Tuesday, 19 June 2012

----- || CHAAR VICHAAR || -----

TEUSDAY, JUNE 19, 2012                                                                         


" योग्यता का परिक्षण योग्य ही कर  सकता है....."
  


" भाषायी योग्यता व संज्ञानित ज्ञान की दिशाएँ
  वरीयता परिक्षण हेतु भिन्न है....."






TEUSDAY, JUNE 26, 2012                                                                          


" सच्चरित्र व्यक्तित्व की सुप्रशंसना, व्यक्ति की सर्वोत्तम निधि है....."


" पर परिदृष्टा के पथानुगमन से स्वयं का लक्ष्य लक्षित होता है,
   स्व लक्षित लक्ष्य से पर परिदृष्टा का पथ प्रशस्त होता है....."


TUE/WED, JULY 3/4, 2012                                                                           


" भारत की स्वतंत्रता के कर्णधार का तन एकल वसन था,
  स्वतन्त्र भारत के कर्णधारों का मन भी निर्वसन है....."


" एक वसन, एक वचन, एक मन में आह्वयन..,
  स्वतन्त्र भू ! स्वतन्त्र भाव !! स्वतन्त्र हो भाव भवन !!!


  रिक्त-रिक्त हविष्य है..,
  देह की है आहुति..,
  ह्रदय का है हवन..,
  स्वतन्त्र भू ! स्वतन्त्र भव !! स्वतन्त्र हो भाव भवन !!!


  निराहार नीर आहार में..,
  सत्य सह संहार में..,
  नरंधि नरमेध नमन..,
  स्वतन्त्र भू !स्वतन्त्र भव !! स्वतन्त्र हो भाव भवन !!!


  रक्त-रक्त का है रण..,
  आह !आह !! आभरण..,
  है शान्ति के ही शरण..,
  स्वतन्त्र भू ! स्वतन्त्र भाव !! स्वतन्त्र हो भाव भवन !!!

  सोम्य सैन्य संकेत है..,
  निकुंज निकट निकेत है..,
  विनत-विनत विनीत नयन..,
  स्वतन्त्र भू ! स्वतन्त्र भव !! स्वतन्त्र हो भाव भवन !!!


  विरतर वीर वीरता..,
  चौचरण चिर चीरता..,
  खड्ग रहित शसन शमन..,
  स्वतन्त्र भू ! स्वतन्त्र भव !! स्वतन्त्र हो भाव भवन !!!.....




" भोग विलास में संलिप्त, क्षेत्र विशेष के शीर्षस्थ व्यक्ति का स्थान;
  श्रम सौव्रत्य व सत्य सौश्रवस हेतु सदैव रिक्त व प्रज्ञप्तित होता है....."

Thursday, 7 June 2012

----- || DAND KA MAAPDAND || -----

" भ्रष्टाचार स्वयंसिद्धापराध है जिस पर दण्डारोपन के परिमाण का प्रारूप इस
  प्रकार से हो की अपराधी न्यूनतम 6 माह व उच्चतम 7 वर्ष के सश्रम या
  साधारण कारावास सहित सदोष अर्जन के अधिग्रहण या 'जब्तीकरण' के
  सह अर्थदण्ड का भागीदार हो.."


   किन्तु  :--
" भ्रष्टाचरण स्वरूप आपराधिक सदोष अर्जन के परिमित ही दण्ड का मापदण्ड हो
  जहां अपराधी के ऐसे सदोष अर्जन का दुरुपयोग स्वयं अथवा अन्य द्वारा ऐसा
  कार्य जो किसी व्यक्ति या किन्ही व्यक्तियों की मृत्यु कारित करने के आशय से
  अथवा ऐसे कार्य का रुपान्तरण राष्ट्र में आतंक कारित करने के षड़यत्र स्वरूप
  यथास्थित ह्त्या या सामूहिक ह्त्या कारित करने का अभिसंधान हो वहां ऐसे
  अपराध के दण्ड का परिमाण वही हो जो ऐसे अपराध हेतु  दंडात्मक परिमेय
  का निर्धारण भा.दं.सं. में है....."



" धन की परिक्रमा पर्यंत व गति शिथिल होती है,
  ज्ञान की परिक्रमा अनंत व गति प्रतन्य होती है....."
                                                     -- सनद रहे


  

Thursday, 31 May 2012

'' BHRASHTAACHAARI PAR DANDAAROPAN''

'' भ्रष्टाचार के अपराध में दंडारोपण किस प्रकार होना चाहिए..??""


" चूँकि आर्थिक भ्रष्टाचार के अपराध का सम्बन्ध सीधे आर्थिक दुराचरण से है अत: प्रथमत:
   भ्रष्टाचार के आरोपी पर दोषपूर्ण अर्जन की परिष्टि उपरांत विधिविरुद्ध एवं अवैधानिक
   संपत्ति का अधिग्रहण अथवा 'जब्तीकरण' की कार्यवाही का अनुकरण होना चाहिए, किन्तु
   जहां दोषपूर्ण अर्जन किसी पद्विशेष के समुन्नयन हेतु या  अन्य सदोष समुन्नयन के हेतुक
   है वहां ऐसे पद्विशेष का समुचित परिक्षणोपरांत पदच्युत अथवा तत्संबंधित कार्यवाही हेतु
   अग्रसर होना चाहिए.."
                                  यदि अपराधी ने सदोष समुन्नयन का प्रयोजन स्वयं अथवा अन्य के
   हेतु किया है तब इसकी क्षतिपूर्ति सह समायोजन अपराधी के वैध अर्जन से होना चाहिए.."
       
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 " जहां प्रकट स्वरूप दोषयुक्त अभिलाभ सुनिश्चित हो,
   वहां निश्चय ही दोषयुक्त हानि होगी.."

" जहां न्यूनतम सदोष अभिलाभ हो..,
  वहां उच्चतम सदोष हानि हो सकती है.."

" जहां उच्चतम सदोष अभिलाभ हो..,
  वहां न्यूनतम सदोष हानि होगी.."

" जहां न्यूनतम अथवा उच्चतम सदोष अभिलाभ हो..,
  वहां न्यूनतम अथवा उच्चतम सदोष हानि होगी.."

  अत: दंडारोपण भी अनुपातिक होना चाहिए.."
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" यदि अपराधी ने सदोष अर्जन का प्रयोजन दोहरे सदोष अर्जन हेतु किया है
  तब ऐसे दोहरे सदोष अभिलाभ का अधिग्रहण अथवा 'जब्तीकरण' होना
  चाहिए किन्तु यदि ऐसे सदोष अर्जन का प्रयोजन के कार्यत: अपराधी को
  कोई हानि हो तब ऐसी हानि की क्षतिपूर्ति उसके वैध अर्जन से समायोजित
 होगी कारण की यह सदोष अर्जन हानिवाहक की संपत्ति थी व प्रयोजन हानि-
 वाहक की अनुज्ञा के रहित था.."
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Wednesday, 30 May 2012

'' Sanvidhaan Sudhaatra Anusandhaan Akaansh ''

'' लोकतंत्र का अर्थ व उद्देश्य;--
  -- वंशवाद का बहिष्करण
  -- जन सामान्य का सर्वोच्च प्रतिनिधित्व 
  -- न्यायिक समानता
  -- सामाजिक समरूपता 
  -- अविच्छिन्न स्वराष्ट्र


'' जाति, धर्म, वर्ण के समुच्चय के उत्थापन से युक्त सम्यक  
  व सुव्यवस्थित न्याय के फलीभूत जनसामान्य का निम्नोच्च 
  प्रतिनिधित्व का सर्वोत्क्रित उद्देश्य एवं समग्रविषयिक स्वराष्ट्र 
  एक निश्चित सीमा में संन्नियन्त्र संविधानिक संस्था का अंगीकरण 
  के कर्मत: अविच्छीन्य राष्ट्र की परिकल्पना ही लोकतंत्ह....."  



'' लोकतंत्र की परिकल्पना की व्युत्पत्ति संभवतया वंशवाद के 
  विरोध के कर्मतस हुई होगी..''
  

'' स्वतन्त्र  न्यायपालिका, कार्यपालिका से दृढ़संधि न करते हुवे
   दाप, दाब, दाय,द्रव्य व दिव्यव्यक्तित्व से प्रभावशुन्य हो सर्वतस-
   सम,निर्विशेष दण्डपाश व न्यायप्रस्तुता के परिरक्ष्य हो संविधान
   को परिदृढ एवं चुस्त व पुष्ट कर सकती है..''


'' पृथ्वी-प्रथम;--
  जनता यदि कतिपय 'लेकिन, किन्तु, परन्तु' के अन्यतम दलरहित
  प्रत्याशी का चुनाव सर्वप्रथम करे तत्पश्चात चयनित प्रत्याशी दल का
  चुनाव करें यथाक्रम दल के सदस्यों की निर्धारित संख्या में चुने गए
  प्रत्याशियों की सहभागिता अर्द्धाधिक हो तदनंतर अर्द्धाधिक चयनित
  प्रत्याशी दल का चुनाव करे जिसके सादृश्य जहां द्वीगुण्य दृष्टांत की
  आकृति समरूप चुनाव प्रणाली अधिक पारदर्शी होगी वहीं 'धन' 'बल'
  का प्रभाव संभवतया न्यूनतम होगा कारण कि 'धन' 'बल' का अधिकाधिक
  दुरुपयोग प्रत्याशी के अन्यतस दल के प्रचार हेतु होता है
                            तथानुक्रम एकात्म दल के प्रभुत्व/वर्चस्व की समाप्ति के
 साथ ही वंशवाद से भी जनता निर्मुक्त होगी; इसका प्रयोग-परिक्षण विधायिका
 चुनाव में किया जा सकता है..''
                     

'' पारदर्शी चुनाव प्रणाली, पारदर्शी व सुदृढ़ संविधान की द्योतक है;
  पारदर्शी संविधान,पारदर्शी व सुदृढ़ लोकतंत्र का सूचक है..''


'' राजतांत्रिक प्रणाली में बलात्सत्तापहरण के निमित्त 'राजा' परस्पर
  'लड़ाई' अथवा 'युद्ध' करते थे,
                        लोकतंत्र में जहां प्रत्याशी सेवाभृत/सेवाधारी स्वरूप
  चयन हेतु स्वयं को जनता के समक्ष प्रस्तुत करता है वहां चुनाव के
  सह 'लड़ाई' अथवा 'लड़ना' जैसे शब्दों का प्रयोग समझ से परे है, स्व-
  तंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय लोकतंत्र में 'दलानुवंश' के अन्तया
  'दलपुत्र' के रुपान्वित विचित्र प्रकार के वंशवाद का प्रादुर्भाव हुवा....."





 









Sunday, 27 May 2012

''Gadhabadhajhaalaa'' Athavaa ''gaddamgol''

भ्रष्टाचार विधि के हननातिक्रमण से उत्पन्न ऐसा अपकर्म 
जो दोषपूर्ण अर्जन का अभ्यक्ष-भक्षण के कृत्य को दूषित 
आचरण के द्वारा आपराधिक दुष्कर्म में प्रवृत कर दे..'


अन्य आर्थिक अनियमितताओं  के अंतर्गत 
'गढ़बढ़झाला' अथवा 'गड्डमगोल' क्या है..


लोक सेवक अथवा लोक सेवक से  भिन्न कोई 'व्यक्ति' जो सेवा नियोगी/गिन हो 
अथवा नियोग विहीन हो, कार्य विशेष के सम्पादन हेतु जहां विनिर्दिष्ट 
चल/अचल सम्पत्ति के योजन प्रबंधन हेतुक नियोजित, नियुक्तिक, निर्वाचित, 
निष्पत्तित हो, वहां ऐसे कार्य विशेष के सम्पादन में स्वयं अथवा अन्य व्यक्ति 
हेतु..


'' सदोषाधिरोप या सदोषाधिरोपण का कृत्य..''



दुर्विनियोजन/दुर्विनियुक्त जो स्वयं के अन्यथा किसी अन्य व्यक्ति को कार्य निष्पादन 
हेतु दोषपूर्ण विनियोजन/विनियुक्ति अथवा सदोषाधिक्रमण का कृत्य..,



दुर्विनियोज्य जहां सम्पत्ति का स्वयं अथवा अन्य 'व्यक्ति' के उपयोग हेतु दोषपूर्ण 
परिवर्तन अथवा ऐसी सम्पत्ति को विनिर्दिष्ट उद्देश्यों के अन्यथा उपयोग का
दोषपूर्ण कृत्य..,


'' दुर्विन्यसन व दुर्विचालन जहां विनिर्दिष्ट सम्पत्ति के कार्य सम्पादन में स्वयं 
  अथवा अन्य 'व्यक्ति' हेतु दोषपूर्ण अर्जन के कर्मत; अन्य की चल/अचल 
  सम्पत्ति पर सदोषाधिचरण व सदोषाध्यासन अथवा सदोष विचालन का कृत्य..,


जहां कार्य विशेष के सम्पादन के उद्देश्य हेतु सम्पत्ति की विक्रय प्रक्रिया में 
निर्धारित दर से अधिगणन/अधिमूल्य/अधिशुल्क का कृत्य अथवा ऐसे दोष-
पूर्ण अर्जन का अधिहरण/अधियाना अथवा विनिर्दिष्ट सम्पत्ति के निर्माण कार्य के 
प्रयोजन वैधरूप से अधियुक्त व्यक्ति के वैध अर्जन का अधिहरण/अधियाने का कृत्य..,


जहां विनिर्दिष्ट सम्पत्ति में स्वयं अथवा अन्य हेतु उद्देश्यविपरीत अधिष्ढान, 
adhishdhaapan, अध्यासन अथवा विधिविरुद्ध अधियोजन में adhishdhit
करने का कृत्य..''



















Sunday, 20 May 2012

प्रश्न है भ्रष्टाचार के क्रियाकार कौन कौन से है..??


 "  भ्रष्टाचार के क्रियाकार 
--'उत्कोच'अथवा 'प्राभृत' 
--'घपला' व 'घोटाला'
--'कर्त्तव्य विमुखता'
--'अन्य आर्थिक अनियमितता'
--'कर अपवंचन' व 'अघोषित आय'.."


"  उत्कोच:--
   लोक सेवक अथवा लोकसेवक से भिन्न कोई व्यक्ति जो सेवा नियोगी (गिन)
   या नियोग विहीन हो स्वयं अथवा अन्य व्यक्ति हेतु अपवंचन के आशय से जहां 
   दोषपूर्ण अर्जन के कार्यत: वैध-अवैध किन्तु दोषपूर्ण कार्याकार्य के विनिमय
   का क्रियाभ्युपगम एवं ऐसा दोषपूर्ण क्रियान्वय का प्रयोग किसी व्यक्ति के पक्ष-
   विपक्ष में व उसके अनुरत-विरत में करता है वहां ऐसे दोषपूर्ण अर्जन के समुन्नयन
   का प्रयोजन व सन्निधान एवं सदोष सन्निवेश का कर्ता, कर्तृत्व, कारयिता,
   उत्कोच अथवा प्राभृत का अपराधी है.."


"  दृष्टांत 1 :--
  'अ' एक लिपिक है 'ब' को इस हेतुक मद्य परोसता है कि वह रु. दस करोड़ 
  मूल्य के पंक्तिपत्र  को कार्य-करण में त्रुटियों को अनदेखा कर उसपर हस्ताक्षर
  कर दे 'अ' एवं 'ब' कार्य-कारण विपर्यन दोष के सह,  उत्कोच के अपराधी है..,\


"  दृष्टांत 2:--
  'अ' एक विशिष्ट व्यक्तित्व का स्वामी व समाज का सम्मानित व धनिक व्यक्ति है 
  'ब' एक लोकसेवक है जो 'अ' के पक्ष में इस हेतुक दोषपूर्ण कार्याकार्य करता है
   कि 'ब' 'अ' के सह सदोष सन्निवेश करता है, 'अ' व 'ब' उत्कोच का अपराधी है.."


" घोटाला:--
  लोक सेवक अथवा भिन्न कोई व्यक्ति, शासकीय अर्धशासकीय अशासकीय,
  निकाय, इकाई, संस्था, संगढन, समिति निगम, केंद्र, न्यास, अर्धन्यास जो
  किसी संपत्ति(चल-अचल) के योजन अथवा प्रबंधन का  स्वामि-सेवक स्वरूप
  निर्वाचित, योजित- नियोजित, नियुक्तिक, निष्पत्तित नियोगी (गिन) अथवा
  नियोग विहीन हो जो स्वयं अथवा अन्य हेतुक 'हड़पकर' 'अपवंचन' के आशय
  से उक्त संपत्ति का कोई अंश अथवा सम्पूर्ण संपत्ति के दोषपूर्ण अर्जन के कार्यत:
  वैध-अवैध किन्तु दोषपूर्ण कार्याकार्य को संविदा सहित-रहित एवं ऐसे दोषपूर्ण
  क्रियान्वयन का प्रयोग किसी व्यक्ति के पक्ष-विपक्ष में व उसके अनुरत-विरत
  में करता है वहां ऐसे दोषपूर्ण अर्जन के समुन्नयन का प्रयोजन व सन्निधान
  एवं सदोष सन्निवेश का कर्ता, कर्तृत्व, कारयिता; घोटाला का अपराधी है.."

" दृष्टांत  :--
 'अ' एकशासन है
 'ब' व्यापारिक संस्था है
 'स' 100 व्यक्तियों का समूह है
  दृश्य 1:-- 'अ' के  पास 100 आम है जिन्हें 'स' में वितरित करना है,
                 'अ' बोली के द्वारा 'ब' को रु. 500.00 लेकर वितरण संविदा करता है कि 'ब'
                  आमों को 'स' में स्वयं के साधन से वितरण करे. अब 'ब' रु.6.00 प्रति आम
                  की दर से 'स' को विक्रय करता है, इधर 'अ' जो की एकशासन है उक्त रु.500.00
                  'स' को दुप्रशासन में रु.100.00 व्यय कर रु. 4.00 प्रति व्यक्ति की दर से उप-
                   लब्ध करवा कर विद्यमान आय में रु. 4.00 की वृद्धि करता है, 'स' का प्रत्येक 
                   व्यक्ति, 4.00 + रू 2.00(स्वयं की विद्यमान आय से) = कुल रु. 6.00 में आम 
                   को सरलता से क्रय कर लेता है..,

 दृश्य 2 :--  'अ' उन्हीं 100 आमों को बोली के द्वारा मात्र रु. 100.00 लेकर 'स' के लिए 'ब'
                   को बोली के द्वारा आमों को स्वयं की साधन से वितरित करने की संविदा 
                   करता है किन्तु आम की वास्तविक मूल्य रु. 500.00 है शेष रु. 400.00 में 
                   से रु. 200.00 का दोषपूर्ण अर्जन  करते हुवे 'ब' से सदोष संविदा का कार्य 
                   करता है. अब 'ब' रु. 5.00 प्रति आम की दर से 'स' को विक्रय करता है, 
                   इधर 'अ' जो की एकशासन है उक्त रु.100.00 'स' को दुप्रशासन में अन्य स्त्रोत से 
                   रु.10 व्यय कर रु.1.00 प्रति व्यक्ति की दर से उपलब्ध करा कर विद्यमान 
                   आय में मात्र रु.1.00 की वृद्धि करता है, 'स' का प्रत्येक व्यक्ति 1.00 + 4.00
                   ( स्वयं की विद्यमान आय से) = कुल रु.5.00 में आम को कढीनता से क्रय 
                   करता है, 'अ' व 'ब' घोटाले के अपराधि हैं.."

निष्कर्ष1 :-- दृश्य 1 में यद्यपि 'स' को आम महँगा मिलेगा किन्तु आय में वृद्धि के फलत:
                  उसे अपनी विद्यमान आय से रु. 2.00 व्यय करना पढ़ेगा.
                  दृश्य 2 में आम रु.1.00 सस्ता है किन्तु 'स' को अपनी विद्यमान आय से रु. 
                  4.00 देने होंगें 
निष्कर्ष2:-- दृश्य 1 में 'ब' को रु.100.00 का वैध लाभार्जन होता है.
                  दृश्य 2 में 'अ' व 'ब' रु.200.00-200.00 का दोषपूर्ण अर्जन करते हैं 
                  'स' को रु. 4.00 प्रति आम की दर से कुल रु.400 की सदोष हानि 
                  होती है साथ में रु.100  अन्य स्त्रोत से सदोष हानि होती है 
                   ( यदि दुप्रशासन से घोटाला न हो तो )..,


" घपला व घोटाला में अंतर करना कढीन है सामान्यत: घपला, घोटाला का लघुरूप है
  चल-अचल संपत्ति का ऐसा दोषपूर्ण अर्जन जो घोटाला की अपेक्षा निर्धारित मूल्य में
  लघुत्तम हो घपला का अपराध होगा.."


 " लोकसेवक अथवा लोकसेवक से भिन्न कोई व्यक्ति या शासकीय अशासकीय अर्धशासकीय
   अधिकारानिक निकाय, इकाई, संस्था, समिति, संगढन, निगम, केंद्र, न्यास, अर्धन्यास  के
   स्वामी अथवा संचालक द्वारा अथवा उसके अधीन नियोजित, निष्पत्तित, नियुक्तिक वैधानिक
   सेवा नियोगी(गिन) हो अथवा नियोग की अवस्था में यदि वह कर्त्तव्य निर्वहन में विधेयाविमर्ष,
   विनीग्रह, निर्मर्याद, निर्मर्यादावधि व दोषपूर्ण कार्याकार्य इस हेतुक की जिसके कार्यत: स्वयं को
   अथवा अन्य व्यक्ति को कपटपूर्ण आशय से ओश्पूर्ण अर्जन का समुन्नयन व सन्निधान का
   कर्ता, कर्तृत्व, कारयिता हो;  कर्तव्य विमुखता का अपराधी होगा.."



" विधेयाविमर्ष:--
  'लोकसेवक' अथवा 'लोकसेवक' से भिन्न कोई 'व्यक्ति' जो कोई भी धर्म, संस्कृति, समाज, राष्ट्र
  उपराष्ट्र एवं तत्संबंधित निर्मित-निर्माणाधीन विधि-विधान का रचनात्मक निरूपण-विरूपण,
  मौखिक-लिखित व दृष्टव्य संकेत स्वरूप प्रधान उद्देश्य को छिपाते हूवे घृणा, द्वेष या उपेक्षा व 
  उत्तेजना-अनुत्तेजना सहित अपमानापकार के कृत्य का कर्ता, कर्तृत्व, कारयिता हो;
  विधेयाविमर्ष का अपराधी होगा..,

 व्याख्या:--
 घृणा, द्वेष या उपेक्षा को उत्तेजित-अनुत्तेजित करने का कृत्य-कर्तृत्व रहित अस्वीकृति, असहमति
 की प्रकट आलोचनाऍ एवं अधीनस्थ 'व्यक्ति' द्वारा विधिपूर्वक तत्संबंधित निर्मित-निर्माणाधीन
 विधि-विधान में परिवर्तन का आशय अपराध नहीं है..,

 दृष्टांत:--
 हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ 'रामायण' व 'महाभारत' से धर्म विचार संकलन में श्री राम की एकल विवाह
 पद्धति को स्वीकृत व श्री कृष्ण की बहुविवाह पद्धति को अस्वीकृत किया गया व श्री राम द्वारा
 स्त्री त्यागाचरण को अस्वीकृत व श्री कृष्ण के स्त्री के प्रति प्रेमाचरण को स्वीकृत किया गया
 वही श्री राम-रावण युद्ध में दुष्ट को दंड व महाभारत युद्ध में परस्पर सौह्रदय्यता को सम्मिलित
 किया गया....."
                                                                                                                                   क्रमश:

 
   
         
                   
             



   
   
   




Friday, 18 May 2012

" Jivaatma Gyaan "

Happy .....:)


" जीवों का विघटन ही सत्य है..,
  जीवों का संघटन ही ब्रम्ह है..,
  जीवों का संवर्द्धन ही विष्णु है..,
  जीवों का घटक(घटन) शिव है.."
  -----सत्यम शिवम् सुन्दरम-----
 " अर्थात जीवनांत सत्य है किन्तु शिव जीवंत है, यही सुन्दर है.."


 " घटक ---> संघटन  ---> संवर्द्धन ---> विघटन ---> घटन.."


" जीव, निर्जीव का संघटक है..,
  निर्जीव, जीव  का विघटक है.."


" जीव यन्त्र  मात्र है,
  आत्मा, जीव  में सत्तत्त्व स्वरूप स्थित है.."


" आत्मा, देह में संघटन स्वरूप है..,
  मृत्यु के पश्चात यह विघटित हो द्रव्य की आकृति ग्रहण करती है..,
        देह = पृथ्वी + अग्नि + जल..,
  आत्मा = वायु + आकाश.."


" धर्मकर्म के गुण आत्मतत्त्व की प्रकृति को निर्धारित करते है..,
  धनकर्म के गण आत्मतत्त्व की दुष्कृति को निर्धारित करते है.."


" पृथ्वी + अग्नि + जल + वायु + आकाश (अर्थात शुन्य ) = देह..,
  पृथ्वी * अग्नि * जल * वायु * आकाश (अर्थात शुन्य ) = शुन्य अर्थात आकाश अर्थात मोक्ष....."