Monday, 21 July 2025

----- ॥ दोहा-पद॥ -----,

 जो लिख दोइ बात कहें सो सब संत कहाए ।

करना है हम आपको जेतक जो करि जाए ॥१|| 

:- ये लिखी कही दो बातें सभी संतों की वाणी हैं हम और आप जितना जो हो सके उन्हें उतना करके अपने जीवन को कृतार्थ कर सकते...

को संत को बात कहे, कहे संत बत कोइ ।
कही बात हम कर सकै,जासों जेतक होइ ॥२|| 
:-- किसी संत ने कोई बात कही तो किसी संत ने कोई संतों के कहे इन सद्वचन का अधिकाधिक अनुशरण करके हम अपने जीवन को धन्य कर सकते हैं.....

जलम् अन्नम् सुभाषितम्, जो गहे नहिं प्रवाह ।
धरे ढके तिन राखिये, रहे करम के नाह ॥३|| 
:-- अक्षरों की तलवार जब शब्दों की धार धारण करती है तब वह अपने वारों और प्रहारों से जिसे चाहे उसे घाट उतारने में सक्षम होती है.....
:-- यदा अक्षरखड्गः शब्दानां धारं वहति तदा सः स्वस्य आक्रमणैः प्रहारैः च कस्यचित् वधं कर्तुं समर्थः भवति...

पहिले आपा जोग फिर,निज गह देस समाज । 
कही सुनि लिखा पढ़ी न त, होतब सबहि ब्याज॥४|| 
व्याज=छल, धोखा
:-- संत जनों का कहना है:सर्वप्रथम स्वयं का सुधार करके तत्पश्चात निज गृह को सुधारें तो देश समाज में स्वमेव सुधार होगा...

आखर की तलबारि जब धरे सबद की धारि । 
जो वारि प्रहारि सो जिन चाहे घाट उतारि॥५|| 
:-- अक्षरों की तलवार जब शब्दों की धार धारण करती है तब वह अपने वारों और प्रहारों से जिसे चाहे उसे घाट उतारने में सक्षम होती है.....

बड़े कपोले थाप दिए, छोटे दिए अपकारि।
साधौ जाए उपदेसिए, दूर दिरिस के द्वारि।।५|| 
:-- बड़ों के सम्मुख उपदेश कहो तो गालों पर थपकी देकर कहते अच्छा हमको उपदेश? तुम्हारे कान पकड़ कर हम ही लाते थे! छोटे इनकी अवहेलना कर देते हैं बेचारे सद्वचन भी क्या करें वह दूरदर्शन को कह देते हैं.....

जंगल ताके बाप का, जो हो सत्ताधीस ।
न मेरा न आपका यह, लोक तंत्र की रीस॥६|| 
:-- जंगल उसके बाप का है जो सत्ताधीश हैं.....जंगल मेरा न आपका.....वस्तुत:यह एक लोकतंत्र विरोधी विचार है.....- वनं तस्य पितुः यः शासकः अस्ति.....











----- ॥ दोहा-पद 38॥ -----,

 देस बिसराए निज ग्रन्थ निज को निज देशज की कही | 

पर रीत बरे बिसरे जो निज भू रज की रीत रही || 

रहिअ ताहिं सुरत सदा जो यदा कदा कहँ आन मही | 

देस कही कि को आन कही सोइ मानिए जोइ सही | 

:-  अपने देश अपने ग्रंथ अपने देश वंशियों के कथन विस्मृत हो चले हैं पराई परम्पराओं का वरण कर अपनी जन्म भूमि के रज की रीतियाँ तिरोहित हो गई किसी विषय विशेष पर केवल उन्हीं कथनों का  रीतियों का संस्मरण कहा जाता है जो निज मातृभूमि से अन्यथा यदा कदा कही व् निर्वहन की गई हों देश की हों अथवा देशांतर की, उपयुक्त कथनोक्तियाँ व  पारम्परिक रीति ही सर्वमान्य हों..... 


Sunday, 20 July 2025

----- || दोहा -विंशी १८ || ----,

 दृष्टीहीनं दीपं करतले जगदालोक्य न प्रतीतम् l 

तस् उद्यम विहीनं कर धनं लाभान्वित न ज्ञानम् ll

अँधे करतल दीप दहे दरसे ना जग आभ।

बिनु उद्यम कर धन गहे लहे न ज्ञान कर लाभ ॥१||  

:-- दृष्टीहीन को अपने करतल में प्रज्वलित दीपक से जगत का आलोक्य प्रतीत नही होता उसी प्रकार उद्यम हीन को भी अपने हस्तगत धन से ज्ञान का लाभ प्राप्त नही होता ।


अँधे करतल दीप धरे भए न भास कर भान।

बिनु श्रम बिनु उद्यम करे गहे न ज्ञान बिधान॥२||  

:-- दृष्टीहीन को करतल आधरित दीपक से प्रकाश का आभास नहीं होता उसी प्रकार उद्यम स्वरूपी दृष्टी से हीन मनुष्य को भी ज्ञान का विधान प्राप्त नही होता....  

कर= अवधि में का 
कर = हाथ, किरण ,करना, शुल्क

खाओ पीयो पहिरियो लेउ जगत को भोग ।
सेष ना लवलेष रहे कहे जोग जग जोग॥३|| 
:-- विश्वस्य जनान् एकीकृत्य भारतस्य योगः एतत् सन्देशं ददाति यत् जीवनं लौकिकसुखानां आनन्दाय, तेषु एतावत् आनन्दाय च अभिप्रेतम् यत् भविष्यत्पुस्तकानां कृते किञ्चित् अपि न अवशिष्यते।
:-- विश्वजनों को योजित कर भारत का योगयह सन्देश दे रहा है कि जीवन भव भोगों का उपभोग करने के लिए है इतना उपभोग हो कि आगामी पीढ़ियों के लिए लेशमात्र भी कुछ शेष न रहे..... 

नहि बीर सो सबद बान जोइ चलावै तीर |  
रन आँगन में बोलता सोइ कहावै बीर ||४||  
:-- युद्धं न वचनबाणप्रहारेन जितं भवति, केवलं रणक्षेत्रे वदन् एव शूरः
:-- शब्द बाण चलाने भर से लड़ाई जीती नहीं जाती जो समरांगण में बोलें वीर वही होता है

छाए सघन घन देवता गाए अस्तुति प्रसंस l 
जय जय जय रघुबंस मनि,जय रबि कुल औतंस॥५|| 
: - - इंद्रदेव: सघनरूपेण आवृतः श्रीरामस्य स्तुतिं गायति ----रघुवंशस्य मणि रविकुलस्य पुरुषोत्तम जय ते....!!!
 : - -इन्द्र देव सघन रूप में आच्छादित हो श्री राम की प्रशंसा स्तुति का गान कर रहें है - - हे रघुवंश के मणि स्वरुप हे रवि कुल के पुरुषोत्तम आपकी जय हो ... . . !!!

बिआ बिनसाए आपुना बोए रहे उद्योग | 
बोए बिआ नभ देखिआ चढ़े जगत के लोग ||६||  
: -- उद्योगानां विकासेन स्वस्य उर्वरभूमिं नष्टं कृतवन्तः पृथिव्याः जनाः अन्तरिक्षं गतानां बीजानां अंकुरणस्य परीक्षणं कुर्वन्ति...
: -- उद्योग उपजाकर अपनी उपजाऊ भूमि को विनष्ट किए पृथ्वी के लोगअंतरिक्ष में चढ़े बीजों के अंकुरण का परिक्षण कर रहे हैं....  

दरस महि की सत्ता पर निर्बुध का अधिकार | 
अधुनै पर उपहाँसेगा एक दिन होवनिहार ||७||  
:--पृथिव्यां मूर्खतायाः अधिकारं लक्ष्यं कृत्वा एकस्मिन् दिने भविष्यस्य अस्तित्वस्य उपहासं करिष्यति.....

: -- पृथ्वी की सत्ता पर मूर्खता का अधिकार लक्षित कर एक समय भावी विद्यमान का उपहास करेगा 
पृथिव्यां मूर्खतायाः अधिकारं लक्ष्यं कृत्वा एकस्मिन् दिने भविष्यस्य अस्तित्वस्य उपहासं करिष्यति.... 

दूषन गुन दोनउ बसे, सबद सिंधु के कोष। 
कोई पावै मनि रतन,को निकसावै दोष ॥८||  
:--शब्दाब्धिकोषे गुणदोषौ निवसतः;केचित् तस्मिन् बहुमूल्यानि रत्नानि प्राप्नुवन्ति,केचन तु दुष्टानि निष्कासयन्ति ।
:--शब्द सिन्धु के कोष में गुणदोष दोनों का वास होता है किन्तु कोई उसमें मणि रत्न प्राप्त कर लेता है तो कोई दोष निष्काषित करता है ।

 दैदिप धरती गगन भए,दैदिप केत निकेत। 
प्रबसे राम निज मंदिर,दैदिप भयो साकेत ।।९|| 
:-- पृथिवी आकाशं च प्रकाशितं जातम्, प्रत्येकं धाम उज्ज्वलं जातम्, श्रीरामः स्वस्य शुभं धामं प्रविष्टमात्रेण साकेत एव उज्ज्वलः अभवत्।
:-- अवनि अम्बर दैदीप्त हुवे केत निकेत दैदीप्य हुवे ज्यों ही भगवान श्री राम अपने मंगलायल में प्रविष्ट हुवे  त्यों ही साकेत बह दैदीप्यमान हो उठा  

खेत कमाया खेतिहर पाया मन बिसराम l 
किसलय कन की कोँपलैँ जहँ तहँ बरसे राम॥१०|| 
:- - कृषि कार्य से निवृत होकर कृषक का मन मेंसंतोष व्याप्त है कारण कि स्थान स्थान पर उत्तम वर्षा होने से कणों की कोंपलें नव पल्लव को प्राप्त है . . . . .
खेत कमाना = कृषिकर्मखेतिहर...

को कह कही कहाइ बत,को कह सुनि सुनाइ ।
कहा सुनि को त्याज के, दरस लेव तहँ जाइ ॥११|| 
:- - जब कोई कहता है ये कही कहाई बातें है कोई कहता है ये सुनी सुनाई बातें हैं अर्थात इनमें सत्यता नहीं है इस कहा सुनि को त्याग कर सत्यता का प्रत्यक्ष परिक्षण उत्तम होता है.....

प्रियतम पिय की प्रीति सो काल कबित की रीत l 
प्रेम भाव भगवन सोहि जोइ भक्ति के गीत ll१२|| 
:-- प्रियतम प्रिय के प्रति की प्रीति पर रचित काव्य रीति काल कहलाता है जब यही प्रेम भाव भगवान के प्रति हो तब वह गीतिका काव्य भक्ति काल कहलाता है.....

मधुरिम बोल बचन छनहि जुग के जोग जुगाए l 
कटु कथन जुग जोग लगन देय पलक बिलगाए ll१३क|| 
:-- मुखात् उक्ताः मधुरवचनाः क्षणमात्रेण अनेकजन्मसंबन्धं स्थापयन्ति, यदा तु कटुशब्दाः क्षणमात्रेण अनेकजन्मसंबन्धं भङ्गयितुं समर्थाः भवन्ति
:-- मुख से कहे मधुर वचन क्षण में जन्म-जन्म के संयोग स्थापित कर देते हैं वहीं कड़वे वचन जन्म जन्म के  संयोगों को क्षण में विभंजित करने में सक्षम होते हैं

काठ कठिन कोटिक कथन कोटि कटुक कड़ुवारि।
बोलत दोइ मधुर बचन पल में दे नेवारि ॥१४ख|| 
:--मुखात् उक्तौ मधुरौ शब्दौ तत्क्षणमेव कोटि-कोटि-कठोर-कटुतायाः कारणात् अत्यन्तं कटुतां, कटुतां च दूरीकर्तुं शक्नुवन्ति; तानि वचनानि "क्षमस्व मां..." इति।
:--मुख से कहे गए दो मधुर वचन कोटिशः कठिन कठोर कथन से उपजी अतिशय कटुता व कड़वाहट का एक पल निवारण कर देते हैं वह शब्द हैं " मुझे क्षमा कर दो... .. "

तहाँ प्रीति न बैठ सके जहां ऐंठ की पैंठ ।
जहाँ ऐंठ न पैंठ सके प्रीत जाइ तहँ बैठ ॥१५ग|| 
:-- यत्र अहङ्कारः वर्तते, तत्र प्रेम न वसति, यत्र अहङ्कारः न प्रविशति, तत्र प्रेम सर्वदा वसति...
:-- जहाँ अहंकार प्रविष्ट रहता है वहां प्रीति विराजित नही होती, जहाँ अहंकार का प्रवेश नहीं होता वहाँ प्रीति सदैव विराजमान रहती है... ..

दंश दंभ दल दरप कल लए भरोस अवसोष ।
ता पुनि प्रीति प्रेम भाव दूरावै दुइ कोस ॥१५घ|| 
:-- दम्भ-दंश-अभिमान-पूरितः शब्दसमूहः प्रत्ययं अवशोषयति; प्रेमस्य स्नेहस्य च भावः एतत् अविश्वासं अत्यन्तं दूरं करोति...
:-- दंभ,दंश दर्प भरे वचनों का दल प्रतीति का अवशोषण कर लेते हैं प्रीति प्रेम का भाव इस अविश्वास को सर्वथा दूर कर देता है... . .

भाषा संस्कृति से है भारत देस समृद्ध | 
विचारों की संकुलता से पश्चिम है दारिद्र ||१६|| 
:-- भारतं भाषासंस्कृतेः दृष्ट्या समृद्धः देशः अस्ति, यदा तु पाश्चात्त्यदेशाः विचाराणां पूर्णतायाः दृष्ट्या अद्यापि दरिद्राः सन्ति।
:-- भाषा व् संस्कृति से भारत एक समृद्ध देश है विचारों की परिपूर्णता से पश्चिमी देश अभी दरिद्र है

बिआ बिनसाए आपुना बोए रहे उद्योग | 
बोए बिआ नभ देखिआ चढ़े जगत के लोग ||१७क|| 
: - उद्योग उपजाकर अपनी उपजाऊभूमि को विनष्ट किए पृथ्वी के लोगअंतरिक्ष में चढ़े बीजों के अंकुरण का परिक्षण कर रहे हैं....
: -- उद्योगानां विकासेन स्वस्य उर्वरभूमिं नष्टं कृतवन्तः पृथिव्याः जनाः अन्तरिक्षं गतानां बीजानां अंकुरणस्य परीक्षणं कुर्वन्ति...

दरस महि की सत्ता पर,निर्बुध काअधिकार |
अधुनातन पर हाँसेगा एक दिन होवनिहार ||१७ख||
 : -- पृथ्वी की सत्ता पर मूर्खता का अधिकार लक्षित कर एक समय भावी विद्यमान का उपहास करेगा.....

: -- पृथिव्यां मूर्खतायाः शक्तिं लक्ष्यं कृत्वा एकस्मिन् दिने भविष्यस्य वर्तमानस्य उपहासः भविष्यति...

दिपित दिपित दृक दिसा दस दैदीप दिवस मान ।
पूरबाहन बहुर चला चरन धरा मध्यान ॥१८|| 
:-- दिवसमान के दैदीप्य से दसों दिशाओं को दीप्तवान दर्शकर पूर्वाह्न ने निर्गमन किया और मध्यान का 
पदार्पण हुआ... . .:-- दिनस्य तेजसा दशदिशाः सर्वान् प्रकाशयन् प्रभातोऽभवत्, मध्याह्नश्च आगतः ... ...

नील गगन स्याम भयो छाइ घटा घन घोर ।
भरम भरे समुझ न परे, ए साँझि अहै कि भोर॥१९|| 
: - - घनघोर घटा केआच्छादन से नील गगन श्याम वर्णं हो गया है यह संध्याकाल है अथवा प्रभातकाल, ये भ्रमवश ज्ञात नहीं होता....
: - - स्थूलमेघानां आच्छादनात् नीलगगनं कृष्णं जातम्। न ज्ञायते सन्ध्या उत प्रभात इति भ्रमात्.....

घर घर घुसपैठिये गए,भर पश्चिम बंगाल |
सासन हर को चाहिए लगाए,आपद काल ll२०|| 
:--पश्चिमबङ्गस्य प्रत्येकं गृहं घुसपैठिभिः पूरितम् अस्ति, सत्ताधारी दलेन तत्र आपत्कालः आरोपणीयः.....









Wednesday, 16 July 2025

----- ॥ दोहा-पद 37॥ -----,

धृर्त कृत सद चरित सौं करिआ जबहि बिहार |

उड़त धूर ते धूसरित होत तब संस्कार || 

:--वंचक व कुचरित्र जब सद्चरित्रों के संग विचरण करते हैं तब इस विचरण से उड़ते धूल रूपी कुविचारों के प्रभाव से संस्कार धुंधले होते चले जाते हैं 

अजहुँ भयउ भंड भंडरिए  भाँडन की भरमार |

ता सोंहि संस्कारि गुन पड़िआ जाइ भँगार || 

:-- वर्तमान में निर्लज्ज अनिष्ट की व्यंजना करने वाले उपद्रवियों की बहुलता हो गई है जिनके द्वारा संस्कारों से प्राप्य सद्गुणों का निकृष्ट वस्तु के रूप में पतन हो रहा है 

अपवचन सन दुर्वादन  हृदय के उदगार | 

अंतर की दुर्वासना तासों करत बहार || 

:-- अपशब्द के सह कुत्सित वाक्य ह्रदय के उद्गार स्वरूप होते हैं जिनके माध्यम से अंतर की कुप्रवृत्ति बहिर्गत होती  हैं | 

दुर्बचन एहि दुर्बादन कहत बुराई नाह | 

जबहि हँसी बिनोद करत  रीति रूप निरबाह ||

: - -ये अपशब्दों व दुर्वाद तब निंदनीय नहीं होते जब यह हंसी विनोद स्वरूप पारम्परिक रीतियों के निर्वहन हेतु होते हैं | 

पढ़िए तुलसी मानस में दुर्बादन की रीत | 

सामध सबंधी संगत तासों गाढ़े प्रीत || 

: - - गोस्वामी तुलसी दास रचित रामचरित्र मानस में इस दुर्वादन की मधुर रीति का वर्णन है यह समधीयों के परस्पर संबंधों की प्रगाढ़ता हेतु इस परम्परगत रीत का प्रयोग होता आया है 

जेँवत जेँउनार जौँ जौँ धर मुख सौंधी सोंठ | 

पुर नारि उदगारि गान  करत सजन के गोंठ || 

:--प्रीति भोज्य ग्रहण करते व सुगंध सौंठ इत्यादि मुखोधार्य करते ज्यों ज्यों सज्जन गोष्ठी की रीत परिपूरित  होती है त्यों त्यों पुर की नारियों द्वारा सज्जनों के विनोद स्वरूप उद्गारों का गान किया जाता है | 

कब किया जाता है ये तो पता नहीं............  यही तो रामायण है..... जिसे जानना है वो सुन लें..... 





"साहित्य वही है जिसे पीढ़ियां पढ़ें अन्यथा तो वह पुस्तकालयों में धूल धूसरित होते पृष्ठों का पुला है....."

Monday, 14 July 2025

----- ॥ दोहा-पद 37॥ -----,

 अधुनै भारत बंसि का जातिअ धर्म समाज | 

अर्थाधारित होइ रहा तीनि बरग में भ्राज ||  

: -- विद्यमान भारत वंशियों का जातिक व धार्मिक समाज आर्थिक आधार पर त्रयवर्ग  स्वरूप में सुशोभित हो रहा है | 

मध्यम ऊँच अबराबर तीन बरन तिन जान | 

सुखद दंपति जीवन ते मध्यम अति सुखवान ||

: - उन्हें उत्तम मध्यम व् अन्य यह तीन वर्ण में संज्ञानना चाहिए इनमें मध्यम वर्ग सुखद दाम्पत्य जीवन सूत्र को धारण सर्वाधिक सुखी व् प्रसन्न है 


सुखद दम्पति सामाजिक जीवन का आधार | 

ऊँचे अबर दुख पाँवहि ता सुख को परिहार || 

:-- वस्तुत: सुखद दाम्पत्य का जीवन सूत्र किसी समाज का आधार स्वरूप है आर्थिक रूप से उत्तम व् अन्य वर्ग इस सुख का परित्याग कर दुःख को प्राप्त हो रहे हैं.....  

सुखद दम्पति जीवन को ऊँचे बिरथा मान | 

भोग उपभोग भूरिसह कह भव भूति प्रधान || 

:-- सुखद दाम्पत्य जीवन को व्यर्थ मानकर आर्थिक रूप से संपन्न उच्च वर्ग द्वारा कहा जाता कि संसार के भोगों के  अधिकाधिक उपभोग में जीवन की सार्थकता है 

जीवन में धन सम्पदा सुख कर मान अधान |

तासहुँ इर्षा करत सो  बरन आन सुखवान || 

: -- जीवन में धनसम्पति को सुख का आधार मानकर यह जब तब  उन अन्यान्य वर्गों के सुखमय जीवन से इर्षा करता है 

दुपहिया भी मध्यम वर्ग के जीवन का आनंद स्वरूप हैकिन्तु यह वर्ग इस सुख से अनभिज्ञ है मध्यम वर्गीय जीवन के इस आनंद से प्राय: लब्धप्रतिष्ठित वर्ग कुढ़ता व् इर्षा करता दर्शित होता है 

मध्यम वर्ग के इस आनंददायी दृश्य को दर्शाती यह रचना है जो "जादू भरी तेरी आँखें"भजन की लय पर राग दरबार पर आधारित है.....


फुर फुर करतीँ रे चली दुपहिआ...
(सखि)लागहि पिय को भली दुपहिआ.....

कास पकड़ जब उनके गाछे l लाए हिया हम बैंठे पाछे ll 
गाल फुलाए मुख लेय मोड़े l सौतनिया सी जली दुपहिआ ll

जोइ पिया भैं कृष्ण कन्हया ।हम राधे बनि गहि गल बहियाँ ॥
करत बतइँया चित चौँरएँ तो । गोपियन सी मचली दुपहिआ ॥

रूसत ठाढ़े जब मन आवै । मनवावै बन बन बिगरावै l 
छुई मुई हम सोही ऐसी l नही दुबरी पतली दुपहिआ ॥

एक दिन पिय सों ए पूछ बुझाए। किन्ह कारन तुम ओहि पतियाए ll
हम को पता ए ऐसी तो नाए । है मिसरिन की डली दुपहिया ॥

तुमको पल महि छिन लए दौड़े l तिनका तोड़े छन नहि छोड़े ll 
कहो तो पिया है का काची l कचनारन की कली दुपहिआ ll

भइँ गौरँगनी बलि बलि हारी । सो कलि हारी मन करि कारी।
न जाने सखि कवन भवनन मैँ । तिन्ह संग रँग रँगरली दुपहिआ ॥

फिर एक दिन

निरखो ए नव नवली दुपहिया... 
हमने ली चमकिली दुपहिआ.....

है ये सौतनिआ की जाई।ओहि केहि सों गई पराई ॥
हँसि कह पिय हमरे ललन की ।और लली कीअली दुपहिआ॥













 

Saturday, 12 July 2025

----- || दोहा -विंशी १७ || ----

अधिकाधिक संचाए धन तैसे बिरथा जाए l  
जैसे मधुकर कोष कृत माधुर दूजा पाए ll१|| 
 :-- अधिकाधिक संचित धन उसी प्रकार व्यर्थ जाता है जिस प्रकार मधुकर द्वारा कोष कृत माधुर्य अन्यान्य प्राप्त करता है..... 

अधुनातन जुबा संगति औगुन का भंडार l 
ता भंडारा भोगये सद्गुन भोज बिसार ll२||  
:--आधुनिक युवाओं की संगति अवगुणों का भंडार है सत्गुण के भोज का तिरष्कार कर ये अवगुणों के भंडारे का ही भोग करते हैं..... 

चालीस पंच पचासिए भए गदहे पच्चीस l 
जोय गदहे पच्चीसे ताकि नही बत्तीस ll३||  
:-- चालीस पांच पचास के भी गधे पच्चीसे अर्थात 16से पच्चीस की अवस्था के बुद्धि हीन व प्रज्ञारहित वाले हो गए हैं जो गधे पच्चीस हैं उनके तो अभी बत्तीसी ही नहीं उगी है..... 

छेना छाछी छहो रस, छन छिन छिन कै खाएँ l 
मुख सौंह एकहु बार परि, निकसत नाहि न गाए ll४||  
:-- छेना छाछ जैसे दुग्ध जनित छहों रसों को यह क्षण में छिन छिन कर पा लेते हैं किंतु इनकी जनिति गौ माता का नाम तक इनके मुख से नहीं निकलता..... 

छेना छाछ माखन घिउ चाहे सबही पाए l 
ताकी जनिती गौ मात चाहिब कोई नाए ll५||  
:-- छेना छाछी माखन घिव तो सभी को चाहिए किंतु उसे व्युत्पन्न करने वाली गौमाता किसी को नहीं चाहिए.....

सुभाउतस नियत सरूप,तुअ कृतु करतब कारि । 
अकरमन ते करम परम, सुनहु गाँडीउ धारि ॥६||  
:-- हे गांडीव धारी अर्जुन सुनो ! तुम स्वभावतस् नियत स्वरूप कर्त्तव्य कर्म करो क्योंकि अकर्मण्य से कर्मण्य श्रेष्ठ होता है..... 

पाञ्चजन्यधारि कहत होतब सिद्धहु नाह । 
कृत कारज अकारज ते तव बिगरह निरबाह ॥७|| 
 :--पाञ्चजन्य धारी श्री कृष्ण कहते हैं कर्तव्य कर्म न करने से तुम्हारी शरीर यात्रा भी सिद्ध नहीं होगी..... 

धनु धुरंधर धर्म राज धीरज धर्म धुरीन l 
तेऊ काल कबलित भए जाके तात ए तीन ll८|| 
 :-- धनुर्धुरंधर अर्जुन धर्मराज युधिष्ठिर व धैर्य धर्म के धुरी को धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण जिनके पितृ पुरुष थे उन्हें भी काल कवलित हुवे फिर साधारण का तो कहना ही क्या है..... 

लोभ लाभ अरु परिलबध लाखे ऊंच न नीच l 
लाखी गहे गौमल ते गहे कमल कर कीच ll९||  
:-- लोभ लाभ और परिलब्धियाँ ऊँच- नीच का विचार नहीं करते, ये गौमय जैसे उच्च स्थान से लक्ष्मी तो कीचड़ जैसे निम्न स्थान से कमल प्राप्त कर लेते हैं । 

गरल रिपु कि बाल बयस कि अपावनी अस्थान l 
सदगुन सद्गुरु सदधर्म सुरसरि सरिस समान ll१०||  
:-- विष हो कि शत्रु हो या बाल्यवय हो अथवा कोई अपावन स्थान ही क्यों न हो, सद्गुरु,सद्वचन या उत्तम नियम व न्याय गंगा के सदृश्य सभी स्थानों पर समान महत्वता धारण करते हैं 
सद्‌धर्म= उत्तम नियम व न्याय 

भावाभावा भलाभल दुख सुख भोगाभोग l 
ते सरिस सब काल जिन्ह, धीमन कहाए जोग ll११||  
:-- वह व्यक्ति प्रज्ञावान कहलाने के योग्य है जिसे भोग-अभोग, भाव-अभाव, भल-अनभल,sुख-दुःख जैसे कारक सभी काल में तुल्य प्रतीत होते हों.....

देख ऊँची उड़ान, आशा के पतंगों की |
ये मन में ले ठान, तपेदिक हार मानेगा || 
सही हो खान पान, सही जीवन चर्या हो|
ये मन में ले ठान,तपेदिक हार मानेगा ll१२|| 


माणिक मुक्ता रतन जड़ि स्वर्णमई द्वारि l
पचि कोरि कुसुम अहिबेलि,बँधेउ बँदनबारि ll१३|| 
:--मुक्तामणियों जैसे रत्नों से जड़ित भगवान की हिरण्यमई द्वार है जिसपर पच्चीकारी किए हुए पुष्प एवं पान की बेलों का बँदनवार बँधाहै ...

नेता मंत्री के संग लब्धनाम  के ठाट | 
चहुँपुर अँधेरिआ,चौपट भयो कपाट ||१४||  
:-- नेता मंत्रियों के साथ ख्यातिलब्धों के ठाट बाट देखते ही बनते हैं देश में नीति नियमों का अभावतस स्वेच्छाचारिता चरम पर है  सीमाएं द्वार हीन होकर चौपट हो गईं हैं यही लोकतंत्र है तो नहीं चाहिए ऐसा लोकतंत्र  

फिरत प्रधान देस देस बहुर देस तस आए | 
प्रात के भूरे पाँखिन जैसे साँझि बहुराए ||१५|| 
:-- दिनों का अवसान होते देख कर जन जन की दृष्टियां प्रतीक्षा में हैं कि अब यह दिन कब फिरेंगे, किन्तु विमान में बैठे फिर रहे देश के प्रधानमन्त्री लौटते ही नहीं| 

दरस होतअवसान दिग दरसे कब दिन फिरै |
बैसे फिरत बिमान देस प्रधान फिरै नहीं ||१६|| 
: -- नित्य नई नवल भोर हो कर दिवसों का अवसान हो रहा है अर्थात समय व्यतित होता जा रहा है किन्तु देश के प्रधान मंत्री विमान में ही बैठे है वह लौट नहीं रहे |

दरसत धुँधरा दरसनी दरसन को दे दोष | 
दरसत धुँधरा दरसनी दरसन का का दोष ||१६|| 
दरसनी = दर्पण, दर्शक 
दरसन = दृश्य 
: -- कहीं दर्पण धुंधला दर्शित हो रहा है दृश्यों को दोष दिया जा रहा है कहीं दर्शक को ही धुंधला दर्श रहा है दृश्यों को दोष दिया जा रहा है....  
गीता में उपदेश यह देय रहे भगवान | 
जीवन ज्ञानोपासना करतब कर्म प्रधान ||१७|| 
: -- श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण वह उपदेश कर रहे हैं कि जीवन की यात्रा त्रिकांड की प्रधानता पर आधारित है ज्ञान कर्म उपासना, ज्ञान व् उपासना में कर्म तिरोहित न हों | 

बेध बितनु अनु परमानु बैसा जग करि ढेरि | 
चहे सब तब चाहे जब बाज उठे रन भेरि ||१८क || 
:-- विश्व देहविहीन भेद्य आयुधों अणुओं परमाणुओं के पुंज पर पदासित है जब इच्छा हो तब विश्व युद्ध का आह्वान   किया जाए विश्वजनों की भी मनोवांछा है.....  

अजहुँ जगद परम पद पर बिरधा बय आसीन | 
आगे जग का होएगा सो तो काल आधीन ||१८ख ||  
:-- वर्तमान में विश्व के सर्वोच्च पदों पर वृद्धावस्था आसीन है जो धैर्य धर्म की अपनी धुरियां धारण किए हुवे हैं आगे इस विश्व का क्या होगा यह समय निश्चित करेगा.....   

पारावार पदोपवित बैसे जहाँ जुबान | 
दरसे तहँ संसार में होत घोर घमसान ||१८ग || 
पारावार = इस छोर से उस छोर तक 
पदोपवित =  पदों को प्राप्त 
:--  विश्व के एक छोर से दूसरे छोर तक सर्वोच्च पदों को प्राप्त किए जहाँ युवावस्था आसीन है वहां युद्ध सघन  स्वरूप में संकुलित है.....  
 
सेय लख लख नेय अलख मूरख देय अजान | 
परमाणु परमेय निरख परख लेय परिमान ||१८घ ||  
सेय=सैयद,इमाम 
:--  एक छोर में अपनी नींव को अलक्षित करके धर्म के नाम पर लाखों लाख का नेतृत्व स्वरूप मूर्खता अज़ान दे रही है वह परिणाम से अनभिज्ञ परमाणु के परिमाण का निरीक्षण कर उसके मान की परीक्षा लेने को आतुर है | 

ध्वंस गति निरमान की सिरजन की साकार | 
 जुग जुगत जिग्यास जगे जगत लेय आकार ||१८ङ || 
: -- निर्माणे: अन्तिमः परिणामः विनाशः, सृष्टेः अन्तिमः परिणामः साकार:, यदा युगस्य  युक्तयःजिज्ञासा जागरिता तदा अयं संसारः आकारं गृह्णाति......
: -- निर्माण की अंतिम परिणिति विध्वंश है साकार सृजन का अंतिम परिणाम है युग युक्तियों की जिज्ञासाएं जब जागृत होती है तब यह संसार आकार लेता है.....  

सारांश = यह युग सृजन का है निर्माण का नहीं

दरसत धुँधरा दरसनी दरसन को दे दोष | 
दरसत धुँधरा दरसनी दरसन का का दोष ||1९|| 
: -- कहीं दर्पण धुंधला दर्शित हो रहा है दृश्यों को दोष दिया जा रहा है कहीं दर्शक को ही धुंधला दर्श रहा है दृश्यों को दोष दिया जा रहा है....

दरसनी = दर्पण, दर्शक दरसन = दृश्य

गीता में उपदेस यह, देय रहे भगवान l
जीवन ज्ञानोपासना, करतब कर्म प्रधान ll२०|| 
:-- श्रीमद्भागवत गीतायां भगवान् श्रीकृष्णः उपदेशं ददाति यत् जीवनयात्रा ज्ञान-पूजन-कर्तव्य-कर्म-त्रिभागैः पूरिता भवेत्...
:-- श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण यह उपदेश दे रहे हैं कि जीवनयात्रा ज्ञान उपासना कर्तव्य योग्य कर्म इन त्रयकाण्डों की प्रधानता से युक्त रहे.....