Monday, 1 June 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३४ ॥ -----

सोमवार,०१ जुन, २०१५                                                                                            

कौसिक लए रस बिहँस बतायो ।  चितबत जनक पुलकित कहि रायो ॥ 
तिन्हनि दिनकर बंस जनावा ।दसरथ तनुज रूप तिन पावा ॥ 

ते बर धुरीन धर्म धुरी के । अहहिं अवनिपत अबध पुरी के  ॥ 
पाए परच पुनि मुदित बिदेहू । बहुरि बहुरि प्रभु लखत सनेहू ॥ 

लेइ बिदा नृप चरन जुहारे । नगरी दरसन आन पधारे  ॥ 
भमरन रत पथ  पथ जग रूपा । दृग दरपन छबि लखत अनूपा ॥ 

जो देखे सो चितबत पायो ।देखि केहि किन समुझ न आयो ॥ 
लगिहै जुवतीं नयन गवाखेँ । रघुबर रूपनेह भर लाखेँ ॥ 

गौर बरन एक साँवरो,  दोनउ बाल मराल । 
देइ रुचिर सिर चौंतनी चले मोहनी चाल ॥ 

मंगलवार, ०२ जून, २०१५                                                                                   

जनक राज धिए चले बिहाने ।सिउ धनु भंजन के पन दाने ॥ 
जिन राजन कर भंजन होही । बिनहि बिचार सिअ बरिहि सोही ॥ 

सुनि पन सजि सब राउ समाजा । सिआ बरन अभिलाख बिराजा ॥ 
किए संगत  दोनउ सुकुआँरे । धनुमख दरसन मुनिहु पधारे ॥ 

चहुँ पुर कंचन मंच बिसाला । बैठिहि नगर सहि महिपाला ॥ 
धरएँ तमक तकि करएँ घमंडा । टार न टरिहि कटुक कोदंडा ॥ 

लगे उठावन सहस दस राए । कर्मुक तापर उठे न उठाए ॥ 
जनक राज मन भयउ दुखारी । अस तौ रहिहि कुँअरि सुकुँआरी ॥ 

लखत जनक प्रभु मुख परितापा । उठे सहज भंजन  सिउ चापा ॥ 
पावन आयसु मुनि बर देखे । दियो हरष आसीस बिसेखे ।। 

राजभवन उदयित होत रघुबर कासि किसोर । 
बिकसे संत सरोज सब भई बिभासित भोर ॥ 

बुधवार, ०३ जून २०१५                                                                                                             

रसमस दरस रही जो कोई । लोमहरष  तन हहरन होई ॥ 
नयन सुपुत सुमनस जस लागे ।पाए पलक पल्लव जस जागे ॥ 

निज प्रनमन गुरु चरन पठावा । राम कुँअर तुर धनुर उठावा ॥ 
उठत नभोगत  मंडलकृतिलहि । दमकिहि कर जस दामिनि दमकिहि ॥ 

रघुबर छन भीतर दिए तोरा ।भयऊ भुवन रवन घन घोरा ॥ 
परे भूतर होत दुइ खंडा । करे जयति जय सुर मुनि षण्डा ॥ 

दरसत रहँ सब नयन उघारे । चितबत पलकिनि चिक नहि डारे ॥ 
एक घन गर्जन एक जय बानी । रहि रसमई दुनहु रस सानी ॥ 

संख नुपूर सुर संगत बाजिहि  झाँझ मृदंग । 
चहुँ पुर सुमधुर रागिहीं रागिनि रंजन रंग ॥ 


बृहस्पतिवार,०४ जून २०१५                                                                                        

धनुहत नृप भए अस श्री हीना । होत दिवस जस दीप मलीना ॥ 
मंचासित नर घर घर जावैं । रुचितत रतिबत कहत बतावैं ॥ 

री सिउ के कोदंड कठोरा । रघु केरव कर गयऊ तोरा ॥ 
गह गह पुरजन धन कर लीन्हि । बारिहि फेर निछाबर दीन्हि ॥ 

सिअ सुबदन चितई कृपायतन । पाए चातकी स्वाति जलकन । 
पलक पाति रहि बरन बिहीना । लिखे  राम की नयन अधीना ॥ 

हिय सरोजल नयनाराबिंदु । प्रमुदित प्रगसिहि ओसु के बिंदु ॥ 
सखीं माँह सिय सोहति कैसे । निसिगन माँह महानिसि जैसे ॥ 

बहोरि सोए सुभ अबसर आए  जनि कुँअरि कर जयमाल धराए ॥ 
गहि दुहु करसुन्दर जय माला । चली मंद गति बाल मराला ॥ 

मन महि रामहि चाह करि हरिहरि चरि  नियराइ । 
प्रियबर प्रति अति प्रीत बस, पहनाइब नहि जाइ ॥ 

शुक्रवार, ०५ जून २०१५                                                                                                    
 लखत पिया निज मुख सकुचाईं । रघुबर मन ही मन सुहसाईं ॥ 
जो सुमाल कर बास सुबासी । संगत सिय पिय निलय निबासी ॥ 

गावहिं मंगल सकल सहेली । जुगित बाहु बल सिय उर हेली ॥ 
उदधि गान भए सुर घन बाहीं   । जुग  कर कौसुम जर बरखाहीं ॥ 

तिनउ लोक लग जस बिस्तारै । बरे सिया धनु भंजनहारे ॥ 
राम सिया जुग लागिहि कैसे । मयन महा सुख सँजूगि जैसे ॥ 

कहै सखी पद गहु बहु प्रीती । गौतम तिय गति सुरति सभीती ॥ 
दरस सिया के सरल सुभावा । प्रियबर उरस बढे प्रिय भावा ॥ 

तेहि अवसर संकर धनु  भंजन के धुनि पाए । 
भृगुकुल रूपी कमल के  तेज तूर तहँ आए ॥ 

शनिवार, ०६ शनिवार, २०१५                                                                                              

तपसी बसन बदन रतनारे । तापस तपन जस नयन उतारे ॥ 
जनक राज अगुसर सहुँ आयो । प्रणमत पद सिय कर परनायो ॥ 

 सुनि जस तस धनु भंजित पावा । परबह प्रसारत बहुंत रिसावा ॥ 
लिए कुठार कर जहाँ मुनीसा । किए रघुबर अगुसर तहँ सीसा ॥ 

भृगुपति चिक्कर लगन अगनि के । भयउ बचन घन रघुकुल मनि के ॥ 
कोपित पवन अँगारि जगारैं । नाथ निगदन बिंदु बौछारें  ॥ 

जानिहि  मुनि जस प्रभो प्रभावा । अवतरि  राम रूप हरि आवा ॥ 
हे मनु मानस के कल  हंसा । मँगत छिमा अस  करेँ  प्रसंसा ॥ 

मंद मलिन प्रभ मुख लहे रहे सहुंत कर जोरि । 
छिमा मंदिर छिमा दियो जयकर चरन बहोरि ॥ 

रवि/सोम ,०७/०८  जून, २०१५                                                                                               

गयऊ मिटे लगन पथ सूला ।रघुबर सिरपर बरखिहि  फूला ॥ 
राजित करतल कुसल प्रबीना ।सुमधुर सुर कीन्हि कल बीना ॥ 

ढोर हुडुक झाझर कर  साजे । गहगह गगनन घन घन बाजे ।। 
झंझिया कर झंझरी सुहाए । सुर मंडली मुख मधुरिम गाए ॥ 
झार्झर =ढोलबजाने वाला 
सुमुख सुलोचनि मिल करि जूहा  ।  मिलिहि रागिनिहि राग समूहा ॥ 
गावहि सुन्दर  मंगलचारा । छावहि चहुँपुर मोदु अपारा ॥ 

होइहऊँ किमि चित चीता के । भयउ भय भीत चित  सीता के ॥ 
चिंतन रत मन बहु दुःख जोई  ।निबरिहि भय अब चिंत न कोई ॥ 

जनम दारिद जिमि पारस पावा । जनक राज मुख अस दरसावा ॥ 
कहहि मुनि भई सिआ पिआ की । करौ  नाथ अब रीति बिहा की ॥ 

जनक जाइ कुल बिराध बुझाओ । कल कुसल पुनि बोलि पठायो ॥ 
बेद बिदित सब रीति नुहारे । नौ दुलहनि से  नगर सिँगारे ॥ 

कलापावली किए कुञ्ज गली किए कनक कदलि कील कसे । 
मुनगि धरई के मनि गठियई के हरिद बेनु बल बिलसे ॥ 
बीच बीच बधि रचि चीरि कोरि पचि परन मई मनि मालरी  । 
बेली बनई रूचि रुचिरई के झूरत झौरि झालरी ॥ 

बहु रंगी बिहँगी गूँजहि कूजहि कतहुँ भूरि भूरि भँवरे । 
कलस भरे मंगल द्रव्य कर धरे देवन्हि अनुकृति करे ।। 
चौँक पुरायो बहु भाँति सुहायो रंगोरी रंग भरी । 
मनोभवँ कर फंद परी बर बंदनिबारी द्वारि घरी ॥ 

बहु निकट निकट  बटिक बटी बट पुरट पट पहिरन दियो । 
छीन छाम छबि छन उडुगन छूटत दहरी तट लग लग्यो ॥ 
मंगल घट सजे दंड धुजा धजे पताक पथ पथ पहरे । 
पथ राज भए सुरजस पंकज पत जस सौरभित सुगंध भरे ॥ 

 दीपांकुर धरी  मनिमय मँजरी मंजुल मनोहारनी । 
जेहि मंडपु दुलहि बेदेहि केहि कबि सों जाइ न बरनी ॥ 
दूलहु राम जहाँ बरहि सो ठाम तिनहु  लोक उजागरे । 
सों जनक भवन के सुहा भुवन के सोइ प्रति घर घर घरे ॥  

जेहि नयन तिरहुत लखे भूरि भुअन दस चारि । 
ऊँच सदन सन नीच लग जग सुख सम्पद सारि ॥ 

बसइ लखी नगर घर घर भेष भरे जहँ साखि । 
तेहि के सुहा सेष सहि सारद सकुचहिं भाखि ॥ 

मंगलवार, ०९ जून, २०१५                                                                                                 

जनक अवध पुनि दूत पठायो । सिउ धनु भंजन देत बधायो । 
बारि बिलोचन कह बहु बतिया । दिए दूत कर लगन के पतिआ ॥ 

पाए अवध पति लगन प्रस्ताउ । नीर नयन हिय भरे प्रिय भाउ ॥ 
लिखे सरस अस बरन बिदेहा । दसरथ के मन भरे सनेहा ॥ 

तब दूत नृप निकट बैठाईं । पूछ बिकल सकल कुसलाईं ॥ 
दूत द्रवित कहि कह सब बाता । बजाउ बाज सजाउ बराता ॥ 

उठे जनक पुनि आदर साथा । दिए पतिआ बसिष्ठ के हाथा ॥ 
गुरुबर मुख जब पाए सँदेसा ।होहि रागि उर हरष बिसेसा ॥ 

सजि बिधुबदनी रति मदन बिनिंदत जहँ तहँ मिलि लगिहिं भलीं । 
सँमरिहि नागर सहि उमगत मुद महि मग गह गह गलीं गलीं   ॥ 
 सिंगरहि पत नद सहि  परवत रतिबत  कुञ्ज कुञ्ज कौसुम कलीं । 
कतहुँ  बेद  धुनि करिहिं मुनि कतहुँ त उच्चरहिं बिरदाबली ॥ 

राम नगर सदैव सुहावन तदपि रीत कृत लगि पावना । 
पताक पट तोरन माल बनाउन बिलखि नबल बिहावना ॥ 

दूतिन्ह देत निछावरि दसरथ केर दुआरि  । 
 सजिहै बराति सुठि सुभग  भीड़ परी अति भारि ॥ 

बुधवार, १० जून २०१५                                                           

सहजन स्वजन गुर पुर लोगे । सुबुध सूजन सुधि सचिव सुजोग ॥ 
रथि हय  गज रथ केतनि केता । चले अवध पति जुगत जनेता ॥ 

थांल धरी द्वारि कुल नारी । करि आरती कुसुम रस बारी ॥ 
बनइ न बरनत बनी बराता । होंहि सगुन सुन्दर सुभदाता ॥ 

भरत बयस सब छरे छबीले । पहिरे भूषन बसन सजीले ॥ 
बाहन सिबिका हय कर कासे । भरे बस्तु पुर बहिर निकासे ।। 

पथ पथ सबजन सथ जब नाचिहि । रँगे रागिनी रंजन राँचिहि ॥ 
बीच बीच रचि बास सुबासीं । पाए सकल सुख सम्पद रासी ॥ 

भए आनंद समुद रूप जनेत उर न समाए । 
एहि बिधि बहु कौतुक करत जनक पुरी नियराए ॥ 

शुक्रवार, १२ जून,२०१५                                                                                           

बाजत बाजने दिए सुनाई  ।  आतिथेय अगुसर अगवाईं ॥ 
कंठ माल दिए किए जोहारे । आउ भगत कर बहु सत्कारे ॥ 

होइहि मधुर मिलन हिल मेला । मेलिहि जिमि दुइ मंगल बेला ॥ 
हरित दुब  दधि दीप धरि थारी । किए आरती द्वाराचारी ॥ 

बहु सुपास जन वास  सुगंधे । चारिहि दिसि स्वजन कर बंधे ॥ 
कनक कलस रस कोपर थारी  । भरे बिबिध भोजन रसियारी ॥ 

लिए बरातिन्हि बीच बिहारें । मृदुलित मधुर भास् मनुहारें ॥ 
आह जनक जी की पहुनाई । मुकुत कंठ सब करें बढ़ाई ॥ 

मिलि  पितु सों राम लखमन बधे मोह के पास । 
जनक सहित जनेत सबहि लेन  आए जनवास ॥ 

शनिवार, १३ जून २०१५                                                                                              

धारिअ पाउ नेउता दीन्हि  । भयउ समउ अब सबिनय कीन्हि ॥ 
यह सुनि चले अवध के राजा । सहित संत गुरु राज समाजा ॥ 

चारि बंधु सोहहि रथ संगा । जात  नचावत चपल तुरंगा ॥ 
राम जेहि बार तुरग बिराजे । बिभवत बिभावरी मुख लाजे ॥ 

मणिमान पलान सुमोति  जरे । किंकनि  किरन सुजोति कर भरे ॥ 
प्रीत पुलक उद उदधि उछाहू  । चले सिया रघुबीर बिआहू ॥ 

जानि  आवत जनेत दुआरी । चलि परछन सुठि कुँअर कुँआरी ॥ 
सकल सुमंगल द्रव्य सँभारी । सजा आरती चलि  कुल नारी ॥ 

करहिं सकल कल गान द्वारा । कीन्हि बिदित सुमंगल चारा ॥ 
करें आरती दुलहु निहारहि । भूरि भूरि मनि भूषन बारहिं ॥

देखिं राम बर रूप मन जो सुखु भा सिअ मात । 
सारद सेषु महेसु मुख को बिधि बरनि न जात ॥ 

रवि/सोम , १४/१५  जून, २०१५                                                                                         

सैम सामध होअहि समधौरा । समदिहि जिमि दुहु पौरक पौरा ॥ 
जनकु सकल बरात सनमानी । दाए पान बिनती मुख बानी ।। 

राम मंडप आगमन सुहाए । जनकु सादर अवधेसु ल्याए । 
कहे कुअँरि गुरु आनइ  जाईं । सखि सँवारि सिअ आन लवाईं ॥ 

धरे धरा हरियर पद ताला ।बाजिहि  नुपूर मंजुल माला ॥ 
बैठि हरिअ बहु रघुबर बामा । भयउ जुगल जुग पूरनकामा ॥ 

पट पल्लब बल कृत कल कुंजे  । पढिहिं बेद मुनि कल धुनि गुंजे ॥ 
हवन सँजोबल भूसुर भाखी । गहहि अगन सुख आहुत साखी ॥ 

परमिलित कुअँरि परिमल करतल कुँअरु पानि गहन कियो । 
किए बेद बिधान लोक सहित जनि जनक कनिआँ दान दियो ॥ 
पट पल्लब जोरि दोउ बिधिबत लेइ लगि  कल भाँवरी । 
 सुनि बंदी मुख बिबिध हरष सुरगन  कुसुम झरि करि हरिअरी  ॥ 

दुलहिन  बर अनुरूप लखि परस्पर सकुचित हियँ । 
सिय बर लगन अनूप निरख  निज नयन सबहि कहि ॥ 

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