Wednesday, 9 December 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४४ ।। -----

सोमवार ०७ दिसंबर,२०१५ 

बहुरि जानकी रमन के हेता । लए औषध आइहिं रन खेता ॥ 
औषध सहित गयउ जब आवा । निरखत हनुमत सब सुख पावा ॥ 
फिर जानकी रमण श्रीराम के शुभेक्षु औषधि लिए रणक्षेत्र में आए | हनुमान जी औषधि सहित लौ आए यह दर्शकर सभी सुखी हो गए | 

भेंट तासु रिपु हो कि मिताईं । साधु साधु कह करिहिं बड़ाईं ॥ 
कपि गण महुँ अद्भुद कपि मानिहि । बली महुँ महबली पद दानिहि ॥ 
मित्र हो अथवा शत्रु उनसे भेंट कर साधु साधु कहते हुवे सभी उनकी प्रसंशा करने लगे | कपिगणों में उन्हें अद्भुत कपि मान और बाहुबलियों में महाबली पद प्रदान किया | 

महामना माहि महातिमही । बुला मंत्रिबर सुमति सों  कहीं ॥ 
जो निर्जिउ जिय देइ जियाइहिं । करिहौं अब मैं सोइ उपाइहिं ॥ 
फिर हनुमंत ने महामनाओं में महातिमहा मंत्रीवर सुमंत को बुलाकर बोले : - ' जो नीर्जिवो को प्राण देकर उन्हें जीवंत कर दे अब मैं वह उपाय करूंगा | 

लए भुजदल पुष्कल पुठबारे । पुनि हरिहर उर औषध धारे ॥ 
धर ते बिहुन तासु सिर लीन्हि । जुगत मन जुत जुगावत दीन्हि ॥ 
तदनन्तर पुष्कल के पृष्ठप्रदेश को भुजाओं में धारणकर उनके वक्षस्थल पर धीमे से वह औषधि रख दी व् धड़ से विहीन उनका शीश लिया और सावधानी पूर्वक युग्मित कर उसे धड़ से संयुक्त कर दिया | 

जुगे जोहि धर सोहि सिरु, पुष्कल देह सँभारि । 
द्रवत हरिदय हँकारि के कथे कथन हित कारि ॥ 
शीश ज्यों ही धड़ से संयोजित हुवा तब पुष्कल की देह को संयत कर द्रवित ह्रदय से पुकारते हुवे यह हितकारी कथन कहने लगे : - 

जो मन क्रम बचन ते मम होइ राम गोसाइँ | 
 तुरै ए सजीवन औषधि पुष्कल देइ जिआइँ || 
यदि मन क्रम वचन से रघुवीर मेरे स्वामी हैं तो यह प्राणदायिनी औषधि पुष्कल को तत्काल जीवित कर दे | 

बुधवार, ०९ दिसंबर, २०१५                                                                                   

एहि निगदन मुख निकसिहि जोहीं । बीर सिरोमनि पुष्कल तोहीँ ॥ 
जीअत उठि बैठे हरषाईं । भेंटत सकल हरष उर लाईं ॥ 
ज्यों ही मुख से यह उक्ति निष्कासितत्यों ही वीरों के शिरोमणि पुष्कल जीवित होकर उठ बैठे और अत्यंत हुवे हर्षित फिर सभी से भेंट कर उन्हें सहर्ष ह्रदय से लगा लिया | 

कटकटात पुनि दन्त रिसायो । सहज सरूप समर भुइँ आयो ॥ 
बजे पुनि घन घोर रन डंका । पचारि चला बयरु सो बंका ॥ 
वह रोष करते हुवे दांत कटकटाने लगे फिर सहज स्वरूप में संग्राम भूमि आए | पुनश्च घनघोर रण डंका बज उठा फिर वह वीर अपने वैरियों को ललकारते हुवे चला 

गयउ कहाँ सो राम बिद्रोही । आजु ताहि हठि मारिहुँ ओही ॥ 
कहँ सर धनु कहँ मोर निषंगा । बोलत  अस फरकिहिं अंगंगा ॥ 
 रामजी के वह विद्रोही कहाँ गए आज मैं उनका निश्चित ही वध कर दूंगा | मेरे धनुष-बाण कहाँ है मेरा निषंग कहाँ है ऐसा कहते पुष्कल के अंग-अंग फड़क उठे | 

तानि कान लग कटु कोदंडा । संधान रसन बान प्रचंडा ॥ 
दरसत ऐसेउ कपिबर ताहि । कहेउ कोमलि आन तिन पाहि ॥ 
रसना में प्रचंड बाण का संधान कर फिर उन्होंने अपने कठिन कोदंड को श्रुतिसाधन तक तन्य किया | उन्हें ऐसा दर्शकर कपिवर उनके निकट आकर कोमलता से बोले : - 

बीर भद्र मारेसि तोहि, तुम जीवन्मृत होहु । 
रघुबर चरन प्रसादु सों पुनि नव जीवन जोहु ॥ 
वीरभद्र ने तुम्हे हताहत किया तुम्हारे जीवन का अंत हो गया था | रघुवर के चरण-प्रसाद से तुम्हें नवजीवन प्राप्त हुवा है | 

शुक्रवार, ११  दिसंबर, २०१५                                                                                 

रामानुजहू मुरुछित होंही । जिअन सजीवन जोहत ओहीं ॥ 
लागेउ सिउ संभु के बाना । पीर परत भए साँसत प्राना ॥ 
रामानुज शत्रुध्न भी मूर्छित  होंगे वह भी जीवन हेतु संजीवनी की प्रतीक्षा कर रहे हैं | शिवशंभु का के बाण के प्रहार से पीड़ित हो उनके प्राण भी साँसत में हैं | 

परेउ होइ हताहत जहँवाँ  । अस कह दोनउ गयऊ तहँवाँ ॥ 
साँसत साँस बहोरत आने । तब हनुमत औषध उर दाने ॥ 
ऐसा कहकर वह दोनों वहां गए जहाँ शत्रुध्न हताहत हुवे भूमि पर धराशायी थे | हनुमत ने उनके ह्रदय पर औषधि का आधान कर उनके अवरुद्ध होती सांस को संयमित कर कहा : -

परेउ मुरुछि कहत रे भाई । मही माहि कादर के नाईं ॥ 
तुम बिक्रमी तुम मह बलबाना । नहि को बीर तुहरे समाना ॥ 
हे भाई ! तुम भीरुओं की भांति भूमि में मूर्छित पड़े हो ? तुम तो पराक्रमी व् महाबलवान हो तुम्हारे समकक्ष कोई वीर नहीं है | 

जो मैं जतनसील जनिकाला । अहउँ बम्हचर के परिपाला ॥ 
त सत्रुहन उठि बैठु छन माही । न तरु ब्रम्ह चरनिहि मैं नाही ॥ 
यदि मै जन्मकाल से  ब्रम्हचर्य सचेष्ट पालनकर्ता हूँ तो शत्रुध्न कहलन में ही स्वस्थ हो जाएं अन्यथा में ब्रम्हचारी नहीं हूँ | 

देइ पलक पट डीठ दुआरे । जिअत सत्रुहन ए  बचन उचारे ॥ 
दृष्टि द्वार पर पलक पट दिए शत्रुध्न जिवंत होकर फिर यह वचन कहने लगे : - 

सिउ कहँ संकर कहँ संभु, गयऊ कहँ रन छाँड़ि । 
 कहत अस रिस दहत नयन लपट बदन पर बाढ़ि ॥ 
शिव कहाँ हैं ? शम्भू कहाँ हैं ? संग्राम त्यागकर वह कहाँ चले गए ऐसा कहते उनके नेत्र क्रोधवश दग्ध हो उठे और उसकी शिखाएं मुखमण्डल पर प्रस्तारित हो चली | 

संग्राम सूर बीर बहुतेरे । पिनाका धारिहि मारि निबेरे ॥ 
महत्मन मह बीर हनुमंता । जतनत सबन्हि किए जीवंता ॥ 
पिनाकधारी भगवान शंकर ने संग्राम में बहुतक शूरवीरों का संहार कर दिया था महात्मा महावीर हनुमान जी  यातना करते हुवे सभी को जीवित कर दिया | 

तब सबहि गाताबरन सोंही  ।  साजत निज निज रथ अबरोहीँ ॥ 
रोष पूरनित हरिदे संगे । करेउ धुनि घन सब रन रंगे ॥ 
तब सभी कवचकुंडल आदि से सुसज्जित होकर  अपने अपने रथों पर आरूढ़ हो गए | और रोष आपूरित ह्रदय से रण हेतु उत्साहित हो घोर गर्जना करने लगे | 

बजे भेरि पुनि धनबन भेदी । चले रिपुपुर चढ़े रन बेदी ॥ 
बीरमनि सुभटन्हि सों घेरे । चले आपहिं अबहिं के फेरे ॥ 
रण भेरी पुनश्च गगन भेदी ध्वनि से निहनादित हो उठी वह सब रण वेदी पर आरोहित हो शत्रु की ओर निर्गत हुवे  | इस बार शूरवीरों से घिरे वीरमणि युद्ध हेतु स्वयं अग्रसर हुवे | 

भिरन जैसेउ सम्मुख होंही । देखि ताहि सत्रुहन अति कोहीं ॥ 
तापर आग्नेस्त्र चलाईं । तासों सकल कटक दवनाईं ॥ 
युद्ध हेतु वह जैसे ही सम्मुख हुवे उन्हें देखकर शत्रुध्न अत्यंत क्रोधित हो गए और उनपर आग्नेयास्त्र का प्रयोग किया इस आक्रमण से समूची सेना दग्ध होने लगी | 

अरि अरि दवारि समतूल दहत धुरोपर छाए । 

लपट चहुँ दिसि चपेटन्हि प्रचंड रूप धराए ॥  
प्रतिपक्ष का प्रत्येक शत्रु दावाग्नि के समतुल्य दाहित कराती वह अग्नि शीर्ष पर व्याप्त होने लगी उसकी शिखाओं ने फिर प्रचंड रूप धारण कर चारों दिशाओं को अपनी चपेट में ले लिया | 

शनिवार, १२ दिसंबर, २०१५                                                                        

देखि महायुध के दहनाई । सीवा रहित  कोप किए राई ॥ 
जरत बदन ज्वाल कन जागे । प्रत्यरथ बरुनास्त्र त्यागे ॥ 
इस महायुद्ध का दहन दर्शकर राजा को असीम कोप किया | कोप में जलाते राजा के मुख से चिंगारियां  विकरित होने लगी प्रतिकार में उन्होंने वरुणास्त्र प्रयोग किया  | 

मरम भेदि प्रहार के ताईं । सीतारत अनीक अकुलाईं ॥ 
कंपत  जब आरत अति गाढ़े । सत्रुहन तापर बायब छाँड़े ॥ 
इस मर्मभेदी प्रहार द्वारा शीत से पीड़ित होकर  सेना व्याकुल हो गई कंपकपाते हुवे जब उनकी पीड़ा बढ़ने लगी तब शत्रुध्न ने उसके निवारण हेतु वायव्यास्त्र छोड़ा | 

चले बेगि बहु बात कराली । बिभंजत घन भई बाताली ॥ 
घोराकार घटा घन काला । धार धार जिमि बदन ब्याला ॥ 
इससे वायु तीव्रतापूर्वक प्रसारित होने लगी और विकराल आंधी का रूप धारण कर उसने मेघ समूहों को विभंजित कर दिया |  काली घनघोर घटाएं घोराकृति वाली थी और धाराओं की मुखाकृति हिंसक जंतु की सी थी 

होइ जोहि बाताल अधीना । चहुँ दिसि छतबत भई बिलीना ॥ 
जोइ सैन रहि सीत दुखारी । बीतत दुःख पुनि होइ  सुखारी ॥ 
जैसे ही वह उस आंधी की वशीभूत हुई वह चीन-भिन्न होकर चारों दिशाओं में विलीन हो गई | जो सेना शीत के प्रकोप से पीड़ित थी अब उनकी पीड़ा विगत हो गई वह पुनश्च सुखानुभूत करने लगी | 

बीर मनि निज अनीक दिखि जब पीर गहाहि  । 
निबारक रिपु संहारक पर्बतास्त्र चलाहि ॥ 
वीर मणि ने जब अपनी सेना को पीड़ित देखा तब उन्होंने उस वायव्यास्त्र के निवारण हेतु शत्रु-संहारक पर्वतास्त्र का प्रयोग किया | 

रविवार, १३ दिसंबर, २०१५                                                                                     

बाताली परिहरै न कोपा । लेइ केतु करि चहुँदिसि रोपा ॥ 
परा समुख परबत गतिरोधा । बिहनए भए पूरन प्रतिसोधा ॥ 
आंधी कोप का त्याग ही नहीं कर रही थी वातकेतु लेकर उसने उसे चारों ओर आरोपित कर दिया | जब सम्मुख पर्वत का गतिरोध उत्पन्न हुवा तब अंत में उसका प्रतिशोध पूर्ण हो गया | 

प्रसर बिनु जब चरन पयाने । त सत्रुहन बज्रास्त्र संधाने ॥ 
मारि चोट अघात किए घोरा । बिनसिहि उपरुध उपल कठोरा ॥
प्रसारण न होने पर उसके चरण पलायन कर गए तो शत्रुध्न ने वज्रास्त्र का संधान किया फिर घोर आघात कर  गंभीर चोट देते हुवे कठोर उपल को घेरकर विनष्ट कर दिया | 

बहोरि सिल पट रहे न कोई । तिल तिल कर सब कन कन होईं । 
रिपुदल बीर बिदारन लागिहि । अंग अंग सुरंग में पागिहि ॥ 
तत्पश्चात उस पर्वत में कोई भी शिलापट न रहा तिल-तिल करके वह सब चूर्ण हो गए  | फिर वह अस्त्र शत्रुदल के वीरों को विदीर्ण करने लगा उनके अंग अंग लाल रक्त में अनुरक्त हो रहे थे | 

रिसत रुधिरु तन सोहहिं ऐसे । सुबरन संग सुभग के जैसे ॥ 
दरसि दिरिस यह बिसमय कारी । देख न हारे देखनहारी ॥ 
 द्रवीभूत होता रुधिर देह पर ऐसे शोभित हो रहा था जैसे स्वर्ण के संग  सुहागा सुशोभित होता है | यह विस्मयकृत दृश्य दर्शकर दर्शकगण एकटक रह गए | 

बहोरि होत रिसान, रहइ न सीवाँ कोप कर । 
ब्रम्हास्त्र संधान बीर मनि कसै कोदंड ॥ 
फिर तो रुष्ट होते वीरमणि के क्रोध की सीमा न रही उन्होंने कोदंड कर्षित कर ब्रह्मास्त्र का संधान किया | 

सोमवार, १४ दिसंबर, २०१५                                                                                


ब्रम्हास्त्र बहु अचरजकारी । जहँ जा लागिहि तहँ रिपु जारीं ॥ 
सोए बीरमनि सन रन रंगा । चढ़ेउ रसना छाँड़ निषंगा ॥ 
यह ब्रह्मास्त्र अत्यंत विस्मयकारी था जहाँ का लक्ष्य करता वहां शत्रु को दग्ध कर देता | वीरमणि शयनित युद्धोत्साह जागृत हो गया वह अस्त्र  निषंग त्याग कर प्रत्यंचा पर आरोहित हो गया | 

तासों छूट चला रिपु ओरा । छुटत  टँकारिहि गुन घन घोरा ॥ 
 तब लग सत्रुहन कर सोहा । तुरत आन आयुध मन मोहा ॥ 
और जैसे ही मुक्त हुवा वह शत्रु की ओर बढ़ चला उसके मुक्त होते ही प्रत्यंचा ने घोर टंकार किया | तब तक शत्रुध्न के हस्त में तत्काल मोहनास्त्र धारित हुवा | 
  बिद्युत गति सम धाए प्रचंडा । बम्हास्त्र छन किए दुइ खंडा ॥ 
राउन्हि उर घन अघात करे । मुरुछित बिकल धरनि खसि परे ॥ 
उसने विद्युत् की सी गति दौड़कर उस प्रचंड ब्रह्मास्त्र के दो खंड कर दिए और राजा के वक्षस्थल पर गहरा आघात किया वह विचलित हो कर  मूर्छित अवस्था में पृथ्वी पर गिर पड़े | 

क्रोध अगन  लोचन न समायो । रोहित रथ सिउ नृप पहि आयो ॥ 
सत्रुहन औचकहि तेहि औसर । चढ़ा प्रत्यंचा  कसे धनु सर ॥ 
लोचन में क्रोधाग्नि समा नहीं रही थी शिवजी रथारूढ़ होकर राजा वीरमणि के निकट आए | उस समय  शत्रुध्न सहसा ही धनुष कर्षकर प्रत्यंचा चढ़ाई | 

आयउ बढ़ि त्रै लोचन आगे । करि गहन रन जुझावन लागे ॥ 
एक पाली रिपुहन एक संकर । भयउ बीच संग्राम भयंकर ॥ 
और त्रिलोचन के सम्मुख बढे चले आए फिर वह उनके साथ युद्ध कर घनघोर  संघर्ष करने लगे | एक पाले में शत्रुध्न तो दूसरे में भगवान शंकर, दोनों के मध्य भयंकर संग्राम होने लगा | 

चलेउ सस्त्रास्त्र बिकट, आयुध बहुंत प्रकार । 
परे चमक चिङ्गारि कन सबहि दिसा उजियार ॥ 
फिर चिंगारियों से चमकते हुवे सभी दिशाएँ उद्दीप्त करते  नाना भांति के आयुध व् विकराल शस्त्रास्त्र प्रक्षेपित होने लगे | 

बुध/बृहस्पति , १६/१७  दिसंबर, २०१५                                                                             

लरत भिरत त्रै लोचनसंगा । भए सत्रुधन्हि सिथिर सब अंगा ॥ 
आकुल हिअ अरु जिअ नहि जोहीं । तब हनुमत उपदेसन सोही ॥ 
त्रिलोचन के संग लड़ते-भिड़ते शत्रुध्न के सभी अंग शिथिल हो गए | व्याकुल ह्रदय और देह प्राण संयोजित नहीं हो रही थी तब हनुमंत के उपदेश से उन्होंने : - 

सुमिरै मन ही मन गोसाईं । आरत नाद कहत रे भाई ॥ 
धरे संभु रन रूप भयंकर । लेहि प्रान हाँ गहे धनुषकर ॥ 
मन ही मन अपने स्वामी श्रीराम चंद्र जी का स्मरण किया व् आर्तनाद से बोले हा नाथ ! हां  शम्भु ने इस संग्राम में भयंकर रूप धारण कर लिया है धनुष ग्रहण किए अवश्य ही वे मेरे प्राण ले लेंगे | 

टीस  देन जिअ लेन उतारू । पाहि पाहि प्रनतारत हारू ॥ 
राम राम जो राम पुकारे । भए भव पारग सो दुखियारे ॥ 
ये पीड़ा देने व् प्राण लेने हेतु उतारू हैं हे शरणागत के पीड़ा को हरण करने ! वाले मेरी रक्षा करो | जो कोई राम राम कहके आपका आह्वान करता है वह दुःखार्त इस भव सिंधु से पारगम्य हो जाते  है | 

कहि गए साधक सिद्ध सुजाना । दीन दयाकर कृपानि धाना ॥ 
मिटे दोष सब मोर हिया के । दुराइहौ दुःख एहु दुखिया के ॥ 
ऐसा साधक सिद्ध व विद्वान कह गए हैं | हे दीनदयाकर ! हे कृपानिधान ! मेरे ह्रदय के दोष समाप्त हो जाएं इस दुखित के दुःख भी दूर कीजिए  सत्रुहन निगदित ए गदन जोहीं । प्रगसिहिं सम्मुख रघुबर तोहीं ॥ 
दरस प्रभो निज पीर बिजोगे । करे अस्तुति सत्रुहन कर जोगे ॥ 
शत्रुध्न ने ज्योंही उक्त उक्ति कही उनके सम्मुख श्रीरामजी प्रकट हो गए | प्रभु को साक्षात दर्शकर वह अपनी पीड़ा विमुक्त हो गए और हस्त आबद्ध कर उनकी स्तुति करने लगे : - 

कुण्डलाय शिरो कुंतलम् । लसितम्  ललित ललाटूलम् ॥
नयनाभिराम नलीन सम । श्रीराम श्याम सुन्दरम् ॥
जिनके शीश पर कुंडलित केश हैं जो उनके सुन्दर ललाट पर  सुशोभित हो रहे हैं | नलीन के समान वह श्रीरामश्याम सुन्दर नेत्रों को प्रिय हैं | 

परम धाम ज्योतिः परो । सर्वार्थ सर्वेश्वरम् ॥

सर्वकाम्योनंत लील:। प्रद्युम्नो जगद्मोहनम् ॥
सर्वोत्तम वैकुण्ठधाम निर्गुण परमात्मा हैं  सूर्यादि को भी प्रकाशित करने वाला जिनका सर्वोत्कृष्ट ज्योर्तिमय स्वरूप है महाबली कामदेव के समान अपने अलौकिक लावण्य  से सम्पूर्ण विश्व को मोहने वाले | 

कंदर्प कोटि लावण्यम । तीर्थ कोटि समाह्वयं ॥

शम्भुकोटि महेश्वराय । कोटीन्दु जगदानन्दम् ॥
करोड़ों कामदेवों के समान मनोहर कांतिवाले, करोड़ों तीर्थों के समान पवित्रनाम वाले, करोड़ों शंकर के समान महा ऐश्वर्य शाली, करोड़ों चंद्रमाओं की भांति जगत को आनन्दित करने वाले | 

सर्वदेवैकदेवता : । जगन्नाथो जगदपिता: ॥

नित्य श्री : श्री निकेतनम् । नित्यवक्ष स्थलस्थ श्रीधरं ॥
समस्त देवताओं के एकमात्र आराध्य देव जगत के स्वामी , सम्पूर्ण जगत के जन्मदाता, नित्य स्थिर रहने वाली भगवती लक्ष्मी की शोभा से युक्त व् लक्ष्मी के ह्रदय में निवास करने वाले, जिनके वक्षस्थल में लक्ष्मी सदा निवास करती है ऐसे भगवान विष्णु | 


हृषिकेशाय हंसो क्षरो । पीयुषोत्पत्ति कारणम् ॥ 

स्मृतसर्वाघविनाशन: । तीर्थमयी जनार्दन: ॥ 
समस्त इन्द्रियों के स्वामी , हंसरूप धारण कर संतों को उपदेश देनेवाले अक्षय परमात्मा, क्षीरसागर से  अमृत की उत्पत्ति के कारणभूत, समस्त पापों के नाशक, तीर्थस्वरूप जनार्दन | 

श्रीरामो भद्र शास्वता । विश्वामित्रप्रियो दांता ॥ 
खरध्वंसी कौशलेयम्   । वेदांतपारात्मनम् ॥ 
शास्वत व् कल्याणमय ईश्वर,  विश्वामित्रजी के प्रिय, जितेन्द्रिय,  हे खर नामक राक्षश का विध्वंश करने वाले कौशल्या पुत्र ! हे वेदान्त से भी अतीत् आत्म स्वरूप् ईश्वर ! 

जामदग्न्य दर्प: दलनम्   । कामद् कोदंड खण्डनम् ॥ 
सत्यवाच्य विक्रमो व्रते । श्रीमान जानकी: पते ॥ 
परशुरामजी के महान अभिमान काचूर्ण करने वाले ! शिवजी के धनुष का विखंडन करने वाले, सत्यवादी, सत्य पराक्रमी, श्रीमान जानकी पति !

दासरथि सद्गुणार्णव: । रविवंश रामो राघव: ॥ 
पित्राज्ञा त्यक्त राज्य : । कंदरार्पितैश्वर्य: ॥ 
अयोध्या के चक्रवर्ती नरेश महाराज दशरथ के प्राणाधिक प्रिय पुत्र, सूर्यवंशी योगीजन के रमन हेतु नित्यानन्दस्वरूप रघुकुल में जन्म ग्रहण करने वाले भगवान श्रीराम !  पिता की आज्ञा से समस्त भू मंडल के साम्राज्य  कात्याग करने वाले 

चित्रकूटाप्त रत्नादृ: । श्यामाङ्ग सुन्दरो शूर: ॥  
पीताम्बरी धनुर्धर: । यथेष्टामोद्यास्त्र:॥ 
चित्रकूट को निवासस्थल में परिणित कर उसे रत्नमय पर्वत की महत्ता प्रदान करने वाले ! श्यामविग्रह वाले परम मनोहर शौर्य संपन्न वीर ! पीतवस्त्र व् धनुर धारण करने वाले, जिनके सभी अस्त्र इच्छाचारी व् अमोद्य हैं 

महासार पुण्योदयो । ब्रह्मण्यो मुनिसोत्तम: ॥ 
देवेंद्रनंदनाक्षिहा ।  मारीचध्न : विराधहा ॥ 
 ब्राम्हण व् मुनियों के सर्वोत्तम पुरुष ! देवराज इंद्र के पुत्र जयंत के नेत्र विक्षिप्त करने वाले, मायामय मृग का रूप धारणकरने वाले मारीच के विध्वंशक व् विराध के का वध करने वाले 

 निर्गुणीश्वरादि देवा । ध्वस्तपाताल दानवा ॥ 
दण्डकारण्यपवित्र  कृते ।   हस्ताचल : हनुमत पते ॥ 
 पातालनिवासी दानवों के विनाशक दंडकारण्य अपने निवास से पवित्र करने वाले, करतल में पर्वत को धारण करने वाले हनुमंत के स्वामी ! 

वालि प्रमथन जनार्दन: ।  सुग्रीवस्थिरोराज्यप्रद:॥ 
जटायुषो ग्नि दातार: । धीरोदत्तगुणोत्तर : ॥ 
बालि का प्रमथन करने वाले जनार्दन ! सुग्रीव को स्थिर राज्य प्रदान करने वाले ! जटायु का दाहसंस्कार कर उन्हें उत्तम गति प्रदान करने वाले  सिंहल द्वीप ध्वंशनम् । सुबद्धे सेतु :सागरम्  ॥  
द्वितीय सौमित्रि लक्ष्मण: । प्रहतेन्द्रजिता राघव : ॥ 
 समुद्र में सुन्दर सेतु आबद्ध कर लंका द्वीप का विध्वंश करने वाले 

विराध दुषण त्रिशरो S रि: । दशग्रीव शिरो हर: हरि: ॥ 
पौलत्स्य वंश कृन्तन: । कुम्भकर्ण च रावणिध्न :॥  
विराध, दूषण व त्रिशिरा नामक दैत्यों के शत्रु दशाशीश के मस्तकों का हनन करने वाले हरि | कुम्भकरण सहित रावण का वध कर विश्व हेतु कंटक स्वरूप पौलत्स्य के वंश को समूल नष्ट करने वाले | 

परं ज्योति: परं धाम । पराकाशो परोत्पर : ॥ 
परेशोपारो पारग: । सर्वभूतात्मक: शिवा ॥  
परम प्रकाशमय साकेतधामस्वरूप, त्रिपाद विभूति में स्थित परमव्योम नामक वैकुण्ठधामरूप, इन्द्रिय मन बुद्धि आदि से परे ईश्वर ! सर्वोत्कृष्ट शासक, सबसे परे, भवसागर से पार लगाने वाले सर्वभूतस्वरूप वह कल्याणमय ईश्वर ! 

जाग दीछित पुुरुख भेष गहे हस्त मृग शृंग । 
कमल नयन चरन सरोज सत्रुहन भयऊ भृंग ॥ 
हस्त में मृगश्रृंग लिए यज्ञ दीक्षित पुरुष का वेश धारण किए जिनके नेत्र कमल व् चरण सरोज के समान हैं स्तुति करते हुवे शत्रुध्न ऐसे भगवान विष्णु के भृंग स्वरूप हो गए 

शनिवार, १९ दिसंबर, २०१५                                                                               

हरैं पीर जो प्रनताजन के  । सत्रुहन सो अभिराम नयनके ॥ 
साखिहि समुख जब दरसन पाए । हरिदे के सब दुख्ख दूराए ॥ 
जो शरणागतों की पीड़ा का हरण करते हैं फिर शत्रुध्न ने अपने सम्मुख नेत्रप्रिय उस विष्णु अवतार भगवान श्रीराम के साक्षात दर्शन किए तब शत्रुध्न का  ह्रदय सभी दुखों से मुक्त हो गया  | 

हनुमंतहु  दरसिहि रघुनाथा । गिरे चरन बहु अचरज साथा ॥ 
ते औसर ऐसो हर्षाईं । तृषावन्त  जिमि जल दरसाईं ॥ 
रघुनाथ ने हनुमंत को दर्शन दिए | भगवान के दर्शन प्राप्तकर हनुमंत साश्चर्य उनके चरणों में गिर गए | उस समय वह ऐसे हर्षित हुवे मानो तृष्णावंत को जल के दर्शन हो गए हों | 

जोइ भगत रच्छन हुँत आईं । पुलकित तिन्ह कहे गोसाईं ॥ 
भगतन के सब बिधि कृत पाला । भगवन हेतु जोग सब काला ॥ 
जो भक्तों की रक्षा हेतु आए थे हुनमान जी ने पुलकित होते हुवे उनसे कहा : - ' स्वामी ! भक्तों का  सभी प्रकार से पालन करना आप भगवन हेतु सभी काल में सर्वथा योग्य है | 

धन्य धन्य हम हे रघुनंदन । एहि औसर भए तुहरे दरसन ॥ 
कृपा सिंधु सों कृपा तिहारी । होहि बिजय कर कटक हमारी ॥ 
हे रघुनन्दन! हम धन्य हुवे ! आज इस अवसर पर हमें आपके दर्शन प्राप्त हुवे | हे करपा के सिंधु ! अब आपकी कृपा से हमारी सेना विजित होगी | 

जोगिन्हि ध्यान गोचर रघुबर आगत जानि । 
सिव संकर होइँ अगुसर गहे चरन जुग पानि ॥ 
उस समय योगियों के ध्यानगोचर भगवान शिवशंकर को भगवान श्रीराम के आगमन सूचना प्राप्त हुई तब अग्रसर होकर उन्होंने  उनके चरणों में करबद्ध प्रणाम अर्पित किया |  

करिहि सुवागत करत प्रनामा । बिनयाबत एहि बचन उचारी ॥ 

हे सरनागत के भय हारी । धनुरु धारि बनचर असुरारी ॥ 
और प्रणाम अर्पण करने के पश्चात उनका स्वागत करते वह विनम्रतापूर्वक बोले : - 'हे शरणागतो का भय हरण करने वाले ! दैत्यों के शत्रु ! हे वनचारी धनुर्धर !

पारब्रम्ह प्रकृति के स्वामी । पुरुष रूप तुम अंतरयामी ॥ 
आपनि अंस कलावतारे। सरजत पालत जग संहारे ॥ 
स्वामी ! एकमात्र आप ही अंतर्यामी पुरुष हैं और प्रकृति से परे परब्रह्मा कहलाते हैं | जो अपनी अंश-कला से  विश्व का सृजन, पालन और संहार करते हैं | 

सरजन काल बिधात सरूपा । पालन काल चतुर भुज रूपा ॥ 

प्रलय काल में सर्ब नाउ धर । मोर रूप में भयो साखि हर ॥ 
सृष्टिकाल में विधाता, पालनकाल में चतृर्भुजस्वरूप व् प्रलयकाल में शर्व नाम से विख्यात साक्षात मेरे अर्थात हर के स्वरूप हैं | 

मैं भगत कृतत उपकारा । बाधत तुहरे काज बिगारा ॥ 

दया सील हे दीन दयालू । छिमा मोर अपराध कृपालू  ॥ 
मैंने अपने भक्त का उपकार करने के लिए आपके कार्य में अवरोध उत्पन्न किया | हे दयाशील दीन दयाल ! हे कृपालु ! मेरे इस अपराध को क्षमा करें | 

साँच करन कहि आपनी मो सों एहि कृत होइ । 
भगवन ता संगत अबरु मोए दोष न कोइ ॥ 
अपने कथन को सत्य सिद्ध करने हेतु मुझसे यह कृत हुवा है भगवन ! इसके अतिरिक्त मेरा और कोई दोष नहीं है | 

सोमवार, २१ दिसंबर, २०१५                                                                            

जानतहुँ प्रभो तोर प्रभाउब । रच्छन भगत इहाँ मैं आउब ॥ 
कहे संभु पुनि नत सिरु संगा । पुरब काल भयऊ ए पसंगा ॥ 
प्रभो ! मुझे आपका प्रभाव ज्ञात है यहाँ में भक्तों की रक्षा हेतु आया हूँ संभु ने विनयित शीश से पुनश्च कहा : - 'पूर्वकाल का यह प्रसंग है  --

एकु समऊ सुनु यहु महराई । छपा नदिहि तट आन  न्हाई ॥ 
उज्जेनि महकाल देवाला ।  कीन्हेसि तप कठिन कराला ॥ 
एक समय इस राजा ने क्षिप्रा नदी के तट पर आकर स्नान किया था, उज्जैन नगर में महाकाल -देवालय में इसने अत्यंत कठोर  तपस्या की थी | 

धरनिहि भर के तपो निधानी । निरख तासु तप अचरज मानीं ॥ 
निरखत तपरत नृप तेहि समउ । मोरेउ मन बहु प्रमुदित भयउ ॥ 
समस्त भूमण्डल के तपो-निधान उनके तप को देखकर विस्,विस्मित रह गए  उस समय तपरत नृप को विलोक मेरा मनमानस अत्यंत हर्षित हो उठा | 

बर दायन मम कर बढ़ि आईं ।  बोलेउ ताहि करत बड़ाई ॥ 
तुहरे तप परिपूरन होईं । मँगो भूप मो सों बर कोई ॥ 
वरदायन हेतु मेरे हस्त अग्रसारित हुवे उसकी प्रशंसा करते मैने कहा : -'  तुम्हारी तपस्या परिपूर्ण हो गई | राजन ! मुझसे कोई वर मांगो |
 
सुरपुर के अखंड  राज मँगे भूप बर माहि । 
तासु कथनानुहार के बढे हस्त बर दाहि ॥ 
तब भूपति ने वर में सुरपुर का अखंड राज्य माँगा | उसके कथनों का अनुशरण करके मेरे अग्रसारित हस्त ने उसे फिर वह वर दान दिया | 

मंगलवार, २२ दिसंबर, २०१५                                                                             

तदनन्तर प्रभु मैं कहि पारें । होए देवपुर राज तिहारे ॥ 
अवधेसु के मेधीअ बाहिहिं ।  जब एहि देउ नगरि पुर आहिहि ॥ 
प्रभु ! उसके पश्चात मैने कह दिया कि देवपुर में तुम्हारा राज्य होगा, तुम्हारे नगर की और  जब  अवध नरेश के मेधीय अश्व  का देवनगरी में आगमन होगा,

तुहरे हितहुत तेहि बसबासा | तबलगि मैंहु रहिहौं निबासा ||| 
एहि भाँति बर दान मैं दायउँ । दिया बचन ता संग बँधायउँ ॥ 
तुम्हारे हितों की रक्षा हेतु तब तक में भी उस स्थान में निवासित रहूंगा | ' इस प्रकार में उसे वरदान दिया और उस वरदान में दिए वचन के साथ मैं विबन्धित हो गया | 

आयउ अजहुँ समउ सो भगवन ।  सुजन सुत सहित सो जागि जवन  ॥ 
नृप तव चरन समर्पन करिहि । बंदत भव सिंधु पार उतरहिं॥ 
भगवन ! वह अवसर आ गया कि अब वह राजा अपने  पुत्र व् बंधू-बांधवों सहित उस याज्ञिक यवन को वह नरेश आपके चरणों में समर्पित करेगा और उन चरणों की वंदना कर भवसिंधु से पारगम्य होगा | 

तब सिव सों बोले रघुराई । देवन्हि धरम भगत भलाई ॥ 
एहि औसर जस रखिहउ राई । भले काज भी तुहरे ताईं ॥ 
तब भगवान रघुवीर शिवजी से बोले : - भक्त का कल्याण करना देवताओं का तो धर्म  ही है, इस समय आपने जैसे अपने भक्त राजन का संरक्षण किया यह आपके द्वारा अति उत्तम कार्य हुवा | 

हर के हरिदय होइँ हरि हरि हरिदै हर होइँ । 
हम दुनहु के बीच परस्पर अंतर भेद न कोइ ॥ 
हर के हृदय में हरि निवासित हैं  हरि के ह्रदय में हर निवासित हैं | हम दोनों के  मध्य कोई पारस्परिक अंतर्भेद नहीं है | 

बुधवार, २३ दिसंबर, २०१५                                                                          

को मूरख मलीन मति जाकी । करें भेद मुख दीठ न वाकी ॥ 
धूप किरन जिमि किरनहि धूपा । दरसित हम तिमि एक सम रूपा ॥ 
कोई मूढ़ जिसकी बुद्धि दूषित   है जिनका मुख है न दृष्टि वही हम दोनों में भेद करते हैं | जिस प्रकार धूप ही किरण व् किरण ही धूप है हमारा स्वरूप भी वैसा ही एकसम है | 

हरि हर बीच भेद मति राखा ।  होंहि तासु लोचन बिनु लाखा ॥ 
अहहीं महादेउ जो तोरे । धर्मी पुरुख भगत सो मोरे ॥ 
हरि हर के मध्य जो भेदबुद्धि रखते हैं उनकी दृष्टि गोचर विहीन है | महादेव ! जो धर्मी पुरुष आपके भक्त हैं वह मेरे भी भक्त हैं | 

जैसेउ मोर चरन जुहारें । परत बिनत सो चरन  तिहारे  ॥ 
कहत शेष हे सुबुध सुजाना । रघुबीर बचनन्हि दे काना ॥ 
वे जैसे मेरी चरणवंदना करते हैं आपके चरणों में उनकी वैसी ही अनुरक्ति है | शेशभगवान कहते हैं : - हे बुद्धिमान ! हे विद्वान !रघुवीर के वचनों को श्रवण कर 

परसादि सों सिउ भगवंता । जिअ हीन जिअ करिहिं जीयन्ता ॥ 
बाण पीरित बीर मनि संगा । भयउ सचेत सकल चतुरंगा ॥ 
फिर भगवान शिव ने स्पर्शादि से जीवनांत प्राण को जीवंत कर दिया बाण पीड़ित राजा वीरमणि सहित समूची सेना चैतन्य हो उठी | 

रथारोहि कि पदचर हो हितू कर हो कि हेत ।  

एहि बिधि भूपत सुत सहित सब जन भयउ सचेत ॥  
वह रथ पर आरोहित हो अथवा पदचर  हो अथवा हितार्थी हो अथवा बंधू-बांधव हों इस प्रकार भूपति व् उनके पुत्र सहित सभी सचेष्ट हो गए | 

 शुक्रवार, २५ दिसंबर, २०१५                                                                      


तदनन्तर हे वात्स्यायन । धन्य धन्य सो सुरपुर राजन ॥ 
जोग नीठ कि तपोबल ताईं । केहि भाँति दुर्लभ गोसाईं ॥ 
तदनन्तर हे वात्स्यायन ! वह राजा धन्य धन्य हुवे स्वामी ! यज्ञनिष्ठा अथवा तपोबलादि अन्य किसी भी विधि से दुर्लभ हैं | 

जोगि जन जिन्ह दरस न पावा । तिन्हनि जगजीवन दरसावा ॥ 
दरस समुख भगवन श्री रामा । कुटुम सहित निप करिहि प्रनामा ॥ 
जो योगीगण को भी दर्शनातीत है वह जगजीवन उन्हें दर्शित हुवे | भगवान श्रीराम को के सम्मुख दर्शन प्राप्तकर नृप ने उन्हें कौटुम्ब सहित प्रणाम किया | 

परिहि पदुम चरनन सब कोई । गहे असीर कृतारथ होईं ॥ 
दुर्लभ मानुष  देहि गही के । भयउ सफल जीवन सबहीं के ॥ 
सभी ने उनके पद्मचरणों को स्पर्श किया और आशीर्वाद ग्रहण कर कृत कृत हो गए | मानव की दुर्लभ देह धारण कर सभी का जीवन सफल हो गया | 

सारद सेष ब्रम्हादि सहिता । भयउ देवन्हि केर पूजिता ॥ 
सत्रुहन हनुमन सरिस सुजाना । करिअहि नित जिनके जस गाना ॥ 
शारदा, शेष व् ब्रह्मादि सहित जो देवों के द्वारा पूजित हैं; शत्रुध्न हनुमान जैसे विदूषक जिनका यशोगान करते हैं | 

तेहि रघुबर चरन सिरु नाईं । अरपिहि अस्व बीर मनि राई ॥ 
उन भगवान रघुवीर के चरणों में नतशीश से फिर वीरमणि ने वह मेधीय अश्व समर्पित कर दिया | 

जानि निज भगत अनुकूल, ससिधर कहि अनुहारि । 
समर्पित सकल राज पुनि जोए पानि पग धारि ॥  
अपने भक्त को अनुकूल संज्ञान कर व् शशिधर भगवान शंकर के कथन का अनुशरण करते हुवे अपना सम्पूर्ण राज्य समर्पित कर हाथ जोड़ते हुवे श्रीराम जी के चरण ग्रहण कर लिए | 

सुनु बिप्रबर बहोरि रघुनाथा । हसित बिहर्षित रिपुदल साथा ॥ 
निज सेवक सों वन्दित होहीं । मंजुल मनिमय रथावरोही ॥ 
हे विप्रवर सुनो ! तत्पश्चात  रघुनाथ ने हर्षित शत्रुदल सहित अपने सेवकों से अभिवन्दित होकर विहास करते हुवे अति सुन्दर मणिमय रथ पर आरूढ़ हुवे और 

होत पीठासीत् भगवाना । छन माहि भए अन्तरध्याना ॥ 
जगवन्दित  रामहि जगजीवन । समझिहु न ताहि मनुज सधारन ॥ 
फिर  उसपर पीठासित होते ही भगवान अंर्तध्यान हो गए | विश्ववन्दित राम ही संसार के जीवनदाता हैं मुने ! आप उन्हें साधारण मनुष्य रूप में संज्ञापित न करना | 

जल में थल में अम्बर तल में । भगवन ब्यापित चलाचल में ॥ 
सबके अंत: करन निवासित । श्रीबर रूप सर्वत्र प्रकासित ॥ 
जल में, स्थल में, गगनतल, चल व् अचल  में वह भगवान ही व्याप्त  हैं वह सबके अंत:कारन में निवास करते हैं और श्री के वर स्वरूप वह सर्वत्र प्रकाशित हैं | 

कहेउ बचन सन पन पुराए । संकर संभुहु चरन बहुराए ॥ 
माँगत बिदा चलन जब लागे । कहत कहत ए ठाढ़ भए आगे ॥ 
अपने कहे वचन सहित अपनी  प्रतिज्ञा पूर्ण कर भगवान शंकर भी लौट चले | विदा माँगते हुवे जब वह प्रस्थान करने लगे तब यह कहते-कहते ठिठक गए : -- 

राजन दुर्गम जगत में दुर्लभ बस्तु न कोइ । 
एकु रघुनंदन के सरन सबते दुर्लभ होइ ॥ 
'राजन ! इस दुर्गम जगत में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है एक रघुनाथ जी का आश्रय ही सबसे दुर्लभ है | 















































  



Friday, 20 November 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४३।। -----

 शुक्रवार, २० नवम्बर, २०१५                                                                  
 झाँक चकत अस रकत प्रकासा । ढाक ढँकत जस फुरिहि पलासा ॥ 
सूल सूल भए फूलहि फूला । सोइ दसा गहि हस्त त्रिसूला ॥ 
चकत्तों से झलकता रक्त इस भांति प्रकाशित हुवा मानो ढाक को उलाँघते पलास पुष्पित हो रहा हो |वीरभद्र फूल-फूल अर्थात घाव-घाव से शूल-शूल अर्थात रक्त-रक्त हो गए | उसी दशा में उसने त्रिशूल हस्तगत किया, 

पुनि पुष्कल जय राम पुकारा । काटि निबार पलक महि पारा ॥ 
बिकट रूप धर गर्जहि ऐसे  । ताड़त तड़ित गहन घन जैसे ॥ 
फिर पुष्कल ने जयराम पुकारा और निमेषमात्र में उसे काटकर निवृत कर दिया और विकराल रूप धारण कर ऐसे गरजने लगा जैसे घनघोर बादलों से बिजली कड़क रही हो | 

निज त्रिसूलन्हि कटत बिलोका । भयउ प्रबल रन रहइ न रोका ॥ 
छतज नयन उर जरइ न थोरे । कोपवंत पुष्कल रथ तोरे ॥ 
अपने त्रिशूल को कटा देखकर वह पुष्कल के विरूद्ध युद्ध में प्रबल हो उठा और फिर वह स्वयं को रोक न पाया रक्तपुरित नेत्रों व् दग्ध ह्रदय से कोपवंत वीरभद्र ने उसके रथ को विभंजित कर दिया |  

रुद्रानुचर के बेग प्रसंगा । भंजेउ रथ भयउ बिनु अंगा ॥ 
गयउ पयादहि रथ परिहारे । बीर भद्रहि कसि मूठि प्रहारे ॥ 
रुद्रानुचर के इस वेग के संगत भंजित रथ से वह अंग (सैन्य) रहित हो गए फिर उस रथ का त्याग कर वह पदचर हो गए  इस अवस्था में ही उन्होने  वीरभद्र पर कर्षित मुष्टिका से बलपूर्वक प्रहार कर दिया | 

बहुरि एकहि एक मुठिका मारएँ  । घात गहत दुहु मानि न हारएँ ॥ 
लरिहि बिजय दुहु करि अभिलासा । चहहिं परस्पर प्रान निकासा ॥ 
अब वह परस्पर मुष्टि प्रहार करने लगे, इस द्वंद से हताहत होते भी उन्होंने हार नहीं मानी | दोनों ही विजय की अभिलाषा में युद्धरत थे और एक दूसरे के प्राण हरण करने पर उतारू थे | 

रयनि बासर निरंतर जुझत रहै एहि भाँति । 
लरत बिरते चारि दिबस, पर नहीं उर साँति ॥  

अहिर्निश युद्ध में लड़ते-भिड़ते संघर्ष करते इस प्रकार चार दिवस व्यतीत हो गए किन्तु उनके ह्रदय शांत नहीं हुवा | 

शनिवार, २१ नवम्बर, २०१५                                                                                 

पंचम दिवस कोप के साथा । बीर भद्रन्हि कंठ गहि हाथा ॥ 
बाहु मरोरत महि महुँ  डारा । चोट गहत  भै पीर अपारा ॥ 
पंचम दिवस  पुष्कल ने अत्यंत क्रोध के साथ वीरभद्र का कंठ और हाथ पकड़कर उसकी भुजाओं को बल देते हुवे उसे भूमि पर गिरा दिया | चोटिल हुवे वीरभद्र को अपार पीड़ा हुई | 

बीर भद्रहु पुष्कल पग धारिहि  । घुर्मावत नभ बारम बारहि ॥ 
भुज उपार पछाड़ महि पारे । मरति बार पुष्कल चित्कारे ॥ 
प्रतिशोध में वीरभद्र ने पुष्कल के चरण पकड़े और उसे वारंवार आकाश में घुर्मित उनकी  भुजाएं उखाड़ दी और उन्हें भूमि पर दे मारा, मृत्यु के समय पुष्कल चीत्कार उठे | 

मुने अस बीर गति गहि पुष्कल । कासि जिन्ह मैं कंचनि कुंडल ॥ 
काट सो सिस गरज घन घोरा । फेरीबार फिरिहि चहुँ ओरा ॥ 
मुनि! इस प्रकार जिसमें हिरण्यमयी कुण्डल जगमगा रहे थे वीरगति प्राप्त पुष्कल के उस मस्तक को काट दिया और घनघोर गर्जना करते हुवे क्रमश: रणभूमि के चारों ओर परिक्रमा करने लगा | 

बहोरि  भय अस रन भूमि ब्यापे । जो देखिहि सो थर थर काँपे ॥ 
कुसल बीर सत्रुहन पहि जाईं । समाचार एहि कहि सिरु नाईं ॥ 
फिर रणभूमि में भय इस भांति व्याप्त हो गया कि जो वीरभद्र को देखता वह थरथर कांपने लगता | कुशलवीरों ने शत्रुध्न के पास जाकर शीश झुकाए  पुष्कल के वीरगति का समाचार कहा | 

पुष्कल केऊ बीर गति बीरभद्रहि कर सोहि । 
सुनेउ अस त सत्रुध्नन्हि करन भरोस न होंहि ॥ 
वीरभद्र के हाथों पुष्कल की वीरगति हुई शत्रुध्न ने जब ऐसा सूना तब उनके कानों को सहसा विश्वास नहीं हुवा | 

रवि/ सोम , २२/ २३  नवम्बर, २०१५                                                                             

रे नयन सुनि सकल बखाना । सत्रुहन मन बहुतहि  दुःख माना ॥ 
कंपत ह्रदय धरा सम डोलिहिं । सोकाभिभूत पलक हिलोलिहि ॥ 
वध का पूर्ण वृत्तांत श्रवण कर उनके नेत्र भर गए उस समय शत्रुध्न मन ही मन अत्यंत दुखित हुवे, उनका कम्पायमान ह्रदय धरणी के समान उद्दोलित हो उठा, शोक के अभिभूत उनकी पलकें हिलोलने लगे | 

उठे ताप  घन पलक जल छाए । बरख घन बिरमन बदन भिजाए ॥ 

सोक मग्न सत्रुहन जब पायो । सिव संकर बहु बिधि समझायो ॥ 
संताप के बादल उठकर जब पलकों पर छाए तो वह घनघोर वर्षा कर मुखमण्डल को देर तक द्रवित करते रहे | शत्रुध्न को जब शोकमग्न देखा तब शिवशंकर ने बहुंत प्रकार से उनका प्रबोधन किया | 

असह जे दुःख न जाइ बिलोका । तथापि रे तुम परिहरु सोका ॥ 

जेहिं समुख मह प्रलयंकारी । पंच दिवस लग किए रन भारी ॥ 
यह दुःख असहनीय है, देखा नहीं जाता तथापि हे वीर तुम शोक न करो | जिनके सम्मुख महाप्रलयंकारी वीर भद्र थे और उनके साथ पांच दिवस तक निरंतर घोर संग्राम करते रहे | 

देइ प्रान रच्छत निज पाला । धन्य धन्य सो बीर निराला ॥ 

जोए दच्छ महत्तम निज जाना । जासों होएसि  मम अपमाना ॥ 
अपने भूपति की रक्षा करते हुवे जिसने अपने प्राण आहूत कर दिए वह निराला वीर धन्य है | जिस दक्ष ने स्वयं को ही महामहिम जाना, जिसके द्वारा मेरा अपमान हुवा | 

तेहि मारि संघारिहि जोई । येहु  बीर भद्र अहहीं सोई ॥ 

एतेउ तुम्ह सोक परिहारौ । हे मह बली उठौ रन कारौ ॥ 
उसका संहार कर जिसने उसकी मृत्यु कारित की यह वीरभद्र वही हैं | इसलिए तुम शोक त्याग दो हे महाबली! उठों और संग्राम करो | 

नयनायन जल रोक  प्रगस रोष पुनि संभु प्रति । 
सत्रुहन परिहर सोक, धरि धनु लोहितानन किए ॥ 
तब रामानुज शत्रुध्न ने नेत्र कोटर में जल रोधित किया और शम्भू के प्रति रोष व्यक्त करते हुवे क्रोधित मुखमण्डल से धनुष उठाया | 

मंगलवार, २४ नवम्बर, २०१५                                                                                   

बहुरि बान संधान धनुरयो । रघुबंसि के पानि महुँ पुरयो ॥ 
ताकि तमक बितान झरि लाईं । दरसिहि धारा सार के नाईं ॥ 
तदनन्तर रघु वंशज ने आवेशपूर्वक लक्ष्य साधा और पाणि में आपूरित बाण संधानित धनुष को विस्तार देकर वृष्टि आरम्भ कर दी | 

उत सर सिव संकर के छाँड़े । बिदार बदन द्युति सम बाड़ें ॥ 
गयउ गगन भै गुत्थमगुत्था । दुहु दलगंजन के सर जुत्था ॥ 
उधर भगवान शिव शंकर के छोड़े विदीर्ण मुख वाले सायक विद्युत् गति के समान आगे बढे | दोनों बलवीरों के बाणसमूह गगनगामी होकर आपस में उलझ गए  | 

काल गहन नभ घनहि समाना  । गर्जत भिरिहि एकहिं एक बाना ॥ 
अवलोकत ऐसेउ घमसाना । सबन्हि जन के मन अनुमाना ॥ 
गगन में काले घने मेघों की भिड़ंत के समरूप वह बाण भी गर्जते हुवे  एक दूसरे से भीड़ गए | इस भांति के घमासान का अवलोकन करते सभी दर्शक गण के चित्त  ने यह अनुमान किया कि 

जहँ लोक संहारन कारी । सम्मोहक प्रलयंकर भारी ॥ 
चेतन हरत सबन्हि मन मोहीं । अवसि प्रलय के आगम होंही ॥ 
लोक-संहारकर्ता सम्मोहक प्रलयंकर अब निश्चित ही सब की चेतना का हरण कर सभी का मन मोह लेंगे निश्चित ही यह प्रलय का आगमनकाल है | 

दुहुरनकार निहार के कहै निहारनहारि । 
एकु अधिराज रामानुज, दूजे त्रय सिक धारि ॥ 
दोनों योद्धा का अवलोकन कर दर्शकगण फिर आगे कहने लगे इनमें एक योद्धा रामानुज हैं और दूसरे त्रिशूल धारी भगवान शंकर हैं,

बुधवार, २५ नवम्बर, २०१५                                                                          
भरिहीं बिजै आस करि  दोई । राम न जाने अब का होई । 
दोनउ बीर बिराम न लेहीं । गहिहीं बिजय कलस कर केहीं ॥ 
दोनों ही विजय की प्रत्यासा से संघर्षरत हैं राम जाने अब क्या होगा दोनों वीर विश्राम नहीं ले रहे,न जाने किसका हाथ विजय कलश ग्रहण करेगा  | 

 राजा सत्रुहन अरु ससि सेखर। करिहिं सतत संग्राम भयंकर ॥ 
दिवस एकादस लग एहि भाँती   । समर भूमि उर परेउ न सांति  ॥ 
राजा शत्रुध्न और शशि शेखर के मध्य ग्यारह दिवस तक  इसी प्रकार निरंतर भयंकर संग्राम में अनुरत रहे  | युद्ध भूमि का ह्रदय शांत ही नहीं हो रहा था | 


दिवस दुआदस संभु बिरुद्धा । तर्जत अति सत्रुहन बहु क्रुद्धा ॥ 
तीख बान तूनीर त्याजे । चढ़ि गुन गगन त गढ़ गढ़ गाजे ॥ 
बाहरवें दिवस शम्भू के प्रति अत्यंत क्रुद्ध होते हुवे शत्रुध्न ने तर्जना की और तूणीर का त्याग कर एक तीक्ष्ण बाण प्रत्यंचा पर आरोहित हो गगनोपर बादलों की सी गर्जना करने लगा | 

चलेउ ब्रम्हायुध बिकराला । चहसि अबोध बधन मह काला ॥ 
रहेउ जिमि मह देउ प्यासे । पयसिहि हँस हँस पयस सकासे ॥ 
उस बाण के वेश में विकराल ब्रह्मास्त्र चला वह अबोध महाकाल के वध हेतु अभिलषित थे | किन्तु महादेव मानो उस बाण की तृष्णा थी उन्होंने विहास करते हुवे जल के समान उसका पान कर लिया | 

तासों सुमित्रा नंदनहि भइ अचरज अति भारि । 
करिए चहिअ अब कृत कवन लगे ए करन बिचारि॥ 
महादेव की इस चेष्टा से सुमित्रानन्दन को अत्यंत आश्चर्य हुवा | वह विचार करने लगे कि अब कौन सा कृत्य करना उचित होगा  |  बृहस्पतिवार, २६ नवम्बर, २०१५                                                                           

एहि बिधि सोच बिचारत रहिहिं । देबाधिदेउ एकु सर लहहिं ॥ 
तासु बदन सिखि कन छतराइहिं । सत्रुहन के उर सदन उतराइहिं ॥ 
इसप्रकार वह सोच -विचार कर ही रहे थे कि उधर देवाधिदेव ने एक बाण लिया उसके मुख से अग्नि की लपटें निकल रही थी और उसे शत्रुध्न के ह्रदय सदन में उतार दिया | 

भयउ बिकलतर बेध्यो हियो । सत्रुहन हतचेत धरनि गिरियो ॥ 
हय कि गज कि रथी कि पदचारी । तेहि अवसर भरे भट भारी ॥ 
उसने ह्रदय के विभेदन कर दिया जिससे शत्रुध्न व्याकुलित हो गए और निश्चेत होकर भूमि पर गिर पड़े | अश्व  हो कि हस्ती हो राठी हो अथवा पदचर ही क्यों न हो उस समय शूरवीरों से भरपूर 

सकल सेना हां हा हँकारी । पाहि पाहि मम पाहि पुकारी ॥ 
हियहि बान मुख पीर बिसेखा । सत्रुहन जब मुरुछित गिरि देखा ॥ 
समूची सेना ही हाहाकार कर त्राहि त्राहि पुकार उठी  | ह्रदय में बाण व् मुख पर पीड़ा लिए शत्रुध्न को मूर्छित अवस्था में भूमि पर गिरा  देख 

हनुमत तुर गति भुज भरि ल्याए । प्रथम तिन्ह स्यंदन पौढ़ाए ॥ 
रच्छन हुँत पुनि राखि रखौते । आप जुझावन होंहि अगौते ॥ 
हनुमंत भुजाओं में भरकर उन्हें द्रुतगति से ले आए और प्रथमतः रथ में बैठाया तत्पश्चात उनकी रक्षा हेतु रक्षकों को नियोजित कर शत्रु से भिड़ंत हेतु स्वयं अग्रसर हुवे | 

सीस ससि सिर गंग गहे भूषित कंठ भुजङ्ग । 
जोगत बाहु बलि हनुमत, कोपत भिरि ता संग ॥ 
जो शीश पर शशि शिखर पर गंगा ग्रहण किए है भुजंग जिनके कंठाभूषण हैं बाहुबली हनुमानजी की प्रतीक्षारत  वह भगवान शिवशंकर कोप करते हुवे फिर उनसे जा भिड़े | 

शुक्रवार, २७ नवम्बर, २०१५                                                                                                  

एकै नाम निज रसन अधारे । राम राम हाँ राम उचारे ॥ 
निज दल बीर के हर्ष बरधाए | खलबलात निज पूँछि हलराए ।  
अपनी रसना पर एक ही नाम का आधार कर हनुमंत जी राम राम उच्चारण करने लगे | अपने पक्ष के दलवीरों का हर्षवर्द्धन करते हुवे क्षुब्ध अवस्था में वह अपनी पूँछ हिलाने लगे | 

समर सरित तट चरन धरायो । बहोरि  तरत रुद्र पहि आयो ॥ 
देबाधिदेब बधन कर इच्छा । ऐसोइ कहत करिहि प्रदिच्छा ॥ 
संग्राम नदी के तट पर पदार्पण कर फिर वह तैरते हुवे से भगवान रूद्र के पास आए | देवाधिदेव के वध की अभिलाषा कर वह ऐसा कहते उनकी प्रदक्षिणा करने लगे : - 

 धरम बिपरीत चरन करिअहहु । राम भगतहि हतन करि चहहु ॥ 
जो रघुबीर चरन अनुरागी ।भै अजहुँ मम दंड के भागी ॥ 
रूद्र !आप रामभक्त का वध को अभिलाषित होकर धर्म विपरीत आचरण कर रहे हो जो रघुवीर के चरणानुरागी हैं ? अब आप मेरे दंड के भागी बनो | 

बेद बिदुर मुनि मुख कहि पारा । सुना ए पुरबल बहुतहि बारा ॥ 
पिनाक धारि रूद्र अस होहू । राम चरन  सुमिरन रत होहू ।। 
पूर्वकाल में मैने वेद विद ऋषियों के मुख से कहे इन वचनों को अनेकों बार श्रवण किया था कि पिनाकधारी रूद्र ऐसे हैं जो सदैव भगवान श्रीराम चंद्र के स्मरण में मग्न रहते हैं | 

मुनि बर  बदन कहे बचन, असत  भयउ हे राम । 
राम भगत सत्रुहन संग करिहहु तुम संग्राम ॥ 
हे ईश्वर ! मुनिश्रेष्ठ के कहे वचन असत्य हो गए ? रामभक्त शत्रुध्न के संगत आप संग्राम हेतु उद्यत हैं  ? 

शनिवार, २८ नवम्बर, २०१५                                                                              

जब ऐसेउ कहा हनुमंता  । कहे ए  निगदन गिरिजा कंता ॥ 
हे कपिबर तुम बीर महाना । तुहरी  कही फुरी मैं माना ॥ 
जब वीर हनुमंत ने ऐसा कहा तब गिरजा कांत ने यह कथोक्ति की कि  हे कपिवर !तुम महान वीर हो तुम्हारे कथन को में सत्य मानता हूँ | 

धन्य धन्य तुम पवन कुमारा । ध्न्य धन्य प्रभु पेम तिहारा ॥ 
राम जासु जस आप बखाना  । तुहरे काज जगत कल्याना ॥ 
हे पवनकुमार! तुम धन्य हो, प्रभु के प्रति तुम्हारा अनुराग भी धन्य है | श्रीरामचन्द्र जिसका व्याख्यान स्वयं करते हैं  तुम्हारे वह कार्य विश्व के कल्याण हेतु हैं | 

अगजग जिन बंदिहि कर जोरे । जथारथ में सोइ पति मोरे ॥ 
भगवान जेहि तुरग परिहाई । बीरमनि तेहि बाँधि लवाईं ॥ 
समूचा संसार हस्तबद्ध होकर जिनकी वंदना करता है वस्तुत: मेरे स्वामी भी वही हैं | भगवान ने जिस अश्व का त्याग किया है उसे वीरमणि ने लाकर बाँध लिया | 

 रिपुदल दवनि जेहि जग भाखे | रघुबर जिन्ह तुरग करि राखे || 
सो सत्रुहन हरनत तिन पावा । रच्छत हय  तापर चढि  आवा ॥ 
जिसे संसार शत्रुदल का दमनकारी कहकर पुकारता है रघुवर ने जिसे अश्व की रक्षा हेतु नियोजित किया है उस शत्रुध्न ने जब उसका हरण होते देखा तब अश्व की रक्षा करते हुवे उसने उसपर आक्रमण कर दिया |  

तासु भगति बस आपनि पायउँ । ताहि रच्छन रन भूमि आयउँ ॥ 
मैने स्वयं को उस वीरमणि की भक्ति के  वशीभूत पाया तब उसकी रक्षा हेतु मैं रणभूमि में उपस्थित हुवा | 

भगवान भगत सरूप है भगत रूप भगवान । 
भगत राख करि चाहिये राखें जेन बिधान ॥ 

क्योंकि भक्त भगवद स्वरूप ही होता है और भगवद भक्त स्वरूप | भगवन को जेन केन प्रकारेण भक्तों की रक्षा करनी चाहिए | 

सोमवार, ३० नवंबर, २०१५                                                                    

सुनत बचन सिउ भगवंता के । भरि रिस सों उर हनुमंता के ॥ 
छोभित एकु सिलिका कर धारे । ताहि तासु बहि महि दै मारे ॥ 
भगवान शंकर के वचनों को श्रवण कर हनुमत का हृदय क्रोध से आपूर्त हो गया | क्षुब्ध अवस्था में उन्होंने एक शिलिका हस्तगत की और उसे लेकर उनके रथ पर प्रक्षेपित कर दिया | 

गहे स्यंदन सील अघाता । भंग होत रन भूमि निपाता ॥ 
कतहुँ त सारथि कतहुँ त चाका । कतहुँ केतु अरु कतहुँ पताका ॥ 
शिला का आघात ग्रहण किए वह रथ भंजित होकर धराशायी हो गया  | कहीं सारथी तो कहीं चक्र कहीं केतु तो कहीं पताका, 

चितबत नंदी पत रथहीना । लरत पयादहि बदन मलीना ॥ 
 उठेउ तुरत अस  निगदत धाए । भगवन मोरे पुठबार पधाएँ ॥ 
अपने स्वामी को रथहीन अवस्था में मलिन मुख से पदचर की भांति संघर्ष करते देख नंदी उठे और ऐसा कहते दौड़े : - 'भगवन आप मेरे पृष्ठ भाग पर पधारें |' 

भूतनाथ नंदी करि बाही ।मारुत सुत  बयरु  बरधाही ॥ 
लोहितानन गाढिहि अतीवा । पारग भयउ कोप के सींवा ॥ 
भूतनाथ ने नंदी को अपना वाहन नियुक्त कर लिया इससे  मारुती नंदन का प्रतिकार और अधिक बढ़ गया और उनका मुखमण्डल क्रोध से और अधिक लाल हो गया | 

लम्ब बाहु बरियात पुनि लिए एक साल उपार। 
घोर पुकार हनेसि  उर किए बहु बेगि प्रहार ॥ 
फिर उन्होंने प्रलंबित बाहु से बलपूर्वक एक साल वृक्ष उखाड़ा और घोर गर्जना कर ह्रदय पर वेगपूर्वक प्रहार करते हुवे शिव जी को हताहत कर दिया | 

मंगलवार, १ दिसंबर, २०१५                                                                            

ज्वाल सरिस तीनि  सिखि षण्डा । गहे संभु अस सूल प्रचंडा 
अग्नाभ तूल तेजस जाका । तेजोमूर्ति सम मुख वाका ॥ 
प्रतिउत्तर में भगवान शम्भू ने अग्निज्वाल के सरिस त्रिशिख समूह से युक्त ऐसा प्रचंड त्रिशूल धारण किया  उसका मुखमण्डल तेजोमूर्ति सूर्य के समान होने से उसका तेज अग्नि की आभा के समतुल था और 

अहो गोल सम सूल बिसेखे ।  आपनि पुर जब आगत देखे ॥ 
हनुमत ताहि बेगि कर धरके । किए भंजित पुनि तिल तिल कर के ॥ 
अहो ! अग्नि गोलक के समरूप इस विशेष त्रिशूल को अपनी ओर आते देखकर हनुमंत जी ने उसे आसुगति से हस्तगत किया और तिल-तिल कर उसका विभंजन कर दिया | 

दिसत दिसत भए खंडहि खंडा । गहे हस्त पुनि सक्ति प्रचंडा ॥ 
बदन कि उदर कि पुठबार कि पुच्छल । सबहि कतहुँ सों अहहीं लोहल ॥ 
देखते ही देखते जब वह बाण खंड-खंड हो गया तब फिर शिव जी ने शक्ति धारण की वह प्रचंड थी मुखमण्डल हो कि उदार हो पृष्ठिका हो अथवा पुच्छ हो वह सभी ओर से लौह द्वारा निर्मित थी || 

लागि सक्ति उर संभु चलाईं । छनभर हनुमत बहु बिकलाईं ॥ 
भयऊ श्रमित कछु मुरुछा भई । छन महुँ अनाइ  छन महूँ गई ॥ 
शिव जी की चलाई शक्ति ने हनुमंत के ह्रदय को भेद दिया, क्षण भर के लिए वह अत्यंत व्याकुल हो गए |  वह कुछ मूर्च्छा आने से वह शैथिल्य से यह मूर्छा क्षणमात्र में आई-गई हो गई | 

बहोरि एकु अति भयंकर बिटपन्हि लिए उपाऱ । 
अहि माली के उर माझ हनेसि घोर पुकार ॥ 
तत्पश्चात एक अति भयंकर विटप उखाड़कर भुजंगहार के मध्य ह्रदय में घोर गर्जना कर प्रहार किया | 

बुधवार, ०२ दिसंबर, २०१५                                                                                 

अहि भूषन  कर कंठ लपेटे । महाबीर के चोट चपेटे  ॥ 
छितरत  इत उत सकल ब्याला । हहर प्रबिसिहि बेगि पाताला ॥ 
हस्त व् कंठ में सर्प को भूषण किए भगवान शिव महावीर की चोट के चपेट में आ गए | इधर-उधर विकिरित हुवे सभी सर्प  भयभीत होते हुवे शीघ्रता से पाताल में प्रवेश कर गए | 

बहुरि मदनारि मुसल चलाईं । करत रखावनि कुसल उपाई ॥ 
महाबली भुज अस बल घारे । बिरथा गयऊ सबहि प्रहारे ॥ 
रक्षा का कुशल उपाय करते फिर मदनारि ने मूसल चलाया किन्तु महाबली हनुमान की भुजाओं ऐसे बल से युक्त थीं कि शिव जी के सभी प्रहार व्यर्थ हो गए | 

तेहि अवसर राम के दासा । कोप अगन कर बदन निवासा । 
उपात् परबत लिए एक हाथा । डारि संभु उर बहु बल साथा ॥ 
उस समय रामसेवक हनुमान के मुखमण्डल पर क्रोधाग्नि का निवास हो गया, उन्होंने के पर्वत उखाड़कर हाथ में लिया और उसे बलापपूर्वक शम्भुजी के हृदय भवन प्रक्षेपित कर दिया | 

सैल धारासार बौझारे । ताकि तमक लक तकि तकि मारे ॥ 
धरिहि उपल खंडल बहु खंभा । पुनि बरखावन लगे अरंभा ॥ 
फिर उनपर शिलाओं के अनवरत बौछार करने लगे और उनके मस्तक का लक्ष्य कर कर के आवेश पूर्ण प्रहार करने लगे | फिर वह बहुतक शिलाखंड व् शैलस्तम्भ की भी वृष्टि करने लगे | 

सागर सरित भयउ उदवृत जिमि भयक्रांत भू कंपिहि । 
खन खन भित भित भिदरित गिरि अस सिरपर जस गिरहि महि ॥ 
प्रमथ मह झोटिंग गन सहित भई भयाकुलित सकल अनी । 
 सत्रुध्नन्हि सैन बाहिनी इत लागिहि बहु भयावनी ॥ 
सागर व् सरिता इस प्रकारउद्वेलित हो गए मानो भयाक्रांत भूकंप आ गया हो | भित्तियाँ, शैलखंड फिर यूं गिरने लगे मानों शीश पर पृथ्वी ही गिर रही हो | प्रमथ, महाजटाधारी शंकर जी  और उनके गण सहित समूची सेना व्याकुल हो गई, इधर शत्रुध्न की सैन्यवाहिनी अत्यंत ही भयावह प्रतीत हो रही थी | 

होइहि उपल प्रपात नंदी बिहबल दरस्यो । 
छन छन खात अघात महदेउ ब्याकुल भयो ॥ 
उपल के इस प्रपात से नंदी अत्यंत विचलित हो गए  इधर क्षण क्षण आघात पड़ने से महादेव भी व्याकुलित हो गए | 

बृहस्पति/शुक्र , ०३/०४  दिसंबर, २०१५                                                                       

देखि संभु महबीर प्रभाऊ । बोले मृदुलित हे कपिराऊ ॥ 
कमल नयन पद केर पुजारी । धन्य धन्य सेबिता तिहारी ॥ 
भगवान शम्भो ने जब महावीर का प्रभाव देखा तब मृदुलता से बोले : -'हे कपिराज ! कमल नयन के श्री चरणों के पुजारी तुम धन्य हो, तुम्हारी हरि सेवा भी धन्य है | 

तुहारे भुज जस बल दरसायो । भगत प्रबर तुम मोहि अघायो ॥ 
तव बल बक्रम कीन्हि बड़ाई । मोर कोस सो सबद न भाई ॥ 
 भक्तप्रवर तुम्हारी भुजाओं ने जैसा बल प्रदर्शित किया उससे तुमने मुझे संतुष्ट कर दिया |  मेरे कोष  में ऐसे शब्द ही नहीं हैं जो तुम्हारे बल विक्रम की प्रशंसा करने में समर्थ हों  | 

दान जाग यत्किंचित तप तैं  । रे भगत हेतु सुलभ नहीं मैं ॥ 
बेगसील हे बीर महाना । एतएव मँगिहु को बरदाना ॥ 
दान, यज्ञ यत्किंचित तप से भक्त हेतु में सुलभ नहीं हूँ | एतएव हे महानवीर ! तुम शीघ्रता कर कोई वरदान मांगो | 

संभु अस कथ कथन जब लागे । हनुमत हँसत तब भय त्यागे ॥ 
पुनि मनमोहि गिरा कर बोले । हे डमरू धर हे बम भोले ॥ 
शम्भू ने ऐसा कथन कह ही रहे थे कि हनुमंत तब भय त्यागकर विहासित हो उठे | फिर मनमोहिनी वाणी से बोले : ' हे डमरूधर! हेबमभोले! 

हे  गिरिजा पति गिरि बंधु अरु किछु  चाह न मोहि । 
रघुबर चरन प्रसाद सों दिए  समदित सब किछु होहि ॥ 
हे गिरिजापति गिरिबंधु ! मुझे कुछ अभिलाषा नहीं है | रघुबर द्वारा चरण प्रसाद स्वरूप  दिए गए उपहारों से मुझे सब कुछ प्राप्य है | 

सियापति रघुनाथ के नाईं । मम रन कौसल तोहि अघाईं ॥ 
एहि हेतु तव कहे अनुहारा । माँगिहि बर यह  दास  तिहारा ॥ 
 मेरे रणकौशल ने सीतापति श्रीरघुनाथ के समान आपको भी संतुष्ट किया | इस हेतु व् आपके कथनों का अनुशरण कर यह दास आपसे यह वर माँगता है कि : - 

रघुबरहि प्रिय भरत तनुज ए पुष्कल । हमरे पाख केरे बीरबल ॥ 
गहे बीर गति बीर भद्रहि कर । लरत भिरत हत परेउ भूपर ॥ 
रघुवर को अत्यंत प्रिय भरत नंदन यह पुष्कल हमारे पक्ष के बलवीर हैं जो वीर भद्र के द्वारा रण संघर्ष में घायल होते हुवे भूमि पर गिरकर वीरगति को प्राप्त हुवे | 

यह रामानुज सत्रुधन होई । मुख मंडल मुरुछ गहि सोई ॥ 
अबरु बहुतक सूर ता संगे ॥ गहे बान तन भयउ निषङ्गे ॥ 
यह श्रीराम के अनुज शत्रुध्न हैं यह भी अपने मुखमण्डल में मूर्छा को आश्रय दिए हुवे हैं | इनके साथ और भी बहुतक शूरवीर हैं बाण ग्रहण किए जिनकी देह  निषंग के समदृश्य हो गई है | 

होवत छतबत गहत प्रहारे । मुरुछा गहिं गिरि महि हारे ॥ 
रखिहु तिन्ह निज गन के साथा । धरिअ रहिहौं सिरोपर हाथा ॥ 
जो आपके प्रहार से हार के क्षत-विक्षत अवस्था में मूर्छित होकर धराशायी हो गए हैं | गणों के साथ आप इनकी रक्षा करें और इनके शीश पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें | 

खँडरन तन प्रभु होए न याके  । सिउ तनिक जतन करें वाके  ॥ 
द्रोन गिरिहि अस औषधि होंही । निरजीउ जिउ जियावत जोंही ॥ 
प्रभु! इनके शरीर खंड-खंड न हो शम्भू  आप इस हेतु उनका किंचित यत्न कीजिएगा | द्रोणगिरि में एक ऐसी औषधि है जो निर्जीव जीव को भी जीवंत कर देती हैं | 

 लेन गिरिहि सो औषधी मोही आयसु दाहु  । 
संभु द्रवित हिय सों कहे हाँ हाँ अवसिहि जाहु ॥ 
अब मुझे उस औषधि को लिए लाने की आज्ञा दीजिए | शम्भू द्रवित ह्रदय से बोले : -' हाँ! हाँ! अवश्य प्रस्थान करो |'

शनिवार, ०५ दिसंबर, २०१५                                                                      
देवधिदेव अनुमति दयऊ । सकल द्वीप उलाँघत गयऊ ॥ 
आए छीर सागर के तीरा । आए अचिर  हनुमत महबीरा ॥ 
देवाधिदेव ने स्वीकृति दी, तब महावीर हनुमान सम्पूर्ण द्वीपों  को उलाँघते हुवे अचिरम क्षीरसागर के तट पर आए | 

 इहाँ सिव संभु निज गन सहिता । पुष्कलादि के भयउ रच्छिता ॥ 
उत पहुंचत गिरि द्रोन महाना । औषध हुँत उद्यत हनुमाना ॥ 
यहाँ शिवजी अपने गणों  के साथ पुष्कालड़ी वीरों के रक्षक हो गए और वहां औषधि हेतु उद्यत हनुमान जी महान द्रोण पर्वत पर पहुंचे | 

हस्त गहत परबत हहराहीँ । राखनहर सुर निरखत ताहीं ॥ 
कहत एहि बत भए कुपित बहुँता । को तुम आइहु इहँ केहि हुँता ॥ 
हथेली पर ग्रहण करते हुवे पर्वत डोलने लगा उसके रक्षक सुर ऐसा निरीक्षण कर यह कहते हुवे अत्यंत कुपित  हुवे कि 'कौन हो तुम ? यहाँ किस हेतु आए हो ?' 

छाँड़ौ सठ अस कस तिन गहिहू । परबत कहँ कत लिए गत चहिहू ॥ 
सुरन्हि केर बचन दए काना । बिनयंनबत बोले हनुमाना ॥ 
दुष्ट ! छोड़ दो इसे,तुमने ऐसे कैसे इसका ग्रहण किया इस पर्वत को क्यों और कहाँ ले जाना को आकांक्षित हो |' सुरों के वचनों को श्रवण कर हनुमान जी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया : - 

बीर मनि के नगरी में होइँ बिकट संग्राम । 
एक पाख अहैं सिउ संभु  दूज पाख श्री राम ॥ 
'वीरमणि की नगरी में विकत संग्राम हो रहा है, एक पक्ष में शिवशम्भु तो दूसरे में भगवान श्रीराम हैं |' 

सोमवार, ०७ दिसंबर, २०१५                                                                 

तब हनुमान घटना क्रम बँधाए । उभय दिसि  की सब कथा सुनाए  ॥ 
जोधत बहु बलबीर हमारे ।  रूद्र कर तैं गयउ संहारे ॥ 
तब हनुमंत ने घटना का क्रमवार विवरण देते उभय पक्षों का युद्ध वृत्तांत सुनाते हुवे कहा : - 'युद्ध में हमारे बहुतक बलवीर रूद्र के द्वार संहारित हो गए | 

तिन्हनि हुँत मैं गिरि लए जैहौं । जीवनोषधिहि देइ जियैहौं ॥ 
जिन्ह के बिक्रम अपरम होईं । प्रदरस् तिन्ह गरब  करि जोईं ॥ 
उनके हेतु ही मैं इस गिरी को ले जाऊंगा और संजीवनी औषषि के द्वारा उनकी पीड़ा का निदान कर उन्हें जीवंत कर दूँगा | 

परबत लिए गत जो अवरोधिहि । सो सठ  मोरे संगत जोधिहि ॥ 

तीन पापिन बहु रन खेलइहौं । एकै पलक जम भवन पठइहौं ॥ 
इस द्रोण पर्वत को ले जाने में जो अवरोध उत्पान करेगा उस दुष्ट को फिर मुझसे संग्राम करना होगा  | उस पापी  की मैं युद्ध में अतिसय दुर्गति करूँगा और निमेष मात्र में उसे यमभवन पहुंचा दूँगा | 

अब औषधिहि चहे गिरि दाहू । अजहूँ जौ मन संक न काहू  ॥ 

लेइ ताहि में अचिरम जैहौं । निर्जीवन जन जीवन दैहौं ॥ 
अब या तो औषधि दे दीजिए या समूचा द्रोण पर्वत ही दे दो |  यदि किसी को शंका न हो तो मैं इसे द्रुतगति से ले जाऊं और निर्जीवन को जीवन प्रदान करूँ ? 

पवन कुमार केर बचन सुनि करि सकल प्रनाम । 
ते औषध कर देइहीं जासु सजीवन नाम ॥ 
पवनकुमार के वचनों को श्रवण कर सभी सुर नतमस्तक हो गए और वह औषधि सौंप दी जिसका नाम संजीवनी था |