Friday, 24 May 2019

----- || दोहा -विंशी 2 || ----

बन में सिँह बहु रहि सकैं, तूनी में बहु बान |
दोइ खाँड़ा न रह सकै, कबहुँक एकै पिधान ||१ || 
भावार्थ : - वन में बहुतक सिंह रह सकते हैं तूणीर में बहुतक बाण रह सकते हैं, किन्तु एक पिधान में दो कृपाण एक साथ नहीं रह सकते | 
तात्पर्य : -विपरीत कृत्य करने वाले व्यक्ति एक साथ रह सकते हैं किन्तु दो विपरीत स्वभाव वाले व्यक्ति एक साथ नहीं सकते उनमें परस्पर विवाद अवश्य होता है | 

रुसे न ए बरस बदरिया रुसे नाहि रे मेह |
बूँद बूंद कहुँ तरसते तिलछत कस खन खेह || २ || 

भावार्थ : - इस वर्ष बदली न रूठे,मेघा न रूठे | बून्द बून्द को तरसते खेत-खंड देखो कैसे व्याकुल हैं | 

सोवैं खावैं पँख पसुहु  जनमत जीवहु सोए | 
ताते बिलगित कृत करै सो तो मानस होए || ३ || 
भावार्थ : - भोजन व् शयन यह दिनचर्या तो पशु-पक्षियों की भी होती है संतान को वह भी जन्म देते हैं | जो इससे पृथक कृत्य करे वस्तुत: वही मनुष्य है | 

साँच दया दान अरु तप मानस केरा धर्म | 
सब धर्मिन को चाहिये करतब सोई कर्म || ४ || 
भावार्थ : - सत्य भाषण, दयाभाव, दान क्रिया, त्यागाचरण यह मनुष्य का परम धर्म है सभी धार्मिक सुमदायों को चाहिए कि वह मनुष्य हेतु विहित कर्तव्यों में प्रवृत होकर सर्वप्रथम उक्त मनुष्योचित धर्म का पालन करें  तत्पश्चात अपने अपने धर्मगत सिद्धांतों एवं उनकी पद्धतियों का अनुशरण करे | 

दोइ नैया पाँव धरे लागे नही कगार |
डगमग डगमग दोल के बूढ़े सो मझधार || ५ || 
भावार्थ : - दो नाँव में पाँव रखने से वह तट को प्राप्त नहीं होती | असंतुलन के कारण वह डगमगा उठती है और स्वयं के साथ पारगामी को भी मझधार में डुबो देती है | 


सूखे सूखे नैन सब नदि झरने बिनु पानि | 
दुनिया तोरे ए निरदै  हरिदै केरि कहानि || ६ || 
भावार्थ : - नेत्रों में शुष्कता व्याप्त है नदी झरनों में भी पानी नहीं है |  ऐ दुनिया ! ये तेरे निर्दय हृदय की कहानी  हैं  | 

सब बनस्पति बिनसावै जीउ जंत हति जात | 
बन अस्थलि ए देस अजहुँ मरू अस्थलि दरसात || ७ || 
भावार्थ : - जीव जंतुओं की क्रूरता पूर्वक ह्त्या हो रही है, वनस्पतियां दिनोदिन नष्ट होती जा रही हैं | कभी वनस्थली रहा यह देश अब तो मरुस्थल दर्शित हो रहा है | 

सोइ दसा को दोष दए जोइ दसा का दास |
सो तो रीते घट सदा राखे कंठ पिपास || ८ || 
भावार्थ : - लक्ष्य प्राप्ति हेतु परिस्थतियाँ कभी बाधक नहीं होती,  परिस्थितियों को वही दोष देता है जो उनका दास होता है तथा अयोग्यता के कारण अप्राप्त लक्ष्य की अप्राप्ति का सदैव रोना रोता रहता है | 

नैन गगन दै गोरि काल घटा घन घोर रे |
बैस पवन खटौले चली कहौ किस ओर रे || ९ || 
दोहा : -
नैन गगन दे के गोरि काल घटा घन घोर |
बैस पवन करि पालकी चली कहौ किस ओर ||९ -ख || 

साँच दान दया अरु तप सो त परम हितकारि | 
काम कोह लोभु अरु मद मह अराति एहि चारि || १० | 
भावार्थ : - सत्य, दान, दया और त्यागतप ये मनुष्य के परम हितैषी है | काम क्रोध लोभ और मद ये चार उसके परमशत्रु हैं | 

केतक राजा राज गए गए केतिक धनबंत | 
जग के चाका थमै नहि आगत केहु गयंत || ११ || 
भावार्थ : - कितने ही राज चले गए, कितने राजा चले गए, कितने ही धनवंत चले गए | किसी के गमनागमन से इस जगत का कालचक्र स्थिर नहीं होता यह अनवरत संचालित रहता है || 
मारि खाए जौ  काटि के अजहूँ सो त  उदार | 
कट्टर पँथ कहलाइया जोई राखनहार || १२ || 
भावार्थ : - अधुनातन जो मारकाट कर खाने वाले हैं वह उदार कहलाते हैं जो प्राणिमात्र के प्राणों की रक्षा में संलग्न हैं वह कट्टर पंथी अर्थात मारकाट कर खाने वाले कहे जा रहे हैं | 

पहले राज खसोट जो लूट खूँद करि खाए | 
हमरे पुरखाइन कइँ अजहुँ लूट मचाए || १३ | 
भावार्थ : - जिन्होंने पहले देश की सत्ता व् सम्प्रभुता खसोट कर उसका आर्थिक शोषण किया |  अब इन्होने हमारे पूर्वजों की लूट मचा रखी हैं |  

लूट खूँद करि खाए के जोइ खसोटे राज | 
दरस दीनता आपुनी लूटन चले समाज || १४ || 
भावार्थ : - जिन्होंने पहले हमारे देश को लूटा फिर इसका शासन लूटा और शारीरिक यंत्रणाएं देकर उसका  आर्थिक शोषण किया | अब वह अपने समुदाय की सामाजिक दरिद्रता दूर करने के लिए हमारा सामाजिक शोषण करने पर तुले हैं 

 पराए स्वत बिरोधि  के तौ सौ राखनहार | 
बिरोधि आपन आपनौ वाके को रखबार || १५ || 
भावार्थ : - पराए स्वामित्व का विरोध करने वाले के सौ रक्षक होते हैं | अपने स्वत्व अथवा अस्तित्व हेतु अपना ही विरोध करे उसकी रक्षा कौन कर सकता है | 
तात्पर्य : - आप ब्राह्मण की रक्षा करते  हैं किन्तु बाह्मण अपनी रक्षा करने न दे तब फिर भला उसे कौन बचा पाएगा | 

सबहि देह हरिदै बसे सब हरिदय बसि साँस  |
पीरा होत सबन्हि कहुँ जिउ सब एकै सकास || १६ |
भावार्थ : -  सभी देह में ह्रदय का निवास है, सभी हृदय में सांस का निवास है | ईश्वर के बनाए सभी जीउ एक समान हैं क्योंकि पीड़ा और कष्ट सभी को होती है | 

देही सबहीं जिउ गहे रकत सबै  का लाल |
ताहि हत हिंस करे सो मानस जंत ब्याल || १७ ||
भावार्थ : - देह तो सभी जीव ने पाई है  रक्त तो सभी का लाल है | जो हिंसा कर इनकी ह्त्या करता  है वह मनुष्य मनुष्य न होकर हिंसक जंतु  है | 

पीरे पराए जीउ कहुँ खाए खिंच के खाल | 
मानस कहिता आपुनो रे तू जंतु ब्याल  || १८ || 
भावार्थ : - पराए जीव् को पीड़ा देता है उसकी खाल खिंच कर खाता है |  स्वयं को मनुष्य कहने वाला अरे  मनुष्य तू  मनुष्य न होकर हिंसक जंतु है | 
प्रान रखबारि आपुने  करिता बहुस बिधान | 
जिन कातर मुख बानि नहि लेवे वाके प्रान || १९ || 
भावार्थ : - रे मनुष्य ! अपने प्राणों  की रक्षा के लिए तो तू बहुतक विधान की रचना करता है | जिस निरीह के मुख में वाणी नहीं है उसके प्राण लेने पर उतारू रहता है | 

अपुना जी प्यारा बहु प्यारि अपुनी काय  | 
तब कहा होइ कोइ रे  मार तोहि जब खाए  || २० | 
भावार्थ : - अपनी काया बहुंत प्यारी है अपना जी तो बहुंत प्यारा है |सोचो तब क्या होएगा जब कोई तुझे मारकर खाएगा | 



Wednesday, 22 May 2019

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 14 ॥ -----

1.सहन-सहन सुलगती हुई सुर्ख़ शमा के जलवे..,
तश्ते-फ़लक पे रक़्स करती कहकशाँ के जलवे..,
शब्-ओ-शफ़क़ बखेर के निकलता है जब चाँद..,
देखते ही बनते हैं फिर तो आसमाँ के जलवे.....
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2..कहीं इशाअते-अख़बार हैं कहीं हाकिमों के तख़्ते हैं..,
शाह हम भी हैं अपने घर के क़लम हम भी रख्ते हैं.....
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3..बिक रहा ख़बर में हर अखबार आदमी..,  
ख़रीदे है सरकार, हो खबरदार आदमी..,
मालोमता पास है तो ही है वो असरदार..,
हो ग़रीबो-गुरबां तो है वो बेक़ार आदमी.....  
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4..सुर्खो-स्याह रु का बाज़ार हूँ मैं..,
सूरते-हाल से बेख़बर अख़बार हूँ मैं.... 
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5.. रिन्द-ए-रास्तों की ये अज़ब दास्ताँ है
काफ़िला बर्के-रफ़्ता औ रहबर न कोई
न कोई आबे-दरिया और तिश्ने-लब है
तिरे मरहलों पे आबे-दरिया न कोई

न रहमत न रिक़्क़त न दयानत की रस्में
इल्मो-इलाही से इसके रहले हैं खाली
न ख़िलक़त के ख़ालिक़ की ही इबादत
  ख़ातिरो-ख़िदमत न कोई

रिन्द = स्वच्छंद, निरंकुश, मनमाना आचरण करने वाला
काफ़िला बर्के-रफ़्ता = द्रुत गति से जानेवाला यात्रिसमूह
रहबर = पथप्रदर्शक
तेरे मरहलों के

न मरहला ही कोई गुजरे-गह पे इसकी
न मंजिल है उसका न रहमाँ ही कोई
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6..सफ़हा-ए-दिल तेरे..,
दरिया की लहरों पे..,
यादों की कश्ती की.,
अजीब दास्ताँ है ये.....

सहरों और शामों के
गिरह बंद दामन से
छूटते हुवे लम्हों की
अजीब दास्ताँ है ये.....

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7..कोई ख़्वाहिश नहीं कोई अरमाँ नहीं..,
कभी यूं भी सफ़र हम तो करते रहे..,
और बसर का कोई पास सामाँ नहीं..,
कभी यूं भी बसर हम तो करते रहे.....

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8..ज़श्न औ जलवा जलसा ज़रूरत से ज्यादा..,
जिंदगी क्या है तू इस हक़ीक़त से ज्यादा.., 
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9..मिटा लक़ीरें औरों की खुद फ़क़ीर बन गए.., 
ऐ दुन्या वो फ़क़ीर आज लक़ीर बन गए.....  

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10..जिसके ज़ीस्त-ए-जहाँ में रहमो-करम के मानी..,
वो इंसा फिर इंसा है जिसकी नज़रों में पानी.....
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11..रख्खें ग़र ईमाने-दिल सच कह दें तो गुनाह है
ये कौन सी दुन्या है ये कौन सा जहाँ है.....
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12..खिल के चमन में रंगो-खुशबु लुटाना है,
तू गुल है तुझे सदा मुस्कुराना है
ए शोला-ए-आफताब औ चॉंद सितारों सुनो,
तुम्हे बुलंदे-आस्माँ को सर पे उठाना है 
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13..तवारिख को स्यह तहजीब को बदरंग किए हुए,
मिरी मुल्के-मलिकियत को वो फरहंग किए हुए,
रहती है मिरे घर में मिरी गुलामियत अब तक,
गड़े मुर्दे उसके उसपे हैं मुझे तंग किए हुए...
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14..लावा से न लश्कर से तोप से न तीर से..,
ख़त्म हुई हकूमतें क़लम बंद शमशीर से..... 
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15..अपनी गुलामियत के हुक्म रानो का..,
मैँ दुश्मन अंग्रेजों का मुसलमानो का.....
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16..फक्र न कर अपनी गरीबो-गर्दवारी पर..,
लोग हँसते हैँ तिरी ईमानदारी पर..,

है पास दौलत तो है सल्तनत औ साहबी..,
है आबाद ज़महुरियत भी इसी रायशुमारी पर..,

इंसाफ पे पाबंदियाँ जबहे-जुल्म को आजादियाँ ..,
बजती हैँ तालियाँ य़ाँ रइय्यते-आज़ारी पर..,
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17..ढली शाम वो सुरमई, लगा बदन पे आग l
फिर रौशनी बखेरते, लो जल उठे चराग ll

चली बादे-गुलबहार, मुश्के बारो-माँद l
सहन सहन मुस्कराके निकल रहा वो चाँद ll

Monday, 20 May 2019

----- || दोहा-एकादश 16|| -----

बेद बिधि बिधानतस एक सनातन संविधान |
नेम नीति निरधार जौ दए जथारथ ग्यान ||
भावार्थ : - वेद वस्तुत: वैधानिक सिद्धांतों का प्रबंधन स्वरूप एक सनातन संविधान है जो नियम व् नीतियों का निर्धारण कर यथार्थ ज्ञान का प्रबोधन करते हैं |

टिप्पणी : - संविधान मनुष्य के लिए हैं मनुष्य संविधान के लिए नहीं एतएव यह परिवर्तनशील है | कोई संविधान कितने समय तक मान्य रहता है यह देखने वाली बात है |

नेमनीति एहि हेतु कर सुधित जो


Saturday, 18 May 2019

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 13 ॥ -----

दुन्या इक बाज़ारे-शौक़ है..,
ख़्वाहिशें-दराज़ हैं ख़रीदार उसकी..... 
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कहतें हैं जो सब रह दीन-धर्म सब मेरे.., 
उस क़ाफ़िले-क़दम का तमाशा भी देखिए.....
रह= राह,पंथ  
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उन दोनों की फ़ितरत एक जैसी थी..,
ये ऐसा था तो वो वैसी थी..,
पूछते हैं ग़ालिब अब दोनों कैसे हैं..,
बढ़िया ! ये ऐसा है न वो वैसी है.....  
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ऐ हुकूमतों होश करो के फिर क़लम के दीवाने.., 
अहले वतन की दीवानगी दिल में ले चले.....
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निकला फिर शान से  सुबह आफ़ताब.., 
सितारों की फ़ौज का सिपह आफ़ताब.., 
 हरिक स्याहपोश सतह को देके शह .., 
 करता हुवा तिरगी पै फ़तह आफ़ताब..... 

सिपह = सिपाही 
स्याहपोश सफ़हे = धरती के ऊपर की बुराइयाँ 
शह = ललकार 
तारीक़ी = अंधकार 

समंदर से उठते वो घटाओं के साए.., 
निगाहों में क़तरे बन के समाएँ..... 
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शोला-ओ-सुर्ख़रू आतश फ़शाँ है आफ़ताब.., 
सरे-बरहन नातवाँ  ज़ोर जवाँ है आफ़ताब..,
हाय कोई रगे-अब्र शमशीरे-बर्क़ लिए कहे..,
अच्छा ये बात है बताओ कहाँ है आफ़ताब.....     
शोला-ओ-सुर्ख़रू आतश फ़शाँ = ज्वलामुखी के अंगारों सा लाल हुवा 
सरे-बरहन  = बिना छत्र का सिर 
नातवाँ = निर्बल 
ज़ोर जवाँ = वीर बलवान 
रगे-अब्र = बादलों की धारी (बादलों की सेना )
शमशीरे-बर्क़ = बिजली की तलवार 
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फिर झूमते मेरी छत की मुँडेर से निकला चाँद.., 
लोग बोले आज तो बड़ी देर से निकला चाँद..... 

Friday, 17 May 2019

----- ॥पद्म-पद 34 ॥ -

 रे पलकन्हि पाँखि पखेरे, 
घनिघनि अलकनि पिंजर देई कन खाँवहि छिन छिन केरे..,

भोर भईं नभ उड़ि उड़ि जावैं सो उठिते मूँह अँधेरे ..,
पहरनन्हि के परधन पहरैं प्यारे पियहि को हेरें.., 

बैसत पुनि छत छत छाजन पै सुरति के मुतिया सकेरे..,
बिचरत बीथि बीथि थकि जावैं सिरु पावत घाउँ घनेरे.., 

तापर हेरी हेर न पावैं अरु केहि फेराए न फेरें.., 
ढरकत दिन अब निकसिहि चंदा रे हारि कहैं बहुतेरे..,

तबहि बियद गत होत बिहंगे बिहुर चरनन्हि निज डेरे.., 
आन बसे साँझी सपन सदन करि नैनन रैन बसेरे..,

फिर मौसमे-गुल खिल खिल के महके 
दरख्तों के शाख़सार नए मेहमानों से चहके 




Thursday, 16 May 2019

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 12 ॥ -----,

ऐ शबे-नीम ज़रा ख़्वाबों के कारिंदों से कहो..,
इन निग़ाहों को भी जऱ निग़ारी की जरुरत है.....
शबे-नीम = अर्धरात्रि
कारिंदों = सुनार
जऱ निग़ारी /= सोने का सुनहरा काम



बर्क़-ए-ताब-ओ-ऱगे-अब्र के क्या मानी है..,
ऐ निगाहे-नम तिरी ज़द क्यूँ पानी पानी है..... 
बर्क़-ए-ताब-ओ-ऱगे-अब्र = बिजली की चमक लिए बादलों की काली धारियां
मानी = अर्थ, आशय, मतलब
ज़द = पलक

क्या होता गर हम आसमानी परिंदे होते..,
बिला इल्म के मानिंद-ए-चरिन्दे होते..,
होते हम भी गर मसलहतों से ख़ाली..,
नीम सहाराओं के ज़ब्हे-कश दरिंदे होते.....
इल्म = ज्ञान, धर्म शास्त्र 
मस्लहत = विचार 
नीमसहरा = घनेजंगल 
जबहे-कश = हिंसक 

कभी रूहानी सी कभी सुहानी सी..,
जिंदगी इक मुश्ते-ख़ाके फ़ानी सी.., 
कभी नज़रों से बरसती बूंदों सी.., 
कभी बहते दरिया के पानी सी...... 
मुश्ते-ख़ाके फ़ानी =   क्षण में नष्ट होने वाली एक मुठ्ठी धूल 

शबे-गूँ-ओ-नीम स्याह फ़लक पे पुरनूर.., 
निकला है आज चाँद सुर्ख़े-रंग में डूब के..... 

मंजिल हो जाती है आसाँ जब कोई हम सफ़र हो 
ग़म ख़्वार अगर हो 
तारीके-शबे- स्याह में वो चराग़े-सहर हो 
क़दम-ब-क़दम उस रहे-ख़ुदा की हो रहबरी 
तरबियत से तर हो 
तफ़रक़ा-ए-अंदाज़ ताक़ पे रखा हो इक तरफ 
तफ़ावतें भी कुछ फासले पर हो 





Tuesday, 14 May 2019

----- ॥पद्म-पद ३३ ॥ -----

                             बुधवार, १५ मई, २०१९                          
-----|| राग-मल्हार || ----

बरखे घटा घनकारे नयन से.., 
घिर घिर आवैं सो पहिले सावन से..,  

पलकन कै सीपियन में मोतियन की बुँदिया..,
लटकत लड़ि पड़ते लट पड़ेउ अलकन से.., 

झरि झरि सो गालन के छाजन पै झूरैं.., 
घडी घडी झड़ी करत लपटे रे अधरन से.., 

चढ़ी चढ़ीवहि सो आँट पे परी परी के गाँठी..,
कंठ सहुँ उतरे रे रसि रसि के रसियन से.., 

निरखत रे छबि प्यारे प्रीतम पिया की.., 
प्रीति सहित मेलत हरिदय के दरपन से.....
--------------------------
 रे पलकन्हि पाँखि पखेरे 
घनिघनि अलकनि पिंजर देई कन खाँवहि छन छन केरे 

भोर भईं नभ उड़ि उड़ि जावैं सो उठिते मूँह अँधेरे 
पहरनन्हि के परधन पहरैं प्यारे पियहि को हेरें 

बैसत पुनि छत छत छाजन पै सुरति के मुतिया सकेरे 
बिचरत बीथि बीथि थकि जावैं सिरु पावत घाउँ घनेरे 

तापर हेरी हेर न पावैं अरु केहि फेराए न फेरें 
ढरकत दिन अब निकसिहि चंदा रे हारि कहैं बहुतेरे 

तबहि बियद गत होत बिहंगे बिहुर चरनन्हि निज डेरे 
आन बसे साँझी सपन सदन करि नैनन रैन बसेरे