Wednesday, 13 August 2014

----- ॥ उत्तर-काण्ड १७ ॥ -----


बृहस्पतिवार, १४ अगस्त, २०१४                                                                                                 

रक्छा भूषन तन सँजुताईं । रच्छउँ मुकुति सीप के नाईं ।। 
धरे धनुर कर कस गुन सायक । परसु परिघ जस हे रघुनायक ॥ 
हे रघुनायक ! मुक्ता रक्षक सीप की भाँती एवं देह के रक्षा  कवच की भाँती हाथों में परसु परिघ जैसे अस्त्र शस्त्र एवं प्रत्यंचा कसे धनुष-बाण कवच आदि से संयुक्त होकर मैं सेना की रक्षा करूंगा ॥ 

रक्छउँ तात पीठ पख पाँती । घाम घिरे छतरी के भाँती ॥ 
एही  काल प्रभु नाउ प्रतापा । अगजग लग ऐसेउ ब्यापा ॥ 
हे तात ! धूप में घिरे हुवे की रक्षक छत्री की भाँती ही मैं उसके पृष्ठ भाग की करूंगा ॥ इस समय प्रभु के नाम ही का प्रताप संसार भर में इस प्रकार व्याप्त है कि : -- 

बिजय सिद्धि प्रभु चरन जुहारिहि । आप ही आप आनि दुवारिहि ॥ 
साजि सेन सब साधन साईं । अंतर्मन अरु देह के नाईं ॥ 
विजय सिद्धि स्वयं ही द्वार में पधार कर प्रभु के चरणों को प्रणाम करेगी ॥ समर के सभी साधनों से सुसज्जित सेना और स्वामी देह और अंतर्मन के सदृश्य हैं ॥ 

भरत तनय यह पुष्कल नामा । होइहि सोइ देहि के चामा । 
जासु सिरु कर कोसलाधीसा । सस्य सीख सह सहस असीसा ॥ 
यह भरत-पुत्र  जिसका नाम पुष्कल है यह उस देह रूपी सैन्य-समूह की चर्म है ॥ उसके साथ सद्गुण सहित शस्त्रों की शिक्षा एवं सहस्त्रों आशीर्वचन हैं ॥ 

भव भाव भीति भूरि के भोग भूमि बिसराए । 
भव बंधन मोचत सोइ, परम बीर कहलाए ॥ 
जो भौतिक सत्ता से आसक्ति ,जीवन-मरण के भय,  एवं लौकिक सुखों के भोग एवं शक्तिमत्ता का त्याग कर  दे । जीवन-मरण के चक्र को भेद कर वह वीर परम वीर कहलाता है ।  

शुक्रवार, १५ अगस्त, २०१४                                                                                                      

निज कीर्ति का कहुँ अधिकाई । कीन्ह चहुँ चरन सेउकाई ॥ 
बोलि अबर सो बीर न होहै । सूर समर भू बोलत सोहैं ॥ 
अपनी आत्म कीर्ति का और अधिक व्याख्यान  क्या करूँ । हे प्रभु ! संक्षेप में मैं  केवल आपके चरणों का सेवाकांक्षी हूँ । अन्यत्र  बोले वह वीर नहीं होता । समर सूरवाँ रणांगण में ही बोलते शोभित होते हैं  ॥ 

सुनत भरत कुमार के बचना । बीरता भरी रस मय रचना ॥ 
साधु साधु कह दसरथ नंदन । तासु नाउ रन किए अनुमोदन ॥ 
भरत कुमार के वचन एवं वीरता से ओतप्रोत उसकी रसमयी शब्द रचना श्रवण कर , दशरथ नंदन श्रीरामचन्द्रजी ! साधु ! साधु !! कह उठे । तदनन्तर पृष्ठ देश की सैन्य सुरक्षा हेतु पुष्कल के नाम का ही अनुमोदन किया गया ॥ 

बहोरि बानर बीर प्रधाना । कहत प्रभु मह बली हनुमाना ॥ 
हम मानस अरु सिंधु अपारा । तुहरे बल संग पाए पारा ॥ 
ततपश्चात रघुवर ने वानरों में महावीर श्री  हनुमान से कहा : -- हम मनुष्य थे, सिंधु अपार था अहोभाग्य ! जब तुम्हारे बुद्धि बल का प्रसंग प्राप्त हुवा  तब उससे  पार पाया जा सका  ॥ 

बुद्धि बिबेक बिग्यान निधाना । पवन तनय बल पवन समाना ॥ 
कवन सो काज कठिन जग माहि । होइ सकै जो नहि तुम्ह पाहि ॥ 
बुद्धि, विज्ञान विवेक के भंडार स्वरूप हे पवनपुत्र ! तुम्हारा बल पवन  के सदृश्य ही है ॥ संसार में ऐसा कौन सा कार्य कठिन है जो तुमसे नहीं हो सके ॥ 

 गमन लंका हेर तुम लाइहि । भई संभव सिया मेलाइहि ।। 
जानउँ मैं तुम अति बलवंता । एहि कारन सुनु हे हनुमंता ॥ 
लंका लांघ कर जब तुमने सीता को ढूंडा तभी  उसका मिलना संभव हुवा । तुम अतुलित बल के धाम हो यह मुझे ज्ञात है इस हेतु हे हनुमंत सुनो : --  

चाहे ए मम बिनति कहो, चहे कहौ आदेस । 
गवनु पाछिनु पताकिनी, कहि बिनइत अवधेस ॥  
 इसे मेरी विनती कहो अथवा आदेश । तुम उस पताकिनी के अनुगामिन बनो  हे वात्स्यायन ! अवधेश ने विनय पूर्वक फिर हनुमंत से कहा ॥ 

शनिवार, १६ अगस्त, २०१४                                                                                                                    

जहँ जहँ सत्रुहन बिचलित होही । तहँ हे  कपि तुम होहु अगौही ॥

निज भ्रात जान  हे हनुमाना । मगदर्सक बन देहु ग्याना ॥ 
जहाँ जहाँ भ्राता शत्रुध्न विचलित हो जाएं । हे कपि ! तुम वहां अग्रसर होकर उसे अपना लघु भ्राता ही जानना । उसका मार्ग दर्शन करते हुवे उसे ज्ञान देना ॥ 

निज भरोस डगमगि बलिबाहू  । बिकलकरन के बल बर्धाहू ॥ 
आन बिपति सौमुह को लोचन । धरिउ चरन तहँ संकट मोचन ॥ 
जहां कहीं उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगे तब हे बलीबाहु ! तुम ऐसे बलहीन के बल का वर्द्धन करना ॥ यदि सम्मुख कोई विपत्ति दृष्टिगत हो तब हे संकट मोचन ! वहां तुम केवल अपने चरण प्रतिष्ठित कर देना ।। 

 महबीर चरन जहाँ  बिराजे । पाए सिद्धि स्वयं सब काजे  ॥ 
प्रभु अग्या हनुमत सिरु धारे । बाहु सिखर धार गदा सँभारे ॥ 
जहां महावीर के चरण विराजित हों वहां कठिन से कठिन कार्य स्वयं ही सिद्ध हो जाते हैं ॥ प्रभू श्रीरामचन्द्रजी ! की आज्ञा को सिरोधार्य किए बलीमुख ने अपने कन्धों पर गदा सम्भाला  : -  

जावन पूरब करे प्रनामा । उद्घोष करत जय श्रीरामा ॥ 
कहे प्रभु होहि हरष अपारा । तुअ कहि कारज दास सँवारा ।। 
प्रस्थान करने से पूर्व जयश्री राम ! का मंगल उद्घोष करते हुवे प्रभु के चरणों में प्रणाम अर्पित महाबली हनुमंत ने बोले : -- प्रभु ! इस दास को आपके कहे कार्य संपन्न करते हुवे अपार हर्ष होगा ॥ 

 कपि तारानन्दन गवय मयंदन दधि मुख बानर राऊ । 
पुनि रघुकुलकन्ता जाम्बबंता कहत सेन सन जाऊ ।। 
नल नील सोंह बोले तुहु सौं होलें  पीठ भाग बन रच्छिक । 
हे अधिगंता भुज बलवन्ता हे सतबलि हे अच्छिक ॥ 
तब रघुकुल के सिरोमणि ने कपि तारानन्दन अंगद,, गवय, मयंद, दधि मुख ( राम जी की वानरी सेना का एक सेनानायक ) वानर राज सुग्रीव एवं जामवंत से बोले : --  सेना का अनुगमन हेतु आप सब भी तैयार रहिए ॥ अधिगन्त, शतबलि , अक्क्षिक, एवं नलनील आदि से कहा : -- हे बलवंत ! सेना के पृष्ठ देश के रक्षण हेतु पृष्ठ-रक्षक बनते हुवे  आप भी इनके संग हो लें ॥ 

 मेधीअ है पीछु तुअहु सत्रुहन सह हनुमानु । 
समर जोग संजोग कै, सेना संग पयानु ॥ 
हे वीरों ! आप सब भी आवश्यक समर साधन से संयुक्त हो मेधीय अश्व के पीछे भ्राता शत्रुध्न एवं वीर हनुमान के सह सेना के संग प्रस्थान करें ॥ 

पहि पदुम पद कहि पवनज , रज पंकज धरि सीस । 
अजहुँ मोहि निज आसीस, देउ कोसलाधीस ॥ 
तब पवन सुत हनुमंत ने भगवान के पदम चरणों को ग्रहण किए रज पंकज को सिरोधार्य कर कहा हे कोशलाधीश !  अब आप हमें आशीर्वाद प्रदान कीजिए  ॥ 

रविवार, १७ अगस्त, २०१४                                                                                                         

बहुरि बिभीषन बुला पठाईं । आगत सादर सीस नवाईं ॥ 
बरन बरन मधुरित रस सानी । पूछे प्रभु किए अति मृदु बानी ॥ 

लवनासुर के चरित कहानी । कहु सिव तिन त्रिसूल कस दानी ॥ 
कहि बिभीषन जुगल कर जोरी  । अहैं  एक सौति भगिनिहि मोरी ॥

धरि कुम्भनसी नाऊ जननी । मधु दनु के भै पानि प्रनइनी ॥ 
लवनासुर भए  तनुभव तासू । संकर चरन रति रही जासू ॥ 

सिव संभु जप अगम तप कीन्हि । भयउ मुदित प्रभु त्रीशूल दीन्हि ॥ 
मान मद मन दहराम पथ छाँड़े । बिपरीत बुद्धि अवगुन गाढ़े ॥ 

पैह त्रिसूल बल सो खल, लेखै को जी नाहि । 

गगनचारि थल हो कि जल, सब जिउ जीवन लाहि ॥ 

मंगलवार, १९ अगस्त, २०१४                                                                                                 

बिपुल बा सील अगजग धाता । बोलि पठइँ सुमंत्र महमाता ॥ 
कहत महर्षि सेष भगवाना । भए सहुँ प्रतिमुख द्रुत गति आना ॥ 

पूँछिहि प्रभु कह महानुभावा । रन कारिन अरु कौनु सुहावा ॥ 
अरु को जन रन समर्थ होई । कहौ अहैं तव चित जो कोई ॥ 

समाहित बुद्धि रूप  समासा  । सुमंत्र बिनई दिए प्रतिभासा  ॥ 
सका सूर जहँ एक एक दूना । जुद्ध आजुध ग्यान निपूना ॥ 

जहाँ बसे धनु बिद्या गुरु भारी । प्रभु सोइ दसरथ अचिर बिहारी ॥ 
तहँ प्रतिमुख रन सूर अनेका । धीर धनुर्धर एक ते ऐका ॥ 

प्रतापग्रअ नीलरतन, लख्मी निधि रिपुताप । 
उग्र अस्त्र  अरु सस्त्र कुसल, बलिबर आपनि आप ॥ 

बुधवार, २० अगस्त, २०१४                                                                                                    

श्रुत सुमंत्रु के बचन सुहावा । मन ही मन प्रभु हरषावा ॥ 
महामात भट जेहि बुझाई । रघुबर सेना संग लगाईं ॥ 

रनोन्मत सिय पत के प्रेरे । लिए जुझावनी साज घनेरे ॥ 
अस्त्र सस्त्र सन भूषन साजे । आन अरिहान भवन बिराजे ॥ 

उत चहुँ दिसि एहि गान अगाने । असन बसन धन दाने दाने ॥ 
इत रघुबर उर भर अति भावा । रित्विज पाद पदुम पूजावा ॥ 

दान दक्खिना बर कर दाई । तदनन्तर रिषि अग्या पाईं ॥ 
एहि बिधि महमख चलिअ सुचारू । तोषित जाचक भए भरमारू ॥ 

सकल मंगल करमन के होइहि तहँ अनुठान । 
इहँ रामानुज अरिहंत, प्रनमत जनि पहि आन ॥ 

बृहस्पतिवार, २१ अगस्त, २०१४                                                                                             

मंजुल मुख मृदु भचन उचारी । करुन मई हे मम महतारी ।। 
भ्रात मोहि हाय पाछु पठाऊ  । सीस सपुत सुभ असीस दाऊ॥ 

तुहरी कृपा दीठ जो होही । बिजय सिद्धि तव पुत पथ जोही ॥ 
रच्छा भूषन कर धर लोहा । मंडित मुकुट बिजय के सोहा ॥ 

बीर बिक्रमि तव तनुभव तुरहीं । सैनि सहित है संग बहुरिही ॥ 
कहत मात तव सब दिग जय हो । पयान मारग मंगलमय हो ॥ 

भरत सुपूत जदपि रन कौसल । धरे माथ मति भरे बाहु बल ॥ 
सोइ जगत बर धरम ग्याता । त्रास होत तिन भयऊ त्राता ॥ 

सौर श्री समर सूरमा,रे सुत जे तव माइ  ।  
होही मुदित जब तव चरन, पुष्कल सन बहुराइ ॥ 

शुक्रवार, २२ अगस्त, २०१४                                                                                                   

 हे मात तेहि निज सुत लखिहउँ । अरु निज  देहि के भाँति रखिहउँ । 
नाउ अहइ मम जस अरिहंता । हँतारि बहुरिहि ए बीर कंता ॥ 

सुमिरि मातु रत पद अनुरागा । होइहि तव तनुभव बड़ भागा । 
कर धनुर्धर भुज सिखर भाथा । मूर्धन् मुकुट तिलकित माथा  ॥ 

धरे चरन त बढ़े उत्कर्षा । सत्रुहन जनि अस कहहि सहरषा ।। 
बहुरि तहाँ सन बेगिहि आने । सकल बाहिनी लेइ  पयाने ॥ 

गमन गम गति गह पवन सरिसा । चरत पथ सगुन होइ चहुँ दिसा ॥ 
जपत सियापत रघुबर नामा । गगन घोषि जय जय श्री रामा ॥ 

सद्भावना भाव भरन  अधरम करन बिनास । 
कल्यान मई बिजय को , संसूचत चहुँ पास ॥ 

शनिवार, २३ अगस्त, २०१४                                                                                                     

 इत पुष्कल प्रनमत प्रतिपाला । गयउ  उरु क्रम आपनि अटाला ॥ 
जोगति पति नयन पथ राखी । तहाँ प्रिया दरसनाभिलाखी ॥ 

सो सील सती अति हरषाई । जस पिय दरस प्रसादु पाई ॥ 
भेंट प्रिया प्रिय सूचना दाए । पीठ पोषक रन मोहि जुगाए ॥ 

जानिहि तव प्रियतम एहि जोगे । रच्छन हाय श्री राम निजोगे ॥ 
मैं सेबक अग्या अनुहारा । चलन चाहि अब रमन तुहारा ॥ 

जननिन्हि मान सब बिधि दहिहू । तुम तिनके सेबारत रहिहू ॥ 
दिए सो अग्या सिरऔ धारिहू । तासु कहे आखरसह कारिहू ॥ 

लोपामुद्रा इहँ आन सुहाए । मुनि भामिन बहु पतिब्रता आए ॥ 
तिनके प्रति रहिहू सौधाना । होइ न पाए केहि अपमाना ॥ 

सो सबइ तपो बल के सोहा । सत्य सार चित केहि न लोहा ॥ 
षट बिकार जित  अनघ अकामा । अचल अकिंचन सुचि सुख धामा ॥ 

सबईं पतिब्रता पतिनिहि, सीली सरल सुभाउ । 
धरत निहछल प्रीति तासु रहिहु चरन गहाउ ॥ 

रविवार, २४ अगस्त, २०१४                                                                                             

कहत मुने प्रभु सेष बिसेसा । एहि बिधि दयिता दय उपदेसा ॥ 
कांतिमती पयस पद धोके । रागित अम्बुद अंब बिलोके ॥ 

लाइ लवन अरु हरिअ सुहासे । अम्बुज इब अम्बर उद्भासे । 
हे प्रियंरन प्रानाधिनाथा ॥ लेखिहि दिगंत तव जय गाथा ॥ 

दए प्रभु सो अग्या अनुहारौ । सबहि भाँति है राख निहारौ ॥ 
चारि दिसा अरि सन ले लोहा । बढ़ाउब केतु पत कुल सोहा ॥ 

हे महाबाहु अजहुँ पयाऊ । रन रंग भूमि जीत अनाऊ । 
यह धनु बर गुन क़से सुसोहित । लेह गहन रन कारन जग हित ॥ 

चाप कर सर फेरि लगे, करिही जस टंकारि । 
भय दर्सी  ब्यूह कृतत कादर आतुर कारि ॥  

सोमवार, २५ अगस्त, २०१४                                                                                                       

लिजौ ए दोइ तेज तूनीरा । बाँध्यो क़ास कटि हे बीरा ॥ 
रामानुज सुत परम प्रबेका । तासु भीत सर पुंज अनेका ॥ 

लगनहार उर ऐसिहु लागे । दिित पीठ रन आँगन भागे ॥ 
बसंत बंधु सम रूप सुन्दर । प्रानाधार तुहरे बपुर्धर ॥ 

अचिर द्युति के द्यु सम रूपा । बिकिरत पत जस दमकत धूपा ॥ 
तामस हरन तस किए प्रत्यूसा । भरौ ए रच्छा भूषन भूसा ।। 

मूर्धन् मुकुट अति मन मोहक । तेजसवी तव तूल तिलक लक ॥ 
कला कर कलित किए रत्नाचल । बरौ करन जुग कल कुण्डल  ॥ 

अवसि कहत पुष्कल कहे, तव बत कही नुहार । 
होहि मम कृतकर रबि कुल कीर्ति के बिस्तार ॥ 

मंगलवार २६ अगस्त, २०१४                                                                                                       

तदनन्तर पराक्रमी पुष्कल । दइता दिए किरीट कल कुण्डल ॥ 
संजुग करतल आयसु दाई । लउ भूषन तन देउ बनाई ॥ 

जोग अनुचर कर बस्तु नाना । माथ मुकुट किए कुण्डल काना ॥ 
कर्मठ रूप कास करमाला । धरे धनुर भुज सिखर बिसाला ।। 

करे करधन तीर तूनीरा । त्रान अभूषन भरे सरीरा ॥ 
सकल जोग जब कर दिए धारा । श्रीमन कह सुठि नाथ निहारा ॥ 

अयुधी आयुध संग सुसोभित । अमित तेज किए ओक अलोकित ॥ 
कुंकुम संग अगरु कस्तूरी । अर्चत गंधद रस कर्पूरी ॥ 

परम सती कान्त वती, कलिति कंठ श्री दाम । 
कहे कबिबर सोहा कस, जस पुष्कल के नाम ॥  

बृहस्पतिवार २८ अगस्त, २०१४                                                                                                

माल मनोहर उरसिज बस्यो । नाभि लए नल कील लग सज्यो ।। 
सती कांत वती लिए थारी । बारिहि बारि आरती तारी ॥ 

तेजस तूल तिलक धरि भाला । अक्छत जुगत मनिक सर लाला ॥ 
तिलक लक्छन तेजसी कैसे । गगन आठ धरि दिनकर जैसे ॥ 

असूर्पस्या लागै चरना । दिरिस वान चित्र जाइ न बरना ॥ 
कर माल मह प्रिया भुज धारे । अनुरागित दृग संग निहारे ॥ 

सकल बीर बर समर रूचई । अस कह पुष्कल बाहिर आईं ॥ 
त्रान जुग चरन सुठि रथ चाढ़े । मात पिता दरसन हुँत बाढ़े ॥ 

पिता भरत मांडबी माता । जयासीस दैं जनमन दाता ॥ 
कहत पंकज पद सीस नवाए । ले आसिर बाहिनिहि पहि आए ॥ 

अमित  तेजस बिक्रम बीर, रन साधन संजोग । 

सैंहिक सैनिक सैन के, सोहा दरसन जोग ॥   





शुक्रवार, ०४ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                       

चरन सरन एक एक दुग्नाया । सान धरत मुख सधत सवाया ॥  
ठारि धारि सब दरसत सोई । हलबल कल कोलाहलु होई ॥ 
कसौटी में कसा हुवा उन बाणों का मुख लक्ष्य को सवा गुना साधता और उसके पथ पर चलते हुवे एक एक बाण,दोहरे हो जाते ॥ 
सैनिक स्थिर स्वरुप में बस उन्हें देखते ही रह जाते । उनके चलने से हलचल मच गई, वातावरण में कोलाहल सा भर गया ॥ 

ध्वजन प्रहरत पत पत फड़के । बिटप ह्रदय बहु हहरत धड़के ॥ 
खग मृग मग जे बिपिन बिहारे । धावत डरपत चढ़े पहारे  ॥ 
हावा में प्रहरते हुवे पत्ते फड़फड़ाने लगे । वृक्षों के ह्रदय कांपते हुवे धड़कने लगे । विपिन विहारी पशु-पक्षी भयभीत होकर भागते हुवे पहाड़ियों पर चढ़ बैठे ॥ 

सत्रुहन अब लग मूर्छा छाइ ।  ऐतक बेर मह भई दुराइ ॥ 
रन कारिन दल दसा बिलोके । तब तिन मुख भा लाल भभोके ॥ 
शत्रुध्न के चित्त जो अब तक अचेत था । इतने समय में वह अचेतना दूर हो गई ॥ जब उन्होंने अपने वीरों एवं सैनिकों की गति का अवलोकन किया तब उनका मुख क्रोध से लाल हो गया ॥ 

भाँवर भुइँ जब भइ सिध गीवा । क्रोधि क्रान्त के रहि न सींवा ॥ 
कारत मुख मुद्रा बिकराला । घनके जिमि घनकत घन काला ॥ 
समस्त रन क्षेत्र का भ्रमण कर जब उनकी ग्रीवा सीधी हुई । तब उनके क्रोध और आक्रान्त सीमाहीन हो गए ॥ तब उनका मुख भयानक स्वरुप में ऐसे गरजने लगा जैसे काले ग्बादल गरजना करते हों ॥ 
जिन सर लवनासुर हते, तिन्ह सरिद संधान । 
सत्रुहन कर्खन धनुर्गन, लेइ करन लग तान ॥ 

शनिवार, ०५ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                       

बान भयंकर दंस कराला । जस जम के मुख बिकराला ॥ 
छूटत तरस दस दिग ज्वाला । करत प्रकासन तम घन काला ॥ 

लव लाल लोचन जब तिन देखे । भ्राता कुस मन सुमिरन रेखे ॥ 
भ्रात बलइ बल लागिन लागहि । देख बान जिन बिपरित भागहि ॥ 

छन ठहरत लव सोच बिचारे । रन बाँकुर कुस भ्रात हमारे ॥ 
एहि बयस तिन्ह रहत सहारे । तौ मैं लैंते सकल सँभारे ॥ 

दन्तक तर दर दारुन दाई । चित हतप्रभ तब रहत न छाई ॥ 
भ्राता कुस के सह्सथ हीना  । सत्रुहन सर किए मोहि अधीना ॥ 

पुंग पुच्छल पुंख पवन, अटन रवन रन राध । 
लसनत लव नलिन निलयन ,लखहन दिए लखभेद ॥ 

रविवार, ०६ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                             

काल अगन सम बान भयंकर । घात खात तिन लै निलयन पर ॥ 
समर सूर लव भए गत चेतन । कटे बिटप सम परे माझ बन ॥ 
काल अग्नि के समान भयंकर बाणों  का  आघात लिए ह्रदय के संग समरमूर्द्धन लव अचेत हो होते हुवे कटे हुवे वृक्ष के सदृश्य रणभूमि के मध्य गिर पड़े ॥ 

खलन दलन दल बादल गंजन । मूरछा मई दरसत सत्रुहन । 
नीति कुसल सिखिताजुध जाने । रन बलबन निज बिजइत माने ॥ 

घटाटॉप ससि सीस सजाया । सुरमइ रूप सोंह रघुराया ॥ 
सत्रुहन तिन ले रथ बैठारे । लै जावन तँह सोच बिचारे ।। 

दरस बट मित्र सत्रुहन अधीना । जे दरसन तिन बहु दुःख दीना ॥ 
बहुरि तेइ बात गवन तुरंते । लव मातु जेइ देइ उदंते ।। 

कहे अस मातु जानकी, लिए लव लाल तुहार । 
कौनु राउ के बाजि गहि ,बाँधे तरु बल कार ॥ 

सोमवार, ०७ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                             

राजाधिराज धरे धारि बृहद । अरु अहहिं तिन्ह बहु मानद मद ॥ 
गहत बाजि भै जुद्ध भयंकर । एक पुर तव लव एक धारिहि बर ॥ 

पर हे मात कर पुत तुहारे । एक एक जोधिक गवने मारे ॥ 
बहुरि बहुरि ते लरन अवाई । बार बार लव भै बिजिताई ॥ 

लव राजनहू किए गत चेतन । औरु पाए जुद्ध मह महा जयन ॥ 
तदनंतर किंचित बिलम्ब पर । राऊ के मुरछा भइ ओझर ॥ 

जब राऊ गत चेत बिजोगे । तिन के मुख दृग दरसन जोगे ॥ 
अतिसय क्रुद्ध कर कारे पतन । भए गत चेतन तव पुत भू रन ॥ 

बोलइ सीते दुःख धरि भीते आह राउ का भए निठुरे । 
सो बालक सन रन कारि कवन, अधर्म तस मति बहुरे ॥ 
मम लरिकाई किए धरासाई रे बालक किमि कहु तौ । 
किए पतन कवन लरत बाल सन अब गवने कहँ रउ सों ॥  

जब पतिब्रता सिय बटु सों, कहि रहि ऐसन बात । 
आए बीर बर कुस त्यों,मह रिसि गन साथ ॥ 

मंगलवार, ०८ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                          

भइ अति बिकल भर लोचन बारि । दरसइ तिन्हन सिया महतारि ॥ 
तब लव आपन जनि सन बादे । मम सों सुत अरु जे अवसादे ॥ 

कहु कँह मर्दरि मोरे भाई । समर सुर सों दी न दिखाई ॥ 
गए कहूँ भँवरन कतहूँ बिहारी । तुम्ह रुदन करि को कर कारी ॥ 

कही जानकी रे मम बच्छर । सुनि मैं गहि लव को के हय कर ॥ 
हय रहि को नृप जग्य प्रसंगे । इँहा अवाऍ बहु रछक संगे ॥ 

जदपि बाहु लव बहु बरिआरे  । सों एक अनेकारि रन कारे॥ 
तदपि ते बिक्रमी दिए हँकारे । बहुस रछक तिन सन लर हारे ॥ 

जे सन गए ते बटुक बहुराए । फेर बाँधत सब बात बताए ॥ 
रे ललना तुम समउ पर आए । गवनउ लवनउ लवनु परिहाए ॥ 

हे जनि जे तुम लौ जान, कहत कुस करे आह । 
लव परिहत गत मैं लान, बंधन मोचित लाह ॥ 

बुध /गुरु , ०९ /१० अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                           

अजहूँ गवन लव मैं तिन नाहू  । बाहि अनी लखहन लख लाहू ॥ 
अमर देव दहूँ सों अरु कोई । चाहे सोंमुख रुद्रहू होई ॥ 

तथापि तिन तिख तर परिहारे । करत तिलछ लहूँ लव तिहारे ॥ 
सुनउ तनिक अरु मोरी माई । रुधत रुदन उर दुःख परिहाई ॥ 

कलि भू जिनकी दीठत पीठे । लगि लाछन तिन पीठहि दीठे ॥ 
जिनकी गति रन कारण होई । पावत परम बीर पद सोई ॥ 

रन कारिन के जस रन कारन । मरनी मारन में रजतंतन ॥ 

मुने कुस के बचन श्रवन, धरि धीरज लवलेस । 
भइ मुदित सुभ लखिनि सिया, कथनत भगवन सेस ॥ 

भाल धनुर धर आयुध नाना । देइ सुत सिस असीस बरदाना ॥ 
कहत सिया पुटी अब तुम गवनौ । कटक बंध लव लेइ लवनौ ॥ 

अस श्रवनत कुस धर कोदंडे । कासित कटि भाथा सर षंडे ॥ 
गुरुबर बिदिया चेतस धारे । भए धन्बिन धनु गुन टंकारे । 

छेप धुनी धन्बन बिस्तारे । देउ नाथ कर जोर पधारे ॥ 
सुमनस जल कण करतल धारे । सिया कुँवर के चरन पखारे ॥ 

बंदन करत झरत जल धारे । बूंद बूंद कंठन गुन्जारे ॥ 
केसरि कंधर उर मनुहारी । लोचन पथ अस जस सर चारीं ॥ 

लाल लवन लक तिलक ललाटे । त्रस रजस परिपाटलित पाटे॥ 
मनि कान्त मुख तनि मुसुकाने । मानहु रघुकुल गाथ बखाने ॥ 

सारंगा सुन्दर, पाटन परिकर कमनइ कुस कटि कस्यो । 
सर सर सिख साखा, सूल सलाका,लाहन लोहन लस्यो ॥ 
बनबासी भेसा, कुंडल केसा, रूप सम्पद रस रस्यो । 
पावन पत पितरक, तेज नयन नक्, रघुबर मुख छबि बस्यो ॥  

रघुकुल तिलक नौ दीपक, नौ नयनाभिराम । 
नौ अभिजनभिवादन कर, जलकन लेइ बिश्राम ॥  

बुधवार, २ ५ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                  

मात गुरु मुख सुभ आयसु पाए । काया कवच कल सकल सजाए ॥ 
पंकज पद रज सिरौ धराए  ॥ बेगि बहस कुस रन भू पयाए ॥ 

बहोरि कुस रन कामिन कारी । रंग रनक चक चरनन धारी ॥ 
आत भ्रात दिसि लव चौंकारे । मनहु पवन सह पा पौ जारे ॥

कसमसन रसन बंधन छड़ाए । रथ सन लव रन भूमि निकसाए ॥ 
नय कोविद कल कौसलताई । गुरुबर दिए कर दोनउ भाई ॥ 

एक पुर कुस के तिछ्नत बाने । दूज पुर लव के सूलक साने ॥ 
सूर सकल जस उदल तरंगे । सागर सम भट भँवरित भंगे ॥ 

उत सेन सूर श्री राम रघुकुले । इत लव कुस रन रनक संकुले ॥ 
दो रन बाँक़ुर अस कल बादे । जस घन घाँ घाँ घनकन नादे ॥ 

राज रजोकुल पत के सैने । धनुर बान के मुख सन बैने ॥ 
दोनउ पुर बढ़ करकएँ करखें । चरत बान जस बरखा बरखे ॥ 

दोउ भ्रात धनु तर अस तरितें । घन घर जस छनु छबि अवतरिते ॥ 
छन छन जल कन छीनक छनिते । धारिन तस छत बंत छितरिते ॥ 

महरथी समर संग्राम, सूर बीर भरि सैन । 
एक सन एक रन बांकुर, सह रथ बड़ धनु बैन ॥  

जिनके चितबन ऐतक तीखे । भेद लखित लख लखहन दीखे ॥ 
तपित तपोबन तन कर कासे । कोटिक केतु किरन संकासे ॥ 

पीताम्बर बर बेस मुनिसा । रचित कुंडल कल केस कुलिसा ॥ 
भाल भँवर भरि धारिन अंके । मनु धारा धर धारिहि बंके ॥ 

कटक कटक कृत त्रिसूलाकारि । तूर तेज त्रस तेजनक धारि ॥ 
तिनके कासि कसा कोदंडे । कही न जाए तिन्ह गुन षंडे ॥

सूल सिखर सर लाहन लाहू ।  जँह तँह परत दिग बली बाहू  ।। 
आवइ सौंमुख जे सर कोई । छिनु भर मह ते छलनी होई ॥ 

बलइ बली मुख बालि कुमारा । सर निकर तिन्ह कंदुक कारे ॥ 
चराचर कर नभस दुआरे । कबहु उछारें कभु पट्कारें ॥ 

चरत सतत अस सर जर धारा । धन्वन सन जस तरत अँगारा ॥ 
सुभट सुरथ सथ महि महबीरे । भए छतवत हत महि मह गीरे ॥  

बालि तनय जस रन सूर, जिनके चरन अटेर । 
तिन सिया के रन बाँकुर, किए छिनु भर मह ढेर ॥ 

रन चरन गहन धूरि धर, दिए गगनाँगन रंग । 
कारि कंठन कलरव करि, दिसि गोचर मुख अंग ॥  

गुरूवार, ०३ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                               

पुनि रन कंठन करकत कैसे । कुलिस कुलीनस रवरत जैसे ॥ 
खैंच  करन लग सरित सरासन । ऐंच नयन सर चरित सनासन । 

दूइ दल हन रन करमन भीरे । जूझत जस दुइ घन गम्भीरे ॥ 
चरत गगन अस सायक सोई । जस धारा धर बाहक होही ॥ 

हटबत सुभट कहरत भू गिरे । को इत तिरे कोउ उत तिरे ॥ 
उठइ धरा पुनि धाए  सुभट्टे । दोउ भाइ मुख मारि झपट्टे ॥ 

पुनि कर्नी कारन लौ लग, कुस कास कोदंड । 
चरत तरत सरत सल्लग, करत प्रघोष प्रचंड ॥      






रविवार,२९ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                     

पुनर लव कर सर धनुर धरिते । लख़त लोचन लख भेद लहिते ॥ 
एक पुर लव एक पुर पितु षदना । सेन रसन जस बसि मध् रदना ॥ 

महरथी समर संग्राम, सूर बीर भरि सैन । 
एक सन एक रन बांकुर, सह रथ बड़ धनु बैन ॥  

सोमवार,३० सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                      

नाम राम रघु नायक धारी । नानायुध रथ बाहि सँवारी ॥ 
तेइ सेन तब हाहाकारी । सौंतुख परि जब दुइ सुत भारी ॥ 

दोइ दृग दीठ रहि सर जूथा । तिलक तेज तिन सूल बरूथा ॥ 
एक बार जेइ दिसा निहारे । डरपत सुभट कवच कर धारे ॥ 

उरस उदर जब लागन भागे । समर सूर तब भागन लागें ॥ 
पूँख पर बट सुभट घर बूझे । का कहि तिन्ह कछु नाहि सूझे ॥ 

कहित पवन सन पूछ बुझाईं । पवन लछन सुत तिन पद नाईं ॥ 
रन कारन आँगन बैसे । देखु दुइ पुर एके कुल कैसे ॥ 

दिग कुंजर सर पुँज पलक, दिसा सिखर बर सूल । 
चारि चरन चर कुञ्ज घर, धरे मात पद धूल ॥  

छन खलदल गंजन दुःख दाई । सत्रुहन राजन सों बढ़ आईं ॥ 
सोंहत रहि जे लवहु समाने । तिन कुस सन रन कारन आने ॥ 
इसी समय दुष्टों के दल वीरों को ताप देने वाले राजा शत्रुध्न आगे बढ़े और भ्राता लव के सदृश्य ही प्रतीत होने वाले वीरवर कुश से युद्ध करने हेतु उसके सम्मुख आ गए ॥ 

पाहि पैस के पूछे सोईं । हे महाबीर तुम को होई ॥ 
काइ कलेवर तुहरे रूपा । भान देइ निज भ्रात सरुपा ॥ 
समीप पहुँच कर  उन्होंने  पूछा : -- महावीर ! तुम कौन हो ? तुम्हारा आकार-प्रकार और रूप आकृति से तुम अपने भ्राता लव क्जेसे प्रतीत होते हो ।। 

तव भुज दल अतुलित बल धामा । कहु तौ का तुहरे सुभ नामा ॥ 
को तव जने तुम्ह किन जाता । कँह तव जनि कँह जनिमन दाता ॥ 
तुम्हारी भुजाएं अतुल्यनीय बल का धाम हैं । कहो तो तुम्हारा सुभ नाम क्या है ।। वो कौन हैं ? जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया, तुम किनके पुत्र हो ? तुम्हारी माता कहां है ? तुम्हारे जन्म दाता कहां हैं ? 

कहत कुस सोइ मात हमारी । पति ब्रता धर्म पालन कारी ॥ 
श्री सीता सुभ जिनके नामा । जन्मे हम तिन गर्भन धामा ॥ 
कुश ने कहा : -- जो पातिव्रता धर्म का पालनकरने वाली है वह हमारी माता हैं ॥ सुश्री सीता जिनका शुभ नाम है । हम उन्हीं के पावन गर्भ धानी से जन्में हैं ॥ 

गुरु बाल्मिक पद बंदत, कारत सेवहि मात । 
एहि सघन बिपिन मह रहत, हम दोउ यमज भ्रात ॥ 
महर्षि गुरु वाल्मीकि के चरणों की वंदना कर तथा माता की सेवा में अभिरत हम दोनों युगल ब्भारा इसी सघन विपिन में ही रहते हैं ॥ 

शनि/रवि १२/१३ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                              

प्रथम गुरु भई हमरी माई ।  जे धरे कर चरन सेखाईं ॥  
हमरे गुरु मह रिसि बाल्मीकि । देइ सब बिधि बल बिद्या नीकि ॥ 
प्रथम गुरु स्वरूप में स्वयं हमारी माता हैं, जिन्होंने हाथ पकड़ कर हमें चलना सिखलाया ॥ और जिन्होंने सभी प्रकार की सुन्दर विद्या का बल दिया वे गुरुवर महर्षि वाल्मीकि हैं ॥ 

तिन कर भए हम परम प्रबीने । सकल लखन गुन तिनके दीने ॥ 
भ्राता लव अरु कुस मम नाऊ । कहु तुम को का तव परिचाऊ ॥ 
जिनके कारण हम कुशल कोविद हुवे ये समस्त शुभ गुण एवं शुभ लक्षण जिन्हुन्ही की देन हैं ॥ हमारे भ्राता का नाम लव है और हमारा कुश है । अब कहो तुम कौन हो ? तुम्हारा परिचय क्या है ? 

समरथ सूर बीर जुजुधाना । दिए दरसन तुहरे मुख भाना ॥ 
बयसय जवनय हय जे सुन्दर । कहु तिन्ह इहाँ छाड़े को कर ॥ 
तुम्हारा श्री मुख के दर्शन से तो ऐसा प्रतीत होता है कि तुम एक समर्थवान सूर वीर योद्धा हो ॥ कहो वय वर्द्धित तीव्रवान इस सुन्दर घोड़े को तुमने यहाँ किस कारण से छोड़ा है ॥ 

दरसन मह लागहु बरिआरे । कारौ रन पुनि संग हमारे ॥ 
तीर तुरावइ छन उर धारों । तुदन तुम्ह कौ तीरित कारों ॥ 
देखने में तुम बहुंत बलशाली प्रतीत होते हो । यदि ऐसा है तो फिर मेरे साथ युद्ध करो ॥ तीव्र गति से चलने वाले तीरों को मैं अभी तुम्हारे हृदय में उतार कर तुम्हारा कार्य समाप्त कर दूँगा ॥ 

जे सिय राम रजस जात, सत्रुहन जब ते जान । 
तिन चितब ए चितबत बात, कौउ भाँति ना मान ॥ 
ये ( युगल पुत्र ) सिया रामचन्द्र के रजस से उत्पन्न हुवे है, जब शत्रुध्न ने यह जाना । यह स्तब्ध कर देने वाली बात को शत्रुध्न के चित्त ने किसी प्रकार से भी स्वीकार नहीं किया ॥ 

रन हूँत तर्जित जातक दोई । जेहि कारन धरे धनु सोई ॥ 
जब कुस दरसे तिन धनु धारे । खैंच रोख के रेख लिलारे ॥ 
चूँकि इन जातकों ने उन्हें रन हेतु ललकारा था ।इस कारण  शत्रुध्न ने धनुष धारण किया ॥ जब कुश ने उन्हें धनुष धारण करते हुवे देखा । तब उसके मस्तक पर क्रोध की रेखाएं अंकित हो गई ॥ 

सूल सरि सर कठिन कोदंडे । गहत हस्त तल तार प्रगंडे ॥ 
धरत बरत बर बाण बिताने । काषत कासि करन लग ताने ॥ 
 फिर कुश ने अपने कंधे से शूल के सदृश्य बाण और कठोर धनु को उतार कर हाथों में ग्रहण किया ॥ और धनुष गण पर बाण को साध कर प्रस्तारित करते हुवे अपनी मुष्टिका में कसते हुवे उसे कर्ण तक तान लिया ॥ 

बहुरि दोएँ संधानत चापे । आन आन बन बान ब्यापे ॥ 
दरसत धनबन लखहन लाखे । जे दरसन बहु बिस्मइ राखे ॥ 
फिर दोनोब छोर के संधानित धनुष से बाण आ आ कर बन भूमि ( जो कि रन भूमि में रूपांतरित हो चुकी थी ) में व्याप्त होने लगे ॥ आकाश में लाखों बाण दर्शित होने लगे यह आक्शीय दर्शन अत्यधिक विस्मय कारी था ॥ 

ते काल रन उद्भट कुस क्रुधे । किए प्रजोग नारायनाजुधे ॥ 
सत्रुहा पतहु बहु बिक्रम होई । यह आयुध हत सके न सोई ॥ 
उसी क्षण रन उद्भट  कुश कुपित हो उठा । और उसने नारायण आयुध का प्रयोग किया ॥ शत्रुधन की पद प्रतिष्ठा भी बहुंत ही पराक्रमी थीं  अत: यह आयुध उन्हें बाधित करने में असफल हुवा ॥ 

ए सोचत भए अधीर, करिअ कुँवर कोप असीँव । 
बिक्रमी मह बलबीर, नृप सत्रुहन सों कहे ॥  
ऐसी विवेचना कर अधीर होते हुवे सिया कुंवर कुश के क्रोध की सीमा नहीं रही । महाबली, महावीर,महा पराक्रमी राजा शत्रुध्न से कहे : -- 

सोमवार, १ ४ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                      

हे मह राऊ यहू मैं जाना । तुम बर रन बादिन मैं माना ॥ 
कारन जे मम अजुध भयंकर । भए असमर्थ तव बिधन तनिकर  ॥ 
हे महाराज मुझे इस बात का तो संज्ञान हो गया है, और में मानता हूँ कि तुम श्रेष्ठ योद्धा हो ।  इएसे संज्ञान और मान का कारण यह है कि  मेरा यह भयंकर आयुध तुम्हारा अल्पांश प्रतिरोध करने में भी असमर्थ रहा ॥ 

तदपि एहि छन मैं लै त्रिबाना । करुँ पतत इह लीला बिहाना ॥ 
जे मैं तव अस बयस न कारूँ । तो तुम्ह सोंह किरिया पारूँ  ॥ 
तथापि मैं इसी क्षण त्रयबाण लेकर पतन करते हुवे तुम्हारी इह लीला समाप्त कर दूँगा ॥ यदि मैं तुम्हारी ऐसी
अवस्था न करूं तो आज तुम्हारे सम्मुख यह प्रतिज्ञा करता हूँ : -- 

चह कोटिक कृत कारित कोई । मनुख जोनि तिन लब्ध न होई ॥ 
ते जोनि जोइ पावन हारे । मोह बस करि न तिन सत्कारे ॥ 
चाहे कोई करोड़ों सुकृत्य कारित करे फिर भी यह मनुष्य की योनि उसे प्राप्त नहीं होती । और इस योनि के प्राप्त कर्त्ता माया मोह वश इसका आदर नहीं करते॥ 

 ऐसे नर जे पातक लागी ।तिन सौंतुख भयऊँ मैं भागी ॥   
अस कहबत कुस मुख धुँधकारे । भेद धुनी धन्बन बिस्तारे ॥ 
ऐसी जीवात्माँ जिस पाप से बाधित होते हैं उन्ही के समरूप मैं भी उसी पाप का भागी बनूँ ॥ ऐसा कहते हुवे कुश के मुख ने गर्जना की । जिसकी गुंजार गगन को भेदते हुवे चारों और प्रस्तारित हो गई ॥ 

लावन बदन ललित लोचन, लाहत लाल अँगार । 
मनहु मानस मुख मंजुल, कमल मुकुल मनियार ।। 
मनोहारी मुखाकृति,सुन्दर लोचन, उसपर क्रोध की लालिमा  । मानो मुख रूपी सुन्दर मान सरोवर में अंगार रूपी अध् खिले कमल शोभायमान हो ॥ 

मंगलवार, १५ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                     

चेतत गुरु पुनि कुस लिए चापे । परस भाल मुख मंतर जापे ।। 
अरु कहि राजन अब मैं नेते । आपन काल कल्पत सचेते ॥ 
तत्पश्चात अपने गुरु का ध्यान कर, कुश ने धनुष लिया, फिर धनुष को मस्तक से स्पर्श करते हुवे दीक्षा प्राप्त मंत्र का जाप किया ॥ और कहा हे राजन अब मैने यह निश्चय कर लिया है अत: तुम अपने काल की कल्पना कर सावधान हो जाओ ॥ 

कारूँ  पतन तव में तत्काला । बाँधउ बल सन बान ब्याला ॥ 
हे धन्बिंन कह सत्रुहन भासे । छाँड़ौ लखहन बदन बिहासे ॥ 
मैं तुम्हें इन सर्प सदृश्य बाणों से बांधकर तत्काल ही तुम्हारा पतन करता हूँ, ॥ तब शत्रुहन ने मुस्कराते हुवे ( व्यंग पूर्वक) ऐसे वचन कहे - हे धनुर्धारी ! 'बाण चलाओ' ॥ 

सत्रुहन हरिदै भवन बिसाला । तरत सारँगी नीरज माला ॥ 
तमकि ताकि कुस तीर बिताने । मुकुलित मुख प्रफुरित मुसुकाने ॥ 
तब शत्रुध्न के विशाल वक्ष, जहां कि नाना वर्णों से युक्त स्वेद कणों की मुक्तिक मालाएँ उतर रही थीं को उद्वेग सहित ध्यान पूर्वक एखाते हुवे कुश ने बाण प्रस्तारित किया ,उस समय कुश के अध् खिले मुख पर एक मुस्कान खिल गई ॥ 

बाहु दल दृग जोजित काँधे । लखत लखनक लख सीध बाँधे ॥ 
काल अनल फल बान कराला । छुटै प्रथम सों कनक ज्वाला ॥ 
कंधे, दृष्टि एवम भुजाओं को की युक्ति से लक्ष्य चिन्हों को साधते हुवे देखा ॥ फिर कालाग्नि के सदृश्य भयंकर मुख वाले प्रथम बाण फिर चिंगारी के जैसे छूटा ॥ 

सत्रुहन लोचन कुस करत देख बान संधान । 
भए अतिसय कुपित तब जब, सर सर निज सों आन ॥ 
शत्रुध्न की दृष्टि ने कुश के बाण संधान करते हुवे देखा तब अत्यधिक कुपित हो गए जब सर-सर करता बाण उनकी ओर आने लगा ॥ 

बुध/गुरु, १६/१७ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                             

प्रभु रघुबर सुध मानस मंते । आन बान सों घानि तुरंते ॥ 
भय कुस कुपित कटत नाराचे । अगन कण मुख भरकत नाचे ॥ 
तब प्रभु श्रीरामचंद्र जी का स्मरण कर शत्रुध्न ने मन ही मन मंत्रणा की । सन्मुख आते बाण को तत्काल ही नष्ट कर दिया ॥ बाण के नष्ट होते ही कुश क्रोधित हो उठा और उसके मुख पर क्रोध के अंगारे भड़कते हुवे नृत्य करने लगे ॥ 

सैलबान सल श्रिंग सलाका । सुधित सान सन लोहित लाखा ॥ 
लोहितेखन लख लौंक उठाई । बरत धनुर दूज बान चढ़ाईं ॥ 
पत्थर जैसे कठोर बाण जिनके फल शलाकाओं के समान तीक्ष्ण थे । और उस फल की धातु शान पत्थर की कसौटी पर लाखों बार कसे हुवे थे ॥ ऐसे बाणतूण लिए कुस ने जलती हुई आँखों से लक्ष्य को निहारा और धनुष उठा कर प्रत्यंचा में दुसरा बाण चढ़ाया ॥ 

छत कारन उर चरे प्रचंडे । चढ़े घात सत्रुहन किए खंडे ॥ 
पुनि कुस सुध जनि पदार्विंदे । धर धनुबर तिज सर लखि विन्दे ॥ 
तद उपरान्त तीक्ष्ण बाण प्रत्यंचा छोड़ कर शत्रुध्न के ह्रदय को घायल करने हेतु प्रस्थान किए । ताक में बैठे शत्रुधन ने उन्हें खंड खंड कर दिया ॥ फिर कुश अपनी जननी के चरण कमलों का स्मरण किया  और श्रेष्ठ कोदंड धारण कर लक्ष्य प्राप्त हेतु तीसरे बाण का संधान किया ॥   

तीख तीज तर धुरु उपर धाए । घानन्ह सत्रुहन चाप उठाए ॥ 
निकर निकर कर सर सर सरिते । गगन सरन जस किरन बिकरिते ॥ 
तीसरा तीक्ष्ण बाण उपरोपर दौड़ाने लगा, जिसे नष्ट करने के लिए शत्रुध्न ने धनुष उठाया 

तासु पूरब जे आए धिआना । भए पत भू हत लागत बाना ॥ 
लागत सर तन छतवंत कृते । बहुरी सत्रुधन भए मूर्छिते ॥ 
और इसके पहले कि उसे नष्ट करने का ध्यान आता बाण अपना लक्ष्य प्राप्त कर चुका था, जिससे शत्रुध्न हतवत होकर रण भूमि पर गिर गया ॥ 

हतत सत्रुहन रन परत पहुमी । परावत कटक चिक्करत धुमी ॥ 
तेइ समउ निज भुज बलवंता । समर बीर कुस भयउ जयंता ॥ 
शत्रुध्न घायल होकर रण भूमि गिर गए । ( यह देख) सेना में भगदड़ मच गई और वह चीत्कार करती रन भूमि में विचरने लगी ॥ 

कहत भगवन सेष मुने, सुरथ सिरौमनि बीर । 
रामानुज रन भू पतन दरसत भयउ अधीर ॥ 
भगवान् शेष जी कहते हैं हे मुने ! वीरों के वीर राजा सुरथ ने जब श्रीरामचन्द्र के अनुज शत्रुध्न का पतन होते देखा तब वे अधीर हो उठे ॥ 
रचित खचित चित अति बिचित्र, मनिमत रथ रतनार । 
 तापर तत्पर बिराजित, लिए रन भू अवतार ॥ 
और फिर अति अद्भुद रक्त वर्ण माणिक्यों से खचित, सुरुचित श्रेष्ठ रथ में विराज कर सुरथ तत्परतापूर्वक रन भूमि में उतरे ॥  

शुक्रवार, १८ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                   

जिन कर केसर बाहिनि राधे । बढ़े कुस सौ रथ रस्मि साधे ॥ 
जोंहि सुरथ कुस सोंमुख पैठे । तोंहि थिरत रथ चरनन ऐंठे ॥ 
जिन हाथों से अष्ट भुजा धारी, वनराज वाहिनी, माता दुर्गा की आराधना की थी । उन्हीं हाथों से उस अद्भुद पच्चीकारी रथ की किरणों को साधे आगे बढ़े ॥ जैसे ही  राजा सुरथ कुश के सम्मुख पहुंचे वैसे ही  रश्मियों ने गतिशील चक्रों को  नियंत्रित करते हुवे ,रथ को स्थिर किया ॥   

छाँड़े पुनि पख पुंज अनेके । केर बिकल कुस चहुँपुर छेके ॥ 
सकुपित कुस तेहि लै दखीना । सार बान दस किए रथ हीना ॥ 
फिर राजा सुरथ ने  बाण संधान कर समूह के समूह छोड़े । और कुश को व्यथित करते हुवे उसे चारों और से घेर लिया ॥ इससे कोपित होकर कुश ने परिक्रमा करते हुवे दस बाण चला कर सुरथ को रथ हीन कर दिया॥ 

कठिन कोदंड कसि प्रत्यंचे । किए खंड खँडल सकल बिरंचे ॥ 
बिरथ सुरथ पथ दरसत कैसे । फुर फर पतहिन् को तरु जैसे ॥ 
फिर प्रत्यंचा कसा हुवा कठोर धनुष सहित सुरथ की समस्त साज सज्जा को खंड खंड कर दिया ॥ रथहीन सुरथ कैसा दिखाई दे रहा था जैसे वह कोई वृक्ष प्रसूनहिन् वृक्ष हो ॥ 

दोउ प्रबल अब सों पत राखे । लाखि परस्पर एक एक आँखे ॥ 
छाँड़त एक को अस्त्र प्रचंडा । बेगि दूज किए तिन तिन खंडा ॥ 
दोनों बलवान की प्रतिष्ठा अब एक सी हो गई । और वे एक दूजे को काट खाने लगे ॥ यदि कोई एक दिव्यास्त्र का प्रयोग करता तो दुसरा उसे शीघ्रता पूर्वक नष्ट कर देता ॥ 

एक को आयुध जुगत प्रहारे । दुज संहारत सह प्रतिकारे ॥ 
लै को बरछी भाल उछालै । किए भंजन दुज तिन तत्कालै ॥ 
एक कोई शस्त्र का प्रयोग करता दूजा प्रतिशोध के सह उसे लौटा देता ॥ । कोई यदि बरछी भाले उछालता तो दूजा उसे तत्काल ही खंडित कर देता ॥ 

एहि बिधि द्वी दल गंजन, हेति हत दुइ छोर । 
रोम हर्षक यहु दरसन, गोचर रन घन घोर ॥ 
इस प्रकार दोनों भारी वीर, दो छोरों से परस्पर आघात प्रतिघात कर रहे हैं । यह दृश्य अत्यधिक संकुल स्वरूप में  रोंगटे खड़े कर देने वाला है ॥ 

शनिवार, १९ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                     

अजहुँ कारौं का कुस बिचारे । कृत निज करतब निश्चय कारे ॥ 
ततछन धारत करधन गोईं । तेज भयंकर सायक सोईं ॥ 
कुस ने मन ही मन विचार विमर्श किया कि अब आगे कौन सी नीति वरण करूँ , फिर उसने अपने कर्त्तव्य करने का( जो की एक रन योद्ध का होता है ) निश्चय किया  और तत्काल ही उसने करधनी में खचित किया  हुवा एक तीक्ष्ण एवं भयंकर बाण को हाथों में लिया ॥ 

तासु दंत नख ब्याल सरिसा । छुटै छन घन काल कुलिसा ॥ 
तरत सुरथ सन्मुख अस धावैं । काल देव जस जिउते आवैं ॥ 
उस बाण के दन्त सिंह के नख के सदृश्य थे और वह घनी घटाओं से चमकती हुई बिजली के जैसे छूटा । सुरथ के सन्मुख वह तैरटा हुवा सा ऐसे गति कर रहा था जैसे मृत्यु का देवता यमराज ही स्वयं आ रहा हो ॥ 

 जोंहि तासु किए कटख प्रयासे । तोंहि महा सर उर गह धाँसे ॥ 
लगत गाँसी सुरथ हँकराई । अरु निपतत भयउ धरासाई ॥ 
जैसे ही सुरथ ने उसे काटने का प्रयास किया वैसे ही वह महा बाण सुरथ के हृदय में जा धँसा ॥ उस बाण का फल लगते ही सुरथ ने एक चिंघाड़ लगाई और  घायल होकर भूमि पर गिर पड़े ॥ 

सोइ सुरथ सुत बहि ले गवने । तासु पतन कर भए कुस जयने ॥ 
दरस ए दिरिस बलीमुख जोधा । धूनत जरत अगन प्रतिसोधा ॥ 
शयनित अर्थात मूर्छित सुरथ को उसका सारथी रन क्षेत्र से बाहर ले गया । उसका पतन कर कुस विजयित हुवा ॥ 
सुरथ की मूर्छा का दृश्य देखकर योद्धा वानर क्रोध वश कांपते हुवे प्रतिशोध की ज्वाला में जलने लगे ॥ 

 फरकत बजरागी अंग, प्रनदत किए घन नाद । 
गहु पुरब प्रसरे प्रसंग, तिनके परच प्रसाद ॥  
महाबली हनुमान के अंग भी फड़कने लगे और वे घन ना के सदृश्य गर्जना करने लगे । इससे पूर्व की यह प्रसंग आगे बढे महाबली बजरंग का परिचय-प्रसाद ग्रहण करते चलें ॥ 

गुरूवार २६ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                                   

तरु मृग मारुत सुत हनुमंता । किए जे पयोधि पार तुरंता ॥ 
बर कबहुक लघु रूप रचाईं । पठतइ निकसे मुख सुरसाईं ॥ 

कनक कोट के चमक चकासे । हट बट चौहट नगर निकासे । 
सैल सरि सर  लंका बनबारि। चित्र चितेर कर देइ  लंकारि ॥ 

पुनि परबत मह इंद्र उछंगे । पाट पयधि सत जोजन लंघे ॥ 
जामि घोष जाजाबर केरे । जामिन जब लंका पुर घेरे ॥ 

समर सूर गन घर घर हेरे । राम बोधिते आँगन घेरे ॥ 
हेर बिभीषन रावन भाई । तेइ परच सिय कथा बुझाईं ॥ 

माता सीता बन रह जहवाँ । मसक सरिस रूप गवने तहवाँ ॥                                                                 बेसत तरुबर मुँदरी डारी । राम नाम बर अंकित कारी ॥ 

प्रभु अंकन सिय जब पहचाने । आवै तब सौमुख हनुमाने ॥ 
मैं  राम दूत कहि हे माता । तुहरे हमरे जनि सुत नाते ॥  

पुनि कर जोर निज श्री मुख, किये राम गुन गान । 
कहत हरत मात के दुःख, तव हेरन मैं आन ॥   

शुक्रवार, २७ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                         

सुरत नाथ नयनन घन घारे । साख सुमन सरि जवल कन झारे ॥ 
पूछीं हिय पिय मोहि बिसारीं । भूर भई का ऐतक भारी ॥ 

 देइ संदेस हनुमत तेही । धैर हिया तब धरि बैदेही ॥ 
राम चन्द्र तव लेवन आहीं । तनिक दिवस अरु धीर धराहीं ॥ 

पाए सिया कर सीस आसिषे । प्रेम पाग कपि नयन जल रिसे ॥ 
चरण नाइ कपि लेइ बिदाई । करन चले लंका उजराई ॥ 

सकल निसाचर करि संघारे । मर्द मर्द महि मरतएँ मारे ॥ 
इंद्राजीत लंकेस कुमारे । अर्थ कर दिए धोबी पछारे ॥ 

एहि श्रवनत दनुपत दुर्बादे । परचत तिन कपि क़िए संबादे ॥ 
कह बत हनुमत बहस समुझाए । प्रभु राम धरा धिया बहुराएं॥ 

तुम साखामृग मति मंद, हम भरू भूमि बिलास । 
कँह चित चित्ती कँह चंदु, कहि दनुपत कर हास ॥ 

शनिवार,२८ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                            

दसानन कपि हन आयसु दाए । पुनि दनुगन तिन्ह मारन धाए ॥ 
कहि बिभीषन कर बहुस बिनिते । दूत हनन नय नीति बिपरिते ॥ 

 कहत दसानन लिए अटहासे । बसत कपि के पूँछ भित साँसे ॥ 
तेल बुरे पट देइ बँधाईं । कहत दनुज पुनि लाग लगाईं॥ 

करतल सकल जन धुनी देईं । फेर चहूँत पुर पूँछि जरेईं ॥ 
पवन ताने धर अगन लगारी । जारत फिरि भू भवन अटारी ॥ 

लपट लपट ऐसेउ झपटाए । जस तिन तूल संबाहिन पाए ॥ 
अकुल बियाकुल लख लगन लाहि । कहत त्रसत तस त्राहि मम त्राहि ॥ 

मंजुल मंडित सोन सुबरनित भंजन भवन भू भूति । 
दहन केतु धर धुरियन ऊपर दिए गगन धूनन धूति ॥ 
कर्पुर घारि द्वीप दुआरि दहत धूमलाभ लहे । 
मानहु लंका करि निज डंका  आपन रुप कलुख कहे ॥ 

उथल पुथल कर सिंहला, सोन सुबरन दहाइ । 
बहुरि बली मुख निमज्जत, पयोधि पूँछ बुझाइ ॥ 

रविवार,२९ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                                  
तेइ कुस लखि अवतरे आँगन । लेइ हनन हनुमन मन कामन ॥ 
सुरथ के बिगत सैन सँभारे । गगन भेदि घन नाद उचारे ॥ 

तेइ हनुमत उपार पहारे । नभो गति गहत लै कर धारे ॥ 
लगे बान उर मूर्छा पाए । हेर संजीवन लखन जियाए ॥ 

रहहि संग जे अस रघुनाथे  ।  ताप धूप जस छाया साथे ॥ 
तेइ हनुमत अज ज्ञान बिहिना । दोउ प्रभु तनए जानत रहि ना ॥ 

रन कामिन कर ठाड़ बिरोधे । राम सेन सन रंगन जोधे ॥ 
दिसि हनुमत एक पाहन लिन्हे । बल पूरबक प्रबिद्धन किन्हे ॥ 

पाए पवन पाहन जस धूरे । किये लव तिन्ह चिकिना चूरे ॥ 
दिरिस दरस एहि कवन अकारी । जिमि हिम उपल के धारि बारी ॥ 

ऊपर देख छोरे उपल आपन मुख पर आत । 
आपन गाल बजाए ते खावत आपन घात ॥  

रविवार, २० अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                          

बजर अंग तन भवन अलिंदु । छनन मनन हन कोपित बिंदू ॥ 
लंकाहन रहि मह बल्बाना । धूनत गिरी तिन धुनि कर काना ॥ 

लिए बलबन भुज दल बन काला । पतअरु एक तरु साल बिसाला ॥ 
सौंतुख कुस कर बिटप सहारे । भए आतुर उर पर दे मारे ॥ 

खात घात पर कुस ना हारे । लिए बीर बर अस्त्र संहारे ॥ 
रहि दुर्जय जे तेइ निछेपे । दरसत तिन तनि हनुमत झेंपे ॥ 

बहुरि मन भगवन बिहन हारी । रामचंद्र के सुमिरन कारी ॥ 
सुमिरत हनुमत दरसत कैसे । तड़तइ बालक माता जैसे ॥  

धावाताए अस्त्रासु अस निकट बिकट बिकराल । 
घातन उरस स्वयं जस,प्रगस भए देउ काल ॥  

सोमवार,२१ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                       

ऐतक ही मह घातत करके । दारत उरस दास रघुबर के ॥ 
धरत बदन घन नादन बानी । ताड़न तड़ित प्रभा कर सानी ॥ 

गंधत अस जस अगनित गोले । आयुध आपन आपइ बोलें 
लागत वाके चेत बिहाईं । अनुमत के मति मुरछा छाई ॥ 

फिर तौ रन भू कुसहि कुस छाए । मुदितइ बिसिख पर बिसिख चलाए ॥ 
चरत उरत सर गगन ब्यापे । अस जस बायुर पत सन ढाँपे ॥ 

अवध देस की अर्धांगिनी । कोटि पाल कटक चतुरंगिनी ।। 
चरन चरन रन आँगन गाढ़े । अटल प्रबल ते चरन उपारे ॥ 

होवत बिकल सेन सकल, बिसिख बिसिख उर लाग । 
गहिहिं जे आजुध भुजदल, तज रहि भागाभाग ॥   


बुधवार, ०२ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                                      

ते जय बटु मनोबल बढ़ाईं । कारत कुस जयघोस सुहाईं ॥ 
ता बय बानर बर बलहिनि के । भए संरछक बृहद बाहिनि के ॥ 
वह विजय, लव कुश के सहायक बाल ब्रम्हाचारियों का मनोबल बढाने वाली थी । और वे कुश का विजय घोष करते अत्यधिक सुहावने प्रतीत हो रहे थे ॥ उस समय अवध की उस भारी किन्तु बलहीन सेना के वानरराज सुग्रीव संरक्षक हुवे ॥ 

बीर बली मुख राज सुग्रीवा । रिष्य मूल परबत के दीवा ॥ 
जे रहि प्रभु राम गहन मिताए । जिन पहिं दास हनुमंत पाए ॥ 

बलधि बालि रहि जिनके भाई । जिन सन प्रभु के होइ लराई ॥ 
सुग्रीव राज करत छल छिन्हे । हत कारित तिन प्रभु ले दिन्हें ॥ 

रहि बहस सोंह जिनके सहाइ । जलधि उदधि पल पयोधि बँधाइ ॥ 
जिनकी बानर सेन सुहाई । समर सूर सह बहु बलदाई ॥ 

नीति कुसल कर रन लंकेसे । भए बिजइत कर लंका देसे । 
जिन्ह सह्चार राम सुधीता । मारे रावन लवाइ सीता ॥    

ते सुग्रीव मित्र धारि सन, कारै रन घन घोर । 
तड़ग खडग कटि कर धार, किए चिकार कठोर ॥   



















गुरूवार, ०३ अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                               

पुनि दूइ दल रन करमन भीरे । भीरत जस दूइ घन गम्भीरे ॥ 
चरत गगन अस सायक सोई । जस धारा धर बाहक होही ॥ 

सौतत सैनिक होवत सोहें । हरीस कुस के सौंमुख होहें ॥
बढ़इ बाहु बल दिए लंगूरे । परइ धरा पद उराइ धूरे ॥ 

एक पल कुस दिसि धुंध धराई । निकसत धनु सर इत उत धाईं ॥ 
कल कोमल करताल मलियाए । निर्झर जर सन परम पद पाए ॥ 

हटबत सुभट कहरत भू गिरे । को इत तिरे कोउ उत तिरे ॥ 
उठइ धरा पुनि धाए  सुभट्टे । दोउ भाइ मुख मारि झपट्टे ॥ 

पुनि कर्नी कारन लौ लग, कुस कास कोदंड । 
चरत तरत सरत सल्लग, करत प्रघोष प्रचंड ॥ 

मंगलवार,२२, अक्तूबर, २ ० १ ३                                                                                            

पुनि तेहि कंठ करकन कैसे । कुलिस कुलीनस घटघन जैसे ॥ 
खैंच करन लग सरित सरासन । ऐंच नयन सर चरित सनासन । 
फिर (संरक्षक हो रन भूमि में उतरते ही) उसका गला कैसे गर्जा जैसे जल युक्त घने बादलों का साथ प्राप्त कर बिजली गरजती है ॥ फिर सुग्रीव ने  धनुष की प्रत्यंचा को कान तक खिंच कर तिरछे लोचन कर सनासन की ध्वनी करते तीर छोड़े ॥ 

उपार उपल सैल अनेके । धाए कुस सों भुज दंड लेके ॥ 
किए खंडन तिन कुस एक साँसे । खेलत उदयत हाँस बिहाँसे ॥ 
अनेकों शिलाओं और पत्थरों को उखाड़ कर अपनी भुजाओं में लिए कुस की ओर दौड़े ॥ जिन्हें कुश ने हँसी-खेल में  एक ही  स्वांस में खंडित कर दिया ॥  

सुग्रीव बेगि बहुस बिकराला । धरे कर एक परबत बिसाला ॥ 
कुस लखित कर लाखे लिलारे । औरु सबल ता पर दे मारे ॥ 
फिर सुग्रीव ने अत्यधिक भयानक एक विशाल पर्वत लिया, और कुश को लक्ष्य कर उसके मस्तक को लक्ष्य चिन्ह कर पुरे बल के साथ उस पर दे मारा  ॥ 

दरसत परबत निज सों आने ।  कुस कोदंड बान संधाने ॥ 
करत प्रहार कारि पिसूता । भसम सरुप किए बस्मी भूता ॥ 
जब कुश ने उस पर्वत को अपनी ओर आते देखा तो तत्काल ही धनुष में बाण का संधान कर उस पर्वत पर आघात कर उसे चूर्ण कर
उसे  (महारूद्र के शरीर में लगाने योग्य) भस्म के सदृश्य करते हुवे, नष्ट कर दिया ॥ 

देख कुस कौसल सुग्रीव, भयउ भारी अमर्ष । 
बानर राउ मन ही मन, किये बिचार बिमर्ष ॥ 
कुश का ऐसा रन कौशल देख कर वानर राज सुग्रीव को अत्यंत क्रोधित हो गए । तब  वानर राज मन ही मन रन की भावी नीति कैसी हो, इस पर विवेचन करने लगे ॥  

बुधवार, २ ३ अक्तूबर,२ ० १ ३                                                                      

जोइ जान रिपु लघुत अकारी । सोइ मानत भूर भइ भारी ॥ 
किरी कलेबर जिमि लघुकारी । पैठत नासिक गरु गज मारी ॥ 

लघु गुन लछन इत लिखिनि लेखे । नयन पट उत गगन का देखे ॥ 
सुग्रीव के कर क्रोध पताका । प्रहरत बहि सन गहन सलाका ॥ 

एक तरुबर दरसत कर तासू । धावत मारन कुस चर आसू ॥ 
नाम बान लइ बरुनइ धारा । पथ प्रसारित कुस बिपुल अकारा ॥ 

चहूँ पुर दिग सिरु घेर हरीसा । कसा कास के बाँधि कपीसा ॥ 
बलबाल के कमल कर कासे । बँधइ सुग्रीव कोमली पासे ॥ 

होत असहाय नृतू निपाते । दरसत तिन भट भागि छितराते 
बहुरि बटुक सह लव कुस भाई । हर्ष परस्पर कंठ लगाईं ॥ 

लखहन बरखन पर, अंगन रनकर, संस्फाल फेट फुटे । 
बल दुई बर्तिका, जस दीपालिका, तस भाई दुई जुटे ॥ 
संग्राम बिजय कर, सिया के कुँवर, कमलिन कर कलस धरे । 
बाजि दुंदुभ कल, नादत मर्दल, धन्बन ध्वजा प्रहरे ॥ 





शनिवार,२८ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                            

दसानन कपि हन आयसु दाए । पुनि दनुगन तिन्ह मारन धाए ॥ 
कहि बिभीषन कर बहुस बिनिते । दूत हनन नय नीति बिपरिते ॥ 
जब दशानन ने वानर को हताहत करने की आज्ञा दी तब दानव गण उन्हें मारने के लिए दौड़े ॥ फिर दशानन के लघु भरता विभीषण ने अत्यंत ही विनम्रता से कहा : -- हे राजन ! दूत की ह्त्या करना राजधर्म के विपरीत है ॥  

मान भ्रात कहि लिए अटहासे । बसत कपि के पूँछ भित साँसे ॥ 
 तेल बुरे  पट देइ बँधाईं । कहत दनुज पुनि लाग धराईं ॥ 
और लघु भरता की बात को मानते हुवे रावण ने ऐसा कहते हुवे अट्टाहास किया कि वानर का जीवात्मा उसके पूँछ में बसती है ॥ उस पूँछ में तेल से तर किया हुवा कपड़ा बाँध दो और उसमें आग लगा दो ॥ 

करतल सकल जन धुनी देईं । फेर चहूँत पुर पूँछि जरेईं ॥ 
पवन तनय लगि अगन पुछारी। जारत फिरि भू भवन अटारी ॥ 
तब सभी दानवों ने ताली बजा कर खेल करते हुवे हनुमान जी को गोल गोल घुमाया , फिर उनकी पूँछ में आग लगा दी ॥ तब मारुती नंदन ने आग लगी पूँछ से लंका द्वीप के भूमि भवनों एवं उनके खण्डों को जलाते हुवे घूमने लगे ॥ 

लपट लपट ऐसेउ झपटाए । जस तपित तिन संबाहिन पाए ॥ 
लोग बियाकुल लख लगन लाहि । कहत त्रसत तस त्राहि मम त्राहि ॥ 
सब भूमि भवन आग की झपट में आ कर ऐसे लपट देने लगे मानो जलती हुई तृण को वायु का साथ प्राप्त हो गया हो और वह भड़क गई हो ॥ आग लगी देखकर वहाँ के वासी व्याकुलित हो उठे और ट्रस्ट होकर रक्षा करो! हमारी रक्षा करो ! की ध्वनी का उच्चारण करने लगे ॥ 

सुबरन मंडित रतन मनि कलित  भंजइँ भवन भू भूति । 
दहन केतु धर धुरियन ऊपर दिए गगन अगनी धूति ॥ 
कर्पुर घारि द्वीप दुआरि दहत धूमलाभ लहे । 
तिन सों लंका करि निज डंका  आपन रुप कलुख कहे ॥ 
स्वर्ण-मंडित  एवं रत्न माणिक्यों से सुसज्जित भूमि के विभूति स्वरुप भवन खंडित हो गए ॥ वे धुआँ धारण करते हुवे आकाश के उपरोपर आग की लपटें कम्पन करने लगी  ॥ जिस द्वीप के द्वार कर्पूर वर्ण का थे वह आग में धधकते हुवे मटमैले रंग के हो गए और इन कज्जल द्वारिकाओं से लंका, डंका बजा बजा कर अपने कलुषित रूप का बखान करने लगी ॥ 

उथल पुथल कर सिंहला, सोन सुबरन दहाइ । 
बहुरि बली मुख निमज्जत, पयोधि पूँछ बुझाइ ॥ 

शुक्रवार, १५ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                      

तेइ लव लखि अवतरे आँगन । लेइ हनन हनुमन मन कामन ॥ 
आवत छतरित सैन सँवारे । गगन भेदि घन नाद उचारे ॥ 
लव को हनन करने की मनोकामना लिए वे ही महाबली हनुमान रन क्षेत्र में अवतरित हुवे । आते ही उनहोंने छितरित सैन्य समूह को सुनियोजित किया ॥ फिर गगन को भेद करने वाली ध्वनी से गरजना की ॥ 

कपि बल बिपुल भुज दल गहियाए । देख तिन लव बहु बिस्मय पाए ॥ 
बजरी देह सैल सम लागहि । लाल लोचन बरखावत आगहिं ॥ 
वानरराज ने अपनी भुजाओं में अतुलित बल ग्रहण किया हुवा था । जब सीता पुत्र लव ने उन्हें देखा तो उसे अतिशय विस्मय हुवा । उनकी वज्र के सरिस देह लव को शैल के सदृश्य प्रतीत हुई । और उनकी लालिमा युक्त दृष्टि तो जैसे आग ही वर्षा रही हो ॥ 

दिए ऐँठ तनि भुजा पद गाते । करकत तरु दुइ डारि निपाते ॥ 
चरतईं आए जब लव धूरे । लौहितेछन सन लगे घूरे ॥ 
जब उन्होंने अपनी भुजा चरण एवं देह को किंचित ऐंठा । तब कड़कते हुवे वृक्षों कि दो शाखाएँ टूटकर नीचे गिर पड़ी ॥ जब वे चलते हुवे लव के निकट आए । रक्तक आँखों से उसे घूरने लगे ॥ 

कास मुठिका दन्त कटकाईं । मार धुमुक लव दूर गिराईं ॥ 
छनु भर मह लिए पूँछ लपेटे । देवत बल दिए दुइ तिनु फेंटे ॥ 
मुष्टिका कास कर उन्होंने दांतो को किटकिटाया और एक घूँसा मारा , तो उसके प्रहार से लव दूर जा गिरा ॥ फिर क्षण भर उसे अपनी लंगूर में लपेट कर बल देते हुवे दो तिन बार गुरमेटा ॥ 

बाँध बाँगुरिन कसकत गहनी । उठैं गगन कभु अवनि ठनमनी ॥ 
टसकत लव जनि सुमिरन कारे । पुनि एक मुठिका महा प्रहारे ॥ 
कसकर कड़े बंधन में फांसते हुवे फिर उसे ( लव को ) कभी तो ऊपर उठाते कभी धरती पर पटक देते ॥ इस क्रिया से टसकने गा और अपनी मैय्या को स्मरण करने लगा । फिर उसने ( हनुमान जी की पूँछ पर ) मुष्टिका का एक महा प्रहार किया ॥  

दिए धौसत धुनकत धुनत, गहनति गहन प्रघात ॥ 
बानर भयउ बहु बिहबल, बिहुरि बल बिलबिलात ॥ 
और घूंसे से धुनाई करते हुवे वह गहरे प्रहार करने लगा । वानरराज हनुमान जी को कष्ट होने लगा । बिलबिलाते हुवे लव के बल से लव के बल से मुक्ति पाने का अभ्यास करने लगे  ॥ 

 शनिवार, १ ६ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                

बहुरि बाहु लव बिहुरत फेंटें । दिए गुंठित धर पूँछ उमेठे ॥ 
घुर्मि घुर्मि हँसि केलिहि करहीं । महा बीर हनुमत चिक्करहीं ॥ 
फिर लव ने अपनी भुजाओं को उस लपेटे से छुड़ा कर हनुमान जी की पूँछ को गाँठ देते हुवे उसे गुरमेट दिया ॥ और घुमा घुमा कर हँसते हुवे खेल करने लगा । उधर महावीर हनुमान कष्टमई होकर चीत्कार उठे ॥ 

साध सकल बल लेइ छोड़ाए । रिस भरे देइ गदा घुरमाए ॥ 
तासे परत चपेटिन आने । बाँचत लव किए नत सिरहाने ॥ 
फिर अपना सारा बल लगा के किसी प्रकार से पूँछ को लव से छुड़ाया । और क्रोध में भरकर गदा को तीव्रता पूर्वक घुमा दिया ॥ इससे पहले कि लव उस गदे के चपेट में आते । उन्होंने अपना शीश झुकाया और स्वयं की रक्षा की ॥ 

छूटत गदा बहु उरेउ गिरे । भयउ कुपित कपि आपा बहिरे ॥ 
बहोरि एक बर सेल उपारे । लखि कर लव मस्तक दे मारे ॥ 
लक्ष्य हिन् गदा मारुती नंदन के हाथ से छूट गया और दूर जा गिरा । इससे वे क्रोधवश आपे से बाहर हो गए । फिर उन्होंने एक बड़ा भारी पत्थर को उखाड़ा और लव के मस्तक का लक्ष्य कर उसपर दे मारा ॥ 

एहि लख सो भए लाल भभूका । छाँड़ प्रदल तिन किए सौ टूका ॥ 
कन लग गुन धन्वंतर सारे । उरूज अरि बनाउरि उरारे ॥ 
यह देखकर लव अत्यंत क्रोधित हो उठा और बाणों का प्रहार कर उस पत्थर के सौ टुकड़े कर दिए । फिर उन्होंने की प्रत्यंचा को  चार हाथ की माप तक प्रस्तारित किया और उस समय शत्रु स्वरुप वीर हनुमान पर चढ़ाई करते हुवे बाणावली की बौछार कर दी ॥ 

उरि उरंग सों उरस बिँधाई । अरु हनुमत चित मुरुछा छाई ॥ 
गवने बलि भट सत्रुध्न पाहीं । मुरुछा प्रसंग कहत सुनाहीं ॥
उड़ते हुवे सर्प की भांति ( एक दुर्लभ प्रजाति का विषधारी सर्प जो पेड़ों पर रहता है, और एक पेड़ से दुसरे पेड़ पर छलांग मारता है इसका रंग हरा होता है छलांग मारने के कारण यह उड़ता हुवा प्रतीत होता है, जो छत्तीसगढ़ में पाया जाता है ) वे बाण वीर हनुमत के ह्रदय को भेदने में सफल हुवे  फिर उनके चित्त पर मूर्छा छा गई ॥यह देख वीर सैनिक शत्रुध्न के पास गए और हनुमत की मूर्छा का प्रसंग कह सुनाया  ॥ 

पावत सत्रुहन कान, हनुमत अचेत आगान । 
हिय बहुसहि दुःख मान, भए बिहबल यह सेष कहे ॥ 
भगवान शेष मुनि वात्स्यायन से कहते हैं हे मुने ! : -- हनुमत की अचेतना के वृत्तांत को सुनकर शत्रुधन के ह्रदय ने  बहुंत ही दुःख माना और वे शोक से विह्वल हो उठे ।। 

रविवार, १३ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                     

अब सोइ आप लिए दल गाजे । सुबरन मई रथ पर बिराजे ॥ 
लरन भिरन ते पौर पयाने । जहँ बिचित्र बीर लव रन ठाने ॥ 
अब वे स्वयम् ही स्वर्णमयी रथ पर विराजित होकर श्रेष्ठ वीरों को साथ लिये युद्ध हेतु उस ड्योढ़ी की और प्रस्थान किए जहाँ वह विस्मयी कारक वीर बालक लव युद्ध छेड़े हुवे था ॥ 

लोकत लव तँह पलक पसारे । सत्रुहन मन बहु अचरज कारे ॥ 
जिनके कहान दिए न ध्याना । साँच रहि सोइ सुभट बखाना ॥ 
वहाँ लव को देखते ही शत्रुध्न की पलकें आश्चर्य से प्रस्तारित हो गई और उनका मन बहुंत ही आश्चर्य करने लगा ॥ जिनके कथनों पर शत्रुधन ने ध्यान नहीं दिया वे वीर सैनिक सत्य ही कह रहे थे ॥ 

स्याम गात अवगुंफित रुपा । येह बालक श्री राम सरूपा ॥ 
नीलकमलदल कल प्रत्यंगा । बदन मनोहर माथ नयंगा ॥ 
श्याम शरीर, सांचे में ढला हुवा रूप,यह बालक तो वास्तव में श्री रामचन्द्रजी का ही स्वरुप है ॥ नीलकमलदल के सदृश्य सुहावने प्रत्यंग ऐसा मनोहारी मुखाकृति औए\और माथे पर का यह चिन्ह ॥ 

एहि बीर सपुत अहहैं को के । ऐ मति धारत तिन्ह बिलोकें ॥ 
पूछत ए तुम कौन  हो बतसर । जोइ मारे हमरे बीर बर ॥  
यह वीर सुपुत्र  किसका है ? ऐसा विचार करते एवं उस बालक को ध्यान पूर्वक देखते हुवे शत्रुध्न ने पूछा : -- हे वत्स  ! तुम कौन हो ? कौन हो जो तुमने हमारे सारे वीर सैनिकों को मार दिया ॥ 

हे मुनि मोहक भेस , कहु को तव पालनहार । 
तुम्ह बसहु को देस, कृपा कर  निज परचन दौ ॥ 
हे । मुनियों का मोहक वेश धारण करने वाले । कहो तो तुम्हारे अभिभावक कौन हैं । तुम किस देश में वास करते हो , कृपया करके मुझे अपना परिचय दो ॥ 

सोमवार, १८ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                  

जानउँ ना मैं कछु तव ताईं । पुनि लव ऐसेइ उतरु दाईं ॥ 
बीरबर मम पितु जोइ होई । मम श्री जननी हो जो कोई ॥ 
मैं तुम्हारे निमित्त कुछ भी नहीं जानता । लव ने उनके प्रश्न का इस प्रकार से उत्तर दिया  हे वीरवार ! मेरे पिता  जो भी हों, मेरी माता जो कोई हों ॥ 

आगिन औरु न कहहु कहानी । एहि बय सोचहु आप बिहानी ॥ 
सुरतत निज कुल जन के नामा ।धरौ आजुध करौ संग्रामा ॥ 
अब आगे और कहानियाँ न बनाओ । इस समय अपने अंत का सोचो ॥ और अपने कुल जनों का स्मरण करते हुवे आयुध धारण कर मुझसे संग्राम करो ॥ 

तुहरे भुजदल जदि बल धारहिं । बरियात निज बाजि परिहारहि ॥ 
किए लव बाण संधान अनेका । तेजस तिख मुख एक ते ऐका ॥ 
यदि तुम्हारी भुजाएँ ने बल धारण किया हुवा है तो वे बलपूर्वक अपने अश्व को मुक्त कर लें ॥ ऐसा कहकर लव ने अनेकों बाण का संधान किया जो एक से एक दिव्य एवं तीक्ष्ण थे 

लिए धनु गुन दिए चंदु अकारे । भयउ क्रुद्ध धनबन प्रस्तारे ॥ 
को पद को भुज परस निकासे । को सत्रुहनके मस्तक त्रासे ॥ 
और धनुष उठा कर उसके गुण को चंद्राकार कर कुपित होते हुवे उनहन गगन में बिखेर दिया ॥ जिनमें कोई बाण चरण तो कोई भुजा स्पर्श करते हुवे निकला  , कोई शत्रुधन के मस्तक को भेद कर उन्हें त्रस्त का गया  ॥ 

रिसत सत्रुहन छबिछन सों, देइ धनुर टंकार । 
हहरनत रन आँगन के, कन कन किए झंकार ॥ 
( ऐसा दृश्य दखाकर ) शत्रुध्न फिर अत्यधिक क्रुद्ध होकर कड़कती बिजली के समान धनुस की प्रत्यंचा अको टंकार किया । इस ध्वनी से कम्पायमान होकर रन क्षेत्र का कण कण झंकृत हो उठा ॥ 

मंगलवार, १९ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                   

बर धनुधर सिरुमनि बलबाना । अवतारे गुन अनगन बाना ॥ 
बालक लव तूली कर तिनके । खरपत सम  काटै गिन गिन के ॥ 
बलवानों के शिरोमणि एवं श्रेष्ठ धनुर्धर शत्रुध्न ने फिर अपनई प्रत्यंचा से अनगिनत बाण उतारे । किन्तु बालक लव ने उन्हें तृण-तुल्य कर उन्हें खरपतवार के जैसे गिन गिन कर काट कर हटा दिया ॥ 

ता पर तिन कर अस सर छाँड़े । अचिर द्युति जस घनरस बाढ़े ॥ 
सत्रुहन नयन अलोकत अंबा । बिचित्र कहत किए बहुस अचंभा ॥ 
उसके पश्चात उसके हाथ ने ऐसे बाण चलाए जैसे चमकती हुई बिजली से युक्त घनी घटा से जल की बुँदे चली आती हैं ॥ शत्रुध्न के नयनों ने अम्बर में जब उनका अवलोकन किया तब 'विचित्र ' ऐसा कह कर वे बहुंत ही अचम्भा किये ॥ 

अचिरत बरतत पुनि चतुराई । तेइ सकल काटि निबेराईं ॥ 
निरखत निबरत लव निज सायक । किए दुर्घोष हृदय भय दायक ॥ 
और फिर शीघ्रता पूर्वक रन कौशलता बरतते हुवे उन्हें काट कर हटा दिया ॥ जब लव ने अपने बाणों को लक्ष्य विहीन पाया तब उसने कर्कश घोष किया जो हृदय में भय उत्पन्न करने वाला था ॥ 

दमक उद्भट देवत प्रतिमुखे । किए दुइ खंडित वाके धनुखे ॥ 
अचिर द्युति गति कर सिय नंदन । सुबरन मई रथहु किए खन खन ॥ 
तब उत्तर देते हुवे उद्भट सिया नंदन लव ने शत्रुध्न के  धनुष को दो खण्डों में विभाजित कर दिया ॥ और बिजली के जैसे तीव्र गति से स्वरमयी रथ को भी खंड खंड करते हुवे नष्ट कर दिया ॥ 

धनु कहुँ रथ कहुँ कहुँ सुत बहिही । सत्रुहन गति परिहास लहिही ॥ 
लोकत अमर्ष अस मसि मूखे । मेघ घटा जस जोत मयूखे ॥ 
धनुष कहीं था, रथ कहीं था, उस रथ का सारथी कहीं था और उसके घोड़े कहीं थे । उस समय शत्रुध्न की दशा परिहास को प्राप्त थी ॥ उनके मलिन मुख पर आक्रोश ऐसे दर्श रहा था, जैसे घने मेघों में बिजलियाँ चमक रही हों ॥ 

रथ सुत धनुर हिन् सत्रुहन, धारे पुनि दूसरौह । 
बलपूरबक दृढ़ सरूप, ठाढ़ रहि लव सोंह ॥  
 तब रथ, सारथी धनुष हिन् शत्रुध्न ने फिर दुसरा रथ दुसरा सारथी एवं धनुष धरा और वे बलपूर्वक, अत्यधिक दृढ़ता से लव के सम्मुख डटे रहे ॥ 

बुधवार, २ ० नवम्बर, २ ०  १ ३                                                                                   

जोइ सकहु तौ काटि निबेरउ । दाप धरत सत्रुहन अस कहतउ ॥ 
लाग लगे लोचन लव लाखा । छाँड़ेसि दस तिख सिख बिसाखा ॥ 
यदि तुम समर्थ हो तो इन्हें काट कर हटाओ । फिर दाप करते हुवे शत्रुध्न ने ऐसा कहकर लव को जलती हुई आँखों से निहारा तीखे मुख वाले दसवाण छोड़े ॥ 

रहहि जोग जे प्रान सँहारे । पर लव तिन्हन खंडित कारे ॥ 
पुंखि पंख मूर्धन मयंके । सार रसन किए लस्तक अंके ॥ 
ये बाण प्राण हारने के योग्य थे किन्तु लव ने इन्हें भी खंडित कर दिया ॥ पंख लगे पृष्ठ से और चंद्राकार मुख वाले बाण को प्रत्यंचा में सार कर उसे धनुष की मूठ पर सजाते हुवे : - 

खैंचत बहुरि सीध कर साधे । करत हत हयनत ह्रदय बाधे ॥ 
सत्रुहन पाए घात गंभीरा । तिनके उर भइ गहनइ पीरा ॥ 
फिर खींचकर सीध बांध कर शत्रुध्न के हृदय में प्रहार करते हुवे उनकी छांती  में गहरी चोट पहुंचाई और लक्ष्य को प्राप्त हुवे ॥ 

एक छन लोचन तमाछन् छाए । चहुँ दिसि दिरिस दरसन धुँधराए ॥ 
पते रथासन दारुन होके । निपातत जस पखहिन नभौके ॥ 
शत्रुध्न के आंकाहों में एक कछान को अन्धेरा छा गया । चारो दिशाओं के दृश्य-दर्शन धुंधला गए । कष्टमय होकर वे रथ पर ऐसे गिरे जैसे कोई पंखहीन पक्षी भूमि पर गिर रहा हो ॥ 

सकल बीर भट सह राउ, सत्रुहन मुरुछा लोक । 
मलिन मुखित बहु दुखित हो, घारे उर मह सोक ॥ 
शत्रुध्न की मूर्छा को देखकर, राजाओं सहित समस्त वीर सैनिको का मुख पर उदासी छह गई,  हृदय में शोक भर आया और वे बहुंत ही दुखित हुवे ॥ 

गुरूवार, २१ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                     

 गहत हरबली पुनि पुंज प्रतापे । धीरोद्धत सुरथ कर दापे ॥ 
अरु वाके सों सकल सुभट्टा । चढ़ि लव पर अस जस नभ घट्टा ॥ 
तब तेज के पुंज स्वरुप धीरोद्धत राजा सुरथ ने सेना का  प्रधान पद ग्रहण किया  ॥ और उनके साथ सारे वीर सैनिक दर्प करते हुवे लव के ऊपर ऐसे चढ़ बैठे, जैसे आकाश में बादल चढ़ आते हैं ॥ 

जागे पौरुख भयौ बिद्रोही । धर प्रतिनाह लोहिका लोही ॥ 
कोउ के हाथ धरि लाहांगी । कोउ बजर बिय बाहु बलंगी ॥ 
सेना की पौरुषता जो कि सुप्त हो गई थी वह जागृत हो उठी । सभी चिन्हों धारण किये , त्राण और अस्त्र-शस्त्र ग्रहण किए हुवे थे ॥ किसी के हाथ में लोहांगी थी तो कोई के सदृश्य दोनों बल युक्त बाहु में वज्र धारण किए हुवे था ॥ 

को बाढ़े बकुचत बिकराला । कास लस्तकी लोहल नाला ॥ 
एहि बिधि भट धर आजुध नाना । रन रनक बाजे घमसाना ॥ 
कोई पंजे में भयंकर के समान भयानक लोहे का बाण और लोहे का धनुष कासे हुवे लव की और बढ़ रहा था । इस प्रकार से वीर सैनिक विभिन्न आयुधों से युक्त होकर युद्ध के लिए उद्यत हुवे और घनघोर युद्ध करने लगे ॥ 

लिखिनि लेखत कहत संछेपे । लव पर चहुँ दिस लौह निझेपे ॥ 
देखि लव अस जब एहू लोगें । छत्रिय धर्म हिन् कलि कृत जोगें । 
लेखनी सारांश में यह कहती है कि लव के ऊपर चारों और से आयुध चलने लगे । जब लव ने देखा कि ये लोग क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध का संग्राम करने हेतु तैयार हैं ॥ 

बहोरि रिपु ताड़न, धनु पर चाढ़न, त्रोन सायक कसमसे । 
लेइ लस्तक लसे, लव दसम दसे, खिँच गुन करन लग कसे ॥ 
कारत बारिहि बहु आहत कारिहि, बिँध मर्म मुरुछा दियो । 
बीर धीरोद्धत, एक एक चिन्हत केतक हताहत कियो ॥ 
फिर तूणीर में रखे तीर धनुष पर चढाने और शत्रु का नाश करने हेतु जब कसमसाने लगे । तब लव ने दस दस बाणों को धनुष की मूठ पर लिया और उसके गुण को कानों तक खींचा ॥ फिर अतिशय आहत कारी उन बाणों की वर्षा करते हुवे क्रोधी वीरों कू चिन्ह चिन्ह कर उनके मम स्थान को बेध कर कईयों को मूर्छित कर दिया और कई सैनिक हताहत हो गए ॥ 

कछुक कराल मर्कट भट, धाए जोइ दिसि पाए । 
लव कोरी खेत क्यारि, बुअनी जस बिथुराए ॥   
कुछ भयंकर मर्कट सैनिक जहां पाए वहाँ भागने लगे और बीजों की बोआई के जैसे रन के उस क्षेत्र में लव के द्वारा उकेरी गई क्यारियों में बिखर गए ॥  

Thursday, 26 June 2014

----- ॥ उत्तर-काण्ड १६ ॥ -----

सुनत लखन सँदेसु यह प्रियकर । लहे दिए निर्देस कानन धर ॥ 
अस्त्र सस्त्र सब आयुध धारी । समर सिर सूरवाँ अनहारी ॥ 
लक्ष्मण का यह प्रिय यह हर्ष उत्पन्न करने वाला सन्देश श्रवण कर सेनापति कालजीत ने भ्राता लक्ष्मण के निर्देशों को फिर ध्यान पूर्वक सुना ॥ ( भ्राता लक्ष्मण ने कहा : -- ) अस्त शस्त्र एवं सभी आयुधों एवं संग्राम हवन में अपने मस्तक की आहुति देने वाले अविजित शूरवीरों को धारण की हुई  : - 

चातुरंगिनी सेन सँवारौ । रघुबर के आयसु अनुहारु ॥ 
जोग कलित सब काल बिनासा । लेख लखन मुख भासित भासा ॥ 
सेना को तैयार करो यह रघवीर की आज्ञा है उसका अनुशरण हो । सेना सभी उपयोगी सामग्रियों से सुसज्जित होनी चाहिए । लक्ष्मण के मुख द्वारा उद्भासित की गई भाषा को समझ कर : -- 

सकल झुझाउन साज सँमराए । जोग जुगित रन चीन्ह धराए ॥ 
सेन जूथ अस ब्यूह रचिते । दरस माहि अरि भय भीत कृते  ॥ 
समस्त रण कारी आयुधों को संवार कर ईवा सभी उपयोगी सामग्रियों को संकलित किए सेना को युद्धोपकरणों से युक्त किया । फिर सैनिक समूहों की ऐसी व्यूहरचना रची कि वह दर्शन मात्र से शत्रु को भयभीत कर दे ॥ 

बहुरि कालजित समुख पधारे । लखन नयन तब जोख निहारे ॥ 
सेनि संख्या दरसत ऐसे । दरसि गगन तारागन जैसे ॥ 
इस प्रकार सेना को तैयार किए  काल जीत भ्राता लक्ष्मण के सम्मुख पधारे । तब भ्राता लक्षमण की तीक्षण दृष्टि ने उस  निरक्षण किया ।। ( साठ सहस्त्र ) सैनिकों की संख्या ऐसी दर्श रही थी जैसे गगन में नक्षत्र का समूह दर्श रहा हो ॥ 

तदनन्तर समरोद्यत , निरखत सैन बिसाल  । 
कहि पुलक अब  कूच करें लखमन सेनापाल ॥ 
तत्पश्चात रण हेतु तैयार सेना का निरीक्षणोपरांत भ्राता लक्ष्मण ने सेनापति कालजीत से पुलकित स्वर में कहा : - अब  कूच कीजिए  । 

सोमवार, ०४ जुलाई,२०१४                                                                                                        

 तरत तरंग सम तूल जूहा । सागर नागर लोक समूहा ॥ 
जब नायक आयसु पाईं । मख मंडप तट उदकत आई ॥ 
उतरती हुई तरंग के समतुल्य वह सैन्य समूह था । नागरिकों एवं लोगों का समुदाय सागर के सरिस था । सैनिक रूपी उन जल तरंगो को जैसे ही नायक की आज्ञा हुई । वे उत्साह पूर्वक यज्ञ मंडप के तट की ओर उमड़ने लगी ॥ 

निकसत बास छतर कर जोटे । चली बाहिनी रबि किए ओटे ॥ 
जूथ चारी सकल रन बीरा । जस रत्नाकर मुकुतिक हीरा ।। 
 छत्र हस्तगत किए सूर्य को भी आच्छादित काटे हुवे सैन्य वाहिनी, अपने निवेश भूमि से  निकली । यूथ चारीयों में समस्त समर मूर्धा एवं समर-शूर मानो उन तरंगों के सह रत्नाकर सेनिकलने  वाले रत्न हों ॥ 

तोमर मुदगल खड्ग प्रचंडा । सजे भुज सिखर धनु  सर षण्डा ॥ 
भर अतुलित बल मुख अस गर्जहिं । गहे गहन रस घन जस तर्जहिं ॥ 
उनके भुजा शिखर  धनुष एवं वाण -समूह सहित तोमर मुद्गल एवं अति तीव्र खड्ग शोभायमान हैं ॥ भुजाओं में अतुलित बल भरकर उनके मुख ऐसे  गर्जना रहें हैं जैसे गंभीर घन अतिशय रस युक्त होकर तरजना कर रहें हो ॥ 

रन कामिन अस प्रगसि उछाहा । किए रवन जल पाए जस बाहा ॥ 
चले बीर जिमि सीख सिखावा । स्फुटित गति पद ताल मिलाबा ।।  
समरोद्यत सैनिक  ऐसे उत्साह प्रकट रहे हैं जैसे वायु प्राप्त  कर सिंधु का जल ध्वनिवन्त् होता हैं ॥ वे वीर  इस भांति चल रहे हाँ जैसा की उन्हें  प्रशिक्षण दिया गया है उनकी पद ताल इलाते हुवे उनकी गति असाधारण है ॥ 

भरे उतमंग परसन तरंग पद उद कांत के जस धावहीं । 
चतुरंगिनी के एक एक अंग मख मंडप तस आवहिं ॥ 
ताल गति बर ढोल डमरू धर दुंदुभी मुख संख बजे । 
सुर मनि बल गीती कंठ कल सकल संगीत समाजु सजे ॥ 
( किरणों से ) भरी मांग से  जिस प्रकार उत्तरङ्ग  समुद्र के चरण तट को स्पर्श करने तीव्र गति से चली आती है ।  सेना भी अपने समस्त अंगों सहित यज्ञ मंडप रूपी तट में उसी प्रकार प्रभु श्रीराम के चरण स्पर्श हेतु चली आ रहीं हैं ॥ ढोल और डमरू हस्तगत हुवे , तालों की श्रेष्ठ गति वरण कर जब मुख में दुंदुभी एवं शंख ध्वनित हो उठे । तब समस्त स्वर, गीतिका मणियों से वलयित होकर संगीत समाज के कल कंठ में सुसज्जित हो उठे ॥ 

सैन सहि पत पंगत हुए , चातुर रँग के साथ ।  
सौमुख सकल सिरु अवनत, निरख रहे रघुनाथ ॥ 
सेना के चतुर अंग पालक सहित पंक्तिबद्ध हुवे  । महाराज श्री रघुनाथ जी निरक्षण कर रहे हैं, और वह  उनके सम्मुख अवनत मुद्रा में है ॥   

रविवार, ०३ जुलाई, २०१४                                                                                                        

इहाँ भरत प्रभु आयसु पाईं । अग्याकारी सेबक नाईं ॥ 
अचरम तुरग भवन पधारे । चयनित हय के रसना धारे ॥ 
इधर भ्राता भरत प्रभु श्री रामचन्द्रजी प्राप्त कर एक आज्ञाकारी  सेवक की भाँती अतिशीघ्र अश्वशाला में पदार्पण किए एवं चयनित मेधीय अश्व की रश्मियाँ धारण किए ।। 

मणि मंडित बहु लमनी ग्रीवा । लसत लवन के नहि कछु सींवा ॥ 
गह रद बिसद बदन के कांति । लघु करन लघु पाँखि के भाँति ॥ 
मणियों मंडित अति प्रलंबित  आकर्षक ग्रीवा, जिसके सौंदर्य  की कोई सीमा नहीं । दन्त युक्त मुख  जिसकी उज्जवल कांति है छोटे छोटे कान छोटे  छोटे पंख की  भाँती लक्षित हो रहे हैं ॥ 

ललित नयन तापर सुठि नासा । बरधे सुहा हरित मुख ग्रासा ॥ 
मुकुतिक माल रतन रतनारे । कलित चरण पुनि बाहिर धारे ॥ 
अभिराम नयन उसपर  एक सुन्दर सी नासिका, मुख में शोभा वर्धन करता हुवा हरित-ग्रास था ।  रत्नारी रत्नों एवं मुक्ता माल्य से विभूषित उस अश्व की जब  अश्वशाला से निकासी हुई 

लागहि  तीर तरंगित ताना । पलासित पोत पीठ पलाना ॥ 
हिरन सकल बल कल मनि खाँचे । आवत जिमि कर धर रबि राँचे ॥ 
॥ तब ऐसा प्रतीत हुवा मानो  पीठ पर अरुणारी पोत उसपर सूत्रों द्वारा तरंगित कग़ारी  युक्त जीन पर आरूढ़ होकर , स्वर्ण कणों  से वलयित एवं सुन्दर मणियों से खचित  किरणों को  हस्तगत किए  स्वयं सूर्यदेव चले आ रहे हों ॥ 

गौर गिरि सम छतर ता ऊपर । द्योत सरिस दुइ धवलित चँवर ॥ 
साधन संपन सकल सरीरा । अस्व बृंद मैं लागत हीरा ॥ 
उसके ऊपर हिमगिरि की भांति श्वेत छत्र और धूप की भांति धवलित दो चँवर ।  इस  प्रकार उस अश्व  का समस्त शरीर विभिन्न शोभा सम्पत्तियों से विभूषित था और वह अश्व समूह में सबसे श्रेष्ठ था ॥  

जेहि भाँति मनु रिषि मुनि देबा । जुगत  जोग श्री हरि के सेबा ॥ 
तेह भाँति बहुतक सेनाचर । करे राख हय के रस्मी धर ॥ 
 जिस प्रकार देवताओं सहित मनुजन, ऋषि मुनि गण, सेवा -योग्य श्री हरि सुश्रुता में नियोजित रहते हैं उसी प्रकार  बहुंत से सेनाचर  रश्मियाँ ग्रहण किए उस अश्व की रक्षा में नियोजित थे । 

खुर न्यास उत्खचित खल , परस रहा आगास । 
हिंसत अस पैठइ अस्व, मख मंडप के पास ॥  
इस प्रकार धरा ऊपर खुर के चिन्ह खचित कर आकाश स्पर्श करता वह अश्व  हिनहिनाते हुवे यज्ञ मंडप के निकट पहुंचा ॥ 

उजरित लघु रोमावली, दस ध्रुवक के चीन्ह । 
कंठ चरन नूपुर धरे, रुरी रुनझुन कीन्हि ॥ 
उज्जवल महीन रोमावलियां उपसार दस ध्रुवक के चीन्ह मधुर स्वर में रुनझुन करते हुवे उसके कंठ एवं चरण 

कलित कमन तन सित बरन, दुइ करन घन स्याम । 
करत लजित रबि रथ किरन , पूजन किए श्रीराम ॥  
श्वेत वर्ण से युक्त उसकी देह घने काल वर्ण से युक्त  दो कर्ण  मानो कामदेव ने स्वयं रचित किया हो किया हो । ऐसी शोभा से युक्त वह अश्व  रवि के रथ की किरणों को लज्जित कर रहा है भगवान श्री राम उसकी पूजा कर रहे हैं ॥ 

मंगलवार, ०५ जुलाई, २०१४                                                                                                   

हय सह अनी आन जब देखे । प्रभु श्री लोचन मुनि पुर पेखे । 
दिरिस पंथ चर लिए तिन घेरे । समयोचित कृत करतन प्रेरे ॥ 
अश्व के सह भगवन ने जब सेना को आते देखा तब उनकी अर्थ पूर्ण दृष्टि  मुनि वशिष्ट को  देखने लगे ।। दृष्टि गोचर पथ पर चली उसने मुनिवर को घेर लिया एवं समयोचित कार्य करने हेतु उन्हें उत्प्रेरित किया ॥ 

सुबरन मई सिया बोलाईं । बहुरि अनुठान हाथ लगाईं ॥ 
कुम्भज मन बिधि काज सँभारे । बाल्मीकि अधबर निरधारे । 
तब बुद्धिमान महर्षि  वशिष्ट ने स्वर्णमयी माता सीता को बुलाया । तत्पश्चात यज्ञ अनुष्ठान को आरम्भ किया ॥ तपोनिधि अगस्त्य मुनि ने ब्रह्मा का ( कृताकृतावेक्षणरूप ) कार्यभार ग्रहण किया । महर्षि वाल्मीकि को  अध्वर्यु बनाए गए ।। 

कन्य भयउ द्वार प्रतिपाला । ले घेर मख कुण्ड बिसाला ॥ 
आठ दुअरि तोरन अस साजे । सुरग पुरी के पौरी  लाजे ॥ 
कण्व को जब द्वारपाल नियुक्त किया गया । तब उन्होंने उस विशाल यज्ञ कुण्ड को चारों और से सुरक्षित कर लिया । यज्ञ स्थल की अष्ट द्वार तोरण से ऐसे सुसज्जित थे जो स्वर्ग-सोपान की भी निंदा कर रहे थे ॥ 

कहत सेष हे बात्स्यायन । रखे राख तँह दुइ दुइ ब्रह्मन ॥ 
पूरब देबल असित आसिते । पिछु जातू करन जाजलि थिते ॥ 
भगवान शेषजी कहते है हे मुनि वात्स्यायन ! उनमें से प्रत्येक द्वार पर दो-दो मंत्र वेत्ता ब्राह्मण बैठाए गए । पूर्व द्वार पर तपस्या के भंडार देवल एवं असित मुनि थे । पश्चित द्वार पर महर्षि जातूकर्ण्य  एवं जाजलि उपस्थित थे ॥ 

उत्तर मुखी दुआरी, द्वित एकत किए राख । 
दक्खन माहि लगे रहे, कस्यप अत्रि के आँख ॥ 
उत्तर मुखी द्वार  द्वित एवं एकत मुनियों द्वारा रक्षित था । दक्षिण में महात्मा कश्यप एवं मुनिवर अत्रि की दृष्टि लगी थी ॥ 

बृहस्पतिवार, ३१ जुलाई,२०१४                                                                                                     

ऊँच मंच मख मंडप साजे । निकट नागर निबासि बिराजे ॥ 
सौहहि  संगी संग संगिनी । गावहि मंगल कंठ भामिनी ॥ 
ऊँचे मंच पर यज्ञ  मंडप स्थापित किया गया । नगर मन निवासित नागरिक गण निकट विराजमान थे ॥ सहधर्मचारि धर्मचारिणियों के संग सुशोभित हो रहे थे ॥ 

देखू बनाउ नैन किए सैने ।  भए मौनी मुख नैनहि बैने ॥
चितइ चितबत कौतुहल कारी । भरि मख भूमि भीड़ भइ भारी ॥ 
यज्ञ भूमि की रचना के दर्शन हेतु जब उनके नयन संकेत करते तब मुख मौन धारण कर लेते, नयन वाणी से युक्त हो जाते  ॥ 

बिधिदर्शीन सब भाँति तोले ।श्रुतानवित बसिष्ठ मुनि बोले ।। 
बिनहि प्रिया मैं बेद बिलोका । धरम कर्म नहि होत त्रिलोका ॥ 
विधिदर्शियों से न्यूनाधिक की विवेचना कर वेद के ज्ञाया मुंवार वशिष्ट बोले । हे त्रिलोकपत ! मैने वेदों का अवलोकन किया है धार्मिक कर्मकांड अर्द्धनिगिनी से रहित होकर धारामिन कर्मकांड पूर्णता को प्राप्त नहीं होते ॥ एतएव इस समय माता सीता की उपस्थिति परम आवश्यक  है ॥ 

रहे मौन प्रभु कछु न उचारें । नत सिरु नयन पलकिन्हि ढारे ॥ 
छाए मख भूमि अस निरबताए । सूचि कर गिरहि सोइ रबनाए ॥ 
मुनिवर के ऐसे वचन  श्रवण प्रभु  मौन मुद्रा धारण कर अनुच्चरित रहे ।  उनका शीश अवनत था एवं दृष्टि पलक पट से अर्धाच्छादित थीं ॥ यज्ञ भूमि में ऐसी नीरवता छा गई कि यदि वहां सूचिका भी गिरे तो वह भी ध्वनित हो उठे ॥ 


कहे प्रभो करु जुगति अस , मुनि मम किरिया जान । 
करौं मैं आपनि करतब, रहे धर्म सनमान ॥  
तदनन्तर प्रभु श्रीराम चन्द्र जी ने कहा : --  हे मुनिवर ! मेरे वचनों को संज्ञान कर कोई ऐसी युक्ति  करिये जिससे मैं अपने कर्त्तव्य भी पूर्ण करूँ एवं धर्म का सम्मान भी रह जाए ॥ 

शुक्रवार, ०१ अगस्त, २०१४                                                                                                        

सिरुनत प्रभु पुनि लए उछबासे । अवनत नयन मंद सुर भासे ॥ 
कहो मुने अस कोउ उपाई । लहे सम्मति सबहि के नाईं ॥ 
अवनत शीश मुद्रा में ही फिर उच्छ्वास लेते हुवे नत लोचन स्वरूप में ही मंद स्वर में बोले । हे मुनिवर ! ऐसा कोई उपाय कहें जो सर्वसम्मत हो ॥ 

तब रिषि नारद मुनिहि मनीषा । किए मंथन मत जोरत सीसा ॥ 
जोग जुगति गुरुबर  सनकादी । सुनौ  बचन कहि परम अनादी ॥ 
तब ऋषि गण, महर्षि नारद  सहित सभी मनीषियों ने सिर जोड़ कर  विचार-विमर्श किया ॥ गुरुवर एवं सनकादि आदि मुनियों ने एक योग्य युक्ति विचार कर कहा : -- हे अनादि पुरुष ! सुनिए ॥ 

सुबरन मई मूरत रचाहू । सील सीय सरि रूप धराहू ॥ 
भगवन सुबुध बचन अनुहारे । रचत मूरत संग बैठारे ॥ 
स्वर्णमयी मूर्ति की रचना कर उसे परम शीलवती श्री सीताजी के सदृश्य रूपानतरित कीजिए ॥ तदोपरांत भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि महर्षियों के कहे वचनों का अनुशरण किया । और कही गई रचना रचित  कर उसे अर्द्धांगिनी स्वरूप में अपने संग विराजित किया ॥ 

 ललित कला  कृति  बूषन साजे । बिचित्र देह बर बसन बिराजे ॥ 
 चित्रकृत कहि चितबत नर नारी । मूरति नहि जगजननि हमारी ॥ 
वह ललित कला कृति श्रेष्ठ आभूषण कलित किए हुवे थी उसके सुगठित वपुर्धर पर श्रेष्ठ वस्त्र विराजित थे । स्तब्ध  नर एवं नारियों  ने कहा : -- अद्भुद !यह मूर्ति नहीं है साक्षात जगज्जननी है ॥ 

 बहुरि जजमान जग्यधर, बिप्रबर परम प्रबीन । 
बाहि जोग मख रथ केतु, किए तिन्ह के अधीन ॥ 
 तत्पश्चात यज्ञ के धारण कर्त्ता पुरुष श्री रामचन्द्र जी ने ( दो सहस्त्र ) वेद-मत से भली भांत परिचित यज्ञन्न विप्रवर को यज्ञ वाह नियुक्त कर यज्ञ-रथ को संचालित करने हेतु यज्ञ-केतु उनके अधीन किया ॥ 

शनिवार, ०२ अगस्त, २०१४                                                                                              

मकर मास रितु सिसिर सुहाई । मख मंडप बैठे रघुराई ॥ 
बोले गुरु जस बेद बखाने । मेधीअ तुरग तस लय आने ॥  
माद्य मास की सुन्दर शिशिर ऋतु में रघुकुल के कान्त श्रीरघुनाथ जी यज्ञा वेदी पर विराजमान हुवे ॥ तत्पश्चात गुरुवर वशिष्ट ने खा जैसा वेदों में वर्णित किया गया है वैसा मेधीय अश्व यज्ञ के मंडप में लाया जाए ॥ 


जोड़न बिनु जज्ञ होए न भाई। सुबरन मई सिया रच साईँ ॥ 
किए गठ जुग जज्ञ बेदी बैठे । बिमौट सह लव कुस तँह पैठे ॥ 
अर्द्धांगिनी के बिना  कोई भी धार्मिक कार्य संपन्न नहीं होता यज्ञ कर्म काण्ड भी नहीं । इस प्रकार भगवान श्रीरामचन्द्र ने स्वर्णमयी सीता की रचना कर गठ बंधन किए यज्ञ वेदी पर विराजमान हुवे  ही थे कि उसी क्षण महर्षि वाल्मीकि भी लव कुश के साथ अयोध्या नगरी पधारे ॥ 

दौनौ बाल पुर पुरौकाई । भँवर भँवर रामायन गाईं ॥ 
मधुर गान रहि अस रस बोरे। पागत श्रवन पुरौकस घोरे॥    
दोनों बालक ने नगर में घूम घूम कर नगर वासियों महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित श्री रामायण महा काव्य का पाठ बांच कर सुनाया ॥ उनका मधुरित गायन रसों में इस प्रकार से डूबा हुवा था कि वह गहरा होकर नगर वासियों के कानों में घुलने लगा ॥ 

बाँधे लय जब दुहु लरिकाई । सुर मेली के गान सुनाईं ॥ 
संग राग छह रंगन लागे । पुर जन के मन मोहन लागे ॥ 
जब दोनों गदेले लय बद्ध होकर सुर को मिलाते हुवे रामायाण की गाथा गा कर सुनाते  तब छहों राग साथ में  तरंगित हो उठते, और उस गान ने अवध वासियों के मन को मोह लिया ॥ 

आगिन गवने सुत रघुराई । पाछू सब जन रमतत  आईं ॥ 
मोद मुदित मुख निगदित जाते । जो तिन्ह जनि धन्य सो माते ॥ 
राजा राम चन्द्र के पुत्र जब थोड़ा आगे चले तो सब जन मुग्ध होते हुवे उनके पीछे पीछे चलने लगे ।। प्रसन्न चित एवं आनन्दित होते हुवे वे अपने मुख से कहते चलते कि जिस माता ने इन पुत्रों को जन्म दिया है वह माता धन्य है ॥ 

जन मुख कीर्ति कीरतन, श्रुत दोनौ निज मात । 
भए भावस्थ ग्रहत प्रवन, वंदन चरन अगाध ॥    
नगर वासियों से अपनी माता की कीर्ति का कीर्तन श्रवण कर, वे भाव में लीन होकर उस कीर्तन का आशय ग्रहण कर वे भाव विभोर हो उठे, अपनी माता के चरणों में उनकी श्रद्धा और अधिक हो गई ॥ 

गुरूवार, २ ७ जून, २ ० १ ३                                                                                        

प्राग समउ मह भारत खंडे । रहहि लघु राज भू के षण्डा ॥ 
कहूँ नदिया कहूँ नद के धारी । घेर बाँध भू किए चिन्हारी  ॥ 
प्राचीन समय में भारत वर्ष की भूमि,सुव्यवस्थित राजनीतिक क्षेत्रों की लघु ईकाइयों का समूह था । कहीं  क्षुद्र तो कहीं वृहदाकार नदियाँ ही राज्य क्षेत्र  की सीमाओं को चिन्हांकित करती थीं ॥ 

तेइ बयस  मह देसिक धारे । रहहि न अबाधित अंतर सारे ॥ 
समाज सन रहि भेद अभेदे । भेद अभेद भेदीहि भेदे ॥ 
उन परिस्थितियों में राष्ट्रीयता की धारा  अपने आतंरिक  विस्तार में अबाधित नहीं थी अर्थात वे बाधित थी  । प्राचीन भारतीय समाज में भेद और अभेद दोनों ही था । भेदी अर्थात भेद अभेद का लाभ लेने वाले  भेद-नीति अपना कर अपना उल्लू सीधा करते ॥ 

सस्य स्यामलि सुमनस सूमिहि । एक छत्र करतन भारत भूमिहि ॥ 
देस भूमि जन घेरन बंधे । चिन्ह तंत्र प्रद पाल प्रबंधे ॥ 
शस्य श्यामल, सौमनस्य, जल से परिपूर्ण इस भारत की भूमि को एकछत्र अर्थात सार्वभौम स्वरूप देने हेतु राज्य का  क्षेत्र एवं उसके वासियों को  अर्थात भारतीय गणराज्य को एक सीमा रेखा में बाँधते हुवे उसकी सीमाओं का चिन्हांकन कर समस्त भारत में एक ही शासन   पद्धति लागू  करने एवं राष्ट्र को संगठित करने के उद्देश्य से  : -- 

महातिमह मख कल्पन धारे । भारत भू एवम एकीकारे ॥ 
एक कौ अश्व मेध जज्ञ कहही । दूजन राज सूय यज्ञ रहहीं ॥  महा यज्ञों की कल्पना की गई थी कि इस यज्ञ विधि से भारत की भूमि का एकीकरण हो ॥ इन  महा यज्ञों में  एक यज्ञ को अश्व मेध यज्ञ कहते हैं दूसरा  राज सूय यज्ञ कहलाता है  ॥ 

प्रतीकतह तजैं एक हय , भँवरि सकल भू बाट । 
जे राउ तेहिं कर धरहि, जोधहि संग सम्राट ॥ 
प्रतीक स्वरूप समस्त राज्यों की वीथीकाओं में एक घोड़ा छोड़ा जाता । जिस राजा ने उस घोड़े की रस्सियों को पकड़ लेता उसे सम्राट के साथ युद्ध करना पड़ता ॥  

बुधवार,०६ अगस्त, २०१४                                                                                                

सब समिंधन समित हबि बाहा । हबिर रसन  दए बोलि सुवाहा ॥ 
उठे गगन भुक धूम सुगंधा । पास देस सह पुर पुर गंधा ॥ 
समस्त यज्ञीय ईंधन को एकत्रिभूत कर ऋत्विज हवन में रसन दान कर स्वाहा की ध्वनि करने लगे ॥ गगन में अग्नि धूम उठने लगा । जिसके सुगंध से निकटवर्ती देशों सहित नगर-नगर सुंगंधित हो गए ॥ 

दाए आसन भुक देउ बिराजे । परगस रूप गहे निज भाजे ॥ 
मख मुख अंतिम हूति सँजोई  । अस्व मेध तब पूर्ण होई ॥ 
पितृगण, भगवान शिव एवं अग्नि आदि देवता आदर पूर्वक दिए गए आसन में विराजित हुवे प्रकट स्वरूप में  अपना भाग ग्रहण करने लगे ॥ यज्ञ के श्री मुख ने जब अंतिम आहुति संकलित की तब अश्व मेध यज्ञ पूर्णता का प्राप्त हुवा ॥ 

सेन सहित जन  जय जय कारे । एकीकरन बिथुरित संसारे ॥ 
नेकानेक बस्तु बिधि नाना । याचकिन्ह  भगवन दिए दाना ॥ 
सेना सहित सभी उपस्थित जन अस्त-व्यस्त विश्व के एकीकरण हेतु प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की जय जय कार  करने लगे ॥ फिर भगवान ने याचकगण को  नाना प्रकार की अनेकानेक याचित वस्तुएं प्रदान की ॥ 

लिखत पत्री मुनि मुद्रा चीन्हे । हय भाल तूल तिलकित कीन्हे ॥ 
नागर गन  दरसे तृन तोड़े । पत्री बाँध्यो देवन छोड़े ॥ 
मुनिवर वशिष्ट ने मस्तक-पत्री में प्रभु के नाम की मुद्रा चिन्हांकित की एवं अश्व के तेजस्वी मस्तक पर लाल तिलक लक्षित किया ॥ नागरिक समूह  उसे देखते और तृण तोड़ते । फिर मुद्रांकित  पत्री  को अश्व के मस्तक पर बांधा गया वह अश्व त्याग हेतु तैयार हो गया ।।  

बात्स्यायन अहि राउ, सुने धरे चित साँति । 
पूछे बिप्रवर मम प्रभो , लिखि लेख केहि भाँति ।। 
मुनिवर वात्स्यायन भववान शेष जी को स्थिर चित्त से श्रवणरत हैं । वे प्रश्न करते हैं : -- हे प्रभु ! बंधे पत्री  किस प्रकार लेखित की गई थी ॥ 

बृहस्पतिवार, ०७ अगस्त, २०१४                                                                                               
चंचलाख्य चंदन चर्चिता  ।सोहा सम्पद्  कुमकुम अर्चिता ॥ 
तपे हिरन मनमोहक गंधे । पुनि पत्री देइ मस्तक बंधे ।। 
भगवान शेष जी ने उत्तर दिया : -- हे मुनिवर वह पत्र चंचलाख्य ( एक सुगन्धित द्रव्य ) चन्दन से चर्चित कुमकुम से अर्चित होकर शोभा की सम्पति स्वरूप तपे हुवे स्वर्ण की मनमोहक गंध से युक्त कर तत्पश्चात उसे अश्व के तेजस्व ललाट पर मुनि श्री वशिष्ट ने आबद्ध  किया ॥ 

दसरथ नंदन रघुवर जी के । तपित रूप लिखि आखर नीके ॥ 
बरनि अवध प्रताप बल चाका । प्रहरैं जो रबि बंस पताका ॥ 
जिसमें दशरथ नंदन श्री रघुवीर जी के तपाए हुवे शुद्ध रजत से उज्जवल एवं सुन्दर अक्षरों में अवध साम्राज्य के शौर्य एवं प्रताप वर्णन करते हुवे यह उल्लेखित किया कि  रवि वंश की पताका का प्रहरण करने वाले : - 

श्री दशरथ जी बर धनुधारी । धनुहाई के जो गुरु भारी ॥ 
तिन्ह के सुपुत सदपत गामी । ए काल रघु  बंस के स्वामी ॥ 
धनुर विद्या के श्रेष्ठ गुरु एवं धनुर्धर श्री दशरथ जी के धर्म का अनुशरण करने वाले सुपुत्र महाभाग श्री राम चन्द्र जी इस समय रघुवंश के स्वामी हैं ॥ 

सूर सिरोमनि कँह तिन लोगे । धूरिकारू  मान बल जोगे ॥ 
बिधि दर्सी जो नेम उचारा । करें प्रभु मख तासु अनुहारा ॥ 
उन्हें बल के अभिमान को चूर्ण करने वाले वीरों का सिरोमणि कहा जाता है  उन्होंने  विधिदर्शी गुरुवर एवं मुनियों की कही गई विधि के अनुसार महा अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान का श्री गणेश कर दिया है  ॥ 

तेजस तूल तिलक लक लासे । कमन कलित कृत किरनन कासे ॥ 
फटिक बरन जो गहि गुन गाढ़े । सोइ अस्व श्री रामहि छाँड़े ॥ 
जो श्वेत -वर्णी जो गुणों का ग्राम है उस अश्व का श्री रामचद्र जी द्वारा त्याग किया जा रहा है ॥ जिसके मस्तक पर तीक्ष्ण अति शोण तिलक चमक  रहा है किरणों को आकर्षित किए जो  रतिपति कामदेव की रचना है एवं ूानहीं के द्वारा विभूषित किया गया है ॥ 

सकल है बंस  अवतंस बाहन माहि प्रधान । 
रामानुज सत्रुहन जोग, रखे तिन्ह के त्रान ॥  
यह हय अपने वंश में सर्वश्रेष्ठ है वाहनों में सबसे उत्तम वाहन है । रामानुज शत्रुध्न को इस अश्व का रक्षक नियुक्त किया गया है ॥ 

शुक्रवार, ०८ अगस्त, २०१४                                                                                                

सेनाचर सह सैन बिसाला । अस्त्र सस्त्र धनु बान कराला ॥ 
सहसई है संग गज राजू । रथ रन सूर रथि बन बिराजे ॥ 
सेनाचरों के संग विशाल सेना है । जो धनुष-बाण खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र से युक्त है ॥ इसके संग सहस्त्रों अश्व एवं सहस्त्रों गजराज हैं । समरशूर रथी बनकर रथों में विराजित हैं ॥ 

गह घमंड प्रचंड बलि  बाहू । सकल मही मह राउन्हि काहू ॥ 
 हमहि सरिस जग कह नहि कोई । करे हरन है साहस जोई  ।॥
समस्त पृथ्वी में जिन राजाओं को अपने प्रचंड  बाहुबल का घमंड है जो यह समझते हैं की  संसार में हमसे बढ़कर कोई समर शूर  है ही नहीं वह इस अश्व को हरण करने का साहस करे ॥ 

जासु चित ऐसेउ अभिमाना । सूर धनुर्धर बर बल्बाना ॥ 
उद्यत होत समर जो कारिहि । सोइ सत्रुहन जुझावत हारिहि ।  ॥ 
जिसके चित्त में ऐसा अभिमान है कि वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर एवं प्रचंड बलवान है ॥ एवं उद्यत होकर संग्राम हेतु उत्कंठित होगा वह  रामानुज वीर शत्रुध्न द्वारा परास्त हो जाएगा ॥ 

लिखी जन अंग नाउ बल चाका । पत्री पटल है दंड पताका ।। 
अरु लिखत कहि नीति नय नाना । मान न तासु काल निअराना ॥ 
 उस पत्री में जब अवध साम्राज्य के जनसमूह एवं अवध राज्य के अंग जैसे प्रकृति, राजा,अमात्य ,दुर्ग कोष, बल उसके मैत्रीदेश आदि उल्लेख किया गया तब वह पत्री मानो अवध साम्राज्य की केतुचिन्ह हो गई एवं अश्व उस केतु का दंड स्वरूप हो गया ॥  

सुबरन मय इतिहास सन बरनि अवध के बान । 
राम नाम उद्गार के  पुनि देइ मुद्रा दान ॥ 
ततपश्चात अवध के स्वर्णिम इतिहास के संग उसकी सभ्यता एवं संस्कृति का वर्णन करते हुवे उसपर महाराज प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के नाम की आधिकारिक मुद्रा का चिन्ह दिया गया ॥ 

शनि/रवि , ०९/१०  अगस्त, २०१४                                                                                                   

श्रव श्री सोहा के भंडारे । भंवरन भुइँ पुनि  दिए परिहारे ॥ 
निकसि बेग बल बायु समाना । चरण पंख किए काइ बिमाना ॥ 
हे मुनिवर : -- तदोपरांत यशो धन एवं शोभा की सम्पती  का भंडार स्वरूप  उस अश्व का  पृथ्वी में विचरण हेतु  त्याग कर  दिया गया ॥वायु के सदृश्य वेग युक्त होकर चरणों को पंख एवं काया को विमान किएवह अश्व अवध से निर्गत हुवा ॥ 

भूमि अमरावति  कि पाताला । चले चरन समरूप सुचाला ॥ 
तदनन्तर रबि कुल बर रघुराई । भ्रात सत्रुहन्हि आयसु दाईं ॥ 
 त्रैलोक अर्थात पृथ्वी स्वर्ग  एवं पाताल पर वचरण करते  उसकी गति में समरूपता थी । उसके त्यागकरण के पश्चात रवि वंश के अवतंस  राजा रामचन्द्रजी ने भ्राता शत्रुध्न को आज्ञा देते हुवे : -- 

कहे बीर हे सुमित्रा नंदन । बिचरत यह है सो अपनै मन ॥ 
पथ दरसत तुम गावै पिठाई  । रनोद्यत जो कोउ अवाई  ॥ 
कहा : -- हे सुमित्रा नंदन !  हे वीर ! यह अश्व अपनी मन-मानस के अनुरूप विचरने वाला है । । तुम इसका मार्ग दर्शन करते हुवे इसके पीछे जाओ । रणोद्यत होकर जो कोई इसके सम्मुख आवे ॥ 

 प्रगसत धर खल रूप अनेकिहु । जतात निज बिक्रम ताहि छेकिहु ॥ 
वीरोचित गुन संगत राखिहु । सयनित पत निरबसित न लाखिहु ।। 
जिसने की धृष्टता का अनेक रूप वरण किए  हो अपने पराक्रम का प्रदर्शन कर तुम उसका अवरोधन करना । वीरोचित गुणों की संगती रखना । जो निद्राशील निपतित निर्वस्त्र  हों उनपर  दृष्टिक्षेप न करना ॥ 

चरन निपतित त्रसित भैभीते । संग्राम सूर तेहि न जीतें ॥ 
तुम रथारूढ़ रथ हीन बिपाखा । तासु कोत कभु करिहु न आँखा ॥ 
जो चरणों में गिरे हुवे हों,त्रस्त हों, जो भयभीत हों संग्राम शूर उन्हें नहीं जीतते,  उन्हें भीरू ही जीतते हैं ॥ यदि तुम रथारूढ़ हो और शत्रु पक्ष रथहीन हो तब कभी भी उसकी ओर दृष्टि न करना ॥ 

जो निज फूरि कीर्ति न गावए । तासु संग सम बीर जुधावए ॥ 
रनमद भयद्रुत सस्त्र बियोगे । रने सो अधम गति के जोगे ॥ 
जो अपनी असत्य कीर्ति न करता हो  उसके संग उसके जैसा  ही बली जूझता है ॥ जो युद्ध हेतु केवल उन्मत्त हो  उसमें रन-सामर्थ्य न हो भयवश जो दृष्ट-पृष्ठ हो,  जो शस्त्र-वियुक्त हो,   ऐसे योद्धा से युयुधान रन कारित नहीं करते,  जो करते हैं वह अधम गति के योग्य होते  है ॥  

परतिय पर धन चित न लगाहू । करिइहु न सँगत अधमी काहू ॥
सद्गुन चारन रहिहु अपनाए । लागिहु न पहिले तुअ बुढ़ताए ॥
पराई स्त्री एवं पराए धन की ओर चित्त न ले जाना । किसी अधमी की संगती न  करना ॥ सभी सद्गुणों को अंगीकार किए रहना । बड़े-बूढ़ों के ऊपर प्रथमतस  प्रहार न करना ॥ 

गौ ब्रह्मन अरु धरम परायन । बिष्नु भगत प्रनम्य नत लोचन ॥
तेहि प्रनामत जहँ कहुँ जावैं ।  कृतबीर तहाँ  कृतफल पावैं ॥
गौ, ब्राह्मण तथा धर्म परायण वैष्णवों को अवनत लोचन से प्रणाम अर्पित करना । उन्हें प्रणाम करने वाले वीर्यशील जहां कहीं भी जाते हैं  वहां सफलता को प्राप्त होते हैं ॥ 

 लाँघहु न  पूजीत के पूजा । दया भाव चित चेत न दूजा ॥
रहिहु ते  हुँत सदा सचेता । जगजननी पत जगत प्रनेता ॥ 
अर्चित पुरुषों के पूजा-अर्चना का कभी उल्लंघन न करना । जो चित्त दया भाव से युक्त होता है इससे अवर कोई मंदिर नहीं है ॥ इस प्रकार मेरे द्वारा कही गई  उक्त  वचनों के लिए सदैव सचेष्ट रहना । जगज जननी के स्वामी जगत के प्रणेता स्वरूप : -- 

महाबाहु हरि सर्व स्वामी । ब्यापक रूप अंतरजामी ॥
जो भगता श्री हरिहि पियारे । सोइ सरूप सर्वत्र बिहारे ॥
महाबाहो भगवान श्री विष्णु,सर्वेश्वर हैं वह सर्वव्याप्त एवं अंतर जगत के ज्ञाता हैं जो भक्त भगवान विष्णु को प्रिय होते हैं । वह उन्हीं के स्वरूप में सर्वत्र विहार करते हैं ॥ 

सकल भूत के निलय निबासी । तेहि नाउ पुनि पुनि उद्भासी ॥ 
सुमिरि  जो हरि नाउ  गुन रासी । लाखिहु तिन श्री पत संकासी ॥
जो सम्पूर्ण भूतों के निवास करने वाले  हों  उनका नाम का वारंवार जाप करते हों और जो हरि नाम के गुण समूहों का स्मरण करते हों उन्हं तुम श्री के पति साक्षात श्री विष्णु के समरूप ही समझना  

जाके हुँत को आपना, नाहीं  कोउ पराए ।
सो बिस्नुभगत छन माहि, पापिन को पबिताए ॥
जिसके लिए कोई अपना है न कोई पराया है वह वैष्णव क्षण मात्र में ही पापियों को पवित्र कर देता है ॥ 

 सोम/मंगल  ११ /१२ अगस्त २०१४                                                                                                

जो द्विजन्हि के चरन पखारे । भगवदीअ हरि भजन पियारे ।
अरु वैर भाव के प्रतिमोचन । सो सुचिकरन जग लिए अव्तरन ॥ 
 जो सुसंस्कृत बाह्मणों के चरण धोते हैं जिन भगवद् भक्तों को हर भजन प्रिय है जो वैर स्वभाव का विमोचन करने में समर्थ हैं वे संसार को पवित्र करने हेतु ही वैकुंठपुर से अवतरित हुवे हैं ॥ 

जासु चित हरि भगति मह लागा । भाव हरिदै चरन  अनुरागा ।।
जासु उदर  हरि भोग प्रसादा ।  कँह  हरिजन सोइ निर्बिबादा ॥ 
जिसका चित्त हरि भक्ति में ही अनुरक्त है । ह्रदय में सनातन विष्णु ( ईश्वर) का ध्यान ) उनके चरणों में अनुराग है । जिनके उदर में उन्हीं का प्रसाद हो उन्हें निर्विवाद स्वरूप में वैष्णव ही कहा जाएगा ॥ 

दया भाव जिनके मन माही  । लगे बेद प्रिय जग सुख नाही ॥ 
धर्मवान भृत सदकृत कामा । होत भेँट तुअ  करिहु प्रनामा ।। 
जिनके मन में दया का भाव है जिन्हें वेद प्रिय है जगत के सुख नहीं । जो निरंतर धर्म (अर्थात सत्य तप शौच दान )का पालन करते हैं उनसे भेंट होते ही तुम प्रणाम करना ॥  

 सीस धरे पद पंकज धूरी । हर हरि के किए  भगति भूरी ॥ 
गौ गौरी सुरसरि सम देखें । तिनइ बीच जो भेद न लेखें ॥ 
शीश पर उनके चरणारविन्द की धूलि धारण किए जो  श्री विष्णु एवं भगवान शिव की अतिशय भक्ति करते हैं जो गौ गौरी एवं गंगा को समान दृष्टि से देखते हैं इनमें कोई भेद नहीं करते । 

कहे कथन सम सरासन साँच बचन सम  बान । 
भरे अंतर भाव छिमा, सूर न तासु समान  ॥ 
जिनका कहे कथन कोदंड के समान है कथन में निहित सत्य वचन वाण के सदृश्य हैं जिनके अंतर में काशमा का भाव हो उसके सदृश्य कोई वीर नहीं ॥ 

 मान सकल जन पातक नासा । सो सरि अवतर सुर संकासा ॥ 
भगत भाउ निज बल अनुहरे  । सरनागत  के राखनहारे ॥ 
उन सभी भक्तों को वैकुण्ठधाम के निवासी ही समझना इन सभी जनों को वैकुण्ठधाम में निवास करने वाले एवं अघनाशक ही मानना कारण कि ये सभी स्वर्ग से भूमि पर अवतरित हुवे देव ही हैं ॥ 

सरन  दात दानए बर दाने । बिसनौ मह सर्बोपरि माने ॥ 
जासु नाउ के  परभूता  । किए पातक तुर भस्मिन् भूता ॥ 
जो सत्पात्रों के करतल उत्तम दान देते हैं जो शरण -दातृ है एवं सत्पात्र को उत्तम दान देता हो उसे वैष्णवों में श्रेष्ठ जानना चाहिए ॥ जिसके नाम का प्रभुत्व ऐसा है कि वह तत्काल ही पापों को भस्मीभूत  कर देता है ॥ 

बिसई बाहि कर कासे किरन । अंतर्मन  भगवन के चिंतन ॥ 
बिष्नु चरन सरोज रति राखे ।  तासु भगत तिन लोचन लाखे ॥ 
जो विषयों के घोड़ों की किरणों को कर्षित किए अंतरमन में भगवान का ही चिंतन करता हो ।  के चरण सरोज में ही जिसका अनुराग हो ऐसे भक्तों  को तुम्हारी दृष्टि वैष्णव स्वरूप में ही देखे ॥ 

ऐसेउ समुह सिरु परनावै । सो जन निज जीवन पवितावै ॥
एहि भाँति मम अग्या अनुहरिहू । जो मैँ कहा रे सोइ करिहू  ॥ 
 ऐसे विष्णु भक्तों के सम्मुख जो शीश नवाता है वह अपने सम्पूर्ण जीवन को पवित्र कर  देता है ॥ इस प्रकार तुम मेरी आज्ञा का पालन करना जो मैने उपदेश कहा हे भ्राता तुम वही करना ॥ 

मम कहे कथन संग जो, होहिहु कबहु न बाम । 
बर जोग तैं लहनहारु , पैहिहु परमम धाम ।। 
हे लक्ष्मण ! यदि तुम मेरे कहे कथन के संग कभी विरुद्ध नहीं जाओगे । तब  उत्तम योगों के द्वारा प्राप्त होने वाले परम धाम के तुम् अधिकारी होगे । 
बुधवार, १३ अगस्त, २०१४                                                                                                

जासु निगम नित निगम प्रसंसा । हे रिसि अस रघुकुल अवतंसा ॥ 
कृताकृत के देत उपदेसा  । दिए सत्रुहन पयनै आदेसा ॥ 
यह वह परम धाम है जिसकी निगमगम सदैव प्रसंशा करते हैं ॥ हे महर्षि !हे वात्साययन ! इस प्रकार रघुकुल के अवतंस ने कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का उपदेश देते हुवे शत्रुध्न को कूच  करने का आदेश दिया ॥ 

अबर सूर पेखत प्रियताई । बहुरिमधुर बोले रघुराई ।।  
अहइँ कोइ अस अमित बीर बर । पीठ देस के रच्छा बल धर ॥ 
तत्पश्चात श्री रामचन्द्रजी अन्य वीरों के सम्मुख होकर उन्हें अनुरागपूरित दृष्टि से निहारते हुवे मधुर स्वर में कहा : -- है कोई श्रेष्ठ ? है कोई ऐसा अमित तेजस्वी ? जिसमें सेना के पृष्ठ भाग की रक्षा करने की क्षमता हो ॥ 

अहँ को  बिक्रमी भुजबल धारी । रच्छत है जो पाछिनु चारिहि ॥ 
मर्माघाती आयुध सँजुहा  । जीतएँ अरि सो आवैं समुहा ॥ 
है कोई पराक्रमी कोई बाहुबली जो राजस्कंद की रक्षा करते हुवे सेना अनुगमन करे । जो मर्म भेदी आयुधों से संयुक्त हो एवं सम्मुख आए अमित्र को जीतने में समर्थ हो ॥ 

हैं समर सूरवाँ अस कोई । एहि भार गहन समर्थ होई ॥ 
अस कह मौन भाव गह रघुबर । भरत पुत पुष्कल होइ अगुसर । 
है ऐसा कोई समर सूरवाँ जो यह बीड़ा उठाने में समर्थ हो । ऐसा कहकर जब रघुनाथ के मुख ने मौन भाव ग्रहण कर लिया तब भरत-पुत्र पुष्कल आगे आए ॥ 

गह भुज भार बिनयाबत, कह हे सर्व स्वामि । 
महनुभाव के अनुकामि, प्रतिमुख यह अनुगामि ।।   
अपनी भुजाओं में वह भार उठाए वह शिष्टता पूर्वक  बोले : -- हे सर्वेश्वर ! आप महानुभाव के कामनानुकूल यह आज्ञाकारी अनुचर सादर उपस्थित है ॥ 




Thursday, 12 June 2014

----- ॥ जल ही जीवन है ॥ ----

भारत एक जन एवं जीवसंख्या बाहुल्य देश है, जल ही जीवन है और इस जीवन पर सभी निवासियों का अधिकार है ।  नदियां पेय जल की प्रमुख स्त्रोत हैं । अधुनातन इसकी अनुपलब्धता को दृष्टिपात कर पर्यावरण की रक्षा करते हुवे पारिस्थितिक- तंत्र  का चिंतन कर जल- संरक्षण हेतु एक कठोर नियम का उपबंध करना  परम आवश्यक हो गया है..,

>> नदियां जीवन दायिनी स्वरूप में सभी धर्म एवं वर्गों की आदरणीया रही हैं..,

>> एक ग्राम  में केवल श्याम के लिए  नियन उपबंधित नहीं किया जाना चाहिए, अपितु यह  समस्त ग्रामीणों हेतु होना चाहिए उसी प्रकार केवल माँ गंगा जी के लिए ही नियम उपबंधित नहीं होकर नदियों पर किया गया नियम उपबंध व्यापक अर्थ उत्पन्न  करता है..,

>> सर्वप्रथम उद्यम एवं उपक्रमों के उत्सर्जित मल-मूत्र को  प्रतिबंधित करना चाहिए  यह प्रमुख प्रदूषण-स्त्रोत है उद्यमों एवं उपक्रमों को  अवशिष्ट का  पुनर्चक्रीकरण कर उसमें निहित जल का पुनरोपयोग हेतु परमार्श देना चाहिए जो वाष्पीकरण विधि से संभव है..,

>> इसके अतिरिक्त अन्य प्रदूषण-स्त्रोतों को समाज के  लोगों द्वारा जनजागरण अभियानद्वारा उसकी  रोकथाम करनी चाहिए,

>> शासन को चाहिए कि वह नदियों के प्रदुषण को दंडनीय अपराध घोषित कर उस पर कठोर दंड के सह अर्थदंड का प्रावधान करे