Tuesday, 18 July 2017

----- || दोहा-एकादश 7 || -----

धरम अनादर मति करो होत जहाँ अवसान | 
ताहि  कंधे पौढ़त सो पहुँचे रे समसान || १ || 
भावार्थ : --  सत्य,तप,दया और दान आदि धर्म साधारण धर्म है जो सभी मनुष्यों होना चाहिए |  विशिष्ट धर्म का भी अनादर नहीं करना चाहिए, जीवन रूपी संध्या के अवसान होने पर धर्म के कंधे उठकर वह श्मशान पहुंचता है |

मुए जगत निरबसन कियो  धरम दियो ओहार | 
बासत पुरबल देहि कै करिया सो उद्धार || २ || 
भावार्थ : - मृत्यु के पश्चात दुनिया जब मनुष्य को निर्वस्त्र करती है, तब धर्म ही उसे वस्त्र देता है |  दुर्गन्ध आने के पूर्व धर्म ही मृत शरीर का उद्धारकर्ता है |  

भोजन बासा बसन जब भै जिअ के चिन्हारी | 
ताहि प्रबंधन अर्थकर करिअब नीति अनुहारि || ३ || 
भावार्थ : -- सभ्यता के पश्चात जब भोजन वस्त्र व् आवास मनुष्य के  जीवन हेतु आवश्यक साधन हो गए तब कतिपय नीतियों का अनुशरण करते हुवे उसने अर्थ को प्रबंधित किया |

अर्थात : --  मनुष्य द्वारा अर्जित किये गए धन को किस प्रकार प्रबंधित किया जाए कि वह सरलता पूर्वक इन आवश्यक साधनों को प्राप्त कर सके यह उपक्रम अर्थ -प्रबंधन कहलाया |

दूसरे शब्दों में : -- सार्वजनिक राजस्व और उसके आय-व्यय की व्यवस्था ही अर्थ-व्यवस्था है |

भोजन बासा बसन जब भै जिअ के चिन्हारी | 
ताहि प्रबंधन अर्थकर करिअब नीति अनुहारि || ३-क || 
भावार्थ : -- सभ्यता के पश्चात जब भोजन वस्त्र व् आवास मनुष्य के  जीवन हेतु आवश्यक साधन हो गए तब कतिपय नीतियों का अनुशरण करते हुवे उसने अर्थ को प्रबंधित किया |

जब गगन तेउ औतरी  घन बासिनि बिद्युत | 
बहुतक साधन संग सो भयऊ जटिल बहूँत || ३-ख || 
भावार्थ : -- और जब घन निवासिनी का धरती पर प्राकट्य हुवा और विद्युत् का आविष्कार हुवा तब इन आवश्यक हेतु के सह अन्यान्य संसाधनों की व्यवस्था के फलस्वरूप अर्थ नीतियां जटिल होती गई | 

एक अर्थ हेतु स्वारथ एक परमारथ हेतु | 
यहाँ अधर्माधीनता यहाँ धरम के सेतु || ४ || 
भावार्थ : -- सत्ता के लालच ने अर्थ को दो भागों में विभक्त कर दिया | अब अर्थ एक स्वहित के हेतु और एक परहित के हेतु व्यवस्थित होने लगा | जहाँ  स्वहित हेतु व्यवथित होता वहां यह अधर्म के अधीन होता जहाँ परहित के हेतु व्यवस्थित होता वहां यह धर्म के द्वारा मर्यादित रहता, अर्थात उत्तम रीति से यह प्राप्त किया जाता और उत्तम नीति से यह व्यय किया जाता.....

लोह लेत जग लोहिता भयउ लोह कर जोइ   | 
दोहत कोयर सब कतहुँ कोयर कोयर होइ || ५ || 
भावार्थ : - मध्य कालीन युग में लोहा पृथ्वी से निष्कासित होकर जब मनुष्य के हाथ में आया तब कलह-क्लेष से  उसने संसार को रक्त से लाल कर दिया  | आधुनिक काल के प्रारम्भ में जब कोयले का भी दोहन होने लगा तब उसकी करनी से चारों ओर मलिनता व्याप्त हो गई |

छूटत गया बधावना छूटत गए सब ग्रंथ | 
कलि का चाका गति गहा लोहल भए जब पंथ || ६ || 
भावार्थ : -- पृथ्वी के संग्रह का रहस्योद्घाटन होते ही उसकी संचित धन-सम्पदा  शनै: शनै:  रिक्त होने लगी | जब वह लोहपंथी हो गई तब आधुनिक काल का पहिया द्रुत गति से संचालित होने लगा |  

आठ जुग के ठाट जुटे, परे देह पर पाँखि | 
चरन धरा कू छाँड़ के  गगन धरे तब लाखि || ७ || 
भावार्थ : -- मानव के संसाधन अब देखते ही बनते थे उसकी देह में जैसे पंख उग आए हों उसके चरण धरती पर न पड़कर गगन पर धरे दिखाई पड़ने लगे   | जितनी सुख-सुविधाएं उसने इस एक काल में संकलित की  उतनी सभी कालों को मिलाकर भी नहीं की  |  १०० -१५० वर्षों में पृथ्वी का जितना दोहन हुवा विगत कालों में उसका १% भी नहीं हुवा |

समय पुरब उद्यम बिनहि, भाग तेउ अधिकाह  | 
पाप करम उपजाइया सुख साधन करि लाह  || ८ || 
भावार्थ : -- उद्यम के बिना समय से पूर्व और भाग्य से अधिक सुख साधनो की लालसा ने कुत्सित कर्मों को उत्पन्न किया  |

अधिकाधिक की दौड़ जनि जोड़ जोड़ की होड़ | 
लाखोँ लाख लिखा भयो  कौड़ी भयउ करोड़  || ९ || 
भावार्थ : -- अधिकाधिक सुख उपभोग के फेर ने फिर संग्रह करने की प्रतिस्पर्धा उत्पन्न की अब करोड़ों की धन-सम्पत्ति अल्प व्  लाखों की धन-संपत्ति अत्यल्प हो गई |

कतहुँ त भ्रष्ट चरन चरे, कतहुँ त अत्याचार | 
आचरन करि कदाचरन बिकरित भयउ बिचार || १० || 
भावार्थ : -- यह विकृत विचारों की परिणीति थी कि निर्द्वन्द्व सुख-उपभोग व्  अधिकाधिक संग्रह की प्रवृत्ति ने   कहीं भ्रष्टाचार तो कहीं अत्याचार का चलन कर दिया , सदाचरण विलुप्त होने लगा कदाचरण ही अब सदाचरण हो चला |

दुराचरन अपनाए भए  करतब काज मलीन | 
धर्म सेतु बिसुरत अर्थ होतब पाप अधीन || ११ || 
भावार्थ : -- दुराचरणों को अंगीकार किये जाने के कारण  कुत्सित कार्य करणीय कार्य हो गए परिणामतस  अर्थ धर्म की मर्यादा से विहीन होकर पाप के अधीन हो गया |









Saturday, 15 July 2017

----- || दोहा-एकादश 6 || -----

अबिकसित तन मति अरु मन बिनु कारज कुसलात | 
अस जनमानस संग सो  देस दरिद कू पात || १ || 
भावार्थ : -- जहाँ शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास से न्यून व् कार्य कुशलता के अभाव से युक्त जनमानस हो वह राष्ट्र दरिद्रता को प्राप्त होता है.....

जहँ नही मितब्यईता जहँ ब्यसन के बास |
जहँ कर उद्यम हीन तहँ दलिदर करे निवास || २ ||
भावार्थ : - जिस राष्ट्र में मितव्यविता न हो व्यसनों का वास हो, हस्त परिश्रम से हीन हों उस राष्ट्र में दरिद्रता निवास करती है.....

निर्द्वंद्व सुख भोग जहां अधिकाधिक अभिलास |
नव नवल प्रत्यास तहाँ होत दरिद के बास || ३ ||
भावार्थ : - जहाँ जनमानस के सुख-दुःख की चिंता से रहित होकर सुखों का उपभोग किया जाता हो,लोभ व् लालसा के कारण अभिलाषाऐं अधिकाधिक हों, जहाँ नित नव नवल वस्तु के प्रयोग की अभ्यस्तता हो, वहां दरिद्रता का निवास होता है ||

हठ धर्मिता पच्छ पात जहँ नित कलह क्लेस |
संपन ते संकटापन होत जात सो देस || ४ ||
भावार्थ : -- जहाँ हठधर्मिता हो, पक्षपातिता हो जहाँ नित्य कलह क्लेष हो वह संपन्न राष्ट्र संकटापन्न होता चला जाता है |

आसुरी सम्पद कर गहे होत जात जो पीन | 
रीतत सोधन सम्पदा करत देस कू दीन || ५ ||
भावार्थ : -- जो जनमानस अनुचित साधनों से धन-सम्पति अर्जित कर समृद्ध होता जाता है वह राष्ट्र की भू- सम्पदा को रिक्त कर उसे दरिद्र करता जाता है |

जो धन माँगे छाँड़ के अर्जन केर उपाए | 
सो तो मित  सुदामा सम  सदा दरिद कहलाए || ६ ||
भावार्थ : - जो राष्ट्र अथवा जो जनमानस धनार्जन की युक्तियों को न मांग कर धन की मांग करता है, वह मित्र  सुदामा के जैसे छटी का दरिद्र कहलाता है | 

पुरबल महु निज करगहे खेट खेह खलिहान | 
गेह गेह संपन रहे रहे देस धनवान || ७ ||
भावार्थ : -- प्राचीन भारत में इन्हीं गावों और खेत-खलिहानों से घर घर में विभूति विराजमान रहती थी और अपनी समृद्धि के लिए यह राष्ट्र विश्व भर में प्रसिद्ध था | 

सोइ देस खेटक खेड सोइ खेह खलिहान |
दीन दुखि धनहीन होत तरपत मरे किसान || ८ ||

भावार्थ : - अब वही देश है ,वही गाँव-खेड़े हैं खेत खलिहान भी वही हैं, किन्तु किसान की दशा दयनीय है वह तड़पते हुवे प्राण दे रहा है उसके गृह में दरिद्रता क्यों विराजित है इस प्रश्न का उत्तर हमें ढूंढ़ना ही होगा |


धनी के उतरु दान है निर्धन के धन-धाम | 
अधर्मी के उतरु धरम दूषन दंड बिधान || ९ || 
भावार्थ : - धनी यदि एक प्रश्न है तब दान उसका उत्तर है, निर्धन यदि एक प्रश्न है तब धन-सम्पति उसका उत्तर है, अधर्मी यदि एक प्रश्न है तब धर्म उसका उत्तर है, अपराध यदि एक प्रश्न है तब दंड विधान उसका उत्तर है |

अर्थात : - यदि कोई प्रश्न है तब उसका उत्तर भी अवश्य होगा.....

जहाँ दरिदर दान करत, समरथ करत त्याज |
दोषि सत कह करि नृप तप तहाँ धरम कर राज || १० || भावार्थ -- जहाँ दरिद्र दान करता हो, समर्थ त्याग करता हो, जहाँ अपराधी सत्य कहता हो और शासक तपस्या करता हो वहां धर्म का राज होता है |

अजहुँ त हमरे देस में दारिद भया दातार | 
समरथ लज्जा परिहरत मांगे हाथ पसार || ११ || 
भावार्थ : -- विद्यमान भारत में लोभ और लौलुपता के वश निर्लज होकर समर्थ उद्योगपति हाथ पसारे मत की मांग करता है और निर्धन दातार बनकर उस मत को दान करके स्वयं को धन्य मानता है | धिक्कार है ऐसे उद्योगपति पर.....

 







----- ॥ टिप्पणी ११ ॥ -----

>> इसी लिए गांधी को लोग पाखंडी कहते हैं, अनशनोपवास के ढोंग से सत्ता हथिया कर वह भारत को पूर्ण हिंसावादी राष्ट बनाना चाहते थे.....गांधी को  पाखण्ड  वाद  का  प्रणेता  भी  कहा  जाता  है.....   

>> राष्ट्र पति जी ! दीन दरिद्रों को जीत नहीं काम चाहिए ,रोटी चाहिए किन्तु आपके भवन की भव्यता उन्हें यह देने नहीं देती.....

>>  आली-ज़नाब ! आपके बदन की ये नेहरु कट अचकन ग़रीब-गुरबा को खुराके-ख़ुर्द से भी महरूम रखती है.....

>> " धर्म की उपस्थिति मनुष्य को मनुष्य के रूप में निरूपित करती है....."
   
व्याख्या : -  दया, तप, दान व् सत्य आदि साधारण धर्म  प्रत्येक मनुष्य में उपस्थित होना चाहिए यदि यह नहीं है तब वह पशु के तुल्य है.....

>> 'तरवे नमोस्तुते'   
(वृक्ष को नमस्कार हो ) 
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे | 
फलान्यपि परार्थाय वृक्षा : सत्पुरुषा इव || 

भावार्थ : - वृक्ष सज्जनों की भाँति स्वयं धूप में तपकर दूसरों के लिए छाया करते हैं, फलों को भी दूसरों को प्रदान कर देते हैं.....
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>> तोरि खाए फल होहि भल, तरु काटे अपराधु || 
भावार्थ : -- तुलसी दास जी कहते हैं फल तोड़कर खाना और जनमानस से यथोचित लाभ लेना उत्तम है पेड़ काटकर फल लेना और अनुचित कर लगाकर जनमानस को कष्ट देना हितकर नहीं है.....

>> मुसलमानों के आगमन से पूर्व यह देश भारत ही कहलाता था सिंधु नदी के तट पर बसने के कारण यह सिन्धुस्थान के नाम से भी प्रसिद्ध था | फिर मुसलमान आए ये 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे स्थान को स्तान कहते थे कालांतर में मुसलमानों ने अपने राज में इसे हिन्दुस्तान के नाम से सम्बोधित किया, इस शब्द युग्म का वास्तविक अर्थ है सिंधु नदी के तट पर बसने वाले लोगों का देश.....

>> लोकतंत्र में आपही भयऊ बहुतक दोस | 
अवर दोषु पुनि बोहि के गिरिहि चलत दुइ कोस || 
 भावार्थ : --  लोकतंत्र स्वयं दोषयुक्त है, अन्य जन संचालन तंत्रों के दोषों के भार को वहन कर यह अधिक दूर नहीं चल पाएगा | 



>>   अमलदार अमीरों की गरीबी नहीं जाती..,
      इस वास्ते हिन्द की बदनसीबी नहीं जाती.....

>> हम ऐसे शासन तंत्र द्वारा संचालित हो रहे हैं जहाँ क्रूरता और बर्बरता के लिए खुली छूट है और उसके प्रतिरोध के लिए दंड.....

>> एक डाकू भी अपने दल का नेतृत्व करता है.....,
एक महापुरुष ही सन्मार्ग प्रदर्शित करता हैं वह चाहे शासन में हो अथवा अनुशासन में.....

>> जनमानस के दास भए सेवा धर्म निभाउ |
भाउ रहते भाउ रहे अभाउ रहत अभाउ ||

भावार्थ : - भारतीय लोकतंत्र में मत को दान की श्रेणी में रखते हुवे जनप्रतिनिधि को जनमानस का सेवक कहा गया है | जो 


कोई प्रतिनिधि के रूप में जनमानस की सेवा करने की इच्छा रखता है वह सेवाधर्म का पालन करते हुवे उसके दुःख से दुःखी व् सुख से सुखी रहे | जहाँ ४०% से अधिक जनमानस निर्धन रेखा के नीचे जीवन यापन करता हो वहां उस प्रतिनिधि को निर्द्धंद्ध सुख उपभोग की अनुमति नहीं होनी चाहिए, अन्यथा जो अभी ४०% है उसे १०० % होने में देर नहीं लगेगी |

>> आतंकवाद से सामना करने में अपनी असफलता पर क्षतिपूर्ति का घूँघट करते ये नपुंसक सत्ताधारी प्राय: टी. वी, व् समाचार पत्रों के पीछे छुपे पाए जाते हैं.....

>> ये काम भारत की प्रभुता और अखण्डता अक्षुण्ण रखने की शपथ लेने वाले सत्ताधारियों का है |  सारे काम बुद्धिजीवी करेंगे तो ये क्या करेंगे.....?

>>विद्यमान समय की पत्रकारिता विश्वसनीय नहीं रही,  अब तो मीडिया से पत्रकारिता ढूंढनी पड़ती है, इससे प्राप्त तथ्य को जांच-परख कर ही अपना विचार व्यक्त करना चाहिए.....

>> जनमानस गधे के जैसे पैसा कमाए, फटे हुवे कच्छे बनयान में रहकर रूखी सुखी खाए और अपनी इस सारी कमाई को पंच परिधान पहनने, वायुयान में विराज विदेशों में, होटलों, भव्य भवनों, गुलछर्रे उड़ाने के लिए इन मंत्रियों के चरणों में अर्पित कर दे  तब तो वह साहूकार अन्यथा कर चोर.....क्यों.....?



>> यह कर व्यवस्था का नहीं यह नेताओं के निर्द्वंद्व सुख उपभोग का विरोध है जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के भी विरुद्ध है | यदि यह न हो तो जनमानस पर कर का भार अति न्यून हो सकता है.....

Tuesday, 11 July 2017

----- || दोहा-एकादश 5 || -----

सब जगज जन भगवन कृत इहँ कन कन उपजोगि | 
जो कहँ ए केहि जोग नहि सो तो मानसि रोगि || ११ || 
भावार्थ : -- यह चराचर जगत ईशवर की कृति है यहां कण-कण उपयोगी है | जो यह कहता पाया जाए कि यह जीव अथवा अजीव किसी योग्य नहीं वह मानसिक रोगी है | उसके परिजनों को उसका उपचार करवाना चाहिए, यदि परिजन न हों तब सबंधित राष्ट्र उसके उपचार की व्यवस्था करे.....

राष्ट्र की समृद्धि व्यक्ति की समृद्धि सुनिश्चित करती है, व्यक्ति की समृद्धि राष्ट्र की समृद्धिसुनिश्चित करे यह आवश्यक नहीं..... 

साधारन असाधारन धन संपद कुल दोइ | 
असाधारन जनहित हुँत अखिल जगत कर होइ || १ || 
भावार्थ : - धन-संपदाएँ दो प्रकार की होती है एक साधारण  व् एक असाधारण  | असाधारण संपदाएँ व्यक्ति अथवा राष्ट्र की न होकर जनकल्याण हेतु समस्त विश्व की होती है | 


जैसे: -  ज्ञान  की  सम्पदा एक असाधारण है.....

तीनि भाँति कर होइहीं  साधारन भव भूति | 
एक निज दुज जन जन हेतु तीजी देस बिभूति || २ || 
भावार्थ : -- साधारण धन-संपदाएँ तीन प्रकार की होती हैं,  एक संपदा व्यक्ति के निजि उपयोग हेतु, एक सार्वजनिक उपयोग हेतु, एक राष्ट्र के उपयोग हेतु |

जन मानस की सम्पदा धरनि धेनु धन धाम | 
श्रम सील होत कमाइए करतब भल भल  काम || 3 || 

भावार्थ : -- राष्ट्र में भूमि- भवन, धान-धेनु, रुपया-पैसा, रत्न -मणि आदि सम्पदाएँ जन-मानस के निजि स्वामित्व हेतु होती हैं, जिसे वह उत्तमोत्तम कार्य करते श्रम पूर्वक अर्जित करे | वह ऐसा कार्य न करे जिससे जीवन के अधिकार का अतिक्रमण होता हो |

कूप बापि बन बाटिका घाट हाट बट सेतु | 
जाताजात के साधन सम संपद सब हेतु || ४ || 
भावार्थ : -- नलकूप, ताल-तालाब, वनवाटिका, नदियों के घाट, व्यापार मंडी, मार्ग, सेतु  एवं यातायात के साधन जैसी संपति, सार्वजनिक संपति होकर सर्वजन हेतु होती है |

नदी नदिपत बन परबत सकल खनिक खनि खान | 
राज कोष सम्पदा के  देस होत श्री मान || ५ || 
भावार्थ : - राष्ट्र की प्रभुसत्ता में सीमाबद्ध भूखंड के अंतर्गत स्थित भूमि, नदियाँ, समुद्र, खनित खनिज, समस्त खानें व् राजकोश आदि सम्पदा, राष्ट्र के स्वामित्व में होकर राष्ट्र की सम्पदा होती है | 

खेत जोत श्रम साध के निपजावे जो नाज | 
धनार्जन हेतु जै तौ सबते उत्तम काज || ६ || 
भावार्थ : -- श्रम की साधना करते हुवे खेत जोत कर अन्न का उत्पादन धनार्जन करने की सबसे उत्तम वृत्ति है | 


घर की संचित सम्पदा खोद खोद के खाए | 
दारिद होतब जात तब सो तो बिनहि कमाए || ७ || 

भावार्थ : -- वास्तविक उत्पादन में कठोर परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है | जब जनमानस कठोर परिश्रम न कर राष्ट्र की संचित व् संरक्षित सम्पदा को उत्खाद करते हुवे निजि सम्पति एकत्रित कर समृद्ध होता जाता है तब वास्तविक अर्जन के अभाव में वह राष्ट्र दरिद्र होता जाता है | 

एक सँजोइ सुकरम ते एक कुकरम ते सँजोइ | 
यह तो दैबिअ सम्पदा येह आसुरी होए || ८ || 
भावार्थ : -  वर्जित कृत्यों व् दुर्वृत्ति द्वारा अर्जित की गई धन-सम्पति आसुरी, तथा विहित कृत्यों व् सद्वृत्ति द्वारा अर्जित की गई धन -सम्पति, दैविक कहलाती है | 

धरनि धाम ते मानसा नीर नाज ते देस |
सरब जन की  सम्पति सों धनी होत परिवेस || ९ || 
भावार्थ : -- भूमि- भवन, धान-धेनु, रुपया-पैसा, रत्न -मणि   जन- मानस को व् जल, अन्न, उत्तम विचार, नदियों, खनिज आदि सम्पदा  देश को कूप, ताल-तालाब, वनवाटिका, sनदियों के घाट,  मार्ग, सेतु  जैसी सार्वजनिक संपति देश के परिवेश को समृद्ध करती हैं.....

राजा बासै झोपड़ा, चरन पादुका हीन | 
रचिया जो पथ राजसी, सो तो अर्थ बिहीन || १० || 
भावार्थ : --  जिस देश का राजा चरण- पादुका से रहित होकर  झोपड़ियों में निवास करता हो, वहां राजपथ जैसी सार्जनिक सम्पति  व्यर्थ होकर राजा की दरिद्रता का वर्धन करती हैं.....

रह जब संचित सम्पदा तब सम्पत सब काल | 
सीस पड़े को आपदा, जन जन होत निहाल || ११ ||  
भावार्थ : -- जिस राष्ट्र में संयत व्यवहार से सम्पदाएँ संचित रहती हैं उस राष्ट्र के भूत भविष्य और वर्तमान तीनों काल सुखमय होते है, वहां आने वाली पीडियां जन्मजात धनी होती हैं | आपदा ग्रस्त होने पर भी वहां कुछ अभाव नहीं होता.....

उद्यम मन ते धन लख्मी आलस मन ते हानि || 
माया के बंधन पड़े तामें ऐंचा तानि || 
----- || संत कबीर दास || ----
भावार्थ :- उद्यमशीलता लाभ जनित लक्ष्मी की जननी है  | आलस्य दरिद्रता का जनक है |  जनमानस जब विलासिता के बंधन में पड़ता है यब वह अपनी मातृ भूमि की खाल खाने पर भी उतारू हो जाता है ||












Wednesday, 28 June 2017

---- || दोहा-एकादश 4 || -----

रत्नेस ए देस मेरा होता नहि दातार | 
देता सर्बस आपुना बदले माँगन हार || १ || 
भावार्थ :-- जो स्वयं को विकसित राष्ट्र कहने वालों को लज्जित होना चाहिए | उनकेयहाँ आपदाओं का कोई प्रबंधन नहीं है, धनी होकर भी संकट के समय वह हाथ पसारे फिरते  हैं | त्रिरत्न स्वामी मेरा यह देश यदि दातार नहीं होता तब जलमन्न रूपी वास्तविक  रत्नों के बदले ये अपना सर्वस देने को विवश हो जाते ||

किस काम के तुम्हारे ये बम.....?

जल ग्यान है दान हुँत अन्न हेतु ब्यौहार | 
असमरथ की क्षुधा हरे बहुरि करें बैपार || २ || 
भावार्थ : -- सुबुध जन कहते हैं : - जल और ज्ञान ( सुभाषित वचनों का संकलन ) दान के लिए हैं व्यवहार के लिए नहीं |  अन्न में कृषक व् बैल का श्रम नियोजित होता है इस हेतु यह व्यवहार की वस्तु है तथापि इसका प्रथमतः उपयोग असमर्थ की क्षुधा शांत करने लिए हो ततपश्चात इसका व्यापार किया जा सकता है |


प्रगस रतन सँभारी जौ राखै सब के प्रान | 
अगजग हितकर बिधि करै बरनिय सोइ बिधान || ३ || 
भावार्थ : -- जो वास्तविक रत्नों को सहेज कर जीव मात्र की रक्षा करता हो, जो समस्त विश्व के कल्याण की विधि का उपबंध करता हो वह संविधान अंगीकार करने योग्य है |

जेहि देस कर देहरी दिए पट हीन द्वार |
कहा करे पहराइ तहँ कहा करे तलवार || ४ ||
भावार्थ : - जहाँ संविधान अपने राष्ट्र की देहली पर पट विहीन द्वार निर्मित करता हो वहां सभी सुरक्षा उपाय व्यर्थ सिद्ध होते हैं |

स्पष्टीकरण : -- पट विहीन द्वार में कोई भी कभी भी कहीं भी आ-जा सकता है |  ऐसे द्वार वाले देश में कभी भी परायों का शासन सो सकता है |  परायों के बहुमत से परायो के शासन में जनसामान्य द्वारा अंगीकृत संविधान अवमान्य हो जाता हैं और वहां उसके अपने विधान लागू हो जाते हैं |
परायों के बहुमत से परायो के शासक को संविधान के दो टुकड़े कर जनमानस के हाथ में धराते कितनी देर लगेगी.....?

देस केर बनावन मैं मूलभूत जौ नाहि |
ताहि हेतु सो मानसा बिराउना कहलाहि || ५ ||  
भावार्थ : -- वह व्यक्ति उस राष्ट्र के लिए पराया है जो उसके निर्माण में मूलभूत नहीं होता.....

वह व्यक्ति उस राष्ट्र के लिए पराया है जो उसके निर्माण में मूलभूत नहीं होता.....

भीतर ते जो खोखरा बाहिर ते भरपूर |  
अह सहज ब्यौहार ते रहियो वासों दूर || ६ || 
भावार्थ : - जिस देश में आवश्यक अन्न न हो, जल न हो सुभाषित वचन भी न हो,  लोहा भी कुछ विशेष न हो सोना-वोना भी न हो, अपने कोयले को जिसने फूँक दिया हो | अहो! उसकी बाहरी चकाचौंध से प्रभावित हुवे बिना सहज व्यवहार न कर उससे सावधानी पूर्वक व्यवहार करना चाहिए |

जेहि देस कर मानसा रहे सहित परिवार |  
ताहि के रखिताई हुँत बहे सीस मित भार || ७ || 
भावार्थ : -- जिस देश का जनमानस परिजनों की छत्र छाया में निवास करता है उस देश पर उसकी सुरक्षा का भार न्यून होता है | 


जोइ देस अपनाइया बिबाहित संस्कार | 
परिजन के छत छाए सो रचत रुचिर परिवार || ८ || 
भावार्थ : -- जो देश वैवाहिक संस्कार को अनिवार्यता पूर्वक अंगीकार करता है वह  सुन्दर परिवार की रचना करते हुवे जनमानस को परिजनों की छत्र -छाया से युक्त कर अपने दायित्व का भार न्यून कर लेता है |


जेहि देस सुरीत चरत नियत नेम बर नीति |
सुख करत चरित गढत तहँ बासै प्रीत प्रतीति || ९ ||
भावार्थ  -- जिस देश में उत्तम रीतियों का अनुशरण व्  लोक व्यवहार-हेतु उत्तम नियमों व् नीतियों का नियंत्रण होता है, उस देश में स्नेह और विश्वास का निवास रहता है जो शील व् सदाचारी वृत्ति का निर्माण कर जनमानस को सुखी रखते हैं |

मांस मदिरा ब्यसन कर  बान बरे जो कोइ | 
सो जन देस समाज सो तासो दरिदर होइ ||१० || 
भावार्थ : -- जो व्यक्ति, जो समाज, जो देश मांस-मदिरा जैसे व्यसनों  का अभ्यस्त होता है वह दिन प्रतिदिन दरिद्र होता जाता है |

स्पष्टीकरण : -  किसी वस्तु का अधिकाधिक उपयोग भी एक व्यसन है.....








Monday, 12 June 2017

---- || दोहा-एकादश 3 || -----

सासक मिलना सरल है मिलना कठिन किसान |
रक्त सीँच जो आपुना उपजावै धन धान || १ || 

भावार्थ : -- आज शासक सरलता से मिलने लगे है किसान का मिलना कठिन हो गया है कारण कि किसान खेत को रक्त से सींच सींच कर अन्न उपजाता है इसलिए उच्च पदों को प्राप्त होकर सभी नेता-मंत्री बनना चाहते हैं किसान बनना कोई नहीं चाहता |

सासक हटे कछु न घटे जनमे पीछु पचास | 
करषक हटत केत घटत करत असन की आस || २ || 
भावार्थ : -- लोकतंत्र में शासक अथवा राजा के मरने से कुछ भी हानि नहीं होती मृत्यु पश्चात पचासों और शासक जन्म ले लेते हैं किन्तु किसान के मरने से बड़ी हानि होती है  दानों की प्रत्याशा में इसके साथ जाने कितने भूखे ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं | लोकतंत्र में चूँकि किसी पैदल को राजा बनना होता है  इसलिए पैदल की सर्वतस रक्षा करना उत्तम है |

अबिलम ताहि संग तजौ दूषत जेहि प्रसंग | 
करतल धरिया कोयरा करिया करिया रंग || ३ || 
भावार्थ : -- लोकतंत्र में शासक बने रहना है अथवा लोकतंत्र को बने रहना है तब दोषपूर्ण व्यक्ति को करतल पर रखे कोयले के जैसे तत्काल त्याग कर देना चाहिए अन्यथा उसका साथ स्वयं को भी कलुषित कर देता है ||

निर्बल की को सुनै नहि सबल लगावै कान | 
ऊँचे सुर जो बोलिया झट तै लेवेँ प्रान || ४ || 
भावार्थ : -- यहाँ निर्बल की कोई सुनवाई नहीं है सबल व् सशक्त की सभी सुनते हैं जिसने ऊँचे स्वर में बात की उसके प्राण हरण कर लिए जाते हैं |

बन मानुष मानुष भयो, करष भूमि करि खेत | 
बहुरि तहाँ बहुराएगा किया न तासों हेत || ५ || 
भावार्थ : --   कर्षण द्वारा भूमि को क्षेत्र में परिवर्तित करके ही मनुष्य वनमानुष से सभ्य हुवा | यदि उसने इसका तिरष्कार किया तब उजड्ड होते हुवे वह पुनश्च वनमानुष बनकर जहाँ से आया था वहीं पहुँच जाएगा  |

जलमन्न अरु सुभाषितं प्रगस रतन कुल तीन | 
भूमि केरे सबहि अर्थ ता बिनु अर्थ बिहीन || ६ || 
भावार्थ : -- 'अन्न, जल व् सुभाषित वचन'  ये तीन वास्तविक रत्न हैं | भौतिक जगत के जीवित पदार्थों में चूँकि अन्न व् जल का सर्वाधिक महत्व है अत: इनसे विहीनित होकर पृथ्वी के सभी धनसम्पति व्यर्थ सिद्ध होती हैं | 

मान भरे मुद्रित धन तू, बोल न ऊँचे बोल | 
सब जग सम्पद तोल लै जब लग तेरा मोल || ७ || 
भावार्थ : -- मुद्रा पर आधारित अर्थ व्यवस्था की दृढ़ता क्षणिक होती है | मुद्रा के अहंकार में कोई गर्व भरी अभिव्यक्ति न करें, जब तक यह मूल्य वान है इसकी क्रयशक्ति तब तक ही होती है |

मुद्रित धन ते भयउ हरे करौ न को अभिमान | 
प्रगस रतन जा कर धरे सोइ जगत धनवान || ८ || 
भावार्थ : -- जीवन को संचालित करने के लिए वास्तविक रत्न महति आवश्यक हैं उसे सुगमता पूर्वक संचालित के लिए अन्यान्य संसाधनों की आवश्यकता होती है मुद्रा स्वयं में साध्य न होकर इन संसाधनों को प्राप्त करने का साधन मात्र है;एतएव जो केवल मुद्राधारित अर्थ प्रबंधन से सुविधा सम्पन्न हैं उन्हें अपनी धनमत्ता का अभिमान नहीं करना चाहिए क्योंकि संसार में वही धनवान है जिसके पास जल, अन्न व् सुभाषित वचन है |

जोइ सजीवन रूप में साधन साधक सोइ | 
जिउ जगत निरजीउ करे सो तो बाधक होइ || ९ || 
भावार्थ : -- पृथ्वी में कुछ अद्भुद है तो वह जीवन है 'नतरु भगवन तेरा यहु पाहन का संसार' अन्यथा ब्रह्माण्ड पत्थरों का संसार के अतिरिक्त कुछ नहीं है | एतएव जो जीवन के संचालन में संजीवनी का कार्य करे वह संसाधन साधक हैं | जो प्राणि जगत को निष्प्राण करे वह साधन जीवन के संचालन में बाधा उत्पन्न करते हैं |

बाधक साध न कीजिये यह तो छ्दम बिकास | 
आपद को बुलाई के तासों होत बिनास || १० || 
भावार्थ : -- प्रकृति के संचालन में बाधा उत्पन्न करने वाले संसाधनों को साधन न करें इन साधनों द्वारा किया गया विकास छलावा है, यह आपदाओं को निमंत्रण देकर विनाश का कारण बनता है ||

तीनि प्रगस मुकुता मनिक रहेउ न जो सजोइ | 
नित कर जोरि मनाइये परे न आपद कोइ || ११ || 
भावार्थ : --  जिसने पृथ्वी के वास्तविक रत्नों को संकलन नहीं किया है, वह देश नित्य प्रार्थना करे उसपर कोई आपदा न आए ||



Saturday, 10 June 2017

----- || दोहा-एकादश 2 || -----

आपद काल महुँ चाहिए सासक की कुसलात | 
सठता पन हठधर्मिता तबकछु काम न आत || १ || 
भावार्थ : -- संकट काल में शासक की दुष्टता व् हठधर्मिता अनपेक्षित परिस्थितियां उत्पन्न करने के लिए बाध्य करती हैं ऐसी विपरीत समय में उसे कार्य कुशलता का परिचय देना चाहिए |  

इसलिए शासक कुशल होना चाहिए दुष्ट नहीं.....

निर्भिक निर्मम निरंकुस सासक की पहचान | 
रजता राज कसाइया देवे जिअ करसान || २ || 
भावार्थ :-- निर्भीक,निर्मम और निरंकुश शासकों के शासन तंत्र की यही पहचान है कसाई यहाँ समृद्धि को प्राप्त कर संपन्न रहते है और किसानों की बली ली जाती है |

जिनते मीठा बोलना तिनते बोले गोलि | 
जिनते बोलन गोलियां तिनते मीठे बोलि || ३ || 
भावार्थ : -- जहाँ मधुर वार्तालाप की आवश्यकता होती है वहां ये दुष्ट तोप और गोलियों से बात करते हैं | जहाँ तोप और गोलियों को बोलना चाहिए वहां ये मधुर मधुर वार्तालाप करते है |

मुख ते राम नाम रटे बिष धारी करकोष | 
पाखन कर पट देइ के दुरे नहीं को दोष || ४ || 
भावार्थ :-- मुख में राम और करतल में तलवार रखने वाले ये समझ लें  : --पाखण्ड के पटाच्छादन से दोष नहीं छिपा करते |

कातर पे बल जोरि के निर्मम तू जिअ लेय | 
रमता पुनि पाखन करे आसन पट्टी देय || ५ || 
भावार्थ :-- रे निर्मम शासकों कातर निरीह किसानों पर तुम बल का प्रयोग कर उसके प्राण लेते हो ? अरे दुष्टों फिर आसन पट्टी देकर अपनी दुष्टता छिपाने के लिए ढोंग करते हो तुम्हारे सम्मुख लज्जा भी लज्जित हो जाएगी |

कागा देही जनमिया बाना देय मराल | 
नाम धरा बनराज का चले गधे की चाल || ६ || 

बाना देय मराल : -हंस का भेस भरना

जो कर खाए कसाइ के भए सो संत महंत |
गनमान्य होई फिरैं पालन हर के हंत || ७ ||
भावार्थ : -- पाखंडवाद प्रचारित होने के कारण ही आज कसाइयों का कर खाने वाले दुष्ट संत महंत कहलाने लगे हैं, और जगत के पालन हार अन्नदाता किसान की ह्त्या करने वाले गणमान्य बनकर देश को चला रहे हैं |
ऐसे दुष्ट शासकों के कारण ही ये देश कृषि प्रधान से मांस प्रधान हो गया |

राजू : --हाँ ! मांस मट्टी की बिक्री में ये संत महंत नए नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे.....

रेह रेह सब खेह भए रक्ताक्त खलिहान | 
करतारा को पूछिये चुपी रहत तब कान || ८ || 
भावार्थ : --  उद्यमियों की धृष्टता ने  सोना उपजाने वाले खेतों को क्षार क्षार कर दिया , शासकों की दुष्टता ने खलिहानों को रक्त से रंजित कर दिया  | दोषी कौन है ? यह प्रश्न किया जाता है तब संविधान के सभी उपबंध मौन धारण कर लेते हैं क्यों कि वह इन दुष्टों पर लागू ही नहीं होता |

लौह की न लौहार की रहिमन कहे विचार | 
जो हनि मारे सीस में,ताही की तलवार || ९ || 

भावार्थ : --गोली जिसकी दोष उसका | गोली तो बन्दुक की थी, बन्दुक लोहे की थी, लोहा लोहार ने गढ़ा था |
रहीम के विचार से जिसकी बँदूक उसका दोष  |
किन्तु चलाने वाले ने तो आदेश का पालन किया था
प्रश्न यह है कि बन्दुक चलाने का आदेश किसने दिया यदि देश में कोई संविधान है  और शासक ने आदेश दिया तो वह तत्काल त्याग पत्र दे.....

फिरंगी जौ सीस हनै जलिया वाला काँड | 
सठता तेरा राजना कहबत सोई भाँड || १० || 
भावार्थ : --अंग्रेज यदि किसी हिताकांक्षी कातर जनसमूह पर गोली चलाकर उनकी निर्ममता पूर्वक हत्या करते हैं तब दुनिया उसे जलिया वाला काला कांड कहती है |  लोकतंत्र का दुष्ट शासक जब ऐसी घटना कारित करता है उसे उपद्रव कहा जाता है यह भेद भाव क्यों ?

जथातुर मिलिया नहि जो उद्दंडी को दंड | 
हँसि हँसि सब कहिअहिं तासु हंता कू बरबंड || ११ || 
भावार्थ :-   उद्दंडी शासक की ह्त्या होने पर लोग ताली बजाकर हत्यारे को शुरवीर के पद से विभूषित करें इससे पूर्व संविघान अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर अपराधी को यथाशीघ्र दंड दे |