जो लिख दोइ बात कहें सो सब संत कहाए ।
करना है हम आपको जेतक जो करि जाए ॥१||
जो लिख दोइ बात कहें सो सब संत कहाए ।
करना है हम आपको जेतक जो करि जाए ॥१||
देस बिसराए निज ग्रन्थ निज को निज देशज की कही |
पर रीत बरे बिसरे जो निज भू रज की रीत रही ||
रहिअ ताहिं सुरत सदा जो यदा कदा कहँ आन मही |
देस कही कि को आन कही सोइ मानिए जोइ सही |
:- अपने देश अपने ग्रंथ अपने देश वंशियों के कथन विस्मृत हो चले हैं पराई परम्पराओं का वरण कर अपनी जन्म भूमि के रज की रीतियाँ तिरोहित हो गई किसी विषय विशेष पर केवल उन्हीं कथनों का रीतियों का संस्मरण कहा जाता है जो निज मातृभूमि से अन्यथा यदा कदा कही व् निर्वहन की गई हों देश की हों अथवा देशांतर की, उपयुक्त कथनोक्तियाँ व पारम्परिक रीति ही सर्वमान्य हों.....
धृर्त कृत सद चरित सौं करिआ जबहि बिहार |
उड़त धूर ते धूसरित होत तब संस्कार ||
:--वंचक व कुचरित्र जब सद्चरित्रों के संग विचरण करते हैं तब इस विचरण से उड़ते धूल रूपी कुविचारों के प्रभाव से संस्कार धुंधले होते चले जाते हैं
अजहुँ भयउ भंड भंडरिए भाँडन की भरमार |
ता सोंहि संस्कारि गुन पड़िआ जाइ भँगार ||
:-- वर्तमान में निर्लज्ज अनिष्ट की व्यंजना करने वाले उपद्रवियों की बहुलता हो गई है जिनके द्वारा संस्कारों से प्राप्य सद्गुणों का निकृष्ट वस्तु के रूप में पतन हो रहा है
अपवचन सन दुर्वादन हृदय के उदगार |
अंतर की दुर्वासना तासों करत बहार ||
:-- अपशब्द के सह कुत्सित वाक्य ह्रदय के उद्गार स्वरूप होते हैं जिनके माध्यम से अंतर की कुप्रवृत्ति बहिर्गत होती हैं |
दुर्बचन एहि दुर्बादन कहत बुराई नाह |
जबहि हँसी बिनोद करत रीति रूप निरबाह ||
: - -ये अपशब्दों व दुर्वाद तब निंदनीय नहीं होते जब यह हंसी विनोद स्वरूप पारम्परिक रीतियों के निर्वहन हेतु होते हैं |
पढ़िए तुलसी मानस में दुर्बादन की रीत |
सामध सबंधी संगत तासों गाढ़े प्रीत ||
: - - गोस्वामी तुलसी दास रचित रामचरित्र मानस में इस दुर्वादन की मधुर रीति का वर्णन है यह समधीयों के परस्पर संबंधों की प्रगाढ़ता हेतु इस परम्परगत रीत का प्रयोग होता आया है
जेँवत जेँउनार जौँ जौँ धर मुख सौंधी सोंठ |
पुर नारि उदगारि गान करत सजन के गोंठ ||
:--प्रीति भोज्य ग्रहण करते व सुगंध सौंठ इत्यादि मुखोधार्य करते ज्यों ज्यों सज्जन गोष्ठी की रीत परिपूरित होती है त्यों त्यों पुर की नारियों द्वारा सज्जनों के विनोद स्वरूप उद्गारों का गान किया जाता है |
कब किया जाता है ये तो पता नहीं............ यही तो रामायण है..... जिसे जानना है वो सुन लें.....
"साहित्य वही है जिसे पीढ़ियां पढ़ें अन्यथा तो वह पुस्तकालयों में धूल धूसरित होते पृष्ठों का पुला है....."
अधुनै भारत बंसि का जातिअ धर्म समाज |
अर्थाधारित होइ रहा तीनि बरग में भ्राज ||
: -- विद्यमान भारत वंशियों का जातिक व धार्मिक समाज आर्थिक आधार पर त्रयवर्ग स्वरूप में सुशोभित हो रहा है |
मध्यम ऊँच अबराबर तीन बरन तिन जान |
सुखद दंपति जीवन ते मध्यम अति सुखवान ||
: - उन्हें उत्तम मध्यम व् अन्य यह तीन वर्ण में संज्ञानना चाहिए इनमें मध्यम वर्ग सुखद दाम्पत्य जीवन सूत्र को धारण सर्वाधिक सुखी व् प्रसन्न है
सुखद दम्पति सामाजिक जीवन का आधार |
ऊँचे अबर दुख पाँवहि ता सुख को परिहार ||
:-- वस्तुत: सुखद दाम्पत्य का जीवन सूत्र किसी समाज का आधार स्वरूप है आर्थिक रूप से उत्तम व् अन्य वर्ग इस सुख का परित्याग कर दुःख को प्राप्त हो रहे हैं.....
सुखद दम्पति जीवन को ऊँचे बिरथा मान |
भोग उपभोग भूरिसह कह भव भूति प्रधान ||
:-- सुखद दाम्पत्य जीवन को व्यर्थ मानकर आर्थिक रूप से संपन्न उच्च वर्ग द्वारा कहा जाता कि संसार के भोगों के अधिकाधिक उपभोग में जीवन की सार्थकता है
जीवन में धन सम्पदा सुख कर मान अधान |
तासहुँ इर्षा करत सो बरन आन सुखवान ||
: -- जीवन में धनसम्पति को सुख का आधार मानकर यह जब तब उन अन्यान्य वर्गों के सुखमय जीवन से इर्षा करता है
दुपहिया भी मध्यम वर्ग के जीवन का आनंद स्वरूप हैकिन्तु यह वर्ग इस सुख से अनभिज्ञ है मध्यम वर्गीय जीवन के इस आनंद से प्राय: लब्धप्रतिष्ठित वर्ग कुढ़ता व् इर्षा करता दर्शित होता है