Wednesday, 8 March 2017

----- ॥ सेंदुरी रंग -धूरि ॥ -----

उरियो रे सेंदुरी ऐ री रंग धूरि, 
पलहिं उत्पलव नील नलिन नव जिमि जलहिं दीप लव रूरि । 
ललित भाल दए तिलक लाल तव तिमि सोहहि छबि अति भूरि ॥ 

हनत पनव गहन कहत प्रिया ते अजहूँ पिय दरस न दूरि । 
करिअ बिभावर नगर उजागर  सजि बेदि भवन भर पूरि ॥ 

तरहि पटतर परिहि अम्बारी मनियरी झालरी झूरि । 
बंदनिवार बाँधेउ द्वार धरि चौंकिहि चौंक अपूरि ॥ 

आगत जान बरु सुमुखि सुनयनि गावहि सुभगान मधूरि । 
सगुन भरि थार करिहि आरती करि मंगलाचार बहूरि ॥ 

चली मंजु गति प्रिया पियहि पहि अरु छूटहि कुसुम अँजूरि । 
जलज माल जय कलित कंठ दय नत सीस चरन रज पूरि ॥ 





Monday, 6 March 2017

----- ॥ सेंदुरी रंग -धूरि ॥ -----


उनिहौ रे सेंदुरी ऐ री रंग धूरि 
पलहि उत्पलव नील नलिन नव जिमि जलहि दीप लव रूरि । 
तरु तमाल दए तिलक भाल तव तिमि सोहिहि छबि अति भूरि ॥ 

बिभौ बदन घन स्याम सुन्दर सिरौपर पँखी मयूरि । 
पहिरै सुरुचित पीत झगुरिया धरि मधुराधर बाँसूरि  ॥ 

बजति भली करधन छली करी कर कंकनि सँग केयूरि ॥ 
कल धुनि करत भाँवरि भरत जबु थिरकत चरन नुपूरि ॥ 

घुटरु घटि बँट काँछ कटि तट पटिअरि धूपटि अपूरि । 
गिरियों लटपटि त उठि कपटि कह लपटि आध अधूरि ॥ 

पाउँ परस करि लीज्यो दरस न त इन्ह कर दरसन दूरि ॥ 

Friday, 3 March 2017

----- ॥ रंग -धूरि ॥ -----


उरियो नहि सेंदुरी ऐ री रंग धूरि 
कुञ्ज गलिअ  कर कुसुम कलिअ यहु अजहूँ न पंखि अपूरि  ॥ 
कहइ बिसुर बल बल गल बहियाँ  ओहि जोरे अंज अँजूरि ॥ 

अंक ही अंक गहि पलुहाई मैं कल परसोंहि अँकूरि  ॥ 
एहि मधुबन रे मोरे बाबुल इहँ बिहरिहु धरे अँगूरि ॥ 

चरनहि नुपूर सिरु बर बेनी, कानन्हि कंचन्हि फूरि ॥ 
बोलहि मिठु जिमि चाँचरि बोलै अरु तुम अति करर करूरि ॥ 

निरखहि नीरज नयन झरोखे तुम रंज न देहु बिंदूरि ॥ 
दय घटा घन छटा मन मोही न त दमकिहि दमक बिजूरि ॥ 

मन चन्दन मुख मनियरचन्दा बालिपन बिहुर नहि भूरि ॥ 
फेरी भँवर कतहुँ फिरजइयो इहँ अइयो कबहुँ बहूरि ॥ 


Thursday, 23 February 2017

----- ॥ फाग ॥ -----

धरे रुरियारे रंग, बन फिरिति पतंग,  दए फगुनिया पुकारि के होरी में..,
मनि मोतियाँ ते भरी बलपरी फूरझरी छरहरी डोरी डार के होरी में..,

रंग लाल लाल बिहंग लाल लाल,
गगन गगन उरति पतंग लाल लाल, 

बूझती अली अली उरि चलि गली गली सखी कलियाँ सँवार के होली में..,
कहँ छुपे मनहरिया  केसरिया साँवरिया  दुअरिया ढार के होरी में..,

अहो चाले है मराल कनक केसरी करताल,
स्याम राग संग धरे रंग थाल थाल, 

घुँघरी घरी घर्घरी कटि धरी गहन घाघरी घार के होरी में..,
सुठि भृकुटि तरेर ठकि मुख तीन सेर दे मीठी मीठी गार के होरी में..,

अहो झाँझरि जड़ाऊ बाँधे पाँउ पाँउ, 
झनक झनक झुमरि बजे है गाँउ गाँउ,

रूपु हरी रूपु भर हे री हेरि घर घर घेरि चौंक चौबार के होरी में
सबु नगर ढिंढोर करी बुँदौरी को घोर भर भर पिचकार के होरी मे..,

अहो भाँवरि भरत तिरत डोल डोल, 
करत निरत थिरत थाप दे ढोल ढोल,   

आयो द्वारिका को नाथ
ग्वाल बाल साथ 
मोर मुकुट माथ 
अधरन पे बंसरी सँवारे.....
                      ---- ॥ राग मारवा, बसंत ॥ ----- उड़ री रंग धूरि चहुँ पासा,
बादिहि बादन बृन्दु अगासा । उड़ री रंग धूरि चहुँ पासा ॥ 
फूरहि फूर पंखि दल पूरे । बासहि बास बसंत सुबासा  ॥  
बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस रास बिलासा ॥ 
सरसि सरसई सरिरुह सौंहैं ।सरित सरोजल कह उछ्बासा ॥ 
दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन प्रभाकर भास बिभासा ॥ 
घोरिहि घन रस बन रस राजा । कर महु कर धर करिहु कुहासा ॥  
बहुरी बदरि बहुर बदराई । बहुरि बदरि न बहुर चौमासा ॥ 
कर्पूर गौर बौरि अमराई । हरिअर हरिअर हरिअर बासा ॥ 
कोयरि कोयरि कूजत बोलहि । पालौ पालौ पलहि पलासा ॥  
चटक छटा फर जीर जँबीरी । झलहिं चँवर सों जौर जवासा ॥ 

Tuesday, 21 February 2017

----- ।। उत्तर-काण्ड ५६ ।। -----

अति बिनैबत  धरत महि माथा । लषन प्रनाम करत रघुनाथा ॥ 
लखि अपलक अरु पलक न ठाढ़े । अबिलम मरुत बेगि रथ चाढ़े ॥ 
लक्ष्मण ने भूमि पर मस्तक नवा कर रघुनाथ जी को अत्यंत विनयपूर्वक प्रणाम किया |  उनकी ओर अपलक देखकर वह फिर एक क्षण भी नहीं रुके और अविलम्ब मारुति वेग के समान शीघ्रगामी रथ पर आरूढ़ हो गए | 

हिरन रस्मि करतल करषाई । सियहि आश्रमु चले अतुराई ॥ 
तेजस बदनु भावते जी के । रघुनाथ तनय अतिसय नीके ॥ 
रथ के घोड़ों की हिरण्यमय रश्मि को करतल में कर्षकर वह शीघ्रता से सीता के आश्रम को प्रस्थान कर गए | इधर रामचंद्र के अत्यंत शोभायमान पुत्रों के  मन को भाने वाले तेजस्वी मुख की ओर : - 

बिहँसि महर्षि ताहि पुर देखे |  बहोरि भर अनुराग बिसेखे ।
कहब बछरु धरु कण्ठ कूनिका । गाउ संगत सुर संगीतिका ॥ 
प्रफुल्लित होकर देखते हुवे वाल्मीकि जी विशेष अनुराग में भरकर बोले : -- 'वत्स ! वीणा धारण कर सुन्दर स्वर संगीतिका के संगत : -- 

सिउ सारद नारदहि सुहाना । रघुबरहि कृत चरित जग जाना  ॥ 
गुरु अग्या करतल बर बीना । गावहि हरिगुन गान प्रबीना ॥ 
शिव, शारद व् नारद को रुचिकर भगवान रामचंद्र जी के जगत प्रसिद्ध चरित्र का गान कारो | ' महर्षि के इस प्रकार आज्ञा देने पर उन बालकों ने करतल में वीणा धारण कर प्रवीणता पूर्वक हरि के गुणों का (इस प्रकार)गायन करने लगे | 

प्रगसो दानव दैत निकंदन प्रगसो हे नयनाभिराम । 
प्रगसो हे महि भारु अपहरन प्रगसो हे ललित ललाम ॥ 
कुकर्म महु लीन अति मलीन मन करे सबु मति कर बाम । 
दीन हीन सुख गुन बिहीन भए भरे हम धरे धन धाम ॥ 
हे दानव व् दैत्यों का विनाश करने वाई प्रकट होवो इ नयनाभिराम पकट होवो | हे पृथ्वी का भार हरण करने वाले ललित ललाम प्रकट होवो | कुकर्मों में संलग्न अत्यंत मलीन मन ने सभी की बुद्धि को विपरीत कर दिया है वह धन-धाम से परिपूर्ण होकर भी अहंकार में भरकर चूँकि सुख व् गुणों से रहित हो चले हैं इसलिए वह दरिद्रता व् दुर्दशा से ग्रस्त हैं | 

प्रगसो अनाथन केरे नाथ हे प्रगसो सिया बर राम । 
तरपत परबसु पियास मरत पसु बहत सुरसरि सबु ठाम । 
तुम बिनु खल दल बल गह भए भल पूर सब साधन साम ॥ 
भगति बिमुख जग कारन चरनहि भजहिं न करहिं प्रनाम ॥ 
हे अनाथों के नाथ सियावर रामचंद्र जी अब प्रकट हो जाइये | यद्यपि गंगा स्थान स्थान पर बहाई है तथापि परवश पशु प्यासे मरते तड़प रहे हैं | प्रभु ! आपके बिना दुष्टों के दल बल ग्रहण कर भले हो गए हैं और जीवन साधन से संपन्न हो चले हैं | हे जगकारण ! भक्तिविमुख संसार आपके चरणों में नमन  करता है न भजन  | 

खलदल दवन भुवन भय भंजन प्रगसो भानुकुल भाम । 
प्रगसो भगवन दुर्दोषु दहन अपहन मोह मद काम ॥ 
भ्रष्ट अचार अस भा संसार भए सबु अलस अलाम ॥ 
जहँ तहँ बाधि बिबिध ब्याधि जग करिअति अति छति छाम ॥ 
दुष्टों के दलों का दमन व् संसार के भय का भंजन करने हेतु हे भानुकुल के प्रकाश अब प्रकट हो जाओ | दुरदोषों का दहन करने व् काम मोह मदादि का अपहरण करने हेतु हे भगवान ! आप प्रकट होवो |  संसार में भ्रष्ट आचार ऐसा हुवा कि अब सभी आलसी  व् अलाल हो चले हैं और विविध प्रकार की आधि-व्याधियां जहाँ तहँ व्याप्त हैं वह विश्व को कष्टमय कर उसे अत्यंत क्षीण करने में संलग्न हैं | 

करि करि पाप कहैं  पाप नहि किछु गहैं मुए कठिन परिनाम । 
हे कमलारमन करो अवतरन करन बिस्व बिश्राम ॥   
तव मंगल करन लाए पथ नयन सब दिनु सब रितु सब जाम ॥  
हे अवतारी अवतार गहन बरो बपुष घन स्याम ॥  
पाप कर कर जो  ये कहते हैं पाप कुछ भी नहीं वे मृत्यु के पश्चात अपने उन पापों के कठिन परिणामो को भुगतते हैं | विश्व की शांति हेतु हे कमलारमन अब आप अवतरित होवो | आपकी मंगलकरनी के लिए ये नेत्र सभी दिन सभी ऋतू सभी समय आपकी प्रतीक्षा में संलग्न रहते  हैं | हे अवतारी ! अब अवतार ग्रहण कर घनस्याम निग्रह का वरण  करो 

जग संताप देइ ताप करै घोर घन घाम । 
आरत भूमि पुकारती प्रगसु हे रघुवर राम ॥ 
पापमयी इस विश्व का संताप घोर घाम कर कष्ट दे रहा है  आर्त पृथ्वी पुकार रही है हे रघुकुलश्रेश्ठ राम अब प्रकट हो जाओ |   

शनिवार, २५ फरवरी, २०१७                                                                       
कातर भूइँ  पाप ते भारी । धेनु रूप कीन्हि गोहारी ॥ 
पुनि दोनहु बालक बड़भागे । हरि अवतरन कथा कहि लागे ॥ 
पापों के बोझ से भारी हुई निरीह पृथ्वी धेनु रूप में भगवन का आह्वान करने लगी तदनन्तर सौभाग्यवान युगल बालक भगवद अवतरण की कथा कहने लगे | 

भाव भेद पद छंद घनेरे । पुन्यकृत चरित चितरित केरे ॥ 
धर्म धुरंधर बिधिकर साखी । भगवन भगति भाँति बहु भाखी ॥ 
भाव,भेद, पद व् छन्दों के अतिरेक से वह भगवन का पुण्यकृत चरित्र वर्णन करने लगे | उन्होंने विधि को साक्षी कर  धर्मधुरंधर भगवान श्रीरामचन्द्र की भक्ति का विविध प्रकार से उपाख्यान किया | 

भनत भनितिहि भदर भर भेसा । किए अबिरत पतिब्रत उपदेसा ॥ 
नेम बचन दृढ़ भ्रात स्नेहा । काल परे अनुहरि सब गेहा ॥ 
साधू वेश धारण किए उन बालकों ने कवितापाठ कर पातिव्रत का अविरत उपदेश किया | कालान्तर में नियम व् वचनों की दृढ़ता, भातृ स्नेह का यह अनुपम आख्यान गृह गृह में कहा जाने लगा | 

सुबिरति जति गुरु भगति बखाना । अनुगम अनुपम सबहि बिधाना ॥ 
दरसिहि जहँ साईँ समुहाना । सेबक नीति मूरतिमाना ॥ 
सुन्दर विरक्ति के सह गुरु भक्ति का व्याख्यान किया जो सभी प्रकार से अनुपमेय व् अनुकरणीय है | जहाँ स्वामी सम्मुख दर्शित हुवे वहां सेवक नीति  मूर्तिमान हो गई | 

निबध निपुण नय नीति सुरीति । निगदिहि निर्मल प्रीति प्रतीति ॥ 
सुन्दर रीतियों,नीतियों व् नेतृत्व का कुशल प्रबंधन कर निर्मल प्रेम व् विश्वास का वर्णन किया | 

कलि कलुष बिभंजन करत पापीजन निज हाथ । 
भू भय हरन पाप दमन दंड दिये रघुनाथ ॥ 
कलि की कलुषता का विभंजन करते हुवे पापीजनों को  पृथ्वी का भय हरण व् उसके पापों का दमन करने वाले श्री रघुनाथ ने अपने हाथों से दंड दिया | 

रविवार, २५ फरवरी, २०१७                                                                                       

गाएँ सुमधुर बाँध सुर दोई । मंत्र मुग्ध सब श्रुत सुखि होईं ॥ 
परे मूर्छि सिद्ध गंधर्बा । हतचित चकित सुराग सुर सर्बा ॥ 
दोनों यमजों ने सुमधुर स्वर आबद्ध ऐसा गान किया कि मंत्र मुग्ध हो सभी श्रोताओं के कर्ण तृप्त हो गए | उनके सुन्दर रागों से देवता चकित होकर स्तब्ध रह गए, सिद्ध गंधर्व तो जैसे मूर्छा को ही प्राप्त हो गए | 

सुनत सहित अनगन  महिपाला । होइहिं मोहित जगद कृपाला ॥ 
मोह मगन मन धीर न धीरा । आनंद घन नयन बह नीरा ॥ 
उन्हें श्रवण कर अगणित राजाओं के साथ जगद कृपाल श्रीरामचन्द्र जी भी मोहित हो गए | उनका मोह में निमग्न चित्त धैर्य का त्याग कर दिया आनंद के अतिरेक से उनके नेत्र अश्रुधारा बहाने लगे  | 

पुनि पंचम सुर गान अधीना । प्रेम सरित  बहि होइहिं लीना ॥ 
रह अस्थमबित हिलहिं न डोलहिं । चित्र लिखित सम अबोल न बोलहिं ॥ 
 पंचम स्वर गान के अधीन उनसे प्रेम सरिता बही तो वह उस सरिता में निमग्न हो गए | वह स्तंभित हुवे अविचल से उल्लेखित चित्र के समान मौनमुर्ति के सदृश्य हो चले | 

पुनि महर्षि दोनहु सुत तेऊ । कृपा समेत इ बचन कहेऊ ॥ 
तुम्हरी मति अस बल सँजोई । कि नीति कुसल नहि तुअ सहुँ कोई ॥  
तदनन्तर महर्षि वाल्मीकि ने दोनों सीतापुत्रों से कृपापूर्वक यह वचन कहे -- 'तुम्हारी बुद्धि ने ऐसा बल संकलित किया है कि तुम्हारे जैसे नीतिकुशल कोई नहीं है | 

अजहुँ पहिचानउ  तेहि ए पूजनिय पितु तुहार । 
जाइ करिहौ तिनकेप्रति, पुत्रोचित ब्यबहार ॥ 
अब तुम इनका परिचय प्राप्त करो ये तुम्हारे पूज्य पिता है, जाओ ! तुम इनके प्रति पुत्रोचित व्यवहार करो | '

सोमवार, २६ फरवरी, २०१७                                                                        

सुनि मुनि बचन आएँ दुहु आगे । बिनय भाउ ते चरनहि लागे ॥ 
मातु कर करि करि सेउकाई । भए निर्मल हरिदै दुहु भाई ॥ 
मुनि के वचनों को श्रवण कर दोनों आगे आए और विनय भाव लिए वह उनके चरणों से लग गए | माता की सेवा करते हुवे वह दोनों बंधू निर्मल ह्रदय हो चले थे | 
 नत सिरु पद देखि रघुराई । प्रेम मुदित दुहु लिए उर लाई ॥ 
सुत सुरूप महुँ मूरतिमाना । प्रगसि धर्म मम किए अनुमाना ॥ 
उन्हें अपने चरणों में नतशिश हुवा देख प्रेममुदित रघुवर ने दोनों को हिदाय से लगा लिया | और यह अनुमान लगाया कि पुत्र स्वरूप में यह मेरा धर्म है जो मूर्तिमान होकर प्रकट हुवा है | 

सहज मनोहर मुख अति नीके । दोउ तनय श्री रघुबर जी के ॥ 
सभा बिराजित सकल समाजा । नगर नारि नर सुर मुनि राजा ॥ 
रघुवर जी के वे दोनों पुत्र सहज मनोहर है उनका मुख अत्यंत शोभनीय है | सभा में विराजित नगर नरनारी देवताओं,मुनियों व राजाओं का समस्त समाज-

चितवहि सचकित तिन्हनि ओरा । चितए  चकित जिमि चंदू चकोरा ॥ 
मानेउ सत्य सरिस सती की । पति भगति श्री जानकी जी की ॥ 
की आश्चर्य युक्त दृष्टि उनकी ओर ऐसे दर्शनाभिरत थी जैसे चकित चकोर चन्द्रमा के मुख का दर्शन करता है | उन्होंने सत्य सरिस सटी श्री जानकी जी की पति भक्ति का अनुमोदन किया | 

कहत सेष मुनि लषन पुनि, गवन  रिषि तपोधाम । 

दीन्हि असीस सिय चरन सिरु धरि करत प्रनाम ॥  
शेषजी कहते है मुने ! फिर भ्राता लक्षण मुनि वाल्मीकि के उस तपोद्दाम को गए, जब उन्होंने माता सीता के चरणों में नतमस्तक होकर प्रणाम निवेदन किया तो उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया | 

शुक्रवार, १० मार्च, २०१७                                                                                     

निरख बिनयसील लछमन आए । सुनि पुनि जानकी जानि बुलाए ॥ 
जोरे हृदयँ लोचन कर पानी । कहहि ससनेह करुनित बानी ॥ 
विनयशील भ्राता लक्ष्मण को आया देख रघुबर का बुलावा श्रवण कर हृदय के जल को नेत्रों में भरकर करुआमयो वाणी से स्नेहपूर्वक कहा -- रघुकुल कैरब मोहि त्यागे । दिए बियोग घन किए बन आगे ॥ 
एहि गुह गोचर घर घन घोरे । करिअहिं नाथ सुहरिदय मोरे ॥ 
रघुकुल कुमुद ने मुझे त्याग कर वियोग देते हुवे यह सघन वन भेंट किया | यह गुहाओं व् वनमें वचरण करने वाले जंतुओं का यह घनघोर गृह को सौहृदयी नाथ ने मेरा गृह किया | 

त्यागु जोग बहुरि अपनाई । एहि जग केहि सुहाव न भाई ॥ 
चरनन्हि तृन पात फल फूला । परे भूमि न चढ़ेउ बहूला ॥ 
जो त्याग योग्य हो उसे फिर स्वीकार्य करना हे बंधू ! संसार में यह किसी को भी प्रिय न होगा | चरणों में निवेदित तृण पत्र पुष्प फल यदि भूमि पर गिर जाएं तो वह पुनश्च अर्पित नहीं होते | 

चलौं अजहुँ कस कहउ अतेवा । मोरे भाग न प्रभुपद सेबा ॥ 
रहिहउँ आश्रमु बाल्मिकी के । सुरति धरत नित रघुबर ही के ॥ 
अब मैं उनके पास कैसे जाऊं एतएव यह निवेदन  मेरे भाग्य में प्रभु के चरणों की सेवा नहीं है | ह्रदय में नित्य श्रीरघुनाथ का स्मरण करते हुवे मैं मुनिवर वाल्मीकि जी के आश्रम में ही रहूंगी | 

सुनत लछमन सियहि बचन मातु कहत गोहारि । 
हतासवांस लए पुनि  कातरि डीठ निहारि ॥  
माता जानकी के वचनों को सुनकर भ्राता लक्ष्मण ने माता कहकर (लौटने की ) प्रार्थना की फिर हताश्वास लेकर उन्हें असहाय दृष्टि से देखा | 

शनिवार, ११ मार्च, २०१७                                                                              

कहत लछमन सुनहु महतारी । लाए  नयन मग होइहि हारी ॥ 
बुला पठइँ प्रभु बारहि बारा । सेष रुचिरु जस होइ तिहारा ॥ 
और पुनश्च कहा हे माता सुनिए ! प्रभु आपकी प्रतीक्षा कृते हुवे शिथिल हो गए हैं वह वारंवार आपको बुला रहें हैं शेष जैसी आपकी रूचि  | 

मन क्रम बचन चरण रति होई । कहहु मातु परिहरहि कि सोई ॥ 
सुकुता गह बसि मनि सम रूपा । दीप जोति रबि किरन सरूपा ॥ 
मन कर्म  व् वचनों से जिसकी चरणों में अनुरक्ति हो कहिए माता क्या वह त्याग योग्य है ? जिस प्रकार सीप में मोती बसती है ,  दीप में  ज्योति बसती है , सूर्य में बसी किरण बसती है  

बसिहि देह जिमि जिअ के नाई । नाथ तोहि तस हृदयँ बसाईं ॥ 
(तथापि ) पति अपराधु पति ब्रता नारी । धरिअ उरस न मनहि महुँ घारी ॥ 
जिस प्रकार शरीर में प्राण बसते हैं हे माता  रघुवर के ह्रदय में आप उसी प्रकार बसी हुई हैं  | तथापि पति के किए अपराध को पतिव्रता नारी न तो ह्रदय में धारण करती है न ही मन में समाहित करती है | 

करउँ बिनति पुनि पुनि जुग हाथा । चढ़ि स्यंदन चलहु मम साथा ॥ 
मानिहि पति सिय देउ समाना । अकनि सोइ सबु बचन बिहाना ॥ 
में वारंवार यह करबद्ध विनती करता हूँ आप रथारूढ़ होकर मेरे साथ चलिए |  पति को देवता समान मानने वाली सीता ने लक्ष्मण उन सभी वचनों को धैर्य पूर्वक श्रवण किया 

प्राति प्रतीति पुकारि उत मुनि तिय कहि  अनुहारि । 
प्रभु परिहरि गति न दूसरि चलि अस नीति बिचारि ॥  
उधर प्रेम और विश्वास की पुकार तो इधर मुनिपत्नी के कहे का अनुशरण, प्रभु के अतिरिक्त और दूसरी गति भी तो नहीं है ऐसी नीति विचारकर माता सीता चल पड़ीं | 

बुधवार, २९ मार्च, २०१७                                                                                            

बेदिन मुनिगन करिअ प्रनामा । चढ़ि रथ सिरु नत तापसि बामा ॥ 
सुमिरि मनहि मन रघुबर नामा । परस पद लिए दरस मन कामा ॥ 
विद्वान मुनिजनों को प्रणाम  तपस्वी वामाओं वह रथारूढ़  हो गईं,  रघुवरजी के नाम का स्मरण कर  मन ही मन में उन्हे चरण स्पर्श कर उनके दर्शन की मनोकामना की | 

सील सनेहिल भूषन साजै । सहज सुहावन बसन बिराजै ॥ 
भाउ प्रबन मन बेषु बनावा ।  उदयित बिधु निभ बदन सुहावा ॥ 
शील व् स्नेह के भूषणों से सुसज्जित कर उन्होंने सहजता के सुन्दर वस्त्रों को धारण किया हुवा था | मन को भावप्रवणता का वेश दिए उनका मुखमंडल उदय होते चन्द्रमा के समान सुशोभित हो रहा था | 

यहु मंगल मूरति ममता की । सदा सहाय सीम समता की ॥ 
होइ लगाउब केहि न काहू । रोकइँ  न चहत कहत न जाहू ॥ 
ममता की यह मंगलमूर्ति सदा सहाय होने वाली समता की यह सीमा से भला किसे अनुरक्ति न होगी तथापि उन्हें रोकने की अभिलाषा किसी को नहीं थी न जाने हेतु कोई कोई कहता नहीं था | 

गहि गहि बहियाँ लपटहि डगरी । अजहुँ दूरि न पिय केरि नगरी ॥ 
चलहि स्यंदन चरन अतूरी । होइँ तपु बन नयन ते दूरी ॥ 
डगरी यद्यपि बाहें पकड़ पकड़ कर लपटाती | अब प्रियतम की नगरी अधिक दूर  नहीं थी रथ के चरण अत्यातुर संचालित हो रहे थे अब तपोवन दृष्टि से ओझल हो चुका था | 

पारग घन बन गिरि मनियारी । तुरतै दरसिहि अवध दुआरी ॥ 
नाघि नगरि चलि जाति निहारी । भरिअ बिलोचन बरसिहि बारी ॥ 
सघन वनों व्  चमकते गिरि को पार कर तत्क्षण ही अवध का प्रवेशद्वार दर्शित होने लगा  भरे नेत्रों से जलवर्षा करते भरे नेत्रों से अयोध्या को देखते हुवे नगरी उलाँघते चली जा थी|  

प्रबसित सो पावन पुरी, पहुँचिहि सरजू तीर । 
रहें बिराजित आपहीं जहँ गुरु सन रघुबीर ॥ 
अयोध्या की उस पावन पुरी में प्रविष्ट होकर फिर वह सरयू नदी के उस तट पर पहुंची जहाँ रघुनाथ जी गुरुजनों के साथ स्वयं विराजित थे | 

शुक्रवार , ३१ मार्च, २०१७                                                                            

 लखनु सहित सो परम सुभागी । उतरि जाइ तहँ प्रभु पग लागी ॥ 
परसत पिय पद पदुम परागा । बिरागिनि मन भरीं अनुरागा ॥ 
लक्ष्मण सहित वह परम सौभाग्यवती रथ से लक्ष्मण के साथ उतरी और वहां जाकर प्रभु के चरणों में नतमस्तक हो गईं | प्रियतम के पद्म चरणों के परागों को स्पर्श कर उस वैरागिणि का मन अनुराग से भर उठा | 

भर आँचरहि नयन जर मोती । मिलहि मिलहि जिमि दीपक जोती ॥ 
मिलइ बिभो सहुँ जगद बिभूती॥ मेलिहि मुकुता मनि सहुँ सूतीं || 
नेत्रों के अश्रुमुक्ताओं को आँचल में भरकर वह प्रियतम से ऐसे मिली जैसे दीपक से ज्योति मिलती हों | जगद विभु से जगद्विभूति का ऐसे मिलन हुवा जैसे सीप से मुक्तामणि का मिलन होता है | 

जानकी साथ जानकि नाथा । दुनहु निज मरजाद के साथ ॥ 
दरसत बदन मनोहर पिय के । ससि सरि सीतर भए हिय सिय के ॥ 
जानकी संग जानकी नाथ थे दोनों ही अपनी मर्यादाओं के साथ थे  प्रियतम के मनोहर मुख का दर्शन कर सीताजी का ह्रदय चन्द्रमा के समान शीतल हो गया था | 

सुर तरंगिनि बहीं चलि आईं । होत सतीरथ सिंधु समाई ॥ 
सुर तरंगिनि श्री गंगा बही आई और सुतीर्थ होते हुवे सिंधु में समाहित हो गई | 

नूपुरामुखर पद अवध पधरयो प्रनता जन नत माथ रे । 
जगन्निवास वरदवास भए जग नाथ जानकी साथ रे ॥ 
 हे हंस धुनी कल वादिनी केहि कृति कुसल करतल गहौ । 
गाउ सुमधुर साध सबहि सुर वद को सुखप्रद श्रुति कहौ ॥ 
नूपुर की ध्वनि करते चरण अवध में पधारे तो प्रणता  जन उन चरणों में नतमस्तक हो गए यह कहते हुवे कि जगन्नथा जगन्मयी जानकी साथ हुवे,जगन्निवास वर दायक वास हो चला है | हे हंस ध्वनि कल वादिनी वीणा !  तुम किसी कलाकुशल का करतल ग्रहण करो और समस्त स्वरों को साध्य कर गान करते हुवे कोई कर्णप्रिय श्रुति कहो | 

साधक गन सुरसाधहीं करुनाहू करुनाइ । 
करुनाधीन करुनानिधि रामु सिया समुहाइ ॥ 
साधकगणों ने सुर साधा तो करना भी करुणामय हो गई इस करुणा के अधीन हुवे करूणानिधि श्री राम चंद्र जी से उन्मुख हुई | 

सोमवार,०३ अप्रेल,२०१७                                                           


बनहि बिपति बिबरन नहि पूछहिं । आरत बदन बरन सबु बरनहि ॥ 
बीतै दिवस न जामिनि बीती । दीप धुजा बस रस रस रीती ॥ 
वन की विपत्तियों का विवरण नहीं पूछा, आर्त मुख पर का वर्ण सारा विवरण वर्णित कर रहा था | न दिवस व्यतीत होता न रात्रि ही व्यतीत होती वह तो दीपक की शिखा धारण किए शनै शनै रिक्त होती चली जाती | 

अगजग लग जोतिर जस जागे । जागिहि दीप पलक न लागे ॥ 
कहिय दहिय हिय पियहि बिहीना । सियहि जियहि जिमि जल बिनु मीना ॥ 
संसार भर में ज्योति की कीर्ति जागृत करते दीपक के प्रज्जवलित रहते तक पलकें नहीं लगती | दहता हृदय यह वर्णन कर रहा था कि प्रिय से विहीन सिय ऐसे जीवित थी जैसे वह जल विहीन मीन हो |

तलफत भए छन कल्प समाना । घनबर अल्प न लाइ मलाना ॥ 
नैन निराजन आँज अँजोरे । घोरिहि घेर निसा घन घोरे ॥ 
तड़पते हुवे क्षण भी जैसे कल्प के समान हो गया था किन्तु वह मुख पर रघुवर के प्रति तनिक भी म्लान नहीं लाती | निरंजन नयन अंजन युक्त होते तो घनघोर निशा घेर कर उस अनजान को स्वयं में घोल लेती | 

जियति धरि जियँ पियहि जिय जानी । मन तनि सोच न हानि ग्लानी ॥ 
प्रभु छबि हरिदै दरपन लाखे  । पूजि चरन मन मंदिर राखे ॥ 
प्राणाधार को ही प्राण मानकर प्राण संजोए जीवति रहीं | मन में यत्किंचित भी हानि ग्लानि नहीं थीं | ह्रदय को दर्पण वह प्रभु की छवि विलोक कर मन के मंदिर में प्रतिष्ठित किए नित्य उनकी चरण-वंदना करती रही | 

फिरिहि बिकल बन धरिअ छिलावा । परिअहि निज चरनन तल घावा ॥ 
बारहि बार आपु बोलाईं | धरिअ देही रहि प्रान पठाई || 
कंटक युक्त चरणतलों में घाव ग्रहण किए व्याकुल हुई वन में फिरा करतीं | जब वारंवार आपने बुलाया देह तो धारण किए प्राण आपको प्रेषित करती रही | 

जाइ जहँ तहँ तुम्हहिं अहेरे । बिरहन  दए दुख दुसह घनेरे ॥ 
जहाँ जाती वहां उन्हें आपकी ही टोह रहती इस विरह ने इन्हें दुसह दुखों से व्याप्त कर दिया | 

बूड़हि नाहि तीरहि अह बिरहा उदधि अपारु । 
करनधार करु धार नहि को बिधि पाए न पारु ॥ 
न डूबती न तैरतीं आह ! यह विरह सागर कितना अपार था | कर्णधार का कराधार न था यह किसी प्रकार पारगम्य न होता | 

शनिवार, ०८ अप्रेल,२०१७                                                                     

गहइ बनहि घन सूल सलाका | कहइ बिनहि सबु देइ भलाका || 
दीन दसा दृग दरसि न जाई | बरसि कहसि हे नाथ दुहाई || 
वन के घनीभूत कष्ट व् पीड़ा कहे बिना ही सारा वृत्तांत कह रहे थे दृष्टि से उनकी दशा देखि नहीं जा रही थी  वह बरस कर कह रहीं थी हे नाथ ! दुहाई हो | 

देइ द्वारि पलक पट ढारे | राम राम हाँ राम गुहारे || 
दुइ छन होर हरुअ हिलोले | सूझ परइ न कहइ का बोलेँ || 
नेत्रों में पलक पट का द्वार देकर नयन गृह राम राम की ही पुकार रहे थे | दो क्षण ढहर कर वह पट धीरे से हिले तब प्रभु को सुझा ही नहीं कि अब क्या कहें क्या बोलें | 

आवत रसन बरन अवरूझे | रघुबर कुसल छेम पुनि बूझे || 
होइ कुसल कस जोइ अनाथा | सबहि मंगल नाथ तव साथा || 
जिह्वा में वर्ण आकर उलझ जाते फिर (किसी विधि ) रघुवीर ने उनका कुशल क्षेम पूछा | जो नाथ वियोजित हो वह भला कुशल कैसे हो सकती है हे नाथ ! सभी मंगल तो आपके साथ ही हैं माता ने कहा | 

रघुकुल दिनकर नयन अगासे | उदइ गहन बिरहन निसि नासे || 
कृत कृपा केतु भा भोर अलस | प्रेम पयस भरि हरिदय मानस || 
इस नयन रूपी गगन के सूर्य रघुकुल ही हैं जिसके उदय होते ही गहन विरह रात्रि का विनास हो गया | आपकी कृपा केतु के कारण दर्शन की अलस भोर हुई जिसने इस हृदय के मानसरोवर को प्रेम पियूष से भर दिया  | 

परम पेम मय हृदय ते कल कर कलस सँजोइ | 
धरि सीस महि गहि चरनहि अरपिहि सरसिज दोइ || 
फिर माता ने भूमि पर शीश रखा और प्रभु का चरणवन्दन कर अपने सुन्दर हस्तकलश में  परम प्रेम मय उस ह्रदय से संगृहीत लव-कुश रूपी दो सरोज अर्पित कर दिया 


पेम पूरित नैन जल जोरे । नाथ छमिबो दोषु जो मोरे ॥ 
बोलिअ बिकल बैन बैदेही । बिधि बध्यो सबु दोषु न केही ॥ 
प्रेम पूरित नेत्रों में जल भरे माता वैदेही ने व्याकुल वाणी से कहा -- नाथ ! यदि मेरा कोई दोष है तो उसे क्षमा प्रदान करें | 

एहु सुअवसरु कहिअ रघुनाथा । करिहउँ पूरन मख तव साथा ॥ 
नाइ माथ सहुँ बाल्मीकि के । आसिर बचन  लहे प्रिय जी के ॥ 
रघुनाथ जी ने कहा -- 'यह विधाता द्वारा रचित है इसमें किसी का दोष नहीं है अब इस शुभ अवसर पर में तुम्हारे संग यह यज्ञ पूर्ण करूंगा | 
नत मस्तक सहुँ ब्रम्ह रिसिहिं के । सुभगासीस गहीं सबही के ॥ 
कौसल्या कि मातु कैकेई । गईं प्रनमन सबु साधु देईं ॥ 
फिर सभी ऋषि-मुनियों के सम्मुख नतमस्तक हुईं और सभी का शुभाशीर्वाद ग्रहण किया | माता कौशल्या हो अथवा कैकेई हों वह सभी साधू देवियों को (सासों को ) प्रणाम करने गईं | 

पगु परसत उर रहँस न थोरे । देइ असीसहिं लेइ अँकोरे ॥ 
देखीं जब पगपरि बैदेही । भेंटि कैकेइ भईं सनेही ॥ 
उनके चरण स्पर्श करते ह्रदय में अपार हर्ष हुवा उन्हें अंक में भरकर उन्होंने आशीर्वाद दिया | जब वैदेही को अपने चरणवन्दन करते देखा तो उनसे भेंट करते माता कैकेईं स्नेहिल हो गईं | 

देइ असीस उर उदधि उमगि पेमानुराग । 

दुहु सुत सहित चीर जियौ रहिहौ भरिअ सुहाग ॥ 
उन्हें आशीर्वाद देते ह्रदय सिंधु में अनुराग उमड़ पड़ा दोनों पुत्रों सहित चिरंजीव होकर सौभाग्यवती रहो | 

मंगलवार,११ अप्रेल,२०१७                                                                     
रामचंदु कर प्रिय परिनीता | पतिव्रति सति साध्वी सीता || 
परिजन सहित सबहि पहिं जाई | कीन्हि प्रनाम अति हरषाई || 
भगवान श्रीरामचन्द्र जी की प्रियपरिणीता पतिव्रती सटी साध्वी सीता परिजन सहित सभी के पास गईं और अत्यंत हर्षित होकर उन्हें प्रणाम किया | 

कुंभज आइ देखि जूँ सीया | मुदित भयो सो नहीं कथनीया || 
रघुबरहि दिसि बाम बैठारे | अरु सुबरन मइ मूरति टारे || 
मुनि अगस्त्य को ज्योंही माता सीता का आगमन दर्शित हुवा वह जिस प्रकार प्रमोदित हुवे वह अकथनीय है | स्वारंमयो मूर्ति को विस्थापित कर रघुवर के वामदिशा में उन्हें विराजित किया गया | 
  बैसिहि बेदि रामु बैदेही | सोभा सकै न  कहि मुख केही || 
बैसि बिभो जनु जगद बिभूति | प्रगसहि भू नव नव भव भूती || 
यज्ञ वेदी पर विजयजीत भगवान रामचंद्र व् माता सीता की शोभा किसी भी मुख से वर्णनातीत है | जगद विभु व् जगद विभूति को विराजमान देख भूमि नव-नवल भूतियाँ प्रकट करने लगीं | 

अपूरहि पौर पुर नर नारी | भए नभ थल कोलाहल भारी ||  
चहेउ  दीठि सबु एकहि बारा | रामसिया के मिलइ निहारा || 
पुर नर नारियां पुर में पौड़ी तक आपूरित थे नभ व् थल में भारी कोलाहल हो रहा था | सभी दृष्टियों की यही अभिलाषा थी की एक बार रामसीता के दर्शन प्राप्त हो जाएं | 

गहि कमंडल मुनि मंडल पुनि किए समिदाधान | 
जुगे पानि निर्मल बानि करिहि अनल अह्वान || 
मुनि मंडल ने कमंडल ग्रहण कर फिर समिधा का आधान किया | और करबद्ध होकर निर्मल वाणी से अग्नि देव का आह्वान करने लगे | 

रविवार,१६ अप्रेल,२०१७                                                                                            

करसि बेदु धुनि अति  मृदु बानी | बहसि मंद जिमि नदि के पानी || 
सरस वती मुनि कंठ बिराजिहि | करन लगे रघुबर मख काजहि || 
अत्यंत मृदुल वाणी से वह ऐसे वेद धवनि करने लगे जैसे किसी सरिता में मद्गति से जल प्रवाहित हो रहा हो | सरस्वती मुनियों के कंठ में विराजित हो गईं और वह रघुवर जी के यज्ञकार्य करने में सलंग्न हो गए | 

पुनि परम बुधि सुधि साधु  सुभाए | गुर बसिष्ठ सोंहि पूछ बुझाए || 
दरसिहि बेद सोइ सबु भयऊ | अबर कवन करतब रहि गयऊ || 
तदोपरांत परम बुद्धिमन्त सुधित साधू स्वभाव गुरु वशिष्ठ से पूछने लगे | जो वेद में दर्शाया गया है वह सब कर्मकांड पूर्ण हुवा अन्य कौन सा  कर्तव्य शेष है ? 

एहि मह मख हे गुर गोसाईँ | बोलिहि गहबरु घन के नाई || 
जाग जोग सब काजु अपूरे | राखिहि जौ भूसुर परिपूरे || 
फिर गुरुवर वशिष्ठ गंभीर मेघ के समान वाणी से बोले - 'स्वामी ! यज्ञ सम्बन्धी सभी कार्य पूर्ण हुवे अब जो ब्राह्मणों को संतुष्ट करें 

अजहुँ बिधिबत करिहु सो पूजन  | श्रुतत रघुपत एहि श्रुति सुख बचन || 
कुंभज परम पूजनिअ जाने | पूजत ताहि प्रथम सनमाने || 
आप विधिवत वह पूजन करिए | यह कर्णप्रिय वचन श्रवण कर रघुपति ने मुनि अगस्त्य को परम पूज्यनीय जानकर अभिनन्दन करते हुवे सर्वप्रथम उनका सम्मान किया | 

उदार रूप नाना बिधि तनु मनु भावनु चीर | 
गज रथ तुरग धेनु धरनि हिरन जड़ित मनि हीर || 
उदार रूप होकर तन को मन को रुचित प्रतीत होने वाले वस्त्र, हस्ती, रथ, तुरंग, धेनु, भूमि, स्वर्णजड़ित मणि मालाएं- 

मंगल दायक बस्तु गहि दीन्हि बहुतक भार | 
कृत कृत प्रभु मुनि तिय सहित कीन्हि अति सत्कार || 
और भी अन्य मांगलिक द्रव्यों से भरे बहुतक भारों का दान किया |  मुनियोंसहित उनकी धर्मपत्नियों को कृतार्थ कर प्रभु ने उनका अत्यंत सत्कार किया | 

तिया सहित च्यवन रिषिहि पूजत भले बिधान | 
समदत सबहि सम्पद ते दिए बहु आदर मान || 
सपत्नी ऋषिच्यवन की भली भाँती पूजार्चना की | सभी प्रकार सम्पतियों से उनका अभिनन्दन करते ैश्य आदर सन्मान किया | 

मंगलवार,१८ अप्रेल,२०१७                                                                                         

एहि बिधि रहि रिषि महर्षि जेता | सकल तपसी ऋत्वजहि समेता || 
बस्तु अनेक सुभ मंगल करन | रूचिहि बिचार बहु पहिरावन || 
इस प्रकार अन्य जितने भी मुनि, ऋषि-महर्षि थे उन सभी तपस्वियों को ऋत्वजों सहित अनेक मंगलकारी  वस्तुओं से व् उनकी रूचि विचार कर अनेकानेक वस्त्रों -

भूषन भरे भार दए भूरी | देइ मान लीन्हि पग धूरी || 
दीनहीन दुखि अंधहि लोचन | देत धनहि  दुःख करत बिमोचन || 
व् भूषणों से भरे भार बहुतायत में दान से उनको मान देकर उनके चरणों की धूल ग्रहण की | जो असहाय अपंग थे निर्धन थे अन्धलोचन थे उन्हें धनादि देकर उनके दुःख का विमोचन करते गए | 

सुख सुसंपद सहित गोसाईँ | मधुर मधुर भोजन बिरताईं || 
दिए दान अस बेदु अनुहारे  | सबहि तोषु परिपोषनहारे  || 
सुन्दर सुख सम्पतियों सहित स्वामी ने मधुर-मधुर भोजन का वितरण किया | जो सभी को संतुष्ट व् परिपुष्ट करें वेदों का अनुशरण कर प्रभु ने ऐसा दान किया | 

आदर मान पेम पद पूजा | करिहि अस कि करि सकै न दूजा || 
रघुनन्दन कर दायन देखे | कुंभज मुनि भय मुदित बिसेखे || 
आदर मान व् प्रेम से चरणों का ऐसा वंदन किया जैसे कोई अपरंच न कर सके | रघुनन्दन का दायन देखकर मुनि अगस्त्य विशेष मुदित हुवे | 

अश्व नहावन सुभ घरि जानी | मँगावनु सुधा सरिबर पानी || 
रानिन्ह सहित चौसठु राईं | बहुरि अतुरै निकट बोलाईं || 
आश्वासनों की शुभ बेला जानकर सरोवरों से सुधाजल मंगवाने हेतु रानियों सहित चौसठ राजाओं को बड़ी ही आतुरता से निकट बुलाया | 
  नव सप्त सिंगार  सोंहि श्री सोहित सिय साथ | 
कनक कलसि कर धरे जल चले लेन रघुनाथ ||
 सोडष श्रृंगारो की शोभा से सुशोभित जगद विभूति माता सीता के साथ स्वर्णकलश हस्तगत किए रघुनाथ फिर जल लेने हेतु प्रस्थित हुवे | 

बृहस्पतिवार, २० अप्रेल,२०१७                                                                          

हिरन मई गागरि गहि हाथा | आगे सिया सहित रघुनाथा || 
धूपापत छाँहीँ के नाई | पाछु चले तीनिउ लघु भाई || 
स्वर्णमयी घघरी हाथ में लिए सीता के साथ रघुनाथ आगे थे धूप में आप्त की छाया के सदृश्य तीनों बंधू उनके पीछे चल रहे थे | 

मांडवी भरत संग सुहावै | उरमिला लखनु मन अति भावै || 
श्रुतिकीरति रिपुदवनु प्रसंगा | कांतिमति पुष्कल कै संगा || 
मांडवी भारत के संग सुशोभित थीं,  उर्मिला लक्ष्मण के साथ मनभावनी प्रतीत हो रहीं थीं |  शत्रुध्न के संग श्रुतिकीर्ति,  पुष्कल के संग कांतिमती सुशोभित थीं | 

लक्ष्मीनिधिहि कोमला साथा | मोहना के सोह कपि नाथा || 
सुरथहि संगत सुमनोहारी | उदधि धरे सबु भयउ कहारी || 
लक्ष्मिनिधि के साथ कोमला और सुग्रीव के साथ मोहना थीं | सुन्दर रथों के साथ सभी जल राशि को ढोने वाले बादलों के समान मंगल मनोहारी प्रतीत होते थे  | 

एहि बिधि रहि अरु जेतक रायो | बसिष्ठ रिषि जल लेन पठायो || 
सीत पुनीत पुण्य पयसु गही | सरजू तट गयउ सो आपहीं || 
इस प्रकार और भी जितने राजागण थे ऋषि वशिष्ठ ने सभी को जल लाने हेतु प्रेषित किया | शीतल पुनीत पुण्य पियूष को ग्रहणकर यह स्वयं भी सरयू के तट  पर गए | 

बाँचत बंदि बेदु बचन बहु बिधिबत तहँ जाइँ | 
किए अभिमन्त्रित तासु जल भए सो अरु सुभ दाइ || 

बंदिगण  वेदमन्त्रों का अत्यंत विधिवत वाचन करते वहां गए और उस तट को अभिमंत्रित किया तो वह और अधिक शुभप्रद हो गया | 

टिपण्णी : - रामश्वमेध की कथा श्रीमद पद्मपुराण से उद्धृत की गई है इस पुराण में सीताजी के भूमि में समाहित होने का  प्रसंग वर्णित नहीं है | 

Friday, 16 September 2016

----- ॥ दोहा-द्वादश 1॥ -----

लघुवत वट बिय भीत ते उपजत बिटप बिसाल । 
बिनहि बिचार करौ धर्म पातक करौ सँभाल ॥ १ ॥ 
भावार्थ : -- एक लघुवत वट बीज के भीतर से एक विशाल वृक्ष उत्पन्न होता है । अत: पुनीत कार्य करते समय उसके छोटे बड़े स्वरूप का विचार न करें । पतित कार्य करते समय उसके छोटे बड़े स्वरूप का सौ बार विचार करें । क्षुधावन्त की क्षुधा को शांत करने के लिए अन्न का एक दाना भी पर्याप्त होता है यह एक दाना खेत में पहुँच जाए तो फिर अनेक से अनेकानेक होकर भंडार भरने में समर्थ होता है ॥  अपात्र को दिया गया एक अभिमत, दाता के नारकीय पथ को प्रशस्त करता है ॥

" संकल्प हीन मनोमस्तिष्क ही विकल्प का चयन करता है " 

जो कारज कृत कठिनतम बढ़ि बढ़ि कीजिए सोइ । 
ताहि कृतब का होइया करिअ जाहि सब कोइ ॥ २ ॥ 
भावार्थ : -- जिन पुनीत कार्यों को करना कठिन हो वह पुण्य प्रदाता कार्य होते हैं अत: उन्हें करने के लिए सदा उद्यत रहना चाहिए । जो सरल हों जिसे सभी करते हो ऐसे सत कार्य पुण्यदायक नहीं होते ॥ 

सो धर्म केहि काम कर जौ जन करै अकाम | 
बिरवा बुवावै न एकहु बैठा खावै आम || ३ || 
भावार्थ : -- वह धर्म संसार के किसी काम का नहीं जो अपने अनुयायियों को कर्म से अलिप्त कर उन्हें अकर्मण्य बनाता हो | जिसकी आम खाने में तो रुचि हो पेड लगवाने में नहीं | 

सो धर्मि केहि काम कर जौ तन करै अकाम | 
बिरवा बुवावै न एकहु बैठा खावै आम || ४ || 
भावार्थ :-- वह अनुयायी भी संसार में किसी काम के नहीं जो अपने शरीरको कर्म से अलिप्त कर उसे अकर्मण्य बना देते हों | जिसकी आम का रसास्वादन करने में रूचि हो किन्तु अपने शरीर से पेड लगवाने में नहीं || 

सीस उतारी जब तेउ डारि दियो सद ग्रंथ | 
कर सत करतब छाँड़ियो  धरिअत चरन कुपंथ || ५ || 
भावार्थ ;-- जब से शिरोधार्य सद्ग्रन्थ अधस्तात होकर त्याज्य हो गए तब से चरण कुपपंथगामी और हस्त कृत कर्मों से विमुख हो गए  ||

आया तू संसार में देख पके पकवान | 
निसदिन खावन में रहा बिछुरे तन ते प्रान || ६ || 
भावार्थ :--कर्मों में संलिप्त जीवन की कहानी लंबी होतीहै | कर्मसे अलिप्त जीवन की कहानी केवल एक पंक्ति में संकुचित होकर रह जाती है | जीवन चरित्र ऐसा हो जिसपर ग्रन्थ लिखा जा सके ऐसा न हो कि मात्र इतना लिखे ;--  "संसार में आया था, पके पकवान देखा ,खाया और चला गया....." 

मानस देहि जनम लियो,रहियो अपनी कान | 
हरा भरा जग करा नहि करो न मरु अस्थान || ७ || 
भावार्थ :--  मनुष्य देह में जन्मे जीव को चाहिए कि वह अपनी मर्यादा में रहे |
संसार को हरा-भरा  नहीं किया कोई बात नहीं उसे मरुस्थल में परिवर्तित न करे |
उसने पुण्य नहीं किया कोई बात नहीं वह पाप तो न करे |



जल के संगत कीजिये, हरियाली ते हेत |
मरत भूमि न त होइही चहुँपुर रेतहि रेत || 8 || 
भावार्थ : - 'जल ही जीवन है' हमें जल-संरक्षण के संगत सदैव हरियाली के लिए उत्प्रेरित रहना चाहिए | यदि हरियाली की उपेक्षा की गई तो यह भूमि मृतप्राय होकर जीवन से रहित मरुस्थल में परिवर्तित हो जाएगी तब इसके चारों ओर मिट्टी के स्थान पर रेत ही रेत व्याप्त रहेगी | 

जाके पंथ पहुँच बिना सो पहुंचे दरबार | 
बोलिए तो स्वान कहे भूकन दे झकमार || ९ ||  

भावार्थ : - ये लोकतंत्र के नाम पर चल रहे भ्रष्टतंत्र का ही चमत्कार है कि जिनके पथ पहुँच से विहीन है वह सत्ता में पहुँच गए है और पहुंचे हुवे पर शासन कर रहे है | यदि इन्हें कोई कुछ बोले तो ये उन्हें कुत्ता कहकर दुत्कारते हुवे कहते हैं भूँकने दो ! संविधान अपना कौन सा कुछ बिगाड़ लेगा | 

दया धर्म बिरोधी भए सत्ता पर आसीन |
अगजग सो पथ चालिआ जो पथ पहुँच विहीन || १० ||


भावार्थ : - दया और धर्म का विरोध करने वाले सत्ता पर आसीन हो गए हैं, इनका अनुशरण करते हुवे अब लोग उस पथ पर चल पड़े हैं जो पथ कहीं नहीं जाता |



मैं मैं कर आसन गहे अधमस की पहचान | 
तू तू कर पाछे रहे उत्तम तिनको जान ||११ || 
भावार्थ : - योग्यता मैं मैं की संकीर्ण विचार धारा से मुक्त होती है |  मैं मैं के साथ कोई पद, आसन अथवा सिंहासन प्राप्त करना यह निकृष्ट अधिष्ठाता के लक्षण है, तू तू करते जो सबसे पीछे रहता है वह इन प्रपंचों के हेतु उत्तम अधिष्ठाता होता है | 



घूँघट ते मरजाद भलि नर नारी को होए | 
बँध रहे न निरबँध रहे भले नेम कर जोए  || १२ || 

भावार्थ : - घूँघट से ही सद्चरित्र का गठन होता है यह आवश्यक नहीं |  नर हो अथवा नारी या नाड़ी इनके लिए घूँघट से मर्यादा उत्तम है | ये न तो बंधन में रहे न स्वच्छंद रहे तथा उत्तम नियम व् रीति का पालन करे ( तभी इनमे शील व् सदाचार का गठन संभव है ) 

संत  कबीरदास जी ने भी कहा है : -
जो कामिनि परदै रहे, सुनै न गुरुगुण बात । 
सो तो होगी कूकरी, फिरै उघारे गात ॥ 518 ॥
भावार्थ : - यदि स्त्री घूंघट में रहे तो गुण व् ज्ञान वाली बातें नहीं सुनती, लज्जाहीन रहे तो उसका स्वभाव स्वान के अनुरूप हो जाता है | 

Wednesday, 24 August 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५५ ।। -----

बुधवार, २४ अगस्त, २०१६                                                                                                  

सिय केर सुचितई मानद हे । तव सहुँ छदम न कोइ छद अहे ॥ 
न तरु हमहि न देवन्हि सोंही । यह कछु मन महुँ भरमन होंही ॥ 
हे मानद ! सीता की शुद्धि के विषय में आपसे न कोई दुराव है न छिपाव | तत संबंध में न हम से और न  देवताओं से ही कुछ गोपनीय है | यह जन-मानस  के मन का भ्रम मात्र ही था | 

हरहि तमस जिमि प्रगस पतंगा । दूरए मन  निभरम ता संगा ॥ 
कहत सेष मुनि जगद निधाता । भगवन जद्यपि सरब ग्याता ॥ 
जिस  प्रकार सूर्य उदयित होकर अन्धकार का हरण कर लेता है, उसी प्रकार उक्त घटना से यह भ्रम भी दूर हो गया | शेष जी कहते हैं : -- हे मुनि! जगत विधाता भगवान यद्यपि सर्वज्ञाता हैं  

तद्यपि मुनि एहि बिधि समुझायउ । सुनि असि अस्तुति सहुँ सिरु नायउ ॥ 
लषन सोंहिं बोलिहि एहि  बाता । सुमित्र सहित कृत करिहु ए ताता ॥ 
तद्यपि वाल्मीकि मुनि ने उनका प्रबोधन किया मुनि वर की ऐसी स्तुति श्रवण कर प्रभु नतमस्तक होकर लक्ष्मण से बोले :--हे तात ! तुम सुमित्र का संग प्राप्त कर यह कर्तव्य करो;

सती सिया पहिं चढ़ि रथ जाहउ। जमल सहित तुर आनि लिवाहउ ॥ 
करएँ जुग कर बिनति सब कोई  । करौ सकार अजहुँ सुत दोई ॥ 
तुम रथारूढ़ होकर युगल पुत्रों सहित धर्माचारिणी सीता को ले आओ | सब लोग करबद्ध होकर मुझसे विनति कर रहे हैं कि आप अपने दोनों पुत्रों को स्वीकार करें | 

मोर अरु मुनि केर कही कहियउ तहँ सब बात । 
अवध पुरी लेइ अइहौ कहत मात हे मात ॥ 
माता माता की गुहार करते हुवे  तुम  मेरे तथा महर्षि वाल्मीकि द्वारा कहे  इन वचनों को निवेदन कर उन्हें अयोध्या पुरी ले आना |  

अहो भगवन अजहुँ मैं जइहौं । सीअहि मातु कहत समुझाइहौं ॥ 
सुनिहि जो तुहरे प्रिय सँदेसा । आनि पधारन  सो एहि देसा ॥ 
अहो भगवन ! माता जानकी के प्रबोधन हेतु मैं तत्काल प्रस्थान करता हूँ आप महानुभावों का सन्देश श्रवण कर यदि वह यहाँ पधारने के लिए : -- 

आइहि मोर संग सिय माई । होइहि तबहि सुफल मम जाई ॥ 
अस कह लखनउ आगिल बाढ़े । प्रभो अग्या सोंहि रथ चाढ़े ॥ 
मेरे साथ आती हैं मेरी यात्रा तभी सफल होगी | रामचंद्र जी से ऐसा कहते हुवे लक्ष्मण आगे बढकर उनकी आज्ञा से रथारूढ़ हो गए | 

अरु मुनिबर के सिस लय संगा । सुमित्र सहित रथ भयउ बिहंगा ॥ 
प्रिय प्राना पति अति परम सती । होहि केहि बिधि मुदित भगवती ॥ 
और मुनि शिष्यों को साथ लेकर सुमित्र सहित वह रथ विहंग के समदृश्य हो गया | पति को प्राणों से भी अधिक प्रिय परम सती भगवती सीता किस प्रकार प्रसन्न होंगी | 

बिकलित मन मानस अस सोचिहि । कबहुँ हरष करि कबहुँ सकोचिहि ॥
एहि बिअ बिचहुत मति बिरझाईं । अतुर परन कुटि देइ दिखाई । 
ऐसा  विचार करते लक्ष्मण के व्याकुल मनोमस्तिष्क में कभी हर्ष होता  कभी संकोच होता |  इन दोनों भावों के बीच उनकी मति उलझ रही थी | शीघ्र ही उन्हें सीता की पर्ण-कुटिया दिखाई देने लगी | 

एहि दसा पैठि रथ चरन पथ श्रमु गयउ सिराए । 
तुरतई पुनि जगन मई जननि देइ देखाए ॥ 
इसी दशा में रथ के चरणों ने वहां प्रवेश किया | कुटिया को दर्शकर पथ जनित शिथिलता जाती रही,  जगन्मयी जननी के भी तत्काल ही दर्शन हो गए | 

रविवार, २८ अगस्त, २०१६                                                                                         

भय अस्थिर रथ चरन तरायल । तुरै तरिय तरु मंडित अस्थल  ॥ 
सिथिरीभूत सीतहि नियराए । कहत ए लखन कण्ठ  भर ल्याए ॥ 
रथ के वेगवान चरण स्थिर हुए शीघ्रता पूर्वक रथ से उतरे |  शिथिलित लक्ष्मण वृक्षों से सजी हुई स्थली पर माता सीता के समीप गए, यह कहते उनका कंठ भर आया कि 

पूजनिअइ हे पेम परिमिता । हे भगवति अति सुभग परिनिता ॥ 
हे आर्ये हे मंगल करनि । बिभव अपार भव सागर तरनि ॥ 
हे अपरमित प्रेम से पूज्यनीय ! हे देवी भगवती | हे अत्यंत सौभाग्य शाली स्वामिनी ! हे आर्ये ! हे कल्याणमयी ! हे वैभववान संसार रूपी अपार सिंधु की नौका ! 

बहोरि कातर रूप निहारे । बोधत अस गहि पद महि पारे  ॥ 
सियहि बत्सल पेम के साथा । बिहबल होति लम दुहु हाथा ॥ 
कातर दृष्टि से निहारकर ऐसा सम्बोधन करते फिर वह उनके चरणों में गिर पड़े | जानकी माता वात्सल्य प्रेम से विह्वल होकर दोनों हस्त प्रलंबित किये | 

नहि नहि कहति नयन भर पानी । उठइ लषन अति करिअ ग्लानी ॥ 
भरिअ सोहाग रहिअ बिरागी । तासों एहि बिधि पूछन लागी ॥ 
और अश्रु पूरित नेत्रों से नहीं नहीं कहते अतिशय ग्लानि करते लक्ष्मण को उठाया और सौभाग्य से परिपूर्ण होकर भी संसार से विरक्त वह साध्वी  इस प्रकार प्रश्न करने लगी --

जौ बेहड़ बन मुनि महर्षि प्रियकर महतिमह तपसि जन के । 
ब्याल कराल जौ भालु बाघ अरु केहर कुंजर गन के ॥ 
कंदर खोह अगम अगाध नदीं नद जो बिनहि रबि किरन के ।  
कंटक कांकर गहबर मग अँधेरि छादित जौ तरुवन के ॥ 
जो विकट वन मुनियों, महर्षियों व् महानतम तपस्वियों को प्रिय है जो विकराल हिंसक जंतुओं, भालुओं, सिंहों व् हाथियों का है | जहाँ सूर्य की किरणों से विहीन अगम्य घाटियां, गुहाएँ, अगाध नदी व् पर्वत है | जिसका मार्ग कंकड़ों, कांटो से युक्त होने के कारण दुर्गम और वृक्षों के आच्छादन से अन्धकारमय है | 

हरिअहि हय हेरिहि केहि, तव डग डगर भुराए । 
दूरत नगर सौम्य हे  कहौ इहाँ कस आए ॥  
क्या किसी ने  भगवान श्रीराम के अश्व का हरण कर लिया है ?  हे सौम्य ! उसकी शोध में नगर से दूर होते क्या तुम्हारे चरण पथभ्रमित हो गए ? कहो तो यहाँ किस हेतु आगमन हुवा ? 

बृहस्पतिवार ०१ सितम्बर, २०१६                                                                                 

मातु गरभ गह सुकुतिक रूपा । उद्भयउ मनि मुकुता सरूपा ॥ 
अराधित देउ मोरे  नाथा । अहहि न धनि  सुख सम्पद साथा ॥ 
माता के शुक्तिक रूपी गृह से मणि मुक्ता स्वरूप में उद्भवित होने वाले मेरे आराध्य देव, मेरे नाथ सुख की सम्पदा से धनि तो हैं न ? 

सजल नयन पुनि कहि हे नागर । जग अपकीरति कारन रघुबर ॥ 
कि राखन साँच मोहि त्यागे । होइँ कुपथ चर प्रजा न आगे ॥ 
सजल नेत्रों से फिर सीता ने कहा हे देवर ! जग अपकीर्ति के कारण अथवा सत्य की रक्षा के लिए रघुवर ने मेरा त्याग कर दिया इस हेतु कि भविष्य में कहीं प्रजा कुपंथ गामी न हो जाए | 

दय बन करिअब बिरहन मोही । त्याज काज सौंपि प्रभु तोही ॥ 
होइ ताहि सों एहि संसारा । तासु बिमल कीरत बिस्तारा ॥ 
मेरे परित्याग का कार्य तुम्हें सौंपा और मुझे विरहणी बनाकर वन दिया | यदि इससे इस संसार में उनकी विमल कीर्ति विस्तृत होकर : -- 

जुग जुग लग अस्थिर कृत होईं  । तासों बड़ संतोष न कोई ॥ 
अजहुँ होउँ किन मैं बिनु प्राना । रहएँ जसोधन प्रान निधाना ॥ 
युग युग तक स्थिरकृत हो तब इससे बड़ा कोई संतोष नहीं है |  मैं प्राण हीन क्यों न हो जाऊं किन्तु मेरे प्राण निधान यशस्वी रहें यह मेरी अभिलाषा है  | 

मोर नयन हरि पेम पियासे । यह मन मंदिर बरें दिया से ॥ 
रुचिर बसन मनि भूषन साजे । मंजुल मूरति रूप बिराजे ॥ 
मेरे नेत्र हरि प्रेम के प्यासे हैं जो मेरे मन मंदिर में दीपक बनकर प्रज्जवलित हैं जहाँ वह सुन्दर वेश व् मणि आभूषण से सुशोभित मनोहर मूर्ति रूप में विराजित हैं | 

अह दयालु परम कृपालु कौसल्या महतारि । 
अहहि न सकुसल अनंदित  अवध सहित सुत चारि ॥ 
अहो ! मुझ पर दया व् कृपा रखने वाली माता कौसल्या चारों पुत्र सहित अयोध्या में कुशल व् प्रसन्न तो हैं न ? उन्हें कोई कष्ट तो नहीं है ? 


शुकवार, ०२ सितंबर, २०१६                                                                                            

रिपुहन भरतादि सबहि भ्राता । अहहि न सकुसल सुमित्रा माता ॥ 
चाहिब अधिक् प्रान ते मोही । मम दुखारत रहँ न सुख सोंही ॥ 
शत्रुहन भरतादि सभी भ्राता कुशल हैं न ?  और सुमित्रा माता सकुशल हैं न ?  जो मुझे अपने  प्राणों से भी अधिक प्रिय मानती हैं जो मेरे दुःखी होने  से जो स्वयं सुख का अनुभव नहीं करतीं | 

कहौ अहैं कस पियतम मोरे । पूछत एहि जब करिय निहोरे ॥ 
लोचन अरु जल बोह न बोही । बालिहि लषमन पुनि सिय सोंही ॥ 
कहो  तो मेरे प्रियतम कैसे हैं  माता जानकी ने लक्ष्मण से जब यह प्रश्न निवेदन किया तब उनके नेत्र जल कभार को वहन न कर सके तब वह उनसे बोले : -- 

देइ सकुसल अहहि महराई । पूछत रहँ तुम्हरि कुसलाई ॥ 
सुमित सहित मातु कैकेई । आहि सकुसल सबहि हे देई ॥ 
' हे देवी ! महाराज कुशलपूर्वक हैं और आपकी कुशलता पूछ रहे हैं | सुमित्रा सहित माता कैकेई भी सकुशल हैं हे महारानी !  

रहिब रागि अरु जो रनिबासा । करिअ निरंतर तोर सुखासा ॥ 
गुरुजन सहित सकल गुरुनारी ।  तुम होउ सुखारी ॥ 
राजभवन की अन्य सभी देवियाँ निरंतर आपके सुख व मंगल की कामना करती रहती हैं | आप जहाँ भी हैं वहां सुख पूर्वक रहें गुरुजन सहित सभी गुरुपत्नियों ने  --

दए असीस जनि पेम अपूरे। तोर जिआ आपन जिअ भूरे ॥ 
तुहरे पदुम चरन सिरु नाई । कुसल प्रसन कृत दोनहु भाई ॥ 
आपको यह प्रेमपूरित आशीर्वाद दिया वह आपकी प्रसन्नता के लिए अपनी प्रसन्नता भूल गईं | दोनों भ्राताओं ने  कुशल-प्रश्न के साथ   आपके  पदम् चरणों में प्रणाम निवेदन किया है| 

रघुनन्दन कहत ए बचन नयन नीर भर लाए । 
पालि मम कहिअ गवन बन जानकिहि जाहु लिवाए ॥ 
महाराज श्री रघुनंदन यह कहते हुवे नयनों में जल भर लाए कि जो  मेरे कथनों का शब्दश:अनुशरण कर वन गामी हो गईं तुम उस जानकी को लिवा लाओ | 

शुक्रवार, १६ सितम्बर, २०१६                                                                                                      

रघुकुल मनि अब रहएँ बुलावा । तोहि ल्यावन मोहि पठावा ॥ 
ह्रदयँ रहस प्रगसभव बानी । पोषत प्रीत पलकन्हि पानी ॥ 
रघुकुल  मणि अब बुला रहें हैं आपको लेने के लिए उन्होने मुझे भेजा है | ह्रदय का रहस्य वाणी द्वारा व्यक्त हो जाता है पलकों का पानी प्रीति का पोषण करती है |  

भरे कण्ठ यह कहिब भनीता । सुनहु सतीहि सिरोमनि सीता ॥ 
दीनदयाकर कृपानिधाना । जन जन कहत मोहि भगवाना ॥ 
उन्होंने भरे कंठ से यह वक्तव्य कहा है : --  ' हे सतीयों की शिरोमणि !हे सीते दीं दुखियों पर दया करने वाले, कृपा के निधान कहकर जन-जन मुझे ईश्वर स्वरूप कहते हैं | 

मोर मते जौ जग करतारी । सौइ  अदरस  करम अनुहारी ॥ 
होइ रहेब जगत महुँ जोई । ताकर अदरस कारन होई ॥ 
किन्तु मैं कहता हूँ, जो परमेश्वर है वहभी अभी कर्मों में अदृष्ट काही अनुशरण करता है | जगत में  जो कुछ होता है उसका स्वतन्त्र कारण अदृष्ट ही है | 

तोर बरन खंडित भए चापा । कैकेई मति भरम ब्यापा ॥ 
पितहि मरन में बन गवनन में । दनुज कर तहँ तुहरे हरन में ॥ 
धनुष खंडित कर मेरे द्वारा तुम्हारा वरण करने में, कैकेई माता की बुद्धि भ्रमित होने में,पिता के स्वरारोहण में, हमारे वनगमन में, दानवों के द्वारा वहां तुम्हारे हरण में, 

बँधेउब पयधि पार तरन में । सहाय कृत केर सहायन में ॥ 
समर समर औसर जब आईं ॥ कपि भल्लुक सबु होए सहाई ॥ 
सेतु बंधन में, समुद्र के पार उतरने में, मित्रों द्वारा सहायता प्रदान करने में, युद्ध-युद्ध में जब भी अवसर आया तब तब भालुओं और कपियों की सहयोग किया | 

बधत दनु तुम्हरे मिलन में । अरु बहुरि मम पन अपूरन में ॥ 
निज बांधव सहुँ होइ सँजोगा । राज जोग करि प्रिया बियोगा ॥ 
रावण का वध और तुम्हारी प्राप्ति में, तदनन्तर मेरे प्रण की पूर्ति में, पुन : अपने बंधुओं  से संयोग होने में, राजयोग के कारण तुम्हारे वियोग में,

निगदित कारज कर एकहि कारन अदरस होइ  । 
पुनि सो होत मुदित जुगित करिअब हमहि सँजोइ ॥ 
उक्त कार्यों का एक मात्र ही अदृश्य कारण है अब वही अदृश्य पुन: हमारा संयोग करने हेतु प्रमुदित हो  रहा  है | 


सोमवार , १९ सितम्बर, २०१६                                                                                   


जिन्ह सुधिजन के बिसद बिचारा । अदर्स करिहि सोइ अनुहारा ॥ 
भुगत भोग सो तासु नसावा । तुहरी  भुगुति बन अपूरावा ॥ 
जिन्ह विद्वानों के उत्तम विचार होते हैं वह भी अदृष्ट का ही अनुशरण करते हैं | उस अदृश्य का भुक्तने से ही क्षय होता है, वन में रह कर तुमने अपना भुक्तान पूर्ण कर लिया || 

 तुहरे प्रति मम सद अस्नेहा । बढ़तै गयउ नित निसंदेहा ॥ 
सोए नेह निंदक परहेला । अजहुँ तोहि सादर  दए हेले ॥ 
सीते ! तुम्हारे प्रति मेरा अकृत्रिम स्नेह है निसंदेह वह निरंतर बढ़ता ही गया है | आज वही स्नेह निंदकों की उपेक्षा करके तुम्हें आदर सहित बुला रहा है | 

सनेह सरित दोषु कर संका । लहत मलिनपन गहत कलंका  ॥ 
दोषु धुरावत मिटिहि बिषादा । दए तबहि नेह रस असवादा ॥ 
स्नेह की  सरिता दोष की आशंका मात्र से मलिनता को प्राप्त  होकर कलंक से लिप्त हो जाती है | दोषों के परिष्करण से जब विषादों का  निवारण हो जाता है  स्नेह रस तभी माधुर्यता प्रदानकर्ता है | 

दोषु धरिअब करिअ संदेहू । होत बिमल ते अबिमल नेहू ॥ 
देय बिपिन में तोहि त्यागा ।  भयउ बिसद अस मम अनुरागा ॥ 
कल्याणी ! दोषारोपण द्वारा संदेह करने पर निर्मल स्नेह भी मलिन हो जाता है |  मैने तुम्हारा त्याग किया और वनवास देकर  तुम्हारे प्रति मैने अपने अनुराग को शुद्ध ही किया है | 

तजि अहो तुम्ह मोर तईं, करिहु न हृदय बिचार  । 
निंदक राखन किया मैं सुबुध चरन अनुहार ॥ 
तुम मेरे द्वारा त्याग दी गई हो, ह्रदय में ऐसा विचार न करना | शिष्ट पुरुषों के मार्ग का अनुशरण करते हुवे मैने तो निंदकों की भी रक्षा ही की है | 
रविवार, २९ जनवरी, २०१७                                                                        
                                                                           
दोषु धरिअब करएँ निंदाई । तासु सब बिधि हमरि सुचिताई ॥ 
साधु चरित कर कहहिँ बुराइँहि । सो हतमति आपहि बिनसाइँहि ॥ 
देवि ! हम दोनों की जो निंदा की गई है इससे प्रत्येक अवस्था में हमारी शुद्धि होगी | जो मूर्ख शिष्ट पुरुषों के चरित्र को लेकर निंदा करते हैं वह स्वयंको ही नष्ट हो जाते हैं | 

पूरन ससि निभ निसि उजयारी । उजबरित तस कीरति हमारी ॥ 
कृत करतब किरनन जस कासिहिं । दुहु कुल दिनकर सरिस प्रकासिहिं ॥ 
जिस प्रकार पूर्ण उज्ज्वलित चन्द्रमा रात्रि को प्रकाशयुक्त कर देता है उसी प्रकार हमारी  कीर्ति भी उज्जवल चन्द्रमा है हमारे कृत कर्म उसकी किरणों के सदृश्य हैं  हम दोनों के कुल सूर्य के समान प्रदीप्तवान हैं | 

हमरे बिरद करहि गुन गाना । होहि बिसद मनि मुकुत समाना ॥ 
सुनहु सिया भव सिंधु अपारग । जाहि हमरी भगति सो पारग ॥ 
जो हमारी इस उज्जवल कीर्ति का गुणगान करेंगे वह नर नारी मणि व् मुक्ता के सदृश्य सदैव उज्जवल रहेंगे | हे सीते सुनो ! यह भव सिंधु से पार उतरना कठिन है किन्तु हमारी भक्ति से वह सहज ही पार हो जाएगा | 

तोर गुन ते मुदित रघुनाथा । येहु सँदेसु दियो मम हाथा ॥ 
दरसन पदुम चरन निज नाथा । करिहु बिचार न चलिहउ साथा ॥ 
तदनन्तर लक्ष्मण ने कहा : - 'माते ! इस प्रकार आपके गुणों से प्रसन्न होकर रघुनाथ जी ने यह मेरे द्वारा यह सँदेश दिया है | एतएव अब आप अपने पतिदेव के चरण- दर्शन हेतु  अन्यथा विचार न कर मेरे साथ चलिए | 

धरत माथ पद पदुम परागा । करतब बहुरि भूरि निज भागा ॥ 
मातु सदय अब हरिदै कीजौ । मोहि  लेइ गत आयसु दीजौ ॥ 
उनके पदुम चरणों की धूलि रूपी परागों को शिरोधार्य कर स्वयं को कृतार्थ करने के लिए हे माते ! अपने हृदय को उनके प्रति सदय बनाइये मुझे आपको लिए जाने की आज्ञा दीजिए 

जगज जननी लए आपनि संगत दोउ कुमार । 
चलिहु बेगि प्रान पति पहि करौ न सोचु बिचार ॥ 

हे जगज्जननी ! अब अन्यथा विचार न करते हुवे दोनों कुमारों को अपने साथ लीजिए और शीघ्रता पूर्वक  प्राण पति के पास चलिए | 

मंगलवार, ३१ जनवरी,२०१७                                                                      
भई सिथिर सुनु हे महरानी ।पथ निहारति रामु रजधानी ॥ 
चढ़ि गज बैठ अधरिया ऊपर । आगिल चलिअहि दुहु जुगल कुँअर ॥ 
हे महारानी सुनिये ! आपकी प्रतीक्षा करते भगवान श्रीरामकी राजधानी अयोध्या भी थकित हो गई है | दोनों युगल कुमार हस्ती की पृष्ठिका पर आसीन होकर आगे आगे चलेंगे | 

चढ़िअ सिबिका कटकु सँग लागे । छाँह करिहि घन बन मग माँगे॥ 
रहिहु मध्य तुम बाहन आछे । चलिहौं मैं तव पाछहि पाछे ॥ 
आप सेना के साथ संलग्न  सघन विपिन के दुर्गम मार्ग में  इच्छानुसार छाया प्रदान करने वाली इस सुन्दर शिविका पर विराजित होकर उत्तम वाहनों के मध्य में रहिएगा और मैं आपके पीछे पीछे चलूँगा | 

एहि बिधि अवधहि नगरि पधारउ । धरि पद रजस रजस उद्घारउ ॥ 
निज पिय ते मिलिहउ तहँ जाईं  । मख अस्थरि दिसि दिसि ते आईं ॥ 
इस प्रकार अयोध्या की पावन पुरी में पधारे और अपने चरणों से वहां की धूलिका के कण कण का  उद्धरण करें |  वहां चलकर जब आप अपने प्रियतम श्रीराम से मिलाप करेंगी तब यज्ञ स्थली में दूर -दूर से आईं हुई :- 

राज रागि संगत ऋषि नारी । हरषिहि बिरहन तापु बिसारी ॥ 
प्रनमत कौसल्या महतारी । छाइ तासु उर आनंद भारी ॥ 
राज-महिलाओं सहित सभी ऋषि-पत्नियां वियोग के संताप को विस्मृत कर हर्षित हो जाएंगी, जब आप माता कौसल्या को प्रणाम करेंगी तब उनका हृदय भी आनंद से पूरित हो जाएगा |

बाजनि बृंद बहु बिधि कर बाजिहि बिबिध बिधान । 
मधुर धुनि सौं सरस राग गाइहि मंगल गान ॥ 
राज-महिलाओं सहित सभी ऋषि-पत्नियां वियोग के संताप को विस्मृत कर हर्षित हो जाएंगी, जब आप माता कौसल्या को प्रणाम करेंगी तब उनका हृदय भी आनंद से पूरित हो जाएगा |

बुधवार, १ फरवरी, २०१७                                                                   


हरि निवास श्री वासिहि जैसे । धूमधाम अरु होहि न कैसे ॥ 
तव सुभागम हेतु कल्याना । जाइ मनाइहि परब महाना ॥ 
हरि निवास में तो जैसे श्री का वास हो रहा है फिर वहाँ राग-रंजन क्यों न हो आपका शुभागमन कल्याण के हेतु है अतएव अयोध्या में समारोह पूर्वक आनदोत्सव मनाया जाएगा | 

कहत सेष सुनि येह सँदेसा । कहइँ सिया एहि बचन बिषेसा ॥ 
अहहि जग पहि पदारथ चारा । अह रे मैं रिति सबहि प्रकारा ॥ 
शेष जीकहते हैं : - हे मुनिवर ! यह सन्देश सुनकर माता सीता ने यह वहां विशेष कहे कि यह संसार चार पदार्थों से युक्त है धर्म,अर्थ काम व् मोक्ष आह ! मैं सभी प्रकार से शुन्य हूँ | 

दरिद दासि यह कहँ महराजा । समरिहिं मम तैं कहु को काजा ॥ 
पानि गहे जब मोहि बिहावा । जोइ मनोहरता तन छावा ॥ 
कहाँ यह दरिद्र दासी और कहाँ महाराज कहो तो भला मेरे द्वारा उनका कौन सा कार्य सिद्ध होगा ? पाणि ग्रहण कर जब उन्होंने मुझसे विवाह किया था तब उनके श्रीविग्रह जो मनोहरता ग्रहण किए हुवे था | 

बसिहि रूपु सो हरिदै मोरे । ता सहुँ सब दिन रहि कर जोरे ॥ 
यह छबि उर कबहु न बिलगाई । तासु तेज सों दुइ सुत जाई ॥ 
उनका वह स्वरूप मेरे हृदय भवन में बसा हुवा हैं जिसके सम्मुख में नित्य हाथ जोड़े रही  यह  छवि मेरे हृदय से कभी वियुक्त नहीं हुई उनके तेज से मैने इन युगल पुत्रों को जन्म दिया | 

अहहि कुँअर एहि बंस अँकोरे । हीर रुचिर बरु बीर न थोरे ॥ 
लहि बिसेख जुगता दुहु भाई । धनु बिद्या मह गह निपुनाई ॥ 
ये राजकुमार उनके वंश बीज के ही अंकुर हैं ये सुन्दर दो हीरे अत्यंत वीर हैं || निपुणता ग्रहणकर धनुर्विद्या में  इन्होने विशेष योग्यता प्राप्त की है |  

सघन बन बहु जतन तेउ पालि पौषि हौं ताहि । 
जाहु संग लए दुहु कुँअर पितु पहि काहे नाहि ॥ 
इस सघन विपिन में मैने इनका पालन-पोषण बड़े यत्न से किया है इनके पिता के पास तुम इन्हें ही क्यों नहीं ले जाते ?  

बुधवार, १५ फरवरी, २०१७                                                                         


तप तैं निज इच्छा अनुहर के । अधर नाउ धर एकु रघुबर के ॥ 
मैं बिरहन अब एहि बन रहिहौं । कीरत कृत नित हरि गुन कहिहौं ॥ 
मैं विरहन तपस्या के द्वारा निज इच्छा के अनुसार अधरों पर रघुनाथ जी के नाम को धारण कर अब इसी वन में रहूंगी और उन हरि की कीर्ति का कीर्तन करते उनका गुणगान करूंगी | 

जाइ तहाँ तुम पूजित जन के । अरु अवध कर आनंद घन के ॥ 
परस चरन कह मोर प्रनामा । कहिहु कुसल सब लए मम नामा ॥ 
महाभाग ! तुम  वहां जाकर पूज्यनीय जनों सहित  अयोध्या के आनंदघन  श्री रामचन्द्र के चरणों को स्पर्श कर मेरा प्रणाम कहना और मेरा नाम लेकर मेरी कुशलता कहना | 

होत बिनैबत बोलि सपेमा । पूछिहउ पुनि सबहि के छेमा ॥ 
बहोरि भरि अनुराग बिसेसा  । दुहु बालकन्हि देइ अदेसा ॥ 
विनम्र होकर स्नेहिल वाणी से उन सभी की कुशल क्षेम पूछना | तदनन्तर माता ने विशेष अनुराग से भरकर  दोनों बालकों को आदेश दिया | 

रे बच्छर तुअ पितु पहि जाहू । दए आदर अतिसय सब काहू ॥ 
मातु बंधु गुरु कह पितु देबा । गहिब चरन करिहौ बहु सेबा ॥ 
अहो वत्स ! अब तुम अपने पिता के पास जाओ वहां सभी को  अत्यंत  आदर करते हुवे पिता को ही माता, बंधू, गुरु और देवता कहते उनके चरणों को पकडे उनकी  सेवा शुश्रूता में संलग्न रहना | 

मातु चरन होएब बिलग दोउ कुँअर चहँ नाहि । 
एहि इच्छा बिनु कहब किछु राख रहे मन माहि ॥
कुमार कुश और लव नहीं चाहते थे कि हम  माता के चरणों से विलग हों | इस इच्छा को व्यक्त न कर उसे मन में ही रखा | 

जनि अग्या सिरुधार के  गहे एकहि एक हाथ । 
सिथिर चरन उपरि मन पुनि चलेउ लखमन साथ ॥ 
तदोपरांत जननी की आज्ञा शिरोधार्य कर एक दूसरे का हाथ पकड़े इच्छा न होते हुवे भी वे शिथिल चरणों से लक्ष्मण के साथ चल पड़े |

बृहस्पतिवार १६ फरवरी, २०१७                                                                        


पहुंच तहाँ दुहु सियसुत नीके । गयउ नकट बाल्मीकि जी के ॥ 
गहिब गुरुपद रहिब जुगगाथा । गयउ लखमनहु तहँ तिन साथा ॥ 
वहां पहुंच कर सीता के दोनों सुन्दर बालक वाल्मीकि जी के निकट गए | करबद्ध होकर अपने गुरु की चरण वंदना की, लक्ष्मण भी उनके साथ गए | 

सुमिरत अकथ अनामय नामा । प्रथमहि महर्षि करिअ प्रनामा ॥ 
बहोरि महर्षि लषन प्रसंगा । चलेउ दोउ कुँअर करि संगा ॥ 
हरि के  अनिर्वचनीय नाम का स्मरण करते हुवे सर्वप्रथम महर्षि को प्रणाम किया | तब महर्षि और दोनों कुमारों एक साथ मिलकर लक्ष्मण के संग चल पड़े | 

जान सभा भित कृपा निधाना । मानेउ मन न केहि बिधाना ॥ 
जागिहि दरसन कर अभिलासा । गयउ अतुरइ सबहि प्रभु पासा ॥ 
जब कृपा निधान भगवान को सभा में स्थित जाना, तब  मन किसी भांति नहीं माना वह सभी अधीरतापूर्वक भरी सभा में प्रवेश करते हुवे प्रभु के निकट गए 

बोलिहि बन जो बिरहनि माता । करि प्रनाम कहि सो सब बाता ॥ 
धूपित पंथ मिलहि जब छाहीं |  सोक सँग तब हर्ष निपजाहीं ||  
जब जब लखमन सिय सुधि करहीं ।  तब तब बारि बिलोचन भरहीं ॥ 
हरिदै थल जल भए दुइ भावा ।  भयउ  मगन अरु तीर न पावा ॥ 
उन्हें प्रणाम करके वन में विरहिणी माता ने जो कुछ कहा था वह सब निवेदन कर दिया | सूर्य से आतप्त पंथ में जब प्रभु की छात्र-छाया प्राप्त हुई, तब शोक के संग हर्ष उत्पन्न हो गया लक्ष्मण जब जब सीता का चिंतन करते तब तब उनके नेत्रों में जल भर आता इस प्रकार जल व थल रूपी इन दोनों भावों में निमग्न ह्रदय को तट की प्राप्ति नहीं हुई |

कहत प्रभु रे सुनहु सखे बहुरि तहाँ तुम जाइ । 
महा जतन करि कै सियहि, आनिहु लए अतुराइ ॥ 
यह वृत्तांत श्रवण कर श्रीरामचंद्र जी ने कहा : - 'सखे ! तुम पुनश्च वहां जाओ और महान प्रयत्न करते हुवे सीते को यथाशीघ्र यहाँ ले आओ |''

शुक्रवार, १७ फरवरी, २०१७                                                                                    

लगि पद सबिनय दुहु कर जोरे । कहहु सिय ते ए बत कहि मोरे ॥ 
साँझ लखिहु न लखिहु तुम भोरा । करहु सघन बन तप घन घोरा ॥ 
चरणों में नतमस्तक होते हुवे हाथ जोड़कर सीता से विनयपूर्वक मेरी ये बातें कहना : - 'तुमने न भोर देखा न संध्या देखी और इस बेहड़ वन में घनघोर तप करने में लीन रहकर  

देखिअ सुनिअ न जग बिन होइ । मम तै अबरु तकिहु गति कोई ॥ 
तुहरे हिय कछु प्रिय नहि जाना । सदा कहिहु पिय प्रान समाना ॥ 
मुझसे भिन्न उस गति का लक्ष्य कर रही हो जो कहीं देखि न सुनी गई हो जो संसार में हुई न हो ? तुम्हारे ह्रदय ने तो मुझे ही प्रिय समझा है तुमने सदैव मुझे प्राण पति कहा है | 

जिअ बिनु देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरुख बिनु नारी ॥ 
तनु धनु धाम धरनि पुर राजू । पत बिहीन सबु सोक समाजू ॥ 
जैसे बिना जीव के  देह और बिना नीर के  नदी  है, वैसे ही हे नाथ ! बिना पुरुष के नारी है | देह, धन, धाम, पृथ्वी,नगर और पति के बिना स्त्री के लिए यह सब शोक के समाज हैं |   

नाथ सबहि सुख साथ तिहारे । सरद बिमल बिधु बदनु निहारे ॥ 
पिय बिनु सुखद कतहु किछु नाही । रहसि चहत अजहूँ बन माही ॥
हे नाथ !आपके साथ रहकर आपका निर्मल चन्द्रमा के समान मुख देखकर मुझे  संसार के सभी सुख प्राप्त होंगे | पति के बिना कहीं सुख नहीं होता यह तुमने ही कहा था तुम ही अब वन में रहना चाहती हो | 

आपनि कहि बिसराए के पिया संग परिहारि । 
घन हठ हृदयँ बिचार करि सुनिहु न मोरि गुहारि ॥ 
अपने कथन की अवहेलना करके पति का साथ त्याग रही हो | हठ योग का आश्रय लेकर ह्रदय में मेरे त्याग का विचार करते तुम मेरी पुकार नहीं सुन रही हो | 

शनिवार, १८ फरवरी, २०१७                                                                              

जेहि बन अस्थरि रिषि मुनि मन भाइँ । निज इच्छा ते तहाँ तुम आइँ ॥ 
दरसत मुनि पूजिहु रिषि नारी । पूर भई अभिलाष तिहारी ॥ 
जो वनस्थली मुनियों के मन को प्रिय है वहां तुम स्वेच्छा से गई हो | जहाँ तुमने ऋषियों का दर्शन कर ऋषि पत्नियों का पूजन किया | तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण हुई |  

अजहुँ नयन तव पंथ निहारिहि । निसदिन हिय सिय सियहि पुकारिहि ॥ 
आजु प्रीत यहु पूछ बुझाईं । तोहि काहे न देइ सुनाई ॥ 
अब मेरे नेत्र तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं मेरा हृदय नित्य सीता सीता की ही पुकार करता है आज मेरी प्रीति तुमसे प्रश्न कर रही है, मेरे ह्रदय की यह पुकार तुम्हें क्यों नहीं सुनाई देती | 

पतिब्रतासति कतहुँ कि न होईं । गहि एकु पति गति अबरु न कोई ॥ 
होए सो जड़ चहे गुनहीना । धन बिहीन बिनु श्रम अतिदीना ॥ 
पतिव्रता सती कहीं भी क्यों न हो पति के अतिरिक्त उसकी अन्य कोई गति नहीं है  जो मूर्ख अथवा गुणहीन हो चाहे धन व् उद्यम से विहीन होकर अत्यंत दीन हो | 

ऐसेहु पति गुन सिंधु समाना । पावहि नतरु नारि दुःख नाना ॥ 
होइबी जो पति मन अनुकूला । सुनहु सिया सो सुखकर मूला ॥ 
ऐसा पति गुणहीन होने पर भी गुणों का सागर है अन्यथा पति से विहीन पत्नी नाना दुखों को प्राप्त होती है |  यदि पति मनके अनुकूल हुवा, वह सुख का मूल है तब उसकी मान्यता के विषय में कहना ही क्या | 

रहे हृदयँ गोसाइँया गहियबआदरु मान । 
सोइ जगदातम श्रीपति सह सिउ सती समान ॥ 
वह पत्नी के ह्रदय का अधिष्ठाता बनकर अतिसय आदर व् सम्मान को प्राप्त करता है | वही जगदात्म लक्ष्मी के नारायण व शिवा के शिव समान होता हैं | 


सोमवार, २० फरवरी, २०१७                                                                              

करहि कुलीन तिय कारज जेतु । होत सो सब पति तोषन हेतु ॥ 
पुर्बल परम पेम ते पोषा । रहा तुम्ह पर मैं परितोषा ॥ 
उत्तम कुल की स्त्रियां जितने भी मांगलिक कार्य कराती हैं वह सब पति के परितोषण हेतु ही होते हैं |  परम प्रेम से पोषित होने के कारण मैं पहले से ही तुमसे संतुष्ट रहा हूँ | 

पाइब बिरह प्रीति अरु गाढ़हि । एहि समय परितोषु अरु बाढ़हि ॥ 
जप तप तीरथ ब्रत कि त्यागा । दान दया यहु धर्म बिभागा ॥ 
विरह को प्राप्त होकर यह प्रीति और गहरी हो गई इस समय मेरा यह संतोष भी बढ़ गया है | जप, तप, तीर्थ, व्रत, त्याग दान व् दया यह धर्म के विभाग हैं | 

करहिं जबहिं प्रसन्नचित मोही । सोई साधन सुफल तब होंही ॥ 
पद बंदन मम तोषन तेऊ । होइब पारितोषित सब देऊ ॥ 
मेरे अर्थात ईश्वर के प्रसन्न होने पर ही ये साधन सफल होते हैं | मेरे संतुष्ट होने पर सम्पूर्ण देवता भी संतुष्ट हो जाते हैं | 

मम कहि नाहिन तनिक सँदेहू । अबरु बचन इब मृषा न ऐहू ॥ 
देखिअ द्रबित रूपु नरहरी के । कहेउ लषन धीरजु धरी के ॥ 
मेरे कथन पर किंचित मात्र भी संदेह नहीं है अन्य वचनों के सामान यह भी  मृषा नहीं सत्य है | नरहरि का द्रवित रूप देखकर लक्ष्मण ने धैर्य धारण करते हुवे कहा : -- 

सिया अनाई हेतु कहिहु जोइ जोइ रघुराइ । 
कहिहउँ सबिनय बना अति भल सोइ सोइ तहँ जाइ ॥  
माता सीता को लिवा लाने के उद्देश्य से आपने जो जो बातें कहीं वह सब  बातें मैं वहां जाकर और भली प्रकार से उन्हें विनयपूर्वक निवेदन करूँगा |