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Thursday, 28 April 2022

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 15॥ -----,

"हमारे पापों के यहां बही नहीं होते, 
    हम हर बार सही नहीं होते"
..................................................................................
आजादियाँ सातवेँ आसमान चढ़ी..,
जबहे कारी फलके परवान चढ़ी.., 
जाता रहा दुन्या वाले का भी खौफ़..,
बदनियति एकऔर पॉयदान चढ़ी..... 
....................................................................................
सुन ऐ जुल्मों ज़बह,ये तिरा लब्बोलुआब l 
उम्र कैद बा मशक्कत, हाँ तिरा है हिसाब ll ....
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ताउम्र गुज़र गई जुल्मों ज़फ़ह कारी में,
पैमाना भर जाए तो सजा दीजिए, 
ग़र यही दस्तूर है इस दुनियाँ का 
तो पहले इस दस्तूर को कजा दीजिए....
......................................................................
जंग लड़ते रहे हम तारीके शब् से, 
सजा का वक़्त आया तो सुबहे दम हो गई
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कहीं तबीयत नहीं मिलती,कहीं आदत नहीं मिलती, 
सूरते सियासत से अपनी सूरत नहीं मिलती.....
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सफ़हा-ए-दिल तेरे..,

दरिया की लहरों पे..,

यादों की कश्ती की.,

अजीब दास्ताँ है ये.....

सहरों और शामों के

गिरह बंद दामन से


मिटा लक़ीरें औरों की खुद फ़क़ीर बन गए..,

ऐ दुन्या वो फ़क़ीर आज लक़ीर बन गए.....


ये काँच से भी कच्चे रिश्ते..,

इक ठेस लगी और टूट गए..,

खींचा जो इक दुश्वारी ने..,

हाथ फिर हाथों से छूट गए....


जिसके ज़ीस्त-ए-जहाँ में रहमो-करम के मानी..,

वो इंसा फिर इंसा है जिसकी नज़रों में पानी.....


सरे-बरहन नातवाँ ज़ोर जवाँ है आफ़ताब..,

हाय कोई रगे-अब्र शमशीरे-बर्क़ लिए कहे..,

अच्छा ये बात है बताओ कहाँ है आफ़ताब.....

शोला-ओ-सुर्ख़रू आतश फ़शाँ = ज्वलामुखी के अंगारों सा लाल हुवा

सरे-बरहन = बिना छत्र का सिर

नातवाँ = निर्बल

ज़ोर जवाँ = वीर बलवान

रगे-अब्र = बादलों की धारी (बादलों की सेना )

शमशीरे-बर्क़ = बिजली की तलवार


हुई ये शबे-दम पुर नीम फिर ख़्वाब का पीछा करते करते..,

सोए सितारे थक के फिर महताब का पीछा करते करते…..


सुर्खियां कायम हुई के यारों अब हम नहीं रहे,
आज के अख़बार की मिरी ये आखरी ख़बर थी.....



न सायबाँ न आबोदाँ न कुछ मेरे पास है, मेरे आशियाँ तक ले चले उस रह की तलाश है, याँ मैं हूँ गैर हाल तू चल ए लरजिशे कदम, चल वाँ जहाँ मिरा गरीबो- खानाखास है.....












Wednesday, 22 May 2019

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 14 ॥ -----

1.सहन-सहन सुलगती हुई सुर्ख़ शमा के जलवे..,
तश्ते-फ़लक पे रक़्स करती कहकशाँ के जलवे..,
शब्-ओ-शफ़क़ बखेर के निकलता है जब चाँद..,
देखते ही बनते हैं फिर तो आसमाँ के जलवे.....
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2..कहीं इशाअते-अख़बार हैं कहीं हाकिमों के तख़्ते हैं..,
शाह हम भी हैं अपने घर के क़लम हम भी रख्ते हैं.....
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3..बिक रहा ख़बर में हर अखबार आदमी..,  
ख़रीदे है सरकार, हो खबरदार आदमी..,
मालोमता पास है तो ही है वो असरदार..,
हो ग़रीबो-गुरबां तो है वो बेक़ार आदमी.....  
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4..सुर्खो-स्याह रु का बाज़ार हूँ मैं..,
सूरते-हाल से बेख़बर अख़बार हूँ मैं.... 
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5.. रिन्द-ए-रास्तों की ये अज़ब दास्ताँ है
काफ़िला बर्के-रफ़्ता औ रहबर न कोई
न कोई आबे-दरिया और तिश्ने-लब है
तिरे मरहलों पे आबे-दरिया न कोई

न रहमत न रिक़्क़त न दयानत की रस्में
इल्मो-इलाही से इसके रहले हैं खाली
न ख़िलक़त के ख़ालिक़ की ही इबादत
  ख़ातिरो-ख़िदमत न कोई

रिन्द = स्वच्छंद, निरंकुश, मनमाना आचरण करने वाला
काफ़िला बर्के-रफ़्ता = द्रुत गति से जानेवाला यात्रिसमूह
रहबर = पथप्रदर्शक
तेरे मरहलों के

न मरहला ही कोई गुजरे-गह पे इसकी
न मंजिल है उसका न रहमाँ ही कोई
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6..सफ़हा-ए-दिल तेरे..,
दरिया की लहरों पे..,
यादों की कश्ती की.,
अजीब दास्ताँ है ये.....

सहरों और शामों के
गिरह बंद दामन से
छूटते हुवे लम्हों की
अजीब दास्ताँ है ये.....

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7..कोई ख़्वाहिश नहीं कोई अरमाँ नहीं..,
कभी यूं भी सफ़र हम तो करते रहे..,
और बसर का कोई पास सामाँ नहीं..,
कभी यूं भी बसर हम तो करते रहे.....

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8..ज़श्न औ जलवा जलसा ज़रूरत से ज्यादा..,
जिंदगी क्या है तू इस हक़ीक़त से ज्यादा.., 
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9..मिटा लक़ीरें औरों की खुद फ़क़ीर बन गए.., 
ऐ दुन्या वो फ़क़ीर आज लक़ीर बन गए.....  

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10..जिसके ज़ीस्त-ए-जहाँ में रहमो-करम के मानी..,
वो इंसा फिर इंसा है जिसकी नज़रों में पानी.....
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11..रख्खें ग़र ईमाने-दिल सच कह दें तो गुनाह है
ये कौन सी दुन्या है ये कौन सा जहाँ है.....
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12..खिल के चमन में रंगो-खुशबु लुटाना है,
तू गुल है तुझे सदा मुस्कुराना है
ए शोला-ए-आफताब औ चॉंद सितारों सुनो,
तुम्हे बुलंदे-आस्माँ को सर पे उठाना है 
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13..तवारिख को स्यह तहजीब को बदरंग किए हुए,
मिरी मुल्के-मलिकियत को वो फरहंग किए हुए,
रहती है मिरे घर में मिरी गुलामियत अब तक,
गड़े मुर्दे उसके उसपे हैं मुझे तंग किए हुए...
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14..लावा से न लश्कर से तोप से न तीर से..,
ख़त्म हुई हकूमतें क़लम बंद शमशीर से..... 
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15..अपनी गुलामियत के हुक्म रानो का..,
मैँ दुश्मन अंग्रेजों का मुसलमानो का.....
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16..फक्र न कर अपनी गरीबो-गर्दवारी पर..,
लोग हँसते हैँ तिरी ईमानदारी पर..,

है पास दौलत तो है सल्तनत औ साहबी..,
है आबाद ज़महुरियत भी इसी रायशुमारी पर..,

इंसाफ पे पाबंदियाँ जबहे-जुल्म को आजादियाँ ..,
बजती हैँ तालियाँ य़ाँ रइय्यते-आज़ारी पर..,
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17..ढली शाम वो सुरमई, लगा बदन पे आग l
फिर रौशनी बखेरते, लो जल उठे चराग ll

चली बादे-गुलबहार, मुश्के बारो-माँद l
सहन सहन मुस्कराके निकल रहा वो चाँद ll

Saturday, 18 May 2019

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 13 ॥ -----

दुन्या इक बाज़ारे-शौक़ है..,
ख़्वाहिशें-दराज़ हैं ख़रीदार उसकी..... 
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कहतें हैं जो सब रह दीन-धर्म सब मेरे.., 
उस क़ाफ़िले-क़दम का तमाशा भी देखिए.....
रह= राह,पंथ  
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उन दोनों की फ़ितरत एक जैसी थी..,
ये ऐसा था तो वो वैसी थी..,
पूछते हैं ग़ालिब अब दोनों कैसे हैं..,
बढ़िया ! ये ऐसा है न वो वैसी है.....  
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ऐ हुकूमतों होश करो के फिर क़लम के दीवाने.., 
अहले वतन की दीवानगी दिल में ले चले.....
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निकला फिर शान से  सुबह आफ़ताब.., 
सितारों की फ़ौज का सिपह आफ़ताब.., 
 हरिक स्याहपोश सतह को देके शह .., 
 करता हुवा तिरगी पै फ़तह आफ़ताब..... 

सिपह = सिपाही 
स्याहपोश सफ़हे = धरती के ऊपर की बुराइयाँ 
शह = ललकार 
तारीक़ी = अंधकार 

समंदर से उठते वो घटाओं के साए.., 
निगाहों में क़तरे बन के समाएँ..... 
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शोला-ओ-सुर्ख़रू आतश फ़शाँ है आफ़ताब.., 
सरे-बरहन नातवाँ  ज़ोर जवाँ है आफ़ताब..,
हाय कोई रगे-अब्र शमशीरे-बर्क़ लिए कहे..,
अच्छा ये बात है बताओ कहाँ है आफ़ताब.....     
शोला-ओ-सुर्ख़रू आतश फ़शाँ = ज्वलामुखी के अंगारों सा लाल हुवा 
सरे-बरहन  = बिना छत्र का सिर 
नातवाँ = निर्बल 
ज़ोर जवाँ = वीर बलवान 
रगे-अब्र = बादलों की धारी (बादलों की सेना )
शमशीरे-बर्क़ = बिजली की तलवार 
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फिर झूमते मेरी छत की मुँडेर से निकला चाँद.., 
लोग बोले आज तो बड़ी देर से निकला चाँद..... 

Thursday, 16 May 2019

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 12 ॥ -----,

ऐ शबे-नीम ज़रा ख़्वाबों के कारिंदों से कहो..,
इन निग़ाहों को भी जऱ निग़ारी की जरुरत है.....
शबे-नीम = अर्धरात्रि
कारिंदों = सुनार
जऱ निग़ारी /= सोने का सुनहरा काम



बर्क़-ए-ताब-ओ-ऱगे-अब्र के क्या मानी है..,
ऐ निगाहे-नम तिरी ज़द क्यूँ पानी पानी है..... 
बर्क़-ए-ताब-ओ-ऱगे-अब्र = बिजली की चमक लिए बादलों की काली धारियां
मानी = अर्थ, आशय, मतलब
ज़द = पलक

क्या होता गर हम आसमानी परिंदे होते..,
बिला इल्म के मानिंद-ए-चरिन्दे होते..,
होते हम भी गर मसलहतों से ख़ाली..,
नीम सहाराओं के ज़ब्हे-कश दरिंदे होते.....
इल्म = ज्ञान, धर्म शास्त्र 
मस्लहत = विचार 
नीमसहरा = घनेजंगल 
जबहे-कश = हिंसक 

कभी रूहानी सी कभी सुहानी सी..,
जिंदगी इक मुश्ते-ख़ाके फ़ानी सी.., 
कभी नज़रों से बरसती बूंदों सी.., 
कभी बहते दरिया के पानी सी...... 
मुश्ते-ख़ाके फ़ानी =   क्षण में नष्ट होने वाली एक मुठ्ठी धूल 

शबे-गूँ-ओ-नीम स्याह फ़लक पे पुरनूर.., 
निकला है आज चाँद सुर्ख़े-रंग में डूब के..... 

मंजिल हो जाती है आसाँ जब कोई हम सफ़र हो 
ग़म ख़्वार अगर हो 
तारीके-शबे- स्याह में वो चराग़े-सहर हो 
क़दम-ब-क़दम उस रहे-ख़ुदा की हो रहबरी 
तरबियत से तर हो 
तफ़रक़ा-ए-अंदाज़ ताक़ पे रखा हो इक तरफ 
तफ़ावतें भी कुछ फासले पर हो 





Thursday, 2 May 2019

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 11॥ -----

दिल को सियाहे-बख़्त किए उठते हो सुबहे रोज..,
मासूम- ओ - मज़लूम को फिर करते हो जबहे रोज..,
पीरानेपीर- ओ- मुर्शिद  अरे कहते हो खुद को..,
जफासियारी के दस्तूर को देते हो जगहे रोज़.....
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एक जोर की आंधी चली..,
दो आंसुओं की बून्द गिरी..,
एक बून्द गंगा बनी..,
दूसरी भारत माँ बनी..... 

Thursday, 4 April 2019

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 10॥ -----

लबों को सी लीजिए जबाँ न खोलिए
ये गुलामे-हिन्द है याँ कुछ न बोलिए..,

गैरों की याँ हकूमत औ मुल्के-खुदाई
मालिकान की किस्मत में कासा गदाई..,

ख़ातिर में सज़ा जो इक पल ग़ुरबत को रो लिए ..,

वो शम्म केआज़ादी की थी जिसको आरजू
जिस सल्तनत को फूँकने जली थी कू-ब-कू..,

सजी है वही सल्तनत बुझी उस शम्म को लिए.....
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ज़र्रा ज़र्रा से कहे सुन मेरे हमराज |
इन हौसलों के पँख भी होते गर परवाज़ ||

जहाँ में रौशन होके हम चश्मेबद्दूर |
चाँद तारे बनके हम आसमान का नूर 

Wednesday, 3 April 2019

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 9॥ -----,

मुल्के दुन्या ने इक नया तमाशा देखा
अतलसी लबास तन पे दस्त में कासा देखा..,

  ग़रीबो-गुफ़्तार के दर माँगे ये सल्तनत
मजबूरी पे पड़ता जम्हूरियत का पासा देखा.. ?

शिकम सेर होकर वाँ खाए है इस कदर
जैसे की कभी बतीसा न बताशा देखा..,

लफ्ज़-दर-लफ्ज़ खुलते गए जब वादों के पुलिंदे
गुजरे वक़्त की नाकामियों का खुलासा देखा..,

दिखी उस तन के चेहरे पे फ़तह की जब उम्मीद
हँसती तब हर इक नज़र को रुआँसा देखा..,

लच्छेदार दार बातों में जब लचकी ज़रा कमर
   मुफत में वजीरे आज़म का सनीमा देखा.....

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 8॥ -----,

कहीं और की पैदाइश कहीं और है बसेरा..,
किस बेशर्म जबाँ से कहते ये हिन्द को मेरा..,

मुल्कों को तक़सीम करना इनकी है फ़ितरत..,
जुल्मों जबह कर फिर करते है उसपे हुकूमत..,

इनसे सियह बख्त है मिरे माज़ी का हर सबेरा
किस बेशर्म जबाँ से कहते ये हिन्द को मेरा..,

महरूम हुवे क़लम से अपनी ही जबाँ से हम
बैठे है ये भी भूल के थे आए कहाँ से हम..,

जहाँ की ज़हीन क़ौम को जहालतोँ से यूं घेरा 
किस बेशर्म जबाँ से कहते ये हिन्द को मेरा.....

Saturday, 3 November 2018

----- || मायने || -----

  हर उम्मीदें बर आईं हर खाहिशें हुई पूरी..,
लबे-तर से पुरकशीश वो तिश्नगी जाती रही..... 
.....................
अहले चमन मेरे बागे-वतन मेरी जाँ ओ चश्मेबद्दूर 
आफताब सा पुरताब रहे जहाँ में तेरा नूर 
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चमकते हुवे जुगनू कभी भी सूर नहीं होते.., 
    बुझे दीपकों से अँधेरे दूर नहीं होते..... 

सत्ता साधन हेतु जे करते सबहि कुकर्म | 
कापर पटतर आपुना बदलें नाम रु धर्म || 
भावार्थ : - सत्ता साधने के लिए ये नेता क्या कुकर्म नहीं करते नाम व् धर्म को तो ये कपड़ों के जैसे बदलते हैं | 

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धरम तजे
धर्म बच्छर धरम राज धर्म सेतु कर धारि धजे
हे धनंजय धीर धरौ

धर्म जुद्ध करौ
धर्मखेत कुरु खेत सँजूते | संजै मम अरु पाँडु सपूते ||
रनोन्मत्त कहा कीन्ही | संजै तब एहि उतरु दीन्ही ||

ते औसर दुरजोधन रायो | पाँडु ब्यूहित सैन लखायो ||
द्रोनाचारज पाहि गयेऊ | हे राजन एहि बचन कहेऊ ||

तुम्ह पितामह भीष्म रु करन | तस हीँ अस्वत्थामा बिकरन ||

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बाज उठी रणभेरी
राजस्थान रो देस जब बाज उठी रणभेरी
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एकमात्र ईश्वर पर.....
राग देश
सरगम के सतरंगी धागों से..,  राग सारे सुर में बंधे..,
कल कुणिका

के कंठ गाँठ ..,
सरस्वती के करतल उतरे

kar ke khnkar se
राग सारे सुर में बंधे

दिअरी सहुँ द्वारि सों लागे
नैन सारी रैन जगे

धूम धरि कारे
प्रान ते प्यारे पिय लागे
पी ते प्यारी प्रीत लगे

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नभ सांझ ढरे
डूबे सूरज नभ सिंधु
निकसत चंदा उडुगन
मणि मुक्ता जाल परे
गै दीपक द्वार धरे
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जनिमें गोकुल में नन्द के लाल
माई गोद भरावन चली
भयो  नंद  गोपाल
कोई मांगे मनिया नी कोई मांगे मोतिया

कोई मनियारी मुक्ता के माल

गहैं पद तुम्हरे
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जागो हे

----- || राग- सारंग ||-----
पिय हमहि ए कलि कलह न भावै |
निर्जर नैनि भई निर्झरनी झरझर नीर बहावै ||१ ||
पलक पहारी कहत कपोलक असुँअन ढर ढर आवै ||
तुम्हरे गह घरी घरी आनि हम्ह सोंहि बिरुझावै || २ ||
करिअ कर सब कृत करतब काजु दोषु धरिअ बिसरावै ||
हरिदय पावक बूझ चहे तव पेम पवन जौं पावै || ३ ||
भेदिनि बैरन परम बैर करि हठि घृत देइ दहावै ||
कुटिल कोदंड खैंच खैंचि के बियंग बैन चलावै  || ४ ||
मरमु भेद घन चोटि करिअ बहु बहु खरि खोटि सुनावै ||
जौ मुख आवै सो कहि निस दिन गरज गरज गरियावै || ५ ||
आपुनि गोई अरु कहि हमरी आगत कहत बतावै  ||
लषन सदगुन गनिहै न मोरे गनि गनि औगुन गावै || ६  ||
करुबर कहनाई कहि कहि के अनकहि कहन कहावै ||
पल छन पहर पिहर के आँगन सुमिरत मन बिरमावै || ७ ||


----- || राग-भैरवी || -----
काहे कीज्यो बाबुल मोहे पराई रे
कहहु कहा छन भर कहुँ तोहे मोरी सुरति नाहि आई रे || १ ||
प्रान दान दए मोहि जियायो काहे परदेस पठाई रे |

पोस्यो बहु बरस लगे बिछुरत लागि न बारि |
पिय के गाँव पठाए के  पल महि दियो बिसारि || २ || 

चारि गलीं दुइ चौंहटीं अजहुँ छितिज लगी दूर दुराई रे |
निकट बसत कबहुँ न मिलि आयो अह एहि तोरी निठुराई रे || ३ ||

हम्हरेहि हुँते लहुरी भई का तुहरी गह अँगनाई रे |
बैस पंखि गहि पवन खटोरे उड़िअ गगन अतुराई रे || ४ ||

गह्यो पियबर पानि जूँ सीस दियो सिंदूर | 
गाँव पराया देइ के कियो नैन ते दूर || ५ || 

दहरी द्वार पट पारि करत जइहउ करतल कसि धाई रे ||
बरखत नैन बिन सावन कहियो घन काल घटा गहराई रे || ६ ||

पवन पँखुरि पाइ के री पतिआ पितु के देस |
करतल गहि दए गलबहीँ  एहि दिज्यो संदेस  || ७ ||

पवन पाँख गहि गगन बीथिका मम पितु गेह तुम्ह जाई रे |
लिखिअ ए सनेसा कह्यो दियो  भरि कंठहियो लपटाई रे || ८ ||

कंठ लपटाइ के जिन्ह  रख्यो जी ते लाइ  ||
ओ रे मोरा बाबुला ओहे लिजो बुलाइ || ९ ||











रे नैना काहे जागे सारी रैन
सी लागै सारी रैन
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राग ललित
सकल पुष्करो भए पद्मपुष्कल
तरंग माल करे हंस कलकल


डब डब अँखियन ते लखे, ए री अँखिए जर भर नहीं लखिए 


बाबुल की प्यारी गली..,
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 पिया बतिया मोरि समुझत नाहि रे
 कहु अलि ताते प्यारो को जग आहि  रे
  मोपे सो तो बिगुरे छन माहि रे


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 बैन दुसह पिया हम ना सहेंगे
दरस-परस बिनु पेम पयस बिनु मीन सरिस तलफेंगे || १ ||
पंखी पपीही पटतर पिय पिय पलछिन प्रति ररिहेंगे ||
जानत दारुढ़ दुसह दहन बरु बिरहा अगन दहेंगे ||  २ ||
छाँड़ देस गह गहस तिहारे नैहर गह जा रहेँगे ||
रहेंगे अजहुँ तुम सहुँ दूरी पद पितु पंथ गहेंगे || ३ ||
बासर चैन न रैन सैन नहि नैनन नींद लहेँगे ||
चहेंगे तुम्हरे हरिदय देस तुमकहुँ नाहि चहेंगे || ४ ||
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बाबुल मोरा पीतम रूठो रे हाय
कैसे पिय के संग सिधारैं आन कोऊ समुझाए
सो दिन घनघन रंगे जौ दिन पीतम रंग रँगाए
अलि पिय निलयन चरन पधारें कहि द्यो कवन उपाए
दिनु रैन नैन घटा बिन सावन घन बरखाए
घनहु गै हारे

पीतम दिए तुम्हने नैनन में जलधारे
जिन सहुँ बरख बरख घन हारे
काजर घोरे सांझ अरु भोरे




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झन झन करत झांझरी बाजे.....
सुर बिराजे

मोहि लेव नहि जाए
अब जा कोउ मनाए
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 तुम्ह सों हितु पिय दुसरो को है

हम्हरे भाग बिरचो है
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जग में सब ते न्यारा म्हारा देस
जन जन का प्यारा म्हारा देस
ग्यान दीप का
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राग-पहाड़ी
चलिहि रे चलिहि रे चली रे भर के
नैय्या तू धीरहि धीर
गंगा के भर के  अँचरा में असुंवन के हीर
चलो रे चलो रे हलकी हलकी पुरवाई
 प्रभो गंगा के तीर

गह तब लगि नाहि बिहाए |
जब लगि ताहि राख रखे मानस माहि समाए || १ || 
भावार्थ : दरिद्रता  जब तक मनोस्तिष्क में समाहित रहती है तब तक दूर नहीं होती 
मनमानस जब लग नाहि बिहाइ समाए जब लगि रहे समाए

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----- || राजस्थानी-धुन || -----

कर्यो तिलक लिलारा केसर्यो..,

चौक पुराया आँगणियो प्यारो पावणा पधर्यो ..,
मेल्यो जोड़ो रो लस्करिआ पिचरंगी पागड़ो पहर्यो..,

पगां लखीना मोचड़ा जी हाथ हीराजड़ मूंदड़ा
सो व सोरठड़ी कटियार करधन उप्पर फेंटा फिर्यो

सोवनी ऊछली घोड़ी बरणी सै जी राजकुमारी
कान्हो बजावै बंसरी नगरी तावड़िया पग धर्यो

ओजी रंगाद्यो बाला चुनड़ी घढ़ द्यो बैंयारो चुडलो..,
न्यारो नौलड़ी रा हार जी ढोला बांकड़ा मनहर्यो..,

मांग्यो मेलियो सोहाग बर परमेश्वर धण भाग रो
जीवणजोति हरि को रूप महान्यो ब्यावण चढ़्यो 

हाल्दि उबटणों अन्हायो रांच्यो मेहन्दड़ि हथेलवो..,
घाल्यो कोयाँ रो काजलों जी ढोला सांवड़ा सँवर्यो..,

म्हारो बिंदणों म्हारो कानड़ो सो तो म्हारो राज..,
पल्लो जिरंजीव को डुपटो घुल घुल गाँठा पड़्यो.....

----- || राग-दरबार || -----
लो फिर हर शै हुई ज़ाहिरॉ.., 
ए चाँद तेरे नूर से..,
अपनी शम्मे-रु को अब..,
मैं किस तरह अर्जे-हाल करूँ..,

शाम ज़रा स्याहे-गूँ तो हो..,
लम्हे भर को तू हिज़ाब कर..,
सिल्के-गौहरे-गुल के दस्त..,
 मैँ ख्वाबे-शब विसाल करूँ.....

तिरी बंद गिरहों से छूट के
चार शूँ रौनके हैं बिखर रही 
तू कम जमीले-सवाब कर
मैँ ज़ौक़-नज्जारह-ज़माल करूँ

ख़ामा-ए-ख़्याल करूँ
----------------------------------------
तिश्नगी में लब को जाँ
औ हम चाहकन को ढूंढते 
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सरद रितु की भोर भई खिली रूपहरि धूप |(रे)
सहुँ सरोजल दरपन दृग दरसत रूप अनूप ||(रे)

जग जगराति ज्योति जौं सैनि पलकन्हि मूँद |
निद्रालस मुखमण्डल तौं गिरीं ओस की बूँद ||

नैन वैन मलिहाए के गहे मलिन मुख ओज |
नभगत बिकसत बालरबि सरसत सरस सरोज ||

रुर जल नूपुर चरन पुर चलत सरित सुर मेलि |
तीर तरंगित माल लिए भेला संगत भेलि ||

कटितट मटुकी देइ के घट लग घूँघट घारि |
आन लगी पनिया भरन पनघट पे पनहारि ||

पुहुप रथ पथ चरन धरत प्रस्तारत पत पुञ्ज | 
सुरभित भई कुञ्ज  गलीं कुसमित भयो निकुञ्ज ||

जगार करत रंभत गौ गोठ गोठ सब गेह | 
बाल बच्छ मुख चुम्बती बरखत नेह सनेह ||

रैन बसेरा बिहुर के छाँड़ बहुरि तरु साखि |
पंगत बाँधत उड़ि चले गहे पाँख नव पाँखि ||

मंदिरु खंखन देइ रे अपुरावत मुख संख |
अब लगि बिकसे न ललना तुहरे पलकनि पंख ||

अगजजगज जगराए के रैनि चरन बिहुराए |
सुनहु लाल तू सो रहे निंदिया नैन बसाए ||
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लागे बिन लाग नही अनुराग नहीं होए रे
सैन रहे जो आपहीं तो जाग नहीं होए रे
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सोहत सिंदूरि चंदा जूँ रैन गगन काल पे..,
लाल लाल चमके रे बिंदिआ तुहरे भाल पे.....

कंगन कलाई कर पियतम संग डोलते
पाँव परे नूपुर सों छनन छनन बोलते
छत छत फिरत काहे  दीप गहे थाल पे
जब लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे..,

चरत डगरी रोकि रोकि बूझत ए बैन कहे
बिरुझे मोरे नैन सहुँ काहे तुहरे नैन कहे
देइ के पट पाटली भुज सेखर बिसाल पे
लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे

गुम्फित छदम मुक्ता हीर मनि बल के रे..,
करत छल छंद बहु छन छब सी झलके रे..,
रिझियो ना भीति केरी मनियारि जाल पे..,
लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे..,

जूँ निरखूं छबि अँगना के दरपन से ताल पे

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----- || राग-ललित || -----

रैन ज्योति नैन ज्योति जगत ज्योति जग जगमगे | कनक कंगूरे कलस ज्योति अगत जगत जगरत जगे ||
नलिन ज्योति मृणाल ज्योति ताल ताल ज्योतिर्मई |
तीर तरंगित माल ज्योति
तरत मराल सम धरत ज्योति सकल दीपक मृण्मई ||

झिलमिल ज्योति
उदयत मंगल काल ज्योति
तिलक चिन्हित भाल ज्योति ज्योतिर्मय मुख मञ्जुलम |
हिलमेलती उरमाल ज्योति कलित कुण्डल कल कंचनम |

दमकत दीपक माल ज्योति ज्योतिर्मय सुभ दीपावली |
भीति भीति मनि जाल ज्योति बीथि बीथि सब गली गली ||
करतल हिरन थाल ज्योति छजत छत छत पंगत परी |
लखत लालमलाल ज्योति छूटत जब नभ फूरझरी ||


दीपक माल ज्योति कृष्णा कृष्ण चन्द्र मुख मनोहरम्
छजत ज्योति छत छत छन छटा छतनार के

ज्योति
जरत जरत दीपक रीते 

----- || राग-देस || -----
बुए बिआ पिय पेम अँकूरे
अँख न आए नहि अंग बिकसाए अजहुँ पंख नहि पूरे
सुख सम्पद गह गह नियराई छाए मोदु मुख भए दुःख दूरे
गै परदेस पंखि परबासी चरन फिरावत देस बहूरे
भरम पास बस दिग भरमावत रे पंथी पंथ नाहि भूरे

----- || राग- केदार || -----
बुए बिआ पिय पेम अँकूरे
जो दिन तुम्हरे संग बिरुझे अजहुँ सो दिन गयउ रे भूरे || १ ||
सांझ भोर करि उड़ि उड़ि जावै पलपल पल छन पंख अपूरे ||
जो दुःख सों सुख मुख बिरुझायो अजहुँ त अखियन सों भए दूरे || २ ||
जो सुख सों दुःख मुख मलिनायो रे अजहुँ त सो सुख भए धूरे ||
हरिदय देस नैनन फुर बारि बिरवा प्रतीति फूर प्रफूरे || ३ ||
 डोरि देइ पिय पलक हिंडोरे पुलकित पेम डारि पर झूरे || 
हमरे बिन तुम आधे अधबर तुहरे बिन हम आध अधूरे || ४ ||
कहत ए डरपत मन रे साजन बैरि बिरहा बहुर न बहूरे ||
सुनहु पिया बर प्रीति ए साँची कहँ सौं लई तुहरे सहूँरे || ५ ||

बहुरि सो बैरन बिरहा बहुर न बहूरे 
जौ तुम्ह कहौ तो सहुँ कर जोरि कहूँरे

----- || राग -पीलू || -----

 माई गोद भरावन चली
कोई मांगे मनिया नी कोई मांगे मोतिया 
कोई हरी हरी चुनरिया 

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लाल लाल तिलक रेख बसत पिया के भाल रे
हिलमेलती उरु रुचिरु गज मुकुतालि माल रे

पीत बसन देह बसे नैनन में नेह रे
बहुरि बहुरि मोहि कसे बहियन में लेह रे
दीप माल थाल धरे मोरे कुमकुम करताल रे

गली गली मनि दीपक की अलियाँ सँवार के
छाँड़त रे फूरझरी श्री की आरती उतार के
आजु अली सुबरनी भए गगन घनकाल रे

देख देख छबि छटा छन लोचन अभिराम जूँ
बारिअहिं अंग अंग कोटिकोटि सत काम जूँ
झरोखन्हि लगी जुवतीं होवति निहाल रे

बाँकी बर करधनि कर निरखत घनस्याम से
चितबत चित चोरि लेहि रे झलक देत राम से
अपलक भए पलक चलत जब मंजुल मराल रे

मिलत कंठ लाई पुर के लोगन्हि बिलोक के
हँसत कहत कहिबत कछु डगरी रोक रोक के
सोहत दए पाटल पट  भुज सेखर बिसाल रे

ताल ताल  मुकुर
बाजत एक ताल रे

घन श्याम मनोहर मन भावन लागे 
निरख छटा छब बिनहि बेला  घन घन अनुरागे 
छन छन करि घुमरन लागे 
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----- || राग-बिहाग || -----
 जर जर मनोहर दीप अली 
जगुरावत घन तम निसि चहुँ दिसि कुञ्ज कुञ्ज सब गेह गली || १ || 

बेनु के बेढ़ब माहि प्रजरत,जिमि लाल मनि मुक्ता बली || 
सकल कला गह बिकसहि चंदा बिकसाइ सब कुमोद कली || २ || 

बरन दिगंतर गौरज बेला  साँझि गहे बरमाल चली || 
सीस धरे पिय के पग धुरी अभरत सुभग सेंदुर ढली || ३ || 

पाँव पधारत पँवरी पँवरी लागहि साँवरि रैन भली || 
दीपित मत मुख अंचल ढाँकी समीप सहुँ सकुचात चली || ४ ||

सोन सलोनी 

मृग मृगी निरखि थकिअ  निहारे


सिंदूरी संध्या वरमाला हस्तगत अन्धकार को वरण करने चल पड़ी, शिरोपर अपने प्रियतम के चरण धूलिका धारण कर वह अस्तांचल गामी हो गई | ड्योढ़ी ड्योढ़ी पर पदार्पण करते श्यामल रयनी मनोहर प्रतीत हो रही है 



बिलसत तरु पल्लब पट पहरे 

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

जगत जगत बिरती रे रतिया,  
बिरतै रतिया रे जगज उठे,
बिरताइ रतिया रे जगज उठे, 

अरुन उदयो अँजोरा सुधयो तज सैय्या सूरज उठे |                     हाँ तज सैय्या सूरज उठे ..
बिराज पुनि रथ उतरे छितिज पथ, परस चरन सिरु रज उठे ||    हाँss परस चरन सिरु रज उठे.. 
सरस सरोजर जोरे पानि सिस नाई पद पंकज उठे |                   सिस नाई पद पंकज उठे.. 
देय ताल मृदुल मंदिरु मंदिरु ढोल मजीरु मुरज उठे ||                  ढोल मजीरु मूरज उठे ..

सुर मालि पुर मधुर मनोहर संख नूपुर सहुँ बज उठे |                  हाँ संख नूपुर सहुँ बज उठे ..
सहस किरन बिनिन्दत गरुअत कलसी सिखर कर ध्वज उठे ||   कलसी सिखर कर ध्वज उठे ..
करत आरती सकल भारती भरि भेस भूषन सज उठे |                भरि भेस भूषन सज उठे.. 
बसहि बासि जिमि चहुँ कोत बासत कोटि कोटि मलयज उठे ||    हाँ कोटि कोटि मलयज उठे..  

अगज-जगज जगत भए सब जीव जगत के जाग |  
हरिअरी हरिदय निकेत जाग उठे अनुराग || 

अरुन उदयो = भोर हुई 
अँजोरा = उजाला
रज = कण, पराग कण 
पाणि = हाथ 
मजीरु मुरज = मंजीर मृदंग,
मलयज = चन्दन 
हरिअरी = धीरे धीरे 






----- ॥ दोहा-पद॥ -----,

जगत-जगत बिरतै रे रतिया 
अम्बरु अंत लग जग जागे, जागत जरत जोति बरतिया | 
दिसै कमन बहु कुटिल करमचँद, कहत जगत कहि सुनी बतिया ||

करमन कर लेखा पढ़त फिरै, पढ़ी सकै चिठिया न पतिया | 
बैनन्हि के बिँग बैनाउरि कसि कसि छाँड़ बिँधे उत्खतिया  ||  

जो ये बस्ती भई बैरागि तो जा पड़े को परबतिया | 
बिरुझत बिदूखत बैरु करेउ भूतेसु के रे बरतिया || 

भक्तिकाल 

सँवरे सँवरे मोरे सँवरिए चितइ नहि देउ मूरतिया | 
बिरज उजारी दए झिरकारी  भयउब भूरि दुरगतिया || 

जोति बरतिया = ज्योति वर्तिका 
कुटिल करमचँद = कुटिल कर्मों से युक्त 
बिंग = व्यंग 
बैनाउरि = बाणावली 
बिदूखत = दोषारोपण करना 

बिरज उजारी = ब्रज को उजाड़ने वाली, वर्जना और जलाने वाली
झिरकारी=फटकार 



लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि भए पानी पानी..,


ओ रे पिया ए रतन अमोलक, हाय ये मोल जानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,

निसदिन करि ए कहि बतिया, गह गह गयउ बखानी
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी


कासे कहें कहँ जा सुनावैं, ए हमरी राम कहानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,

हम सहुँ कहुँ परोसहु बैरि जनिहि न राम कि बानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,

अजहुँ त परबत परतस लागे, हिय करि पीर पिरानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी.....



जौ बाति कहउँ मैं साँचि
हेरि मुख भीत फनिस सी, घरि घरि एहि रसना नाचि,
बाँचि सबहि जग कर कहनि अरि हरि कथा न बाँचि..,
सुनु प्रसंगु एहि कल कीर्तन छाँड़ि मन रंजन बहु राँचि,
पढ़ि सब पढ़नि पढ़ि न हरिप्रिया कर आखरि पै पाँचि..,
जगवनि सबु रस कंठ करि बरु भगवनि भू दे कांचि,
जग बिरुझ भरिअ कुलाँचे जिमि हिरनी मारि कुलाँचि..,
बाहिर पुनि लीन्ही हरिदय मोरे अंतर करि जाँचि..,
साँचि असाँचे बिंग बैन बैनत भयउ नाराचि.....
कहत झूठे बैन जगत अरु जग ते में साँचि.....

अब तो नज़रे उस हर्फ़े-दुआ को पढ़े है,
 ले जाए कोई ये पैग़ाम बराए-दर.....
                          *****

बाबूजी मोहे नैहर लीजो बुलाए, 

नैन घटा घन बरसन लागै घिर घिर ज्यों सावन आए, 
पेम बिबस ठयऊ सनेहु रस जबु दोइ पलक जुड़ाए.., 

भेजि दियो करि ह्रदय कठोरे  काहु रे देस पराए, 
बैनन की ए बूंदि बिदौरि छन छन पग धुनि सुनाए..,

मैं तोरि बगियन केरि कलियन फुरि चुनि पुनि दए बिहाए,
ए री पवन ये मोरि चिठिया बाबुल कर दियो जाए..,

पिय नगरी महुँ सब कहुँ मंगल चारिहुँ पुर भए कुसलाए, 
सुक सारिका अहइँ सबु कैसे पिंजर जिन रखिअ पढ़ाए.....

                                     ******
खोल के पुरट-पट घन स्याम रँग दिखाए है, 
होरी हाथ जोरि मोहे सबहि ढंग मनाए है 

पाए पाति पवन संग नभ बढ़ि चढ़ि पतंग 
कासि थोरि थोरि डोरि अपने सँग मिलाए है 


सपन नव दए के नैन रैन चरन भए बिहंग 
भोरी चोरि चोरि रंग में भंग मिलाए है 

प्रीतम हरि लाल सरि करि ताल धरि रँग-बिरंग 
हो री होरी होरी बिन रे मोहे अंग लगाए है 

पुरट-पट = सुनहरा घूँघट, बिजली का घूँघट 

                    *****
खोल के चश्मे-जद यूँ शाम रंग दिखाए 
दस्ते -सफ़हे पे शफ़क़ टूट के बिखरे   
                     ******

जाग उठे प्यारी भोरी के ये गीत-जाग उठे प्यारी होरी के ये गीत 
जागी सरगम जग रागे संगीत 
कंठ कूनिका कर महुँ धारौ, हे कलामई कुलिका सारौ 
रागौ  सबहि रीत 


होरी पतंगी उरि जाहु, रारी करिअ तुम काहु 
सूति डारी के पौ पुर पंखन पाहु 


होरी पतंगी कहँ जाहु, बहुरि प्रिया पठइ तोहि काहु 

होरी पतंगि कहँ उरि जाहु, 
तुहरि प्रिया एहि कहि कर दियो पुनि रार करन पिय आहु || १ || 
छितिजिहि  पारि हियपिय पिहरियो  छितिज परस न बहुराहु 
पैसिहु गह प्रीति पूरित सब रीति री प्रियातिथि तहँ पाहु || २ || 
भेंटिहि जननी तोहि उर लाइ जलज नयन भरी बाहु 
त मोर हरिदय कर कहनि कहहु  जनि जनित सहित सब काहु || ३ || 
कर गहि जौ  तोहि भाई भउजाइँ सलिल सनेह बरखाहु  
जोरि पानि जुग ए बिनती करिहौ  बाबुल मोहि लए लाहु || ४ || 







हे री हारि के नहि थिरियो, 
तिरत फिरत बिहंग संग, भँवरि भरत न तरियाहु 




मोरे नयन घनस्याम 


खोल के पुरट-पट घन स्याम रंग दिखराए रे, 
हाय हरियारा सावन झुम के नियराए रे..,

रूप हरे धूप भरे इंद्रधनुष कहुँ चंग दै, 
गरज-गरज घोर घनी काली घटा छाए रे.., 

गौर गगन ग्वाल कर लेइ जल तरंग माल,
थिरकत जमुना के तट स्याम उर मिलाए रे..,

बिरुझाइ लट बेनि बट करधनी तट घट किये,
होरी पनघट पे गोरि नैन पंथ लाए रे..,

बैरन सहुँ बैर पड़े डास डँसे बिरहन घन, 
पिय के पेमदूत बन बूँद-बूँद बरखाए रे.., 

बाबुल मोरे मोहे नैहर लीजो बुलाए.....
  

कहुँ = को या कहीं 
चंग = खेंचना , लटकाना 
गौर गगन ग्वाल = उज्जवल आकाश रूपी ग्वाल, मित्र  
कर = हाथ 
उर = हृदय 


करत रारी भयउ रे भोरा 
सजन चित्चोरा 



खोल के चश्मे-जद यूँ शाम रंग दिखाए 

दस्ते-सफ़हे पे शफ़क़ टूट के बिखरे   

जलज माल कल कंठ करन चलिअ मग 

ए री गोरी पिहरवा ना जइ हो री 
        ----- || राग-भैरवी ||-----

ओ री मोरी सजनी तुअ नैहर न जइहो | 
न जइहो न जइहो तुअ नैहर न जइहो || १ || 

मैं सावन अरु तुम बन मेहा  नेहु घन रस बरखइयो | 
मैं पावस तुम घोर घटा री  घेरि गगन गहरइयो || २ || 

मैं सागर सहुँ तुम सुर गंगा हरिदय बहि बहि अइयो |  
पेम के एहि संगम तीरथ ए तीरथ नहि बिसरइयो  || ३  || 

देइब चीठी फेरिहु दीठी जोहि बिरहि घन दइयो | 
कमनिअ कंचन कमन कनीठी मोर कनि कने पइयो || ४  || 

कनक कली कर कानन करिके मोहि न कनखि लखइयो |
कंगन कलिइन लेइ बलइयाँ  मोर कंठन खनकइयो || ५ ||

नैन झरोखे पलक पट देइ हिय गिह पिय पौढ़इयों | 
रैन अँजोरे धरै अँजुरी प्रीत करि जोत जगइयो || ६  ||


अरी मेघा मृग जल सरिता न करिहउ 
भरी भोर = प्रथम काल 


सनेह सहित हरिदय राखि कै गलबहियाँ बलाइ हो री 

जनिह जगत एहि भाँवर देइ मम सोंहि तुअ सों लइयो हो री 

गमन बिदेस न लेस क्लेस को बरु तनि सकुचाइ हो री

----- || रागललित || -----

ख़ुदा की ये दुन्या खुदा की ये राहें,
हरेक उफ़ तलक हों रहम की निगाहें..,

वो सतहे पे हो याके बह्रे-तबक़ पे,
जो क़दमों तले हो सुनो उसकी आहें..,

ख़ुदा-बंद का ही है ये काऱखाना,
हो मासूमो-महरूब के हक़ में पनाहें..,

दयानत से उठे हाथ दुआ के लिए,
के हों दरियादिल हम गाहे-बेगाहे.....


बह्रे-तबक़ = समुद्र की तलहटी
मासूम = निर्दोष 
महरूब = मारा गया, घायल 
ख़ुदा का कारख़ाना = जगत प्रपंच 

जलज माल जुग कर सरोज करिअ, राज मराल गति गवनी
कमल नयन कल कंठ करिअ पिअ रहिअ मेलि हरिदय अवनी
                                          *****

जलज माल जुग कर सरोज धरिअ, बाल मराल गति गवनी |
कमल नयन कल कंठ करिअ सिअ  रहिअ मेलि हरिदय अवनी ||


------------------------------------------------------
----- || राग- भूपाली || -----
लोभ लाह बहु नाच नचावै..,
करि न चहिए सो कर करि जावै || १ ||
यह मोहनि माया बहु ठगनी मूरख मन सब जान ढगावै |
यह लाहन सोइ जोहै जोइ अंत चले कछु काम न आवै || २ ||
पथ भटकावत दृक भरमावै दीठिहु ऐसो दोष धरावै |
पर दूषन दृग दरसत फिरती नाहि अपुना दोष दरसावै|| ३ ||
झूठे संगत करत मिताई अरु साँचे कू झूठ कहावै |
अधर्मी अजहुँ सनमान गहे धर्मी धरम करत सकुचावै || ४ ||
कुटिल चालि चलि करत कुचाली कुल कुल कलि कारन उपजावै |
कूट बचन कह  कलहु कारि के मन महु बहु बहु करष बढ़ावै || ५ ||


भई रीत जग बिपरीत करनी नव नव

कलुषित करनी ता संगत कलि काल कहावै

पंथ परचन पूछ्यो लघुत बृहद निज नाम बतावै

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ये साहिले-साकिन जहाज़ों की रानी
बड़ा ख़ूबसूरत है समंदर का पानी
कौन कहता है ये किसी काम का नहीं
इसके दोश-ए-दम पे है बारानी

होरी सखी घन गगन न ठाढ़एँ
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भुज कंठ माल दै जाए लपटि लरिकाई सी
गहि बाहु उर लहि निज कूंख तेउ जाई सी
भुजाई सो माई सी
जग कहँ सनेहिल छबि अस भाई सी

लागि पीर पराई सी

ललाई निरत करके बिजुरिया
बूड़त गहनइ घनस्याम घन
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भई निरदई प्रीतमा मोरी
चंदा भावै सूरजु भावै  मोरि प्रीति ना भावै थोरी
करतब जोरा जोरी

गगन परस जूँ पवन जगे
पाहन परस जूँ अगन जगे
यौवन परस जूँ लगन जगे
निद्रालस नयन जगे

पेम भाव मन एकै से बिलग बिलग स्वभाए | को पात फल फूल भखे को मारी जिउ खाए ||

बिलग बिलग सब गेह जूँ बिलग बिलग यूँ देस |
बिलग देस धर्म सों बिलग भेस परिबेस


पांच मिनट तक उबला पानी, हम पर डाला जाता। आधी गर्दन काट हमारी, खून निकाला जाता।।सुनो!सुनो!ए ?.... तत्काल पेट में एक छेदकर, हवा भरी उसमें जाती। आधी जीवित मेरे तन से, चमड़ी उतारी जाती।। चमड़ी उतार कर मेरे तन के , टुकड़े चार किये जाते । गर्दन, पैर, हड्डी अरु धड़ का, भाग अलग वे करते।।सुनो!सुनो!ए ..... सबसे विशाल एशिया प्रांत की, है महाराष्ट्र में वधशाला। काटे जाते मेरे वंशज, बहता खून का परनाला।। मेरी माता, बहिनें, बेटे , भाई हजारों कटते। पाकर ताजा मांस विदेशी, पेट स्वयं का भरते ।।सुनो!सुनो!ए ..... मेरे! पुत्रों सुनी आपने, हृदय विदारक अन्तर्कथा। निश्चित मन में जागी होगी, मर्मान्तक मेरी व्यथा कथा।। बहती थी जिस देश में पावन दूध, दही की निर्मल धारा। बहती आज उसी भारत में, गौ माता के खून की धारा।।सुनो!सुनो!ए ..... हे! संतजनों ? माँ भक्तों जागों? सर कफन बांध संघर्ष करो। मेरे दूध की लाज बचाने, केहरि बल हुंकार भरो।। गूंगे, बहरे, लोलुप, निष्ठुर, शासन से दो हाथ करो ? गौ हत्या प्रतिबंधित करने, सत्याग्रह कर जेल भरो।।सुनो!सुनो!ए ..... राम, कृष्ण, शिव, राणा, शिवा, के, वंशज सुनो पुकार। मुझ निरीह के प्राण बचाओ ? मैं करती यही पुकार।। ‘शास्त्री’ करता विनय आपसे, हो जाओ तैयार। गौ संस्कृति रक्षार्थ उठो ? तुम लेकर जौहर ज्वार।।सुनो!सुनो!ए .....


गौ मातु कर करुन पुकार |
सुनहु हे धर्म प्रान बँधुओं || १ ||
भयउ अजहुँ करषक निरमोहि निहठुर निरदय हरिदय होहि |
करे न मोहि पेम प्यार || २ ||
गौचर मोरि पहुमि हर लियो चारा  न बाँटा न नीरहु दियो |
भटकत मैं फिरूँ द्वार-द्वार || ३ ||
अजहुँ त भए सब सुवारथ के साथि, मारै मोहि लकुटि धर हाथि |
करैं अगनित अत्याचार || ४ ||
मैं बस ग्रास तृन तिनकाहि पाति अरु मीठा- मीठा क्षीर पिलाति |
तापर करे नहि मो से दुलार || ५ ||
होत बिरध सो वध मेरे प्रान लें निर्मम हो कस बलवत बलिदान लें |
देखु मोरि दसा एकु बार || ६ ||
कहँ ए कातर करुन कर बानि सुनु अब मोरि ब्यथा कि कहानि |
दे ध्यान करु मो पै उपकार || ७ ||
आँध्र नाउ प्रदेसु बिसाला तहँ एक 'अल-कबीर' बधसाला |
गह गह तहँ देइँ मोहि डार || ८ ||
दए पाषंड दंड मारि मारि के  जहँ नारकि कूप महुँ डारिके |
रखैं मोहि भूखि दिन चार || ९ ||
हत हत मोहि करैं बलहीना चोट दें घाउ दे पुनि करें दीना ||
तड़पत मैं गिरूँ बार बार || १० ||
फाँस दै दै के पाँव बाँध पुला पीट पीट करे अधमरे समतुला ||
उबाल देइ जल डार डार  || ११ ||
प्रथम अरध मोहि काटि धड़े ते पुनि रक्त ते निज कुंड भरें रे ||
कलपूँ मैं प्रान कर धार  || १२ ||
उदर छेद कर हवा पैसारे अध् जिअतें मोरि चमरि निकारें ||
पुनि तन के करें टुक चार || १३ ||
अह!बहँ तहँ मम रुधिरु परनाला बँसुरि धरे जहँ जनमें गोपाला, ||
अजहुँ यहँ जनमें खर सिआर || १४ ||

वर्द्धमान विश्व वरणता विनाशयित विकास को  
शिरोधार्य करो नमन स्वर्णमयी इतिहास को

उच्च श्रृंग श्लाका  को श्लेष कर उत्तोलती
दीप शिखा सी ध्वजा वो छू रही आकाश को

मेघों की प्रगर्जना में प्रकृति का प्रसव निह्नाद
जन्म देती नित्य जहाँ उत्सव और उल्लास को  

विभव क्षयित वर्तमान के सोपान पर आरोह
दिशा-दिशा में ढूंढती पूर्वाशा निज प्रकाश को

भूमि-भूमि पर 
विप्रमयी व्योम का उस व्यास के विभास को 

सूरदास रचित : --
बरखा ऋतु आई देखु माई,
उमगि घटा चहुँ दिसि ते जुर जुर बिजुरी चमक सुहाई |
दादुर मोर पपहिया बोलत कोयर कूँज सुहाई |
निसदिन रहत सदा प्रीतम सँग निरखत नैन अघाई |
घन जमुना घन उलिन मनोहर बायु बहत सुखदाई |
सूरदास प्रभु की छब ऊपर नैनन नीर बहाई |

----- ॥ दोहा-पद 10 ॥ -----

-----|| राग मेघ-मल्हार || -----

घेरि घटा घनकत घन घोरा |
छाए पिया पावस चहुँ ओरा || १ ||

थिरकत नदि जल झर झर झरे, पाँउ परे झनकत रमझोरा || २ ||

भर घमंड ए काल न देख्यो, बिनु नूपुर नाचहिं बन मोरा || ३ ||

बँट दै तरुवरि हरिअरि रसरी, पाए पवन हलै रे हिँडौरा  || ४ ||

ढूँढत जलनिधि सुध बुध भुल्यौ, पँवर पँवर भँवरत चितचोरा || ५ ||

साँझी दिवस सोंहि गठ जोरे, परिनय करत रैन अरु भोरा || ६ ||

दूरबा कर  बिछेउ बिछौने, तपन ऋतु कर न होए बहोरा || ७ ||


 रमझोरा = घुंघरू
पँवर पँवर = द्वार-द्वार
चितचोरा = घनश्याम
पँवरहि = ढूंढ़ना


**********************

घेरि घटा घन घनकत घोरा |
छाए पिया पावस चहुँ ओरा || १ ||

बेनु हरित अहि बेलरि डारै | बंदनिवारे परे दुआरे ||
भयउ मगन मन मोदु न थोरा || २ ||

काल घना की काजर पूरी | माँग भरे भइ साँझ सिँदूरी ||
दिसत झरोखै करत निहोरा || ३ ||

बरसि बरसि बादल पनिहारे | भर भर कलसि करषि कर धारे ||
तृपित कंठ भा चकित चकोरा || ४ ||

यह तापस रितुवन की बेला | जलधि नभ चढ़ि करिहिं का खेला ||
उड़त पतंगिहि भँवरत भौंरा || ५ ||

उरहि पतंगी भंवरहि भौंरा = आंधी में पत्तो और धूल का बवंडर, पतंग और भौंरे (लट्टू) का खेल




  दिन रात से बोले रे सुन ओ मेरी प्रिये..,
तेरी पदचाप को सुनकर जल उठते है दिये.....

कोई लो लाल न कोई लो पीलो,
साँवर सलौने  न करो रे रंगीलो,
कोमल कोमल कपोलन मल के ,
पाछे धर धर के पिचकारी मारो.....

होरी आई रे मोहन पर रंग डारो
कोई लो लाल न कोई लो पीलो, साँवर सलौने न करो रे रंगीलो, कोमल कोमल कपोलन मल के, पाछे धर धर के पिचकारी मारो..... सुरभित गंध फूर कस्तूरिया.., कुमकुम संग केसर मनहरिया.., कनक कलस भरयो चंदन सो.., भरु थारी अबीरन बउछारों .....


चल रे चल ओ मोरेअँखियाँ नु लखियाँ
अब ये देस हुवा बिराना
भई मोरी बैरन सारी दुनिया
जिअ लइ के ये दे बिरहाना
सारी दुन्या
मोरे साजन
है ये प्रीत की रीत पुरानी

----- || राग- काफी || ----
रे जगत तू ! भोगत भवहि भुलायो
भरियब भवन भूति बिभूति बरु भरमन महि भरमायो || १ ||

बनि बैसा सो आपहि भगवन भगति भजन बिसरायो || २ ||

भोग कलप जौ न भाग लिखाहि भाग भाग तिन पायो || ३ || 
आपनु झौंरा दियो बिखेरा औरन जोड़न धायो  || 

भावार्थ : - रे जगत ! तुम पृथ्वी के भोगों को भोगने में लगे हो | भवन में धन संपत्ति का अम्बार लगा है तथापि 
तुम धनार्जन में व्यस्त रहते हो | ईश्वर 

सांझ सलोनी अति भाई

ढरती साँझी मन भाई | (देखु भाई)
( देखु माई )
चारु चंद्र की कनक कनी सी बिंदिया माथ सुहाई || १ ||

उरत सिरोपर सैंदूरि धूरि जगत लखत न अघाई || २ ||

अरुन रथी की रश्मि लेइ के बीथि बीथि बिहराई || ३ ||

दीप अली दुआरि लग जौंहे लौनी लौ न लगाई || ४ ||

बिरत भई गौ धूरिहि बेला रैनि चरन बहुराई || ५ ||


नैनन सोंहि दुराई

अरुन रथी = सूर्य
  रश्मि = किरण
बीथि बीथि बिहराई = पथ पथ में या बाजारों में घूमती फिरती


(हे) दीप धूम करि धुजा धरो
अँधियारोजग जोत भरो

निद्रालस भयो देस दियारा अँजोरन जोहत पंथि हारा
बर्तिका संग सार बरो

अग्यान हरो
कण्ठन राम कै नाम सुहाए
राम नाम मनि दाम सुहाए
दाहिन भ्रात लखन मन मोहें श्री सरूप सिय बाम सुहाए
श्रीहरि सागर साथरि सयनै सिस छतर बलराम सुहाए
श्रम जीबी कर्मन कर सौंहे अकरम सील कू काम सुहाए
सो गह जहँ पिय नयनाभिराम सुहाए

----- || राग बैरागी भैरवी || -----

जगलग ज्योत जगाओ रे, 

चहुँपुर निबिर अंधियार भयो अब रैनी चरन बहुराओ.., 

पंथ कुपंथ मोहि न बूझे, चलेउ कहाँ अजहुँ न सूझे, 

रबि सारथी नियराओ.., 

धरिअ करतल प्रभा प्रसंगा उतरो हे देव रथ संगा.., 

दिसि-बिदिसि अरुनाओ..... 


दिसि -बिदिसि = दिशा व्  दिशाओं के कोण 


जगलग ज्योत जगाओ रे, 

चहुँपुर निबिर अंधियार भयो हे जगन्मई पधराओ रे .., 

धरिअ करतल प्रभा प्रसंगा प्रगसो हे देवि हरि संगा.., 


दिसि-बिदिसि उजराओ रे ..... 

पंथ कुपंथ केहि न बूझे, चलेउ कहाँ अजहुँ न सूझे, 

माया मोह दुराओ रे .., 

जल जल भयउ दीपक रीते यह मावस करि रतिया न बीते


भूति बिभूति भर जाओ रे.,

दीपक संग जोत जगे  देहरि संग द्वार | 


प्रगसो हे ज्योतिर्मइ दूर करो अँधिआर ||






राग मालकोश = गायन समय - रात्रि -तृतीय पहर 


राग मारू बिहाग का संक्षिप्त परिचय-
राग मारु बिहाग - गायन समय-रात्रि का द्वितीय प्रहर
राग गौड़ सारंग और राग पटदीप, राग मारवा  - गायन समय -  दिवस -चतुर्थ प्रहर 
राग काफी -गायन समय-मध्य रात्रि

लखि मोहे नहि भाए ए दूरी 


हेरी कली ए अली अनूठे 
हेरि अलि सम पिया अनूठे 
तापन हो कि हो  केहू बेला | तनिक सकुचै न बोलन झूठे 
सुमन सुमन भा मधुबन गंधा | गंधे सुरभित सार सुगंधा 
रूठे रूठे 

हर्फ़े-दुआ याद आई

 के बाद आई

सनेसो = सन्देश

----- || राग दरबारी गायन समय मध्य रात्रि || -----
दीप मनोहर दुआरी लगे चौंकी अधरावत चौंक पुरो |
हे बरति हरदी तैल चढ़े अबु दीप रूप सुकुँअरहु बरो ||
पिय प्रेम हंस के मनमानस रे हंसिनि हंसक चरन धरो |
रे सोहागिनि करहु आरती तुम भाल मनोहर तिलक करो ||


चलिअ दुलहिनि राज मराल गति हे बर माल तुम कंठ उतरो ||
हरिन अहिबेलि मंडपु दै मंगल द्रव्य सोहि कलस भरो ||
जनम जनम दृढ़ साँठि करे हे दम्पति सूत तुम्ह गाँठि परो |
भई हे बर सुभ लगन करि बेला परिनद्ध पानि गहन करो |
अगनि देउ भए तुहरे साखी लेइ सौंह सातौं बचन भरो ||


बर मुँदरी गह दान दियो हे सुभग सैन्दूर माँगु अवतरो |
जीवन संगनि के पानि गहे हे बर सातहुँ फेरे भँवरो ||
हे गनेसाय महाकाय तुम्ह भर्मन पंथ के बिघन हरो  |
बरखा काल के घन माल से हे नभ उपवन के सुमन झरो ||

पट गठ बंधन बाँध कै देइ हाथ में हाथ |
ओरे बोले बाबुला जाउ पिया के साथ ||






----- || राग -भैरवी || -----
ओ रे पिया  दिअरी से द्वारि लगे
बिरहा कर अगनि में जर जर जगे


रतिया भर दिअरी से जर जर जगे


सारी रैना दिअरी से जरे
जगराते जरे

ओरे नैना दिअरी से द्वार धरे..,
सारी रैना पियहि को जुहार जरे.....

ओ रे  दियरी से द्वार धरे
सारी रैना नैना निहार जरे  .....


ओरे नैना अँसुअन की धार धरे
सारी रैना पियहि को जुहार जरे.....

ओरे नैना दिअरी से द्वार धरे.., सारी रैना पियहि को जुहार जरे..... ओरे नैना अँसुअन की धार धरे सारी रैना दिअरी से जगरत जरे..... दिअरी = छोटा दीया


ओरे नैना दिअरी से द्वार धरे
सारी रैना पिय को जुहार जरे

देखु जग कर रीति ए कस रे भाई
हिय करि टूक जिय दे ज्यायो  सात भँवर करि दियो परायो

ये हमरी पिंजर करि पाँखी पंख परत रे दियो उड़ायो
फूरि भई पिय लेवनु आयो

----- || राग पीलू || -----
हम तुहारे तुहारे तुहारे बलम..,
हे शम्भो प्रभो शीश गंगा धरं | लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजङ्गम ||
निराकारमोङ्कार बाघाम्बरं | 

राग-पीलू
सूर देउ  सिस चढ़ि आए..,
सिउ सहुँ रौद्र रूप दिखराए.....

पट गठ बाँधनि बाँध कै देइ हाथ में हाथ |
बोले मोरे बाबुला जाउ पिया के साथ ||


काहे मोहि कीजौ पराए, 
ओरे मोरे बाबुला 
जनम दियो पलकन्हि राख्यो जिअ तै रहेउ लगाए 

 पौनन के डोला कियो रे बादल कियो कहार | 
 बरखा कर  दियो बरसन दूज द्वार || 
मैं तोरी नैनन की बुंदिया पल पलकैं ढार ढरकाए 

देइ पराई देहरी दियो पिया के देस | 
दूरत दुआरि आपनी पलक कियो परदेस || 
करे अँकोरी सनेह कर डोरी गोद हिंडोरी झुराए 

नैनन को नैया कियो पलकन को पतवार | 
पिय की नगरि भेजि दियो दए अँसुअन की धार || 
कहत ए नीर भरी निर्झरनि निज परबत ते बिहुराए 

कै नैहर कै पिया घर बधियो दोइ किनार | 
नदिया तोरी दोइ गति,  कै इत पार कै उत पार || 
नैन घटा घन बरखत बाबुल रे लीज्यो मोहि बुलाए 


----- || राग-पहाड़ी || -----
नीर भरी निरझरनी 
पहाड़ानु छोड़ चली 
डब डब अँखियन ते लखे 
बाबुल की प्यारी गली 

नैनन की नैया पलक पतवारा 

हरियारे आँचल में अँसुअन की धारा 
 दोई कठारन दोई कहारा 
दोई कहारन पे 
अन्न धन की धानी ले के 
दो तीर्थों को जोड़ चली 

ये साधु संतों की कही बानी 
नारी नदी तेरी एक कहानी 
आँचल में प्रीति पलकों में पानी 
पलकों में पानी लिए  
नई प्रेम कहानि कहने 
देखो सागर की रानी चली 

आँचल में बाँध के आंसुओं के बादल

पलकों में भर के बदरा की  काजल

 पैरों में बरसीली बूंदों की पायल



करि निज नगरि ते दुराए 

फुरवाई फिरिहउ कर मोरी अँगुरी गहाए 

हिय करि टूक जिय दे ज्याए 

जन्माए 


नदिया रे तू कहँ बहिरायो
पैरन महुँ तोरे झाँझ परी पग पग कंटक बिथुरायो


 पैर तोरे कंकरी
 डग तोरी सँकरी

दूर पी की नगरी
बाँध के किनारों पे
दो कहारों पे



चाँदी के पटौहन पे सोने का पलका
    की चित्र पटि पे चाँद का झलका
चाँद का घूंघट ढलका ढलका



पग पग कंटक काँकरी


----- || सोहर || -----
बादहि बादल देउ बधइयाँ
आईं बहियर बरखा रानी ए सुभ सँदेसा दायो
अइने द्वार बरतिया
मैंया कुअँरु मनोहर लइने जी बहियर
बाबा लुटावै रुपइया भैया धेनु गइया
गोतिया लुटावै मोहर


फेरि बारी

दिए भू  माई भूरि बधाई जौ  जौ जेहि मन भायो


कौमुद संग निहार

सदरी रैनि लाग रहे  देहरि संग द्वार
अलका पलका देइ के पलक पटोहाँ ढार
सुमन सुमन भा रयन सुहागा | बसे पिया के मन अनुरागा ||


उरत धूरि घन नभ धूसराए । बरखा रानी अजहुँ  दूराए ॥ 

जल में बासे कौमुदिनी चंदा बसे आकास
जो है जाको भावना सो ताहिन के पास
 ----- || संत कबीर || ----- 
              
दीपक संग जोत लगे  देहरि संग द्वार

सुमन सुमन चहुँ कोत
जगे प्रीति का जोत

हरिदय रतन सिँहासन बैस  स्याम सलोने साजन रे

सखि गाओ री सोहर जी मंगल सुअवसर कुँअर मनोहर जी सुनु अति सुन्दर दूल्हा बनइयो जी हो, रामा दूल्हा बनइयो जी हो..... करधन करधर पाटली परिकर अरु बर बर बसन बसइयो जी हो, रामा बसन बसइयो जी हो..... कल किरीट कपाला कंकनि माला अरु मनिहर रतन सजइयो जी हो रामा रतन सजइयो जी हो..... चारु चँवर हलरई सिरु छतर दसई के अरु हरियर लगन करइयो जी हो, रामा लगन करइयो जी हो.....



भयो दिवस भए दीप मलीना

रजस अलस बस तामस जागै सतो जगत भा नींद अधीना
दिवस हो आया दीप मलीन हो गए | सतो गुण निद्रा के अधीन है ,रजस गुण आलस्य के वशीभूत है  तामस गुण पूर्ण जागृत है | 


 नौ दुलहनिया दुआर खड़ी रे 
झूरत जल करि झलरी रे 

------ || राग-मल्हार -|| -----

घरि घरि गरजहिं घन घन घोरा 

भरि भरि सरिता  ताल तलावा 
नाचहि मोरु नूपुर धर पाँवा 


मेघ माल रे जोबन रंगे ।
 बिरहा करै सब रँग  निरंगे ।।
आह बैरी भयो रे बहोरा 


कहाँ गयो साजन चित चोरा 


सहुँ सागर सखि बूँद पियासे  
पिया बिनु बरखा ऋतु  न रासै 
प्रेम पयस तरसै मन मोरा 

*******
हेरी घटा तू बरख न भुलियो 
पान बेलि के रसियन घारे अँगना परी गयो झुलियो 
कुञ्ज गली मंडपु मंड्यो फुलियो 
ताप ऋतु  भई बैरन जी की पिय तन झुरसावन तुलियो 
देइँ लोग तिन्ह गन गन गारि सकल जगत तुअ 
******
घुमड़ घुमड़ पिय बरखहिं मेहा 
निपतहि नैनहि नन्हि नन्हि बूँदी उपरनन्हि भीनै सनेहा 
                                                  आँचल 
कहु हिय पीरन कहिहु रे केहा 
भरिहि रे भैहा (भय )


रैन कृष्ना नैन कृष्ना कृष्णी मय सब जगत लगे | कनक कंगूरे कलस कृष्ना कृष्ण कृष्ण कह जगत जगै ||

गाल कृष्णा भाल कृष्णा कलित कुंडल कल कुन्तलम् |
कंबोज् कण्ठ कपाल कृष्णा कृष्ण चन्द्र मुख मनोहरम्

भावार्थ : - कृष्णमई रयनि के नयन में मानो कृष्ण है समस्त संसार ही कृष्णमय रयनि के समरूप प्रतीत हो रहा है | स्वर्ण कंगूरे से युक्त मंदिर में कृष्ण है कृष्ण कृष्ण कहते संसार जागृत हो रहा है | जिसके गाल कृष्ण हैं जिसके मस्तक पर काले घुंघराले सुन्दर केश सुसज्जित हैं उन शंखाकृति कंठ व् कृष्णमयी कपाल वाले कृष्ण का मुख चन्द्रमा के समान मनोहर है |

भयउ रजस रजस कृष्णा त कृष्ण

सवैया
रविकर
चीर चुराय चढ़े तरु पे   यमुना तट पे  जब ग्वालिन न्हावै।
३ ४ ३ २ २ ---- ४ २ २ ----- २ ५ ५
हरिगीतिका छंद 
जय देवकी जसुमति जयतु जय राधिके जय रुक्मनी
२ ५ ४ -----३ २ ५ २ ५
मोरे पिछरवा के अँगनवा मैं बोले रे कोयरिया
रीति रीति  अमराई



----- || राग -मियाँ की तोड़ी || -----

हे जग बंदन अब अवतरौ तुम्ह..,
कलि काल कर कलुष हरौ तुम्ह..,

हिय संताप नैन भर बारी | धेनु रूप धर धरति पुकारी ||
तरस प्रभु दृग दरस परौ तुम्ह..,

तलफत भू कलपत बहु रोई | तुम्ह सोंहि प्रभु अबर न कोई ||
मोर हरिदय चरन धरौ तुम्ह..,

बोहि बोह सिरु पाप अगाधा | गहबर पंथ चरन गहि बाधा ||
पातक भारु हरन करौ तुम्ह..,

गिरि सरि सागर हरुबर मोही | भा गरुबर एक धर्म बिद्रोही ||
प्रगस सगुन सरूप धरौ तुम्ह..,


दुःख दारुन कर रैन मँझारे  | धरै दीप सम नैन दुआरे ||
दिनकर के रूप अभरौ तुम्ह

चारिहुँ ओर घोर अँधियारा | निद्रालस बस भयो संसारा ||
करत भोर अँजोर भरौ तुम्ह


दुःख व् दरिद्रता की अर्ध रात्रि में द्वार पर धरे दीपक के समान ये नयन प्रतीक्षारत है  | हे प्रभु ! अब आप दिनकांत के रूप का आभरण करो | चारों और घोर अन्धकार व्याप्त है संसार निद्रा व् आलस्य के वशीभूत हो गया है हे भगवन ! अब भोर कर अपनी दीप्ती से जगत में उजाला भर दो

 


जगत भयऊ मोर बिपरीता | अपकरनि ते भयहु भयभीता ||
भवहि केरि बिभूति बरौ तुम्ह.....

भावार्थ : - हे जगत वंदनीय ईश्वर अब आप अवतार लो | और अवतार लेकर कलियुग की कलुषता से मुक्त करो || ह्रदय में संताप और नेत्रों में जल भरकर  गाय रूप धारण की हुई  धरती ने आर्त होकर भगवान को पुकार कर कहा -- हे भगवन ! अब दया कर इन अश्रुपूरित नेत्रों को अपना दर्शन दो || तड़पती हुवे रूदन के द्वारा  अपनी अंतर वेदना को व्यक्त करती हुई भूमि ने फिर कहा हे प्रभु! आपके अतिरिक्त इस संसार में मरा कोई नहीं है मेरे ह्रदय में अपने चरण धरो | मेरे शीश पर अगाध पाप के गठरी का बोझ है मेरा भ्रमण पंथ दुर्गम है उसपर मेरे चरण आपदा स्वरूप बाधाओं से बंधे हैं, प्रभु! अब आप इन पापों का हरण करो | पर्वत, सरिताएं और सागर भी मुझे भारहीन  प्रतीत होते हैं किन्तु एक धर्म विद्रोही का भार अतिशय भारी प्रतीत होने लगा है | हे अन्तर्यामी ! अब प्रकट होओ और सगुण स्वरूप धारण करो | यस संसार मेरे विपरीत हो चला है | कुकर्मों से तो स्वयं भय भी भयभीत है अब इस लोक की वैभव विभूति को वरण करो हे राम अवतरण करो तुम्ह.....




********

----- || राग-मालकौंस || -----

श्री रामायन कलिमल हरनी.., पुनीत पबित जगत अनुसरनी.....


सिय के पिय की प्रीति सुठि रीति कल कंठ कलित कर बरनी.., 
थकै पंथि हुँत तरुबर छाईं तिसनित हुँत यहु निरझरनी.., 
एहि भव सागर सरिस अपारा तासु तरन हेतु यह तरनी.., 
जगति राति की जरति जोत सी अगजग जोतिर्मय करनी.., 
अधबर पंथ अँधियारे पाँखि महुँ यह उजियारा भरनी.., 
श्रवन मृदु मधुरिम श्रुति रंजन गायन मंजुल मनहरनी.., 
 भगवन्मय यहु भगति भगवती सरूप भगवद पद परनी.., 
भव बंधन मुकुति कर मुकुता गहै याके मारग चरनी.., 
साधू सज्जन संत जन सहित दीन दुखियन केरि सरनी.., 

त्रिभुवन की भूति अभरनी 



गह घन नैन पलक जल धारा  ।
कंज कलस कर  करधन धर के । नाचिहि बरखा छम छम कर के ॥ 
नीरज नुपूर गिरि गिरि आवा । समिट समिट सरि सरित तलावा ॥ 
सकल महिका हरिन्मय होई । भए सब धनिमन दीन न कोई ॥ 

चले चरन भुज प्रभु पद ओरा । बरखिहि बारि पलक पट तोरा ॥ 

रैन भई पिय 
चहुँ पुर रजनी गंधा गंधे 

एकहु पल मिलिहि न पलकिन् पाँति सदरी रैनि जागत गई ॥ 
घोरत अंजन भा घन रंगिहि बिरते बिरति न भोर भई || 

बादहि बादल बजहि बधावा,
पिया भवनन मोदु प्रमोदु मन सावन घन घमंडु भरि छावा || 
मधुरिम धुनि पूरत अगासा परत रे पनवा माहि घावा  |  
हेरी माई देउ सगुनिया परिअ दुअरि दुलहिन के पाँवा ||  
कंठि हारु कर करिअ निछावरि बलिहारत सिरु बारि फिरावा |  
सकल ननदिया आरती करहि पावै सोइ जोइ मनभावा || 
लोक रीति करि पाएँ पखारै गोतिनि कंगन द्युत खिलावा | 
गह करतल पिय बारहिबारा ,जय पावत पुनि मन सकुचावा || 
छुटत कंगन खोरत कर गाँठि हारत गए पिय खोरि न पावा  | 
गावैं जहँ तहँ लोग लुगाई निरख नयन भर पियहि बिहावा || 

पनवा = नगाड़ा  घावा = चोट 

साँझ सैँदूरि जोहती पिया मिलन की रैन | 
हरिदय प्रीति बिबस भयो भयो पलक बस नैन || 

स्वजन सोँहि बैनत गए नैन पिया के पास | 
लखत लजावत पियहि मुख बिथुरी अधर सुहास || 

ना निलयन ते दूर हैं न नैनन ते दूर | 
सौमुख मोरे साँवरे तापर बिरह अपूर || 

हेली मेली मेलि जूँ हेलि मिले पुनि कोइ | 
मिले नहीं पर पिया सहुँ घरी मिलन की दोइ || 

अंजन कू अंजन कियो पलकनि करियो पाति | 
नैना ठहरे बावरे बैने हिय की बाति || 


----- || राग-बिहाग | -----
बाँध मोहि ए प्रेम के धागे प्यारे पिय पहि खैंचन लागे  | 
अँखिया मोरि पियहि को निरखे औरु निरखे नाहि कछु आगे ||
निरखै ज्योंहि पिय तो सकुचै आनि झुकत कपोलन रागे |
ढरती बेला सों मनुहारत  कर जोर मन मिलन छन मागे ||
दिसि दिसि निसि उपरागत जब सखि गै साँझी नभ चंदा जागे | 
मिले दुइ छनहि त कर गहि चुपहि पद चापत पिया लेइ भागे ||
धरे करतल भरे पिय बैंयाँ सब लोकलाज दियो त्यागे |
बँध्यो तन मन पेम के पासु मोरे रोम रोम अनुरागे  ||
चितब रहिउ कहँ पिय मोहि काहु त गिरे पलक पियहि समुहागे |
करनन्हि फूर परस प्रफूरे पैह पिया के अधर परागे ||
लगन मिले ऐसो सजन मिले एहि भा हमरे सौभागे ||

 रैनी द्वार बिराजहि लेइ सुख सौभाग |
सुहासिनि मधुरिम मधुरिम गावत रहि सोहाग ||


भावार्थ = प्रिया कहती है -- देखो ( सखी )ये प्रेम के धागे मुझे प्यारे प्रीतम के पास खैंचने लगे हैं | मेरे नयन प्रीतम को ही देख रहे हैं इन्हे आगे और कुछ भी नहीं दिखाई देता ||  प्रीतम ने ज्योंहि मुझे देखते हुवे देखा तब लज्जावश  नयन झुक आए और  कपोलों को सुरागित कर दिया || ढलती हुई बेला से मनुहार करते मन ने मिलन के क्षण मांगे || संध्यावसान के पश्चात दिशा दिशा में निशा को अरुणिम करते हुवे जब नभ में चंद्रोदयित हुवा तब मिलन के दो क्षण प्राप्त हुवे तब प्रीतम ने चुपके से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे दबे पाँव ले भागे || प्रीतम ने सभी लोक मर्यादाओं का त्याग करते हुवे प्रीतम ने करतल धरे जब उन्होंने मुझे भुजाओं में भरा तब हे सखी ! तनमन प्रेम पाश के बंध गए और रोम रोम अनुराग से परिपूरित हो गए  | मुझे क्यूँ देख रही थीं ? जब प्रीतम ने यह पूछा  तो ये पलकें उनके सम्मुख अवनत हो गईं  | प्रीतम के अधर परागों के स्पर्श को प्राप्तकर कर्णफूल जैसे प्रफुल्लित हो उठे | लग्न उदयित हुवे तो ऐसे प्रीतम मिले हे सखी यह मेरा सौभाग्य है |



----- ॥ गीतिका ॥ -----
हरिहरि हरिअ पौढ़इयो, जी मोरे ललना को पलन में.,
बल बल भुज बलि जइयो, जी मोरे ललना को पलन में., 

बिढ़वन मंजुल मंजि मंजीरी, 
कुञ्ज निकुंजनु जइयो, जइयो जी मधुकरी केरे बन में..... 

बल बल बौरि घवरि बल्लीरी,
सुठि सुठि सँटियाँ लगइयो लगइयो जी छरहरी रसियन में.....

 पलने में परि पटिया पटीरी, 
बल बल बेलिया बनइयो बनइयो जी मोरे ललना के पलन में..... 

दए दए दसावन ओ री बधूरी , 
सुरभित गंध बसइयो बसइयो जी मोरे ललना के पलन में.....


हरिहरि हरिअ  = धीरे से 
हरुबरि = मंद-मंद 
बिढ़बन = संचय करने 
मंजि-मंजीरी = पुष्प गुच्छ, कोपलें पत्र इत्यादि 
मधुकरी केरे बन = भौंरो के वन में- मधुवन 
बल बल बौरि घवरि बल्लीरी =  आम के बौर से युक्त लतिकाएं । बढ़िया से गुम्फित कर 
पटिया पटीरी =चन्दन की पटनियाँ 
बल बल बेलिया = घुमावदार बेलियां 
दसावन = बिछावन 



हे रघुनन्दन असुर निकंदन औसर भए महि भार हरो | 
कहत सनकादि मुनि देव सब अब चरनास्तुति सकार करो || 
चरन अस्तुति सकार करो 

चले अवध सिय सों रघुराई । होंहि सगुन सुन्दर सुख दाई ॥ बैस जान भए गगन बिहंगे । सिंहासन मनि रचि बहु रंगे ॥ नखत नेमि नत पथ दरसाईं|| देखु देखु इँह सेतु बँधायो । हरष प्रभु जानकिहि दिखरायो ।। अह रामेसर दरसन दाईं ||


भोर भई चलो हरि दरसन को 


आई रे बरखा पवन हिंडोले,
छनिक छटा दै लट लग घूँघट लाल ललामि हिलोले
चमक चाँदनि सी छबि दरसै स्याम घना पट खोले
चरन धरे मन मानस उतरे राजत अधर कपोले
बरसै रे घन घन बादल से बैसे उड़न खटोले
दियरी सी निसि रिस रिस रीते प्रीति राज रस घोले
हरिदय भुवन मोल लियो बिन मोले

----- || राग -मेघमल्हार || -----
आई रे बरखा पवन हिंडोरे,
छनिक छटा दै घट लग घूँघट स्याम घना पट खोरे |
 छुद्र घंटिका कटि तट सोहे लाल ललामि हिलोरे ||
सजि नव सपत चाँद सी चमकत, लियो पियहि चितचोरे |
भयो अपलक पलक छबि दरसै लेइ हरिदै हिलोरे |
 परसि जूँ पिय त छम छम बोले पाँव परे रमझोरे |
दए भुज हारे रूप निहारे नैन सों नैनन जोरे ||
बूँद बूँद बन तन पै बरसे अधर सुधा रस घोरे |
नेह सनेह की झरी लगाए भिँज्यो रे मन मोरे ||
चरन धरे मन मानस उतरे राजत अधर कपोरे |
गगन सदन सुख सय्या साजी जलज झालरी झौंरे ||
सुहाग भरीं विभाबरि सोभा जो कछु कहौं सो थोरे |
नीझरि सी निसि रिस रिस रीते भयउ रे रतिगर थोरे ||



आई रे बरखा पवन हिंडोले,
जलज माल कल कंठ घरे पाउँ परे रमझोले
नद परबत उतरी
तरत परबत चरत पगडंडी  पग डगमग डोले
बरसै रे घन घन बादल से बैसे उड़न खटोले





 बैसे  बादल उड़न खटोले

घट = ह्रदय/कुम्भ/करधन पर आधारित कुम्भ
 ह्रदय = रीतिकाल
करधन = पौराणिक काल
लट लग घूँघट = आधुनिक काल      
आई रे बरखा पवन हिंडोरे ,
छनिक छटा दै लट लगि घूँघट स्याम घना पट खोरे
परन बेलि कू रसियन घारे हिलोले 
चमक चाँदनि सी छबि दरसै  पहिरे  पटोले
निसि रिस रिस रीते
 लट उपरागै कपोले
चम् चम् चमकत नाचि बिजुरिया पग गहि बुंदिया छम छम बोले
भीजे तन मन बरसै घन घन बैसे सावन उड़न खटोले
मनि मोतियन रोले

होइब जगत पाप पदासीन | करम बिनु सह धर्म उदासीन || 
नेम नियंतन सो बिनु बाँधे |  गाँठ न पूरे आँखिन आँधे || 

मरयादा न ताहि मन आवा | करिअ चहँ सो जोइ मन भावा || 



जिन हाथों के लोहमयी हल पर..,
चमकते प्रस्वेद कणों के बल पर..,
दसों दिशाएं ज्योतिर होती थीं..,
वो किसान कहो कौन थे..,


जिनके श्रम-बिंदु संच कर धरती.., 
कणिक-कणिका कनकमय करती..,
माणिक मुक्ता माल पिरोती थी..,
वो किसान कहो कौन थे .....