Tuesday, 25 April 2017

----- ।। उत्तर-काण्ड ५७ ।। -----

मंगलवार,२५ अप्रेल,२०१७                                                                                       

पुनि जलहि कर जोर जोहारे | सजिवनिहु जियन तुअहि निहारे || 
आरत जगत राम सुखदाता | त्रसित जीउ के रामहि त्राता || 

पापिहि घनतम राम तमोहर | अँधेरिया घर राम दिवाकर || 
भव भूमि भर भारु अति भारी | छरन अपहरन भए अवतारी || 

भगवद रूप राम जग राखा | कीरति जासु सकल जग भाखा || 
किअहि तुरग मख हेतु नियोजन | करुँ बिनति ताहि करिहौ पावन || 

अभिमंत्रित भा मुनिबर ताईं | उदकत उद घट कंठ पुराईं || 
सुधित जल राम सहित सबु राए | सुसंस्कारित मंडपु ल्याए || 

 निर्मल जल तैं छीर सम घवल अश्व न्हवाए | 
अँग अँग आभूषन संग दिब्य बसन पहिराए || 

शनिवार,२९ अप्रेल,२०१७                                                                                                    

पुनि महर्षि रघुनाथहि हाथा | किए अभिमन्त्रित मंत्रहि साथा  || 
बहुत बिनेबत करत निहोरे | बोलइ चितइ तुरग की ओरे || 

सुनहु बिनति मम हे महबाहू | पूर अपूरित सुर नर नाहू || 
भू सुर गन पुरजन तेउ भरी | करौ पुनीत एहि मख अस्थरी || 

तदनन्तर प्रभु सह बैदेही | परसिहि मेधि तुरग कै देही || 
 भै कौतूकि बस तेहि काला | सुर गुर मुनिजन सहित भुआला || 

भए हतप्रभ भर अचरजु भारी | जान बिचित्र यह पुर नर नारी || 
कहहि परस्पर भरुअर भामा | अहो सुमिरत जिन्हके नामा || 

जाके चरणोपासना मिटहि महतिमह पाप | 
सोइ प्रभु श्री रामचंद अस कस करिहि अलाप || 









Sunday, 16 April 2017

----- || चलो कविता बनाएँ || -----

हाथोँ हाथ सूझै नहि घन अँधियारी रैन | 
अनहितु सीँउ भेद बढ़े सोइ रहे सबु सैन || १ || 

रतनधि धर जलधि जागै,जागै नदी पहार | 
एक पहराइत जगै नहि ,जागै सबु संसार || २ || 

क्रमश:

Wednesday, 5 April 2017

----- ॥ पाखंड-वाद ॥ -----

" मिथ्या द्वारा यथार्थ के स्वांग का सार्वजनिक प्रदर्शन पाखण्ड वाद है...."
दूसरे शब्दों में आप जो नहीं हैं वह होने का प्रदर्शन करना पाखण्ड वाद है,

सत्ता केर स्वाद हुँत प्रसरा पाखण्ड वाद ।  
नव नूतन नहि होइया धर्म केर उन्माद ॥ 
भावार्थ :-- धार्मिक उन्माद फैलाकर सत्ता प्राप्ति करना कोई नई बात नहीं है सत्ता के सुख भोग का परम माध्यम होने से पाखंड वाद अत्यधिक प्रचलित हुवा 

पंच परिधान पहिर के चढिया ऊंच मचान । 
देस परधान बोलिया मैं दरिदर की संतान ॥ 
भावार्थ :--बहुमूल्य वस्त्र धारण कर ऊँचे मंच पर आसीन होकर एक दिन प्रधानमंत्री बोले मैं दरिद्र की सन्तान 'हूँ '। प्रधान मंत्री होकर ये दलिदर हैं नहीं होंगे तो दरिद्र रेखा के नीचे आ जाएंगे 

प्रधान मंत्री बनकर भी इन नेताओं का  दलिदर दूर नहीं हुवा तो ये बताएं फिर और कैसे होगा । धनवान होकर
दलिदरी का पाखण्ड करना, सत्ता प्राप्त कर उसका अधिकाधिक सुख भोग करना नेहरू-गांधी के विचारों की धारा है । 
ऐसी विचार धारा के कारण ही यह  देश खण्ड-खण्ड होता चला गया ।  तीस चालीस वर्षों में अमेरिका के वासी अंतरिक्ष वासी बन गए किन्तु सत्तर वर्षों में भी भारत के वासियों के सम्मुख से आदि नहीं हटा....







Wednesday, 8 March 2017

----- ॥ सेंदुरी रंग -धूरि ॥ -----

उरियो रे सेंदुरी ऐ री रंग धूरि, 
पलहिं उत्पलव नील नलिन नव जिमि जलहिं दीप लव रूरि । 
ललित भाल दए तिलक लाल तव तिमि सोहहि छबि अति भूरि ॥ 

हनत पनव गहन कहत प्रिया ते अजहूँ पिय दरस न दूरि । 
करिअ बिभावर नगर उजागर  सजि बेदि भवन भर पूरि ॥ 

तरहि पटतर परिहि अम्बारी मनियरी झालरी झूरि । 
बंदनिवार बाँधेउ द्वार धरि चौंकिहि चौंक अपूरि ॥ 

आगत जान बरु सुमुखि सुनयनि गावहि सुभगान मधूरि । 
सगुन भरि थार करिहि आरती करि मंगलाचार बहूरि ॥ 

चली मंजु गति प्रिया पियहि पहि अरु छूटहि कुसुम अँजूरि । 
जलज माल जय कलित कंठ दय नत सीस चरन रज पूरि ॥ 





Monday, 6 March 2017

----- ॥ सेंदुरी रंग -धूरि ॥ -----


उनिहौ रे सेंदुरी ऐ री रंग धूरि 
पलहि उत्पलव नील नलिन नव जिमि जलहि दीप लव रूरि । 
तरु तमाल दए तिलक भाल तव तिमि सोहिहि छबि अति भूरि ॥ 

बिभौ बदन घन स्याम सुन्दर सिरौपर पँखी मयूरि । 
पहिरै सुरुचित पीत झगुरिया धरि मधुराधर बाँसूरि  ॥ 

बजति भली करधन छली करी कर कंकनि सँग केयूरि ॥ 
कल धुनि करत भाँवरि भरत जबु थिरकत चरन नुपूरि ॥ 

घुटरु घटि बँट काँछ कटि तट पटिअरि धूपटि अपूरि । 
गिरियों लटपटि त उठि कपटि कह लपटि आध अधूरि ॥ 

पाउँ परस करि लीज्यो दरस न त इन्ह कर दरसन दूरि ॥ 

Friday, 3 March 2017

----- ॥ रंग -धूरि ॥ -----


उरियो नहि सेंदुरी ऐ री रंग धूरि 
कुञ्ज गलिअ  कर कुसुम कलिअ यहु अजहूँ न पंखि अपूरि  ॥ 
कहइ बिसुर बल बल गल बहियाँ  ओहि जोरे अंज अँजूरि ॥ 

अंक ही अंक गहि पलुहाई मैं कल परसोंहि अँकूरि  ॥ 
एहि मधुबन रे मोरे बाबुल इहँ बिहरिहु धरे अँगूरि ॥ 

चरनहि नुपूर सिरु बर बेनी, कानन्हि कंचन्हि फूरि ॥ 
बोलहि मिठु जिमि चाँचरि बोलै अरु तुम अति करर करूरि ॥ 

निरखहि नीरज नयन झरोखे तुम रंज न देहु बिंदूरि ॥ 
दय घटा घन छटा मन मोही न त दमकिहि दमक बिजूरि ॥ 

मन चन्दन मुख मनियरचन्दा बालिपन बिहुर नहि भूरि ॥ 
फेरी भँवर कतहुँ फिरजइयो इहँ अइयो कबहुँ बहूरि ॥ 


Wednesday, 1 March 2017

----- ॥ राग भैरवी ॥ -----

काहे न मानस जनम गवाए,
जग नर नारि चारि बस करियो,भोगहि भूरि बिषय अधिकाए । 
हाटहि हाट बैस चौहाटे, बिचवइ कर कर बिकता जाए । 
नीची करनी नीच न करनी, उँच उँच ऊँचे मोल बिकाए । 
देह अमोली बहु समझायो, ओहि केहि बिधि समुझ न आए । 
करतब कारन कर गहे दोइ, रह बस रैन दिवस अलसाए । 
करिया उद उद्योग न कोइ, कर बिनहि जिन सोचए तीन पाए । 
अकंटक केहि साथर केरी नीँद भर से डास डसाए । 
रहै अकारथ करम भरोसे, अरु सोँ बिरथा श्रम उपजाए ।