Wednesday, 19 June 2013

----- ॥ उत्तर-काण्ड 2॥ -----

नभो नयन पट घन गहनाई  । रतनारि छटा कन बरखाईं ॥ 
बोइ बिरह बिय मिलन उपजाए । होत कातर रघुबर नियराए ।। 
नभ रूपी नयनों के पटल पर गहरे बादल छा गए । नयन लालिमा जल बरसाने लगी । वियोग के बोय बीजों से संयोग की उपज हुई ॥ कातर होते हुवे प्रभु राजा भरत के और निकट आ गए ॥ 

कथनत भरत कहहुँ रे भाई । बार बार मुख ररन लगाईं ॥ 
ररकत उरस त सागर चाढ़े । नयन अगास निर्झरि झारे ॥ 
यह कहते हुवे कि रे भाई ! तुम कहाँ हो ? उनका मुख वारंवार भरत के नाम को ही पुकार रहा था ॥ तापित ह्रदय रूपी सागर जैसे नयन रूपी नभ में चढ़ गया । उस नभो-नयन से झरना ही फूट पड़ा  ॥ 

भरत नयन प्रभु साखिन लाखे । बृंद बिंदु जल बाँध न राखे ॥ 
प्रभु प्रभु बोलत हहरत छाँती । परे भुँइया दंड के भाँती ॥ 
भारत की आँखों न जब प्रभु को साक्षात देखा । तो वे अश्रु के कण समूहों को बाँध न पाए ॥ प्रभु! प्रभु!! कहकर उन का ह्रदय भवन कम्पन करने लगा । और वह भूमि में दंडवत गिर पड़े ॥ 

भ्रात प्रभु जब दण्डबत दरसे । धरत निलय अतिसय उत्करसे ॥ 
लंबत दुइ भुज तिन्ह उठाईं । करत नेह निज निलय लगाईं ॥ 
जब प्रभु श्रीराम ने भ्राता भारत को दंडवत स्वरुप में देखा तब ह्रदय में अत्यधिक उत्कंठा धारण कर दोनों भुजाएं प्रस्तारित कर उसे उठा लिया और सनेह करते हुवे अपने हृदय से लगा लिया ॥ 

लग भुज सिरु बहु क्रंदन कारें। प्रणमत प्रभु पद कस कै धारे ॥ 
अहुरे अहुरे कह प्रभु धरने ।  बहुरे बहुरे कर गहि चरना ।।  
भुजाओं से लगे राजा भरत फिर क्रंदन करने लगे । प्रणाम अर्पित कर प्रभु के चरणों को कास कर पकड़ लिए ॥ आ रे! आ रे !! कह कर प्रभु उसे वारंवार उठाते । वह वारम्वार प्रभु लौटे ! प्रभु लौटे !! कह राजा भरत चरण पकड़ लेते ॥ 

लाखे जल लोचन, दधि गोरोचन, दुर्बा भइ अलक अली । 
कर चरनन धारे, कलसी थारे, भयउ भजन पुहुप कली ॥ 
अरु अरुनाई  जगमगाई मानहु जुगल जोति जरे । 
कोटिसह प्रनामा, लै प्रभु नामा, भरत पद अर्चन करे ॥   
उसकी आँखों का जल, पयस हो गईं पलकों की अलिक पंक्तियाँ दुर्वा हो गईं कर क्लास थाल होकर हो गईं उन पर प्रभु के चरण धरे । प्रभु का उपास्य नाम पुष्प की कलियाँ हो गईं ॥ और नयनों की अरुणाई एस जगमगाई मानो कोई युगल ज्योति प्रज्वलित हों । फिर राजा भरत ने, प्रभु श्रीराम का नाम लेकर उनकी वंदना करते हुवे, उनके चरणों में करोड़ों प्रकार से प्रणाम अर्पित किया ॥ 

राम अनुरत कहत भरत, दरपह दीनानाथ । 
अहो भाग तव चरन रज, परस लहे मम माथ ॥ 
प्रभु श्रीराम की भक्ति में ही अनुरक्त भारत ने कहा : -- दर्प का हरण करने वाले,दीन-दुखियों की रक्षा करने वाले हे प्रभु ! मेरा यह सौभाग्य है कि आपके चरणों की श्री रेणु का स्पर्श मेरे मस्तक को प्राप्त हुवा ॥ 

बृहस्पतिवार, १२ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                             

मैं खल अति पापाचारी । मम पद धरनिहि ऊपर भारी ॥ 
सौंहृदए निधान किरपा सिंधु । प्रभु छमासील हे दीनबंधु ॥ 
भगवन ! मैं अतिशय दुष्ट एवं पाप का आचरण करने वाला हूँ । मेरे चरण धरती पर बोझ हैं ।। हे सद्भावना के भण्डार सवरूप हे कृपा के सागर, क्षमा शील, दीन-दुख्यो के सहायक प्रभु श्रीराम ! 

नाथ मोहि पर अनुग्रह कारैं । दें असीस निज कर सिरु धारैं ॥ 
अहह सिय कर कोमली पोरें । जान परे जिन पारस कठोरे ॥ 
हे स्वामी ! मुझ पर अनुग्रह करें अपने हाथ मरे शीश पर रखकर मुझे आशीर्वाद दें ॥ आह! जिन्हें माता सीता के कोमल पोरों का स्पर्श भी कठोर जान पड़ता है : - 

कमल चरन सो अह मम कारन । काँकरि पथ चरि बिचरे बन बन ॥ 
अस कहकर धर दीनै भावा । भरत नयन बहु जल बरखावा ॥ 
वह कमल के सादृश्य चरण हाय ! मेरे कारण कंकड़ से युक्त पथ पर वन-वन फिरे ॥ ऐसा कहते हुवे भरतराज  ने  दीनभाव से आँसू बुहाते हुवे : --

प्रभु चरनन भुजांतर धारे । सौतुख तिन कर जोरत ठारे ॥ 

पुनि करुणा सागर श्री रघुबर । लघुत भ्रातन्ह कंठ कलित कर ॥ 
प्रभु श्रीराम के चरणों को आलिङ्गन किया और विह्वल होकर उनके सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हो गए । तदोपरांत करुणा के समुद्र श्रीरघुनाथजी ने अपने छोटे भाई को कंठ लगाकर  : -- 

कुसल छेम जब पूछ बुझाईं । भाव बिहल कछु कह नहिं पाईँ ॥ 

बहुरि सचिव सो प्रभु सिरु नाईँ । भेंटत सब पूछें कुसलाई ॥ 
उसकी कुशल क्षेम पूछी किन्तु भ्राजी उस समय भावों की विभोरता के कारण कुछ कह नहीं पाते ॥ फिर प्रभु वृद्ध सचिवों को प्रणाम किया एवं वहाँ उपस्थित सभी जनों से भेंट कर उनकी कुशलता पूछी ॥ 

सह संगिनी सिया चरन, नए भरत नत सीस । 

मात कमल कर सिरौ धर, देइ बहुसइ असीस ॥ 
तब प्रभु के साथ उनकी अर्द्धांगिनी जगद्जननी सीता के चरणों में  भरत ने नतमस्तक होकर प्रणाम अर्पण किया ॥ 

शुक्रवार, १३ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                      

कहे भरत जनि दरसत कैसे । बिन्ध्यारि बधु लुपामुद्रा जैसे ॥ 
बदन कलस रूप रस कस रिसे । मुनि अत्रि बधु अनुसुइया सरिसे ॥ 
भरतराज कहते हैं : -- माता सीता के दर्शन कैसे प्रतीत होते हैं जैसे कि वह अगस्त्य मुनि कि भार्या लोपामुद्रा का ही स्वरुप हों ॥ उन्की मुखाकृति के कलश से रूप का रस कैसे टपक रहा है जैसे मुनिश्री अत्रि की पतिव्रता पत्नी अनुसूया का रूप बह रहा हो ॥ 

जनक किसोरी दरसन कारे । भरत जगत जनु जनम सुधारे ॥ 
बार बार नत कहत पुकारा । मात मूढ़ यहु तनय तुहारा ॥ 
तथा काल जनक की किसोरी जानकी के दर्शन प्राप्त कर भरतराज का जीवन जैसे सार्थक हो गया । वे वारंवार माता के सम्मुख नतमस्तक होकर कहते जाते हे माता ! आपका यह पुत्र महामूर्ख है ॥ 

भयौ दूषन जोइ मम ताईं । कृपा करनी तिन्ह छम दाईं ॥ 
तुम्ह सरिस पतिबर्ता चारिन । सबहिन्ह केहु मंगलकारिन ॥ 
मेरे द्वारा जो भी अपराध हुवा, हे कृपाकारिणी हे माता ! उन्हें क्षमादान करें, क्योंकि आप जैसी पतिव्रत का आचरण करने वाली स्त्रियां, सबकी शुभाकांक्षी होती हैं ॥ 

जनक सुता पुनि परम सुभागी । निज नागर निरखत अनुरागी ॥ 
छिरकत नेहु पद्म लोचन पल । बूझिन तिन्ह के मंगल कुसल ॥ 
फिर परम सौभाग्यवती जनक नंदिनी ने अपने देवर भरत की ओर अनुराग पूरित दृष्टि से देखते हुवे एवं अपने पद्म सरिस नयन पत्रों से स्नेह बरसाते हुवे उनका कुशलता पूछी ॥ 

पुनि सबहि बर जानारुढ़, गमने सरनि अगास । 
छन प्रभु पितु कोसल पुरी, देखि नयन पथ पास ॥ 
तत पश्चात उस श्रष्ठ यान में आरूढ़ होकर सब-के-सब आकाश पंथ में गमन करने लगे छान भर के पश्चात प्रभि श्रीरघुवर ने अपने पिता की राज धानी अयोध्या पुरी को निकट से देखा ।।  

निज धानी निरख परभू, हरषत अतिहि भए नंदू । 
जगत पितु जँह स्वयंभू,कारें तिनके वंदु ॥ 
अपनी उस धाम को देखकर भगवान अत्यधिक प्रसन्न हुवे । सारे जगत के पिता जिस स्थान पर स्वयं उत्पन्न हुवे वे उसकी वंदना करने लगे ॥ 

शनिवार, १ ४ दिसंबर, २ ०१ ३                                                                                    

उत रमनत सब नागर लोगे । पलक डसाए प्रभु पथ जोगे ॥ 
पुलकित रोमनावली ठारी । प्रभु दरसन लाहन धीर न धारी ॥ 
उधर सभी पुरवासी लोग इधर-उधर फिरते हुवे  पलक पावड़े बिछाए प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे । उनकी रोम पंक्तिया पुलकित हो कर उत्संजित हो उठी एवं पभु के दर्शन की लालसा अधीर हो उठी थी ॥ 

इत भरत सचिव सुमुख बुलायो । जान तर नगरि भीत पठायो ॥ 
कहि एक नागर परब प्रबंधें । अठ गंधक सन पुर पुर गंधे ॥ 
विमान से उतर कर इधर भरतराज अपने सचिव सुमुख को बुलाये । एवं उनहन नगर के भीतर यह कहते हुवे भेजा ॥ एक 'नागरिक-उत्सव' का प्रबंध करें । सभी आपण, नगर द्वार, वसति, गृह, भवन इत्यादि अष्टक गंध ( चन्दन, अगरु,
कर्पूर,तमाल,जल,कुमकुम,कुशीत एवं कुष्ठ दर्व्यों के मिश्रण का सार )से सुगन्धित हों ॥ 

सब मंदिर मुख साज सँजोवें  । डहर डहर सुख सुधिकर होवें ॥ 
चौहट चंदनी द्रव फ़ुहारें । ता पर सुरूप पुहुप प्रस्तारें ॥ 
सभी मंदीर के द्वार का श्रृंगार करें । पंथ पंथ पर शुद्ध हो कर संचरण हेतु सुख कारी होवें । चौंक चौबारों पर चंदनमिश्रित द्रव का छिड़काव कर फिर उसके ऊपर सुन्दर स्वरुप वाले पुष्प का बिछा दिए जाएँ ॥ 

घर घर गोपुर प्रहर पताके । दीपक माणिक मंजरि लाके ॥ 
भीत भीत लिपि करमन कारें । सर्वतोभद्र चक चित्र उकारें ॥ 
घर घर में एवं के मुख्या द्वारों पर ध्वज पताका प्रहरण करते हुवे उसपर माणिक्य दीपकोण की मंजरियाँ लगाएँ ॥ समूची भित्तिकाओं का लेपन करें । जो सर्वतस कल्याण कारी हो ऐसे चित्र उकेरें ॥ 

रुक्मी उजियाला चम्पक माला सुरभित सुख सौगन्धें । 
सुठि रचनाकारी, दुआरि दुआरि बँदनीबार बंधे ॥ 
चौकी पूराऊ मंगल गाऊ पूजन भगवन किए जै । 
दीपक जोतिर् लह रेनुसार सह आरती थारी सजै ॥ 
स्वर्णकी आभा युक्त दीप्ती मन को सुवासित करने वाली सुन्दर गंध युक्त चम्पक मालाएँ सुंदरता पूर्वक रची हुई बंदनवार द्वार द्वार बंधे ॥ चौकोण में अल्पना रचित कर भगवन कि जाए जैकार करते हुवे  मंगल गान करो । दीपक-दीप्ती से युक्त कर्पूर के संयुक्त आरती थाल सजाओं ॥ 

कलस मंगल द्रव्य धरे, तोरन के सुख छाँव । 
प्रभु आगवनु के उछाव, बधाव सहित मनाउ ॥ 
तोरण की सुख छाया के नीचे मंगल पदार्थों से परिपूर्ण कलश रखें । एवं प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के आगमन का उत्सव धूमधाम से मनाएँ ॥ 

रविवार १५ दिसंबर २ ० १ ३                                                                                       

सुनत सुमुख पुनि भरत सुबचना । रचावन बिबिध बिधि के रचना॥  
कोसल नगर अंतर प्रबेसे । प्रभु आवन के लिए संदेसे ।। 
भरत के ऐसे सुन्दर वचनों को सुनकर कौसल नगरी अयोध्या में विविध भांति की रचना रचाने हेतु फिर उनके मित्र एवं सचिव सुमुख ने प्रभु के आगमन का सन्देश लेकर नगर के अंतर में प्रवेश किया ॥ 

सब पुर बासिन हूँत हुँकारा । सब जन बहुसहि पुलक निहारे । 
घोषत प्रभु आवन त्यौहारू  । कहि पुर दुलहिन सम सिंगारू ॥ 
वे सब नगर नागरिक का आह्वान करते हुवे उन्हें पुकारने लगे । सारी परजा पुलकित होकर उन्हें आशा भरी दृष्टि से देखने लगी । उन्होंने प्रभु श्रीराम के आगमन की घोषणा करते हुवे कहा समूची नगरी को नई दुल्हन के जैसे श्रंगारों ॥ 

बिरहन दुःख सन पहलै लोगे । तजे रहीं आपन सुख भोगे ॥ 
राम अजोधा पुरी नियराए । सुनि पुरबासी अतिहि हरसाए ॥ 
प्रभु श्री राम के वियोग-जनित दुःख से नगरवासी पहले ही अपने सुख साधनों का त्याग कर चुके थे ॥ भगवान श्रीराम अयोध्या पुरी के निकट आ गए हैं ऐसे वचन श्रवण कर वे अत्यधिक हर्षित हो उठे अर्थात प्रभु के वियोग का दुःख जाता रहा ॥ 

 प्रभु आवन जब पाए सँदेसे । भरि नउ भूषन नउ नउ भेसे ॥ 
बेद बिदित भूसुर लिए कूसा । पीतम पटतर कटिबर भूसा ॥ 
एवं जब नगर के अंतर में आगमन का सन्देश मिला, तब वे नए नए आभूषण के सह नए नए वस्त्र धारण करने में व्यस्त हो गए ॥ वैदिक ज्ञान से परिपूर्ण  अपने हस्त मुकुल में कुशा लिए कंधे पर पीतम वर्ण का पट उतारते कटि पर श्रेष्ठ विभूषा से सुसज्जित हुवे पवित्र सुधीजन॥ 

जोई बर धू तू संग्राम भू बिजइ बीर नेकनेका । 
धनुर्धर पानि सोई अभियानि, समर प्रबीन प्रबेका ॥ 
धनि  बनियारे बनाउनहारे सुबरन कन कर सँजोहीं । 
हरिजन सोहीं द्विज भगत जोंहीँ धर्म कर्म दृढ़ होहीं ॥  
जिन्होंने संग्राम भूमि में अनेकों श्रेष्ठ से श्रेष्ठ नर सिंगों पर विजय प्राप्त की थी । धनुष बाण धारण करने वाले वे आक्रामक श्रेष्ठ एवं शूरवीर क्षत्रिय ॥ धन-धान्य से समृद्ध सुन्दर रचना रच कर स्वर्ण कण से युक्त होकर वैश्यगण अपनी जातीय आचार में दृढ़तापूर्वक स्थित हरिजन उस समय सुशोभित हो रहे थे ॥ 

अजोधा नगरई नाथ, कहत आहिं रे आहिं । 
भए संजुग सबहिं लोग, चरत कहत गहु पाहिं ॥ 
पधार गए ,पधार गए, अयोध्या नगरी में प्रभु पधार गए ऐसा कहते हुवे सब लोग एकजुट हो गए और कहते चले चलो चरण पड़ें ॥ 

सोमवार, १६ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                    

 सिया राम के तरत नभौकस । अस कर लघु बर पौर पुरौकस ॥ 
नयनन गह हिमबल जल हारे ।  प्रभु सन संगिनि चरन पखारे ॥ 
 प्रभु श्रीराम एवं सीता के पुष्पक विमान से उतरते ही इस प्रकार छोटे, बड़े, वृद्ध, व्यस्क सहित अयोध्या नगरी के सभी नागरिक नयनों में मोतियों के हार ग्रहण किये  प्रभु संग उनकी संगिनी के चरण धोने लगे ॥ 

देत बधावनु गाढ़इँ गाढ़े । पुर बासि उर आनंद बाढ़े ॥ 
त्रै लोक के देवन्ह घेरे । मनियारिहि सुख रचना केरे ॥ 
सभी ने उन्हें अयोध्या पधारने की गाढ़ी गाढ़ी बधाई दी । ( बधाई देते हुवे) पुरवासियों का ह्रदय का आनंद बढ़ता ही जाता ।  तीनों लोको के देवों से घिरे प्रभु के उन्होंने फिर बहुंत सी मनियारी एवं सुखकारी रचनाएं की ॥ 

अंतर द्वार प्रभु पद धारें । गावहिं कहि पधारेँ पधारेँ ॥ 
बिबिध बिधि जन कौतुक कारिं । भए प्रभो अंतर नगर दुआरि ॥ 
हे प्रभु ! अब आप अपने चरण द्वार के अंतर में धरें पुरवासी ऐसे गाकर कहते पधारें पधारें निज नगरी हे राम  पधारें कोसल पूरी पदम पद धारें, पधारें पधारें हे राम पधारें ॥ फिर वे भाँति भाँति की क्रीड़ाएँ करते गए । और प्रभु श्रीराम ने अयोध्या द्वारि के अंतर में प्रवेश किया ॥ 

छाइ किरन कर साँझ सुबरनी । दरसत प्रभु मुख छबि सुख करनी ॥ 
लागे प्रभु मुख लावन कैसे । पुष्कर नभ अलि बल्लभ जैसे ॥ 
किरणें विकरित कर सुवर्णी सांझ की छटा छाई हुई है । और वह प्रभु के मुख पर सुखकारी स्वरुप में प्रतिबिंबित हो रही है ॥ प्रभु के मुख की शोभा कैसी प्रतीत हो रही है, जैसे कि वह लाल कमल के सदृश्य भगवान विष्णु ही हों ॥ 

नयन पलक पट पालकी, जन जन भयउ कहार । 
तापर राम सिया सहित, चरत चौंक चौबार ॥ 
नयनों के पलकों का पट पालकी बना है सारी प्रजा कहार बनी हुई है। उसपर भगवान श्रीराम माता सीता सहित विराज कर चौंक चौहट्टे से चले जा रहे हैं ॥ 

मंगलवार, १७  दिसंबर, २ ० १ ३                                                                               

तेहि काल प्रभु आप सहाई । रहे घिरे पुर परिजन ताईं ॥ 
धू कल कंठ कूनिका वादे । पनवानक अरु भेरि निनादे ॥ 
उस समय प्रभु अपने सहायकों,पुरवासियों एवं पैजानों से घिरे थे । मधुर ध्वनी करते हुवे वीणाएँ बज रहीं थी पणव अर्थात नगाड़े एवं  भेरियां निनाद कर रहे थे॥ 

बाजहिं बाजे बिबिध बिधाने । सुर गाँव प्रभु करत आगाने ॥ 

सूत मगध अरु बंदी जन । अस्तुति कारत रागिन रंजन ॥ 
और भी विभिन्न प्रकार के वाद्य-यन्त्र मुखरित थे । सप्तस्वर प्रभु का आख्यान कर रहे थे ॥ सूत ,मागध एवं वंदीजन उनकी रागनियों में अनुरक्त होकर प्रभु की स्तुति कर रहे थे ॥ 

 नागर कहत करत अभिनन्दन । जय जय जय जय रबि कुल भूषन ॥ 
जयति जयदेव दसरथ नंदन । जगन्नाथ हे जगतीबंदन ॥ 
नागरिकजन हे जगन्नाथ हे जगत वन्दनीय  आपकी जय हो! हे सूर्य -कुलभूषण दशरथ नंदन हे देव ! आपकी जय हो यह कहते उनका अभिनन्दन कर रहे थे ॥ 

भयउ नन्द पुरजन एहि भाँती । परे कन प्रभो के ही बाती ॥ 

जस जस भगवन आगिन बाढ़े । तिनके दरसन जन अवली ठाढ़ें ॥ 
इस प्रकार उस आनन्दोत्सव  में हर्षित हो उठे ( चारों ओर )  कानों में प्रभु श्रीराम की ही व्याख्यान सुनाई दे रहा
था। भगवान जैस जैसे आगे बढ़ते, जनसमुदाय उनके दर्शन प्राप्त करने हेतु पंक्तियों में खड़े रहते ॥ 

कछु तिय लोकत टेक लिए, सन गृहनयन अलिंद । 
मनोहारईं निहारइँ, लइ मधु मुखारविंद ॥   
कुछ स्त्रियां भवन के झरोखों से लगे छज्जों पर टेक लगाए प्रभु की मनोहरता को निहारते उअनके कमल मुख के दर्शन का माधुर्य प्राप्त कर रहीं थीं ॥ 

बुधवार, १७ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                 

बपुरमन लवन ललिताई लखि । कहत मनोहर रे स्याम सखि ॥ 
लवनिमन नयन अरुनाई लखि । बरखत रस करुन अविराम सखि ॥ 
पुष्ट देह वाले प्रभु की शोभा एवं सुंदरता को देखकर उन सखियों ने कहा यह श्याम छवि मन को हरने वाली है ॥ 
लावण्ययुक्त लोचन की अरुणाई के दर्शन कर कहा इससे तो निरंतर करुणा का रस वर्ष रहा है ॥ 

रद पट छादन ललनाई लखि । कहत अलि बल्लभ पतश्राम सखि ॥ 
नीलिमन बदन लवनाई लखि । लाहत प्रभु छटा अभिराम सखि ॥ 
जब होठों की लालिमा दर्श कर कहा  यह लाल कमल की पत्तियों का ही मंडप हो ॥ निलिमायुक्त मुखाकृति के दर्शन कर कहा मुख कांति की यह झलक बड़ी ही मन मोहक लग रही है ॥ 

सिरु मुकुट जटा बनताई लखि । मुख मंदिरो मूरति राम सखि ॥ 
धवल कर्पूरि बरनाई लखि । कहत सुसोभित सिया बाम सखि ॥ 
शीर्षोपर जटा मुकुट की रचना से मानो मुख शीश क मंदिर हो गया है और उसमें प्रभु श्रीराम की मूरत रखी हो ॥ जब उज्जवल, कर्पूरी वर्ण वाली के दर्शन कर कहा बाइन ओर उनकी संगिनी माता सीता सुशोभित हो रही हैं ॥ 

अलकावलि पल झुकियाई लखि । कहि करत पिया बिश्राम सखि ॥ 
बसन भूसना भरनाई लखि । कहत पूरनित मनोकाम सखि ॥ 
पलकों की अवनत अलकावली को देखकर कहा रे सखि यहाँ उनके प्रियतम विश्राम कर रहें हैं ॥ वस्त्र आभूषण के सुसज्जा को देखकर कहा हे सखि यह प्रभु तो पूर्णकामी हैं ॥ 

जन जन पद नत परनाई लखि । कहि सत्य प्रभु के एक नाम सखि ॥ 
रागिन रंजन लयनाई लखि । करत सों कीरत सुर ग्राम सखि ॥ 
प्रजाजन को उनके चरणों में नतमस्तक होते देखकर कहा प्रभू का नाम ही सत्य है शेष सम्पूर्ण जगत असत्य है ॥ रागिनों एवं वाद्ययंत्रों को परस्पर निमग्नता होते देखकर कहा रे सखि ये सप्तस्वर की संगती में प्रभु का कीर्तन कर रहे हैं ॥ 

जोइ दृग जानकी जानि, नीलाम्बुज के समान । 
सोइ दरस रस पानि, बन कन्या भइ धन्य सखि ॥ 
जिन्होंने अपने आँखों से जानकी पति प्रभु श्रीराम के नीले अम्बुज के सरिस मुख के दर्शन का मकरंद पान किया सखी वे वन कन्याएं धन्य हो गईं ॥ 

प्रभु पग कर अनुराग, पावत अभ्युदय महान । 
तेहि आपन सुभाग, को सन जाए न बरनि सखि ॥   
क्योंकि उनहोंने प्रभु के पद्म चरण मन अनुराग करके अपने सौभग्य से  जिस प्रकार अपना उद्धरण किया हे सखी !वह वर्णनातीत है ॥ 

गुरूवार, १९ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                             

सारस कंठी इत उत डोली । बट चौहट तट तनि तिय बोली ॥ 
दरसो री रबि कुल रघुनाथा । दरसो री तेजस मुख माथा ॥ 
कुछ स्त्रियाँ मार्ग के ऊपर कुछ चौपथ के तट पर सारस के सादृश्य कंठ लिए इधर-उधर हिंडोल ले रही थी । और कह रही थीं : -- अरी सूर्य-कुल के दीपक रघुनाथ के तेजस्वी मुख के दर्शन कर लो ॥ 

पदमिनि पत परमा लजनाईं । सोहित अस लोचन ललिताई ॥ 
जोइ दरसइँ निज धन्य मानै । देवनहू जो दरस न दानै ॥ 
जो पद्मिनि के पत्रों कि सुंदरता को लज्जित कर दें उनके लोचनों का सौन्दर्य ऐसे शोभित हो रहा है । जो इनके दर्शन काले वह सौभाग्यशाली है । क्योंकि प्रभु अपने ऐसे दर्शन देवताओं को भी नहीं देते ॥ 

सो परभू अज हमरे सोहीं । हे री हम बड़ भागिन होंही ॥ 
अधर कपोल फिरि बहुरि कैसे । पुहुप नउ पल्लब प्रफुरि जैसे ॥ 
वह प्रभु आज इस रूप में हमारे सम्मुख हैं । अरी हम बहुंत भाग्यवती हैं । उनके अधर को देखो कैसे कपोलों का भ्रमण कर वापस कैसे लौटते हैं जैसे कोई पुष्प के नव पल्लव प्रफुलित हो रहे हों ॥ 

ललामिन बंधूक अरुनाई । भयउ अति गहनत तिन्ह लजनाई ॥ 
केस किरीट कलित कल कुंडल । रोम करन सैम केसर कोमल ॥ 
इनकी लालिमा अत्यधिक गहरी होते हुवे तो बंधूक-पुष्प कि अरुण-प्रभा  को भी तिरस्कृत कर रहीं है ॥ मस्तक पर जटा मुकुट कुंडलित होकर सुरुचि पूर्वक विभूषित है और इसके रोम खरगोश क रोमावली कि भांति अतिशय कोमल हैं ॥ 

प्रभु दरसन जस छटा छन, जन जस घन गुँजनाइ । 
छन मैं जिनके ओट लिए, छन भर मैं प्रगसाइ ॥ 
प्रभु के दर्शन ऐसे हैं जैसे प्रजाजन के श्री राम की जयजयकार के गुंजार के मध्य अचिर-प्रभा हो । जो क्षण में उनके ओट हो जाती है,एवं क्षण भर में प्रगट हो जाती है ॥ 

शुक्र/शनि,२०/२१ दिसम्बर, २ ० १ ३                                                                                         

प्रभु रागिन कारन एहि भाँती । पुर रमनी कहत जेइ बाती ॥ 
बढ़े पेम जिनके प्रभु ताईं । तिन जन दरसन देवत जाईं ॥ 
इस प्रकार प्रभु अनुराग के कारण अवधपुर की रमणियाँ उपरोक्त वार्तालाप करती ( प्रभु के दर्शन से निहाल हो गईं ) ॥ तदनन्तर प्रभु के प्रति जिनका प्रेम बढ़ा हुवा था । उन पुरवासियों को अपने दर्शन देकर उन्हें संतुष्ट करते जाते ॥ 

दुहूँ हाथ मुद मोदक गाहे ।  एक लछिमन एक रघुबर आहे ॥ 
बहुरि पलकन पालकि धारे । जय हो जय कह चरे कहारे ॥ 
दोनों हाथों में मोदक ग्रहण किये  एक में लक्षमण एक में प्रभु श्रीराम को फिर पलकों की पालकी में धारण किये कहार स्वरुप पुरजन जय हो ! प्रभु की जय हो !! यह कहते चले ॥  

प्रभु रखबारे पालनहारे । मातृ भवन पुनि गवन विचारे ॥ 
पहिलै निज जननी कैकइ के । भवन गवन पद परने लइके ॥ 
जगत के रखवाले एवं उसका पालन पोषण करने वाले प्रभु श्रीराम ने माता के भवनों में जाने का विचार किया ॥ सर्प्रथम वे अपनी माता कैकेयी के घर में गए । भवन जाकर सीता सहित सभी संतानों ने उनके चरणों की वंदना की ॥ 

कहत हे राम मात लजानी । लोचन लवन भर लाइ पानी ॥ 
चिंतन गहने बारहि बारे । दै बहु असीस कर सिरु धारे ॥ 
तब माता कैकेई हे राम ! कह कर लज्जित हो उठी और अपने सुन्दर दृगों में अश्रु भर लाईं ॥ और संततियों की वारंवार चिंता करते हुवे उनके सिर पर हाथ रखे उन्हें बहुत ही आशीष प्रदान किया ॥ 

रबिकुल ध्वजा प्रहरनहारे  । प्रभु मात जब लाजत निहारे ॥ 
कह बहु बिनइत जोगित बचना । बोधत किए उर सुखचर रचना ॥ 
सूर्य-वंश का पताका प्रहरण करने वाले श्रीराम ने जब माता को लज्जित होते देखा । तब बहुंत से विनययुक्त वचन कहते हुवे उन्हें सांत्वना देते हुवे ह्रदय में शांति की रचना की ॥ 

नयनन घन रस कंठ कर रुखित । कहि रे बच्छर तुम निह कलुखित ॥ 
तब माता ने नयनों में शरू भरकर तथा कंठ शुष्क कर कहा हे वत्स ! तुम निष्कलंक हो अर्थात कलंकिनी तो मैं हूँ ॥ 

औरु कही अजहूँ सेष, जननी भवन दुआरु । 
तुम दुहु भ्रात अचिरम गत , तिनके चरन जुहारु ॥  
और बोली अब तुम दोनों भाई यथाशीघ्र शेष सभी माताओं के भवन द्वार पर जाओ और उनके चरणों में प्रणाम अर्पित करो ॥ 

आदर अतिसय ह्रदय समेटे । दुहु भ्रात मात सुमित्रा भेंटे ॥ 
प्रभु नत जब किए चरन प्रनावा । जननी बहुसहि असीस दावा ॥ 
फिर ह्रदय में अत्यधिक सम्मान संकलित किये दोनों भ्राता ने माता सुमित्रा से भेंट की । प्रभु ने जब  को प्रणाम किया तब माता ने उन्हें बहुंत सा आशीर्वाद दिया ॥ 

कहि प्रभो तुम धन्य हो माई । जो लछमन सरि रतनन जाई ॥ 
एहि लोक मैं हे रतन गरभा । भय तुहारी अलोकिक परभा ॥ 
प्रभु बोले हे माता तुम धन्य हो । जो तुमने लक्ष्मण के जैसे रत्न को जन्म दिया ॥ हे रत्नगर्भा ! इस लोक में तुम्हारी प्रभा आलोकमयी है ॥ 

जेहि भाँति एहि सूरिन भाई । किए सुश्रुता मम दुःख निबराईं ॥ 
ऐसो कारज कोउ ना कियो । जब खल रावन सिया हर लियो ॥ 
जिस प्रकार इस प्रबुद्ध भ्राता ने ( वैन में ) मेरे दुखों को हरते हुवे मेरी सेवा सुश्रुता की । इस प्रकार का कार्य तो किसी से भी न हुवा । जब दुष्ट रावण ने सीता का हरण कर लिया था : --

तासु पर मैं पुनि तिन्ह पायो । लछमन के कर करम सहायो ॥ 
अस कँह प्रभु कौसल्या धूरे । सुमित्रा चरन प्रनमत बहूरे ॥ 
उसके पश्चात मैने उसे लक्ष्मण के हाथो किये गए कार्यों के कारण ही उसे प्राप्त किया ॥ इस प्रकार प्रभु माता सुमित्रा के चरणों में प्रणाम अर्पित कर माता कौशल्या के पास गए ॥ 

दरसत निज जनि दरस उछाहू । अम्बु अम्बर प्रलंबित बाहू ॥ 
पैठ निकट बन कण्ठन हारे । पुनि नत तिनके प्रभु पग धारे ॥ 
अपने दर्शन हेतु माता को बारिज नयन प्रलंबित बाहु स्वरुप में उत्कंठित देखकर प्रभु निकट पहुंचे और उनके गले का हार बन गए फिर उनहोंने झुककर माता के चरणों को पकड़ लिया ॥ 

कौसल्या भई बिहबल, दर्सत छबिमुख ठोट । 
बारहि बार प्रभु कंठ लहि, किए अचरा के ओट ॥ 
पुत्र का मुख देखकर माता कौसल्या विह्वल हो उठी आँचल का ओट किये वे वारंवार उसे कंठ से लगाती ॥ 

मंगलवार, २४ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                     

देखत देखत भई अधीरा । मुदित उदित भए अलक सरीरा ॥ 
मम बछ कह भइ गदगद बानी । धुरे चरण सन लोचन पानी ॥ 
देखते ही देखते माता अधीर हो गईं । हर्ष के कारण उअनके शारीर के रोम रोम उदीयमान हो उठा ॥ मेरे वत्स कह कर उनकी वाणी गदगद हो उठी । नेत्रों से अश्रु प्रवाहित होकर उनके चरणों को भिगोने लगे ॥ 

देख जननी के मोह माया । बिरहन कारन भइ कृष काया ॥ 
भयो नन्द जनि पेखत मोही । अस कहतै प्रभु सन मह रोहीं ॥ 
जननी कि मोह-ममता और विरह के कारण उनकी दुर्बल काया को देखकर । देखो मुझे देखते ही जननी को कैसा हर्ष हुवा है ऐसा कहते ही प्रभु श्रीराम भी उनके संग रुआंसे हो गए ॥ 

किए तुहरे चरन सेउकाई । बहुस दिवस भए हे मम जाई । 
हे जननी मैं बहुस अभागा । रहेउँ दुरान तुहरे रागा ॥ 
हे मेरी जन्मदात्री तुम्हारे चरणों की सेवा किए मुझे बहुंत दिन हो गए । हे माता ! मैं तो बड़ा ही भाग्यहीन हूँ जो तुम्हारे अनुराग से मैं दूर ही रहा ॥ 

एहि मम दूषन कौ छम दाहीं । पालक सेवक जो पुत नाहीं ॥ 
अरु तिन्हन दिए पीर बिजोगे । सोइ नाहि पुत पद के जोगे ।। 
तुम मेरे इस दोष को क्षमा कर दो । जो पुत्र पालक की सेवा नहीं करते । और उन्हें विरह की पीड़ा देते हैं वे पुत्र पद के योग्य नहीं होते ॥ 

रबिकुल रघुबर अस कहत, अरु जल जात बहात । 
आयउँ मैं अब सिय सहित, चरन सरन तव मात ॥ 
ऐसा कहते सूर्य-कुल तिलक रघुपति श्रीराम के कमल जैसे नयन बहने लगे, कि हे माता अब मैं सीता सहित तुम्हारे चरणों की शरण में आया हूँ ॥ 

बुधवार, २५ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                         

श्रुत श्री राम चंदु के बाता । चरनन गहि कौसल्या माता ॥ 
बिधु बदन बधु सिय उर लाईं । देवत असीस अस बदनाई ॥ 
श्री राम चन्द्र जी के वचन श्रवण कर कौसल्या माता ने चरणों को ग्रहण की अपनी चन्द्रवदनी यामिनी  श्रीसीता को फिर ह्रदय से लगा लगाकर आशीर्वाद देते हुवे कहा  : -- 

अध अंगिनी राम हे रमनी । रहहु सदा बन तासु संगिनी ॥ 
निर्मल चरिता पबित सुभाऊ । दुध अन्हाऊ जात जनाऊ ॥ 
राम की अर्धांगिनी हे सुन्दरी सीते ! तुम चिरकाल तक अपने पति की जीवन-संगिनी बनी रहो ॥ हे निर्मल चरिता हे पवित्र -धर्मी ! 'दूधो नहाओ -पूतो फलो' ॥ 

 सह धर्म चरनी हे मम धिया । तीन लोकु मह तुम सोंह प्रिया ॥ 
होत न कहुँ दुःख भागिनी कोई । जह सर्वथा जथारथ होई ॥ 
पति धर्म का पालन करने वाली मेरी बिटिया, तुम्हारे जैसी पतिव्रता स्त्रियाँ तीनों लोकों में कहीं कोई दुःख की भागिनी नहीं होती । यह सर्वथा सत्य वचन है ॥ 

तुम्ह जो हे बिदेह कुमारी । निज पत चरन अनुसरन कारी ॥ 
भए तव कर कुल के उद्धारे । अस कह जनि मुख मौन पधारे ॥ 
वैदेह कुमारी ! तुमने जो अपने पति के चरणों का अनुशरण किया है ।। इससे तुम्हारे हाथों से इस कुल का उद्धरण हो गया । ऐसा कह कर माता कौसल्या के मुख पर मौन विराजित हो गया ॥ 

बहुरि हर्ष स्वन कारन, पुलकित भए सब अंग । 
अस प्रभु सिया मातृ-मिलन भए पूरनित सुप्रसंग ॥ 
हर्ष ध्वनी के कारण उनके पुन: उनके सर्वांग पुलकित हो उठे ॥ इस प्रकार प्रभु श्रीरामचंद्र एवं माता सीता के मातृ-मिलन का यह सुन्दर प्रसंग पूर्ण हुवा ॥ 




























----- ॥ दोहा-पद॥ -----


एक  नगर  माली  के  बन  डालि   डालि  भरपूर ।।
बानि   बानि   के  फर   फूर   धानी   धानी   झूर ।।

ताप   रितु  तर  बरखा   पर  अवनु   सरद  हेमंत ।
सीत   सिसिर   के   रथ   उतर   रागे  रंग  बसंत ।।

सूझ बूझ परख कर गोठ तब लिए  निर्नय  सकल ।
जुना  कोटि  कोटिक  कोठ  राखु  माली नए  कल ॥

बहुस माली अदल बदल पुनि चयन किए दल एक ।
नव  दल  के   पंक   बलकल  रहे  सदस्य रव भेक ॥

कोट   कपट   के  ओट  गहे  चाटुक   दलपति   घेर ।
लपट   लपट   मधु   मधुर   कहें  रहे   हेर  के  फेर ॥

कपट तापस  दल  पति  उर  मारे  जन  एक  लात ।
चर  अचर  न  अधर  ऊपर  थर  न  कहुँ जर गात ॥

पुनि  पदस  सोइ  झोरुधर  रहें  न  कोउ   बिकल्प ।
सुखे  कंठ  बन  सुखे अधर  गहे  मुख  काल कल्प ॥

अब   ते  उहि   झोरा   छाप    लूट  खसोट   मचाए ।
कपट  करे  न  राखे  धाप  जन  बन उजरत जाए ।।



भावार्थ : --
कपट के  परकोटे  के  ओट किये हुवे दलपति को चाटुकार घेरे हुवे थे 
वो मुख   में माधुर्य लपेट कर मीठा  कहते किन्तु  सदा  हेरा-फेरी में 
ही लगे रहते ॥ 

दल पति जो की  ढोंगी  बाबा  था लोगों  ने उसकी छाँती पर एक लात
मारी। और उसे भी भगा दिया  अब  वह  ना  तो चलता  है, न रुका है 
न वह नीचे का रहा न वह ऊपर  गया  न वह स्थल पर है न वह  जल
के ऊपर है ॥ 

अब फिर से वही  कमर  में  झोला  रखे  वाला पदस्थ हुवा, और कोई 
विकल्प भी नहीं था ॥ वनों के  होठ और कंठ सुख गए, मुँह काल के 
गर्त में समा रहा है ॥ 

अब तो उस झोला छाप माली ने लूट खसोट मचा रखी है । वह छल 
करता है और संतोष भी नहीं  करता  व  एवं वन के जन सभी उजड़े 
जा रहे हैं ॥ 

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

आओ  तुम  कौ  भरत  खन  के  दरसन   करवाएँ ।
जहँ  हिम  सैल  सिर पावन  सुर सरित बही आए ॥

मुँदरी   पाछु   धरे   मनिक   पंच    करज   फैलाए ।
धनद सम बर धनिक बनिक जहँ मँगते  कहलाएँ ॥

बैसे  जहँ  अस  राउ  आसन  कारा  धन   गड़ियाए ।
झुठे    लार   लसे    भासन    बोले    तौ    उछराए ॥

कोटि   के  पहन  परकोट  कोटिक  भवन  टिकाए ।
गाँव   गँवन   कहते   गोठ  इ   लुक  तंत्र  है  भाए ॥

भावार्थ : --

आओ तुमको भारत खंड के दर्शन करवाएं । जहां  हिमालय  पर्वत से
पवित्र गंगा नदी निकलती है ॥

जहां अंगूठी के पीछे  में रत्न जड़ित कर कुबेर के समान  धनवान और
व्यापारी ( मत के लिए ) पाँचों  उंगलियाँ  फैला  कर  भीख माँगते हैं ॥

जहां काले धन का संचय कर, उच्च पदों पर ऐसे शासक बैठे हैं।जिनके
 भाषण ऐसे होते हैं, जहां से झूठ उझल उझल कर बाहर आ जाता है ।।

करोड़ करोड़ रूपए के तो ये कोट पहनते हैं । और ये जाने कितने भवनों
के  स्वामी  हैं ।ये  गाँव  के  निवासियों  से कहते है : -- देखो! देखो ! इसे
लोकतंत्र कहते हैं ॥

Tuesday, 18 June 2013

------ ॥ उत्तर-काण्ड १॥ -----

----- ॥ श्री रामाश्वमेध ॥ ----- 
                 || छंद  || 
 नमामि शंभु शङ्करो शिव शङ्खान्तर गङ्गाधरम् | 
भवानी कान्त  भस्म प्रिय भूतेश  भुजङ्गाभूषणम् || 
जटा केशवं   महेश्वरो   मदनान्तकं    मृत्युञ्जयम् | 
महाकाल् हर काल कण्ठ काल नाथ् काल योगिनम् || 
भावार्थ : - उन सिद्धात्मन, कल्याणात्मन भगवान शनकर को नमन है जो मस्तक पर गाना धारण किए हुवे हैं, जो भवानी पति हैं जिन्हें भस्मप्रिय है जो भूतों के स्वामी है और सर्प जिनका आभूषण है | जटिल केश वाले ईश्वरों के भी ईश्वर हैं जो कामदेव का अंत करने वाले व् मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाले अनन्तकालेय हैं, सृष्टि के संहारकर्ता हैं जिनका कण्ठ्य गहरे नीले वर्ण का है जो काल के भी नाथ व् गहन योगी हैं  |                                                                                                                                               

विघ्न हरण हारिणो     गणपते      कार्तिकेयात्मजम्  |                                                                                    अनेक             विलोचनामृतेश्वरानन्ताखिलात्मनम् || 
त्रिशूलपाणि  त्रिलोक्य  त्रयीदेह     त्रिनेत्र    त्रिपुरहरम्  | 
व्याघ्रचर्माम्बरौ         महानिधि:            अद्रायलयम् || विध्न हरण करने वाले गणपति व् कार्तिकेय के पिता | अनेक दृष्टि वाले देवताओं के नाथ नित्य परमात्म स्वरूप | त्रिशूल धारण करने वाले तीन लोक के स्वामी, त्रयी देहि, त्रिनेत्र त्रिपुर नामक राक्षस का वध करने वाले |  व्याघ्र चर्म को वस्त्र के समान धारण करने वाले हिमालय में निवास करने वाले वाले सबके निवास स्थान || 

सर्व पूजिते          सर्वांगरूपीणौ               सर्व मङ्गलं | 
सर्व देवमयो            सर्वदेश्य          सर्व बंध विमोचनं || 
सर्वधार्य        सर्वकामदं                सर्वतूर्य निनादनम् |  
सर्वाश्रयं  सर्व धारिणौ         सर्व पावनं          नमस्तुते || 
भावार्थ : - जो सभी के द्वारा पूज्यनीय हैं सर्वांग रूप हैं जो सभी कल्याण करने वाले हैं  देवता   जिनकी अनेक दृष्टि है,जो देवताओं के ईश्वर हैं जो अनंत स्वरूप हैं जो सर्वत्र व्याप्त परमेश्वर हैं | 

कहे धराधार मुनि श्री वात्सायायन सौँह । 
रामाश्वमेध कहानि, कहत सारदा  तौह ॥ 
भगवान शेष नाग ने श्री रामाश्वमेध की जो कथा मुनि श्री वात्सायायन के सम्मुख कही थी , उस कथा को श्री शारदा उसी प्रकार से श्रद्धा पूर्वक प्रस्तुत कर रही हैं  ॥ 

बिनइत मधुरित बोले मुनिवर । हे महभाग हे सूत श्री कर ॥ 
तव श्री बदन सुरग खन ताईं । मनोहर कथा हमहि सुनाईं ॥ 
फिर विनम्रता पूर्वक और मधुरित स्वर में ऋषि बोले : -- महाभाग सूत जी ! हमने आप के श्री मुख से स्वर्ग-खंड की मनोहर कथा सुनी ;

हे आयुरमन अब हम लोगे । राम चरित श्रवनन पथ जोगें ॥ 
कहे सूत जी हे मह रिसि गन । एक समऊ मुनि वात्सायायन ॥ 
आयुष्मान् ! अब हम लोगों को श्री राम चन्द्र जी के गुण चरित्र  को श्रवण हेतु  प्रतीक्षारत  हैं ॥ सूट जी ने कहा : -- हे महर्षि गण एक समय मुनि वात्सायायन ने : -- 

सोइ निर्मल कथा के ताईं । प्रभु सेष सोंह पूछ बुझाईं ॥ 
कोमल कर जे बचन अमोले । मुनिबर वात्सयायन बोले ।। 
पृथ्वी को धारण करने वाले नागराज भगवान अनंत से इस परम निर्मल कथा के विषय में प्रश्न किया ॥ मुनिवर वात्सायायन ने अत्यंत कोमल स्वरुप में अनमोल वचनों से युक्त होकर कहा : -- 

प्रभु सुनि तव मुख जग इतिहासा। भंजन भवादि बिषय बिकासा॥ 
जग के सब ग्यान मैं जाना । अगजग लग तुम्हरे बखाना ॥ 
भगवन ! शेषनाग ! मैने आपके मुख से संसार का इतिहास, उत्पत्ति एवं प्रलय सहित उसके विकास आदि विषयों की बाते सुनी ॥ संसार के समस्त चराचर का ज्ञान  मैने आपके व्याख्यान से ही प्राप्त किया ॥ 

भूमि खगोलक, मनि स्तनी चक, नखत गति निर्नय तईं । 
महत्तम तत्व के , सृजन सत्व के , बिलग बिलग निरुपनई ॥ 
अहिकर बंसम, नृप के अनुपम, चरितहु मैं श्रवन कियो । 
एहि आगाने आपइ श्री माने, रघुबर कथा बरनन कियो ॥ 
भूगोल, खगोल, सूर्य, पृथ्वी के परिमंडल, गृह नक्षत्रादि की गति का निर्णय के विषय । महत्तत्त्व एवं सृष्टी के सत्व का पृथक पृथक निरूपण तथा सूर्यवंशी राजाओं के अद्वितीय चरित्र को भी मैने आपके मुख से सूना ॥ इसी प्रसंग में हे श्रीमान ! आपने भगवान श्रीरामचन्द्रजी की कथा का भी वर्णन किया ॥ 

प्रभु अस्व मेध कथा पर, सुनि संछेप सरूप । 
अब मैं श्रवनाभिलाखउँ, वाके बिस्तृत रूप ॥  
किन्तु उन भगवान श्रीरामचन्द्रजी के अश्वमेध की कथा मैने संक्षेप स्वरुप में ही सुनी । अत: अब मैं उसे आपके द्वारा उसके विस्तृत रूप में सुनना चाहता हूँ ॥ 

कथन श्रवन सुमिरन करत ,जोउ कथा जो कोइ । 
मुदित मनो काम पूरित , सह सो अघहिन होइ ॥ 
इस कथा को जो कोई भक्त, कथन, श्रवण अथवा स्मरण करता  है । वह प्रसन्न चित्त होकर सभी कामनाओं से पूर्ण हो जाता है अर्थात कामना रहित हो जाता है साथ ही वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ 

सोमवार, २ ५ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                       

कही प्रभु सेष हे द्विज राए । सुभग जोग तुम बुद्धि अस पाए ॥
जो प्रभु के जग पदारविंदे । ललसे अस जस मधु मकरंदे ॥ 
फिर भगवान् शेष ने कहा : -- ब्रह्मण ! आप ब्राह्मण कुल में श्रेष्ठ एवं धन्यवाद के पात्र हैं; क्योंकि आपको ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई है जो प्रभु श्रीरामचंद्रजी के युगल-चरणारविन्दों का मकरंद पान करने को मधुकर के जैसे लौलुप रहते हैं ॥ 

सब मह रिसि कहत एकंगा । होत महत सज्जन सत संगा ॥ 
कारन तिन सौंह एहि कर सुहाए । जेइ कथा तँह श्रवन सुख पाए ॥ 
सभी ऋषि-महर्षि साधू पुरुषों के सत्संग श्रेष्ठ बताते हैं । इसका कारण यह है चूँकि वहाँ इस पावन कथा ( जो समस्त पातकों का नाश करने वाली है ) के श्रवण का सुख प्राप्त होता है अत: उनका साथ सुहावना होता है ॥ 

देवासुर जिनके चरन रती । निज मुकुट मनि सन किए आरती ॥ 
तेहि राम के सुमरन सुधित  कर । तुहरे अनुग्रह भयउ मम उपर ॥ 
देवता और असुर जिनके चरणों में अनुराग रखते हुवे अपने मुकुट की मणियों से उनकी आरती उतारते हैं ।। उन्हीं भगवान श्रीराम का स्मरण कराकर आपने मुझ पर अतिशय उपकार किया है ॥ 

जिन्ह ब्रम्हादि देव ग्यानी । मोह बल के बस कछु न जानी ॥ 
सोइ संवाद सिंधु अपारा । मम सोंह मसक जाननहारा ॥ 
जिनको ब्रह्मादि ज्ञानी देवता भी मोह शक्ति के वश में होकर कुछ भान नहीं पाते ।। उन्ही श्री राम की कथा रूपी महासागर के श्रेष्ठ संवाद को मेरे जैसा-मशक समान तुच्छ जीव भानने वाला हो गया ॥ 

प्रभु चरित ऐसे बिस्तारै । जस पटाम्बर अंत अपारै ॥ 
बंस बेलि कुल कीर्ति कैसी । मंडल मनि मुख मूरति जैसी ॥ 
प्रभु श्रीराम के चरित्र का विस्तार तो ऐसा है जैसे अम्बर पट अपरम्पार है ॥ रघु कुल के वंश वेलि का यश कैसा है जैसे की सौर्य मंडल के मणि सूर्य की मुख मूर्ति का यश हो ॥ 

तथापि मैं आपनि सोंह, बरनउँ निज अनुहार । 
नभग गमन निजबल जदपि, गगन बिपुल बिस्तार ॥ 
तथापि मैं अपनी शक्ति के अनुसार आप से श्री राम कथा का वनं करूंगा ।  यद्यपि गगन तो विपुल विस्तार लिए हुवे है, नभचर फिर भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार गमन करते हैं ॥ 

जाकी जितो बुद्धि होत, तितो ग्यान बखानि । 
जितो कुंभ कोषागार , तितो सँजोई पानि ॥ 
भावार्थ : - जिसकी जितनी बुद्धि होती है उसका ज्ञानाख्यान भी उतना ही होता है । कुम्भज के कोष में जितना स्थान  होगा वह उतना ही जल संचित करेगा ॥ 

मंगलवार, २६ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                 

राम चरित कहि कोटि स्लोके । कोउ कथन कँह लग अवलोके । 
सकल भाख जग दिए जो सानी । बरनातीत तिनकी बखानी ॥ 
श्रीरामचन्द्रजी के चरित्र को करोड़ों श्लोको ने कहा है । यदि कोई उसका कथन करे तो वह कहाँ तक देखे, अर्थात उनका कथन दर्शनातीत है ॥ यदि विश्व की सारी भाषाओं में भी प्रभु को अनुरक्त किये जाने पर भी उनका व्याख्या वर्णनातीत होगा ॥ 

भानुमान जो जगत प्रकासे । सकेर सकै को तिनके कासे ॥ 
प्रभु माया पत सत के मूला । मैं तिन दास तृन तुहिन तूला ॥ 
जैसे भानुमान है उसका कार्य जग को प्रकाशित करना है किन्तु क्या कोई उन्की कांति को संकलित करने में समर्थ है प्रभु का चरित्र भी वैसा ही है ॥ प्रभु तो माया के स्वामी एवं सत्य के मूल हैं और मैं, मैं तो माया का दास हूँ  तथा तुच्छ तृण के सदृश्य उनके सम्मुख नतमस्तक हूँ ॥ 

राम नाम जो बदन उचारे । जो हरि के गुन कीर्ति कारे ।। 
तासु मतिहि अस पावन होही । तापन तप जस निर्मल सोहीं ॥ 
जो कोई भक्त प्रभु श्रीराम के नाम का अपने मुख से उच्चारण करता है । जो कोई भगवान के गुणों की कीर्ति करता है ॥ उसकी मति पवित्र होकर ऐसे शोभित होती है जैसे तपस्वी एवं स्वर्ण तप से शुद्ध होकर सुशोभित होते हैं ॥ 

पुनि सूत कहीं हे मह रिसि गन । अस कह मुनि वात्सायायन सन ।। 
फनिस नाथ भए मगन धिआने । दिए निज पदुम पटल ओहाने ॥ 
तदोपरांत सूत जी ने कहा  : -- हे महर्षिगण ! मुनिवर वात्सायायन से ऐसा कह कर भगवान शेष नाग फिर ध्यान मग्न हो गए और पद्म सदृश्य अपने पोटल का आवरण देकर : -- 

अंतर नयन बिलोक , पुनि लोकानुग्रहोत्तर, । 
कथा कारि अवलोक, लोकाभ्युदय करन किए, ॥ 
फिर उन्होंने अंतर दृष्टि से देखते हुवे लोगों के कल्याण एवं संसार का उद्धार करने हेतु इस असाधारण कथा का अवलोकन किया ॥ 

बुधवार, २ ७ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                      

लिए निज मति भगवन धरनी धर । अवतर प्रभु के चरिता सागर ॥ 
भगवन लघु जान जलधि महिमन । राम कृपा के पर पाए पवन ॥ 
अपनी मति से धरणी को धारण करने वाले भगवान शेष, फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के कथा चरित्र रूपी सागर में उतर गए ॥ भगवान लघु जलयान के सदृश्य थे और चरित्र महा सागर के सदृश्य था किन्तु श्रीरामजी की कृपा से पवन का प्रसंग प्राप्त हुवा ॥ 

नयन करन चितबन करनीकर । पोटल पटल पट पोत पटतर ॥ 
रंग तरंग जब दिए दरसन । रोम रोम लागे अति हर्षन ॥ 
नयन  पतवार हुवे चित्त कर्णधार हो गया । एवं पलक -पटल के पट पोत के समतुल्य हो गए ॥ जब अनुभूतियों की तरंगों के दर्शन होने लगे तब उनके रोम रोम अतिशय हर्षित हो उठे ॥ 

अरु गद गद बानी सन जोगत । कथा कलस के तिर तिर टेरत ॥ 
बारम बार कहत अभिनन्दन । कारत प्रभु के चरना बंदन ॥ 
और वे गदगद वाणी से युक्त होकर कथा के उस मंदिर के  पर पतवार खींचते , वारंवार प्रभु श्रीराम का अभिनन्दन कर उनके चरणों में अपनी भक्ति वंदना प्रस्तुत की ॥ 

सब्द सब्द सीप रूपांतर । अंतर आखर आखर हिमबर ॥ 
कोष कोठार कर कासि कृपन । दिए रघुनन्दन बहु उदार मन ॥ 
वहाँ शब्द शब्द सूक्ति स्वरुप थे और अंतर में अक्षर अक्षर मुक्ति रूप में थे ॥ मोतियों का  भंडार  था किन्तु प्रभु शेष की मुष्टिका छोटी थी प्र रघुनन्दन उदारता पूर्वक उन मोतियों का दान कर प्रभु शेष को अनुग्रहित किया 

हस्त मुकुल धरकर एक एक कन । गिन गिन घारे सुर ग्राम किरन ॥ 
अवगुंफित कही भए संपन्न । अरु किए निज  कंठालंकरन ॥ 
अपने अंजुली में अक्षरों के उन अक्षर मोतियों को  सम्भालते हुवे फिर उन्हें गिन गिन कर सप्तक स्वर के सूत्र में पिरो दिया  फिर उन्हें गूँथ कर यह कहते हुवे कि भगवन बस संपन्न हो गए, अपने कंठ को अलंकृत का लिया ॥ 

सुनौ कहत चित लाइ, प्रभु कथा चरित मैं गाउँ । 
अश्व मेध के ताइ, अस बोले सेष भगवन  ॥   
फिर भगवान शेष मुनिवर वात्सायायन से सम्मुख होकर बोले : -- वात्सायायन जी ! अब आप प्रभु की पावन कथा के इस चरित्र को जो कि  अश्वमेध से सम्बंधित है, चित्त लगाकर श्रवण करो  ॥ 

गुरूवार, २ ८ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                         

देव दनुज को जो दुखदाई । सोई रावन लंका राई ॥ 
दसम दस सीस भरे हँकारे । राम कमल कर भए उद्धारे ॥ 
( फिर भगवन बोले हे मुनिवर ) देवों एवं दानवों को जो दुःख देने वाला था उसी लंकापति रावण के अहंकार से भरे दस के दस सिरों का श्रीरामचन्द्रजी के कम कर द्वारा उद्धरण हो गया ॥ 

नाथ सहित तब सकल देव गन । पाए सांति धरत गत रावन ।। 
बहुरि सोइ भए मगन अनंदे । दास रूप प्रभु चरनन बंदे ॥ 
तब इंद्रा सहित सभी देवतागण रावण की मृत्यु कारित होने पर सुख प्राप्त हुवा ॥ फिर वे आनंद में मग्न होकर दास की भाँति भगवान के चरणों की वंदना  करने लगे : - ॥ 

बरस कलस कर सुमनस सोहे । कंठ कलित कल सुर सरसौंहे ॥ 
हरष एहि भाँति स्तुती गाईं । प्रभु के भाउ भगति उर लाईं ॥ 
उनकी अंजुली से बरसते पुष्प सुहावने प्रतीत हो रहे थे । कंठ में सुमधुर स्वर स्वॉप में स्व्यं माँ सरस्वती  विभूषित हुईं ॥ हर्षित  होकर प्रभु की श्रद्धा एवं भक्ति को हृदय में धारण कर इस प्रकार उनकी स्तुति गाने लगे ॥ 

रघु कैरव हे दसरथ नंदन । कुल गरुबर मनि वर तपस चरन ।। 
हे जग कारन रूप परायन । कोटि जयति जय तव नाथ जगन ॥ 
रघुकुल के कौमुद , हे दशरथ नंदन, कुल के गौरव, मणि , हे कुल श्रेष्ठ, हे तपस्वी ॥ हे परमेश्वर !,हे विष्णु स्वरुप, हे जगत के नाथ तुम्हारी करोडो जय जय कार हो ॥ 

 रघुउद्वह द्वंद हरन, हे जग कलिमल हारु  ।  
भव काइ के तुम भूषन, भग नंदन अवतारु ॥   
रघुवंशियों मन प्रधान, हे ( राग-द्वेष, हर्ष-शोक,जन्म-मृत्यु आदि ) द्वंदों को हारने वाले हे जग से पापों को दूर करने वाले । हे विष्णु के अवतार यह संसार काया है, आप उसके भूषण स्वरुप हैं ॥ 

शुक्र /शनि , २९/३०  नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                          

हे जानकीशं वल्ल्भम् । जीवन रमण जनार्दनम् ॥ 
हे जगदाधार नन्दनम् । धातृ विश्वविश्रुत वन्दनम् ॥ 
हे माता जानकी के ईश्वर हे माता जानकी के प्रियतम हे रामचन्द्र । हे जगत के आधार स्वरुप हे जगत को धारक, सर्व प्रसिद्ध सर्वत्र पूज्यनीय परमेश्वर ॥ 

मुख ओज मनोज अगणित ।श्रवण सहस्रम् बहु विदश्रुत ॥ 
शीश कलश कुंतल कलितम् । मुनि रूप शालिन सम्पदम् ॥ 
अनगिनत काम देव के ओज मुखी, सहस्त्र कारणों से वेद श्रुति आदि श्रवण करने वाले महाकोविद॥ शीर्ष कलश पर कुंतल सुशोभित किये हुवे हे रूपवान मुनि स्वरुप ॥ 

कर्पूर गौरं चन्द्रो वर्णम् ।  जनक धिय निलय निवासितम् ॥ 
पीताम्बरं नवम्बु धरम् । कल कंत काय कलेवरम् ॥
कर्पूर एवं चंद्रमा के सदृश्य गौर वर्ण जनक पुत्री श्री जानकी के हृदय में निवासित प्रभो ॥ पीले वस्त्र  से युक्त आपकी कायाकृति की कांति नवल घन को धरान किये है ॥ 

नीलांगंजनोत्पलम् । सरिल सील नील सागरं ॥
भुजांतरम भृगु रेखितम् । ललाटूल ललाम ललितम् ॥ 
जिसके अंग चंचलानीली ज्योति, नीलम रत्न एवं सागर के शांत नीले वर्ण की आभे दे रहें हैं ॥ ह्रदय भवन पर भृगु के चरण रेखाएं और मस्तक पर का चिन्ह अति मनोहर है ॥ 

लोकावलोकालोकितम् | तव मन्दस्मित ज्योतिरम् || 
भव बन्धन् नयन भङ्जनम्  | पल्लव् पट यत् मुक्ति पत्रम् || 
संसार में जो आलोक अवलोकित है वह आपकी मंद स्मिति की ज्योति ही है ॥ नयन भाव बंधन के भंजनकारी हैं एवं पलक पट ऐसे हैं जैसे वे मोक्ष के पत्र हों ॥ 

हे इन्द्रादि सुरार्चिते ।  नारदादि मुने वन्दिते ॥ 
शार्ङ्ग् धन्वाति शोभितम् । कपिश यूहत्व सुयोगितम् ॥
हे इन्द्रादि देवताओं से अर्चनीय, नारदादि मुनियों द्वारा वन्दनीय देव ।  आप वानरों के समूह से सुंदरता पूर्वक युक्त हैं एवं आपके हाथ में सारँग  धनुष अत्यधिक शोभा दे रहा है ॥ 


हे सर्वान्तर्यामिनक्ष ।  हे सर्वान्तरस्थध्यक्ष ॥  
सर्व सार स्वरूप जन हितम् । हे कौशल्याप्रियतनयम् ॥ 
सब पर दृष्टी रखने वाले हे अन्तर्यामी ईश्वर । सब के अंतस में निवासित हे जगत नियंता ॥ जगत के सार स्वरुप सभी जनों का हित करने वाले माता कौशल्या के प्रिय पुत्र ॥ 

मर्यादित पुरूषोत्तम । नमामि शरणम् त्वामहम् ॥ 
रामाख्यमीशं हरिम । वन्देSहं नमत नतोSहं ॥
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र हम आपको नमस्कार कर आपके शरणागत हैं ॥ राम कहलाने वाले भगवान हैम नत  मस्तक होकर आपकी वंदना करते हुवे प्रणाम करते हैं ॥ 

हे राघवच्युतानंद, बोधित त्वं अनीह । 
हे निच्छल अकिंचन तव, सर्वार्थ पुजनीह ॥ 
हे राघव आपका आनंद नित्य और अक्षुण्य है आप परम बोधित एवं कामनाओं से मुक्त हैं । हे निश्छल हे सर्व त्यागी, आपके समस्त विषय वन्दनीय हैं ॥ 

रविवार, ०१ दिसंबर, २०१३                                                                                       

तासुहु पर रघुबर अधिठाई । भयउ बिभीषन लंका राई ॥ 
होवत कृत कृत कहि मृदु बानी । दया सील प्रभु सारँगपानी ॥ 
रावण वध के पश्चात रघुवर द्वारा प्रतिष्ठापित होकर विभीषण लंका के राजा हुवा ॥ इस प्रकार का सम्मान प्राप्त कर वह कृत कृत हो गया और मृदुल वाणी से कहने लगा सारंग नामक धनुष धारण करने वाले हे दयाशील प्रभु ॥ 

किरपा कारत जनम सुधायो । तव असीस मम सीस धरायो ॥ 
रहहि न मोरिहि किरपा कोई । अस कह प्रभु मुख समितम् लोई ॥ 
आपके कर आशीष मेरे शीश पर इस प्रकार रखा गया की वह कृपा करता गया और मेरा जन्म सुधरता गया ॥ मेरी कोई कृपा नहीं थी ऐसा कहकर प्रभु के मुख पर मंद स्मित सुशोभित हुई ॥ 

सब दृग तव सों एहि कर होंही । तुहरे प्रसंग सत सन सोही ॥ 
सुनत बिभीषन प्रभु  के बचना । भाव प्रबन हो लिए धरि चरना ॥ 
तुम्हारे पक्ष में सारी दिशाएं इस हेतु अनुकूल हुई कि तुम्हारा प्रसंग सत्य के साथ शोभित था ॥ ऐसे वचन सुनकर विभीषण भावुक हो गया और उसने प्रभु के चरण पकड़ लिए । 

तिन नय नीति देत अति गूढ़े । तेहिहि पुष्पक जानारूढ़े ॥ 
कपि पत हनुमत  राजित होहे। लखमन प्रभु सिय संगत सोहे ॥ 
मार्ग दर्शन स्वरुप में  उसे अतिशय गूढ़ नीतियां का ज्ञान देकर फिर प्रभु उसके पुष्पक विमान में आरूढ़ हुवे ॥ श्रीरामचन्द्रजी संग माता सीता के साथ सुग्रीव, हनुमान, लक्ष्मण आदि भी विराजित हुवे ॥ 

तासु परंत असोक बाटिके । डारत तरु दीठ पलक अलिके ॥ 
लंकापुर सौं पीठ फिराने । सँजोवइ अवध हूँत पयाने ॥ 

तों बिभीषन मनोभवन, बिरह डरत भरि कंठ । 
भगवन के सोंह जावन, भए अतिसय उत्कंठ ॥ 
उस समय विभीषण के मनो भवन में प्रभु से विरह का भय वासित हो गया उसका कंठ भर आया । भगवान के साथ जाने के लिए वह भी उत्कंठित हो गया ॥ 

बिभीषन के तिलक बदन, दरस बिरहनी रंग । 
अपनाए हरिदै लगाए, प्रभु तिन्ह लेइँ संग ॥  
विभीषण के तिलक युक्त मुखाकृति पर विरह के रंग देख फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण को अपना कर हृदय से लगाते हुवे अपने साथ ले लिया ॥ 

 भगवन मुख तेजो रूप , बिकिरित चहुँ दृग कोर । 
राग धरत अस्तुति करत, बिधि पुल पुलकि बहोर ॥ 
तब भगवान के मुख का  तेजो रूप चारों दिशाओं में प्रस्तारित हो गया । ( भगवान के ऐसे दर्शन प्राप्त कर ) सृष्टि के रचेता ब्रह्म प्रसन्न एवं पुलकित होते हुवे एवं छ: रागों से युक्त होकर भगवन की स्तुति करने लगे ॥ 

सोम/मंगल , ०२/०३  दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                        

चले अवध सिय सों रघुराई । होंहि सगुन सुन्दर सुख दाई ॥ 
बैस जान भए गगन बिहंगे । सिंहासन मनि रचि बहु रंगे ॥ 
फिर सभी को एकत्र कर, पुष्पक विमान स्वरुप उस नभोचर के माणिक्य रचित बहुरंगी सिंहासन पर विराज कर प्रभु माता सीता के साथ अवध को प्रस्थान किये ॥ 

ज्योतिर मंडल ज्योति जगाए । अर्धयार्च नीराजन गाए ॥ 
नखत नेमि नत पंथ दरसाए । उदइत उदरथि देइँ बधाई ॥ 
( उनके गमन से ) नक्षत्र मंडल में ज्योतियां जागृत रहीं । वे प्रभु की आराधना कर वन्दना एवं आरती गाने लगीं ॥ ध्रुव तारे ने नभ में प्रभु का पथ प्रदर्शन किया । उदधि एवं सूर्यदेव उदयित हुवे एवं उन्हें अवध लौटने की बधाइयाँ देने लगे ॥ 

संगत किए ब्रह्मादिहि देवा । वीना वाद वदन सुर सेवा ॥ 
ढोर पखावज दुंदुभि बजाए । बहु रित मधुरित  करन सुख दाइ ॥ 
ब्रह्मादि देव उअनके साथ थे । वे वीणा वादन करते सुरों से उनकी सेवा करते चल रहे थे ॥ ढोल पखावज दुंदुभि आदि वाया यन्त्र बहुंत रीतियों से बजते हुवे सुमधुरित होकर कानों को अति प्रिय लग रहे थे ॥ 

चलत बयारि त्रिबिध चहुँ फेरे । बारि बारि सुर पत आ घेरे ॥ 
कलरव कर जब सिंधु ढँकयाए  । परसन चरन तरंग उठ आइ ।। 
चारों और त्रिबिध (शीतल,मंद,सुगंध)वायु प्रवाहित हो रही थी । दर्शन के लोभ में इंद्र देव प्रभु को वारंवार घेर लेते ॥ कोलाहल करते हुवा विमान ने जब समुद्र को लांघा तब उअनके चरण सपर्श हेतु तरंगे उत्कंठित हो उठी ॥ 

देखु देखु इँह सेतु बँधायो । हरष प्रभु जानकिहि दिखरायो ।। 
जब रामेस्वर थरी दरसाए । नमत नयनन सिय जल भर लाइ ॥ 
देखो देखो यहाँ सेतु बंधा है फिर प्रभु श्रीराम चन्द्र ने माता सीता को अत्यंत ही हर्ष पूर्वक बंधा हुवा दस्तु दिखाया ॥जब अपने कर कमलों से स्थापि किये रामेश्वर धाम के दर्शन करवाए तब ( प्रिय के अपने प्रति प्रणय के दर्शन कर ) प्रणयित होते हुवे सीता की नयनों में जा भर आए ॥ 

सौह्रदय  निधि करुना निधाने  । बसइ भ्रात सन जिन अस्थाने ॥ 
चिंतत चिन्हत सिया दरसाए । चित्रनहार पलकन पहनाई ॥ 
सद्भाव संपन्न एवं करुणा के भण्डार श्रीरामचन्द्र ने हरण काण्ड के पश्चात लघु भ्राता लक्ष्मण के साथ जिन जिन स्थानों पर निवास किया  ॥उन स्थानों के स्मृति चिन्हों  को माता सीता के दृष्टिगत  कर उनका चित्रात्मक वर्णन का हार माता की पलकों में पहनाते चले ॥ 

तरत गगन बहु  बेगि बिमाना । पयोधि पारग जात न जाना ॥ 
दंडकारन आवत अचिराए । कुंभजादि मुनि सोंह मिलबाइ ॥ 
गगन में विमान अत्यधिक तीव्रता से तैर रहा था । उदधि कब पार हो गया यह ज्ञात न हुवा शीघ्र ही दंडकारण्य आ गया फिर भगवान ने अगस्त्य आदि मुनिवर से माता की भेंट करवाई ॥ 

चलि आगिन तिन कर परनामा । आए चित्रकूट के कल धामा ॥ 
दोइ पद पर कलि हर मलियाए । कल कल करत कालिंदि सुहाइ  ॥ 
उअनके चरणों में प्रणाम प्रणिधान  कर फिर प्रभु आगे बड़े तो चित्रकूट का सुहावना धाम आ गया  ।  दो ही चरणों की दूरी पर कल कल करती पापहरणी साँवली सलौनी कालिंदी के दर्शन मनोहर लगे ॥ 

छन सिय लोचन नाथ निहारी । कहि भए मम पिय गगन बिहारी ।। 
दूर नुपूर सुर सरि सरसाए । सिय सिरु नावत कंठ लगाई ॥ 
एक पलक को माता सीता के नयन प्रियतम को निहारे वह मन में कहने लगी हमरे प्रीतम गगन में विहार करने वाले हो गए ॥ दूर गंगा जी के नुपूर स्वरुप जल बिंदु सुहावने लगे तब माता सीता नत मस्तक होकर उन्हें कंठ से गा लिया ॥ 

देखु कहत प्रभु तीरथ राजा । तिनके दरसन भा बर काजा ।।  
पवित पौरि सुर पँवरपैठाए । अरु देखु बेनि अघ हरनाई ॥ 
फिर प्रभु ने खा देखो यह तीर्थों का भी तीर्थ प्रयागराज है इसके दर्शन प्राप्त कर बड़े से बड़े कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं । इसकी पवित्र पथ -सोपान सीधे स्वर्ग पहुंचा देते हैं और पापों का हरण करने वाली यह त्रिवेणी ( गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदी का संगम स्थल ) देखो ॥ 

पैठ अवध सिय (सों) रघुराइ,  प्रनत बेनि ( त्रिवेणी ) अन्हाइ । 
सकल स्वजन सहि बिप्रवर, दिए बहु बिधि अनुदाइ ॥ 
और अवध देश में पहुँच कर माता सीता एवं प्रभु श्रीराम ने त्रिवेणी को प्रणाम कर पुनीत स्नान किया । फिर समस्त स्वजनों  आकांक्षित जनों की बहुंत प्रकार से सहायता की ॥ 

मग मह नेकानेक, प्रभु मुनि सत भामिनि धाम । 
तिनके पुत परबेक, प्रिया दरसन  दात चले ॥ 
मार्ग में मुनियों की पतिव्रता स्त्रियों एवं उनके श्रेष्ठ पुत्रों से युक्त अनेकों आश्रम थे प्रभु ने अपनी प्रियतमा को उनके भी दर्शन करवाए ॥

बुध /गुरु ,०४ /०५ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                            

एहि बिधि पथ पथ प्रभु सिरु नावा । अवध पुरी के दरसन पावा ॥ 
भरत सुरति पुनि प्रभु चित राते ।  तिन नन्दि गाँउ दिरिस निपाते ॥ 
इस प्रकार पंथ पंथ पर शीश नवाते,प्रभु को अवध देश के दर्शन प्राप्त हुवे । फिर लघु भ्राता भारत के समान से चित्त को आसक्त करते हुवे उस नंदी गाँव में दृष्टिपात किये : --  

जहाँ भ्रात बर जनित बिजोगित । अतुल दुःख मई चिन्हन जोगित ॥ 
धर्म पाल प्रभु आवन आसे । कैकेई सुत करैं निबासे ॥ 
जहां अपने ज्येष्ठ भ्राता के वियोगजनित अनेकों दुखमय चिन्हों को योगित किये हुवे, प्रभु के आने की आशा में कैकेई पुत्र  धर्म पालक राजा भरत निवास कर रहे थे ॥ 

ब्रह्म चरन मुनि भेस रचाई । जटा  सीस बलकल तन लाईं ॥ 
करत गरक भुँइ तहहि सयनाए । अस बै भयउ सोइ कृष काए ॥ 
जो ब्रह्मचर्य होकर मुनियों का वेश रचाए हुवे थे । उनके शीश पर जटा विराजित थी और तन वल्कल वस्त्र धारण किये हुवे था ॥ वह भूमि में गर्क करके वहीँ सयन करते थे ऐसी विकल अवस्था में उनकी काया क्षीण हो गई थी ॥ 

गहहि न अनकन जोग जवारा । लहहि न पयसन बारहि बारा ॥ 
उदयित उदरथि धनबन जेई । सिरु नमनत सो कहतै तेई ॥ 
वे जौ के जितना भी अन्न ग्रहण नहीं करते और वारंवार जल भू मुख से नहीं लगाते ॥ आकाश में जैसे ही सूर्यदेव उदयित होते । तब वे उन्हें प्रणाम कर कहते : -- 

हे सहस किरन, ललामिन बदन , जगलग जगमग जारते । 
कर दान नयन, बरदान दयन, जोत जगत जगारते ॥ 
भूमि भास्वन, देव भानुमन, मम मह पातक हरयो । 
अस कहत भरत, प्रनमत प्रनिपत ,द्यु पत पुनि पद परयो ॥ 
हे सहस्त्रों कारणों वाले, लाल मुखी , समस्त संसार को जगमगाने वाले , जगत को नयन प्रदान कर ज्योत का वरदान देकर उसे नित्य प्रति जागृत करने वाले देव । हे भूमि के प्रकाशमान सूर्यदेव मेरे महान पातकों का हरण कीजिये ( हाय! मुझसे बड़ कर पापी कौन होगा ) ऐसा कहते हुवे फिर राजा भरत झुककर उन प्रभा पति सूर्य के चरण पकड़ कर उन्हें (पुन:)प्रणाम अर्पित किया ॥ 

अह मम कारन, जगती वंदन, राम चन्द्र बन गवने । 
बहु सुकुमारी, कोमल कारी, सिय सेबित तँह बसने ॥ 
धरनी जाता,  जिनके गाता, सुमनस सेज सइनई । 
परस कमलिनी, के मृनालिनी, जो ब्याकुल लहनई ॥ 
आह ! मेरे कारण  समस्त संसार में पूज्यनीय भगवान श्री रामचन्द्रजी वन में जाना पड़ा । सुकुमार काया वाली माता सीता से सेवित होकर उन्हें वहीं निवास करना पड़ा ॥ आह ! माता सीता, जिनका शरीर पुष्पों की शय्या में शयन करने पर भी कमलिनी के कोमल डंठल के स्पर्श मात्र से जो व्याकुलित हो उठती थीं ॥ 

पतिब्रत रूपा, जो रबि धूपा, सदन चरन न बाहिरी । 
जनक किसोरी, करनी मोरी, सो बिपिन भटकत फिरी ॥ 
पसु बन पेखे, चितरन लेखे, जो अति भयभीत भईं । 
तिन सों लाखे , सौमुख साखे, कवन नयन मिलावई ॥ 
 जिन पतिव्रता रूपिणी के चरण सूर्य की धूप में रनिवास से बहिर्गत न हुवे । वही जनक पुत्री आज मेरी करनी से विपिन में भटकती फिर रहीं हैं ॥ चित्र लेखाओं में भी  जो वन और उसके पशुओं को देखकर अत्यधिक भयभीत हो जाती थीं वही  जब  उनके सम्मुख साक्षात स्वरुप में प्रकट होते होंगे  तब वह  नयन कैसे मिलाती होंगीं ॥ 

जो मधु धूरी, पूरन पूरी, सों पाक पर्क पुरिते  । 
फर खर्जूरी, भूरिहि भूरी, जिनके रसन बिसरिते ॥ 
तिन्ह के हुँते सोइ बहूँते, याचन कर बनभँवरी । 
बसि ते देसा, तपसी भेसा, बसइ जोइ बनसँवरी॥  
जो खांड  से मधु-पर्क युक्त भरे पुरे पकवानों को एवं फल खजूरों की अधिकता से जिनकी जिह्वा अनुरक्त होकर विरक्त हो गई थीं, अब वह उन्हीं वस्तुओं के लिए अतिशय याचना करती वन वन फिर रही हैं । जो बन संवर कर अयोध्या देश में बसी थीं अब वह तपस्वनी का वेश धारण कर वन में जा बसी ॥ 

एहि बिधि प्रभु पद प्रीति धर, उदयित उदरथि प्रात । 
प्रणमत तिन्ह निसदिन कहत, भरत राउ अस बात ॥ 
इस प्रकार प्रभु श्रीराम के चरणों में अनुराग रखते राजा भरत, प्रतिदिन सूर्योपस्थान के पश्चात प्रणाम कर सूर्यदेव के सम्मुख उपर्युक्त बातें कहा करते थे ॥ 

शुक्रवार, ०६ दिसंबर, २०१ ३                                                                                           

तिनके सुख दुःख भाजनहारे । सुधि सचिव नय बिद चतुरारे ॥ 
हारे हिय जब धीरजु देईं । कछु कहतहि दिए उतरू तेई ॥ 
 उनका सुख-दुःख बांटने वाले,शास्त्र कुशल,नीति-निपुण ,राजनीति के ज्ञाता सचिव जब हारे ह्रदय को सांत्वना देते हुवे कुछ कहते तब भारत उन्हें इस प्रकार उत्तर देते : -- 

मैं हत भाग हे मह अमाता । करौ न मम सन तुम को बाता ॥ 
सबहि सोंह मैं अधम अहाहूँ । मम करनी प्रभु ताप लहाहू ॥ 
हे अमात्यगण ! मैं भाग्यहीन हूँ अत: आप मुझसे कोई वार्तालाप न करो । मैं सभी जनों से अधम हूँ, कारण कि मेरी करनी से ही आज मेरे भ्राता वन में कष्ट उठा रहे हैं ॥ 

तिन पातक कारन पछतावा । मैं हत भागी औसर पावा ॥ 
एतदर्थ मैं प्रभु पद निरंतर । कारहुँ दूषन सुधि सुमिरन कर ॥ 
मुझ हतभागी को उनको  कष्ट देने के पाप का प्रायश्चित करने का यह अवसर प्राप्त हुवा है । अत: मैं प्रभु के चरणों का निरंतर स्मरण कर अपने दोषों को शुद्ध का रहा हूँ ॥ 

एहि बिधि भरत भ्रात अनुरागे । बसि जँह निसदिन बिलपन लागें ॥ 
निरखत प्रभु तेइँ नन्दि गाँवा । पैठत पौर पँवर सिरु नावा ॥ 
इस प्रकार भरत अपने ज्येष्ठ भ्राता के प्रति अनुराग रखते हुवे जिस स्थान पर वास कर प्रतिदिन विलाप करते थे उसी नन्दि ग्राम के दर्शन कर और वहाँ के पुर में प्रवेश कर उसकी पौड़ी पर प्रभु नतमस्तक हो गए ॥ 

प्रभु के चित भरत दरसन, भइ अतिसय उत्कंठ ॥ 
नंदि गाँव भीतर गमन, कहत सेष कल कंठ ॥ 
भगवान शेषजी ने मधुरित,मंद  स्वर में कहा, मुने ! नन्दि ग्राम के अंतर प्रेवश करते ही फिर प्रभु का चित्त भरत के दर्शन हेतु अतिशय उत्कंठित हो उठा ॥ 

शनिवार,०७ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                                    

बहुरि धरमात्मन अगुताई ।  लघुत भ्रात फिरि फिरि सुरताई ।। 
भए सों हनुमत कहि प्रभु ताही । गवनु तुम मम भ्रात के पाही ॥ 
फिर प्रभु धर्मात्माओं में अग्रगण्य अपने लघु भ्राता  को वारंवार स्मरण करने लगे । और वीरबली हनुमान के सम्मुख होकर प्रभु ने उनसे कहा हे वायुनंदन तुम मेरे भ्राता भरत के पास जाओ ॥ 

धार बिरह सो मोरी माया । तप का कृष भइ तिनकी काया ॥ 
सिरु मुकुट जटा बलकल भेसे । पर तिय मात जिनके निमेसे ॥ 
वह मेरे मोह के वियोग तप में क्षीण होकर दुर्बल  हो गया है ॥ वह वल्कल वेश धरन किये हुवे है उसके शीश पर जटाओं का मुकुट विराजित है । जिसके लिए पराई स्त्री माता के सदृश्य है ॥ 

सुबरन जिन हुँत धूरि अटाला । नेह दिरिस जोई जनपाला ॥ 
सोइ धर्मी भ्रात दुखियाई। तनमन बिरहन अगन जराईं ॥ 
स्वर्णादि बहुमूल्य धातु जिसके लिए धूल की ढेरियां है । स्नेह दृष्टि धारी वह राजा जन जन का पालक है अर्थात जनता जिसके लिए संतान के सदृश्य है ॥ वह पुण्यात्मा मेरा भ्राता अभी मेरे वियोग में दुखित है । उसका तन और मन इस विरह की अग्नि में जल -जल उठा है ॥ 

कहि प्रभु याचत हे हनुमंते ।  एतदर्थ तौं गवनउ तुरंते ॥ 
बिरह तपन  दुःख तपन ज्वाला । वरनार्नव बर बारि माला ॥ 
प्रभु श्री रामचंद्र ने फिर याचना पूर्वक कहा  हे वायुनंदन अत: इस समय तुम शीघ्रता पूर्वक जाओ । वह विरह सुरु स्वरुप है उस विरह का दुःख उसकी  ज्वाला है । वर्ण-समुद्र से वाणी की जल माला का वरन कर : -- 

तुम घन बन आवन संदेसे । गहनत घनघन बिरहन देसे ॥ 
झर झर तिनके जरन बुझाहू । नेह सहि जे उदंत सुनाहू ॥ 
तुम मेरे आगमन-सन्देश के बादल का रूप धरकर उस विरह के प्रदेश में गहन गम्भीर होते हुवे झर-झर कर उसकी विरह ज्वाला को शांत करना, तथा सनेह सहित उन्हें यह समाचार सुनाना ॥ 

कहहु लखमन कपीसादि, जानकी संग जानि । 
राजत जान नभ पथ चर, तुम्हरे पाहि  आनि ॥ 
कहना लक्ष्मण, सुग्रीव आदि कपीश्वरों सहित माता सीता को साथ लेकर तुम्हारे भ्राता श्रीराम विमान में विराजित होकर गगन पथ से चलते हुवे तुम्हारे पास आ पहुंचे हैं ॥ 

रविवार, ०८ दिसंबर,२०१ ३                                                                                               

परम सुबधित रघुबर कहिन्हे । पवन तनय सिरौधर लहिन्हें ॥ 
चिन्हत भरत गाँव प्रभु लेखे । पैठत तँह जे दरसन देखे ॥ 
परम बुद्धिमान श्रीरघुवीर के कथन को पवन पुत्र हनुमान ने शिरोधार किया और मन की गति से प्रभु के समझाए चिन्हों के आधार पर भरत के निवास स्थान नन्दिग्राम को गये वहाँ उन्होंने यह दृश्य देखा ।। 

तिनके हिय प्रभु पदारविंदे । भयउ गहन निमग्न मकरंदे ॥ 
नयज्ञ सचिव निज कछु कह कारत । कातर दिरिस  ऐसेउ भासत ॥ 
उनका हृदय प्रभु के चरण कमलों के मकरंद में गहरे डूबा हुवा है और वह अपने नीति-कुशल सचिवों से कुछ वार्तालाप कर रहे हैं उनकी कातर दृष्टी ऐसी आभास दे रही थी ।। 

जनु बिधि सकल सदगुन सकेरे । तिन्ह धर्म मूरति कृति केरे ।। 
दरस भरत सरूप अभिरामा । हनुमत तिन्ह सों किए प्रनामा ॥ 
मानो विधाता ने समस्त सद्गुणों के संकलित कर उन धर्म -मूर्ति भरत की रचना की हो । उनका ऐसा अभिराम स्वरुप देखकर महाबली हनुमान फिर उनके सम्मुख प्रणाम अर्पित किये ॥ 

दरसटी अतिथि ठारि निज ठौरे । उलसित उरस कलस कर जोरे ॥ 
कौन तुम अगंतुक पूछेईं । तब हनुमत निज परचइ देईं ॥ 
भरत ने देखा जब उस अतिथि सारूप को देखा तब वह अपन स्थान पर खड़े हो गए और उल्लसित ह्रदय से हस्त मुकुल योगित कर पूछा हे आगंतुक तुम कौन हो ? तब वीर हनुमंत ने अपना परिचय दिया ॥ 

जान तिन लखि अस भरतांबे । डूबतइ मनहु तृन अवलम्बे ॥ 
बोलेइ पुनि  त्वं स्वागतम । अहहि कुसलई कहौ भात मम ॥ 
उनका परिचय प्राप्त कर राजा भरत के लोचन ऐसे दर्श रहे थे मानो में डूबते को तिनके का सहारा था ॥ फिर वे बोले हे हनुमंत आइये आपका स्वागत है कहो मेरे भ्राता कुशल से तो हैं ? 

नयन घन आलबाल ,भरे ह्रदय भरत जनेस । 
घारत नीरज माल, बलीमुख कंठ कलित किए ॥  
 नयनों में गहन मेघ लिए फिर राजा भरत करुणार्द्र हो कर  बलीमुख श्री हनुमंत के कंठ को अश्रु बिंदुओं की मुक्तिक मालाओं से विभूषित किया  ॥ 

सोमवार, ०९ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                                   


भाव प्रबन कपि भरत निहारे । बोलेइ अस बरे अश्रु हारे ॥ 
लखमन सहि तव राम पधारे  । बिरह जरन जिमि सुधा फुहारे  ।। 
वानरराज भावुक होते हुवे भारत को निहारने लगे । उस अश्रु  के हार का वरन कर फिर विरह जलन में अमृत सींचते हुवे उन्होंने ऐसे वचन कहे : - हे भरत तुम्हारे राम, लक्ष्मण सहित पधार रहे हैं ॥ 

सुनत भ्रात आवन संदेसे । भए हर्षित कुल दीप दिनेसे ॥ 
कहि प्रभु उदंत लावनहारे । का प्रनिधानउँ कर तुम्हारे ॥ 
भ्राता के आगमन का सन्देश सुनकर सूर्यवंश के दीपक राजा भरत हर्षित होकर कहने लगे : -- श्री राम के आगमन का सन्देश लानेवाले हे हनुमंत ! मैं तुम्हें क्या अर्पण करूँ ॥ 

अस न सँजोउ को मम पाहीं । जे प्रिय उदंत के प्रति दाहीं ॥ 
तुम मम पर जो किरपा कारे । जिउ लग रहहुँ किंकर तुहारे ।
मेरे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो इस समाचार का प्रतिदान हो ॥ यह सन्देश सुनाकर तुमने मुझ पर जो कृपा की है उसके प्रतिफ में मैं जीवन भर तुम्हारा दास रहूंगा ॥ 

प्रभु आवन कथन जब करनन पाए । प्रमुदित उदित सब धावत आए ॥
बिरध सचिव सह बसिष्ठ महरिषि। लिए अर्घ द्रोन आए कर हरषि ॥
पुरवासियों ने जब प्रभु के आने की बात सुनी तो वे उठ उठ कर दौड़े चले आए ॥ वृद्ध साचोवों के साथ महर्षि वशिष्ठ भी दोनों हाथों में अर्घ पात्र लिय हर्षित होते हुवे चले आए ॥ 

हनुमत जी दरसाए पथ, चलि सब मंगल गात । 
तबहि भरत लोचन लखे, राम मनोहर आत ॥ 
और महावीर हनुमान के दर्शाए हुवे पथ पर सभी पुर वासी एवं मुनि गण मंगलगान करते चले ।  तभी भरत की दृष्टि ने परम मनोहर भगवान श्रीराम को देखा ॥ 

मंगलवार, १ ० दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                 

लखमन सोहत बाम बिराजे । सिय दाहिन प्रभु बिचवइ साजे ॥ 
भेस मुनिस धर मुख अवसादे । दरसै प्रभुहू भरत पयादे ॥ 
लक्ष्मण बाईं और विराजते हुवे शोभित हो रहे थे माता सीता दीहिनी ओ प्रभु श्री राम स्वयं मध्य में शोभा दे रहे थे ॥ वल्कल वेश शीश पर जटा मुकुट धारण किये तथा मुख पर अवसाद लिए राजा भरत को भी श्रीरामचन्द्रजी ने पयादे ही आते देखा ॥ 

तिन्ह के सन सचिवन्ह देखे । तासु तनहु मुनि रूपन रेखे ॥ 
तेहु निरंतर तापस किन्हें । यहु कर काया कृष करि लिन्हें ॥ 
साथ ही उनके सचिवगण को भी देखा । उन सचिवों ने भी अपने राजा के सदृश्य मुनि के जैसा ही वेश धारण कर रखा था ।  वे भी निरंतर तप का आचरण करते थे इस कारण उनकी काया भी अत्यधिक दुर्बल हो गई थी ॥ 

दरसत दुर्गति भरत नरेसे । भए रघुबर के मनस कलेसे ॥ 
नयन पतिका पलक हिंडोले । रिसत निलय दुइ जलकन दोले ॥ 
भरत कि ऐसी दुर्दशा को देखकर श्री रघुवीर के मन में अत्यधिक पीड़ा हुई उनके नयन पकि पत्रिका -पलक के झूलों पर हृदय से रिस कर जल के दो कण झूलने लगे ॥ 

चिंतत प्रभु पुनि बोलन लागे । देखु दसा का कारि अभागे ॥ 
अस बनचर धरे न हम लोगे । जैसेउ भरत के जी भोगे ॥ 
(भरत कि इस अवस्था को देखकर )फिर प्रभु श्रीराम चिंतित होकर कहने लगे देखो राजाओं के भी राजा महा बुद्धिमान दशरथ के अभागे पुत्र भरत ने अपनी क्या दशा कर ली है ।  जैसे दुःख मेरे वियोग के कारण इस भरत के अंतस ने भोगा, वैसे दुःख  हमने वन में विचरण करते हुवे भी नहीं भोगे ॥ 

उत भरत के हस्त बढ़े  ,इत रघुबर के पाँउ । 
रमा रमन अनुसरन किए, प्रगसत आदर भाउ ॥  
उधर भारत के हस्त कमल बढ़े इधर श्री रघुवर के चरण बढे । रमा आदर भाव प्रकट करते हुवे अपने प्रिय का अनुशरण कर रही थीं ॥ 





----- ॥ दोहा-पद ॥ -----

 छाप तिलक --- हजरत अमीर खुसरो 

रूप संपद लै लीन्ही रे! सारी रैना जगाई के..,
भए धनी मानी मोरे साँवरिया.., 
धनवारी कह कर चीन्ही रे! सारी रैना जगाई के.., 
हिरनई कंठी संकास कलईयाँ.., 
नैन तिजूरी धरि तीन्ही रे! सारी रैना जगाई के.., 
हाय रे हरजाई सरूप सोहागा.., 
हिरन सुरंगिनी कीन्ही रे! सारी रैना जगाई के..., 
लवनाई जोबन, लड़ लड़ मोतिया.., 
लड़बावरिया ने छीन्ही रे ! सारी रैना जगाई के.....