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Tuesday, 4 June 2019

----- ॥ टिप्पणी 21 ॥ -----,

ओवैसी के बयान "हम किरायदार नहीं,बराबर के हिस्सेदार हैं" को किस नज़र से देखा जाये?
  • भारत में सभी मुस्लिमों का उत्तर होगा - हाँ ! सही तो कह रह हैं…..
  • और भारत वंशी के उत्तर : - हम पहले इंसान है, इंसान का भाई चारा होना चाहिए, जातिवाद क्यूँ है, मुस्लिम मेरा भाई, हम सब एक डाल के पंछी, हाँ हाँ मुसलिम भाई आप भारतीय हो मेरा घर ले लो मेरी दौलत भी ले लो, ये क्या धर्म की दकियानूसी बातें हैं, मैं फालतू विषय पर बहस नहीं करता, राष्ट्र क्या होता है ?  ये ओवैसी कौन है ? हमारे पूर्वज एक थे दे दो..... आदि आदि 
  • भारत शासन द्वारा अब तक ऐसी राष्ट्र विरोधी शक्तियों के विरुद्ध कार्यवाहीकर तत्काल उसे कठोर दंड दे देना चाहिए था | किन्तु आश्चर्य है उसने ऐसा नहीं किया | क्या भारत का संविधान इतना अक्षम है ? क्या वह अपनी अखंडता की रक्षा करने में निर्बल सिद्ध हो रहा है अथवा सत्तधारियों का अंतस काला है ? भारत की सत्ता सुख भोग लिए नहीं है यदि ये सत्ताधारी भारतीय है उन्हें भारत से प्रेम है तो वह अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें |
  • चार टुकड़े होने के पश्चात भारत का आधे से अधिक भाग मुस्लिमों के पास है औवैसी जाएं वहां | यदि प्रत्येक ५० वर्षों में एक जिन्ना जन्म लेता रहा तो भारत बचेगा कहाँ ?
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धर्म साधारण व् विशिष्ट ये दो प्रकार के होते हैं 
विशिष्ट धर्म वस्तुत: ईश्वर के उपासना की एक पद्धति है संसार में १४ प्रकार के विशिष्ट धर्म हैं यदि हम सभी उपासना पद्धतियों का अनुशरण करेंगे तो  ईश्वर पर ध्यान केंद्रित नहीं होगा इसलिए किसी एक पद्धति का अनुशरण कर हमें ईश्वर की उपासना करनी चाहिए आप धर्म परिवर्तित कर सकते हैं किन्तु यह स्मरण रहे कि कोई परिवर्तन तभी  स्वीकार्य योग्य है जब वह संसार के लिए कल्याणकारी हो

Tuesday, 14 May 2019

----- ॥ टिप्पणी १९ ॥ -----,

भारत में बाह्यवर्ग की सम्प्रभुता 
  •  मुस्लिम भारतीय नहीं हैं क्योंकि आपके पूर्वज लगभग डेढ़ सहस्त्र वर्ष पूर्व इस देश में आए थे |
  • ➝धर्म और जाति वह उपकरण है जो आपकी पहचान निर्दिष्ट कर यह संसूचित करते हैं कि आप कौन हैं कहाँ से आए हैं | 
  • ➝भारतीय का अर्थ है भारतवासी या भारतभूमि में उत्पन्न भारतवंशी | आप भारत के वासी नहीं है आप वहां प्रवासी बनकर आए और अधिवासी बनकर निवासरत रहे |
  • ➝चूँकि आप अधिवासी हैं एतएव इस राष्ट्र के मूलगत नहीं हैं यह सर्वविदित है कि कोई शाखा उसी वृक्ष की कहलाती जिससे वह उत्पन्न हुई हो वह चाहे पूरे संसार में विस्तारित ही क्यों न हो | आपका वृक्ष भारत नहीं है क्योंकि आपकी जड़ें कहीं और हैं, अत : भारत आपकी जन्म भूमि है न कर्म भूमि इस हेतु स्वयं को  भारतवंशी कहकर  भारत सहित आप अपने ही पूर्वजों को धोखा दे रहे |
  • ➝जाके पूर्बज जनम भए जाहि देस के मूल |
  • जनमत सो तो होइआ सोइ साख के फूल || ३४०० ||
    भावार्थ : -"कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र का मूल नागरिक है यदि उसके पूर्वजों की जन्म व् कर्म भूमि उक्त राष्ट्र की भूमि रही हो तथा उसका जन्म ऐसे पूर्वजों द्वारा उत्पन्न माता-पिता से हुवा हो |" और उसने ऐसे पूर्वज सहित ऐसे मातापिता के धर्म से भिन्न धर्म क्यों न अपना लिया हो |
  • ➝जाके पूर्बज जनम भए जाहि देस के  मूल | 
          जनमत सो तो होइआ सोइ साख के फूल || ३४०० || 
          भावार्थ : -"कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र का मूल नागरिक है यदि उसके पूर्वजों की जन्म व् कर्म भूमि                      उक्त राष्ट्र की भूमि रही हो तथा उसका जन्म ऐसे पूर्वजों द्वारा उत्पन्न माता-पिता से हुवा हो |" और                उसने ऐसे पूर्वज सहित ऐसे मातापिता के धर्म से भिन्न धर्म क्यों न अपना लिया हो एतएव इस बात प्              संदेह है कि भारत के ९० प्रतिशत मुसलमानों के माता-पिता सहित उनके पूर्वजों की जन्म व् कर्म भूमि              भारत थी | 
  • पाकिस्तान ने स्वयं कहा है भारत नया पाकिस्तान है | भारत में मुस्लिमों की संख्या और उनकी सम्प्रभुता पर दृष्टिपात करें तो यह सत्य सिद्ध होगा | कल्पना कीजिए यदि भारत विभाजन नहीं होता तब भारत में इनकी संख्या कितनी होती | भारत का संविधान प्रत्येक नत्थू खैरे को शासन का अधिकार प्रदान करता है इस अधिकार द्वारा संख्या बल प्राप्त कर कोई भी बहिर्देशीय समुदाय इस राष्ट्र पर शासन कर सकता है और वह भी करते | तब यह देश एक इस्लामिक राष्ट्र होता | प्रवासी रूप आ बसे अधिवासियों के रोग का उपचार विभाजन तो कदापि नहीं है जबकि वह उक्त राष्ट्र के आधिकर्ता हैं | विद्यमान में दासत्व मानसिकता के कुछ लोग इन मुसलमानों को भारतीय कहते है|आने वाली जनगणना में हमें चौंकाने वाले आकड़ें प्राप्त होने वाले हैं, ये आकड़ें हमें सोचने पर विवश कर देगें कि क्या यह देश में मुसलमानों के लिए स्वतन्त्र हुवा था क्या संविधान में किसी को भी शासन करने व् शासक चयन करने का अधिकार होना चाहिए ? यदि नहीं होना चाहिए तब फिर भारत के मूलगत निवासी क्या छलें नहीं जा रहे जहाँ उन्हें अपने ही राष्ट्र का सम्प्रभुत्व प्राप्त नहीं है.....
  • अपनी साम्राज्यवादी सोच को मूर्त रूप देने के लिए भारत में इस्लाम की ये एक नई चाल है कि यहाँ के मुसलमान हिन्दू से मुसलमान बन गए और पाकिस्तान व् अफगानिस्तान के नहीं बने | 

  • धर्म और जाति वह उपकरण है जो आपकी पहचान निर्दिष्ट कर यह संसूचित करते हैं कि आप कौन हैं कहाँ से आए हैं | यदि यह उपकरण नहीं होता तो  बाह्य  आँतरिक में भेद करना कठिन हो जाता | राष्ट्रवाद इस भेदवाद अथवा द्वैतवाद  पर अवलम्बित हैं द्वैतवाद के बिना राष्ट्रवाद की कल्पना नहीं की जा सकती, द्वैतदृष्टि ने ही मानव जाति के मध्य सीमाएं व् मर्यादाएं निश्चित की जैसेएक वैज्ञानिक पहचान है : - तुम्हारा स्वभाव हमसे भिन्न है इसलिए तुम उधर रहो हम इधर रहेंगे | इस प्रकार एक  सीमाबद्ध क्षेत्र अंतर्गत एक परिवेश निर्मित हुवा फिर इसी परिवेश आवेष्टित निश्चित भूभाग ने देश अथवा राष्ट्र का स्वरूप लिया | अब यदि  विपरीत स्वभाव संस्कृति के जातक अथवा उनके वंशज अपने भूभाग को छोड़ कर दूसरे के भूभाग में रहेंगे और उसपर शासन करेंगे या उसपर शासन करने की अभिलाषा करेंगे तब उस भूभाग को निर्मित करने वाले वहां के मूल निवासी अथवा उनके वंशजों को इससे आपत्ति होगी.....
  • समय आ गया है कि अब हमारी सोच सत्ता परिवर्तन अथवा नेतृत्व परिवर्तन की परिधि में संकीर्ण न रहकर व्यवस्था परिवर्तन तक विस्तारित हो | वर्तमान में भारत का जनसंचालन तंत्र दासोन्मुखी होते हुवे अतिशय दोषपूर्ण है इसे कई सुधारों की आवश्यकता है समय रहते हमने इसे दोषमुक्त नहीं किया तो ऐसी स्थिति में इसके आमूलचूल परिवर्तन की परिस्थितियां निर्मित हो जाएंगी....
  • किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता उसके संवैधानिक निबंधों से बड़ी होती है वह संविधान अंगीकार्य योग्य नहीं है जो तत्संबधित राष्ट्र के स्वातंत्र तथा उसके सम्प्रभुत्व में बाधा उत्पन्न करे.....
  • प्रबंधन सों प्रभुत बड़ा बड़ो नेम ते देस |
    सो बिधि सकारु जोग नहि करे देस जौ सेस ||

    भावार्थ : -  संचालन प्रबंधन से सम्प्रभुत्व बड़ा होता है और नियम निबंधनों से राष्ट्र बड़ा होता है वह संविधान अंगीकार योग्य नहीं है जो देश को खंड-खंड कर उसे शेष करने प्रवृत हो
  • यह गर्व का  नहीं प्रत्युत खेद  का विषय है कि सत्ता धारियों के षड़यंत्र का भाजन बना हिन्दू और उसका धर्म अपने मूल से विलगित होकर आज अपनी पहचान खो रहा है | 
  • इसका कारण हैं भारत के वह संविधान निर्माता जिन्होंने मौलिक अधिकारों के नाम पर झुनझुना पकड़ा कर भारतीयों से अतिशय छल कपट किया | मूल की सुरक्षा से मौलिकता की सुरक्षा है किसी राष्ट्र का मूल सुरक्षित तभी होगा जब उसकी मौलिकता सुरक्षित होगी, मूल तभी सुरक्षित होगा जब उसे अपने राष्ट्र का सम्प्रभुत्व प्राप्त हो | किसी राष्ट्र के मूलगत को सम्प्रभुत्व तब प्राप्त होगा जब उक्त राष्ट्र पर उसके स्वयं का नियम नियन्त्रण हो ,यह नियंत्रण 'शासन के अधिकार' से प्राप्त होता है | इस संवैधानिक नियंत्रण हेतु उन्हें संवैधानिक संस्थाओं का भारतीयकरण करना चाहिए था जो नहीं किया जबकि इसके विरोध का तर्क भी था  | ये नेहरू की चाल थी की उसने पाकिस्तान को एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप प्रस्तावित किया  | चाहते तो व एक उपनिवेश भी हो सकता था जिसका संवैधानिक नियंत्रण भारत के हाथों में होता और मुसलमान वहां जाने हेतु कभी भी किसी औपचारकता की आवश्यकता नहीं होती | जाने को वह अब भी जा सकते हैं किन्तु इन्हें भारत का ठप्पा चाहिए भारतीयों की सांस्कृतिक व् सामाजिक समृद्धि का लाभ चाहिए इस हेतु वह वहां जाना नहीं चाहते | उन्हें यह ज्ञात नहीं कि ऐसी समृद्धि के लिए पीढ़ियों का रक्त लगता है वह अपनी दरिद्र संस्कृति को भारत की घोषित कर वैश्विक पटल पर यहाँ की समृद्धि का अनुचित सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं | इस्लाम इस्लाम एक है, भारत से बाहर पूछिए क्या इस्लाम भारत की संस्कृति है ? आपको उत्तर नहीं में मिलेगा | यदि इस्लाम भारत की संस्कृति नहीं है तो फिर यह दोरंगी ( दोरंगी का अर्थ दोगली होता है )कैसे हो गई भारत की मूर्ख मीडिया व्  नेता जिसे प्राय: गौरवान्वित होकर कहा करते हैं | 
  • वह सौहर्दय ( बंधू ) न होकर शत्रु है जो राष्ट्र के खंड-खंड होने का कारण हो 
  • हम किसी समुदाय के व्यक्तिगत विषयों पर आक्षेप नहीं करना चाहिए  क्योंकि न्यूनाधिक दोष सभी में होते हैं | किन्तु इतना अवश्य है कि भारत व् भारतीय  स्त्रियों पर इस समुदाय की सदैव कुदृष्टि रही है कदाचित भारत की आर्थिक व्  सांस्कृतिक समृद्ध इसका कारण  है क्योंकि समृद्धता सदैव दरिद्रता को आकर्षित करती है |  कुछ अपवाद स्वरूप भारतियों ने मुस्लिम स्त्रियों से विवाह सम्बन्ध स्थापित किए हैं किन्तु यह कुप्रचलन बहुंत काल पश्चात् प्रारम्भ हुवा जो भारत शासन के अंतर्जातीय व् अंतरधर्म विवाह के प्रचार व् पुरष्कार का कुपरिणाम था | यदि आप किसी अन्य के निवास में वासित  हों और आपको अपनी स्त्रियों के प्रति असुरक्षा का बोध हो तो आपको वह निवास त्याग देना चाहिए  और अपने परम पिता के निवास में चले जाना चाहिए |  यदि उक्त गृह का स्वामी अपने घर में घुसे परायों से ऐसी असुरक्षा से ग्रस्त हो तो वह कहाँ जाए, ये कौन बताएगा ? किसी संविधान में यह स्पष्ट  उल्ल्खित होना चाहिए कि  वह जिस राष्ट्र हेतु अंगीकार्य हो रहा है वो राष्ट्र किसका है यदि वह उस राष्ट्र के लोगों का है तब उन लोगों का परिचय क्या है यदि उस राष्ट्र को  दास बनाया गया तो वह कौन थे कहाँ से आए थे..... 
    • भारत की सत्ता सदैव विदेशियों के हाथों की कठपुतली रही और रहेगी जब तक इस देश में दास     मानसिकता वाले वैदेशिक पूजक उत्पन्न होते रहेंगे 
    • भारत-विभाजन ने इन्हें विकल्प दिया था भारत छोड़ कर अन्यत्र जाने के लिए यह कहते हुवे ये भारत भारतियों हेतु वो तुम्हारे लिए | और ये विकल्प एक बार नहीं तीन तीन बार दिए गए थे किन्तु ये नहीं गए |
    1. अब भी विश्व में अनेकानेक इस्लामिक राष्ट्र पलक पांवड़े बिछाए बैठे हैं इन्हें अपनाने के लिए ये क्यों नहीं जाते ?
    2. इनके धर्म ग्रन्थ में उल्लखित है कि ये जब चले तो इनका मुख काबे के सम्मुख हो
    3. किन्तु ग़ालिब ने कहा '' क़ाबा मेरे पीछे कलीसा मेरे आगे ,देख तू क्या रंग है तिरा मेरे आगे'' कलीसा = कैलाश
    4. विभाजन के समय भारतीयों के बच्चे तक उठा ले गए थे ये जैसे तैसे फिर उन्हें छुड़वाया गया |
    5. प्रश्न ये है कि यदि भारतीय इनसे असुरक्षित अनुभव करें तब वो कहाँ जाएं….. ?  
    6. इनका व्यवहार इनके हृदय की भावना को अभिव्यक्त कर रहा है, इन्होने इस हिन्द को सदैव परास्त किया फिर यह जयहिंद पुकार कर अपनी हार और उसकी विजय की कामना क्यूँ करें |
    7. और यह भारत भूमि उनकी जन्म भूमि है ही नहीं फिर ये इसे माता क्यों कहे…..
    8. दासमानसिकता वाले कुछ भारतीय कुपुत्र हैं जो इन्हें भारतीय कहकर अपनी माता को इनकी बेड़ियों में बंधा देखना चाहते ये..... 
  • किसी राष्ट्र में निवासित अथवा अधिवासित समुदाय उक्त राष्ट्र के संवैधानिक नियमोपबन्धों से प्रभावित होता हैं विद्यमान शासन काल ने अब तक ऐसा कोई विधान उपबंधित नहीं किया जो भारत में अधिवासित मुस्लिमों को प्रभावित करने में सक्षम हो | पूर्व के सदृश्य उनका इस राष्ट्र पर प्रभुत्व पूर्ववत है….
  • आतंक राष्ट्रों के प्रति किया गया अपराध है अब तक किसी अन्य  राष्ट्र में हिन्दू धर्म द्वारा आतंक हुवा हो अपवाद स्वरूप भी ऐसा दृष्टांत दृष्टिगत नहीं हुवा यह भारत की सत्ता के लालचियों का एक षणयन्त्रकारी आक्षेप है जो यहाँ बहिर्देशीय वर्ग का साम्राज्य स्थापित करना चाहते हैं.....
  • >> डेढ़ शताब्दी तक हमने अंग्रेजों को सहन किया, एक सहस्त्र से अधिक वर्षों तक मुसलमानों को सहन किया और अब तक सहन कर रहे हैं उनके लिए देश के चार खंड हो गए और अधिक सहनशीलता से खंड-खंड होकर हम अपने ही देश में शरणार्थी हो जाएंगें.....विभाजन के पूर्व से ही संविधान निर्मात्री समिति को सभी संवैधानिक संस्थाओं का भारतीयकरण करना चाहिए था 
  • >> पाकिस्तान ने स्वयं कहा है भारत नया पाकिस्तान है | भारत में मुसलमानों की संख्या और उनकी सम्प्रभुता पर दृष्टिपात करें तो यह सत्य सिद्ध होगा | कल्पना कीजिए यदि भारत विभाजन नहीं होता तब भारत में मुसलमानों की संख्या कितनी होती | भारत का संविधान प्रत्येक नत्थू खैरे को शासन का अधिकार प्रदान करता है इस अधिकार द्वारा  संख्या बल प्राप्त कर कोई भी बहिर्देशीय समुदाय किसी राष्ट्र पर शासन कर सकता है और वह भी करते | तब यह देश एक इस्लामिक राष्ट्र होता | प्रवासी रूप आ बसे अधिवासियों के रोग का उपचार विभाजन तो कदापि नहीं है जबकि वह उक्त राष्ट्र के आधिकर्ता हैं | विद्यमान में दासत्व मानसिकता के कुछ लोग  इन मुसलमानों को भारतीय कहते है | आने वाली जनगणना में हमें चौंकाने वाले आकड़ें प्राप्त होने वाले हैं, ये आकड़ें हमें सोचने पर विवश कर देगें कि क्या यह देश में मुसलमानों के लिए स्वतन्त्र हुवा था क्या संविधान में किसी को भी शासन करने व् शासक चयन करने का अधिकार होना चाहिए ? यदि नहीं होना चाहिए तब फिर भारत के मूलगत निवासी क्या छलें नहीं जा रहे जहाँ उन्हें अपने ही राष्ट्र का सम्प्रभुत्व प्राप्त नहीं है.....
  • कहने का तात्पर्य है हमें और अधिक सहिष्णुता से बचना चाहिए क्योंकि सहिष्णुता की यह अधिकता शेष देश की अखंडता के लिए घातक सिद्ध हो सकती है सहिष्णुता से जन सामान्य निरपेक्ष रहा है यह सदैव नेताओं व् मंत्रियों द्वारा बहिर्देशीय समुदाय के विरोध का भावनात्मक दमन करने हेतु उपेक्षित की गई है यह विरोध भी तब होता है जब देश का चार चार बार विभाजिन हो गया, अपने सहपंथियों के साथ निवास करने हेतु विकल्प प्राप्त होने के पश्चात भी यह बहिर्देशीय वर्ग अपने पंथ के विस्तार के साथ साथ पीढ़ियों से इस देश पर राज करने के पश्चात भी इसकी सम्प्रभुता पर एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास करता हैं | दो खड्ग एक पिधान में नहीं रह सकती यह जगतविदित कहावत है दो विपरीत स्वभाव वाले समुदाय भी एक साथ नहीं रह सकते| यह देश उन भारतीयों का है जिनके माता पिता ऐसे पूर्वजों की संताने हैं जिन्होंने इस राष्ट्र को अपने रक्त से सींचा, अपनी तयाग और तपस्या से इसे जगत प्रतिष्ठित किया और अपने सत्य से इसे अनश्वर बनाए रखा | यह देश वास्तव में स्वतन्त्र हुवा था तो यह अन्योदर्य को अन्यदीय न हो इस हेतु इसके समस्त संवैधानिक संस्थाओं एवं शासकीय विभागों में ऐसे भारतीयों की प्रधानता कर देनी चाहिए थी.....
  • आधी दुनिया पर जिसका शासन हो क्या उसपर कोई अत्याचार करने का साहस कर सकता है |  ये जहाँ रहतें वहां के मूलनिवासियों को ऐसे भावनात्मक उत्पीड़न देते हैं जिससे वहां उनकी सत्ता          व् आधिपत्य स्थापित रहे | 
  • मुसलमानों के राज का विरोध करते तात्कालिक भारतीय जनमानस के आक्रोश से लड़ने में इंद्रा का धर्मनिरपेक्ष सफल सिद्ध हुवा | 
  • हिन्दू धर्म के स्वयं के अनुयायियों ही नहीं अपितु अन्य धर्मों के अनुयायियों ने भी  सत्ता हेतु इसका भरपूर दुरूपयोग किया | यह स्वयं के अनुयायियों द्वारा ही सर्वाधिक निन्दित व् उपेक्षित किया गया है.....
  • हिन्दू धर्म भारत में प्रादुर्भूत ईश्वरीय उपासना की वह पद्धति है जो प्रकृति देववाद के सिद्धांतों पर आधारित है.....
  • 'फूट डालो और राज करो' ये भी कांग्रेस द्वारा फैलाई हुई भ्रान्ति है अंग्रेजों ने चेताया था तुम अपने
    भुजाओं में पराए देश के सांप पाल रहे हो वो सांप जो एक दिन तुम्हारा देस तुम्हारी संस्कृति को डस लेंगे
    'न समझोगे तो मिट जाओगे हिन्दुस्तान वालों तुम्हारी दास्ताँ तक न होगी दास्तानों में,(अज्ञात) और ख़ाँ-ग्रेस ने इसे फूट कहा | आज ये सांप कश्मीर को डसने के लिए तैयार हैं उसके पश्चात उत्तर प्रदेश फिर हैदराबाद और केरल को डसेंगे फिर तो समूचे भारत में इनका विष फैल जाएगा
  • आर्य वस्तुत: सम्बोधन सूचक शब्द है जिसके सम्बन्ध में प्रवासी से अधिवासी हुवे मुसलमानों एवं अंग्रेजों द्वारा भारत में अपना प्रभुत्व स्थिर रखने के लिए कई भ्रांतियां फैलाई गई | खेद है की सत्ता के लालचियों ने उनकी इन भ्रांतियों का अनुमोदन भी किया | आर्य इस राष्ट्र के मूल में है जिन्होंने इस भारत भूमि को अपनी त्याग व् तपस्या से एक समृद्ध व् अखंड राष्ट्र का स्वरूप दिया…..
  • एक सहस्त्र वर्ष से अधिक अवधि तक दास बनाकर भारत के टुकड़े टुकड़े करने वाले मुसलमानों की बर्बरता की कहानी है भारत-विभाजन.....
  • धर्म और जाति वह उपकरण है जो आपकी पहचान निर्दिष्ट कर यह संसूचित करते हैं कि आप कौन हैं कहाँ से आए हैं | जातिवाद शब्द का आश्रय लेकर सर्वप्रथम नेहरू ने भारतीयों की जड़ें काटने की कुल्हाड़ी का आविष्कार किया | यह सर्वसम्मत कथन है कि नेहरू मुसलमानों के परम हितैषी थे उन मुसलामों के हित  हेतु उन्होंने इस कुल्हाड़ी से भारतीयों की जड़ें काटनी प्रारम्भ कर दी |  किसी भी सामाजिक व्यवस्था में गुणदोष दोनों होते हैं और समाज का विघटन न कर हमें दोषों का निवारण करना चाहिए | यदि निर्धनता एक दोष है तो इसका तात्पर्य यह नहीं है की निर्धन को ही समाप्त कर दिया जाए | भारत की सामाजिक व्यवस्था जातिगत वर्गीकरण पर आधारित हैं | नेहरू को ज्ञात था इस राष्ट्र का निर्माण इस जातिगत समाज के संघटन से हुवा है यदि इसे विघटित कर दिया जाए तब भारत का विघटन होने में देर नहीं लगेगी | वह दुर्भावना से ग्रसित थे, पुत्री का अंतरधर्म विवाह होने से उन्हें उसके सामाजिक बहिष्कार का भय था  | समाज ही नहीं होगा तो बहिष्कार कैसा यह विचार कर उन्होंने जातिवाद का विष फैलाया कालांतर में इस विष के प्रभाव से जातियों के जातक अपने मूल से वियोजित होते चले गए | कारण की जातिसंकरता से संक्रमित होने के पश्चात इन्हें धर्मसंकरता की नागिन डस लेती है |आज कांग्रेस अध्यक्ष पुष्कर में अपनी जड़ें ढूंढ़ आए किन्तु नहीं मिली यदि जातिवाद के नाम पर हमारी जड़ें इसी प्रकार कटती रहीं तब एक दिन हममें से किसी को ये जड़ें नहीं मिलेगी | इस प्रकार मुसलमान भारतीय तथा ये भारत उसका होता चला जाएगा | 
  • हाँ ! क्योंकि इसने एक सहस्त्र से अधिक वर्षों तक भारत को दास बनाए रखा | आधे विश्व पर स्थापित इसका साम्राज्य यह दर्शाता है कि इसका समुदाय विद्यमान समय में भी साम्राज्यवादी सिद्धांत का समर्थक है| अंग्रेजों ने तो भारत छोड़ दिया किन्तु ये भारत छोड़ने का नाम नहीं ले रहा |
  • जो प्रबंधन प्रभुत्व से रहित करता हो वह दोषपूर्ण है  से विहीन करता हो तो वह 
  • कौन अधिक दुष्ट है वह मुसलमान जिसने भारतीयों से शासन छीन कर उन्हें दास बनाया अथवा वह अंग्रेज जिन्होंने मुसलमान से शासन छीन कर उसे दास बनाया.....? 
  • संविधान से सदैव राष्ट्र सर्वोपरि होता है क्योंकि राष्ट्र के अस्तित्व से ही संविधान का अस्तित्व है | ये वक्तव्य भारत की सम्प्रभुता एवं उसकी अखंडता को निर्बल करने वाले रोगों की जड़ों के विषय में है | यदि उसे अपनी अस्मिता प्रिय है तब वह जड़ चाहे धर्म ही क्यों न हो उसे उसका निवारण करना ही होगा  | आप धर्म का नाम सुनकर इसलिए तिलमिला जाते हैं क्योंकि यह आपकी पहचान निर्दिष्ट करता है एक मुस्लिम की यही पहचान है कि वह इस देश का नहीं है जब वह इस देश का नहीं है तो  यह उसका कैसे हो सकता है | 
  • किसी राष्ट्र विशेष में जब बाहिरि समुदाय संख्या में अधिक होकर बहुमत को प्राप्त हो जाता है तब वहां लोकतंत्र असफल सिद्ध होता है यदि तत्संबंधित राष्ट्र के संविधान में ऐसे बाहरी समुदाय को शासन करने का अधिकार प्रदत्त हो | 
  • ----- || धर्मो रक्षति रक्षित: || -----यदि भारत को खंड-खंड होने से बचना है तो उसे अपने द्वारा प्रादुर्भूत धर्म की रक्षा करनी होगी | यदि वह धर्म की रक्षा करेगा तो धर्म उसकी रक्षा करेगा | 
  • इस्लाम और कैथोलिक भारत की धार्मिक विवधता का अंश नहीं हैं क्योंकि ये भारत में प्रादुर्भूत नहीं हुवे इस हेतु इनके अनुयायी भी भारतवंशी नहीं है | भारत इनके अनुयायियों द्वारा दासत्व को प्राप्त हुवा, भारतीयों द्वारा इसके विरोध का दमन करने हेतु सत्ता के लालची नेताओं ने असहिष्णुता को उत्पन्न किया  | भारत में प्रादर्भुत धर्मों के मध्य युगों से लेकर अब तक ऐसा कोई व्यवहार ही नहीं हुवा जो असहिष्णु हो | 
  •  हिन्दू शब्द धर्म का प्रतीक नहीं है जिसे हिन्दू धर्म कहाँ गया वह वैदिक धर्म या सनातन धर्म है ऐसा माना जाता है कि हिन्दू शब्द मुसलमानों ने भारत आगमन पर सिंधु नदी के तट पर वासित भारतीयों के लिए किया तथा ये 'थ' का उच्चारण 'त' करते थे इस लिए इन्होने इस देश को हिन्दुस्थान अर्थात हिन्दुओं का स्थान कहा कालांतर में यह नाम प्रचलन में आया और विद्यमान समय में भी प्रचलित है….. 
  • सोचिए ! यदि इस्लाम भारत में फलीभूत होता रहा तो भारत के भविष्य क्या होगा | निश्चित ही खंड-खंड होकर खंडहर हुवा वह भविष्य स्वतंत्रता को एक छलावा सिद्धि कर देगा और चँदोवों में पड़े भारतीय शरणार्थी होकर हम जैसे पूर्वजों को कोस रहे होंगे…..
  • प्रत्येक भारतीय को इस्लाम से भयभीत रहना चाहिए | क्योंकि वह अपनी साम्राज्वादी सोच को मूर्त रूप देने में सफल होता दिखाई दे रहा है, जिससे भारत की स्वतंत्रता छलावा सिद्ध हो रही है | भय होता है कि यदि हमारा देश दासता की बेड़ियाँ बंध गया तो हमारी आने वाली पीढ़ियां को वर्षोंवर्ष तक स्वाधीन करने वाला कोई न होगा और इसकी समृद्धि इसकी अस्मिता फिर एक बार लूट ली जाएगी…..
  • ''किसी राष्ट्र में बाह्य संस्कृति उसके आचार विचार बाह्यलोकव्यवहार सहित बहिर्लोक द्वारा उसके शासन-प्रशासन को अपने हितों का साधन बनाना ही पराधीनता है |'' कदाचित भारत स्वतंत्रता संग्राम का उद्देश्य यही था कि भारत में भारतीयों की पूर्ण सम्प्रभुता रहे किन्तु वह अपने उद्देश्य से भटक कर सत्ता संग्राम में केंद्रित हो गया | किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता का यह अभिप्राय है  कि उसपर उसकी सभ्यता संस्कृति लोकव्यवहार आचार-विचार भाषा वेशभूषा उसकी सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा करने वाले उस मूलगत का स्वामित्व हो जिसने ऐसे पूर्वजों द्वारा जन्म ग्रहण किया हो जो उक्त राष्ट्र के निर्माण में मूलभूत रहे 
  • धर्मपरिवर्तन केवल अपवाद स्वरूप ही हुवा है इस्लाम अपनी साम्राज्य वादी सोच को मूर्त रूप देने के लिए ऐसा भ्रामकता प्रसारित करने का षड़यंत्र कर रहा है | धर्म श्रद्धा उपासना प्रेम भक्ति का नाम है यह भावों से उत्पन्न होने वाली विषयवस्तु है, आप भावों को छल से तो जीत सकते हैं किन्तु बल से नहीं जीत सकते | आप बलपूर्वक मुझे नहीं कह सकते आप ईश्वर की उपासना ऐसे करो वैसे करो ऐसे चलो वैसे चलो | हाँ छल से कह सकते किन्तु छल भी अधिक दिनों तक नहीं चलता है वह भी एक न दिन समझ आ जाता और भक्त पुनश्च पूर्वानुसार आचरण करने लगता है….. 
  • आर्य वस्तुत: सम्बोधन सूचक शब्द है जिसके सम्बन्ध में प्रवासी से अधिवासी हुवे मुसलमानों एवं अंग्रेजों द्वारा भारत में अपना प्रभुत्व स्थिर रखने के लिए कई भ्रांतियां फैलाई गई | खेद है की सत्ता के लालचियों ने उनकी इन भ्रांतियों का अनुमोदन भी किया | आर्य इस राष्ट्र के मूल में है जिन्होंने इस भारत भूमि को अपनी त्याग व् तपस्या से एक समृद्ध व् अखंड राष्ट्र का स्वरूप दिया…..'फूट डालो और राज करो' ये भी कांग्रेस द्वारा फैलाई हुई भ्रान्ति है अंग्रेजों ने चेताया था तुम अपने भुजाओं में पराए देश के सांप पाल रहे हो वो सांप जो एक दिन तुम्हारा देस तुम्हारी संस्कृति को डस लेंगे'न समझोगे तो मिट जाओगे हिन्दुस्तान वालों तुम्हारी दास्ताँ तक न होगी दास्तानों में,(अज्ञात) और ख़ाँ-ग्रेस ने इसे फूट कहा | आज ये सांप कश्मीर को डसने के लिए तैयार हैं उसके पश्चात उत्तर प्रदेश फिर हैदराबाद और केरल को डसेंगे फिर तो समूचे भारत में इनका विष फैल जाएगा.....
  • आपके जैसे विचारधाराओं को ही राष्ट्र विरोधी शक्तियाँ कहा जाता है |
  • नीतिनेम बिनु देस बिनु करनधार जलजान |
    अपुना जहाँ न आपुना राजएँ तहाँ बिरान || ३५५७ || 

    भावार्थ : - नीति नियम से रहित राष्ट्र कर्णधार से रहित जलयान के समान होता है | जहाँ स्वत्व पर अपना अधिकार नहीं होता वहां उस पोत के पति पराए हो जाते हैं |
  • देसबाद बिरोधजनक पुनि बिचार की धार |
    चढ़त जगत बोहत ताहि बूड़त पाए न पार || ३५५९ || 

    भावार्थ : - जब विचारों की ये धाराएं राष्ट्रवाद अथवा सीमावाद हेतु विरोध व्युत्पन्न करने वाली होती हैं तब वह तट रूपी सीमाओं की पहुँच से विहीन हो जाता है जिससे विश्वभर के यात्री उसपर आरूढ़ हो जाते हैं और फिर असहनीय भार उस जलयान को डूबो देता है |ऐसी विचार धाराएं देश की सम्प्रभुता व् उसकी अखंडता पर निरंतर आघात करके उसे दुर्बलता प्रदान करती है | भारत में इस्लाम को इस प्रकार की शक्तियों से संपन्न इसलिए ही कहा जाता है इस्लाम से इस राष्ट्र को इस हेतु भय है कि पूर्व में भी इसप्रकार की शक्तियों का प्रयोग कर उसने इस देश को खंड-खंड कर दिया और उन खण्डों पर अपना आधिपत्य कर इसका शत्रु बन बैठा आज वह वैश्विक पटल पर उसकी निर्बलता का कारण है | सत्ता की लालच लिप्सा के वशीभूत नेताओं ने राष्ट्र के विरुद्ध षड़यंत्र किया और शत्रुपक्ष से एकता को भारतीय एकता का नारा दिया | भाईचारा 
लोकतंत्र कब विफल सिद्ध होता है 
  • धर्म निरपेक्ष से भारत के सम्प्रभुत्व व् उसकी अक्षुण्यता पर संकट मंडरा रहा है |अच्छा होगा कि हम समय पर सचेत हो जाएं अन्यथा पराधीन होकर हम अपने ही देश में शरणार्थी हो जाएंगें …..
  • कोई तंत्र तब विफल सिद्ध होता है जब वह राष्ट्रविरोधी शक्तियों व् बाहरी तत्वों को  शासन के अधिकार जैसे मूलगत अधिकारों से संपन्न  करता हो | 
राष्ट्रद्रोह 
आपके जैसे विचारधाराओं को ही राष्ट्र विरोधी शक्तियाँ कहा जाता है | ऐसी विचार धाराएं देश की सम्प्रभुता व् उसकी अखंडता पर निरंतर आघात करके उसे दुर्बलता प्रदान करती है | भारत में इस्लाम को इस प्रकार की शक्तियों से संपन्न इसलिए ही कहा जाता है इस्लाम से इस राष्ट्र को इस हेतु  भय है कि पूर्व में भी इसप्रकार की राष्ट्रविरोधी शक्तियों का प्रयोग कर उसने इस देश को खंड-खंड कर दिया और उन खण्डों पर अपना आधिपत्य कर इसका शत्रु बन बैठा आज वह वैश्विक पटल पर उसकी निर्बलता का कारण है | सत्ता की लालच लिप्सा के वशीभूत नेताओं ने राष्ट्र के विरुद्ध षड़यंत्र किया और शत्रुपक्ष से एकता को भारतीय एकता का नारा दिया | भाईचारा जैसे शब्दों का आश्रय लेकर वह राष्ट्र विरोधी शक्तियों को और अधिक शक्तिसंपन्न करते चले गए.....
जातिवाद 
हिन्दुधर्म 
  • हिन्दू समुदाय में निर्गम मार्ग सहस्त्रों हैं किन्तु उसका प्रवेश मार्ग अवरूद्ध है। ....-----रवीन्द्रनाथ टैगोरएतएव नियम व् निबंधों से सबसे अधिक अनुशासित हिन्दू धर्म है | किन्तु यदि बहिर्गमन की बात हो रही है तो सबसे अधिक इसी धर्म से बहिर्गमन हो रहा है इस प्रकार अनुशासन की आवश्यकता सबसे अधिक इसी धर्म को ही है…..
    • मुद्रा 

     वैश्वीकरण
    • किसी विषय,वस्तु अथवा विचार विशेष के दृष्टिकोण में किसी स्थान, विभाग,क्षेत्र, देश की प्रधानता निश्चित न कर उसे समग्र विश्व की प्रधानता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया वैश्वीकरण है.....
    धर्म एवं धर्मनिरपेक्ष 
    • कोई व्यक्ति या तो हिन्दू हो सकता है या धर्म निरपेक्ष | विश्व में अन्य धर्मों के सह धर्मनिरपेक्षों का भी अपना एक संख्या वर्ग है.....
    •  जो पंथों के यातायात नियमों का पालन नहीं करते वह पंथ निरपेक्ष है.....  जो  सत्य,अहिंसा,दान,त्याग रूपी   मनुष्योचित स्वाभाविक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करते वह धर्म निरपेक्ष है.....
    • ''धर्म वस्तुत: एक पंथ है ईश्वर जिसका अंतिम लक्ष्य है |''धर्म दो प्रकार का होता है एक साधारण धर्म दुसरा विशिष्ट धर्म
    •  साधारण धर्म : - "साधारण धर्म सत्य,अहिंसा,दान,त्याग रूप में वह संवेदनशील स्वभाव है जो मनुष्य मात्र में प्राकृतिक रूप से उपस्थित होता है....."

                                                                      अथवा
              " साधारण धर्म सत्य,अहिंसा,दान,त्याग रूप में वह मनुष्योचित स्वाभाविक कर्तव्य है जिसका निर्वहन                 सभी मनुष्यों को करना चाहिए....."

               विशिष्ट धर्म : - '' विशिष्ट धर्म ईश्वरीय उपासना की एक पद्धति है जिसका अनुशरण मनुष्य, मनुष्य                 समुदाय अथवा सम्प्रदाय करता है |''

    • धर्म (विशिष्ट धर्म)वस्तुत: एक पंथ है और ईश्वर उसका अंतिम लक्ष्य है | धर्मों ने भी अपने नियम विहित किए हैं दो पंथ से संचालन यातायात के नियम का उल्लंघन है नियम पथिक की सुरक्षा हेतु होते हैं इनके उल्लंघन से दुर्घटना की संभावना अधिक होती है और पथिक को गंतव्य की प्राप्ति नहीं होती |

    • अपने नाम के सम्मुख 'श्री' 'जनाब' अथवा 'मिस्टर' लगाने के लिए तत्संबधित धर्म में विहित नियमों का  दृढ़तापूर्वक पालन करना पड़ता है | राजपथ में जिसप्रकार यातायात के नियमों का पालन न कर  'लीक निरपेक्ष'अंग्रेजी में कहें तो 'लेन निरपेक्ष' होने से दुर्घटना होने की संभावना बनी रहती है और प्राण जाने खतरा रहता है उसी प्रकार पंथ निरपेक्ष होने से भी आपकी मौलिकता विनष्ट हो जाती है और आपकी पहचान खोने का खतरा रहता है.....
    • हिन्दू अथवा वैदिक धर्म ने सर्वप्रथम शौर्य मंडल और ब्रह्माण्ड का अध्ययन कर भौगोलिक विज्ञान, जीवों का वर्गीकरण कर जीव विज्ञान, धातुओं का परिशोधन कर भौतिक विज्ञान, नाना रसन का अध्ययन कर औषधि विज्ञान,जनसंचालन प्रबंधन तंत्र का निरूपण कर राजनीतिविज्ञान, मानव समूह को समाज का स्वरूप देकर सामाजिक विज्ञान को प्रतिपादित किया था अत: हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ वैज्ञानिक धर्म कहा जाता है.....
    • जिस प्रकार बल से बड़ी बुद्धि होती है क्योंकि : -धनुधर के सर कदाचित, करे न एकहु हास । बुद्धमान के बुद्धि सन, सर्वस् करै बिनास ।१६७५।  ------ ॥ विदुर नीति ॥ -----भावार्थ : -- शस्त्र धारी का शस्त्र चले तो कदाचित एक भी न मरे । यदि बुद्धिमान की बुद्धि चल गई तो वह सर्वस्व का नाश  कर देती है ॥उसी प्रकार : लिखनिहि सौंही बड़ी नहि करतल गहि तलबार |तलबारि की धार सहुँ बड़ी सब्द की मार ||भावार्थ : - तलवार से बड़ी लेखनी होती है क्योंकि तलवार की धार से शब्द की मार गहरी होती | तलवार का वार एक बार मारता हैं शब्द का वार वारंवार मारता हैं
    • प्राचीन समय में मुद्रा अस्तित्व में नहीं थीं और समूचा वाणिज्यिक प्रबंधन वस्तु-विनिमय पर आधारित था | एक दो सहस्त्र वर्ष के पश्चात की पीढ़ियां हम पर हँसेगी कहेंगी ये लोग कितने मूर्ख थे कागद के कुछ टुकड़ों के बदले अपना सर्वस्व देने को तैयार रहते थे अब जो अंक मुद्रा का चलन आ गया भविष्य में वह और अधिक हास्यास्पद सिद्ध होगा | जो भावी समय होनेवाला है उसे वर्तमान में क्रियान्वित कर हमें अपनी निर्यात नीति का सुधारीकरण करना चाहिए और अन्न में मुद्रा के व्यवहार को अस्वीकृत कर उसके बदले अन्न को प्राथमिकता दें इस उपाय से निश्चित ही हमारी मुद्रा दृढ़ और अर्थ व्यवस्था सुदृढ़ होगी.....
    • गांधी का समर्थन विदेशी शिक्षा ग्राहियों व् अंग्रेजी बोलने वालों को ही होता था | विदेशी वस्तुओं की होली एक ढकोसला था…..
    भारत में व्याप्त अंधविश्वास
    • महीनों तक बोतलों में बंद पानी व् शीतल पेय शुद्ध व निर्मल होता हैं
    • तीन तीन चार चार दिनों तक शीतलगृह में पड़ा भोजन स्वास्थ को हानि नहीं पहुंचाता
    • मांस-मछली भक्षण सभ्यता व् आधुनिकता है | 
    • नग्नता नारी स्वातन्त्र की प्रतिक है | 
    • रासायनिक उर्वरा से उत्पादन में वृद्धि होती है |
    • संकरता ( दो भिन्न जातियों के संयुग्मन से एक नई जाति प्राप्त करना ) आधुनिक विचार है
    • ऐलोपैथिक चिकित्सालय खुलने चाहिए, एलोपैथिक उपचार से हम स्वस्थ हो जाएंगे |
    • उद्योगिक अपशिष्टों के नाले नालियों से नदिया मैली नहीं होती |
    • वाहन के अत्यधिक प्रयोग से प्रदुषण नहीं होता वो तो पड़ोस के खेतों में पैरा जलाने व् गायों के रम्भाने से होता है |द्वारा वेदों में प्रादुर्भूत 
    • भू सम्पदा के अधिकाधिक उत्खनन से राष्ट्र समृद्ध होता है |
    • भू सम्पदा से प्राप्त खनिज उत्पादन है ( जबकि यह उत्पादन नहीं है )|
    • पाश्चात्य संस्कृति एक समृद्ध संस्कृति है |
    • भारतीय वैदिक सामाजिक व्यवस्था पिछड़ी सामाजिक व्यवस्था है, और पाश्चात्य वाली अग्रणी है 
    • इ वी एम् मशीन कभी हैक नहीं हो सकती 
    अलंकार 
    • रस व् अलंकार, संस्कृत व् हिंदी व्याकरण का एक अंग है जिसका अर्थ विभूषण है इसका प्रयोग काव्यरचना में किया जाता है सर्वाधिक उत्तम श्रृंगार रस प्रधान अलंकार को माना गया है, क्योंकि : - 
    • यदि काव्य एक स्त्री है तो श्रृंगार रस उसका  सौभाग्यचिन्ह है | 
    निर्धन रेखा 
    • क्या भारत शासन में छः अंकीय भृति एवं अन्यान्य  लब्धियों से युक्त पद पर पदस्थ  व्यक्ति को अत्यंत निम्न आय वर्गीय चिन्हित कर निर्धन रेखा के नीचे की श्रेणी में रखा जाएगा ?  भले ही वह उक्त वृति व् उपलब्धियां ग्रहण न करता हो तथा वह किसी अन्य संपत्ति का स्वामी भी हो ?
    विवाह की परिभाषा एवं हिन्दू विवाह
    • स्त्री पुरुष के पारस्परिक सम्बन्ध एक इकाई का निर्माण करते हैं प्रत्येक ईकाई से अधिकार के सह कतिपय उत्तरदायित्वों की भी व्युत्पत्ति होती है | इन उत्तरदायित्वों के निर्वहन हेतु ली जाने वाली शपथ विवाह है |
    • ईसाई की मैरिज एक व्यवहार है, चूँकि उभय पक्षों की परस्पर सहमति संविदा का लक्षण है एतएव मुस्लिमों का निकाह एक संविदा है | हिन्दू विवाह में स्त्री पुरुष को परस्पर परिणद्ध किया जाता है इस हेतु यह एक बंधन (बॉन्ड)है जो मनुष्य के संस्कार स्वरूप में ग्रहण किया गया है यह संस्कार उसके पाश्विकता को परिशोधित करते थे |
    • शपथ  हेतु साक्षी का भो होना आवश्यक है हिन्दू धर्म में अग्नि को साक्षी माना गया और बंधन को दृढ़ता प्रदान करने हेतु ग्रहों के द्वारा सूर्य की परिक्रमा से अग्नि के परिक्रमण की रीति को प्रचलित किया  |
    • स्त्री का पुरुष के गृह में गमन एक समाजिक व्यवस्था के रूप अंगीकृत किया |
    • विवाह के पूर्व विभिन्न प्रकार की प्रथाएं व् रीतियां  विवाह को उत्सव का स्वरूप देने हेतु अपनाई गई थी तैलहल्दी जैसी रीति केवलमात्र परिणेय का सौंदर्योपचार हेतु व्यवहारित की गई |वर पक्ष के बंधू बांधव द्वारा सडकों में ढोल बजाकर वधु का लाने की प्रथा श्री रामायण से प्राप्त की | विश्व मान्य इतिहास ने इसे सिंधु घाटी की सभ्यता काल की प्रथाओं से सुमेलित किया |
    • चूँकि किसी इकाई के संचालन हेतु कतिपय निधियों की भी आवश्यकता होती है इस हेतु दान की प्रथा प्रचलित की | उपहार की प्रथा तो सभी धर्मों द्वारा अपनाई गई | उपहारों के इस लेनदेन को भारतीय संविधान ने विशेषकर हिन्दू धर्मावलम्बियों हेतु  दायजा या दहेज़ कहकर उसे आपराधिक कृत्य की श्रेणी में रखा | जबकि स्वेच्छा से दी गई कोई वस्तु आपराधिक कृत्य न होकर पुण्यकृत्य है.....
    समसामयिक घटनाएं इतिहास नहीं हुवा करती |
    1. समसामयिक घटनाएं इतिहास नहीं हुवा करती | राजस्थान ने इन घटनाओं को इतिहास बताकर बच्चों हेतु विषयात्मक न्यूनता उत्पन्न की है |
    2. सत्तासूत्र जिसके हाथों में होता हैं शासन भी उसी का मान्य होता है अधीनस्थ केवल आज्ञाकारी होते हैं |यह निर्णय करने का अधिकार सत्ताधारी का होता है कि वह कौन सी घटना को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करे कौन सी नहीं किंतु सत्ताधारियों को इस बात का भी विशेष ध्यान रहना चाहिए कि पाठ्यक्रम ज्ञानपरक, गुणवर्द्धक व् नैतिकता की शिक्षा देनेवाला हो पाठ्यक्रम की विषयसूची केवल मात्र उदरपूर्ति का माध्यम न बनकर बच्चों का चारित्रिक गठन करे |
    3. घटनाएं समसामयिक हो अथवा ऐतिहासिक वह उनके वास्तविक तथ्यों का उल्लेख करे और किसी प्रकार का भ्रम उत्पन्न न करे |
    4. पाठ्यक्रम देश व् उसके धर्म (देश विशेष में प्रचलित संस्कृति सभ्यता भाषा अचार-विचार, आहार-विहार रीति -प्रथा व् उसके जातक ) के प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना उत्पन्न न करे |
    राजनीति
    • किसी विचार अथवा प्रबंधन को दी गई हमारी अभिमति हमें उसे धिक्कारने के अधिकार  से वंचित करती है | मतदान के पश्चात उसे धिक्कारने का कोई औचित्य नहीं है | साम, दाम, दंड, भेद राजनीति के नहीं अपितु विजय प्राप्त के चार उपाय हैं जो वेदों में विहित हैं जिसका दुरूपयोग वर्तमान में सत्ताप्राप्ति हेतु हो रहा है |
    • राजनीति : -''कार्य विशेष की सिद्धि हेतु प्रयुक्त होने वाला वह युक्ति व् आचरण है जो लोक व्यवहार के निर्वाह हेतु निश्चित किया गया है |''
                                                अथवा
    • सरल शब्दों में : - राजनीति वस्तुत: एक युक्ति है जो संसार, पृथ्वी, अथवा उसका कोई भूभाग, कोई प्रांत तथा उसमें निवासित प्रजावर्ग, समूह, समाज के व्यवहारों के सरल रूप में निर्वाह हेतु निश्चित की गई है |
    नीति परक विचार 
    • सत्य है इस प्रकार के व्यक्ति उस व्यवसाय वर्ग से आते जो धर्म व् जातियों का भावनात्मक दुरूपयोग कर अपना उल्लू सीधा किया करते हैं | किन्तु जहाँ तक एक सामान्य व्यक्ति का प्रश्न है सबको अपने अपने धर्म में दृढ़ रहना चाहिए किसी कारण वश धर्म परिवर्तन करना पड़े तो वह अपने परिवर्तित धर्म में निष्ठवान रहे वारंवार पंथ परिवर्तन से दुर्घटना का भय बना रहता है |
    • धर्म को नहीं धर्म में परिवर्तन करें और वही परिवर्तन अंगीकार योग्य है जो समस्त विश्व के लिए कल्याणकारी हो.....
    • शास्त्रों में लिखा है कि गर्भकाल अत्यंत पीड़ा जनित व् कष्टमय काल है जन्म के पश्चात वह स्मरणातीत हो जाता है | यदि वह स्मृति होने लगी तब हमें कदाचित अपने शरीर में उस पीड़ा का अनुभव होने लगेगा.....
    • यदि चरण हैं तब मार्ग की आवश्यकता भी होगी ये ग्रन्थ ऐसे मार्ग का निर्माण करते हैं संसार में वही ग्रन्थ सद्ग्रन्थ है जो सन्मार्ग का निर्माण करते हैं और वह मार्ग सन्मार्ग हैं जो हमें ईश्वर तक पहुंचाते हैं.....
    • अपेक्षित विषय, वस्तु, विचार, कार्य, हेतु जन सामान्य के अभिमत का संग्रह जनमतसंग्रह है...
    •  जो अंतिम स्वांस तक सीखता है मरणोपरांत वही गुरु कहलाता हैयदि हमारी सीख स्वार्थ हेतु न होकर परमार्थ हेतु हो.....
    • एतएव भारतीय समाज अन्तर्जाती व अंतरधर्मीय विवाह से स्वयं को बचाए | क्योंकि इस प्रकार की विवाह से उत्पन्न संतानों से उनकी भारतीयता छीनी जाएगी और भारतीय कहीं दिखाई नहीं देंगे | भारतीयों से ही भारत है और भारत है तो भारतीयता है | भारतीयों के रहने से पर बाहरी लोग इसकी सांस्कृतिक,सामाजिक व् वानस्पतिक समृद्धि से स्वयं को सम्पन्न करते चले जाएंगे |
    दिव्यांग एवं विकलांग में अंतर 
    • और चार दिन के प्रधानमंत्री सत्ता के धुरंधर अवश्य होंगे किन्तु शब्दों के नहीं | दिव्यांग और विकलांग दोनों शब्द परस्पर भिन्नार्थी है यह शब्द न होकर शब्द युगम हैं यदि इस युग्म का संधि विच्छेद करेंगे तो हमें ज्ञात होगा कि  
    1. दिव्य + अंग = वह दिव्याङ्ग  जिसके अंग अलौकिक हैं,प्रदीप्तवान वान हैं लोकातीत हैं वह दिव्यांग जैसे : - चतुर्भुज, दसभुजा,चतुरानन
    2. विकल+ अंग = वह न्यूनाङ्ग जिसके अंग खंडित हैं, क्षुब्ध हैं ,निस्तेज हैं, अपूर्ण हैं,क्षीण हैं, बलहीन हैं
    अंतर्जाल का जगत और साहित्य 
    • अपने नाम के सम्मुख कवि साहित्यकार और पत्रकार लिखकर 'कपटवेशी लेखक' तो बहुंत से बन गए हैं |  हाँ ! यह सत्य है कि अंतर्जाल ने लेखन  प्रतिभाओं को अपनी भावों को अभिव्यक्त करने का एक मंच दिया है एक ऐसा मंच जिसका उपयोग वह दैनिक जीवन का निर्वाह करते हुवे  बिना किसी आडम्बर व् लोक प्रदर्शनी के कर सकते है, इस मंच हमारे देश की महिलाएं बहुंत प्रसन्न हैं | साहित्य व् पत्रकारिता जगत अभी भी समाचार पत्रों पर प्रकाशित लेखकों को ही लेखक या साहित्यकार की उपाधि देता है समय आ गया है वह अब समाचार पत्र पत्रिकाओं के जगत से बाहर निकल कर अन्तर्जालजगत का भी अवलोकन करे क्योंकि यहाँ श्रेष्ठ लेखकों की अर्हताओं को पूर्ण करती बहुंत सी ऐसी प्रतिभाएं हैं जो साहित्यिक आडम्बरों सो रहित है वह लोकप्रदर्शनी नहीं चाहती | 
    सभ्यता  
    • पाश्विकता से पृथक कर मानवीय गुणों का क्रमबद्ध विकास ही सभ्यता है | 
    • मानव को पाश्विक दोषों से परिष्कृत कर गुणों की प्राप्ति के लिए आवश्यक धर्म का विकास संस्कृति है| 
    • भाषा, वेशभूषा, आहार-विहार,आचार-विचार सभ्यता व् संस्कृति के आवश्यक कारक हैं | 
    • पाश्विक लक्षणों से पवित्रीकरण करने वाले कृत्य संस्कार कहलाते हैं | नाम न होना, विवाहेतर संबंध, केश, मांस व् कच्चा अन्न ग्रहण करना आदि  पशुओं का नाम नहीं होता तो उसका नामकरण संस्कार करते हैं, पशुओं में केश होता है इसे केशमुक्त करने के लिए उपनयन संस्कार करते हैं, पशु विद्याध्ययन नहीं करते विद्याध्ययन संस्कार करते हैं, मनुष्य पशुओं से इतर मांसभक्षण न कर पके अन्न का भोजन ग्रहण करे इस हेतु अन्नप्राशन का संस्कार किया जाता है, मृत होने के पश्चात पशुओं से इतर उसके देह की उत्तम गति हो इस हेतु अंतिम संस्कार किया जाता है | 
    • कोई संस्कृति उत्तम तभी कहलाती हो जब वह मनुष्य के पाश्विक  दोषों को अधिकाधिक परिष्कृत करने में समर्थ हो | जैसे : - नग्नता एक पाश्विक दोष है वेश इस दोष को परिष्कृत करते हैं, मांसभक्षण एक पाश्विक दूषण है तो शाकाहार इस दोष का परिष्करण है इस प्रकार परिष्करण के अधिकाधिक सांस्कृतिक उपकरणों से युक्त संस्कृति उत्तम कहलाती है तथा ऐसे संस्कृति से युक्त मनुष्य अधिकाधिक सभ्य है | 
    • संस्कृति भी संपत्ति है अधिकाधिक सांस्कृतिक संपत्ति से युक्त समाज समृद्ध कहलाता है 
    • कोई राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था संपन्न हो तो यह आवश्यक नहीं की उसकी सामजिक व्यवस्था भी समृद्ध हो | 
    • विद्यमान समय में केवल भारतीय सामाजिक व्यवस्था ही सभ्यता के चरमोत्कर्ष पर है इस चरम पर उसे संतुलन की आवश्यकता है किंचित असंतुलन से वह पतन की ओर अग्रसर होगी 
    • विश्व की अन्य सामुदायिक अथवा सामाजिक व्यवस्थाएं  विकास शील एवं पिछड़ी या पाश्चात्य हैं भविष्य में ये समाज अथवा समुदाय सांस्कृतिक समृद्धि को प्राप्त होकर  सभ्यता के चरम को भी प्राप्त हो सकते हैं और असंस्कृत होकर अधोगति को भी प्राप्त हो सकती हैं 
    • वर्तमान में सभी मानवजाति समूह सभ्यता के किसी न किसी सोपान पर खड़े हैं इस हेतु किसी नई सभ्यता के उत्पन्न होने की सम्भावना लगभग समाप्त हो चुकी है|  
    पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम १९६० 
    • पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम १९६० तो हैं किन्तु ये किसी दोषी को दण्डित करने में प्रभावशील सिद्ध नहीं हो रहे या यूँ कहें कि सही ढंग से काम नहीं कर रहा | आज नियम रचयिता शासन स्वयं ही इसका खुल्लमखुल्ला उल्लंघन कर  रक्षा पक्ष को उलटे कट्टर कहकर अपराधी को संरक्षण दे रहा हैं | और प्रशासन भी अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रहा | ऐसे प्रकरण लेकर थाने जाओ तो भगा दिया जाता है यह कहकर कि यहाँ मनुष्य की रखवाली हो नहीं रही पशुओं की कहाँ से करें | 
    सिद्धांत 
    • सिद्धांतों की नीव पर प्रयोगों का भवन निर्मित होता है 
    नीति 
    अन्याय को प्रतिबंधित करने वाले प्रावधान उत्तम नियम हैं 
    न्याय का नियमन करने वाले उत्तम नियमों का प्रावधान उत्तम नीति है 

    इसके विपरीत 
    न्याय को प्रतिबंधित कर अन्याय का प्रावधान करने वाली नीति दुर्नीति है 

    Wednesday, 23 January 2019

    ----- ॥ टिप्पणी १८ ॥ -----,

    भारत  
    • हम आज भी इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि सिंधुघाटी के पतनोपरांत सिंधु घाटी के लोग कहाँ गए और नई नई कहानी गढ़कर भारत के लोगों को ही भारत आगमन होना बताया गया | जबकि उस समय विश्व यातायात  के साधनों से नितांत वंचित था |  जब वह अपने पैरों पर ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाया था तब एकमात्र भारत के लोग ऐसे थे जिन्होंने चक्र और नौका का आविष्कार किया और यातायात के साधनों से परिचित हुवे | इनका जाना यदि कहीं उल्लखित होता तब वह  तथ्य मान्य होता किन्तु  सभ्यता के चरम शिखर को प्राप्त प्रगति पथ का अग्रदूत हुवे राष्ट्र में असभ्यों का आना असंभव सी बात है | 
    • ऐसा अनुमान है कि और डेड सौ वर्ष पश्चात जब पृथ्वी की भूसम्पत्ति उत्खनित हो चुकी होगी तब ऊर्जा के स्त्रोत समाप्ति की कगार पर पहुँच जाएंगे यदि ये नेता-मंत्री इसी प्रकार हवा में उडते और उड़ाते रहे तब तो उसे समाप्त होने में डेड सौ वर्ष भी नहीं लगेंगे | अच्छा होगा कि हम अपने बच्चों को गौ पालन कर कंडे बनाना  सिखाएं | जिससे उनकी आनेवाली पीढ़ी भोजन को पका कर खा सके और सभ्य रहे | 
    • प्राचीन समय में मुद्रा अस्तित्व में नहीं थीं और समूचा वाणिज्यिक प्रबंधन वस्तु-विनिमय पर आधारित था | एक दो सहस्त्र वर्ष के पश्चात की पीढ़ियां हम पर हँसेगी कहेंगी ये लोग कितने मूर्ख थे कागद के कुछ टुकड़ों के बदले अपना सर्वस्व देने को तैयार रहते थे अब जो अंक मुद्रा का चलन आ गया भविष्य में वह और अधिक हास्यास्पद सिद्ध होगा | जो भावी समय  होनेवाला है उसे वर्तमान में क्रियान्वित कर हमें अपनी निर्यात नीति का सुधारीकरण करना चाहिए और अन्न में मुद्रा के व्यवहार को अस्वीकृत कर उसके बदले अन्न को प्रथम प्राथमिकता दें इस उपाय से निश्चित ही हमारी मुद्रा दृढ़ और अर्थ व्यवस्था सुदृढ़ होगी.....
    • किसी राष्ट्र अथवा किसी विरोधी समुदाय का दमन करने हेतु दूसरे राष्ट्र अथवा समुदाय द्वारा भयोत्पादक तत्वों का अवलम्बन ही आतंकवाद है.....
    • एक निश्चित भूखंड के लिए 'राष्ट्र' ( नेशन ) एवं वहां के वासियों हेतु 'जन' (प्यूपिल)शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वैदिक काल में किया गया था..... 
    • लोक हो अथवा राज जनमानस को शासन के द्वारा संचालन के तंत्र का मंत्र विश्व को भारत ने दिया है ऐसा विश्व प्रमाणित इतिहास में उल्लेखित है 
    • भारत आपके लिए व्यापारिक संस्थान हो सकता है हम भारतियों के लिए तो यह देश एक गृह एक मंदिर के समान है जिसके स्वामी पति अथवा पिता होते हैं पति व् पितृभक्ति इस देश की संस्कृति है कितनी भी दुर्दशा हों हमें अपना गृह अपना देश नहीं बदलना चाहिए ये संस्कार हमें दिए गए हैं.....


    • जाके पूर्बज जनम भए जाहि देस के  मूल | 
              जनमत सो तो होइआ सोइ साख के फूल || ३४०० || 
              भावार्थ : - "कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र का मूल नागरिक है यदि उसके पूर्वजों की जन्म व् कर्म भूमि         उक्त राष्ट्र की भूमि रही हो तथा उसका जन्म ऐसे पूर्वजों द्वारा उत्पन्न माता-पिता से हुवा हो |"  और उसने ऐसे पूर्वज सहित ऐसे मातापिता के धर्म से भिन्न धर्म क्यों न अपना लिया हो आपकी इस बात प् संदेह है कि भारत के ९० प्रतिशत मुसलमानों के माता-पिता सहित उनके पूर्वजों की जन्म व् कर्म भूमि भारत थी 


    •  देश तो एक सहस्त्र वर्ष तक इस्लाम ने भी चलाया था डेढ़ शतक वर्ष तक अंग्रेजों ने भी  चलाया था उसका विरोध हुवा |  किसी राष्ट्र को स्वहित का साधन बनाने वाले विचार ही राष्ट्र विरोधी विचार हैं  ये सत्तधारी दल भी इसी विचारधारा से ओतप्रोत हैं जो इस्लाम की है और जो कभी अंग्रेजों की हुवा करती थी-----
    • भारतीय धर्म शास्त्र एवं प्रसिद्द वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के वर्गीकरण सिद्धांत के अनुसार : - धर्म व् जाति जीव की एक वैज्ञानिक पहचान है न की भौतिक
    • किसी अन्य के स्वभाव अथवा धर्म को अंगीकृत करने से मौलिकता परिवर्तित नहीं होती वह यथावत रहता है दो विपरीत स्वभाव वाली जाति  व् धर्म के संयुग्मन से यह परिवर्तित होती है  इस संयुग्मन को संकरण अथवा hybridisation कहते हैं और इससे  उत्पन्न संतति को ही संकरित संतति या हाइब्रिड स्पीसीज कहते हैं..... अब पाम यहाँ आकर बोलेगा की में भारतीय हूँ तो केवल सत्ताधारी ही उसे भारतीय मानेगें विज्ञान और भारतीय उसे नहीं मानेंगे.....और आम जाकर बोलेगा की में अमेरिकन हूँ तो आप ही उसे अमेरिकन मानेगें विज्ञान और हम तो नहीं मानेगे हाँ उसने पाम से बच्चे दे दिए  तब हम कहेंगे ये बच्चे खाम खाँ हैं | 
    • धर्म और जाति वह उपकरण है जो आपकी पहचान निर्दिष्ट करता  है आप कौन हैं कहाँ से आए हैं इसके संसूचक धर्म व् जाति है, यदि यह उपकरण नहीं होता तो  बाह्य  आँतरिक में भेद करना कठिन हो जाता | राष्ट्रवाद इस भेदवाद अथवा द्वैतवाद  पर अवलम्बित हैं द्वैतवाद के बिना राष्ट्रवाद की कल्पना नहीं की जा सकती, द्वैतदृष्टि ने ही मानव जाति के मध्य सीमाएं व् मर्यादाएं निश्चित की जैसेएक वैज्ञानिक पहचान है : - तुम्हारा स्वभाव हमसे भिन्न है इसलिए तुम उधर रहो हम इधर रहेंगे | इस प्रकार एक  सीमाबद्ध क्षेत्र अंतर्गत एक परिवेश निर्मित हुवा फिर इसी परिवेश आवेष्टित निश्चित भूभाग ने देश अथवा राष्ट्र का स्वरूप लिया | अब यदि  विपरीत स्वभाव संस्कृति के जातक अथवा उनके वंशज अपने भूभाग को छोड़ कर दूसरे के भूभाग में रहेंगे और उसपर शासन करेंगे या उसपर शासन करने की अभिलाषा करेंगे तब उस भूभाग को निर्मित करने वाले वहां के मूल निवासी अथवा उनके वंशजों को इससे आपत्ति होगी.....
    • राष्ट्रविरोधी नेतृत्व के प्रति प्रत्येक नकारात्मक विचार राष्ट्र व उसके जनसामान्य हेतु सकारात्मक होते हैं
    • ये दोनों दल एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं ये दोनों ही दल राम राम कर भारत की सत्ता के सिंहासन पर चढ़े और इस्लाम-इस्लाम कर उतर गए, यदि ये यूँही इस्लाम-इस्लाम खेलते रहेंगे तो एक दिन जागरूक भारतीय इस लोकतंत्र के खेल का सत्यानाश कर देगा…..
    • सत्ता निरंकुश न हो इस हेतु  लोकतांत्रिक दलगत शासनप्रणाली की संसद्सभा में एक शसक्त विपक्ष का होना परम आवश्यक है | एक विपक्ष का यह कर्तव्य है कि वह शासक की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश रखे  | किन्तु कई बार ऐसा दृष्टिगत हुवा कि राष्ट्रहित विषयों के निर्णय व् नियम नीतियों के निर्धारण में विपक्ष ने अकारण बाधाएं उत्पन्न कर राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को तिलांजलि दे दी  | ऐसा भी दृष्टान्त मिला जब राष्ट्रहित विषयों के विरुद्ध दोनों ही पक्ष मतैक्य थे ऐसी मतैक्यता ने राष्ट्र की सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया | पक्ष हो अथवा विपक्ष राष्ट्र तथा उसकी सम्प्रभुता की रक्षा करना उनकी प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए | संविधान से सदैव राष्ट्र सर्वोपरी होता है क्योंकि राष्ट्र के अस्तित्व से ही संविधान का अस्तित्व है इस हेतु उभय पक्षों को चाहिए कि वह चारों ओर से राष्ट्र की रक्षा करें इस उपक्रम में वह ऐसे प्रावधानों का उपबंध करें जिससे उसकी अखंडता पर आंच न आए.....    


    •  यदि ये दल सत्ता हेतु हिन्दू धर्म का दुरुपयोग करके ''मुख में राम-बगल में इस्लाम''' रखना छोड़ दे तो यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा यदि नहीं छोड़ेंगे तो लोकतंत्र वाट लग जाएगी.....
    • भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी कौड़ियों के भाव में बिकी थी और उसका  क्रेता एक भारतीय है ऐसा मैने कहीं पढ़ा था.....
    • भगवान शिव-पार्वती के विवाह से,

              करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा | गनन्ह समेत बसहि कैलासा ||
              हर गिरिजा बिहार नित नयऊ | तेहिं सिंगार न  बखानत कहउँ  ||
              प्रसंग : - यह पंक्तियाँ भगवान शिव व् गिरिजा के विवाह पश्चात का प्रसंग है
              भावार्थ : विवाह पश्चात शिव-पार्वती विविध प्रकार की प्रणयक्रिया करते हैं और गणों समेत कैलाश पर              रहने लगते हैं ये नित्य नए विहार करते हैं तुलसी दास जी कहते हैं : -  विवाह पश्चात उनके श्रृंगार का मैं             वर्णन नहीं कर सकता क्योंकि वह जगत के मात-पिता हैं |

    • गंगा हमारी परिष्कृत संस्कृति की द्योतक है इसे दूषित कर हम एक दिन गंगाजल को भी समाप्त कर देंगे.....
    •  'आम के आम और गुठलियों के दाम' अर्थात उत्पाद के साथ साथ उसके अवशिष्ट से भी लाभ अर्जित करना | शास्त्रों में कृषि कर्म को संसार की सबसे उत्तम आजीविका कहा गया है | कृषि कर्म में उपज से आय तो होती ही होती है साथ ही इसके अवशिष्ट से भी लाभार्जन किया जा सकता है | कृषोपज का अवशिष्ट गौमाता का भोजन है यदि कृषि हमारी आजीविका है तब हमें गौपालन अवश्य करना चाहिए | गौ माता आय का एक बहुआयामी साधन है इससे हमें अमृत तुल्य गौरस, खेतों की पोषणकारी उर्वरा, ईंधन के रूप जैविक गैस और गौमूत्र के रूप कीटनाशक व् रामबाण औषधि प्राप्त होती हैं | आजकल शुद्धता की अत्यधिक मांग हो चली है लोग इसके मुंहमांगे दाम देने को तैयार हैं हम दुग्ध से दुग्धडेयरी का अतिरिक्त व्यवसाय कर सकते हैं जहाँ विशुद्ध खोवा,घृत,छेना-पनीर, नवनीत, दही,मही का निर्माण इकाई के रूप में किया जा सकता है | खोवे व् छेने से विशुद्ध मिष्ठान तैयार कर उसके भण्डार या शोरूम खोले जा सकते हैं  शुष्क गौमय के चूर्णकर उसकी धूप अगरबत्ती आदि  पूजन सामग्री की लघु इकाई भी स्थापित की जा सकती है | हाँ खेतों के किनारे किनारे हम फलदार वृक्ष लगाना न भूलें ये रसीले फल प्रदान करने के साथ साथ आपके खेतों की मिटटी के कटाव की रोकथाम करते है | तो देखा साथियों इस प्रकार हम आम के साथ उनकी गुठलियों के दाम ही अर्जित नहीं करते प्रत्युत उनके छिलकों को भी सोना बना सकते हैं आवश्यकता है तो थोड़ी लगन और थोड़े परिश्रम की.....
    • कहते हैं तलवार विश्व का सबसे घातक हथियार है और इससे भी अधिक घातक लेखनी है.....
    • ये लाल गुलाबी भारत जिनके भीषण रक्तपात कहानी कहते हैं उन मुगलों, मुसलमानों की सत्ता भारत में आज भी यथावत है आज के अकबर संसद में बैठे हुवे हैं और राणा प्रताप को जनसामान्य में नक्कार खाने की तूती बना दिया गया है | सुचना के माध्यम जब तब उसे भरमाते हुवे कहते हैं मत दो ! तूती कहता है क्यों दूँ ? उत्तर मिलता इसलिए कि यह तुम्हारा अधिकार है इसलिए कि तुम्हें लोकतन्त्र सुदृढ़ करना है वह कहता है अकबरी सत्ता वाला लोकतंत्र ? उत्तर मिलता है यदि तुमने मत नहीं दिया तो ऐसे वैसे लोग संसद पहुँच जाएंगे | तूती कहता है जब मत दिया ही नहीं तब कोई कैसे संसद पहुँच सकता है ? उत्तर मिलता है जनादेश को धत्ता बताकर जैसे अपने वित्त मंत्री पहुंचे थे | अच्छा होगा कि तुम उसे मत देकर पहुंचाओ अन्यथा जिसे संसद पहुंचना है वो तो पहुंचेगा ही | तूती प्रश्न करता है क्या हम स्वाधीन हैं ? क्या देश स्वतंत्र है ? मुग़ल मुसलमान गए नहीं क्या ये लोकतंत्र है ? समय आ गया है अब हम किसी नए तंत्र का चिंतन करें जो दासोन्मुखी न हो, जो पतनोन्मुखी न हो,जो  राष्ट्र विरोधी न हो,  जो भारत की मौलिकता का संरक्षण कर उसकी सीमाओं का संवर्द्धन करे, जो बुराइयों व् समस्याओं से रहित हो, तब तक हम मत तो दें किन्तु स्वयं को.....|


    >> जब देश की बुद्धि रूपी इस संसद में चलचित्र के तारक तारिकाएँ बैठे हों, आपराधिक तत्व बैठा हो, दुश्चरित्रता बैठी हो तब उसे भ्रष्ट तो होना ही है और जब इस बुद्धि में देश को दास बनाने वाले बहिर्देशी भी बैठे हों तब इस देश के टुकड़े-टुकड़े होना भी निश्चित है.....

    >> पहिरत सोई कापड़ा पावत सोई रोटि |
         तापर सत्ता हेतु किए बुद्धिहि आपुनि छोटि ||

    >> माहो-अख्तर रखने की है औक़ात तो आसमाँ हो तुम..,
         वर्ना तो एक मुश्ते ख़ाक का ज़र्द ज़र्रा हो तुम..,
        रोजो करता है जफ़ा ज़ब्ह -ओ -जुल्मो सितम..,
        उस कमज़र्फ आदमी कहते हो हाँ खुदा हो तुम.....



    • होगी संख्या अल्पतर जब भारत तेरी संतान की.
       राज करेगा मुस्लिम सत्ता होगी मुसलमान की.....

    हो रही जो दशा सुनो जम्मू और कश्मीर की
    हो रही जो दशा अवध में राम के मंदिर की

    पाकर दाता फिर से शक्ति तेरे मतदान की
    राज करेगा मुस्लिम सत्ता होगी मुसलमान की.....


    >> योग्यता  की उपेक्षा करने वाले (आरक्षण के समर्थक)योग्यता अपेक्षा न करे.

    >> लक्ष्मी का पाणिग्रहण कर लक्ष्मीवान बनना यदि मूर्खता है तो यह मूर्खता अच्छी है.....

    >> जिन्हें राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्ष, आतंकवाद जैसे शब्दों की परिभाषा ज्ञात नहीं वह देश के शासक बनने हेतु लालायित हैं.....दुर्भाग्य.....!!

    >> पाखंडी कारागार से मुक्ति अभिलाषा करते हैं और संत कारागार को भी तपोभूमि में परिवर्तित कर देते हैं.....
    >> भारतीय जनमानस सत्ता परिवर्तन हेतु सोचने लगा है किन्तु उसमें व्यवस्था परिवर्तन वाली समझ विकसित होनाअभी शेष है-आपके मनोभावों से ऐसा प्रतीत होता है.....

    >> चौकीदार चोर न होकर ऐसा संत महात्मा है तो उसको बोलो सत्ता का लालच न कर किसी मंदिर में जाके घंटा बजाए.....
    >> ये सत्ताधारी लोगों के घरों में बलपूर्वक प्रविष्ट होकर झंडे लगाते हैं और विरोध करने पर दुर्व्यवहार करते हैं.....

    >> भारतीय संविधान में न्यायपालिका का कार्य न्यायनिर्णय करने का है न कि  आदेश देने का
    संविधान का उल्लंघन होने पर कोई न्यायाधीश महाभियोग द्वारा पदच्युत किया जा सकता है.....

    > यहाँ यदि कोई कुशल शासक होता तो पाक अधिकृत कश्मीर  पर पुनश्च भारत का अधिकार स्थापित हो जाता.....

    >> यह सत्य हो सकता है लंका में घुसे हनुमंत को रावण ने पूँछ में आग लगाकर लौटाया था सूट-बुट पहनाकर नहीं..... यदि यह सत्य है तो बंदरनाच दिखा काहे नहीं देते.....
    >> काम लज्जा को, क्रोध बुद्धि को,लोभ धर्म को व् मोह ज्ञान को नष्ट कर देता.....
    >> योद्धा युद्धक्षेत्र में बोलते अच्छे लगते हैं ध्वनि विस्तारक पर नहीं.....
    >.> मानव की दुनिया से प्रकृति विलुप्त होती जा रही है.....
    >.> जहाँ नेता निडर हों वहां का लोकतांत्रिक शासन निरंकुश होता है.....

    >.>  मुसलमानों के भारतीय होने का एक ही अर्थ है वह है पराधीन भारत.....

    >> विश्वमान्य इतिहास के अनुसार हिन्दू धर्मावलम्बियों का मांगलिक अवसरों पर नृत्य परम्परा सैन्धव सभ्यता की देन है.....

     >> घोटालों की अदरक का स्वाद ज्ञात न ही हो तो ही अच्छा है.....
    >> श्रवणकुमार के मातपिता की कोई वधु नहीं थी.....
    >>  क्योंकि हिन्दू धर्म के मूल में अहिंसा है इसलिए यह कटु सत्य है कि इस्लाम आतंक का जनक है.....

    >> यह परिश्रम सत्ताप्राप्ति हेतु है देशहित के लिए नहीं.....
    >>  पराक्रम  किसके लिए है ?
     एकजुटता किससे है ?
    इच्छाशक्ति किस हेतु है ?

    >> देश की सेवा और विश्व का कल्याण.....

    >> हमने अपना धर्म अपनी जाति विस्मृत कर दी तो ये देश भी हमें विस्मृत कर देगा फिर एक दिन पराए कहेंगे ये देश हमारा है और हमसे पूछंगे कौन है तू.....?

    >> अमृतमय ये पवित्र नदियाँ इन बुद्धिमानों की बुद्धि से ही मलीन हो रही है.....

    >> कश्मीर तो कब से इस्लाम का हो चुका है और इसे हमारा हमारा कहकर भारतीयों को मूर्ख बनाया जा रहा है.....
    >> वल्लभ भाई पटेल का नारा था पराधीनता को ''कर मत दो'' क्या हम स्वाधीन हैं, क्या हमें मत और कर देना चाहिए.....?
    >> "आमदनी अठन्नी खर्चा रुपय्या....."

    >> जो दूध पिलाए वह माँ ही होती है अट्ठारह पुराणों में से एक मार्कण्डेय-पुराण है विश्वास नहीं होता कि यह पाषाणपंथी सोच वाला व्यक्ति अपने  नाम रखने वाले माता-पिता की संतान है.....


    >> यह भी ध्यानने योग्य बात है कि भारत की संतान ने कभी कोई लूट नहीं मचाई किन्तु खान की संतान ने आते ही लूट मचा दी.....

    >> और शेष सभी दल इन 'ख़ाँ-ग्रेसी' के पदचिन्हों पर चल रहे हैं.....कोई दल ऐसा नहीं है जो इनकी विचारधारा से पृथक हो.....

    >> अरे भाई बिंदु में सिंधु लिखा करो तो लोग पढ़ेंगे जैसे : -
    भारतीय ''प्राण जाए पर वचन न जाए'' के अनुयायी हैं इंडियन ''चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए'' के.....


    >> कुछ रचनाएं तात्कालिक पाठकों हेतु तो कुछ पीढ़ियों और उनके मार्गदर्शन हेतु होती हैं.....

    >> भारत का बचपन मात-पिता की छत्रछाया में पलता है और इंडिया का सड़कों पर .....


    >.> वैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग से गृह युद्ध होता है पहली बारी पढ़ रहे हैं.....

    >.> अरब देशों के उधार की सरकार है इनकी.....
    >> वर्तमान की २०से ३० वर्ष वाली नवागत नेता पीढ़ी भविष्य में इतनी अधिक असंयमित होगीं कि सत्ता प्राप्ति केलिए सेना तक का दुरूपयोग करने से भी नहीं चुकेंगी.....

    >> राम मंदिर की बात करो तो ये न्यायधीश बने नेताओं के बंगले झांकने लगते हैं.....

    >> ठगवे का तो एक ही काम ''मुख में राम बगल में इस्लाम.....''
    >> यदि घूस घोटाला वाला भ्रष्टाचारी तंत्र चाहिए तो ही मतदान केंद्र तक जाइये और अपना घर लुटवाने को तैयार रहिए.....

    >> इन्हें पाशविक वर्ग (कैटलक्लास ) भी कहें तो यह पशुओं का अपमान होगा.....

    >> आमदनी अठन्नी कर दी खर्चा रुपय्या..... 

    >> ये हमारे आराध्य हमारे जन्मदाता हैं क्या इनकी छवि इस प्रकार दर्शानी चाहिए.....?

    >> ये सचमुच में भगवे  है या सत्ताधारी के ठगवे हैं.....?

    >> एक बात बताइये, यदि सवा करोड लोग प्र.मंत्री का परिवार है तो जो  ४०% बहिर्देशीय समुदाय पंजे के बाप हैं वो उनके क्या लगते है.....? दूसरा प्रश्न : - इस देश की एकशासन पद्धत्ति (एक व्यक्ति द्वारा संचालित शासन पद्धति ) है अथवा दलगत शासन पद्धति है.....?

    >> चारित्रिक गठन भी उतना ही आवश्यक है जितनी की शालेय शिक्षा, यह गठन उच्च आदर्श मानकों व् नैतिक ज्ञान से होता है ये नैतिक ज्ञान और आदर्शक हमें धर्मचर्या से प्राप्त होते हैं पूजन गृह की स्थापना धर्मचर्या का ही एक कृत्य है.....

    >> ''सिकल सेल अनीमिया'' ये एक रोग है जो भारत में सर्वाधिक छत्तीसगढ़ में पाया जाता है इसका कारण चकित करने वाला है  ''साहू'' जाति वर्ग  के लोग इस रोग से अधिक ग्रस्त पाए गए हैं  इस प्रदेश में इस जाति का बाहुल्य है अभी इस रोग पर शोध चल रहा है हो सकता है किसी रोग अथवा उपचार के शोध हेतु किसी रोगी से उसका धर्म पूछा गया हो.....

    >> कश्मीर तो कबसे इस्लाम का हो गया.....हमारा हमारा कहकर मूर्ख बनाया जा रहा है हमें.....

    >> धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए |
    माली सींचे सौ घड़ा रुत आवै फल जोए ||
    ----- || संत कबीर दास || -----

    >> ''आप'' के लात मारे हुवे और कितने नेता हैं आपके व्यवसायिक समाचार समूह में.....?

    > दुइ पंगत करि कहनी महँ दोइ पलक खरचाए | 
        करनि माहि सदरे दिवस भर की लागत आए || 
    भावार्थ : -  कथनी की दो पंक्तियाँ रचने में दो क्षण ही व्यय होते हैं किंतु इसे करनी में परिवर्तित करने हेतु दिवस भर की लागत लग जाती है |
    अर्थात : - कथनी करना सरल है उसे करनी में परिवर्तित करना कठिन है.....

    >> करतब दासा देस जो लूट खूँद कर खाए | 
          कहौ बंधू साँचहि कहा कहन जोग सो भाए || 
    भावार्थ : - इस देश को दास बनाकर जिन्होंने इसका आर्थिक शोषण किया बंधू सत्य कहिए क्या वह भाई कहलाने के योग्य हैं ?

    >>   पृथ्वी में जबतक ईंधन शेष है ये मशीनी युग भी तभी तक है.....फिर कंकड़ों के जंगलों में कागद भी नहीं होंगे..... तबतक यदि लोकतंत्र जीवित रहा तो लोग पाषाणयुग के जैसे चट्टानों में भित्तिचित्र  द्वारा मतदान करेंगे.....


    >> यद्यपि उच्च शिक्षा से विश्व की आधारभूत विज्ञता तो प्राप्त होती है किन्तु यह विज्ञता व्यक्ति को ज्ञानी नहीं बनाती या यूं कहे अंग्रेजों की शिक्षा पद्धति शिक्षित तो करती है किन्तु ज्ञान नहीं देती एक शिक्षित शासक से एक ज्ञानी अधिक उत्तम होता है और वह दोनों हो तो सोने पर सुहागा है.....

    >>बिलकुल सही..... यदि वास्तव में ये मूलत: भारत के हैं और यदि बांग्ला देश भारत का मित्र देश है तो इनके बसने के लिए उससे भूमि की भी मांग करनी चाहिए.....वैसे ६९ वर्ष हो गए संविधान लागू हुवे अबतक देशवासियों यह ज्ञात नहीं है कौन इस देश का मित्र देश है कौन शत्रु और कौन तटस्थ..... क्या करते रहते हैं इस देश के विदेश मंत्री क्या संसद मख्खियां मारने के लिए है.....?

    >> कहो श्याम घन कब छाएंगे..,
      प्यासी धरती तड़प रही कब पानी बरसाएंगे..,
          बरखा रानी कब बरखाएगी बूँद.....

          कहो श्याम घन कब छाएंगे..,
     बादल गरज गरज कब मेघ मल्हारा गाएंगे..,
           कब बुँदे छम छम बरसेंगी.....

      यह कैसा युग परिवर्तन है..,
    रही कहाँ राम की वह मर्यादा अब..,
       यहाँ रहे राम आदर्श कहाँ.....   

    सूरज देखें आँखें लाल किए
    किरण किरण को ज्वाल किए
    नदी पर्वत वन हुवे तप्तायन

    गगन मैं स्याम घणा बिराज्यो..,
    पिचरंगी पुरट को पटको रे काँधेन देइ..,
    कारो काजलियो सों नैनन साज्यो.....

    आदि माहि करतब भला अंत बुरा परिनाम |
    बंधु सो तो साँच नहीं  झूठहि वाका नाम |
    भावार्थ :
    कोई असत्य प्रारम्भ में भले ही भला करता हो तथापि अंत में बुरा ही परिणाम देता है,इसलिएअसत्य भाषण कभी नहीं करना चाहिए…..

    • जिस भाषा मेँ अधिकाधिक स्वर व् व्यंजन हों उस भाषा का व्याकरण समृद्ध होता है और व्याकरण की समृद्धि भाषा को समृद्ध करती है |संस्कृत में सर्वाधिक स्वर व् व्यंजन हैं तत्पश्चात हिंदी में फिर उर्दू में इसके पश्चात चौथे क्रमांक में अंग्रेजी की बारी आती है | वह भाषा श्रेष्ठ मानी जाती है जो भावों को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करने में समर्थ हो और समृद्ध भाषा में ही ऐसी क्षमता होती है | 




    Monday, 14 January 2019

    ----- ॥ टिप्पणी १७ ॥ -----,

    >> रेवड़ी के जैसे बंटने वाली नागरिकता का भी अंतत:यही परिणाम होना है.....ये नागरिकता या तो हमारा सब कुछ लूट कर ले जाएगी या हमें घर से ही निकाल देगी.....

    >> यदि किसी अन्य दल ने चुनाव जीत कर मंदिर बना दिया तो देश हो न हो संसद अवश्य बीजेपी मुक्त हो जाएगी.....

    >. ये देश है कि कोई धर्मशाला है जिस धर्म को देखो यहीं आ जाता है..... सारे जगत को भारतीय का ठप्पा लगा के यहीं काहे नहीं बसा लेते.....हमें जगत में भेज दो..... वहां भी हमने एक गंगा न निकाल दी तो फिर चन्द्रमा में भेज देना.....

    इस देश को बहु बेटियों के रहने योग्य छोड़ेंगे कि नहीं ये न्यायाधीश बने नेता.....ये लोकतंत्र का नाटक क्यों कर रहे हैं..... स्पष्ट कहते क्यों नहीं कि ये अधिनायक तंत्र है.....

    राजू ; -- में कहता हूँ इस न्यायालय की अंग्रेजी बंद कर दो तब इसकी बुद्धि ठिकाने आएगी.....


    >> न्हाए धोए क्या हुवा मन का मैल न जाए |
    मीन सदा जल में रहे तापर देइ बसाए ||
    भावार्थ : - कबीर दास जी कहते हैं स्नान का महत्व तभी है जब मन में कोई मलिनता न हो | स्नान से पाप नहीं धुलते यदि धुलते तो मीन मलीन न होकर पावन पवित्र होती |

    >.> ''अहिंसा परमो धर्म :'' का सूत्रपात कर हिन्दू धर्म में मांसाहार वर्जित किया गया देह की लाभहानि हेतु नहीं.....और फिर गांय तो एक पालतू अहिंसक और ममतामई प्राणी है इसका वध तो परम दोष है.....

    >> मुंह टेड़ा हो जाएगा, टाँगे दो से एक रह जाएगी, चल नहीं पाएंगे.....तथापि भगवद रटन के स्थान पर ये नेता सत्ता सत्ता रटते हुवे ही मरेंगे.....

    >> भगवान का कारावास में जन्म निर्दोष को दंड का प्रतीक है.....

    >> जैसे ईश्वर को अर्पित किया गया भोजन पवित्र होकर प्रसाद हो जाता ,है वैसे ही ईश्वर के निमित्त किए गए स्नान से हमारी देह पवित्र होकर पापमुक्त हो जाता है.....

    >> यूरोप अमेरिका के अल्पसंख्यक हैं किस धर्म के.....? यदि ये हिन्दू हैं तो फिर इस धर्म के अस्तित्व पर ही भारी संकट आन पड़ा है.....
    आप संसद में हैं इसे उसे कोसने से अच्छा होगा की आप इस हेतु नियम बनाएं.....

    >> बात तो सही है किन्तु आपकी कौन मानेगा.....? आजकल सत्ताधारी और उनके चाटुकारों की मनती है.....

    >> ये शरणार्थी होकर ही जागेंगे.....इन्हें देश नहीं केवल नौकरी चाहिए.....बिजली पानी चाहिए..... वो अंग्रेज दे दे या मुसलमान.....
    >> धाम धनु घरहि अरु बंधु मरघट छुटिहि जाए |
    सुभासुभ करतब करमहि पाछहि पाछे आए ||
    ----- || गरुड़ पुराण || -----
    भावार्थ : -धन-सम्पदा घर में छूट जाती है बंधु बांधव्य श्मशान में छूट जाते हैं | किए गए शुभाशुभ कर्म ही मृतक के पीछे पीछे जाते हैं |

    >> भाव भगति रामजी सी लंका पति सा साज |
    राम का मंदिर अहहैं कहु कहँ वाका राज ||

    >> विवाह स्त्री पुरुष के पारस्परिक सम्बन्ध की अनुमति मात्र है, इस अनुमति से रहित संबंधों में भी वही दोष दर्शित हो रहा है जो ''बाल विवाह'' अथवा ''किशोर वृद्ध विवाह'' अथवा ''अधिवेत्ता विवाह'' (एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करने वाला पुरुष )में दृष्टिगत होता था ऐसी अनुमति विभिन्न देशों की शासन व्यवस्था या न्यायपालिका प्रदान कर रही हैं मायानगरी में यह रूढ़िवादिता सर्वाधिक देखने को मिल रही है.....वर्तमान में निर्धन अश्पृश्य हो गया है, मालों (मंडियों ) में संसद सभा में ऊंची अट्टालिकाओं में उसका प्रवेश निषेध हो गया है अर्थात : -

    ''राहे-रवां वही रही राही बदल गए.....''

    >> पाखंड रहित नग्न साधुत्व हमें त्याग की शिक्षा देता हैं,
    एक त्यागा हुवा वस्त्र किसी अभावग्रस्त के देह को ढांक सकता है..,
    हम वस्त्रों का उपयोग करें उपभोग नहीं.....
    >> एक आरक्षित अवसर १० को पिछड़ा, पददलित व् निर्धन बना देता है.....

    >> डेढ़ सहस्त्र वर्ष हो गए, ये सत्ताधारी अब भी हमसे इन मुसलमानों की टट्टियाँ ही उठवाते रहेंगे क्या.....?

    >> एक धर्म में कोई वर्ग उपेक्षित हो तो आवश्यक नहीं वह दूसरे धर्म में भी उपेक्षित हो..... पर नहीं : - खाता न बही - जो सत्ताधारी कहें वो सही.....

    >> पाखण्ड रहित नग्नसाधुत्व प्रकृति के आतप्त के प्रति सहिष्णुता की शिक्षा देता है..... प्रलयकाल में ऐसे सहिंष्णु ही मनुष्य जाति को बचा रखेंगे.....

    >> राजा होकर भी जब भगवान ने राजसी स्नान नहीं किया तो हम क्यूँ करें.....?

    >> हिन्दू धर्म में भी स्त्रियों की दशा दयनीय थी कालान्तर में इस धर्म ने सुधारवादी विचारों को स्थान दिया।....भय है की इस प्रकार के अधिनियमों से वह स्थान लुप्त न हो जाए.....

    >> हिन्दू विवाह सचमुच में एक अटूट बंधन ही था, इस बंधन में तलाक व् डाइवोर्स जैसे शब्द ही नहीं थे.....इस बंधन में इन शब्दों का विष भी इन सत्ता के लालचियों का ही घोला हुवा है.....

    >> विभाजन में आपको अवसर दिया गया था ''इस्लामावाद'' अपनाने का.....ये एक धर्म विशेष की सामाजिक व्यवस्था है यदि ये बुराई हैं तो भी आपको अधिकार नहीं है इनपर टिका टिपण्णी करने का....आप अपने धर्म की बुराइयों को देखिए.....

    >> किसी संविधान का विरोध देशद्रोह है.....? वह संविधान जो अपनी मौलिकता को विस्मृत कर अपने ही राष्ट्र के दासकर्ता को अधिकारों से संपन्न करता हो.....?

    गए.....देश द्रोह में कितना दंड है.....बापरे ! फांसी.....

     ----- ॥ धर्मो रक्षति रक्षित: ॥  ----- 

    >> कांग्रेस प्रोसेस से ऋण लो और भाजपा प्रोसेस से ऋणमुक्त हो जाओ.....देश का बंटाधार कर देंगे ये एक थैली के चट्टे-बट्टे.....

    >> औरन की देहरि पड़ा भुल्या अपना मूर |
    धन धरती कइ लाहु मैँ मातुपिता गै भूर || ५ ||

    भावार्थ : -दूसरों की देहली में पड़ के अपनी जड़ें भूल गए धन और धरती का इतना लोभ हुवा कि अपने मातापिता, अपने पूर्वज तो क्या उनकी कब्रें भी याद नहीं रही |

    >> अपने सम्मुख बैठे विपक्ष से प्रधानमंत्री ने कभी इस सम्बन्ध में प्रश्न किया कि यह स्वतंत्रता देश की थी या कांग्रेस की.....

    >> हिन्दू विवाह अधिनियम है भाई.....

    >. जिस देश में चरित्रहीनता का वास होता है, वहां नारी असुरक्षित रहती है.....

    >> सेवा व् उपासना दोनों शब्द एक ही भाव से व्युत्पन्न हुवे हैं एतएव दोनों का धर्म भी एक ही होना चाहिए वह है लोकोपकार.....

    >> पच्चीस तीस लाख पैकेज वाली दासी आई 'आई टियर्स' से एक करोड़ लाभांश वाली पकोड़ा मुस्कान का समाज में अधिक सम्मान है.....