Thursday, 20 May 2021

-----|| दोहा-विंशी 7 || -----

 ढली शाम वो सुरमई,लगा बदन पे आग | 

फिर रौशनी बखेरते लो जल उठे चराग़ || १ || 


चली बादे गुलबहार मुश्के बारो माँद | 

सहन सहन मुस्करा के निकल रहा वो चाँद || २|| 


मर्ज़ की शक़्ल लिये फिर क़ातिल है मुस्तैद | 

दरो बाम कफ़स किए फिर जिंदगी हुई क़ैद || ३ || 

कफ़स =पिंजड़ा 


ये महले मुअज्ज़म औ ये आलिशा मकान | 

नादाँ को मालुम नहीं दो दिन की है जान || ४ || 


सुन ऐ नादान तुझको है गर जान अज़ीज | 

चेहरे को हिज़ाब दे रह अपनी दहलीज़ || ५ || 


इधर मर्ज़े नामुराद और उधर तूफ़ान | 

ऐ नादा इन्सा तिरी मुश्किल में है जान || ६ || 


साहिलों पे बेख्याल दरिया करता मौज़ | 

पीछे हमला बोलती तूफानों की फ़ौज || ७ || 


बादे वारफ्तार वो तूफ़ां बे मक़सूद | 

सरो सब्ज़ दरख्तो दर हुवे नेस्तनाबूद || ८ || 


इक दिल इक जान इक सर और सौदे हज़ार | 

न दुआ पे यकीन अब न दवा का एतबार || ९ || 


इक तो ये फाँका कशी उसपे ये बीमारि | 

चार सूँ आह कू ब कू मुश्किल औ दुश्वारि || १० || 


देखि हमने जम्हुरियत तेरी रय्यत दारि | 

शहर शहर हर रह गुज़र दहशत औ बीमारि || ११ || 


कहीँ मरीज़े ग़म कहीं, दरिया औ तूफ़ान | 

कहीं गिरते जहाज़ पर, आफ़त में है जान || १२ || 


मरीज़े ग़म दरम्याँ आफ़त जदा जहान | 

आह पोशे निग़ाह में और लबों पे जान || १३ || 


सब बाज़ार बंद हैं खुला काला बज़ार | 

जमाख़ोर का ख़ूब याँ  चलता क़ारोबार || १४ || 


साहिल साहिल किश्तियाँ किश्ति किश्ति बादबाँ | 

दरिआ दरिआ नाख़ुदा लहरो लहर तूफाँ || १५ || 


है ये मुश्किल वक़्त पर नहीं हम फिक्र मंद | 

दिल है होशो हिम्मती औ हौसले बुलंद || १६ || 






-----|| दोहा-विंशी ६ || -----

जोड़ जोड़ करि होड़ मह जोड़ा लाख करोड़ | 

अंतकाल जब आ भया गया सबहि कछु छोड़ || १ || 


रोग संचारत चहुँ दिसि रोग सायिका नाहि |

करत गुहारि रोगारत जीवन साँसत माहि || २ || 


जिअ हनत ब्यापत महमारी | जन जन केरी करत संहारी || 

देस नगर कि बस्ती कि गांवाँ | गली गली पैसारत पावाँ || 

महमारी मह रूप धर करत सतत सँहार | 

हाथ धो रहे प्रान ते जन जन बिनु उपचार || ३ || 


रोग केरे कारन कहुँ पुरबल करौ अवसान | 

बहुरी कारज कीजिये तापुनि करौ निदान || ४ || 


रोगी औषध नाउ चढ़ सिंधु भई महमारि | 

काल रूपी तरंग उठै जबतब बारम्बारि || ५ || 


असाध ब्याधि ब्यापति नाही कोउ निदान || 

बिनु औषध जन जन केर साँसत मह हैं प्रान || ६ || 


करोना बिषानु भरी के चलि चुनाउ करि नाउ | 

काल नदी माझि  अहई बहुतहि बेगि बहाउ || ७ || 


काल न दरसे रैन दिन काल न दरसे भोर | 

काल न दरसे ठाउ को काल न दरसे ठोर || ८ || 


सम्बलपुरि गोठान मह मरत भूखि गौमात | 

निरदय निगम  ताहि सुखा तृनहहु हुँत तरसात || ९ || 


पबिताई बसे तहँ जहँ गौकुल करै निबास l
साजन सुचिता बसे जहँ पबिताई के बास ll १० ||
भावार्थ :- जहाँ गौवँश निवास करता है वहाँ पवित्रता का वास होता है l सज्जनो ! जहाँ पवित्रता का वास होता है
स्वच्छता भी वहीं निवास करती है

भोजन न को पाइ सकै सुचित होत संडास l
साजन सुचिता बसे तहँ जहँ पबिता कहुँ बास ll ११ ||
भावार्थ :- संडास के स्वच्छ होने पर भी वहाँ कोई भोजन नहीं करता l सज्जनो ! जहाँ पवित्रता का वास होता है स्वच्छता भी वहीं बसती है

साजन मोरे देस अब गाँव रहे नहि गाँव |
तुलसी बिनु भए आँगना नहि पीपल करि छाँव ||१२क ||

साजन मोरे देस अब,सुनी परी अमराइ |
कुहु कुहु करती कोयरी डारन सो अलगाइ || १२ख

साजन मोरे देस अब नहि हरिदय मह प्रीत |
सरगम बिहुने गीत भए सुर बिनु भा संगीत ||ग ||

पनघट भयउ नीर बिहुन भई नदी बिनु नाउ |
बिसरि कंठ सहुँ भैरवी बिसरा राग बिहाउ ||

रजस कन सों रत्नारा दरसावत दिग अंत |
पुहुप रथ बिराज कै आयो राज बसंत || १३ ||

क्यारि क्यारि कुसुम भए पथ पथ पुहुप पलास |
चहुँ पुर छटा बखेरते आयो फागुन मास || १ ४ ||


कटि तट घट मुख पट करी कहै गोपिका भोरि |
ए री सखि फागुन आयो कब आवेगी होरि || १५ ||

पाहन पाहन गह नखत, पाहन नदी पहार l
पाहन करिता धरति रे,पाहन सब संसार ll १६ ||
भावार्थ :- ये ग्रह नक्षत्र पाषाणमय है, नदी-पर्वत भी पाषाणमय ही हैँ, जीवन को धारण करने वाली धरती को भी पाषाणीय करता रे मनुष्य देख ! ये समस्त संसार पाषाण का ही है .

पाहन पाहन गह नखत, पाहन नदी पहार l
एकु धरति जी धरित्री न त, पाहन सब संसार ll १७ ||
भावार्थ :- ग्रह नक्षत्र में पाषाण ही पाषाण है, नदी-पर्वत में भी पाषाण ही पाषाण हैँ एक धरती जीवन को धारण करने वाली है अन्यथा तो समस्त संसार पाषाणीय है .

जहाँ कुलिनी कुलीन कर जहाँ कूल कुलवान l
जहाँ कुलीन कुल करतब, तहाँ दान कल्यान ll१८||
भावार्थ :- जहाँ नदी निर्मल व पवित्र करने वाली हो, जहाँ तट कुलवानो से युक्त हो जहां का कुल पुन्यकृत व विशुद्ध हो वहाँ दिया दान कल्याण करता है

सृष्टि के विध्वंश पर साधे हुवे है मौन |
प्रकृति से खेलता ये कहो समय है कौन || १९ ||

भ्रष्टाचारी घुटाला आतंकी उपजाए |
परजा तोरे तंत्र मह भया बिकाउ न्याय || २० ||




कटि तट घट मुख परि पट करी,कहै गोपिका भोरि ll
ए री सखि फागुन आयो, कब आवेगी होरि ll




Thursday, 26 March 2020

-----|| GYAAN-GANGAA || -----,

===> ''क्षुधा प्राणवान का प्रथम रोग है भोजन उसकी औषधि है.....'' 
===>'' उदर की अग्नि भोजन से शांत होती है धन से   नहीं.....''

Wednesday, 25 March 2020

----- || दोहा -विंशी 5 || ----

पसरा ब्यभिचार जबहि हिंसक भया अहार |
मानस निपजे रोग अस जाका नहि उपचार॥१ || 
भावार्थ:-- जब व्यभिचार अर्थात अनुचित यौन-संबंध ने पैर पसारे और आहार हिंसा जनित हो गया मानव ने ऐसे ऐसे रोगों को  जन्म दिया जिसका वर्तमान में कोई उपचार नहीं है | 

कुपथ्य सोंहि निपजायउ बिषानु भया बिलाए | 
जनमानस मूषक सरिस  डरपत गह भितराए ||२|| 
 भावार्थ: - कुपथ्य के कारणवश उपजा कोरोना नामक विषाणु बिलाऊ हो गया है और मानव जाति मूषक के जैसे भय के मारे घरों में दुबकी पड़ी है 

भया देस महँ महबंध, कारन रोग प्रसार |
सासन हर को चाहिये, खोलए अन भंडार॥३|| 
भावार्थ: - रोग प्रसारण के कारण देश में 'महाबंध’ घोषित हो गया अब सत्ता धारियों को चाहिए कि वह अन्न के भंडार खोल दे अन्यथा निर्धन जन मानस कोरोना से अधिक भूख के विषाणु(वायरस )से मर जाएगा | 



उड़ि उड़ि के धनी मानी लैहेंगे नव रोग |
गह कहुँ बँधना गार किए, बँधे रहेंगें लोग॥४|| 
भावार्थ:- घनाड्य व लब्ध प्रतिष्ठित वर्ग उड़ उड़ कर विदेश से नए नए रोग लाता रहेगा और सामान्य लोग इसके बचाव हेतु अपने घरों को कारावास किए बंधे पड़े रहेंगे क्यों-- ये लोकतंत्र है या बंधतंत्र ..... ? 

मेढक स्वान सर्प सहुँ भाखो मछरी माँस l
रोग ब्यापौ जगत महँ ,ताका नाउ बिकास ॥५|| 
भावार्थ :- कुत्ता बिल्ली सर्प मेढक मछली का माँस खाओ और समूचे जगत को रोगों से व्याप्त करो इसी को आधुनिक युग में विकास कहा गया - ----

 ताल थाल कंकनि संग बाजत जबहीं संख | 
साधौ रोगानु केरे, बिकसत नाही पंख ||६|| 
 भावार्थ : - सज्जनों !  हिन्दू धर्म के अनुयायियों की उपासना पद्धति में शंख ताल थाल व्  घंटिका  के प्रयोग  का एक वैज्ञानिक कारण है जब ये धातुमय वस्तुएँ निह्नादित होती है तब इनकी  ध्वनि तरंगों से आसपास के अदृश्य रोगाणु विकसित न होकर नष्ट हो जाते हैं | 


 चारि चरन पै धर्म जहँ धर्म रता जहँ लोगן
तहँ सब प्रानि सुखिहि रहैं तहँ न ब्यापत रोग ||७|| 
भावार्थ:- जहाँ धर्म अपने चार चरणों( सत्य,दया, दान, त्याग) पर स्थित होता है,जहाँ लोग धर्म निष्ठ होते है वहाँ सभी प्राणी सुख पूर्वक निवास करते है वहाँ कोई रोग व्याप्त नही होता----- 

भगवन केरि भारत पै किरपा भई अपार। 
दुरदिन महँ धन धान ते भरे पुरे भंडार ll८|| 
भावार्थ:- ईश्वर ने भारत पर असीम कृपा की दुर्दिनों में उसके भंडार को धन धान्य से परिपूर्ण किया हुआ है | 

पथ पथ जन ते सून भए, छाइ चहुँपुर साँति | 
बाकी गति बिधि के सँगत सकल कलेष क्लाँति ||९||  
भावार्थ : - पंथ पंथ  निर्जन हो गए चारों ओर शांति व्याप्त हो गई है  सिद्ध हुवा कि संसार की समस्त क्लेश क्लांति का कारण मानव व् उसकी गतिविधि ही है  |

जागा बहुरी जगत में छुआछूत का श्राप ।
आप करे तो धर्म है, आन करे तौ पाप॥१०|| 
भावार्थ:- संसार में छूआ छूत का श्राप पुनश्च जागृत हो चला है,यह छुआछूत यदि गणमान्य करें तो उत्तम जीवन चर्या है और अन्य कोई करे तो बुराई है | 

नेम किए जौ सुचिता हुँत साधु संत अवधूत ।
अजहुँ जग अपनाए रहा सोई छूआ छूत॥११|| 
भावार्थ:- वेदिक काल में ऋषि मुनियों ने स्वच्छता की अवधारणा कर जिस अस्पृश्यता के नियम का प्रादुर्भाव किया था, वर्तमान में वही नियम विश्व में जन - जन द्वारा अपनाया जा रहा है.....

भूखे को भोजन देउ, रु पिपासे को पानि | 
मतिहीन को दे मति प्रभु, मौन मुखी को बानि ||१२||  
भावार्थ : - हे प्रभु ! तू भूखे को भोजन दे प्यासे को पानी दे, मूर्खजनों को बुद्धि दे और मौन मुखी को वाणी दे। ..... नीतुसिंघल 


''क्षुधाप्राणवान का प्रथम रोग है भोजन उसकी औषधि है.....

महबँध कै नेम निबंध लखित  नहि संविधान |
तापर देस माही कस लागे ए बिधि बिधान ||१३||  
भावार्थ : - महाबन्ध अथवा लॉकडाउन का नियम निबंध भारत के संविधान की किसी धारा किसी अनुच्छेद में उल्लखित नहीं है तथापि यह विधान देश कैसे लागू हो गया ?

मानस तोरी क्रूरता तोरे अत्याचार |  
दरसत  तव हुँत आपने भगवन दिए पट ढार ||१४||  
भावार्थ : - हे मानव ! पशुओं पर तेरा अत्याचार, पाश्विकता की  परकाष्ठा को पार करने वाली तेरी क्रूरता को देखकर तेरे लिए ईश्वर ने अपने द्वार बंद कर दिए | 

तूलिका तुला माहि लिए सबद कछु साति ग्राम | 
सेर भर की रचना रचि,ले लिज्यो बिनु दाम || १ ५|| 
भावार्थ :- तूलिका रूपी तुला में कुछ सात ग्राम शब्द लिए तत्पश्चात उससे सेर भर की रचना रची इसका मूल्य नहीं है यह अमूल्य जिसेचाहिए 
वह मूल्य दिए बिना इसे ले ले | 

आस्था चारि धरम भृत नहीं पड़ौसी  लोग | 
एही कारन निपजायउ इहाँ छूत कर रोग || १६ || 
भावार्थ :--पड़ौसी देश चीन के लोग आस्था का आचरण करने वाले धर्म परायण नहीं हैं यही कारण है की वहां संक्रामक रोग व्युत्पन्न हुवा |  

त्राहि त्राहि पुकारि मरत जन जन रोग अधीन | 
हाथ ऊपर हाथ धरे बैसे सत्तासीन || १७ || 

 त्राहि त्राहि कर रोग सों जोए लोग दुहु हाथ | 
प्रभु सन्मुख बिनती करै पीर हरौ जगनाथ || १८ || 

बजै अतिगहन रन भेरि अदिरिस रिपुहु समूह | 
संहारत अति घनहि घन हारि जात जन जूह || १९ || 

रोग कारी बिषानु अह धरे रूप बिकराल | 
तासु पीरिता होइ कै जन जन मरत अकाल || २० || 




Sunday, 10 November 2019

----- || दोहा -विंशी 4 || ----,

जिउ हते न हिंसा करें देय ना केहि सूल | 
धर्म बरती रहत गहैं  साक पात फल फूल || १ || 
भावार्थ : - किसी जीव की हत्या करें न  किसी की हिंसा करें  ही किसी को कष्टापन्न करें  | हमें धर्मानुकल आचरण करते हुवे अपने आहार में  शाक पात फल फूल ही ग्रहण करना चाहिए   | 

अभेद नीति न जानिहै का कंचन का काँच | 
धौल कहा रु काल कहा कहा झूठ का साँच || २ || 
भावार्थ : - स्वर्ण क्या है और कांच क्या है धवला क्या है काला क्या है सत्य क्या असत्य क्या है,  अभेद नीति को यह ज्ञात नहीं होता  | 

काया तौ छिन भंगुरिहि एक दिन वाका अंत | 
सद कृत करम संग रहै जनम जनम परजंत || ३ || 
भावार्थ :- क्षण भंगुर इस  काया का एक दिन अंत होना निश्चित है किए गए उत्तम कर्म नित्य हैं जो जन्म जन्म तक साथ देते हैं | 

करै न कर सद करम को चलै न पद सद पंथ | 

रे कलि तेरो काल मैँ बँधे पड़े सद ग्रंथ || ४ ||
भावार्थ : - हस्त कोई सद्कर्म कर्म नहीं करते, चरण सत्पथ पर नहीं चलते अरे कलि ! तेरे काल में सद्ग्रन्थ बंधे पड़े रहते हैं इनका अध्ययन कोई नहीं करता | 

ए अनंत ब्रह्माण्ड महँ  रतिक नहीं परिमान | 
समुझै मानस मद भरा आपन पो भगवान् || ५ || 
भावार्थ : - इस अनंत ब्रह्माण्ड में अणु मात्र भी परिमाण नहीं है तथापि अहंकार से भरा मूर्ख मानव स्वयं को ईश्वर तक संज्ञापित करने लगा है 

कौसुम कर रस मधु अहै, पाहन कर रस पानि | 
देहि कर रस रुधिरु अहै, अनतस कर रस बानि || ६ || 
भावार्थ : - पुष्प का रस मधु है तो पाषाण का रस पानी है रक्त देह का रस है तो वाणी अंतस का रस है | 

खेलत होरि स्याम घन भीजत हैं सबु अंग | 
चढ़ बिनु उतरत ए री सखि फीके तोरे रंग || ७ || 
भावार्थ : - घनस्याम/काले बादल होली खेल रहे हैं और सभी अंग भीग रहे हैं, ए री सखी ! ये तेरे रंग फीके हैं जो चढ़े बिन उतरते ही चले जा रहे हैं || 

आज की कहावत :-
जाके पहि धन संपदा, अजहुँ सोइ गुनवान ॥
संपद न पूछौ साधु की पूछ लिजै ग्यान॥८ || 
भावार्थ : -जिसके पास धनसम्पत्ति है विद्यमान समय में वही गुणवान है इसलिए साधू संतो की सम्पदा मत पूछिए उनका ज्ञान पूछिए | 

रजस कन सों रतनारा,दरसावत दिग अंत | 
पुहुप रथ बिराज कै रे, आयो राज बसंग || ९ || 
भावार्थ : - धूल के रक्तिम कणों  से व्याप्त छितिज लालिमायुक्त दर्श रहा है अरे देखो !पुष्प रथ में विराजित हो ऋतु राज वसंत का आगमन हो रहा है | 

क्यारि क्यारि कुसुम भए पथ पथ पुहुप पलास | 
चहुँपुर छटा बिखेरिते, आयो फागुन मास || १० || 

पाहन पाहन गह नखत, पाहन नदी पहार | 
पाहन करिता धरति रे पाहन सब संसार || ११ || 
भावार्थ : - ये गृह नखत्र पाषाणमय हैं नदी पहाड़ भी पाषाणमय ही हैं, धरती को भी पाषाणीय करता रे मनुष्य ! समूचा संसार ही पाषाणमय है 

पाहन पाहन गह नखत, पाहन नदी पहार | 
एकु धरति जिअ धरित्री न त पाहन सब संसार || १२ || 
भावार्थ : - ये गृह नखत्र पाषाणमय हैं नदी पहाड़ भी पाषाणमय ही हैं, मात्र धरती जीवन धारण करनेवाली हैना अन्यथा तो समूचा संसार ही पाषाणमय है | 

जहाँ कुलिनी कुलीन कर जहाँ कूल कुलवान l
जहाँ कुलीन कुल करतब, तहाँ दान कल्यान ll १३ ||
भावार्थ :- जहाँ नदी निर्मल व पवित्र करने वाली हो, जहाँ तट कुलवानो से युक्त हो जहां का कुल पुन्यकृत व विशुद्ध हो वहाँ दिया दान कल्याण करता है |

सृष्टी के विध्वँश पर,साधे हुए है मौन l
प्रकृति से खेलता ये कहो समय है कौन ll१४||

घूटाला भ्रष्टाचारि,आतंकी उपजाए l
परजा तोरे तंत्र महँ,भया बिकाउ न्याय ll१५||
भावार्थ :-- घोटाला, भ्रष्टाचार और आतंक को जन्म दिया हे प्रजा ! तेरे तंत्र में न्याय भी बिकाऊ हो गया है |

हरिअर हरिअर पहुमि कहुँ, करि कै सत्यानास |
काँकरी कै बिकसे बन, ताका नाउ बिकास || १६ ||

नारी तोरी तीनि गति चतुरथी कोउ नाए l
पति पुत अरु बंधु बाँव सतजन दियो बताए ll१७ ||
भावार्थ :- संत जनो ने नारी की तीन ही गति बतलाई है प्रथम पति,दुजी पुत्र व तिजी बंधु-बांधव इसके अतिरिक्त उसकी चौथी कोई गति नही है यदि उसे पति त्याग दे तो वह पुत्र के पास रहे पुत्र त्याग दे तब वह बंधु बांधवों के पास रहे यदि बंधु-बांधव भी उसका परित्याग कर दे फिर तो उसकी दुर्गति होनी निश्चित है l

घन अँधेरा नगरि माहि,छाए रहा चहुँ ओर l
छूट रहै साहुकारा गहि गए सो तौ चोर ll१८||
छूट रहै साहुकारा गहि गए सो तौ चोर ll.....नीतू सिँ घल

हरिअर हरिअर भूमि कहुँ l करिके सत्यानास llकाँकरी के बन बिकसे lताका नाउ बिकास ll.....नीतु सिंघल

हरिअर हरिअर भूमि कहुँ l करिके सत्यानास llकाँकरी के बन बिकसे lताका नाउ बिकास ll.....नीतु सिंघल

हरिअर हरिअर भूमि कहुँ l करिके सत्यानास llकाँकरी के बन बिकसे lताका नाउ बिकास ll.....नीतु सिंघल




Tuesday, 22 October 2019

----- || दोहा -विंशी 3 || ----,

करम केरि पतवार नहि सीस पाप का भार | 
तोरि नाउ कस होएगी भव सागर ते पार | १ |
भावार्थ : - सद्कर्मों की पतवार नहीं है उसपर पापों का भार | रे मनुष्य ! तेरे जीवन की नैया इस संसार सागर से कैसे पार होगी | 

कहता सबते काल का चाका घुरमत जाए | 
जैसी करनी कारिये तैसो ही फल पाए || २ || 
भावार्थ : - काल का  चक्र घूमते हुवे सबसे कह रहा है ये मैने देखा है कि जो जैसी करनी करता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है | 

खूंटे बाँध कसाई के कान्हा तोरि गाय | 
आया द्वारे पाखँडि कापट भेष बनाए || ३ || 

भावार्थ : - हे कन्हाई तेरी गाय को कसाई के खूंटे बाँध कर अब कपट वेश धारण किए पाखंडी द्वार पर आ खड़ा हुवा | 

दास करता ए देस का पराया सो समुदाय | 
वाकी मलिनी संस्कृति ए भारत की नाए || ४ || 
भावार्थ : - यह पारा समुदाय इस देश का दासकर्ता है इसकी मलिन संस्कृति भारत की संस्कृति नहीं है |
 एहि भव सिंधु समान है माया जल के मान  | 
तीरे सो तो देउता डूबे सो पाषान || ५ || 
भावार्थ : - यह संसार सिंधु व् सांसारिक प्रपंच जल के समान है जो इन प्रपंचों में अनुरक्त रहा वह पाषाण कहलाया और जो तैर गया वह देवता कहलाया | 
कपोत कनका खाए के बैसे जबहि मुँडेर | 
बीट संगत निपजावै पीपर बट के पेड़ || ६  || 
भावार्थ : कपोत कनका खाकर जब  मुंडेर पर विराजित होते हैं वहां तब वह अपने बीट से पीपल व् वट का वृक्ष उपजाते हैं ( इनके द्वारा खाने  के पश्चात पीपल व् वट के बीज की एक  विशेष प्रक्रिया होतीहै तथा बीट से निष्कासित होने के पश्चात् ही यह उगते हैं  ) इस हेतु पक्षियों में कपोत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है |  

जुबता तपती दुपहरी बालपना परभात | 
ढरती बयस साँझ अहै मरनी कारी रात || ७ || 
भावार्थ : - बालकपन प्रभात के तुल्य है तो यौवनावस्था तपती दोपहर के समदृश्य है ढलती वृद्धवयस ढलती संध्या के तुल्य है तो मृत्यु काली रात्रि के सदृश्य जहाँ अंतत शयन करना है | 

साँझि भइ दीप मनोहर, धरे द्वारि द्वारि ।
मंदिर मंदिर सुमधुरिम, घंटिहि करत गुँजारि ॥ ८ || 
भावार्थ : - संध्या होते ही मनोहर दीपक द्वार द्वार पर स्थापित हो गए मंदिरों में घंटिकाएँ सुमधुरिम गूंज कर रही हैं | 

घनकत कारी बादरी, बजै गगन मै ढोल ।
कृष्णा कृष्णा बोल सखि, राधे राधे बोल ॥ ९ || 
भावार्थ : - काली घटा घनक रही है और  गगन में ढोल बज उठे हैं हे सखी ! कृष्ण कृष्ण बोलकर राधे राधे बोल | 

अँधन  को प्रभो ऑख दे, बहरे को दे कान।
गूँगे के मुख बोल दे, रू मूरख को ग्यान ॥ १० || 
भावार्थ : - हे प्रभु !अंधों को दृष्टि प्रदानकर बधिर को कर्ण प्रदानकर गूंगे के मुख को वाणी से युक्त कर और मूर्खों को ज्ञान प्रदान कर | 

जाम घोष उदघोषते, भई सुनहरी भोर ।
उतरे दिनकर अरुन सहुँ, गहे अस्व की डोर ॥११ || 
भावार्थ : - रात्रि के प्रहरी के उद्घोषणा करते ही सुनहरी भोर हो गई अश्व की रश्मियाँ ग्रहण किए दिनकर अपने सारथी अरुण के साथ धरती पर अवतरित हुवे  | 

बूँद बूँद मसि धानि भइ,कागद भए खन खेड़ ।
बिअ के आखर सोँ चलौ, लेखें पौधा पेड़ ॥१२ || 
भावार्थ : - मसि धानी बुँदे हो गई कागद खेत खंड हो चले हैं  चलो अक्षरों के बीज रोपकर हम उसपर पेड़पौधे लिखते हैं | 

नैन गगन परि छाए रे मोरा स्याम घना।
मृदुल मंद मुसुकाए रे मोरा स्याम घना॥१३ || 
भावार्थ : - मेरे श्यामघन नैन गगन पर आच्छादित हो रहे हैं और वह मृदुल मंद विहास करते हैं | 

र सौं राजा राम लिखे घ संगत घन स्याम ।
जबहिं कछु लेखै लिखनी,लेखै हरि का नाम ॥१४ || 
भावार्थ : - र से राजा राम लिखे घ से घनश्याम लिखे यह लेखनी जब भी कुछ लिखे तो केवल हरि का नाम लिखे 

तन बिनु दुखी कोई मन बिनु धन बिनु कोउ उदास ।
थोरे थोरे सब दुखी, सुखी राम का दास ॥१५ || 

दूषक जन कहनी कहैं,ऐसी मरनी होए ।

ओछी करनी करि चलें, और हँसे ना कोए ||१६ || 

सासन कर अधिकारु दए जहँ के सासन तंत्र ।
दास करिता बसाए रहँ, नहि सो देस सुतंत्र ॥१७ || 
भावार्थ:- जहाँ का शासन तंत्र अपने ही दासकर्ताओं को शासन का अधिकार देकर उन्हें वसवासित रखता है वह देश स्वतंत्र नहीं होता ।.....

लोक जाग जगरीति नहि होतब जहाँ सबेर |
घनियारि रैन रहे तहँ ब्यापत घन अँधेर || १८  ||
भावार्थ : - जहाँ लोक जागृति न हो जनमानस स्वकर्तव्य के विषय में सचेत न हों वहां स्वातंत्र का प्रभात होने पर भी नियम व् नीतियों का अभाव रूपी घना अन्धेरा व्याप्त करती दासता की काली रात्रि ही रहती है |

नियत नियंतन जोग हैं, नेम निबंधन सोए ।
बिधि सम्मत होई के, नीतिमान जो होए ॥१९-क  || 
जन हुँत पालन जोग हैं, नेम निबंधन सोए ।
बिधि सम्मत होई के, नीतिमान जो होए ॥१९-ख || 
भावार्थ :- " वही नियम-निबंधन नियंत्रण व निर्धारण के योग्य हैं जो विधि सम्मत होकर लोक-व्यवहार के निर्वाह हेतु नियत की गई नीति के अनुसार आचरण करने वाले हों....."
 " वही नियम-निबंधन जन-सामान्य द्वारा पालन योग्य हैं जो विधि सम्मत होकर लोक-व्यवहार के निर्वाह हेतु नियत की गई नीति के अनुसार आचरण करने वाले हों....."

उदाहणार्थ:- यदी राजा व नेता लोग यह नियम निर्धारित कर दें कि अब से कोई भोजन नहीं करेगा, जो करेगा वह 1सहस्त्र मुद्रा से दण्डित किया जाएगा । यह नियम दमनकारी व विधि के असम्मत होने के कारण जन-सामान्य द्वारा पालन योग्य नहीं है.....

दान करे न दया करें सत्कृत करे न कोइ | 
धर्म परायन जन अजहुँ  उदरपरायन होइ || २० || 
भावार्थ :- दया करते हैं न दान करते हैं न ही कोई सत्कर्म ही करते हैं, जो लोग कभी धार्मिक प्रयोजन में संलग्न रहते हैं वह अब केवल अपने उदर पूर्ति में संलग्न रहते हैं | 

Sunday, 29 September 2019

----- ॥ दोहा-पद 36॥ -----

  ----- || राग-मेघ मल्हार || -----


बहुर बहुर रे बावरि बरखा, री बहुरयो पावस मास रे,
बिहुरन अबरु बेर न कीज्यो,कहे तव बाबुला अगास रे ||

पिय कर नगरिहि पंथ जुहारै,नैनन्हि लाए थकि गै हारे,
लखत लखत पलकन्हि भइँ पाथर तोर आवन करि आस रे ||

जनम दात कइँ दहरि पराई, जग माहि असि रीति बिरचाई,
हँसि कहँ सखिआँ तिआ सुहावै बासत निज पियहि के बास रे ||

पलक माहि पलकनि भए पाँखी, अरु भैं पंखि उरे दिनु राती,
तोहि बिरमत भए बहु बेरिआ, अजहुँ बहुरो पिय के पास रे ||

भावार्थ : - अरी बावरी बरखा पावस मास लौट गया अब तुम भी लौट जाओ,तुम्हारे बाबुल आकाश कह रहें हैं -अब लौटने में और अधिक विलम्ब न करो || तुम्हारे आने की आस में तुम्हारे प्राणाधार की नगरी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है  पंथ देखते उसकी आँखें शिथिल हो गई और तुम्हारी प्रतीक्षा करते करते उसकी पलकें निश्चल सी हो गई हैं || जन्मदाता की देहली पराई होती है इस संसार ने ऐसी ही रीति बनाई है सखियाँ हंस कर कहती है - स्त्री अपने प्राणनाथ के गृह में निवास कराती हुई सुशोभित होती है || पलकों में पलक पंखों में परिणित हो गए रयान और दिवस पंक्षी बनकर उड़ गए (ऐसा ही होता है ) तुझे पिता के गृह में पधारे बहुंत समय हो गया अब तुम अपने प्रिय के पास लौट जाओ ||
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