Wednesday, 8 March 2017

----- ॥ सेंदुरी रंग -धूरि ॥ -----

उरियो रे सेंदुरी ऐ री रंग धूरि, 
पलहिं उत्पलव नील नलिन नव जिमि जलहिं दीप लव रूरि । 
ललित भाल दए तिलक लाल तव तिमि सोहहि छबि अति भूरि ॥ 

हनत पनव गहन कहत प्रिया ते अजहूँ पिय दरस न दूरि । 
करिअ बिभावर नगर उजागर  सजि बेदि भवन भर पूरि ॥ 

तरहि पटतर परिहि अम्बारी मनियरी झालरी झूरि । 
बंदनिवार बाँधेउ द्वार धरि चौंकिहि चौंक अपूरि ॥ 

आगत जान बरु सुमुखि सुनयनि गावहि सुभगान मधूरि । 
सगुन भरि थार करिहि आरती करि मंगलाचार बहूरि ॥ 

चली मंजु गति प्रिया पियहि पहि अरु छूटहि कुसुम अँजूरि । 
जलज माल जय कलित कंठ दय नत सीस चरन रज पूरि ॥ 





Monday, 6 March 2017

----- ॥ सेंदुरी रंग -धूरि ॥ -----


उनिहौ रे सेंदुरी ऐ री रंग धूरि 
पलहि उत्पलव नील नलिन नव जिमि जलहि दीप लव रूरि । 
तरु तमाल दए तिलक भाल तव तिमि सोहिहि छबि अति भूरि ॥ 

बिभौ बदन घन स्याम सुन्दर सिरौपर पँखी मयूरि । 
पहिरै सुरुचित पीत झगुरिया धरि मधुराधर बाँसूरि  ॥ 

बजति भली करधन छली करी कर कंकनि सँग केयूरि ॥ 
कल धुनि करत भाँवरि भरत जबु थिरकत चरन नुपूरि ॥ 

घुटरु घटि बँट काँछ कटि तट पटिअरि धूपटि अपूरि । 
गिरियों लटपटि त उठि कपटि कह लपटि आध अधूरि ॥ 

पाउँ परस करि लीज्यो दरस न त इन्ह कर दरसन दूरि ॥ 

Friday, 3 March 2017

----- ॥ रंग -धूरि ॥ -----


उरियो नहि सेंदुरी ऐ री रंग धूरि 
कुञ्ज गलिअ  कर कुसुम कलिअ यहु अजहूँ न पंखि अपूरि  ॥ 
कहइ बिसुर बल बल गल बहियाँ  ओहि जोरे अंज अँजूरि ॥ 

अंक ही अंक गहि पलुहाई मैं कल परसोंहि अँकूरि  ॥ 
एहि मधुबन रे मोरे बाबुल इहँ बिहरिहु धरे अँगूरि ॥ 

चरनहि नुपूर सिरु बर बेनी, कानन्हि कंचन्हि फूरि ॥ 
बोलहि मिठु जिमि चाँचरि बोलै अरु तुम अति करर करूरि ॥ 

निरखहि नीरज नयन झरोखे तुम रंज न देहु बिंदूरि ॥ 
दय घटा घन छटा मन मोही न त दमकिहि दमक बिजूरि ॥ 

मन चन्दन मुख मनियरचन्दा बालिपन बिहुर नहि भूरि ॥ 
फेरी भँवर कतहुँ फिरजइयो इहँ अइयो कबहुँ बहूरि ॥ 


Wednesday, 1 March 2017

----- ॥ राग भैरवी ॥ -----

काहे न मानस जनम गवाए,
जग नर नारि चारि बस करियो,भोगहि भूरि बिषय अधिकाए । 
हाटहि हाट बैस चौहाटे, बिचवइ कर कर बिकता जाए । 
नीची करनी नीच न करनी, उँच उँच ऊँचे मोल बिकाए । 
देह अमोली बहु समझायो, ओहि केहि बिधि समुझ न आए । 
करतब कारन कर गहे दोइ, रह बस रैन दिवस अलसाए । 
करिया उद उद्योग न कोइ, कर बिनहि जिन सोचए तीन पाए । 
अकंटक केहि साथर केरी नीँद भर से डास डसाए । 
रहै अकारथ करम भरोसे, अरु सोँ बिरथा श्रम उपजाए । 


Thursday, 23 February 2017

----- ॥ फाग ॥ -----

धरे रुरियारे रंग, बन फिरिति पतंग,  दए फगुनिया पुकारि के होरी में..,
मनि मोतियाँ ते भरी बलपरी फूरझरी छरहरी डोरी डार के होरी में..,

रंग लाल लाल बिहंग लाल लाल,
गगन गगन उरति पतंग लाल लाल, 

बूझती अली अली उरि चलि गली गली सखी कलियाँ सँवार के होली में..,
कहँ छुपे मनहरिया  केसरिया साँवरिया  दुअरिया ढार के होरी में..,

अहो चाले है मराल कनक केसरी करताल,
स्याम राग संग धरे रंग थाल थाल, 

घुँघरी घरी घर्घरी कटि धरी गहन घाघरी घार के होरी में..,
सुठि भृकुटि तरेर ठकि मुख तीन सेर दे मीठी मीठी गार के होरी में..,

अहो झाँझरि जड़ाऊ बाँधे पाँउ पाँउ, 
झनक झनक झुमरि बजे है गाँउ गाँउ,

रूपु हरी रूपु भर हे री हेरि घर घर घेरि चौंक चौबार के होरी में
सबु नगर ढिंढोर करी बुँदौरी को घोर भर भर पिचकार के होरी मे..,

अहो भाँवरि भरत तिरत डोल डोल, 
करत निरत थिरत थाप दे ढोल ढोल,   

आयो द्वारिका को नाथ
ग्वाल बाल साथ 
मोर मुकुट माथ 
अधरन पे बंसरी सँवारे.....
                      ---- ॥ राग मारवा, बसंत ॥ ----- उड़ री रंग धूरि चहुँ पासा,
बादिहि बादन बृन्दु अगासा । उड़ री रंग धूरि चहुँ पासा ॥ 
फूरहि फूर पंखि दल पूरे । बासहि बास बसंत सुबासा  ॥  
बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस रास बिलासा ॥ 
सरसि सरसई सरिरुह सौंहैं ।सरित सरोजल कह उछ्बासा ॥ 
दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन प्रभाकर भास बिभासा ॥ 
घोरिहि घन रस बन रस राजा । कर महु कर धर करिहु कुहासा ॥  
बहुरी बदरि बहुर बदराई । बहुरि बदरि न बहुर चौमासा ॥ 
कर्पूर गौर बौरि अमराई । हरिअर हरिअर हरिअर बासा ॥ 
कोयरि कोयरि कूजत बोलहि । पालौ पालौ पलहि पलासा ॥  
चटक छटा फर जीर जँबीरी । झलहिं चँवर सों जौर जवासा ॥ 

Tuesday, 21 February 2017

----- ।। उत्तर-काण्ड ५६ ।। -----

अति बिनैबत  धरत महि माथा । लषन प्रनाम करत रघुनाथा ॥ 
लखि अपलक अरु पलक न ठाढ़े । अबिलम मरुत बेगि रथ चाढ़े ॥ 

कल कीरन कर भर करषाई । सियहि आश्रमु चले अतुराई ॥ 
तेजस बदनु भावते जी के । रघुनाथ तनय अतिसय नीके ॥ 

बहोरि भर अनुराग बिसेखे । बिहँसि महर्षि ताहि पुर देखे ॥ 
कहब बछरु धरु कण्ठ कूनिका । गाउ सुठि को सुर संगीतिका ॥ 

सिउ सारद नारदहि सुहाना । रघुबरहि कृत चरित कर गाना ॥ 
गुरु अग्या करतल बर बीना । गावहि हरिगुन गान प्रबीना ॥ 

प्रगसो दानव दैत निकंदन प्रगसो हे नयनाभिराम । 
प्रगसो हे महि भारु अपहरन प्रगसो हे ललित ललाम ॥ 
कुकर्म महु लीन अति मलीन मन करे सबु मति कर बाम । 
दीन हीन सुख गुन बिहीन भए भरे हम धरे धन धाम ॥ 

प्रगसो अनाथन केरे नाथ हे प्रगसो सिया बर राम । 
तरपत परबसु पियास मरत पसु बहत सुरसरि सबु ठाम । 
तुम बिनु खल दल बल गह भए भल पूर सब साधन साम ॥ 
भगति बिमुख जग कारन चरनहि भजहिं न करहिं प्रनाम ॥ 


खलदल दवन भुवन भय भंजन प्रगसो भानुकुल भाम । 
प्रगसो भगवन दुर्दोषु दहन अपहन मोह मद काम ॥ 
भ्रष्ट अचार अस भा संसार भए सबु अलस अलाम ॥ 
जहँ तहँ बाधि बिबिध ब्याधि जग करिअति अति छति छाम ॥ 

करि करि पाप कहैं  पाप नहि किछु गहैं मुए कठिन परिनाम । 
हे कमलारमन करो अवतरन करन बिस्व बिश्राम ॥   
तव मंगल करन लाए पथ नयन सब दिनु सब रितु सब जाम ॥  
हे अवतारी अवतार गहन बरो बपुष घन स्याम ॥  

 जग संताप देइ ताप करै घोर घन घाम । 
आरत भूमि पुकारती प्रगसु हे तरुवर राम ॥ 

शनिवार, २५ फरवरी, २०१७                                                                       

कातर भूमि पाप भर भारी । धेनु रूप धरि करिअ गुहारी ॥ 
पुनि दोनहु बालक बड़भागे । हरि अवतरन कथा कहि लागे ॥ 

भाव भेद पद छंद घनेरे । पुन्यकृत चरित चितरित केरे ॥ 
धर्म धुरंधर बिधिकर साखी । भगवान भगति भाँति बहु भाखी ॥ 

भनत भनितिहि भदर भर भेसा । किए अबिरत पतिब्रत उपदेसा ॥ 
नेम बचन दृढ़ भ्रात स्नेहा । काल परे अनुहरि सब गेहा ॥ 

सुबिरति जति गुरु भगति बखाना । अनुगम अनुपम सबहि बिधाना ॥ 
दरसिहि जहँ साईँ समुहाना । सेबक नीति मूरतिमाना ॥ 

निबध निपुण नय नीति सुरीति । निगदिहि निर्मल प्रीति प्रतीति ॥ 

कलि कलुष बिभंजन जहां पापीजन निज हाथ । 
भू भय हरन पाप दमन दंड दिये रघुनाथ ॥ 

रविवार, २५ फरवरी, २०१७                                                                                       

गाएँ सुमधुर बाँध सुर दोई । मंत्र मुग्ध सब श्रुत सुखि होईं ॥ 
पर मूर्छि सिद्ध गंधर्बा । हतचित चकित सुराग सुर सर्बा ॥ 

सुनत सहित अनगन  महिपाला । होइहिं मोहित जगद कृपाला ॥ 
मोह मगन मन धीरे न धीरा । आनंद घन नयन बह नीरा ॥ 

पुनि पंचम सुर गान अधीना । प्रेम सरित  बहि होइहिं लीना ॥ 
रह अस्थमबित हिलहिं न डोलहिं । चित्र लिखित सम अबोल न बोलहिं ॥ 

पुनि महर्षि दोनहु सुत तेऊ । कृपा समेत इ बचन कहेऊ ॥ 
तुम्हरी मति अस बल सँजोई । कि नीति कुसल नहि तुअ सहुँ कोई ॥ 

अजहुँ पहिचानउ  तेहि ए पूजनिय पितु तुहार । 
जाइ करिहौ तनके प्रति, पुत्रोचित ब्यबहार ॥ 

सोमवार, २६ फरवरी, २०१७                                                                        

सुनि मुनि बचन आएँ दुहु आगे । बिनय भाउ ते चरनहि लागे ॥ 
मातु कर करि करि सेउकाई । भए निर्मल हरिदै दुहु भाई ॥ 

नए सिरु पद देखि रघुराई । प्रेम मुदित दुहु लिए उर लाई ॥ 
सुत सुरूप महुँ मूरतिमाना । प्रगसि धर्म मम किए अनुमाना ॥ 

सहज मनोहर मुख अति नीके । दोउ तनय श्री रघुबर जी के ॥ 
सभा बिराजित सकल समाजा । नगर नारि नर सुर मुनि राजा ॥ 

चितवहि सचकित तिन्हनि ओरा । चितए  चकित जिमि चंदू चकोरा ॥ 
मानेउ सत्य सरिस सती की । पति भगति श्री जानकी जी की ॥ 

कहत सेष मुनि लषन पुनि, गवन  रिषि तपोधाम । 

दीन्हि असीस सिय चरन सिरु धरि करत प्रनाम ॥  

शुक्रवार, १० मार्च, २०१७                                                                                     

निरख बिनयसील लछमन आए । सुनी पुनि जनि निज जान बोलाए ॥ 
जोरे हृदयँ लोचन कर पानी । कहहि ससनेह करुनित बानी ॥ 

रघुकुल कैरब मोहि त्यागे । दिए बियोग घन किए बन आगे ॥ 
एहि गुह गोचर घर घन घोरे । करिअहिं नाथ सुहरिदय मोरे ॥ 

त्यागु जोग बहुरि अपनाई । एहि जग केहि सुहाव न भाई ॥ 
चरनन्हि तृन पात फल फूला । परे भूमि न चढ़ेउ बहूला ॥ 

चलौं अजहुँ कस कहउ अतेवा । मोरे भाग न प्रभुपद सेबा ॥ 
रहिहउँ आश्रमु बाल्मिकी के । सुरति धरत नित रघुबर ही के ॥ 

सुनत लछमन सियहि बचन मातु कहत गोहारि । 
लेय उसाँस निरासु भरि कातरि डीठ निहारि ॥  

शनिवार, ११ मार्च, २०१७                                                                              

कहत लछमन सुनहु महतारी । लाए  नयन मग होइहि हारी ॥ 
बुला पठइँ प्रभु बारहि बारा । सेष रुचिरु जस होइ तिहारा ॥ 

मन क्रम बचन चरण रति होई । कहहु मातु परिहरहि कि सोई ॥ 
सुकुता गह बसि मनि सम रूपा । दीपक दिनकर किरन  सरूपा ॥ 

बसिहि देह जनि जिअ के नाई । नाथ तोहि तस हृदयँ बसाईं ॥ 
(तथापि ) पति अपराधु पति ब्रता नारी । धरिअ उरस न मनहि महुँ घारी ॥ 

करउँ बिनति पुनि पुनि जुग हाथा । चढ़ि स्यंदन चलहु मम साथा ॥ 
मानिहि पति सिय देउ समाना । अकनि सोइ सबु बचन बिहाना ॥ 

प्राति प्रतीति पुकारि उत मुनि तिय कहि  अनुहारि । 
प्रभु परिहरि गति न दूसरि चलि अस नीति बिचारि ॥  














Friday, 16 September 2016

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

लघुवत वट बिय भीत ते उपजत बिटप बिसाल । 
बिनहि बिचार करौ धर्म पातक करौ सँभाल ॥ १ ॥ 
भावार्थ : -- एक लघुवत वट बीज के भीतर से एक विशाल वृक्ष उत्पन्न होता है । अत: पुनीत कार्य करते समय उसके छोटे बड़े स्वरूप का विचार न करें । पतित कार्य करते समय उसके छोटे बड़े स्वरूप का सौ बार विचार करें । क्षुधावन्त की क्षुधा को शांत करने के लिए अन्न का एक दाना भी पर्याप्त होता है यह एक दाना खेत में पहुँच जाए तो फिर अनेक से अनेकानेक होकर भंडार भरने में समर्थ होता है ॥  अपात्र को दिया गया एक अभिमत, दाता के नारकीय पथ को प्रशस्त करता है ॥

" संकल्प हीन मनोमस्तिष्क ही विकल्प का चयन करता है " 

जो कारज कृत कठिनतम बढ़ि बढ़ि कीजिए सोइ । 
ताहि कृतब का होइया करिअ जाहि सब कोइ ॥ २ ॥ 
भावार्थ : -- जिन पुनीत कार्यों को करना कठिन हो वह पुण्य प्रदाता कार्य होते हैं अत: उन्हें करने के लिए सदा उद्यत रहना चाहिए । जो सरल हों जिसे सभी करते हो ऐसे सत कार्य पुण्यदायक नहीं होते ॥