Monday, 21 May 2018

----- ॥ दोहा-पद 4॥ -----,

लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि भए पानी पानी..,


ओ रे पिया ए रतन अमोलक, हाय ए मोल न जानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,

निसदिन करि ए कहि बतिया, गह गह गयउ बखानी
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी


कासे कहें कहँ जा सुनावैं, ए हमरी राम कहानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,

हम सहुँ कहुँ परोसहु बैरि जनिहि न राम कि बानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,

अजहुँ त परबत परतस लागे, हिय करि पीर पिरानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी.....







----- ॥ दोहा-पद 3॥ -----,

जगत-जगत बिरतै रे रतिया 
अम्बरु अंत लग जग जागे, जागत जरत जोति बरतिया | 
दिसै कमन बहु कुटिल करमचँद, कहत जगत कहि सुनी बतिया ||

करमन कर लेखा पढ़त फिरै, पढ़ी सकै चिठिया न पतिया | 
बैनन्हि के बिँग बैनाउरि कसि कसि छाँड़ बिँधे उत्खतिया   ||  

जो ये बस्ती भई बैरागि तो जा पड़े को परबतिया | 
बिरुझत बिदूखत बैरु करेउ भूतेसु के रे बरतिया || 

भक्तिकाल 

सँवरे सँवरे मोरे सँवरिए चितइ नहि देउ मूरतिया | 

बिरज उजारी दए झिरकारी  भयउब भूरि दुरगतिया || 

जोति बरतिया = ज्योति वर्तिका 
कुटिल करमचँद = कुटिल कर्मों से युक्त 
बिंग = व्यंग 
बैनाउरि = बाणावली 
बिदूखत = दोषारोपण करना 

बिरज उजारी = ब्रज को उजाड़ने वाली, वर्जना और जलाने वाली
झिरकारी=फटकार 

Sunday, 20 May 2018

----- ॥ दोहा-पद 2॥ -----

जगत-जगत बिरती रे रतिया,  
बिरतै रतिया रे जगज उठे,
बिरताइ रतिया रे जगज उठे, 

अरुन उदयो अँजोरा सुधयो तज सैय्या सूरज उठे |                     हाँ तज सैय्या सूरज उठे ..
बिराज पुनि रथ उतरे छितिज पथ, परस चरन सिरु रज उठे ||    हाँss परस चरन सिरु रज उठे.. 
सरस सरोजर जोरे पानि सिस नाई पद पंकज उठे |                   सिस नाई पद पंकज उठे.. 
देय ताल मृदुल मंदिरु मंदिरु ढोल मजीरु मुरज उठे ||                  ढोल मजीरु मूरज उठे ..

सुर मालि पुर मधुर मनोहर संख नूपुर सहुँ बज उठे |                  हाँ संख नूपुर सहुँ बज उठे ..
सहस किरन बिनिन्दत गरुअत कलसी सिखर कर ध्वज उठे ||   कलसी सिखर कर ध्वज उठे ..
करत आरती सकल भारती भरि भेस भूषन सज उठे |                भरि भेस भूषन सज उठे.. 
बसहि बासि जिमि चहुँ कोत बासत कोटि कोटि मलयज उठे ||    हाँ कोटि कोटि मलयज उठे..  

अगज-जगज जगत भए सब जीव जगत के जाग |  
हरिअरी हरिदय निकेत जाग उठे अनुराग || 

अरुन उदयो = भोर हुई 
अँजोरा = उजाला
रज = कण, पराग कण 
पाणि = हाथ 
मजीरु मुरज = मंजीर मृदंग,
मलयज = चन्दन 
हरिअरी = धीरे धीरे 

Saturday, 19 May 2018

----- || राग बैरागी भैरवी || -----

----- || राग बैरागी भैरवी || -----

जगलग ज्योत जगाओ रे, 
चहुँपुर निबिर अंधियार भयो अब रैनी चरन बहुराओ.., 

पंथ कुपंथ मोहि न बूझे, चलेउ कहाँ अजहुँ न सूझे, 
रबि सारथी नियराओ.., 

धरिअ करतल प्रभा प्रसंगा उतरो हे देव रथ संगा.., 
दिसि-बिदिसि अरुनाओ..... 


दिसि -बिदिसि = दिशा व्  दिशाओं के कोण 

Friday, 18 May 2018

----- ॥ दोहा-द्वादश 3 ॥ -----

समय संगत चलिहौ रे समय जगत का बाहि | 
समउ रहत सब साध है समय बिरत कछु नाहि || १ || 
भावार्थ : - समय जगत का वाहन है एतएव समय के साथ ही चलना चाहिए | समय रहते ही सभी कार्य सिद्ध होते हैं समय व्यतीत होने पर पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रहता |                                                                      

काल गगन तरि दरसिया मेघाबरि कर झुंड | 
गिरि बूँद सो होम भई  तपन देव के कुंड || २ || 
भावार्थ : - बीते कल गगन तल पर घोर घटाओं का झुण्ड लक्षित हुवा,बुँदे भी गिरि, किन्तु वह सूर्य देव के यज्ञ कुंड में स्वाह हो गई, ठंडक थी सो जाती रही और वातावरण में ताप यथावत है | 

जाने कहाँ कदम चले छूटी सच्ची राह | 
रिश्ते नाते तोड़ती धन- दौलत की चाह || ३ || 

समंदर और किश्तियाँ साहिल और तूफ़ाँ  | 
मौजाँ मौजाँ माहिला बादे कश बादबाँ || ४ || 
बादे कश = हवा से खैंचा हुवा 
बादबाँ = पोत का पाल 
माहिला = मल्लाह 

मेह बसावै नीलनभ नेह बसावै नैन | 
देह बसावै आतमा गेह बसावै बैन  || ५ || 
भावार्थ : - मेघों को नीला आकाश बसाता है | आकाश से रहित मेघ छीन-भिन्न रहते है, नयन स्नेह को बसाते हैं नयन से वियुक्त नेह अदृश्य रहता है | आत्मा को देह बसाती है अन्यथा वह भटकती रहती है वाणी घर को बसाती है वाणी की कटुता घर को उजाड़ देती है |    

नाम बड़ाई सबहि किए तासु सधै सब काम  | 
नाम के संग होइ सो  पहुंचे अपने धाम || ६ || 
भावार्थ : - नाम पहचान का प्रतीक है संसार में नाम की सभी प्रशंसा करते आए हैं | नाम जाति अथवा धर्म को संसूचित करता है जैसे : -आम नाम है और दशहरी उसकी जाति है | यदि किसी का नाम ज्ञात हो तो फिर उसे उसके धाम या मुक्ति धाम पहुंचाना सरल होता है एतएव नाम भी सोच समझ कर रखना चाहिए | 


जहाँ अर्थ परमार्थ हुँत जहाँ दान कल्यान | 
देवनहार भगत तहाँ लेनहार भगवान || ७ || 
भावार्थ : - जहाँ अर्थ स्वार्थ हेतु न होकर परमार्थ हेतु हो, दान मान हेतु न होकर कल्याण हेतु हो वहां भगवान भिक्षुक व् भक्त दाता हो जाता है |  

लोक ब्यौहार कर हुँत नियताचारहि नीति | 
प्रथानुकूल नेमधर्म कर परिपालन रीति || ८ || 
भावार्थ : - लोक-व्यवहार के हेतु नियत किए गए उत्तम आचार-विचार नीति है तथा इनका दृढ़ता पूर्वक परिपालन ही नैतिकता है और परम्परागत नियम-धर्म का परिपालन ही रीति है | 

रहे जौ ठाट बाट ते कि रहे ठट्टा टाट | 
कबहुँ न होत भली सुख साधन की बाट || ९ || 
भावार्थ : - संपन्न हेतु हो अथवा विपन्न हेतु, सुख सुविधाओं की बन्दर बाँट कभी कल्याणकारी नहीं होती | 

कहँ त यहु जीबात्मना कहँ जग कर परिमान | 
बहुरि सो मति मूरख जौ भरे भूरि अभिमान || १० || 
भावार्थ : - कहाँ यह अतिशय सुक्ष्म मानव शरीर और कहाँ संसार का परिमाण, वह बुद्धि फिर मूर्ख बुद्धि है जो अहंभाव से परिपूर्ण है | 


कहँ मानस कर खेलना कहँ अगास को अंत | 
एक सस परस समुझत सो आपनु आप महंत || ११ || 
भावार्थ : - कहाँ तो आकाश का अंत, और ज्ञान -विज्ञान के प्रसंग कहाँ मनुष्य की यह उछल-कूद | एकमात्र चन्द्रमा को स्पर्श करके ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार्य कर वह स्वयं को ही स्वयंभू समझने लगा  | 

बछुवन भूखन देख के गौ मा करे पुकार | 
मानस मोरे अमृत के करो ना तिरस्कार || १२ || 
भावार्थ : बछड़ों को भूखा देखकर गौ माता आह्वान करती है मानवों तुम मेरे स्नेहरस का तिरस्कार मत करो 



Wednesday, 16 May 2018

----- || रखताँ + दोहा-पद 1॥ -----


मेरे सरापे को जेहन में जगह दो,
के मुस्कराने की कोई तो वज़ह दो..,

वो मरमरीं चाँद जो शब् को न मयस्सर,
उसे हमराज करो और दामन में गिरह दो..,

ख़म को खोल गेसू-ए-दराज़ को संवार के,
लबे-कनार को सुर्खियाँ नज़रों को सियह दो..,

ज़हीनत के ज़मील-तन पे सीरत के हैं ज़ेवर,
दस्ते-दहल को हिना के रंग की निगह दो..,

हर रब्ते-मंद जाँ ऱगे-जाँ से हो नज़दीक,
रवाज़ी शामो-सहन की वो रस्मी सुबह दो..,

मुबारकें शफ़ाअतें सलामतें हो दम-ब-दम,
हम-क़दम को रुख़सते-रहल की रह दो.....

                   ----- || राग-दरबार || -----

       मङ्गलम् भगवान विष्णु मङ्गलम् गरूड्ध्वज: | 
        मङ्गलम् पुण्डरिकाक्ष्: मङ्गलाय तनोहरि: || 

दीप मनोहर दुआरी लगे चौंकी अधरावत चौंक पुरो |
हे बरति हरदी तैल चढ़े अबु दीप रूप सुकुँअरहु बरो ||
पिय प्रेम हंस के मनमानस रे हंसिनि हंसक चरन धरो |
रे सोहागिनि करहु आरती तुम मौली मस्तक तिलक करो ||


चलिअ दुलहिनि राज मराल गति हे बर माल तुम कंठ उतरो ||
हरिन अहिबेलि मंडपु दै मंगल द्रव्य सोहि कलस भरो ||
जनम जनम दृढ़ साँठि करे हे दम्पति सूत तुम्ह गाँठि परो |
भई हे बर सुभ लगन करि बेला परिनद्ध पानि गहन करो |
अगनि देउ भए तुहरे साखी लेइ सौंह सातौं बचन भरो ||


बर मुँदरी गह दान दियो हे सुभग सैन्दूर माँगु अवतरो |
जीवन संगनि के पानि गहे हे बर सातहुँ फेरे भँवरो ||
हे गनेसाय महाकाय तुम्ह भर्मन पंथ के बिघन हरो  |
बरखा काल के घन माल से हे नभ उपवन के सुमन झरो ||

पट गठ बंधन बाँध कै देइ हाथ में हाथ |
ओरे बोले बाबुला जाउ पिया के साथ ||


शामो-शम्मे-सहर के शबिस्ताने रह गए..,
जिंदगी रुखसत हुईं आशियाने रह गए.....

भावार्थ : - मन को हारने वाले दीप स्वरूप कुअँर द्वार पर पहुँच गए हैं  चौंक पुरा कर उसपर चौकी रखो | हे बाती ! हल्दी व् तैल्य से परिपूरित इस दीप रूपी सुकुमार का वरण करो || १ || रे हंसिनी ! तुम्हारे इन  प्रियतम रूपी प्रेमहंस मन रूपी मानसरोवर में बिछिया से विभूषित चरण रखो  | सुहागिनों ! तुम कुंअर की आरती करते हुवे उसके मौलिमस्तक पर तिलक का शुभ चिन्ह अंकित करो | 
                 दुल्हन राजमराल की गति से चल पड़ी है एतएव हे वरमाल्य तुम वर के कंठ में अवतरित होओ | मार्केट रत्न सी हरी पान की पत्तियों की बेलों से लग्न-मंडप को सुसज्जित कर मंगल  द्रव्य से कलश भरो || हे दम्पति सूत्र ! तुम  इस भाँती ग्रंथि ग्रहण करो कि वर-वधु का बंधन  जन्म-जन्म तक सुदृढ़ रहे | हे वर ! शुभ मुहूर्त का समय हो गया तुम परिणद्ध होकर कन्या का दान ग्रहण करो | अग्निदेव तुम्हारे साक्षी हैं एतएव उनकी शपथ लेकर सात वचन भरो | 
                   वर ने मुद्रिका से सिंदूर अर्पित कर दिया एतएव हे सौभाग्य रूपी सिंदूर तुम अब वधु के केश प्रसारणी में अवतरित हो जाओ | जीवनसंगिनी के हाथ को ग्रहण किए हे वर ! अब तुम सप्त-पदी रीति का निर्वहन करते हुवे अग्नि की सात बार परिक्रमा करो | हे गणेशाय | हे महाकाय ! तुम भ्रमण पंथ के सभी विध्नों का हरण करो | हे नभ के उपवन के सुमन तुम वर्षा ऋतू की मेघमालाओं के जैसे वरवधू पर वर्षो || 

आँचल से ग्रंथि बाँध कर वर के हाथ में वधु का हाथ दे बाबुल बोले : - अब तुम अपने प्राणपति के साथ प्रस्थान करो | 

Wednesday, 2 May 2018

----- ॥ दोहा-द्वादश 2 ॥ -----

जो जग धर जग हेतु कर लेन जोग सो नाम | 
जो जग जीवन जोइया करन जोग सो काम || १ || 
भावार्थ : - जो इस जगत के आधार स्वरूप है, जो जगत की उत्पत्ति के कारण व् कारक है उसी का नाम लेने योग्य हैं | जो इस जगत का तथा इस जगत में जीवन का संरक्षण करते है वह कार्य कृतकार्य कहलाते हैं  एतएव वही कार्य करने योग्य हैं | 



बैनन बैनन एकै जो  ह्रदय माहि समाए | 
एक घाव भरियाए रहे दूज रहे  हरियाए || २ || 
भावार्थ : - बैन यद्यपि शब्द एक है किन्तु इनका अर्थ दो है, 'बैन'बाण को भी कहते हैं और वाणी को भी कहते हैं यदि ये ह्रदय में उतर जाए तो एक बैन के दिया घाव कदाचित भर भी जाता है किन्तु दूजे बैन  का दिया घाव कभी नहीं भरता अर्थात बाण का दिया घाव कदाचित भर जाता है किन्तु वाणी का दिया घाव कभी नहीं भरता |   

यमक अलंकार = इस अलंकार में एक शब्द की वारंवार आवृति होती है किन्तु उसके अर्थ सार्थक व् भिन्न भिन्न होते हैं | 

जैसे : - कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाए | 

             या खावै बौराइ गए वा खावै बौराए || 
भावार्थ : - यहाँ एक कनक का अर्थ सोना या धन सम्पति है और एक कनक का अर्थ धतूरा है | कवी कहते हैं कि : - कनक कनक की मादकता एक से बढ़कर एक है दोनों को खाकर पागल ही होना है ऐसे पागल या तो घर से भाग जाते हैं या देश से, इसलिए किसी का कुछ भी मत खाओ | 

काम सधे जब एकै तैं करो न और उपाए | 
अनभल रजता एक भलो कहा करिब बहुताए || ३ ||  

भावार्थ : जब एक से काम चल रहा हो तब अन्यान्य उपाय नहीं करना चाहिए | शासन करता एक दुष्ट भी बहुंत होता हैं, जब सारी जनता ही दुष्ट,भ्रष्टाचारी व् अनाचारी हो तब उसका शासन तंत्र किस काम का |