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Monday, 21 July 2025

----- ॥ दोहा-पद॥ -----,

 जो लिख दोइ बात कहें सो सब संत कहाए ।

करना है हम आपको जेतक जो करि जाए ॥१|| 

:- ये लिखी कही दो बातें सभी संतों की वाणी हैं हम और आप जितना जो हो सके उन्हें उतना करके अपने जीवन को कृतार्थ कर सकते...

को संत को बात कहे, कहे संत बत कोइ ।
कही बात हम कर सकै,जासों जेतक होइ ॥२|| 
:-- किसी संत ने कोई बात कही तो किसी संत ने कोई संतों के कहे इन सद्वचन का अधिकाधिक अनुशरण करके हम अपने जीवन को धन्य कर सकते हैं.....

जलम् अन्नम् सुभाषितम्, जो गहे नहिं प्रवाह ।
धरे ढके तिन राखिये, रहे करम के नाह ॥३|| 
:-- अक्षरों की तलवार जब शब्दों की धार धारण करती है तब वह अपने वारों और प्रहारों से जिसे चाहे उसे घाट उतारने में सक्षम होती है.....
:-- यदा अक्षरखड्गः शब्दानां धारं वहति तदा सः स्वस्य आक्रमणैः प्रहारैः च कस्यचित् वधं कर्तुं समर्थः भवति...

पहिले आपा जोग फिर,निज गह देस समाज । 
कही सुनि लिखा पढ़ी न त, होतब सबहि ब्याज॥४|| 
व्याज=छल, धोखा
:-- संत जनों का कहना है:सर्वप्रथम स्वयं का सुधार करके तत्पश्चात निज गृह को सुधारें तो देश समाज में स्वमेव सुधार होगा...

आखर की तलबारि जब धरे सबद की धारि । 
जो वारि प्रहारि सो जिन चाहे घाट उतारि॥५|| 
:-- अक्षरों की तलवार जब शब्दों की धार धारण करती है तब वह अपने वारों और प्रहारों से जिसे चाहे उसे घाट उतारने में सक्षम होती है.....

बड़े कपोले थाप दिए, छोटे दिए अपकारि।
साधौ जाए उपदेसिए, दूर दिरिस के द्वारि।।५|| 
:-- बड़ों के सम्मुख उपदेश कहो तो गालों पर थपकी देकर कहते अच्छा हमको उपदेश? तुम्हारे कान पकड़ कर हम ही लाते थे! छोटे इनकी अवहेलना कर देते हैं बेचारे सद्वचन भी क्या करें वह दूरदर्शन को कह देते हैं.....

जंगल ताके बाप का, जो हो सत्ताधीस ।
न मेरा न आपका यह, लोक तंत्र की रीस॥६|| 
:-- जंगल उसके बाप का है जो सत्ताधीश हैं.....जंगल मेरा न आपका.....वस्तुत:यह एक लोकतंत्र विरोधी विचार है.....- वनं तस्य पितुः यः शासकः अस्ति.....











----- ॥ दोहा-पद 38॥ -----,

 देस बिसराए निज ग्रन्थ निज को निज देशज की कही | 

पर रीत बरे बिसरे जो निज भू रज की रीत रही || 

रहिअ ताहिं सुरत सदा जो यदा कदा कहँ आन मही | 

देस कही कि को आन कही सोइ मानिए जोइ सही | 

:-  अपने देश अपने ग्रंथ अपने देश वंशियों के कथन विस्मृत हो चले हैं पराई परम्पराओं का वरण कर अपनी जन्म भूमि के रज की रीतियाँ तिरोहित हो गई किसी विषय विशेष पर केवल उन्हीं कथनों का  रीतियों का संस्मरण कहा जाता है जो निज मातृभूमि से अन्यथा यदा कदा कही व् निर्वहन की गई हों देश की हों अथवा देशांतर की, उपयुक्त कथनोक्तियाँ व  पारम्परिक रीति ही सर्वमान्य हों..... 


Wednesday, 16 July 2025

----- ॥ दोहा-पद 37॥ -----,

धृर्त कृत सद चरित सौं करिआ जबहि बिहार |

उड़त धूर ते धूसरित होत तब संस्कार || 

:--वंचक व कुचरित्र जब सद्चरित्रों के संग विचरण करते हैं तब इस विचरण से उड़ते धूल रूपी कुविचारों के प्रभाव से संस्कार धुंधले होते चले जाते हैं 

अजहुँ भयउ भंड भंडरिए  भाँडन की भरमार |

ता सोंहि संस्कारि गुन पड़िआ जाइ भँगार || 

:-- वर्तमान में निर्लज्ज अनिष्ट की व्यंजना करने वाले उपद्रवियों की बहुलता हो गई है जिनके द्वारा संस्कारों से प्राप्य सद्गुणों का निकृष्ट वस्तु के रूप में पतन हो रहा है 

अपवचन सन दुर्वादन  हृदय के उदगार | 

अंतर की दुर्वासना तासों करत बहार || 

:-- अपशब्द के सह कुत्सित वाक्य ह्रदय के उद्गार स्वरूप होते हैं जिनके माध्यम से अंतर की कुप्रवृत्ति बहिर्गत होती  हैं | 

दुर्बचन एहि दुर्बादन कहत बुराई नाह | 

जबहि हँसी बिनोद करत  रीति रूप निरबाह ||

: - -ये अपशब्दों व दुर्वाद तब निंदनीय नहीं होते जब यह हंसी विनोद स्वरूप पारम्परिक रीतियों के निर्वहन हेतु होते हैं | 

पढ़िए तुलसी मानस में दुर्बादन की रीत | 

सामध सबंधी संगत तासों गाढ़े प्रीत || 

: - - गोस्वामी तुलसी दास रचित रामचरित्र मानस में इस दुर्वादन की मधुर रीति का वर्णन है यह समधीयों के परस्पर संबंधों की प्रगाढ़ता हेतु इस परम्परगत रीत का प्रयोग होता आया है 

जेँवत जेँउनार जौँ जौँ धर मुख सौंधी सोंठ | 

पुर नारि उदगारि गान  करत सजन के गोंठ || 

:--प्रीति भोज्य ग्रहण करते व सुगंध सौंठ इत्यादि मुखोधार्य करते ज्यों ज्यों सज्जन गोष्ठी की रीत परिपूरित  होती है त्यों त्यों पुर की नारियों द्वारा सज्जनों के विनोद स्वरूप उद्गारों का गान किया जाता है | 

कब किया जाता है ये तो पता नहीं............  यही तो रामायण है..... जिसे जानना है वो सुन लें..... 





"साहित्य वही है जिसे पीढ़ियां पढ़ें अन्यथा तो वह पुस्तकालयों में धूल धूसरित होते पृष्ठों का पुला है....."

Monday, 14 July 2025

----- ॥ दोहा-पद 37॥ -----,

 अधुनै भारत बंसि का जातिअ धर्म समाज | 

अर्थाधारित होइ रहा तीनि बरग में भ्राज ||  

: -- विद्यमान भारत वंशियों का जातिक व धार्मिक समाज आर्थिक आधार पर त्रयवर्ग  स्वरूप में सुशोभित हो रहा है | 

मध्यम ऊँच अबराबर तीन बरन तिन जान | 

सुखद दंपति जीवन ते मध्यम अति सुखवान ||

: - उन्हें उत्तम मध्यम व् अन्य यह तीन वर्ण में संज्ञानना चाहिए इनमें मध्यम वर्ग सुखद दाम्पत्य जीवन सूत्र को धारण सर्वाधिक सुखी व् प्रसन्न है 


सुखद दम्पति सामाजिक जीवन का आधार | 

ऊँचे अबर दुख पाँवहि ता सुख को परिहार || 

:-- वस्तुत: सुखद दाम्पत्य का जीवन सूत्र किसी समाज का आधार स्वरूप है आर्थिक रूप से उत्तम व् अन्य वर्ग इस सुख का परित्याग कर दुःख को प्राप्त हो रहे हैं.....  

सुखद दम्पति जीवन को ऊँचे बिरथा मान | 

भोग उपभोग भूरिसह कह भव भूति प्रधान || 

:-- सुखद दाम्पत्य जीवन को व्यर्थ मानकर आर्थिक रूप से संपन्न उच्च वर्ग द्वारा कहा जाता कि संसार के भोगों के  अधिकाधिक उपभोग में जीवन की सार्थकता है 

जीवन में धन सम्पदा सुख कर मान अधान |

तासहुँ इर्षा करत सो  बरन आन सुखवान || 

: -- जीवन में धनसम्पति को सुख का आधार मानकर यह जब तब  उन अन्यान्य वर्गों के सुखमय जीवन से इर्षा करता है 

दुपहिया भी मध्यम वर्ग के जीवन का आनंद स्वरूप हैकिन्तु यह वर्ग इस सुख से अनभिज्ञ है मध्यम वर्गीय जीवन के इस आनंद से प्राय: लब्धप्रतिष्ठित वर्ग कुढ़ता व् इर्षा करता दर्शित होता है 

मध्यम वर्ग के इस आनंददायी दृश्य को दर्शाती यह रचना है जो "जादू भरी तेरी आँखें"भजन की लय पर राग दरबार पर आधारित है.....


फुर फुर करतीँ रे चली दुपहिआ...
(सखि)लागहि पिय को भली दुपहिआ.....

कास पकड़ जब उनके गाछे l लाए हिया हम बैंठे पाछे ll 
गाल फुलाए मुख लेय मोड़े l सौतनिया सी जली दुपहिआ ll

जोइ पिया भैं कृष्ण कन्हया ।हम राधे बनि गहि गल बहियाँ ॥
करत बतइँया चित चौँरएँ तो । गोपियन सी मचली दुपहिआ ॥

रूसत ठाढ़े जब मन आवै । मनवावै बन बन बिगरावै l 
छुई मुई हम सोही ऐसी l नही दुबरी पतली दुपहिआ ॥

एक दिन पिय सों ए पूछ बुझाए। किन्ह कारन तुम ओहि पतियाए ll
हम को पता ए ऐसी तो नाए । है मिसरिन की डली दुपहिया ॥

तुमको पल महि छिन लए दौड़े l तिनका तोड़े छन नहि छोड़े ll 
कहो तो पिया है का काची l कचनारन की कली दुपहिआ ll

भइँ गौरँगनी बलि बलि हारी । सो कलि हारी मन करि कारी।
न जाने सखि कवन भवनन मैँ । तिन्ह संग रँग रँगरली दुपहिआ ॥

फिर एक दिन

निरखो ए नव नवली दुपहिया... 
हमने ली चमकिली दुपहिआ.....

है ये सौतनिआ की जाई।ओहि केहि सों गई पराई ॥
हँसि कह पिय हमरे ललन की ।और लली कीअली दुपहिआ॥













 

Sunday, 29 September 2019

----- ॥ दोहा-पद 36॥ -----

  ----- || राग-मेघ मल्हार || -----


बहुर बहुर रे बावरि बरखा, री बहुरयो पावस मास रे,
बिहुरन अबरु बेर न कीज्यो,कहे तव बाबुला अगास रे ||

पिय कर नगरिहि पंथ जुहारै,नैनन्हि लाए थकि गै हारे,
लखत लखत पलकन्हि भइँ पाथर तोर आवन करि आस रे ||

जनम दात कइँ दहरि पराई, जग माहि असि रीति बिरचाई,
हँसि कहँ सखिआँ तिआ सुहावै बासत निज पियहि के बास रे ||

पलक माहि पलकनि भए पाँखी, अरु भैं पंखि उरे दिनु राती,
तोहि बिरमत भए बहु बेरिआ, अजहुँ बहुरो पिय के पास रे ||

भावार्थ : - अरी बावरी बरखा पावस मास लौट गया अब तुम भी लौट जाओ,तुम्हारे बाबुल आकाश कह रहें हैं -अब लौटने में और अधिक विलम्ब न करो || तुम्हारे आने की आस में तुम्हारे प्राणाधार की नगरी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है  पंथ देखते उसकी आँखें शिथिल हो गई और तुम्हारी प्रतीक्षा करते करते उसकी पलकें निश्चल सी हो गई हैं || जन्मदाता की देहली पराई होती है इस संसार ने ऐसी ही रीति बनाई है सखियाँ हंस कर कहती है - स्त्री अपने प्राणनाथ के गृह में निवास कराती हुई सुशोभित होती है || पलकों में पलक पंखों में परिणित हो गए रयान और दिवस पंक्षी बनकर उड़ गए (ऐसा ही होता है ) तुझे पिता के गृह में पधारे बहुंत समय हो गया अब तुम अपने प्रिय के पास लौट जाओ ||
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Saturday, 19 May 2018

----- || राग बैरागी भैरवी || -----

----- || राग बैरागी भैरवी || -----

जगलग ज्योत जगाओ रे, 
चहुँपुर निबिर अंधियार भयो अब रैनी चरन बहुराओ.., 

पंथ कुपंथ मोहि न बूझे, चलेउ कहाँ अजहुँ न सूझे, 
रबि सारथी नियराओ.., 

धरिअ करतल प्रभा प्रसंगा उतरो हे देव रथ संगा.., 
दिसि-बिदिसि अरुनाओ..... 


दिसि -बिदिसि = दिशा व्  दिशाओं के कोण 

Wednesday, 8 March 2017

----- ॥ सेंदुरी रंग -धूरि ॥ -----

उरियो रे सेंदुरी ऐ री रंग धूरि, 
पलहिं उत्पलव नील नलिन नव जिमि जलहिं दीप लव रूरि । 
ललित भाल दए तिलक लाल तव तिमि सोहहि छबि अति भूरि ॥ 

हनत पनव गहन कहत प्रिया ते अजहूँ पिय दरस न दूरि । 
करिअ बिभावर नगर उजागर  सजि बेदि भवन भर पूरि ॥ 

तरहि पटतर परिहि अम्बारी मनियरी झालरी झूरि । 
बंदनिवार बाँधेउ द्वार धरि चौंकिहि चौंक अपूरि ॥ 

आगत जान बरु सुमुखि सुनयनि गावहि सुभगान मधूरि । 
सगुन भरि थार करिहि आरती करि मंगलाचार बहूरि ॥ 

चली मंजु गति प्रिया पियहि पहि अरु छूटहि कुसुम अँजूरि । 
जलज माल जय कलित कंठ दय नत सीस चरन रज पूरि ॥ 





Monday, 6 March 2017

----- ॥ सेंदुरी रंग -धूरि ॥ -----


उनिहौ रे सेंदुरी ऐ री रंग धूरि 
पलहि उत्पलव नील नलिन नव जिमि जलहि दीप लव रूरि । 
तरु तमाल दए तिलक भाल तव तिमि सोहिहि छबि अति भूरि ॥ 

बिभौ बदन घन स्याम सुन्दर सिरौपर पँखी मयूरि । 
पहिरै सुरुचित पीत झगुरिया धरि मधुराधर बाँसूरि  ॥ 

बजति भली करधन छली करी कर कंकनि सँग केयूरि ॥ 
कल धुनि करत भाँवरि भरत जबु थिरकत चरन नुपूरि ॥ 

घुटरु घटि बँट काँछ कटि तट पटिअरि धूपटि अपूरि । 
गिरियों लटपटि त उठि कपटि कह लपटि आध अधूरि ॥ 

पाउँ परस करि लीज्यो दरस न त इन्ह कर दरसन दूरि ॥ 

Friday, 3 March 2017

----- ॥ रंग -धूरि ॥ -----


उरियो नहि सेंदुरी ऐ री रंग धूरि 
कुञ्ज गलिअ  कर कुसुम कलिअ यहु अजहूँ न पंखि अपूरि  ॥ 
कहइ बिसुर बल बल गल बहियाँ  ओहि जोरे अंज अँजूरि ॥ 

अंक ही अंक गहि पलुहाई मैं कल परसोंहि अँकूरि  ॥ 
एहि मधुबन रे मोरे बाबुल इहँ बिहरिहु धरे अँगूरि ॥ 

चरनहि नुपूर सिरु बर बेनी, कानन्हि कंचन्हि फूरि ॥ 
बोलहि मिठु जिमि चाँचरि बोलै अरु तुम अति करर करूरि ॥ 

निरखहि नीरज नयन झरोखे तुम रंज न देहु बिंदूरि ॥ 
दय घटा घन छटा मन मोही न त दमकिहि दमक बिजूरि ॥ 

मन चन्दन मुख मनियरचन्दा बालिपन बिहुर नहि भूरि ॥ 
फेरी भँवर कतहुँ फिरजइयो इहँ अइयो कबहुँ बहूरि ॥ 


Thursday, 23 February 2017

----- ॥ फाग ॥ -----

धरे रुरियारे रंग, बन फिरिति पतंग,  दए फगुनिया पुकारि के होरी में..,
मनि मोतियाँ ते भरी बलपरी फूरझरी छरहरी डोरी डार के होरी में..,

रंग लाल लाल बिहंग लाल लाल,
गगन गगन उरति पतंग लाल लाल, 

बूझती अली अली उरि चलि गली गली सखी कलियाँ सँवार के होली में..,
कहँ छुपे मनहरिया  केसरिया साँवरिया  दुअरिया ढार के होरी में..,

अहो चाले है मराल कनक केसरी करताल,
स्याम राग संग धरे रंग थाल थाल, 

घुँघरी घरी घर्घरी कटि धरी गहन घाघरी घार के होरी में..,
सुठि भृकुटि तरेर ठकि मुख तीन सेर दे मीठी मीठी गार के होरी में..,

अहो झाँझरि जड़ाऊ बाँधे पाँउ पाँउ, 
झनक झनक झुमरि बजे है गाँउ गाँउ,

रूपु हरी रूपु भर हे री हेरि घर घर घेरि चौंक चौबार के होरी में
सबु नगर ढिंढोर करी बुँदौरी को घोर भर भर पिचकार के होरी मे..,

अहो भाँवरि भरत तिरत डोल डोल, 
करत निरत थिरत थाप दे ढोल ढोल,   

आयो द्वारिका को नाथ
ग्वाल बाल साथ 
मोर मुकुट माथ 
अधरन पे बंसरी सँवारे.....
                      ---- ॥ राग मारवा, बसंत ॥ ----- उड़ री रंग धूरि चहुँ पासा,
बादिहि बादन बृन्दु अगासा । उड़ री रंग धूरि चहुँ पासा ॥ 
फूरहि फूर पंखि दल पूरे । बासहि बास बसंत सुबासा  ॥  
बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस रास बिलासा ॥ 
सरसि सरसई सरिरुह सौंहैं ।सरित सरोजल कह उछ्बासा ॥ 
दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन प्रभाकर भास बिभासा ॥ 
घोरिहि घन रस बन रस राजा । कर महु कर धर करिहु कुहासा ॥  
बहुरी बदरि बहुर बदराई । बहुरि बदरि न बहुर चौमासा ॥ 
कर्पूर गौर बौरि अमराई । हरिअर हरिअर हरिअर बासा ॥ 
कोयरि कोयरि कूजत बोलहि । पालौ पालौ पलहि पलासा ॥  
चटक छटा फर जीर जँबीरी । झलहिं चँवर सों जौर जवासा ॥ 

Thursday, 4 August 2016

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

घनक घटा गहराए जिमि भोर लखइ नहि भोर । 
झूलए झल जल झालरी मुकुताहल कर जोर ॥ 

बारि बरसात डारि डारि फुर पात अँगना अमराई फरे |  
जर नूपुर गुँजात थरी थरी देखु सखि हरि हरु रँग भरे || 
खेह खेह भए कनक देह ससि कनि कर मनि मोतिया धरे | 
कंठि माल कटि करधनिया जिमि धरनि के  कर कँगना परे || 


भावार्थ : - हे सखी ईश्वर जलवर्षा कर रहे हैं जिससे डाल-डाल पर पुष्प-पत्र पल्ल्वित हो उठे आँगन की अमराइयाँ फलीभूत हो गईं | जल रूपी नूपुर का मधुर गुंजन करते हुवे ईश्वर ने प्रत्येक स्थली को हरे रंग से भरकर हरिण्मय कर दिया है | अन्न- कणिकाओं के मणि मोतियों को धारण किये खेत की देह मानो स्वरणमयी हो गई है ( अथवा गेहूँ से परिपूर्ण हो गई है ) इन स्वर्णमय खेतों से ऐसा प्रतीत होता है मानो  कंठ-माल, करधनी, कंगन धारण कर धरती ने श्रृंगार किया हो | 

Wednesday, 13 April 2016

----- ॥ गीतिका ॥ -----

----- ॥ गीतिका ॥ -----
हरिहरि हरिअ पौढ़इयो, जो मोरे ललना को पालन में.,
अरु हरुबरि हलरइयो, जी मोरे ललना को पालन में., 

बिढ़वन मंजुल मंजि मंजीरी, 
कुञ्ज निकुंजनु जइयो, जइयो जी मधुकरी केरे बन में..... 

बल बल बौरि घवरि बल्लीरी,
सुठि सुठि सँटियाँ लगइयो लगइयो जी छरहरी रसियन में.....

 पालन में परि पटिया पटीरी, 
बल बल बेलिया बनइयो बनइयो जी मोरे ललना के पालन में..... 

दए दए उहारन ओ री अहीरी, 
सुरभित गंध बसइयो बसइयो जी मोरे ललना के पालन में.....


हरिहरि हरिअ  = धीरे से 
हरुबरि = मंद-मंद 
बिढ़बन = संचय करने 
मंजि-मंजीरी = पुष्प गुच्छ, कोपलें पत्र इत्यादि 
मधुकरी केरे बन = भौंरो के वन में- मधुवन 
बल बल बौरि घवरि बल्लीरी =  आम के बौर से युक्त लतिकाएं । बढ़िया से गुम्फित कर 
पटिया पटीरी =चन्दन की पटनियाँ 
बल बल बेलिया = घुमावदार बेलियां 
उहारन = आच्छादन 
अहीरी = ग्वालन 

हरिहरि हरि तर अइयो कौसल्या के अजिरन में 
अजहुँ न बेर लगइयो कौसल्या के अजिरन में 

दए दए उहारन  दए दए बहीरी  , 
सुरभित गंध बसइयो बसइयो जी कौसल्या के अजिरन में.....

बहीरी = बुहारना 

Sunday, 10 April 2016

                                       ----- ॥ सोहर ॥ -----

सखि गाओ री सोहर जी भइने सुअवसर 
कुँअर मनोहर जी सुनु अति सुन्दर दूल्हा बनइयो जी हो, 
                                                    रामा दूल्हा बनइयो जी हो..... 
करधन करधर पाटली परिकर अरु बर बर बसन बसइयो जी हो, 
                                                     रामा बसन बसइयो जी हो.....

कल किरीट कपाला कंकनि माला अरु मनिहर रतन सजइयो जी हो 
                                                     रामा रतन सजइयो जी हो.....

चारु चँवर हलरई सिरु छतर दसई के अरु हरियर तिलक लगइयो जी हो, 
                                                      रामा लगन करइयो जी हो..... 


झीनी झीनी रतिया ओरी चारू चंदनिया,
हरी भरी मनिया अरु धौरी धौरी मुतिया में मनहर पुरट पुरइयो जी हो 
                                                                 रामा पुरट पुरइयो जी हो.....
सो बंदन वारी बांध दुअरिया देहर देहर रचइयो जी हो 
                                        रामा  देहर रचइयो जी हो.....

हरिया चन्देरी अहिबेलि घेरी  निज पटतर पट पहरियों जी हो 
                                         रामा पट पहरइयो जी हो..... 

ताराबरी झलहरी झालरिया जननी के भवन ओरमइयो जी हो 
                                            रामा भवन ओरमइयो जी हो.....


कोई लुटावे लकोहरनु कोई रुपइया 

बाबा भइया ओ मइया अरु बहिनी भुजइया तूम धेनु गैय्यानु लुटइयो जी हो  
                                               रामा धेनु गैय्यानु लुटइयो जी हो.....  

ढोलु हनि पावत मुख संख पुरावत ऐ री मुरलिया बधावा बजइयो जी हो 
                                              रामा मुरलिया बधावा बजइयो जी हो.....

ललना चिरंजीउ हो ललना जुंग जुग जियो कहि कहि हिय हिलगइयो जी हो 
                                                                   रामा हिय हिलगइयो जी हो..... 

चरन जुहारी जो करिहि कुँवर त गोदिया भर घोड़िया चढ़इयों जी हो,   
                                                            रामा घोड़िया चढ़इयों जी हो.....   

बादिहि बादल बृन्दु अगासा । झरिहि झर झर बिंदु चहुँ पासा ॥ 
भर भर कलसि करषि कर देईं । पियत पयस बूझै न पिपासा ॥ 

बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस बरुन निवासा ॥ 
कंठ ताल नूपुर दल पूरे  । गावहि झनक झनक चौमासा ।  

 । हरषित जननी  दियो निकासा ॥ 

दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन सुधाकर करिहि बिलासा ॥ 
कोमल करज जलज जय माला । पहिरावन मुख लवन ललासा ॥ 






----- ॥ सोहागी ॥ -----

हरि हरि कुँअरि पौढ़इयो जी करि पनित पलन में, 
ऐ री हरतरी न फेरइयो जी करि पनित पलन में, 
      
बिढ़वन मंजुल मंजि मंजीरी, 
कुञ्ज निकुंजनु जइयो, जइयो जी मधुकरी केरे बन में..... 

बल बल बौरि घवरि बल्लीरी,

सुठि सुठि सँटियाँ लगइयो लगइयो जी छरहरी रसियन में.....  

 पालन में परि पटिया पटीरी, 

बल बल बेलिया बनइयो बनइयो जी करि पनित पलन में..... 

दए दए उहारन ओ री बधूरी, 

सुरभित गंध बसइयो बसइयो जी करि पनित पलन में..... 


पनित करना =  सगुन हेतु प्रतिज्ञा 
हरतरी न फेरइयो = किए पर पानी न फेरना  
हरिहरि हरिअ  = धीरे से 
हरुबरि = मंद-मंद 
बिढ़बन = संचय करने 
मंजि-मंजीरी = पुष्प गुच्छ, कोपलें पत्र इत्यादि 
मधुकरी केरे बन = भौंरो के वन में- मधुवन 
बल बल बौरि घवरि बल्लीरी =  आम के बौर से युक्त लतिकाएं । बढ़िया से गुम्फित कर गांठ लगाना 
पटिया पटीरी =चन्दन की पटनियाँ 
बल बल बेलिया = घुमावदार बेलियां 
उहारन = आच्छादन 
अहीरी = ग्वालन     
                       

Tuesday, 14 April 2015

----- ॥ दोहा-पद॥ -----



धरा जले धारा जले , जले जले जल धारि । 

जलज जले जलगा जले जले जले जलहारि ॥ 

जलेतन जरेंधन जले जल जल झरे चिँगारी ॥ 
जरख़र धान जरत करे चहुँ पुर हाहाकारि । 


जलगिरि उपल उपल जले जले जले ररिहारि । 
अम्बरतल पलपल जरत कातर रहे निहारी ॥ 

द्रु दल जरे द्रुम दल जलत , करे गहन गोहारि । 
धनबन घन स्याम करे बरसो गगन बिहारि ॥ 

द्रोन कलस साँकल भरे , जर सत सार सँवारि । 
जलधि जरे जलद जल धरे झर झर झर झर झारि ॥ 

Thursday, 2 October 2014

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

              ----- ॥  हे  राम ! ॥ -----

फटिक मनि रचना रचे, जहां न गोकुल धाम ।
सो मंदर  खाली पड़े, बहिर हुए घनस्याम ॥

बिना स्याम का मंदिर भगत नबैद चढ़ाएं ।
भगतिहि  का पाखन करे, मीठे भोग उड़ाएँ ॥

पापी पाप तजे नहीं लाज तजे हे राम ।
सो मंदिर खाली पड़े, बहिर हुए घनस्याम ॥

जिन उद्यमि के कुल माता, निर्दय खूंटि बँधाए ।
ऐसे कलंकी कुल को, चाँद पे छोड़ आएँ ॥

बहुरि रैन देखो तिन्ह दूरबीन कर थाम ।
सो मंदर खाली पड़े, बहिर हुए घनस्याम ॥

भर भर आपनि झोलि ये हीरे चुन चुन लाएँ ।
बिष्टा निर्मल जल वालि गंगा माहि बहाएँ ॥

इनको कोस कोस के भजन करो अविराम ।
सो मंदर  खाली पड़े, बही हुए घनस्याम ॥

इन अधमी की चिता को निरदै आग लगाए ।
निरदै गौउ पूँछ धरा , नरक द्वारी दिखाए ॥

इनके होवनिहार के राखौ रावन नाम ।
सो मंदर खाली पड़े, बहिर हुए घनस्याम ॥  

Sunday, 23 March 2014

----- ॥ दोहा-पद॥ -----


स्वतंत्रता चिंघाडी, जगि द्रोह की ज्वाल । 
चमक उठी फिर अँधियारि, जले चिता में लाल ।१३६५-क। 

स्वत्व यहाँ मेरा कह मुखर हुवा जब मौन । 
सत्ता गर्जि क्या कहा,  बता कि है तू कौन ।१३६५-ख। 

फिर तमक कर बोली सब  यहाँ मेरे नियंत । 
रह भारत मेरा दास तू जीवन पर्यन्त ।१३६५-ग । 

जल जल भस्मी भूत हुए, कितने ही कर्पूर । 
बुझि कितनी दीप शिखाएँ, बुझा न मेरा सूर ।१३६५ -घ । 

रक्त के रज रंजन से, उतरी एक एक बिंदु । 
डूबा रक्तिम सूर उस, लवन बिंदु के सिंधु ।१३६५-ङ। 

मंत्रपटु शव साधन किए, मारे ऐसा मंत्र । 
कसी रही पग बेड़ियाँ, मिला नहीं स्वातंत्र ।१३६५-च। 

हे जन हे जगद्जीवन तू सिंहासन योग । 
व्यवस्था कब तक सहे, आह !तेरा वियोग ।१३६५-छ। 

रक्त-रज = सिंदूर 
रक्त-रंजन = मेहँदी 
रक्तिम = रक्तमय 
लवन बूंद = अश्रु 
मंत्रपटु = तंत्र-मंत्र जानने वाले, तांत्रिक, सेवड़े  
शव-साधन = श्मशान में पर शव पर बाथ कर मंत्र जगां की तंत्र शास्त्रोक्त क्रिया 
जगद्जीवन = जगत क जीवन रूप ईश्वर 

Saturday, 15 March 2014

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

जँह सुमिरन मैं हो मगन, भजमन भगवन नाम । 
भाब भगति में हो लगन, तँह धन के काम ।। 

रचे पद पत पदासीन, सुन्दर सुन्दर ठाम । 
जन जन हो जँह अधिपते, तँह तिनके का काम ।। 

हार अरथ हिय हार, जीतार्थ जन मन जीत ( 'मत' मत जीत)  । 
जग कल्यान अधार, हो जनहित में सब रीत ॥ 
करन जगन उद्धार, सेवापन के कर थाम । 
जँह सुमिरन में हो लगन, भजमन भगवन नाम ॥ 

बर बरासन स्थाप, बिराजे नयन सों दूर । 
धूरे धूरे आप, भगवन भरि धूरिहि धूर ॥ 
प्रभुवन निलयन  ताप,तू सीतल सीतल श्राम । 
भाव भगति मैं हो लगन, तँह तिनके का काम ॥ 

बाहिर घन अँजोर, अंतरतम घन अंधेर । 
बाहिर पलक पछोर, अंतर मह मल के ढेर ।। 
कुल नामावलि छोर, धारे निज सौ उपनाम । 
भाव भगति मैं हो लगन, तँह तिनके का काम ॥ 

पलक पछोर = जिसके धूल के महीन कणों को पलकों से झाड़ा जाए उसे पलक पछोड़ कहते हैं 

Sunday, 16 February 2014

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

----- || राग -बसंत || -----
पूस रथ हेमन हिमबर, बिदा कियो हेमंत ॥ 
आयो राज बसंत सखि, छायो राज बसंत ।। 

नौ पत फल नवल द्रुमदल भइ रितु अति रतिबंत । 
आयो राज बसंत सखि, छायो राज बसंत ।। 

पील नील नव नारंजी , केसरियो हरि कंत । 
आयो राज बसंत मन भायो राज बसंत ॥ 

गाजत घन गगन महि घन रागए राग दिगंत | 
आयो राज बसंत मन भायो राज बसंत ॥ 

नारद सारद सेष श्रुति सुर मुनि संत महंत । 
गायो राग बसंत सखि आयो राज बसंत ।। 

सारंगी संग सिंगार, रुर सुर सात सुबंत । 
गायो राग बसंत सखि छायो राग बसंत ॥ 

कास कोनिका कैसिका , कल बीना के तंत । 
गायो राग बसंत सखि छायो राग बसंत  ॥ 

बृंदाबन बेनु बोलत , बादहि बादन यंत । 
गायो राग बसंत सखि छायो राग बसंत ॥ 



जल नुपूर रुर फुर संग, रकत कंठ अलि रंत । 
गायो राग बसंत मन भायो राग बसंत ॥ 

शोख शिफक अबीर अबलक, चिरक फ़लक (तलक )पर्यन्त । 
खेलए फाग बसंत आ हेलए फाग बसंत ॥ 

राग ललित परिपाटलित, छिरक गगन परजंत । 
खेललि फाग बसंत हेललि फाग बसंत ॥ 

लाल ललितक गाल ललित, लै रस लस रसवंत । 
खेलए फाग बसंत सखि मेलए फाग बसंत ॥ 

पूस रथ हेमन हिमबर, बिदा कियो हेमंत ॥ 
आयो राज बसंत सखि, छायो राज बसंत ।। 

भाल ललामिक लाल ललामिक लसत मुख रजत जयंत । 
लायो सौहाग बसंत मन भायो सौहाग बसंत ॥ 







                                               क्रमश: 

Thursday, 6 February 2014

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

गठ गढ़ो बड़ो सोहनों हार, प्रभो जी थारो पइयाँ धरूँ । 

पइयाँ धरूँ थारी बिनति करूँ । प्रभो जी थारो पइयाँ धरूँ ॥ 
मारो धरन करो स्वीकार । प्रभो जी थारी पइयाँ धरूँ ॥ 

पाँच सबद धुनि मंगल गावै । सुहा सुभग सुभ सगुन सुहावै ॥ 
कहै जनक जनेत जै जुहार । प्रभू जी थारी पइयाँ धरूँ  ॥ 

चुन चुन पतियाँ सकल सँजोई । लग दिनु रतियाँ सूत पिरोई ॥ 
गुंफ गुंफ गच गाँठी सँवार । प्रभो जी थारो पइयाँ धरूँ ॥ 


हाथ कंगनियाँ, करनन फूले । पाँउ पजनियाँ रुर रमझूले ॥ 
सजी सिय सोलहो सिंगार । प्रभू जी थारी पइयाँ धरूँ ॥ 

रुचि रुचि छापन भोग बनायो । पयसन सोरन संग सजायो ॥ 
रची रुचि रसबती जेवनार। प्रभो जी थारो पइयाँ धरूँ ॥ 

Wednesday, 1 January 2014

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

आयो दुआरि नौ बरस, पुरान लेइ बिदाए । 
करत सुवागत बाट-बन, पाँवर पलक बिछाए । १ । 

तरुनई अरुन किरन सों, चारुहु चरन रचाइ  । 
कूल कूलिनी निरत रत, रमझौरे खनकाइ  ।२ । 

ढोल मजीर सन झाँझरि, नद्पत संख बजाए । 
सुर गाँऊँ सिंगार कर, रागिनि मंगल गाए ।३। 

चित्ररथी चितकारी किए, पथ पथ चौंक पुराए ।
मंडप मंडित मंच पर, मंजरिया डुलियाए ॥ 

पुहुप सेखर करज धरे,दुलनिया सी लजाइ  । 
सौंधी सौंधी पुरबाइ, अगुवानी सरनाइ  ।५। 

पाँवर = देहली 
चारू = कुमकुम 
रामझौरे = घुंघरू,नुपूर 
निरत = नृत्य 
चित्ररथि = सूर्यदेव 
मंजरी : छोटे छोटे पुष्प गुच्छ 
पुहुप शेखर = पुष्प माला 
अगुवानी सरनाए = स्वागत हेतु आगे आना 


   -----॥ प्रनय पाती ॥ -----
प्रथम किरन गहे नौसर, नौ नौ भूषन भेस । 
लेखे नवल बत्सल को, नभ आवनु संदेस ।१। 

भाव भरे पंगत निलय, अंतर किये प्रबेस । 
प्रनुत प्रनय निवेदन किए, लाज लहत लवलेस ।२।  

कथन गहन अलंकृत हो, अभरित नौ गनबेस । 
कहत प्रिया पथ जोग रहि ,पिय तव प्रतिसंदेस ।३।   

अंतर आखर सुघर लिख, स्वागतम सुभ सेस ।
पल मह पाटल पुहुप की, रख पाँखुरियाँ पेस ।४ ।  

दु बरन लिख कहि आपकी , नाम लिखा निज केस । 
पातिहि ऊपर जोग लिखे, नव अम्बर के देस ।५। 

नौसर = ओस की बिंदुओं का लड़ियों का हार 
वत्सल = वर्ष 
निलय =ह्रदय 
प्रनत = अंतर आख्यान में 
गणवेश = समूह भूषा  
प्रतिसंदेस = प्रतिउत्तर में 
पातळ = गुलाब 
पेस =कोमल 
केस = किरण