Thursday, 12 July 2018

----- ॥ दोहा-पद १९ ॥ -----,

                   ----- ॥ गीतिका ॥ -----
हरिहरि हरिअ पौढ़इयो, जी मोरे ललना को पलन में.,
बल बल भुज बलि जइयो, जी मोरे ललना को पलन में.,

बिढ़वन मंजुल मंजि मंजीरी, 
कुञ्ज निकुंजनु जइयो, जइयो जी मधुकरी केरे बन में..... 

बल बल बौरि घवरि बल्लीरी,
सुठि सुठि सँटियाँ लगइयो लगइयो जी छरहरी रसियन में.....

 पलने में परि पटिया पटीरी, 
बल बल बेलिया बनइयो बनइयो जी मोरे ललना के पलन में..... 

दए दए दसावन ओ री बधूरी , 
सुरभित गंध बसइयो बसइयो जी मोरे ललना के पलन में.....


हरिहरि हरिअ  = धीरे से 
हरुबरि = मंद-मंद 
बिढ़बन = संचय करने 
मंजि-मंजीरी = पुष्प गुच्छ, कोपलें पत्र इत्यादि 
मधुकरी केरे बन = भौंरो के वन में- मधुवन 
बल बल बौरि घवरि बल्लीरी =  आम के बौर से युक्त लतिकाएं । बढ़िया से गुम्फित कर 
पटिया पटीरी =चन्दन की पटनियाँ 
बल बल बेलिया = घुमावदार बेलियां 
दसावन = बिछावन 

Wednesday, 11 July 2018

----- ॥ दोहा-पद १८ ॥ -----,


            ----- || राग-बिहाग | -----
बाँध मोहि ए प्रेम के धागे प्यारे पिय पहि खैंचन लागे  |
अँखिया मोरि पियहि को निरखे औरु निरखे नाहि कछु आगे ||
निरखै ज्योंहि पिय तो सकुचै आनि झुकत कपोलन रागे |
ढरती बेला सों मनुहारत  कर जोर मन मिलन छन मागे ||
दिसि दिसि निसि उपरागत जब सखि गै साँझी नभ चंदा जागे | 
मिले दुइ छनहि त कर गहि चुपहि पद चापत पिया लेइ भागे ||
धरे करतल भरे पिय बैंयाँ सब लोकलाज दियो त्यागे |
बँध्यो तन मन पेम के पासु मोरे रोम रोम अनुरागे  ||
चितब रहिउ कहँ पिय मोहि काहु त गिरे पलक पियहि समुहागे |
करनन्हि फूर परस प्रफूरे पैह पिया के अधर परागे ||
लगन मिले ऐसो सजन मिले एहि भा हमरे सौभागे ||

 रैनी द्वार बिराजहि लेइ सुख सौभाग |
सुहासिनि मधुरिम मधुरिम गावत रहि सोहाग ||

भावार्थ = प्रिया कहती है -- देखो ( सखी )ये प्रेम के धागे मुझे प्यारे प्रीतम के पास खैंचने लगे हैं | मेरे नयन प्रीतम को ही देख रहे हैं इन्हे आगे और कुछ भी नहीं दिखाई देता ||  प्रीतम ने ज्योंहि मुझे देखते हुवे देखा तब लज्जावश  नयन झुक आए और  कपोलों को सुरागित कर दिया || ढलती हुई बेला से मनुहार करते मन ने मिलन के क्षण मांगे || संध्यावसान के पश्चात दिशा दिशा में निशा को अरुणिम करते हुवे जब नभ में चंद्रोदयित हुवा तब मिलन के दो क्षण प्राप्त हुवे तब प्रीतम ने चुपके से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे दबे पाँव ले भागे || प्रीतम ने सभी लोक मर्यादाओं का त्याग करते हुवे प्रीतम ने करतल धरे जब उन्होंने मुझे भुजाओं में भरा तब हे सखी ! तनमन प्रेम पाश के बंध गए और रोम रोम अनुराग से परिपूरित हो गए  | मुझे क्यूँ देख रही थीं ? जब प्रीतम ने यह पूछा  तो ये पलकें उनके सम्मुख अवनत हो गईं  | प्रीतम के अधर परागों के स्पर्श को प्राप्तकर कर्णफूल जैसे प्रफुल्लित हो उठे | लग्न उदयित हुवे तो ऐसे प्रीतम मिले हे सखी यह मेरा सौभाग्य है | 

Sunday, 8 July 2018

----- ॥ दोहा-पद १७ ॥ -----,


साँझ सैँदूरि जोहती पिया मिलन की रैन | 
रीति के बस दिवस भयो भयो प्रीति बस नैन || 

स्वजन सोँहि बैनत गए नैन पिया के पास | 
लखत लजावत पियहि मुख बिथुरी अधर सुहास || 

ना निलयन ते दूर हैं न नैनन ते दूर | 
सौमुख मोरे साँवरे तापर बिरह अपूर || 

हेली मेली मेलि जूँ हेलि मिले पुनि कोइ | 
मिले नहीं पर पिया सहुँ घरी मिलन की दोइ || 

अंजन कू अंजन कियो पलकनि करियो पाति | 
नैना ठहरे बावरे बैने हिय की बाति || 

भावार्थ : - सिन्दूरमयी संध्या प्रियतम के मिलन-रात्रि की प्रतीक्षा में थी  दिवस रीतियों के अधीन तो प्रिया के नेत्र प्रीति के अधीन हो चले थे || १ || स्वजनों से वार्तालाप करते जब प्रीतिपूरित नेत्र प्रियतम के पास गए तब प्रियतम के लज्जाशील मुख-मंडल को देखकर प्रिया के अधरों पर एक मंद हास बिखर गई || २ || न ह्रदय  से दूर थे  न ही नेत्रों से दूर थे प्रियतम  सम्मुख उपस्थित थे तथापि वियोग भरपूर था  || ३ || संगी-साथी  मेल मिलाप कर लौटते तो प्रियतम को फिर कोई और पुकार लेता इस प्रकार दिवसभर में प्रियतम को प्रिया से मिलाप हेतु दो क्षण तक नहीं मिले || ५ || प्रीति की अधीनता ने काजल को मसि व् पलकों को पत्र में परिणित किया और बावरे नैन अंतर्मन की बातों को व्यक्त करते चले गए ( जिसे न जाने कब प्रियतम ने पढ़ लिया )|

Tuesday, 3 July 2018

----- ॥ दोहा-पद १६ ॥ -----,

बादहि बादल बजहि बधावा,
पिया भवनन मोदु प्रमोदु मन सावन घन घमंडु भरि छावा | 
मंगल धुनि पूरत अगासा परत रे पनवा माहि घावा  ||   
हेरी माई देउ सगुनिया परिअ दुअरि दुलहिन के पाँवा |  
कंठि हारु कर करिअ निछावरि तृन तोरत सिरु बारि फिरावा ||   
सकल ननदिया आरती करहि पावै सोइ जोइ मनभावा | 
लोक रीति करि पाएँ पखारै दूब पयस मय थार धरावा ||  
छुटत कंगन खोरत कर गाँठि हारत गए पिय खोरि न पावा  |  
दूबि संगत धरेउ बरायन गोतिनि कंगन द्युत खिलावा || 
गह करतल पिय बारहिबारा ,जय पावत मुख बिहँस सुहावा  |  
गावैं जहँ तहँ लोग लुगाई निरख नयन भर पियहि बिहावा || 

भावार्थ : - बादल वादन कर रहे हैं जिसमें 'बधाई' बज रही है | प्रीतम के भवन पर परिजनों के मन में आनंदोल्लास, सावन के मेघों जैसे घुमड़ कर छा रहे हैं | नगाड़ों पर चोट पड़ रही है, मंगल ध्वनि से आकाश परिपूरित हो रहा है | वधु के आगमन का सन्देश देते हुवे देवर ने कहा अरी जननी शगुन दो तुम्हारे द्वार पर दुलहन का आगमन हो रहा है तब  होती जननी बलैयाँ लेती कंठ पर के हार को वधु के शीश पर वार कर न्यौछावरी देती हैं | सभी ननदें वधु की आरती उतारती हैं और रूचि अनुसार भेंट प्राप्त करती हैं | लोक रीति का निर्वहन करते वरवधू का चरण प्रक्षालन किया गया दूर्वा पायस से युक्त थाल सामुख आधरित की गई | सप्त-ग्रंथि पड़े कंगन खोलने के खेल में  प्रीतम की हार होती हैं वह ग्रंथि खोल नहीं पाते | तदनन्तरखोले गए कंगन के छल्ले को दूर्वा के साथ पयस भरी थाल में ज्येष्ठ पत्नी वरवधू को कंगन के पण की क्रीड़ा करवाती हैं | प्रीतम छल्ला न ढूंढ कर वारंवार वधु का करतल ग्रहण करते हैं तथापि उक्त क्रीड़ा में वह विजय प्राप्त करते हैं उनके मुख का सुहास अतिशय सुहावना प्रतीत हो रहा है | प्रियवर के इस विवाह का दर्शन कर नर नारियां उसकी शोभा को जहाँ-तहाँ वर्णन करते हैं | 

पनवा = नगाड़ा 
घावा = चोट 
तृण तोड़ना = बलैया लेना 
बरायन = विवाह के समय दूल्हा-दुल्हन को कंगन के साथ पहनाया जाने वाला छल्ला 
गोतिनि = कुल वधु, जेष्ट की स्त्री 
द्युत = पण 


Tuesday, 26 June 2018

----- ॥ दोहा-पद १५ ॥ -----,

हाय भयो (रे)कस राम ए रोरा..,
सांझ बहुरत बहुरेउ पाँखी, नभ सहुँ लाखै सहसै आँखी |
रैन भई ना गयउ अँजोरा ||

कहत दिवस सों साँझि रे पिया, झूठि आँच ते जरइहौ हिया |
कन भरै मन मानै न तोरा  ||

यहु तापन यहु बैरन रारी, हम सों अतिसय तुअहि प्यारी |
अगन लगइ ए फिरै चहुँ ओरा  ||

रे निस दिन केरी कहीबत ए  पास परौस मुख जोर कहत ए |
कह अनभल सकुचाए न थोरा ||

अजहुँ लगन की बेला न आइ  तापर दियरा पौंर पधराए                                                                            निज हुँत पेखै पंथ ए मोरा ||    

भावार्थ : - ये कैसा व्यर्थ का कोलाहल है
संध्या  के लौटते ही पंछी लौट आए,  अभी नभ में सूर्य भी सम्मुख दर्शित हो रहे है || न रैन हुई है न उजाला ही गया है  तथापि यह कैसा कोलाहल है |   संध्या दिवस से कहती रे प्रियतम  झूठी आंच से अपने ह्रदय को तप्त कर रहे हो,  कान भरे बिना तुम्हें विश्राम नहीं मिलता | यह तापस ऋतु और यह कलह बड़ी ही बैरन है, जो तुम्हें हमसे भी प्रिय हैं  ये चारों ओर आग लगाए फिरती हैं |  पास पड़ोस के लोग बातें बनाते हुवे कहते हैं ये झगड़ा तो निसदिन का है इसे क्या सुनना, अनुचित कथन करते इन्हें  किंचित भी संकोच नहीं होता | अभी तो लगन की बेला नहीं आई तद्यपि अपने स्वार्थ हेतु ये दीप ड्योढ़ी पर मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं..... 

Monday, 11 June 2018

----- ॥ दोहा-पद 14॥ -----,

----- || राग-पहाड़ी || -----

नीर भरी निरझरनी, 
पहाड़ानु छोड़ चली.., 
डब डब अँखियन ते लखे, 
बाबुल की प्यारी गली..,

नैनन की नैया पलक पतवारा, 

हरियारे आँचल में अँसुअन की धारा.., 
 दोई कठारन दोई कहारा, 
दोई कहारन पे.., 
अन्न धन की धानी ले के, 
दो तीर्थों को जोड़ चली.., 

ये साधु संतों की कही बानी, 
नारी नदी तेरी एक कहानी.., 
आँचल में प्रीति पलकों में पानी, 
पलकों में पानी लिए..,  
नई प्रेम कहानि कहने, 
देखो सागर की रानी चली..... 

Friday, 8 June 2018

----- ॥ दोहा-पद 13॥ -----,

               ----- || राग - भैरवी || -----

पट गठ बाँधनि बाँध कै देइ हाथ में हाथ |
बोले मोरे बाबुला जाउ पिया के साथ ||
भावार्थ : - आँचल से ग्रंथि बाँध कर वर के हाथ में वधु का हाथ दे बाबुल बोले : - अब तुम अपने प्राणपति के साथ प्रस्थान करो | 


काहे मोहि कीजौ पराए, 
ओरे मोरे बाबुला 
जनम दियो पलकन्हि राख्यो जिअ तै रहेउ लगाए || १ || 

 पौनन के  डोला कियो रे बादल कियो कहार | 
 बरखा कर भेजी दियो बरसन दूज द्वार || 
मैं तोरी नैनन की बुंदिया पल पलकैं ढार ढरकाए || २ || 

देइ पराई देहरी दियो पिया के देस | 
दूरत दुआरि आपनी पलक कियो परदेस || 
करे अँकोरी सनेह कर डोरी गोद हिंडोरी झुराए || ३ || 

नैनन को नैया कियो पलकन को पतवार | 
पिय की नगरि भेजि दियो दए अँसुअन की धार || 
कहत ए नीर भरी निर्झरनि निज परबत ते बिहुराए || ४ || 

कै नैहर कै पिया घर बधियो दोइ किनार | 
नदिया तोरी दोइ गति,  कै इत पार कै उत पार || 
नैन घटा घन बरखत बाबुल रे लीज्यो मोहि बुलाए || ४ || 

भावार्थ  : -- हे बाबुल ! तुमने मुझे पराया क्यों कर दिया | जन्म दिया तो  पलकों पर ही धारण किए अपने ह्रदय से लगाए रखा || १ || अब पवन का  डोला रचा, बादलों को कहारों में परिणित कर मुझे बरखा का रूप देकर दूसरे द्वार पर बरसने भेज दिया ||  में तो तुम्हारी नयनों की अश्रु बून्द थी | आज उसे बंदकर क्यों ढलका दिया ||  २ || मुझे दूर करते हुवे अपने नयन द्वार को क्षणमात्र में परदेश कर दिया |  पराई देहली प्रदान कर मुझे प्रीतम का देस दिया | मुझे कंठ से लगाए स्नेह की डोरी से अपनी गोद के झूले में झुलाया || ३ || ( मेरी देह को नदी और  )मेरे नयनों को नैया और पलकों की  पतवार करके आँसुओं की धारा दे कर  मुझे पिय की नगरी में भेज रहे हो  | अश्रु से भरी ये निर्झरणी अपने पर्वत पिता से वियोजित होकर कहती है रे बाबुल मुझे पराया क्यों कर दिया || ४ || नैहर अथवा प्रीतम का घर, रे नदी तेरे दो ही कगारे हैं, तेरी गति भी दो ही है,  इस पार अथवा उस पार अन्यथा तो दुर्गति ही है | रे बाबुल नैनों की घटा बरसने लगे तब मुझे बुलवा लेना  ||