Monday, 14 January 2019

----- ॥ टिप्पणी १७ ॥ -----,

>> रेवड़ी के जैसे बंटने वाली नागरिकता का भी अंतत:यही परिणाम होना है.....ये नागरिकता या तो हमारा सब कुछ लूट कर ले जाएगी या हमें घर से ही निकाल देगी.....

>> यदि किसी अन्य दल ने चुनाव जीत कर मंदिर बना दिया तो देश हो न हो संसद अवश्य बीजेपी मुक्त हो जाएगी.....

>. ये देश है कि कोई धर्मशाला है जिस धर्म को देखो यहीं आ जाता है..... सारे जगत को भारतीय का ठप्पा लगा के यहीं काहे नहीं बसा लेते.....हमें जगत में भेज दो..... वहां भी हमने एक गंगा न निकाल दी तो फिर चन्द्रमा में भेज देना.....

इस देश को बहु बेटियों के रहने योग्य छोड़ेंगे कि नहीं ये न्यायाधीश बने नेता.....ये लोकतंत्र का नाटक क्यों कर रहे हैं..... स्पष्ट कहते क्यों नहीं कि ये अधिनायक तंत्र है.....

राजू ; -- में कहता हूँ इस न्यायालय की अंग्रेजी बंद कर दो तब इसकी बुद्धि ठिकाने आएगी.....


>> न्हाए धोए क्या हुवा मन का मैल न जाए |
मीन सदा जल में रहे तापर देइ बसाए ||
भावार्थ : - कबीर दास जी कहते हैं स्नान का महत्व तभी है जब मन में कोई मलिनता न हो | स्नान से पाप नहीं धुलते यदि धुलते तो मीन मलीन न होकर पावन पवित्र होती |

>.> ''अहिंसा परमो धर्म :'' का सूत्रपात कर हिन्दू धर्म में मांसाहार वर्जित किया गया देह की लाभहानि हेतु नहीं.....और फिर गांय तो एक पालतू अहिंसक और ममतामई प्राणी है इसका वध तो परम दोष है.....

>> मुंह टेड़ा हो जाएगा, टाँगे दो से एक रह जाएगी, चल नहीं पाएंगे.....तथापि भगवद रटन के स्थान पर ये नेता सत्ता सत्ता रटते हुवे ही मरेंगे.....

>> भगवान का कारावास में जन्म निर्दोष को दंड का प्रतीक है.....

>> जैसे ईश्वर को अर्पित किया गया भोजन पवित्र होकर प्रसाद हो जाता ,है वैसे ही ईश्वर के निमित्त किए गए स्नान से हमारी देह पवित्र होकर पापमुक्त हो जाता है.....

>> यूरोप अमेरिका के अल्पसंख्यक हैं किस धर्म के.....? यदि ये हिन्दू हैं तो फिर इस धर्म के अस्तित्व पर ही भारी संकट आन पड़ा है.....
आप संसद में हैं इसे उसे कोसने से अच्छा होगा की आप इस हेतु नियम बनाएं.....

>> बात तो सही है किन्तु आपकी कौन मानेगा.....? आजकल सत्ताधारी और उनके चाटुकारों की मनती है.....

>> ये शरणार्थी होकर ही जागेंगे.....इन्हें देश नहीं केवल नौकरी चाहिए.....बिजली पानी चाहिए..... वो अंग्रेज दे दे या मुसलमान.....
>> धाम धनु घरहि अरु बंधु मरघट छुटिहि जाए |
सुभासुभ करतब करमहि पाछहि पाछे आए ||
----- || गरुड़ पुराण || -----
भावार्थ : -धन-सम्पदा घर में छूट जाती है बंधु बांधव्य श्मशान में छूट जाते हैं | किए गए शुभाशुभ कर्म ही मृतक के पीछे पीछे जाते हैं |

>> भाव भगति रामजी सी लंका पति सा साज |
राम का मंदिर अहहैं कहु कहँ वाका राज ||

>> विवाह स्त्री पुरुष के पारस्परिक सम्बन्ध की अनुमति मात्र है, इस अनुमति से रहित संबंधों में भी वही दोष दर्शित हो रहा है जो ''बाल विवाह'' अथवा ''किशोर वृद्ध विवाह'' अथवा ''अधिवेत्ता विवाह'' (एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करने वाला पुरुष )में दृष्टिगत होता था ऐसी अनुमति विभिन्न देशों की शासन व्यवस्था या न्यायपालिका प्रदान कर रही हैं मायानगरी में यह रूढ़िवादिता सर्वाधिक देखने को मिल रही है.....वर्तमान में निर्धन अश्पृश्य हो गया है, मालों (मंडियों ) में संसद सभा में ऊंची अट्टालिकाओं में उसका प्रवेश निषेध हो गया है अर्थात : -

''राहे-रवां वही रही राही बदल गए.....''

>> पाखंड रहित नग्न साधुत्व हमें त्याग की शिक्षा देता हैं,

एक त्यागा हुवा वस्त्र किसी अभावग्रस्त के देह को ढांक सकता है..,

हम वस्त्रों का उपयोग करें उपभोग नहीं.....


>> एक आरक्षित अवसर १० को पिछड़ा, पददलित व् निर्धन बना देता है.....

>> डेढ़ सहस्त्र वर्ष हो गए, ये सत्ताधारी अब भी हमसे इन मुसलमानों की टट्टियाँ ही उठवाते रहेंगे क्या.....?

>> एक धर्म में कोई वर्ग उपेक्षित हो तो आवश्यक नहीं वह दूसरे धर्म में भी उपेक्षित हो..... पर नहीं : - खाता न बही - जो सत्ताधारी कहें वो सही.....

>> पाखण्ड रहित नग्नसाधुत्व प्रकृति के आतप्त के प्रति सहिष्णुता की शिक्षा देता है..... प्रलयकाल में ऐसे सहिंष्णु ही मनुष्य जाति को बचा रखेंगे.....

>> राजा होकर भी जब भगवान ने राजसी स्नान नहीं किया तो हम क्यूँ करें.....?

>> हिन्दू धर्म में भी स्त्रियों की दशा दयनीय थी कालान्तर में इस धर्म ने सुधारवादी विचारों को स्थान दिया।....भय है की इस प्रकार के अधिनियमों से वह स्थान लुप्त न हो जाए.....

>> हिन्दू विवाह सचमुच में एक अटूट बंधन ही था, इस बंधन में तलाक व् डाइवोर्स जैसे शब्द ही नहीं थे.....इस बंधन में इन शब्दों का विष भी इन सत्ता के लालचियों का ही घोला हुवा है.....

>> विभाजन में आपको अवसर दिया गया था ''इस्लामावाद'' अपनाने का.....ये एक धर्म विशेष की सामाजिक व्यवस्था है यदि ये बुराई हैं तो भी आपको अधिकार नहीं है इनपर टिका टिपण्णी करने का....आप अपने धर्म की बुराइयों को देखिए.....


>> किसी संविधान का विरोध देशद्रोह है.....? वह संविधान जो अपनी मौलिकता को विस्मृत कर अपने ही राष्ट्र के दासकर्ता को अधिकारों से संपन्न करता हो.....?

गए.....देश द्रोह में कितना दंड है.....बापरे ! फांसी.....

 ----- ॥ धर्मो रक्षति रक्षित: ॥  ----- 

>> कांग्रेस प्रोसेस से ऋण लो और भाजपा प्रोसेस से ऋणमुक्त हो जाओ.....देश का बंटाधार कर देंगे ये एक थैली के चट्टे-बट्टे.....

>> औरन की देहरि पड़ा भुल्या अपना मूर |
धन धरती कइ लाहु मैँ मातुपिता गै भूर || ५ ||

भावार्थ : -दूसरों की देहली में पड़ के अपनी जड़ें भूल गए धन और धरती का इतना लोभ हुवा कि अपने मातापिता, अपने पूर्वज तो क्या उनकी कब्रें भी याद नहीं रही |

>> अपने सम्मुख बैठे विपक्ष से प्रधानमंत्री ने कभी इस सम्बन्ध में प्रश्न किया कि यह स्वतंत्रता देश की थी या कांग्रेस की.....

>> हिन्दू विवाह अधिनियम है भाई.....

>. जिस देश में चरित्रहीनता का वास होता है, वहां नारी असुरक्षित रहती है.....

>> सेवा व् उपासना दोनों शब्द एक ही भाव से व्युत्पन्न हुवे हैं एतएव दोनों का धर्म भी एक ही होना चाहिए वह है लोकोपकार.....

>> पच्चीस तीस लाख पैकेज वाली दासी आई 'आई टियर्स' से एक करोड़ लाभांश वाली पकोड़ा मुस्कान का समाज में अधिक सम्मान है.....










Tuesday, 8 January 2019

----- ॥ दोहा-द्वादश १६ ॥ -----,

गदहा भए उपाधि लहे जोग भये अपराध |
अधुनातन एहि देस मह साधक भए बिनु साध || १ ||
भावार्थ : - अयोग्यता को योग्यता सूचक पत्रोपाधि व् पद प्राप्त हो रहे हैं योग्य होना अपराध हो गया है | विद्यमान परिदृश्य में कुशलता को देश के संचालनोपकरणसे रहित व् अकुशलता को उससे युक्त किया जा रहा है कैसे चलेगा ये देश.....?

गहे नहि गुन ग्यान जौ होतब सो अगवान |
ग्यानबान दीन करत अब होइहि धनबान || २ ||
भावार्थ : - जिसने गुणज्ञान ग्रहण नहीं किया है जो अयोग्य है वह अब आगे होकर उपाधियों का अधिकारी होगा और योग्य मध्यमवर्गीय ज्ञान वान को निर्धन रेखा के नीचे लाकर रातोंरात धनवान बनेगा.....

अधिकार वादी लोकतंत्र का नया आदेश.....

पाहन होतब नीउँ के भए सो कलस कँगूर |
सेष उठे बिनु होत भरित भवन ते दूर || ३ ||
भावार्थ : - जिन पत्थरों को नीचे रहकर समाज रूपी भवन की नीव होना था समाज का उत्थापक होना था वह पर्वत शिखरों के कंगूरे बनकर ऊँचे पदों, ऊँचे स्थानों पर सुशोभित हो जाएं तब फिर शेष रहे पत्थर रूपी समाज, उत्थित भवन बनने से दूर होता चला जाता हैं |


ऊंचाई सोई भली राखे जिउ जिउ जेहि | 
नीचाई बुरी जौ निज नीच निरखे न केहि || ४ || 
भावार्थ : - वह ऊंचाई उत्तम है जो नीची दृष्टिकर जीव मात्र की रक्षा करे | वह नीचाई निकृष्ट है जो यह नहीं देखती कि उसके नीचे भी कोई है |

औरन की देहरि पड़ा भुल्या अपना मूर | 
धन धरती कइ लाहु मैँ मातुपिता गै भूर || ५ || 
भावार्थ : -दूसरों की देहली में पड़ के अपनी जड़ें भूल गए धन और धरती का इतना लोभ हुवा कि अपने मातापिता, अपने पूर्वज भी याद नहींरहे |

धरम बिहूना मानसा भया दया ते हीन | 
लखत लखत मुख सबन कै गौउ मात भइँ दीन || ६ ||   
भावार्थ : - धरम से निरपेक्ष हुवा मनुष्य दया से रहित हो गया आशा पूरित नेत्र से सब ओर निहारती सर्वकामद गौ माताएं विपदाग्रस्त हो गईं |

जबह करे जुलूम करे बनता फिरे इंसान | 
ख़ौफ़ ख़ावत ता संगत भागे दूर मसान || ७ || 
भावार्थ : - जो जीवों पर क्रूरता पूर्ण व्यवहार कर फिर मनुष्य बना फिरता हो ऐसे भूत से सहमकर तो श्मशान भी दूर भागता है |

धरम न कोउ बिसारिये निकसत जबहीं प्रान | 
धरके काँधे धर्मही लेइ जात श्मसान || ८ || 
भावार्थ : - किसी को भी धर्म का अनादर नहीं करना चाहिए  वह धर्म ही है जो प्राण निकलने के पश्चात मनुष्य को अपना कंधा देकर श्मशान ले जाता है | 

धरम रहित मनुष्य पशु के समान है यदि पशुओं में धर्म होता तो उनकी भी श्मशान में अंत्येष्टि होती 




आँगन में नदिया बही आया मरत पियास |
दासा गोसाईं भया अरु गोसाईं दास ||  ||
भावार्थ : - इस देश से भिन्न इस परधर्मावलम्बियों के भारत आने की इतनी सी कहानी है की एक समय इस देश में समृद्धि की नदियाँ बहने लगी थी ये प्यासे मरते हुवे मरुस्थलों से यहाँ आए प्रथमतः स्वयं दास बने, फिर देश को लूटा, कालान्तर में देश के सम्प्रभुत्व को ही अपना दास बना लिया

बैसे भीतर आपने अपुने सोंहि बिरुद्ध |
स्वाम संगत आपनी करते निसदिन जुद्ध ||
भावार्थ : - और यहाँ अपनों के विरोधी अपने ही भीतर बैठे हैं वे अपने स्वाम्य को अपने सम्मुख किए उससे निसदिन संग्राम करते हैं |

जोग बनाया आपुनो पराए संगत प्रीत |
निज सत हेतु बिरोधता सो तो अनभल रीत ||





Monday, 24 December 2018

----- ॥ दोहा-द्वादश १५ ॥ -----

बहिरे बरग के डर ते डरपत मन हम्हार |
एहि डर निडर होतब रे भाजत देस द्वार || १ || 
भावार्थ : -  देश से बाहर के समुदाय का भय हम भारत वासियों को बहुंत भयभीत करता हैं क्योंकि उनका यह भय इस देश को विभाजित करके ही निर्भीक होता है |

को करतब बलिदान को सेवा सुश्रता कोइ |
साँची तब कहिलाइ जब परमार्थ हुँत होइ || २ ||
भावार्थ : - कोई कर्तव्य कोई बलिदान अथवा कोई सेवा शुश्रुता तभी सत्य कहलाती है जब वह निःस्वार्थ होकर परमार्थ हेतु हो स्वार्थ हेतु नहीं |

लीख ते भयउ लाख सखि निरखु ए खंजन खेल |
साखि साखि करु राखि सखि नैन नीँद परहेल || ३ ||
भावार्थ : - हे सखि ! इन प्रवासी पक्षियों को देखो ये कैसे अल्प से अति हो गए | नेत्रों से निद्रा को तिरष्कृत कर तुम अपने वृक्ष और उनकी शाखाओं की रक्षा करो |

सीत पानि करि सीत रुचि सीत काल सिहरात |
सीत बात असपरस के पात पात संपात || ४ ||
भावार्थ : - शीत काल में किरणों की शीतलता से चन्द्रमा भी कम्पन करने लगा | शीतल वायु का स्पर्श वृक्ष को कम्पित कर उसके पत्ते गिराने लगा


मन मोहु माया बस किए देही जति परिधान | 
चित कस ग्यान गहे जो करतल दिए नहि कान || ५ || 
भावार्थ :- मन सांसारिक विषयों वशीभूत हो देह यति वल्कल के |  जब कान अपरिरुद्ध होकर अनर्गल प्रलाप  श्रवण करने में व्यस्त हो तब चित्त ज्ञान कैसे ग्रहण करे |

साँच धर्म की आत्मा दया धर्म की देह |
तप धर्म का हरिदय है दान धर्म का गेह || ६ ||
भावार्थ : - सत्य धर्म की आत्मा है दया  धर्म की देह है तपस्या धर्म का ह्रदय है दान उसका गृह है |

पाठ पराया पढ़त मन मानस भयो अधीन | 
देस पराया जीमता अपुना दीन मलीन || ७ || 
भावार्थ : - पराई पट्टी पढ़ के यह देश मानसिक दास हो चला है भिन्न देश के धर्मावलम्बी इस देश का भरपूर उपभोग कर रहे और देशवासी दरिद्रता को प्राप्त हैं |

कतहुँ मुस्लिमस्ताँ बसै कतहुँ फिरंगी बाद | 
अहले हिन्दुस्ताँ तिरी कौन सुने फ़रियाद || ८ || 
भावार्थ : - कहीं मुस्लिम्स्तान बसा है तो कहीं इंग्लैंडिया बसा है प्यारे भारत यहाँ तेरी दुहाई, तेरी याचिका सुनने वाला कोई नहीं है | 

नेम नियामक पहिले कि पहिले धर्म निकाय | 
जनमानस के राज कहु कवन पंथ अपुनाए || ९ || 
भावार्थ : -  किसी विवादित विषय में एक लोकतांत्रिक शासन प्रबंधन की कार्य प्रणाली किसे प्राथमिकता दे - नियम विधान निर्मित कर शासन करने वाली संस्था को अथवा न्यायपालिका को ?

नेम नियामक नाम का करिआ नेम अभाउ | 
बहुरि कहाँ ते आएगा कहु त निरनय न्याउ || १० || 
भावार्थ : - " जहाँ नियमन करने वाली संस्था नियमों का अभाव करती हो वहां न्याय व् निर्णय का अकाल होता है " जब नियमन करने वाले नियामक नाममात्र होकर नियामादेश का अभाव कर दे तब न्याय व् निर्णय आएगा कहाँ से ? तो '' प्रथमतः नियम निर्मित होते है, उसके आधार पर न्याय व् निर्णय होता है....."

उदाहरणार्थ : - 'अ'विवाहेत्तर सम्बन्ध का अभ्यस्त है उसके पडोसी  'ब' को इससे आपत्ति है दोनों एक सद्चरित्र लोगों के देश में निवास करते हैं |  'अ' आपत्तिकर्ता के विरुद्ध न्यायालय में याचिका प्रस्तुत करता है
कि 'ब' मेरे निज जीवन में व्यवधान उत्पन्न न करे | न्यायालय न्याय निर्णय कैसे दे नियम तो है ही नहीं और न्यायालय 'ब' को बोलेगा सारा विश्व तो चरित्र हीन है तुमको आपत्ति क्यों है चुपचाप अपने घर में क्यों नहीं रहते |  देश काल व् परिस्थिति को दृष्टिगत करते हुवे प्रथमतः कार्यपालिका नियम निबंधित करे कि यह देश चरित्रवानों का है कोई निवासी चरित्रहीनता का व्यवहार न करे यदि करेगा तो दंड का भागी होगा.....

जन जन निज मत देइ के जिन्हनि दियो चुनाए | 
सोई पहिले आपुना कृत करतब निबहाए || ११ || 
भावार्थ : - फिर जनमानस ने जिसका चयन किया है सर्वप्रथम वह अपने कृतकर्तव्यों का निर्वहन करे.....

क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनमानस द्वारा न्यायापालिका के अन्यथा कार्यपालिका का चयन इस हेतु  किया जाता है कि वह उसके देश काल व् परिस्थिति के अनुसार नियम निर्मित करे तत्पश्चात उन नियमों के आधार पर न्यायापालिका न्याय करे व् निर्णय दे..... आदेश नहीं.....

 न्याय संगत बितर्कन बिधि सम्मत परमान । 
साखी दिरिस अवमति दिए नेति जोग अवज्ञान ॥ ३२१४॥ 

भावार्थ : -- न्याय संगत तर्क, विधि- सम्मत साक्ष्य, साक्षाद्दृश्य को तिरोहित कर दिया गया निर्णय अवज्ञा के योग्य होता है.....


''चार बीबी चालीस बच्चे'' ''ये बिना बीबी चार सौ बच्चे.....

''ऐसे संबंधों से व्युत्पन्न संतति का उत्तरदायी कौन होगा.....


पुरुख नारि बिहीन जने संतति जब सतचार | 
पच्छिम तेरी चलनि की  महिमा अपरम्पार || १२  || 
भावार्थ : -अरे पाश्चात्य संस्कृति तेरी महिमा तो सबसे  अपरम्पार है तुम्हारे यहाँ बिना बीबी के चार सौ बच्चे जनम ले रहे है तुमसे तो ''चार बीबी चालीस बच्चे'' इस पार हैं |






Saturday, 15 December 2018

----- ॥ दोहा-द्वादश १४ ॥ -----,

जबहि भीते चोर बसे, पहराइत के राख |
बहुरि सासत राज रजत तहाँ पराई साख || १ ||
भावार्थ : - प्रहरियों के प्रहरी बनकर जब गृह के भीतर ही चोर बसे हों, तब विदेशी अथवा विदेशी प्रवासी के वंशज उस गृह का उपभोग करते हुवे उसपर शासन करते हैं |

जोइ बिटप परपंथि हुँत होत उदारू चेत | 
साख बियोजित होइ सो उपरे मूर समेत || २ || 
भावार्थ : -   पंथ पर अवस्थित जो वृक्ष डाकू, लुटेरों के प्रति उदार ह्रदय होता है वह एक दिन अपनी शाखाएं वियोजित कर मूल सहित उखड जाता है |

पंथ = धर्म
वृक्ष = अनुयायी
परिपंथी = डाकू, लुटेरे

दीन हीन मलीन हुँते रखिता चेत उदार |
साख साख बिरधाए सो बिटप गहे बिस्तार || ३ || 
भावार्थ : - लुटेरों के प्रति उदारवादी न होकर दरिद्र, दुर्दशाग्रस्त, विकलता से भरे हुवे के प्रति उदार वृक्ष अपनी शाखाओं को संवर्द्धित कर विस्तार को प्राप्त होता है |

जूह भीत अभिमन्यु सों बैदि धर्म बिपरीत | 
पैसन पथ परिरुद्ध है, निकासि पथ असिमीत || ४-क  || 
----- || गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर || -----
भावार्थ : -- गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार : - अभिमन्यु द्वारा प्रविष्ट व्यूह से वैदिक धर्म विपरीत है इस समुदाय में प्रवेश द्वार अवरूद्ध  है और निर्गत द्वार अनेकों हैं....."

क्योंकि : - 
बैदिक धरम बिटप सूर सार रूप भगवान | 
ग्यान सिंचित जल है उर्बरा है बिग्यान || ४-ख || 
भावार्थ : - क्योंकि वैदिक धर्म समुदाय एक ऐसा विटप है जिसके सार में सूर्य स्वरूप भगवान हैं यह ज्ञान जल से सिक्त  व् विज्ञान की उर्वरा से परिपुष्ट हुवा  है | इसका विज्ञान आनुवांशिक अभियांत्रिकी का पर्याय है |

साधौ जब हुए जाएँगा बिधिबिद बिधि ते बाम |
जहाँ बिराजै राम समुझि सोइ राम के धाम || ५ ||
भावार्थ : - सज्जनों जब न्यायकर्ता न्याय के विपरीत व्यवहार करने लगे  तब जहाँ राम विराजेंउसे ही राम का धाम समझ लेना |

प्रगस बड़ो पहुमि नहि नहि प्रभु ते बड़ी प्रभुताइ | 
भगत सनेहे भगति कू  बंचक बंचकताइ  || ६ || 
भावार्थ : -  प्राकट्य स्थान से ईश्वर्य का प्राकट्य महत्वपूर्ण है ईश्वर के सम्मुख ईश्वर का सांसारिक वैभव तुच्छ है | भक्त को भक्ति से अनुरक्ति होती है प्रपंचों से नहींऔर  राम का नाम लेकर जगत को ठगने वाले ठगों को ठगी से अनुरक्ति होती है राम से नहीं |

समयँ सबते बली तासु बली न को जग माहि | 
समयँ न कोउ बाँधि सकै समयँ बाँधि सब काहि || ७ || 
भावार्थ : - समय सबसे बलवान है समय से बलवान इस संसार में कोई नहीं है | समय को कोई बाँध नहीं सकता समय द्वारा सभी विबन्धित हैं |

खाना पीना पहिरना साधे साध अगाध | 
एकै स्वारथ साधना कहा न दूजी साध || ८ || 
भावार्थ : -  खाना पीना पहनना और नाना प्रकार के सुख साधनों का संकलन करना अर्थात स्वार्थ सिद्धि में लगे रहना   क्या जीवन का यही एक मात्र लक्ष्य है |

भीतर के संसार एक बाहिर के संसार | 
जे कर्म के अधार है जे तो भावाधार || ९ || 
भावार्थ : - मानव जीवन के दो जगत होते हैं एक बाह्य जगत एक अंतर्जगत | बाह्यजगत  किए गए कर्मों के द्वारा और अंतर्जगत विचार आचार संस्कार आदि मनोभावों के द्वारा व्यवस्थित होता है |

जीवन साधन साधना साधे बाहिर गेह | 
अंतर मन करि भाव सों सधे भीतरी देह || १० || 
भावार्थ : - भोजन वसन वासन वाहन आदि जीवन के साधनों की सिद्धियां मनुष्य के बाह्य जगत को साध्य करती है  आचार, विचार, प्रेम, भक्ति आदि अंतर्भावों से अंतर्जगत साध्य होता है |

साधन माहि रमाए रहँ पेम भगति बिसराए | 
बाहिर भवन बसाए सो भीत भवन उजराए || ११ || 
भावार्थ : - जो प्रेम भक्ति आदि मनोभावों की अवहेलना कर केवल जीवन के साधनों को सिद्ध करने में संलग्न रहता हो उसका बाह्य भवन  अवश्य व्यवस्थित रहता है किन्तु अंतर्भवन उजड़ा रहता है |

देह चहे बासन बसन उदर चहे खद्यान |
पेम भाव पीतम चहे भगति चहे भगवान || १२ ||
भावार्थ : - देह  हेतु बासाबास, उदर हेतु भोजन आवश्यक है | प्रेम हेतु प्रीतम आवश्यक है भक्ति के लिए भगवान भी आवश्यक हैं |

बहिरे बरग के डर ते डरपत मन हम्हार |
एहि डर निडर होतब रे भाजत देस द्वार || १ ||
भावार्थ : -  देश से बाहर के समुदाय का भय हम भारत वासियों को बहुंत भयभीत करता हैं क्योंकि उनका यह भय इस देश को विभाजित करके ही निर्भीक होता है |

को करतब बलिदान को सेवा सुश्रता कोइ |
साँची तब कहिलाइ जब परमार्थ हुँत होइ || २ ||
भावार्थ : - कोई कर्तव्य कोई बलिदान अथवा कोई सेवा शुश्रुता तभी सत्य कहलाती है जब वह निःस्वार्थ होकर परमार्थ हेतु हो |

Thursday, 6 December 2018

----- ॥पद्म-पद ३१॥ -----,

 ----- || राग-      || -----
नीर भरे भए नैन बदरिया..,
चरन धरत पितु मातु दुअरिआ..,
अलक झरी करि अश्रु भर लाई बरखत भई पलक बदरिया..,
बूँदि बूंदि गह भीजत आँचर ज्यौं पधरेउ पाँउ पँवरिआ..,
घरि घरि बिरमावत भँवर घरी  कंकरिआ सहुँ भरी डगरिआ..,
नदिया सी बहति चलि आई बिछुरत पिय कि प्यारि नगरिया..,
 दरस परस के पयस प्यासे तट तट भयऊ घट नैहरिआ..,
 घट घट पनघट आनि समाई सनेह सम्पद गही अँजुरिआ....



----- ॥ दोहा-द्वादश १३ ॥ -----

अजहुँ तो हम्म दरसिआ जग मरता चलि जाए |
एक दिन ऐसा आएगा मरते हम दरसाए  || १  ||
भावार्थ : - अभी हमें संसार मृत्यु को प्राप्त होते दर्शित हो रहा है एक दिन ऐसा भी आएगा जब संसार को हम मृतक दर्शित होंगे |

सार यह है कि : - जीवन का अहंकार कदापि नहीं करना चाहिए.....

भाड़ मचाए भीड़ संग चले भेड़ की चाल |
जो बैरी भए आपनो वाको को रखवाल || २ ||
भावार्थ : - उपद्रव मचाती या धक्कमधक्का करती भीड़ के साथ भेड़ के जैसे अंधानुकरण कर जो स्वतोविरोधी होते हुवे जो स्वयं से वैर करता हो उसकी रक्षा भला कौन कर सकता है |

आँच दिये कुंदन भयो होतब कंचन साँच |
जोइ बिसमाइ गयो सो होत असाँचा काँच || ३ ||
भावार्थ : -  उत्कृष्ट मनुष्य जीवन के आतप्त को सह कर अत्युत्कृष्टता को प्राप्य होता है | जो ऐसे आतप्त को सहन नहीं करता वह अतिनिकृष्टता की श्रेणी को प्राप्त हो जाता है |

सत्ता साधन हेतु जे करिअ न कहा कुकर्म | 
कापर पटतर आपुना बदलें नाम रु धर्म || ४ || 
भावार्थ : - सत्ता साधने के लिए ये नेता क्या कुकर्म नहीं करते नाम व् धर्म को तो ये कपड़ों के जैसे बदलते हैं | 

कतहु गड़बड़ झोला रे कतहुँ त गड्डम गोलि |
लोक तंत्र में बोलिये जनमानस की बोलि || ५ ||
भावार्थ : - कहीं गड़बड़ है कहीं घपला है कहीं घोटाला है कहीं गोली चल रही है | भैया ये लोकतंत्र है यहाँ जन मानस की बोली बोलनी पड़ेगी |

नहि चलेगा गडम गोल नहीं चलेगी गोली |
लोकतंत्र में बोलिये जनमानस की बोलि || ६ ||
गडम गोल = घपला घोटाला

जोइ बसेरा आपना पराए करें निबास  | 
कहा करिएगा बासना कहा करिएगा बास  || ८ || 
भावार्थ : - हे देशवासियों ! जब अपने निवास में पराए समुदाय का वास हो जाए तो परिश्रम कर करके, रोजगार कर करके बाट-वाटिका बनाने, घर को सजाने और बर्तन भांडे जोड़ कर भोजन-वस्त्र की व्यवस्था करने से क्या लाभ उसको तो पराया भोगेगा ||

तनिक जीवति संग सकल साधन साज सँजोए | 
पहरे में रह आपहीं कुसल गेहसी सोए || ९ || 
भावार्थ : - बिंदु में जो सिंधु लिखे यत्किंचित में जो गृह के जीवन यापन के सह समस्त सुख साधनों का संकलन कर ले, और अपने गृह का रक्षा स्वयं करे वह कुशल गृहस्थी है |

मुखिया मुख सों चाहिये खान पान कहुँ ऐक |
पाले पौसे सकल अंग तुलसी कहे बिबेक ||
----- || गोस्वामी तुलसी दास || -----


भावार्थ : - तुलसी दास जी कहते हैं : - गृहप्रधान को मुख के समान होना चाहिए भोजन ग्रहण करने हेतु एक ही है किन्तु वह न्यूनाधिक के विवेक से गृह के भोजनन्न, ईंधन, वन-वाटिका, पालतू पशु, स्वास्थ, शिक्षा, सुखसाधन, रक्षा, पहुँच मार्ग, साज सज्जा, आदि सभी अंगो का यथोचित पालन पोषण करे |

अरहर केरी टाटरी अरु गुजराती राख | 
पहिरन खावण को नहीं अरु पहराइत लाख || १० || 
भावार्थ : - 'अरहर की टाटरी और गुजराती ताला' जब देशवासी झोपड़ियों में निवास करे और उसकी रक्षा के लिए बड़ा व्यय | असन हैं न वासना और उसकी रक्षा में लाखों का व्यय होता हो तो वह अपव्यय है |

टिप्पणी : - गृह की कब, कैसे व् कितनी रक्षा हो - अपनी कुशलता सिद्ध करने के लिए गृह प्रधान यह विवेक से निश्चित करे |

बासर ढासनी के ढका रजनी चहुँ दिसि चोर | (तुलसी दास )
कस गह पहरा राखिए लूट मची सब ओर || ११ ||

भावार्थ : - चोर तो पहले से थे, लुटेरे और ठग भी आ गए अब दिन को ठगों के धक्के खाने पड़ेंगे रात को चोरों से भय रहेगा चारों ओर लूट ही लूट मची है हे भगवान ! अब देश/घर की रक्षा कैसे होगी |

भीत भीत भिद भेद दै द्वारि चौपट खोल |
पहरी गगन में फिरते बैसे उड़न खटोल || १२ ||
भावार्थ : - भित्ति भित्ति को सेंध कर फिर अंतर भेद भी प्रेषित किया और द्वारों को भी चौपट खोल के  हमारे देश के प्रहरी को गगन की रक्षा हेतु उड़न खटोले दिए गए |  न्यायाधीश अथवा प्रतिपक्ष ने नहीं पूछा क्यों दिए गए.....? आकाश में अब तक कितने आक्रमण हुवे जल में कितने आक्रमण हुवे और थल पर कितने आक्रमण हुवे, कितनी घुसपैठ हुई झोल कहाँ है वायु में जल में कि थल में.....?








Friday, 30 November 2018

----- ॥ दोहा-द्वादश १२ ॥ -----

जाके पूर्बज जनम भए जाहि देस के  मूल | 
जनमत सो तो होइआ सोइ साख के फूल || १ || 
भावार्थ : - "कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र का मूल नागरिक है यदि उसके पूर्वजों की जन्म व् कर्म भूमि उक्त राष्ट्र की भूमि रही हो तथा उसका जन्म ऐसे पूर्वजों द्वारा उत्पन्न माता-पिता से हुवा हो |" 

स्पष्टीकरण : - यहाँ पूर्वज का आशय व्यक्ति के पूर्व की ज्ञातित पीढ़ियों में उत्पन्न व्यक्ति से है |  

जौ उलाँघत उपजत निज देस धर्म मरजाद | 
दूज हुँत मरजाद लिखे ताको संग विवाद || २ || 
भावार्थ : - अपने देश, अपनी कुल-जाति, अपने धर्म की मर्यादाओं के उल्लंघन का परिणाम जब दूसरों  के जाति-कुल देश-धर्म की मर्यादा लिखने का यत्न करता है तब उसके साथ विवाद होता है | लोग पूछते हैं तुम्हारी जाति क्या है ? धर्म क्या है ? फिर अपवाद स्वरूप कोई कबीर कहता है कि ''जाति न पूछो साधू की....''

जाति धरम जब कुल रहे रहैं हंस संकास | 
बिहूना होइ बगुल भए भाखन लागे माँस || ३ || 
भावार्थ :- जब जाति धर्म कुल की मर्यादाएं थीं तब हंस के समान रहे, जैसे ही मर्यादा भंग हुई बगुले हो गए और हिंसावादी होकर मांस-भक्षण करने लगे  |


अजहुँ सीस चढ़ि बैसिआ सोई अजाति बाद |
 निज मरजादा भूरि के औरन किएँ मरजाद  || ४ ||
भावार्थ :- अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन कर दूसरों को मर्यादित करने का यत्न करते हुवे जिस वाद का प्रादुर्भाव हुवा वह अजातिवाद विद्यमान समय में शीश पर चढ़ा बैठा है |

जाति बरन अरु कुल धर्म नाउ नेम मरजाद | 
निर्बंधन जिन्ह चाहिए तासों करत बिबाद || ५ || 
भावार्थ :- जाति, वर्ण, कुल, धर्म नियम व् मर्यादाओं का दूसरा नाम है जिन्हें नियमों,मर्यादाओं, सीमाओं का विबंधन नहीं चाहिए उनका इनके साथ सदैव का विवाद रहा है और नियमों तथा सीमाओं की अबन्ध्यता अराष्ट्रवादिता की जननी है |

''राष्ट्रवादिता शब्दों से नहीं अपितु व्यवहार से प्रकट होती है.....''

नागरिकी अधिकार एक मौलिक एक अधिकार | 
येह  नागर कर दीजिए येह मूलि कर धार || ६ || 
भावार्थ : - भारत के इतिहास से शिक्षा लेते हुवे वर्तमान संविधानों को दो प्रकार के अधिकारों से युक्त होना चाहिए, एक मौलिक अधिकार दूसरा नागरिक अधिकार | मौलिक अधिकार तत्संबंधित राष्ट्र के मूल निवासियों को एवं नागरिक अधिकार मूल निवासियों सहित प्रवासी पीढ़ियों को प्रदत्त हो | 

शासन व् शासक चयन का अधिकार मौलिक अधिकार के अंतर्निहित हो..... 

सासन के अधिकार जहँ गहे देस के मूरि | 
जनमानस के सोइ सासन रहँ दासन ते दूरि || ७ || 
भावार्थ : -शासक व् शासन चयन जैसे मौलिक अधिकार जहाँ राष्ट्र के मूल नागरिक को ग्राह्य हों वह लोकतंत्र दासत्व के भय से मुक्त होता है |

सबहि देह मह जीउ है सबहि देह महँ प्रान | 
जिव हन्ता कहुँ  दंड हो काहु नही ए बिधान  || ८ || 
भावार्थ : - सभी देह श्वांस से युक्त है सभी देह प्राणमय हैं जीवन का अधिकार तो सभी को है | ईश्वर के शासन में जीव हत्या हेतु दंड का विधान है, मानव के शासन में इस अपराध हेतु दंड का विधान क्यों नहीं है |

बहुतक स्वाँग रचाई के पुनि भरे छद्म छ्ल भेस | 
नेता कहिते भारतिअ छाड़ों भारत देस || ९ || 
भावार्थ : - नाना भांति के स्वांग रचाकर छल कपट का वेश धरे सत्ता को प्राप्त नेता कहते हैं ''भारतीय भारत छोडो''

देहि जति परिधान दियो पहिरे पाँउ खड़ाउ | 
त्याजत तप रजत भयो सो तो रावन राउ || १० || 
भावार्थ : - देह में यतिवल्कल, चरणों में खड़ाऊ धारण किए सात्विकता यदि तामसी राजत्व को प्राप्त हो तो समझो वहां रावण राज है |


पथ पथ जाके राज में रचे कसाई गेह | 
कहौ कहा तिन होइगा राम नाम ते नेह || ११ || 
भावार्थ : - जिनके राज में पंथ पंथ पर कसाईघर अवस्थित हो कहिए भला उन्हें भगवद से प्रेम होगा क्या |

हिंसे न केहि जिउ कतहुँ सोए अहिंसा नीति |
अधिनायक तंत्र जहँ तहँ होत सबहि बिपरीति || १२-क ||
भावार्थ :- सभी जीवधारियों में ईश्वर की सत्ता है किसी भी जीव की हिंसा न करने की नीति ही अहिंसा नीति है | किन्तु जहाँ अधिनायक तंत्र भाग्य विधाता हो वहां समस्त नीतियां मूलतः सिद्धांतों के विपरीत हो जाती हैं |

 अधिनायक तंत्र = स्वेच्छा चारी शासन-प्रबंध, तानाशाही

दए अमि सुबरन नीपजे जुते खेह जौ बंस |
सो महपापि अधमी जो  ताहि हतें निरसंस || १२-ख ||