Tuesday, 22 May 2018

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

खोल के पुरट-पट घन स्याम रँग दिखाए है, 
होरी हाथ जोरि मोहे सबहि ढंग मनाए है.., 

पाए पाति पवन संग नभ बढ़ि चढ़ि पतंग, 
कासि थोरि थोरि डोरि अपने सँग मिलाए है..,


सपन नव दए के नैन रैन चरन भए बिहंग, 
भोरी चोरि चोरि रंग में भंग मिलाए है.., 



प्रीतम हरि लाल सरि करि ताल धरि रँग-बिरंग 
हो री होरी होरी बिन रे मोहे अंग लगाए है 

पुरट-पट = सुनहरा घूँघट, बिजली का घूँघट 




खोल के चश्मे-जद यूँ शाम रंग दिखाए, 
दस्ते-सफ़हे पे शफ़क़ टूट के बिखरी..,  

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

बाबूजी मोहे नैहर लीजो बुलाए, 

नैन घटा घन बरसन लागै घिर घिर ज्यों सावन आए, 
पेम बिबस ठयऊ सनेहु रस जबु दोइ पलक जुड़ाए.., 

भेजि दियो करि ह्रदय कठोरे  काहु रे देस पराए, 
बैनन की ए बूंदि बिदौरि छन छन पग धुनि सुनाए..,


मैं तोरि बगियन केरि कलियन फुरि चुनि पुनि दए बिहाए,
ए री पवन ये मोरि चिठिया बाबुल कर दियो जाए..,


पिय नगरी महुँ सब कहुँ मंगल चारिहुँ पुर भए कुसलाए, 
सुक सारिका अहइँ सबु कैसे पिंजर जिन रखिअ पढ़ाए.....

Monday, 21 May 2018

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

अब तो नज़रे उस हर्फ़े-दुआ को पढ़े है,
 ले जाए कोई ये पैग़ाम बराए-दर.....

----- ॥ दोहा-पद॥ -----,

लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि भए पानी पानी..,


ओ रे पिया ए रतन अमोलक, हाय ए मोल न जानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,

निसदिन करि ए कहि बतिया, गह गह गयउ बखानी
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी


कासे कहें कहँ जा सुनावैं, ए हमरी राम कहानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,

हम सहुँ कहुँ परोसहु बैरि जनिहि न राम कि बानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,

अजहुँ त परबत परतस लागे, हिय करि पीर पिरानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी.....



जौ बाति कहउँ मैं साँचि
हेरि मुख भीत फनिस सी, घरि घरि एहि रसना नाचि,
बाँचि सबहि जग कर कहनि अरि हरि कथा न बाँचि..,
सुनु प्रसंगु एहि कल कीर्तन छाँड़ि मन रंजन बहु राँचि,
पढ़ि सब पढ़नि पढ़ि न हरिप्रिया कर आखरि पै पाँचि..,
जगवनि सबु रस कंठ करि बरु भगवनि भू दे कांचि,
जग बिरुझ भरिअ कुलाँचे जिमि हिरनी मारि कुलाँचि.....

----- ॥ दोहा-पद॥ -----,

जगत-जगत बिरतै रे रतिया 
अम्बरु अंत लग जग जागे, जागत जरत जोति बरतिया | 
दिसै कमन बहु कुटिल करमचँद, कहत जगत कहि सुनी बतिया ||

करमन कर लेखा पढ़त फिरै, पढ़ी सकै चिठिया न पतिया | 
बैनन्हि के बिँग बैनाउरि कसि कसि छाँड़ बिँधे उत्खतिया   ||  

जो ये बस्ती भई बैरागि तो जा पड़े को परबतिया | 
बिरुझत बिदूखत बैरु करेउ भूतेसु के रे बरतिया || 

भक्तिकाल 

सँवरे सँवरे मोरे सँवरिए चितइ नहि देउ मूरतिया | 

बिरज उजारी दए झिरकारी  भयउब भूरि दुरगतिया || 

जोति बरतिया = ज्योति वर्तिका 
कुटिल करमचँद = कुटिल कर्मों से युक्त 
बिंग = व्यंग 
बैनाउरि = बाणावली 
बिदूखत = दोषारोपण करना 

बिरज उजारी = ब्रज को उजाड़ने वाली, वर्जना और जलाने वाली
झिरकारी=फटकार 

Sunday, 20 May 2018

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

जगत-जगत बिरती रे रतिया,  
बिरतै रतिया रे जगज उठे,
बिरताइ रतिया रे जगज उठे, 

अरुन उदयो अँजोरा सुधयो तज सैय्या सूरज उठे |                     हाँ तज सैय्या सूरज उठे ..
बिराज पुनि रथ उतरे छितिज पथ, परस चरन सिरु रज उठे ||    हाँss परस चरन सिरु रज उठे.. 
सरस सरोजर जोरे पानि सिस नाई पद पंकज उठे |                   सिस नाई पद पंकज उठे.. 
देय ताल मृदुल मंदिरु मंदिरु ढोल मजीरु मुरज उठे ||                  ढोल मजीरु मूरज उठे ..

सुर मालि पुर मधुर मनोहर संख नूपुर सहुँ बज उठे |                  हाँ संख नूपुर सहुँ बज उठे ..
सहस किरन बिनिन्दत गरुअत कलसी सिखर कर ध्वज उठे ||   कलसी सिखर कर ध्वज उठे ..
करत आरती सकल भारती भरि भेस भूषन सज उठे |                भरि भेस भूषन सज उठे.. 
बसहि बासि जिमि चहुँ कोत बासत कोटि कोटि मलयज उठे ||    हाँ कोटि कोटि मलयज उठे..  

अगज-जगज जगत भए सब जीव जगत के जाग |  
हरिअरी हरिदय निकेत जाग उठे अनुराग || 

अरुन उदयो = भोर हुई 
अँजोरा = उजाला
रज = कण, पराग कण 
पाणि = हाथ 
मजीरु मुरज = मंजीर मृदंग,
मलयज = चन्दन 
हरिअरी = धीरे धीरे 

Saturday, 19 May 2018

----- || राग बैरागी भैरवी || -----

----- || राग बैरागी भैरवी || -----

जगलग ज्योत जगाओ रे, 
चहुँपुर निबिर अंधियार भयो अब रैनी चरन बहुराओ.., 

पंथ कुपंथ मोहि न बूझे, चलेउ कहाँ अजहुँ न सूझे, 
रबि सारथी नियराओ.., 

धरिअ करतल प्रभा प्रसंगा उतरो हे देव रथ संगा.., 
दिसि-बिदिसि अरुनाओ..... 


दिसि -बिदिसि = दिशा व्  दिशाओं के कोण