Thursday, 23 February 2017

----- ॥ फाग ॥ -----

धरे रुरियारे रंग, बन फिरिति पतंग,  दए फगुनिया पुकारि के होरी में..,
मनि मोतियाँ ते भरी बलपरी फूरझरी छरहरी डोरी डार के होरी में..,

रंग लाल लाल बिहंग लाल लाल,
गगन गगन उरति पतंग लाल लाल, 

बूझती अली अली उरि चलि गली गली सखी कलियाँ सँवार के होली में..,
कहँ छुपे मनहरिया  केसरिया साँवरिया  दुअरिया ढार के होरी में..,

अहो चाले है मराल कनक केसरी करताल,
स्याम राग संग धरे रंग थाल थाल, 

घुँघरी घरी घर्घरी कटि धरी गहन घाघरी घार के होरी में..,
सुठि भृकुटि तरेर ठकि मुख तीन सेर दे मीठी मीठी गार के होरी में..,

अहो झाँझरि जड़ाऊ बाँधे पाँउ पाँउ, 
झनक झनक झुमरि बजे है गाँउ गाँउ,

रूपु हरी रूपु भर हे री हेरि घर घर घेरि चौंक चौबार के होरी में
सबु नगर ढिंढोर करी बुँदौरी को घोर भर भर पिचकार के होरी मे..,

अहो भाँवरि भरत तिरत डोल डोल, 
करत निरत थिरत थाप दे ढोल ढोल,   

आयो द्वारिका को नाथ
ग्वाल बाल साथ 
मोर मुकुट माथ 
अधरन पे बंसरी सँवारे.....


बादिहि बादल बृन्दु अगासा । उड़ री रंग धूरि चहुँ पासा ॥ 
फूरहि फूर पंखि दल पूरे । बासहि बास बसंत सुबासा  ॥  

बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस रास बिलासा ॥ 
दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन प्रभाकर भास बिभासा ॥ 

घोरिहि घन रस बन रस राजा । घुर घुर होहिहु पलौ पलासा ॥ 
 भर भर कलसि करषि कर देहू । पियत पयस बूझै न पियासा ॥ 



Tuesday, 21 February 2017

----- ।। उत्तर-काण्ड ५६ ।। -----

अति बिनैबत  धरत महि माथा । लषन प्रनाम करत रघुनाथा ॥ 
लखि अपलक अरु पलक न ठाढ़े । अबिलम मरुत बेगि रथ चाढ़े ॥ 

कल कीरन कर भर करषाई । सियहि आश्रमु चले अतुराई ॥ 
तेजस बदनु भावते जी के । रघुनाथ तनय अतिसय नीके ॥ 

बहोरि भर अनुराग बिसेखे । बिहँसि महर्षि ताहि पुर देखे ॥ 
कहब बछरु धरु कण्ठ कूनिका । गाउ सुठि को सुर संगीतिका ॥ 

सिउ सारद नारदहि सुहाना । रघुबरहि कृत चरित कर गाना ॥ 
गुरु अग्या करतल बर बीना । गावहि हरिगुन गान प्रबीना ॥ 

प्रगसो दानव दैत निकंदन प्रगसो हे नयनाभिराम । 
प्रगसो हे महि भारु अपहरन प्रगसो हे ललित ललाम ॥ 
कुकर्म महु लीन अति मलीन मन करे सबु मति कर बाम । 
दीन हीन सुख गुन बिहीन भए भरे हम धरे धन धाम ॥ 

प्रगसो अनाथन केरे नाथ हे प्रगसो सिया बर राम । 
तरपत परबसु पियास मरत पसु बहत सुरसरि सबु ठाम । 
तुम बिनु खल दल बल गह भए भल पूर सब साधन साम ॥ 
भगति बिमुख जग कारन चरनहि भजहिं न करहिं प्रनाम ॥ 


खलदल दवन भुवन भय भंजन प्रगसो भानुकुल भाम । 
प्रगसो भगवन दुर्दोषु दहन अपहन मोह मद काम ॥ 
भ्रष्ट अचार अस भा संसार भए सबु अलस अलाम ॥ 
जहँ तहँ बाधि बिबिध ब्याधि जग करिअति अति छति छाम ॥ 

करि करि पाप कहैं  पाप नहि किछु गहैं मुए कठिन परिनाम । 
हे कमलारमन करो अवतरन करन बिस्व बिश्राम ॥   
तव मंगल करन लाए पथ नयन सब दिनु सब रितु सब जाम ॥  
हे अवतारी अवतार गहन बरो बपुष घन स्याम ॥  

 जग संताप देइ ताप करै घोर घन घाम । 
आरत भूमि पुकारती प्रगसु हे तरुवर राम ॥ 

शनिवार, २५ फरवरी, २०१७                                                                       

कातर भूमि पाप भर भारी । धेनु रूप धरि करिअ गुहारी ॥ 
पुनि दोनहु बालक बड़भागे । हरि अवतरन कथा कहि लागे ॥ 

भाव भेद पद छंद घनेरे । पुन्यकृत चरित चितरित केरे ॥ 
धर्म धुरंधर बिधिकर साखी । भगवान भगति भाँति बहु भाखी ॥ 

भनत भनितिहि भदर भर भेसा । किए अबिरत पतिब्रत उपदेसा ॥ 
नेम बचन दृढ़ भ्रात स्नेहा । काल परे अनुहरि सब गेहा ॥ 

सुबिरति जति गुरु भगति बखाना । अनुगम अनुपम सबहि बिधाना ॥ 
दरसिहि जहँ साईँ समुहाना । सेबक नीति मूरतिमाना ॥ 

निबध निपुण नय नीति सुरीति । निगदिहि निर्मल प्रीति प्रतीति ॥ 

कलि कलुष बिभंजन जहां पापीजन निज हाथ । 
भू भय हरन पाप दमन दंड दिये रघुनाथ ॥ 

रविवार, २५ फरवरी, २०१७                                                                                       

गाएँ सुमधुर बाँध सुर दोई । मंत्र मुग्ध सब श्रुत सुखि होईं ॥ 
पर मूर्छि सिद्ध गंधर्बा । हतचित चकित सुराग सुर सर्बा ॥ 

सुनत सहित अनगन  महिपाला । होइहिं मोहित जगद कृपाला ॥ 
मोह मगन मन धीरे न धीरा । आनंद घन नयन बह नीरा ॥ 

पुनि पंचम सुर गान अधीना । प्रेम सरित  बहि होइहिं लीना ॥ 
रह अस्थमबित हिलहिं न डोलहिं । चित्र लिखित सम अबोल न बोलहिं ॥ 

पुनि महर्षि दोनहु सुत तेऊ । कृपा समेत इ बचन कहेऊ ॥ 
तुम्हरी मति अस बल सँजोई । कि नीति कुसल नहि तुअ सहुँ कोई ॥ 

अजहुँ पहिचानउ  तेहि ए पूजनिय पितु तुहार । 
जाइ करिहौ तनके प्रति, पुत्रोचित ब्यबहार ॥ 

सोमवार, २६ फरवरी, २०१७                                                                        

सुनि मुनि बचन आएँ दुहु आगे । बिनय भाउ ते चरनहि लागे ॥ 
मातु कर करि करि सेउकाई । भए निर्मल हरिदै दुहु भाई ॥ 

नए सिरु पद देखि रघुराई । प्रेम मुदित दुहु लिए उर लाई ॥ 
सुत सुरूप महुँ मूरतिमाना । प्रगसि धर्म मम किए अनुमाना ॥ 


सहज मनोहर मुख अति नीके । दोउ तनय श्री रघुबर जी के ॥ 
सभा बिराजित सकल समाजा । नगर नारि नर सुर मुनि राजा ॥ 

चितवहि सचकित तिन्हनि ओरा । चितए  चकित जिमि चंदू चकोरा ॥ 
मानेउ सत्य सरिस सती की । पति भगति श्री जानकी जी की ॥ 

कहत सेष मुनि पुनि लन,   










Friday, 16 September 2016

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

लघुवत वट बिय भीत ते उपजत बिटप बिसाल । 
बिनहि बिचार करौ धर्म पातक करौ सँभाल ॥ १ ॥ 
भावार्थ : -- एक लघुवत वट बीज के भीतर से एक विशाल वृक्ष उत्पन्न होता है । अत: पुनीत कार्य करते समय उसके छोटे बड़े स्वरूप का विचार न करें । पतित कार्य करते समय उसके छोटे बड़े स्वरूप का सौ बार विचार करें । क्षुधावन्त की क्षुधा को शांत करने के लिए अन्न का एक दाना भी पर्याप्त होता है यह एक दाना खेत में पहुँच जाए तो फिर अनेक से अनेकानेक होकर भंडार भरने में समर्थ होता है ॥  अपात्र को दिया गया एक अभिमत, दाता के नारकीय पथ को प्रशस्त करता है ॥

" संकल्प हीन मनोमस्तिष्क ही विकल्प का चयन करता है " 

जो कारज कृत कठिनतम बढ़ि बढ़ि कीजिए सोइ । 
ताहि कृतब का होइया करिअ जाहि सब कोइ ॥ २ ॥ 
भावार्थ : -- जिन पुनीत कार्यों को करना कठिन हो वह पुण्य प्रदाता कार्य होते हैं अत: उन्हें करने के लिए सदा उद्यत रहना चाहिए । जो सरल हों जिसे सभी करते हो ऐसे सत कार्य पुण्यदायक नहीं होते ॥ 

Wednesday, 24 August 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५५ ।। -----

बुधवार, २४ अगस्त, २०१६                                                                                                  

सिय केर सुचित मद मानद हे । तव सहुँ छदम न कोइ छद अहे ॥ 

न तरु हमहि न देवन्हि सोंही । यह कछु मन महुँ भरमन होंही ॥ 

हरहि तमस जिमि प्रगस पतंगा । दूरए मन  निभरम ता संगा ॥ 

कहत सेष मुनि जगद निधाता । भगवन जद्यपि सरब ग्याता ॥ 

बाल्मीकि एहि बिधि समुझायउ । सुनि मुनि अस्तुति सहुँ सिरु नायउ ॥ 

लषन सोंहिं बोलिहि एहि  बाता । सुमित्र सहित कृत करिहु ए ताता ॥ 

करएँ जुग कर बिनति सब कोई  । करौ सकार अजहुँ सुत दोई ॥ 
सती सिया पहिं चढ़ि रथ जाहउ। जमल सहित तुर आनि लिवाहउ ॥ 

मोर अरु मुनि केर कही कहियउ तहँ सब बात । 
अवध पुरी लेइ अइहौ कहत मात हे मात ॥ 

अहो भगवन अजहुँ मैं जइहौं । सीअहि मातु कहत समुझाइहौं ॥ 
सुनिहि जो तुहरे प्रिय सँदेसा । आनि पधारिहि सो एहि देसा ॥ 

आइहि मोर संग सिय माई । होइहि तबहि सुफल मम जाई ॥ 
अस कह लखनउ आगिल बाढ़े । प्रभो अग्या सोंहि रथ चाढ़े ॥ 

अरु मुनिबर के सिस लय संगा । सुमित्र सहित रथ भयउ बिहंगा ॥ 
पति पतियारिन अति परम सती । होहि केहि बिधि मुदित भगवती ॥ 

बिचलित मन मानस अस सोचिहि । कबहुँ हरष करि कबहुँ सकोचिहि ॥
एहि बिचहुत बिच मति बिरझाईं । अतुरए आश्रमु दिए  देखाई  । 

एहि दसा पैठि रथ चरन पथ श्रमु गयउ सिराए । 
अतुरई पुनि जगन मई जननि देइ देखाए ॥ 

रविवार, २८ अगस्त, २०१६                                                                                         

भय अस्थिर रथ चरन तरायल । तुरै तरिय तरु मंडित अस्थल  ॥ 
सिथिरीभूत सीतहि नियराए । कहत ए लखन कण्ठ  भर ल्याए ॥ 

प्राना पति हे पेम परिमिता । ज्ञानवती अति निपुन विनिता ॥ 
हे आर्ये हे मंगल करनि । बिभव अपार भव सरिता तरनि ॥ 

बहोरि कातर रूप निहारे । बोधत अस गहि पद महि पारे  ॥ 
सियहि बत्सल पेम के साथा । बिहबल होति लम दुहु हाथा ॥ 

नहि नहि कहति नयन भर पानी । देखि लषन गति करिअ ग्लानी ॥ 
भरिअ सोहाग रहिअ बिरागी । तासों एहि बिधि पूछन लागी ॥ 

जौ बेहड़ बन मुनि महर्षि प्रियकर महतिमह तपसि जन के । 
ब्याल कराल जौ भालु बाघ अरु केहर कुंजर गन के ॥ 
कंदर खोह अगम अगाध नदीं नद जो बिनहि रबि किरन के ।  
कंटक कांकर गहबर मग अँधेरि छादित जौ तरुवन के ॥ 

हरिअहि हय हेरिहि केहि, तव डग डगर भुराए । 

नगौकस ते दूर निकस कहौ इहाँ कस आए ॥  

बृहस्पतिवार ०१ सितम्बर, २०१६                                                                                 

मातु गरभ गह मुकुतिक रूपा । परगस भए मनि मुकुत सरूपा ॥ 
अराधित देउ मोरे नाथा । अहहि न धनि  सुख सम्पद साथा ॥ 

सजल नयन पुनि कहि हे नागर । जग अपकीरति कारन रघुबर ॥ 
राखेउ साँच मोहि त्यागे । होइँ कुपथ चर प्रजा न आगे ॥ 

दय बन करिअब बिरहन मोही । छाड़न काज सौंपि प्रभु तोही ॥ 
होइ ताहि सों एहि संसारा । तासु बिमल कीरत बिस्तारा ॥ 

जुग जुग लग अस्थिर कृत होईं  । तासों बड़ संतोष न कोई ॥ 
अजहुँ होउँ किन मैं बिनु प्राना । रहेँ जसोमन प्रान निधाना ॥ 


 मोर नयन हरि पेम पियासे । यह मन मंदिर बरें दिया से ॥ 
रुचिर बसन मनि भूषन साजे । मंजुल  मूरति रूप बिराजे ॥ 

हरिदयालु परम कृपालु कौसल्या महतारि । 
अहहि न आनंद अपूरित अवध सहित सुत चारि ॥ 


शुकवार, ०२ सितंबर, २०१६                                                                                            

रिपुहन भरतादि सबहि भ्राता । अहहि न सकुसल सुमित्रा माता ॥ 
चाहिब अधिक् प्रान ते मोही । दुखातीत रहहि न सुख सोंही ॥ 

कहौ अहैं कस पियतम मोरे । पूछत एहि जब करिय निहोरे ॥ 
लोचन अरु जल बोह न बोही । बालिहि लषमन पुनि सिय सोंही ॥ 

देइ सकुसल अहहि महराई । पूछत रहँ तुम्हरि कुसलाई ॥ 
सुमित सहित मातु कैकेई । आहि सकुसल सबहि हे देई ॥ 

रहिब रागि अरु जो रनिबासा । करिअ निरंतर तोर सुखासा ॥ 
गुरुजन सहित सकल गुरुनारी । दए असीस तुम होउ सुखारी ॥ 

दए असीस जनि पेम अपूरे। तोर जिआ आपन जिअ भूरे ॥ 
तुहरे पदुम चरन सिरु नाई । कुसल प्रसन कृत दोनहु भाई ॥ 

रघुनन्दन कहत ए बचन नयन नीर भर लाए । 
पालि मम कहिअ गवन बन जानकिहि जाहु लिवाए ॥ 

शुक्रवार, १६ सितम्बर, २०१६                                                                                                      

 रघुकुल मनि अब रहएँ बुलावा । तोहि ल्यावन मोहि पठावा ॥ 
ह्रदयँ रहस प्रगसभव बानी । पोषत प्रीत पलकन्हि पानी ॥ 

भरे कण्ठ यह कहिब भनीता । सुनहु सतीहि सिरोमनि सीता ॥ 
दीनदयाकर कृपानिधाना । जन जन कहत मोहि भगवाना ॥ 

होइ रहेब जगत महुँ जोई । ताकर अदरस कारन होई ॥ 
मोर मते  जौ जग करतारी । सौइ  अदरस  करम अनुहारी ॥ 

तोर बरन खंडित भए चापा । कैकेई मति भरम ब्यापा ॥ 
पितहि मरन में बन गवनन में । दनुज कर तहँ तुहरे हरन में ॥ 

बँधेउब पयधि पार तरन में । सहाय कृत केर सहायन में ॥ 
समर समर औसर जब आईं ॥ कपि भल्लुक सबु होए सहाई ॥ 

मरिहि दनु तुम्हरे मिलन में । अरु बहुरि मम पन अपूरन में ॥ 
निज बांधव सहुँ होइ सँजोगा । राज जोग करि प्रिया बियोगा ॥ 

निगदित कारज कर एकहि कारन अदरस होइ  । 

पुनि सो होत मुदित जुगित करिअब हमहि सँजोइ ॥ 


सोमवार , १९ सितम्बर, २०१६                                                                                   

जिन्ह सुधिजन के बिसद बिचारा । अदर्स करिहि सोइ अनुहारा ॥ 
भुगत भोग सो तासु नसावा । तुहरी  भुगुति बन अपूरावा ॥ 

 तुहरे प्रति मम सील सनेहा । बढ़तै गयउ नित निसंदेहा ॥ 
सोए नेह निंदक परहेला । अजहुँ तोहि बुलाउ दए हेले ॥ 

सनेह सरित दोषु कर संका । लहत मलिनपन गहत कलंका  ॥ 
दोषु धुरावत मिटिहि बिषादा । दए तबहि नेह रस असवादा ॥ 

दोषु धरिअब करिअ संदेहू । होत बिमल ते अबिमल नेहू ॥ 
देय बिपिन में तोहि त्यागा ।  भयउ बिसद अस मम अनुरागा ॥ 

तजि अहो तुम्ह मोर तईं  , करिहु न हृदय बिचार  । 
निंदक राखन किया मैं सुबुध चरन अनुहार ॥ 

रविवार, २९ जनवरी, २०१७                                                                             

दोषु धरिअब करएँ निंदाई । तासु हरिहि हमरी मलिनाई ॥ 
साधु चरित कर कहहिँ बुराइँहि । सो हतमति आपहि बिनसाइँहि ॥ 

पूरन ससि निभ निसि उजयारी । उजबरित तस कीरति हमारी ॥ 
कृत करतब किरनन जस कासिहिं । दुहु कुल दिनकर सरिस प्रकासिहिं ॥ 

हमरे बिरद करहि गुन गाना । होहि बिसद मनि मुकुत समाना ॥ 
सुनहु सिया भव सिंधु अपारग । जाहि हमरी भगति सो पारग ॥ 

तोर गुन ते मुदित रघुनाथा । येहु सँदेसु दियो मम हाथा ॥ 
दरसन पदुम चरन निज नाथा । करिहउ बिचार न चलिहु साथा ॥ 

धरिअ माथ पद पदुम परागा । मानिहु बहुरि भूरि निज भागा ॥ 
मातु सदय अब हरिदै कीजौ । मोहि  लेइ गत आयसु दीजौ ॥ 

जगज जननी लए आपनि संगत दोउ कुमार । 
चलिहु बेगि प्रान पति पहि करौ न सोचु बिचार ॥ 

मंगलवार, ३१ जनवरी,२०१७                                                                      
भई सिथिर सुनु हे महरानी ।पथ निहारति रामु रजधानी ॥ 
चढ़ि गज बैठ अधरिया ऊपर । आगिल चलिअहि दुहु जुगल कुँअर ॥ 

सुथर सिबिका कटकु सँग लागे । छाँह करिहि घन बन मग माँगे॥ 
रहिहु मध्य तुम बाहन आछे । चलिहौं मैं तव पाछहि पाछे ॥ 

एहि बिधि अवधहि नगरि पधारिहु । धरि पद रजस रजस उद्घारिहु ॥ 
निज पिय ते मिलिहउ तहँ जाईं  । मख अस्थरि दिसि दिसि ते आईं ॥ 

राज रागि सांगत ऋषि नारी । हरषिहि बिरहन तापु बिसारी ॥ 
प्रनमत कौसल्या महतारी । छाइ तासु उर आनंद भारी ॥ 

बाजनि बृंद बहु बिधि कर बाजिहि बिबिध बिधान । 
मधुर धुनि सरस राग दै गाइहि मंगल गान ॥ 

बुधवार, १ फरवरी, २०१७                                                                   

हरि निवास श्री वासिहि जैसे । धूमधाम अरु होहि न कैसे ॥ 
तव सुभागम हेतु कल्याना । जाइ मनाइहि परब महाना ॥ 

कहत सेष सुनि येह सँदेसा । कहइँ सिया एहि बचन बिषेसा ॥ 
अहहि जग पहि पदारथ चारा । अह रे मैं रिति सबहि प्रकारा ॥ 

दरिद दासि यह कहँ महराजा । समरिहिं मम तैं कहु को काजा ॥ 
पानि गहे जब मोहि बिहावा । जोइ मनोहरता तन छावा ॥ 

बसिहि रूपु सो हरिदै मोरे । ता सहुँ सब दिन रहि कर जोरे ॥ 
यह छबि उर कबहु न बिलगाई । तासु तेज सों दुइ सुत जाई ॥ 

अहहि कुँअर एहि बंस अँकोरे । हीर रुचिर बरु बीर न थोरे ॥ 
लहि बिसेख जुगता दुहु भाई । धनु बिद्या मह गह निपुनाई ॥ 

सघन बन बहु जतन तेउ पालि पौषि हौं ताहि । 
जाहु संग लए दुहु कुँअर पितु पहि काहे नाहि ॥ 

बुधवार, १५ फरवरी, २०१७                                                                         

तप तैं निज इच्छा अनुहर के । अधर नाउ धर एकु रघुबर के ॥ 
मैं बिरहन अब एहि बन रहिहौं । कीरत कृत नित हरि गुन कहिहौं ॥ 

जाइ तहाँ तुम पूजित जन के । अरु अवध कर आनंद घन के ॥ 
गहिहु चरन कह मोर प्रनामा । कहिहु कुसल सब लए मम नामा ॥ 

होत बिनैबत बोलि सपेमा । पूछिहउ पुनि सबहि के छेमा ॥ 
बहोरि भरि अनुराग बिसेसा  । दुहु बालकन्हि देइ अदेसा ॥ 

रे बच्छर तुअ पितु पहि जाहू । दए आदर अतिसय सब काहू ॥ 
मातु बंधु गुरु कह पितु देबा । गहिब चरन करिहौ बहु सेबा ॥ 

मातु चरन होएब बिलग दोउ कुँअर चहँ नाहि । 
एहि इच्छा बिनु कहब किछु राख रहे मन माहि ॥

जनि अग्या सिरुधार के  गहे एकहि एक हाथ । 
सिथिर चरन उपरि मन पुनि चलेउ लखमन साथ ॥ 

बृहस्पतिवार १६ फरवरी, २०१७                                                                        

पहुंच तहाँ दुहु सियसुत नीके । गयउ नकट बाल्मीकि जी के ॥ 
गहिब गुरुपद रहिब जुगगाथा । गयउ लखमनहु तहँ तिन साथा ॥ 

सुमिरत अकथ अनामय नामा । प्रथमहि महर्षि करिअ प्रनामा ॥ 
बहोरि महर्षि लषन प्रसंगा । चलेउ दोउ कुँअर करि संगा ॥ 

जान सभा भित कृपा निधाना । मानेउ मन न केहि बिधाना ॥ 
जागिहि दरसन कर अभिलासा । गयउ अतुरइ सबहि प्रभु पासा ॥ 

बोलिहि बन जो बिरहनि माता । करि प्रनाम कहि सो सब बाता ॥ 
सोक संग हर्ष अपूराही । धूपित पंथ मिलहि जिमि छाहीं ॥ 

जब जब लखमन सिय सुधि करहीं ।  तब तब बारि बिलोचन भरहीं ॥ 
हरिदै थल जल भए दुइ भावा ।  भयउ  मगन अरु तीर न पावा ॥ 

कहत प्रभु रे सुनहु सखे बहुरि तहाँ तुम जाइ । 
महा जतन करि कै सियहि, आनिहु लए अतुराइ ॥ 

शुक्रवार, १७ फरवरी, २०१७                                                                                    

गहि पद सबिनय दुहु कर जोरे । कहहु सिय ते ए बत कहि मोरे ॥ 
साँझ लखिहु न लखिहु तुम भोरा । करहु सघन बन तप घन घोरा ॥ 

देखिअ सुनिअ न जग बिन होइ । मम तै अबरु तकिहु गति कोई ॥ 
तुहरे हिय कछु प्रिय नहि जाना । सदा कहिहु पिय प्रान समाना ॥ 

जिअ बिनु देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरुख बिनु नारी ॥ 
तनु धनु धाम धरनि पुर राजू । पत बिहीन सबु सोक समाजू ॥ 

नाथ सबहि सुख साथ तिहारे । सरद बिमल बिधु बदनु निहारे ॥ 
पिय बिनु सुखद कतहु किछु नाही । रहसि चहत अजहूँ बन माही ॥

आपनि कहि बिसराए के पिया संग परिहारि । 
घन हठ हृदयँ बिचार करि सुनिहु न मोरि गुहारि ॥ 

शनिवार, १८ फरवरी, २०१७                                                                              

जेहि बन अस्थरि रिषि मुनि मन भाइँ । निज इच्छा ते तहाँ तुम आइँ ॥ 
दरसत मुनि पूजिहु रिषि नारी । पूर भई अभिलाष तिहारी ॥ 

अजहुँ नयन तव पंथ निहारिहि । निसदिन हिय सिय सियहि पुकारिहि ॥ 
आजु प्रीत यहु पूछ बुझाईं । तोहि काहे न देइ सुनाई ॥ 

पतिब्रतासति कतहुँ कि न होईं । गहि एकु पति गति अबरु न कोई ॥ 
होए सो जड़ चहे गुनहीना । धन बिहीन बिनु श्रम अतिदीना ॥ 

ऐसेहु पति गुन सिंधु समाना । पावहि नतरु नारि दुःख नाना ॥ 
होइबी जो पति मन अनुकूला । सुनहु सिया सो सुखकर मूला ॥ 

रहे हृदयँ गोसाइँया गहियबआदरु मान । 
सोइ जगदातम श्रीपति सह सिउ सती समान ॥ 

सोमवार, २० फरवरी, २०१७                                                                              

करहि कुलीन तिय कारज जेतु । होत सो सब पति तोषन हेतु ॥ 
पुर्बल परम पेम ते पोषा । रहा तुम्ह पर मैं परितोषा ॥ 

पाइब बिरह प्रीति अरु गाढ़हि । एहि समय परितोषु अरु बाढ़हि ॥ 
जप तप तीरथ ब्रत कि त्यागा । दान दया यहु धर्म बिभागा ॥ 

करहिं जबहिं प्रसन्नचित मोही । सोई साधन सुफल तब होंही ॥ 
पद बंदन मम तोषन तेऊ । होइब पारितोषित सब देऊ ॥ 

मम कहि नाहिन तनिक सँदेहू । अबरु बचन इब मृषा न ऐहू ॥ 
देखिअ द्रबित रूपु नरहरी के । कहेउ लषन धीरजु धरी के ॥ 

सिया अनाई हेतु कहिहु जोइ जोइ रघुराइ । 
कहिहउँ सबिनय बना अति भल सोइ सोइ तहँ जाइ ॥ 



  
 






















Friday, 5 August 2016

----- ॥ टिप्पणी १० ॥ -----

>> हिन्दू उपासना पद्धति मरुस्थल को भी वनस्थली में परिवर्तित करने में सक्षम है
राजू : -- हाँ परीक्षा के लिए किसी मरुस्थल में एक शिव लिंग भर स्थापित कर दो  फिर देखो भारतीय धार्मिक नारियां  सींच सींच कर  पीपल, वट, आंवला, नीम, बेल, कदम्ब, आम आदि वृक्षों से  कैसे उसे दोहरा  करती हैं. 
>> भारत में अब भी मुसलामानों का ही राज है, काले नोट  पर लाल किले को देखकर ऐसा मेरे को ही लगता है की आप लोंग को भी लगता है.....?
>> ' अपनी सत्ता -अपनी मुद्रा ' अब देश इस मुद्रा व्यवस्था के लिए भी तैयार रहे....
>> १५ अगस्त, १९४७ यह तिथि इतिहास के काले पन्नों पर सत्ता के लालचियों द्वारा भारत के टुकड़े टुकड़े कर सत्ता प्राप्ति की तिथि के रूप में उल्लखित होगी.....

>> राजू ! पता है इन दिनों प्रधान मंत्री क्या कहते फिरते हैं..,?
      राजू : -- क्या मास्टर जी.., ?
      " काश ! मैं पुरुष होता..,
      राजू : -- किन्तु मास्टर जी ! चुनाव से पहले तो वे कहते थे की मैं महापुरुष हूँ.....

>> अपनी बिरादरी के सहयोग से पड़ोसी कश्मीर को मार्ग बना कर देश में अंतरस्थ हो गया है , और ई मंत्री जी सीमापार कर प्रोटोकॉल मांगने गए थे ?  घर में ही काहे नहीं दे दिए.....

 राजू : -- हाँ तो जब शत्रु अपने आस-पास हो , तो इधर-उधर जाने की क्या आवश्यकता..... 

Thursday, 4 August 2016

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

घनक घटा गहराए जिमि भोर लखइ नहि भोर । 
झूलए झल जल झालरी मुकुताहल कर जोर ॥ 

Sunday, 31 July 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५४ ।। -----

रविवार, ३१ जुलाई, २०१६                                                                                                 

तुम त्रिकाल दरसी रघुनाथा । बिस्व बदर जिमि तुहरे हाथा ॥ 
लोगहि चरन सरन जिअ जाना  । बोधिहौ मोहि सोइ बखाना ॥ 
हे रघुनाथ ! आप त्रिकाल दर्शी हो यह चराचर विश्व आपके करतल पर रखे बद्रिका के समान है । लोकाचार के आश्रय आपने ज्ञातित प्रसंग मुझसे पूछा । 

तथापि प्रभो सबहि दिन जैसे । कहिहउ जसि करिहउँ मैं तैसे ॥ 
 सिरोमनि तुम सबहि के राई । कहौं  बृतांत  सुनहु गोसाईं ।॥ 
भावार्थ : -- तथापि प्रभु में सदैव की भांति आपकी आज्ञा का अनुशरण करूंगा ॥  आप सभी राजाओं के शिरोमणि हो  अत: हे स्वामिन  ! जो आपने पूछा मैं वह वृत्तांत कहता हूँ सुनिये  : -- 

सिरु पतिया सोहत अति भारी । प्रभो तुरग सो कृपा तिहारी ॥ 
पथ पथ पुर पुर पौरहि पौरे । बिरमन बिनहि भूमि बन भौंरे ॥ 
 प्रभो ! आपका कृपापात्र होकर भालपत्र के कारण शोभा को प्राप्त वह अश्व रहित पंथ-पंथ, नगर-नगर, द्वार-द्वार भूमि-भूमि, वन-वन  में व्यवधान से रहित होकर विचरता रहा ॥   

दिनकर कुल अस तेज प्रचंडा । निज बल केहि न होइ घमंडा ॥ 
पुरबल हय को गहिब न पारा । जो बल गरब गहिब सो हारा ॥ 
दिनकर क्वे वंश का पराक्रम आवेस प्रचण्ड है कि किसी भी राजा को अपने बल पर दर्प नहीं किया । पूर्वतस किसी ने उस अश्व का हरण नहीं किया, जिसने किया वह परास्त हो गया ॥ 

प्रभो श्री चरनन सिरु नत सब नृप सहित समाज । 
जोग जुग पानि आनि लिए अरपिहि निज निज राज ॥ 
पुरजन परिजन पुत्र-पौत्र सहित वह नृप  प्रभु के श्री चरणों में अपना -अपना राज्य समर्पित कर विनय पूर्वक नतमस्तक हुवे ॥ 

गह सकै हय जोइ अवनीसा । अहहिं कहु त को असि बिजिगीसा ॥ 
जोइ दनुजपत दसमुख हंता । जानत  ए सोए जाकर कंता ॥ 

प्रभो मनोरम तुरगम तोरे । पहुँचिहि अहिच्छत्रा पुर पौरे ॥ 
रुर रुचिर अति रमनीअ देसू । बीर सुमद तहँ बसैं नरेसू ॥ 

सुनि सो प्रबसि अस्व एकु नीके । अहहि अवध पति रघुबर जी के ॥ 
कह सँवारन नगर निकेता । बहुरि सहित सुत सैन समेता ॥ 

गए रिपुहन पहिं प्रभु पद सेबा ।  सबहि सम्पत समरपत देबा ॥ 
 बड़ बड़ पत जा सहुँ नत होई । प्रनत तव पद सुमद प्रभु सोई ॥ 

तव दरसन उर लाह लिए आयउ पाए पयाद । 
अजहुँ  डिठी निपात ताहि देवौ कृपा प्रसाद ॥    

सोमवार, १ अगस्त, २०१६                                                                                                          
करिअ रवन गयउ जब आगे । निद्रालस बस रजस कन जागे ॥ 
धावत गयउ नगर ते दूरे । घेर गिरिबन गगन भरपूरे ॥ 

 बहुरि सुबाहु नगर पगु धारा । जोहि जोइ बल सबहि प्रकारा ॥ 
तेहि के सुत दवन सुभ नामा । गहए ताहि त भयउ संग्रामा ॥ 

जूझत मुरुछा गहि महि परयो । पुष्कल बिजै कलस कर धरयो ॥ 
तब महतिमह राउ सुबाहू । आयउ खेत भरे उर दाहू ॥ 

चले समुह गरजत हनुमंता । भिरिहि तासु सो नृपु बलवंता ॥ 
ताकर ग्यानु श्राप बिलोपा । रहे न सुधि किछु उर भर कोपा ॥ 

द्युति गति गत अति बलवत मारि चरन हनुमान । 
लगे श्राप दुराए गयो बहुरिहि गयउ ग्यान ॥  

मंगलवार, ०२ अगस्त, २०१६                                                                                            

पुनि सो महिपत प्रभु कर सेबा । सौंपि चरन निज सरबस देबा ॥ 
समर कला सब बिधि कुसलाया । प्रनमत बिनय बत जोइ राया ॥ 

जाकर गाँठिल तुंग सरीरा । अहहि सुबाहु सोइ रनधीरा ॥ 
दया डिठी करि प्रभो निहारी । किजो तापर स्नेहिल बारी ॥ 

तदनंतर मेधीअ तुरंगा । चोख चरत इब भयउ पतंगा ॥ 
आयउ देउ नगर संकासा । सुहा गहि अति बसिहि केलासा ॥ 

तहँ घटे सो बिदित सबु काथा । आए इहाँ आपहि रघुनाथा ॥ 
मिलिहि बहुरि बधि बिद्युन्माली । सत्यवान नृपु बहु बलसाली ॥ 

आगिल कल कुंडल नगर चपरित चरण धराए ॥ 
भयउ समर जोए रघुबर सो सब अहिहि जनाए ॥ 

बुधवार, ०३ अगस्त, २०१६                                                                                  

बहुरि कुंडल नगर ते छूटा । बिचरत चहुँ दिसि बिनहि अगूँटा ॥ 
अजहुँ गहिब न केहि बरबंडा । निज बल करिअ न कोउ घमंडा ॥ 

]भँमरत चपल चरन जबु फेरे । तेहि औसर सघन बन घेरे ॥ 
पहुंचसि प्रभु तव तुरग मनोरम । बाल्मीकि केर नीक आश्रम । 

गयउ माझ जूं बिटप समूहा । सुनहु तहँ जौ भयउ कौतूहा ॥ 
बीर बलो एकु बालकु आयउ । सोडस बरस बयस कुल पायउ ॥ 

जति पटतर पट कर धनु धारा । रूप बरन रघुबर अनुहारा ॥ 
भाल बँधेउ पतिया पेख्यो । लिआ गहि पढ़ बतिया देख्यो ॥ 

घनक घटा गहराए जिमि भोर लखइ नहि भोर । 
सैन पाल काल जित असि करियो रन घन घोर ॥ 

बृहस्पतिवार, ०४ अगस्त, २०१६                                                                               

गह सो बीर तरल तलवारा । करा प्रहार धरातल पारा ।\ 
बहुरि कला कृत एक ते ऐका । मारिब पुष्कल सहित अनेका ॥ 

रिपुदवनहु जबु ता सहुँ गयऊ । मर्माहत कृत मुरुछा दयऊ ॥ 
लह हरिदै दुःख दारुन दाहू । फरकेउ नयन अरु दुहु बाहू ॥ 

कोपहि असि जसि कोपि न काहू । दिए अघात करि मुरुछित ताहू ॥ 
होइ बीर सो हत चित जोंही । प्रगसि अबरु एकु बालक तोही ॥ 

दरसन माहि दोउ एक रूपा । धनु कर जटा धर जति न भूपा ॥ 
प्रथम एकहि एक होइँ सहाई । बहुरि जुगत दुहु करिब लड़ाई ॥ 

हय हस्ति बट 
अँट भट मरकट भरी चतुरंगनि सैन बिभो । 
फेरि बदन धुजा पट मुख धरी लटपट भय भर नैन बिभो ॥ 
धाई थरथरी कटि घट कर पिछु पछियावैं बैन बिभो । 
उपटन चरन अह !घूँघट करी निरखिहि ऐंचा तैन बिभो ॥ 

किरीट कवच कल कुंडल मौलि मुकुट मनिहारी । 
सब सिंगार निहार सो हरि हर लियो उतारि । 

कर कोदंड कलित करे बले बलइ बल हार । 
अह सर्या कर धार सो, लेइ गयो चिन्हारि ॥ प्रभो 

शुक्रवार, ०५ अगस्त, २०१६                                                                                           

बाँध्यो गहिब दुहु कपि कंता । एकु सुग्रीव एकु हनुमंता ॥ 
कसियो बलइ रसरि कर जोरी । परन कुटिर लय गयो बहोरी ॥ 

तदनंतर कृपाकर आपही । मेधीअ तुरग देइ बहुरही ॥ 
मरनासन पुनि सैन जियावा । अह साँसत जिअ महु जिअ आवा ॥ 

लेइ गहिब सो हय सिरु नाईं । आए सरन त्रिभुवन गोसाईं ॥ 
ऐतकहि प्रभो मोहि जनाया । जिन्हनि प्रगसित सहुँ कहि पाया ॥ 

कहत अहिपत सुनहु बिद्बाना । घटना बलि जस सुमति बखाना ॥ 
बाल्मीकि कर आश्रमु नीके । बसएँ सुत जहँ जानकी जी के ॥ 

कवन सो बीर प्रभु अनुमानिहि । जानपनी सब जान न जानिहि ॥ 
राघव मंदिर महमखु होई । दीन्ही चरन मुनि सब कोई ॥ 

तहँ सहुँ आनि पधारिहि बाल्मीकि मुनि राए । 

सब बिधान अनुमान के, तासों पूछ बुझाए ॥  

रविवार, ०७ अगस्त, २०१६                                                                                   

मुनि तुहरे कुटि मम सम रूपा । कवन जमलज जौ जति न भूपा ॥ 
धनुर बिधा महुँ परम प्रबेका । समर कला कृति एक ते ऐका ॥ 

सचिउ सुमति मुख बरनै जैसे । होइ कहहु को चकित न कैसे ॥ 
किए मुरुछित रिपुहन समुहाई । हति खेत खेलाइ खेलाई ॥ 

बाँधि लियो हँसि हँसि हनुमंता । छाँड़ दियो कसि तुरग तुरंता ॥ 
कौतुक उपजिहि मन किन काहू । बालकन्हि सब चरित सुनाहू ॥ 

बाल्मीकि मुनि कहए स्वामी । नराधिपत तुम अन्तर्यामी ॥ 
तुम निधान ग्यान गुन सीला । जानिहु प्रभो सबहि नरलीला ॥ 

पूछेउ मोहि कहौं सो तुहरे मन परितोष । 
गहौ चरन कर दिजो छम जान कतहुँ मम दोष ॥ 

सोमवार, ०८ अगस्त ,२०१६                                                                                        

जौ बेला तुम जनक किसोरी । प्रान समा सिय हियप्रिय तोरी ॥ 
दोषु बिनहि परिहर बन देहू । आनि न कबहु न केहि सपनेहू ॥ 

मन क्रम बच प्रभु पद अनुरागी । देहु गरभिनि सम्पद त्यागी ॥ 
बेहड़पन अत बनहि ब्यापा । बिहरत बिहरन करिहि बिलापा ॥ 

ब्याल कराल बिहग बन घोरा । जग लग रयन बिलग न भोरा ॥ 
कातर कंठ करुना अस भारी । उपटन चरन चरिहि सुकुआँरी ॥ 

पग बिनु डग मग रिपु बहु जाती । दहइ दारुन कुररि की भाँती ॥ 
दुःख आतुर अह बिलखति रोती । मुकुता गह मुख मुकुत पिरोती ॥ 

दुखिया जनि गोसाईंया, निरखत बन मेँ ताहि । 
पुनि सादर निज परन कुटि लेइ गयो सँग माहि ॥ 


मुनि बालक करनक चुगि ल्याए । करीर नठि सुठि कुटीरु बनाए ॥ 
तहँ दुहु जम कुल दीप जनावा । दीपित द्योति दहुँ दिसि छावा ॥ 

एक कर नाउ कुस में राखेउँ । दूज लाल लव कहि भाखेउँ ॥ 
उजरै बिधु जिमि उजरै पाँखा । जुगल तनुज तिमि बढ़तै लाखा ॥ 

चारिउं बेद सहित छहुँ अंगा । भयउ कुमार पढ़िय सब संगा ॥ 
दै बिद्या सब दिया जनेऊ । होए कुसल मुनि बालक तेऊ ॥ 

आजुरबेद कि आयुध बेदा । सकल सास्त्र सहित सब भेदा ॥ 
करियउँ जगत निपुन रघुनाथा । बहोरि धरा माथ पर हाथा ॥ 

षडज ते निषाद लग जब , सुर सरगम  कर जोग । 
 मधुर मधुर गावहिं तब चितबहि चितबत  लोग ॥ 

बुधवार, १० अगस्त, २०१६                                                                                    

सत सुर माल कण्ठ कर बीना । करिहि सांगत त भयउ प्रबीना ॥ 
पूर पनब जब बजएँ मृदंगा । रंजनए छहुँ राग सहुँ रंगा ॥ 

जुगल केरि अस कौसल देखा । होहि मोहि पभु हरख बिसेखा ॥ 
परम् मनोहर श्री रामायन । तासु नितप्रति करैं सो गायन ॥ 

जानत ए के होवनिहारा । पूरबल जिन्ह रचि मैं पारा ॥ 
मधुप निकर जस मधुबन झौरहिं । करत गान तिमि बन बन भौरहि ॥ 

 कुसुम कली कुसुमित अति सौंहे ।  खंजन सहित मृगहु मन मौहें ॥ 
 गावत लय गति अति मधुराई । श्रोतस श्रुत श्रुत श्रुति सुख पाई ॥ 

श्रुति सो गायन  श्रुति सुख पावन बारि पति पुनि  एक दिवा । 
गहेउ हाथ निज साथ पुनि बिभावरि पुरी गयउ लिवा ॥ 
जुगल मुकुल मंजुल मनोहर सुर सागर करि पार गए । 
पावन पबित तव मृदुल चरित गावनि देउ आयसु दए ॥ 

जनमत भगवन लगन परि बादिहि बादल बृन्दु । 
दसानन बन सिय लिए हरि झरि झर झर जल बिंदु ॥ 

बृहस्पतिवार, ११ अगस्त, २०१६                                                                               
बादिहि बादल बृन्दु अगासा । झरिहि झर झर बिंदु चहुँ पासा ॥ 
भर भर कलसि करषि कर देईं । पियत पयस बूझै न पिपासा ॥ 

बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस बरुन निवासा ॥ 
कंठ ताल नूपुर दल पूरे  । गावहि झनक झनक चौमासा ।  

दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन प्रभाकर करिहि बिलासा ॥ 
कोमल करज जलज जय माला । पहिरावत मुख लवन ललासा ॥ 

गिरि गहबरु अरु फिरैं पयादे । कुपित जनि जब दियो बनबासा ॥ 
हरिअ हरानत हरि अरि हरियो । ल्याए हरि हरि करिअ बिनासा ॥ 

अबरु अबरु अरु गीति ग्याता । हितु हिती गन सहित हे ताता ॥ 
श्रुत बरुनप निज परिजन साथा । राजस रहस सरस सो गाथा ॥ 

अस तो सरस् पयस बहु होईं । तोर चरित ते अधिक न कोई ॥ 
सकल श्रोतस श्रवनतहि जाइहिं । चरित पयस नहि पियत अघाईं ॥  

 बरुन लोक मैं गयउँ बहोरी । करे अगवान दुहु कर जोरी ॥ 
द्रवीभूत मम बंदन करियो । पेम भाव हिय पूर न परयो ॥ 

रागिन रंग बयस गुन सोंही । बरुन जुगल पर प्रमुदित होंही ॥ 
सुनि रघुकुल मनि तजहि सगर्भा । कहिहि एहि बिधि सिया संदर्भा ॥ 


 सिय सम जग को सती न होई । अहहि अस पति बरता न कोई ॥ 
होहि सो गुन संपन्न कैसे । जोहि महि ससि सम्पदा जैसे ॥ 

सील बिरधा रूपवती रघुबर देइ बियोग । 
पतिब्रता सिय परम सती नहि त्याजन जोग ॥ 

बृहस्पतिवार, १८ अगस्त, २०१६                                                                                   

समर बीर पुनि जुगल जनावा । कहहु त असि सुभाग कहँ पावा ॥ 
मन क्रम बच ते सदा पुनीता । परिहर देँ अस जोग न सीता ॥ 

ताहि के हम सबहि सुर साखी । राम बिनु सिय बिहग बिनु पाखी ॥ 
जासु चरन नित चिंतत जेहीं । मिले तुरतै साध फल तेही ॥ 

जगत सृजन थिति लय किन होही । होत सब श्री संकलप सोंही ॥ 
जिन सोंहि भगवद ब्यौहारा । सो त मरित अमरित की धारा ॥ 

प्रभु तुम  सूर सिया संतापा । प्रभु तुम धनद सिया जल भापा ॥ 
प्रभु तुम गहबर घन सिय बारी । तव प्रिय सियहि पदारथ चारी ॥ 

ब्रम्हा शिव पद सिय सों पावा । तासु सबहि दिक् पाल जनावा ॥ 

जगदधात हे सर्ब ग्याता । जगद पिता तुम अरु सिय माता ॥


जानतहउ प्रभो आपहु, सिय नित सुधिता आहि । 
सो तो प्रिय प्रान सम तव अरु को प्रिय कर नाहि ॥ 

शनिवार, २० अगस्त, २०१६                                                                                 

नित पावन पबित सित जानत ए । प्रभु दिजौ मान जसि पुएबल दए ॥ 
साप संगत तव पराभावा । अस तौ जग को करिअ  न पावा ॥ 

सुनु मुनि प्रभु पहि गत पद गहिहउ । जे सबहि मम कही बत कहिहउ  ॥ 
बरुन नाथ कह बहुंत प्रकारा । एहि बिधि प्रगसिहि मनस विचारा ॥ 

सिया सकार जोग गोसाईं । सब निज निज मत सम्मत दाईं ॥ 
यह तुहरे जुग राज दुलारे । करिहि चरित जब गान तिहारे ॥ 

अह नर रूप धरे नारायन । बरुन पति घर गाएं रामायन ॥
सुरासुर गंधरब किन होई । भयउ कौतुक बिबस सब कोई ॥ 

सुनत सुमधुर राम कथा मन बहु रोचन होंहि । 
सब कीन्हि बढ़ाई तहँ मुदित भ्रात कर दोइ ॥ 

रविवार, २१ अगस्त, २०१६                                                                                      
लोकाधिप असीस जो देईं । तुहरे सुत सो सहरष लेईं ॥ 
रिषि महरिषि गन ते अधिकाई । दोउ मान जस कीरति पाईं ॥ 

पुण्य श्लोक पुरुष बर साथा । होवत तीनि लोक कर नाथा ॥ 
एहि औसर गहिहौ घट काँचा । गहस धर्मि निभ करिहहु नाचा ॥ 

बिधा सील गुन भूषन धारे । गहन जोग दुहु तनुज तिहारे ॥ 
सिय सुधित अब सबहि पतियारे । कुँअरु सहित प्रभु ताहि सकारें ॥ 

प्रान दान दए सैन जियाई । अहहि बहुतहि सुचित सो माई ॥ 
दीन बन्धु हे दया निधाना । प्रतीति हुँत एहि  साखि प्रवाना ॥ 

पतित अपबित पुरुष हुँत पावन हर ए प्रसंग । 
सुबरन बहुरि सुबरन हैं होइहि केत कुरंग ॥