Thursday, 26 March 2020

-----|| GYAAN-GANGAA || -----,

===> ''क्षुधा प्राणवान का प्रथम रोग है भोजन उसकी औषधि है.....'' 
===>'' उदर की अग्नि भोजन से शांत होती है धन से   नहीं.....''

Wednesday, 25 March 2020

----- || दोहा -विंशी 5 || ----

पसरा ब्यभिचार जबहि हिंसक भया अहार |
मानस निपजे रोग अस जाका नहि उपचार॥
भावार्थ:-- जब व्यभिचार अर्थात अनुचित यौन-संबंध ने पैर पसारे और आहार हिंसा जनित हो गया मानव ने ऐसे ऐसे रोगों को  जन्म दिया जिसका वर्तमान में कोई उपचार नहीं है | 

कुपथ्य सोंहि निपजायउ बिषानु भया बिलाए | 
जनमानस मूषक सरिस  डरपत गह भितराए ||
 भावार्थ: - कुपथ्य के कारणवश उपजा कोरोना नामक विषाणु बिलाऊ हो गया है और मानव जाति मूषक के जैसे भय के मारे घरों में दुबकी पड़ी है 

भया देस महँ महबंध, कारन रोग प्रसार |
सासन हर को चाहिये, खोलए अन भंडार॥
भावार्थ: - रोग प्रसारण के कारण देश में 'महाबंध’ घोषित हो गया अब सत्ता धारियों को चाहिए कि वह अन्न के भंडार खोल दे अन्यथा निर्धन जन मानस कोरोना से अधिक भूख के विषाणु(वायरस )से मर जाएगा | 



उड़ि उड़ि के धनी मानी लैहेंगे नव रोग |
गह कहुँ बँधना गार किए, बँधे रहेंगें लोग॥
भावार्थ:- घनाड्य व लब्ध प्रतिष्ठित वर्ग उड़ उड़ कर विदेश से नए नए रोग लाता रहेगा और सामान्य लोग इसके बचाव हेतु अपने घरों को कारावास किए बंधे पड़े रहेंगे क्यों-- ये लोकतंत्र है या बंधतंत्र ..... ? 

मेढक स्वान सर्प सहुँ भाखो मछरी माँस l
रोग ब्यापौ जगत महँ ,ताका नाउ बिकास ॥
भावार्थ :- कुत्ता बिल्ली सर्प मेढक मछली का माँस खाओ और समूचे जगत को रोगों से व्याप्त करो इसी को आधुनिक युग में विकास कहा गया - ----

 ताल थाल कंकनि संग बाजत जबहीं संख | 
साधौ रोगानु केरे, बिकसत नाही पंख ||
 भावार्थ : - सज्जनों !  हिन्दू धर्म के अनुयायियों की उपासना पद्धति में शंख ताल थाल व्  घंटिका  के प्रयोग  का एक वैज्ञानिक कारण है जब ये धातुमय वस्तुएँ निह्नादित होती है तब इनकी  ध्वनि तरंगों से आसपास के अदृश्य रोगाणु विकसित न होकर नष्ट हो जाते हैं | 


 चारि चरन पै धर्म जहँ धर्म रता जहँ लोगן
तहँ सब प्रानि सुखिहि रहैं तहँ न ब्यापत रोग ||
भावार्थ:- जहाँ धर्म अपने चार चरणों( सत्य,दया, दान, त्याग) पर स्थित होता है,जहाँ लोग धर्म निष्ठ होते है वहाँ सभी प्राणी सुख पूर्वक निवास करते है वहाँ कोई रोग व्याप्त नही होता----- 

भगवन केरि भारत पै किरपा भई अपार। 
दुरदिन महँ धन धान ते भरे पुरे भंडार ll 
भावार्थ:- ईश्वर ने भारत पर असीम कृपा की दुर्दिनों में उसके भंडार को धन धान्य से परिपूर्ण किया हुआ है | 

पथ पथ जन ते सून भए, छाइ चहुँपुर साँति | 
बाकी गति बिधि के सँगत सकल कलेष क्लाँति || 
भावार्थ : - पंथ पंथ  निर्जन हो गए चारों ओर शांति व्याप्त हो गई है  सिद्ध हुवा कि संसार की समस्त क्लेश क्लांति का कारण मानव व् उसकी गतिविधि ही है  |

जागा बहुरी जगत में छुआछूत का श्राप ।
आप करे तो धर्म है, आन करे तौ पाप॥
भावार्थ:- संसार में छूआ छूत का श्राप पुनश्च जागृत हो चला है,यह छुआछूत यदि गणमान्य करें तो उत्तम जीवन चर्या है और अन्य कोई करे तो बुराई है | 

नेम किए जौ सुचिता हुँत साधु संत अवधूत ।
अजहुँ जग अपनाए रहा सोई छूआ छूत॥
भावार्थ:- वेदिक काल में ऋषि मुनियों ने स्वच्छता की अवधारणा कर जिस अस्पृश्यता के नियम का प्रादुर्भाव किया था, वर्तमान में वही नियम विश्व में जन - जन द्वारा अपनाया जा रहा है.....

भूखे को भोजन देउ, रु पिपासे को पानि | 
मतिहीन को दे मति प्रभु, मौन मुखी को बानि || 
भावार्थ : - हे प्रभु ! तू भूखे को भोजन दे प्यासे को पानी दे, मूर्खजनों को बुद्धि दे और मौन मुखी को वाणी दे। ..... नीतुसिंघल 


''क्षुधा प्राणवान का प्रथम रोग है भोजन उसकी औषधि है.....

महबँध कै नेम निबंध लखित  नहि संविधान |
तापर देस माही कस लागे ए बिधि बिधान || 
भावार्थ : - महाबन्ध अथवा लॉकडाउन का नियम निबंध भारत के संविधान की किसी धारा किसी अनुच्छेद में उल्लखित नहीं है तथापि यह विधान देश कैसे लागू हो गया ?

मानस तोरी क्रूरता तोरे अत्याचार | 
दरसत  तव हुँत आपने भगवन दिए पट ढार || 
भावार्थ : - हे मानव ! पशुओं पर तेरा अत्याचार, पाश्विकता की  परकाष्ठा को पार करने वाली तेरी क्रूरता को देखकर तेरे लिए ईश्वर ने अपने द्वार बंद कर दिए | 

Sunday, 10 November 2019

----- || दोहा -विंशी 4 || ----,

जिउ हते न हिंसा करें देय ना केहि सूल | 
धर्म बरती रहत गहैं  साक पात फल फूल || १ || 
भावार्थ : - किसी जीव की हत्या न  किसी की हिंसा करें  ही किसी को कष्टापन्न करें  | हमें धर्मानुकल आचरण करते हुवे अपने आहार में  शाक पात फल फूल ही ग्रहण करना चाहिए   | 

अभेद नीति न जानिहै का कंचन का काँच | 
धौल कहा रु काल कहा कहा झूठ का साँच || २ || 
भावार्थ : - स्वर्ण क्या है और कांच क्या है धवला क्या है काला क्या है सत्य क्या असत्य क्या है,  अभेद नीति को यह ज्ञात नहीं होता  | 
काया तौ छिन भंगुरिहि एक दिन वाका अंत | 
सद कृत करम संग रहै जनम जनम परजंत || ३ || 
भावार्थ :- क्षण भंगुर इस  काया का एक दिन अंत होना निश्चित है किए गए उत्तम कर्म नित्य हैं जो जन्म जन्म तक साथ देते हैं | 

करै न कर सद करम को चलै न पद सद पंथ | 

रे कलि तेरो काल मैँ बँधे पड़े सद ग्रंथ || ४ ||
भावार्थ : - हस्त कोई सद्कर्म कर्म नहीं करते, चरण सत्पथ पर नहीं चलते अरे कलि ! तेरे काल में सद्ग्रन्थ बंधे पड़े रहते हैं इनका अध्ययन कोई नहीं करता | 

ए अनंत ब्रह्माण्ड महँ  रतिक नहीं परिमान | 
समुझै मानस मद भरा आपन पो भगवान् || ५ || 
भावार्थ : - इस अनंत ब्रह्माण्ड में अणु मात्र भी परिमाण नहीं है तथापि अहंकार से भरा मूर्ख मानव स्वयं को ईश्वर तक संज्ञापित करने लगा है 

कौसुम कर रस मधु अहै, पाहन कर रस पानि | 
देहि कर रस रुधिरु अहै, अनतस कर रस बानि || ६ || 
भावार्थ : - पुष्प का रस मधु है तो पाषाण का रस पानी है रक्त देह का रस है तो वाणी अंतस का रस है | 

खेलत होरि स्याम घन भीजत हैं सबु अंग | 
चढ़ बिनु उतरत ए री सखि फीके तोरे रंग || ७ || 
भावार्थ : - घनस्याम/काले बादल होली खेल रहे हैं और सभी अंग भीग रहे हैं, ए री सखी ! ये तेरे रंग फीके हैं जो चढ़े बिन उतरते ही चले जा रहे हैं || 

आज की कहावत :-
जाके पहि धन संपदा, अजहुँ सोइ गुनवान ॥
संपद न पूछौ साधु की पूछ लिजै ग्यान॥८ || 



Tuesday, 22 October 2019

----- || दोहा -विंशी 3 || ----,

करम केरि पतवार नहि सीस पाप का भार | 
तोरि नाउ कस होएगी भव सागर ते पार | १ |
भावार्थ : - सद्कर्मों की पतवार नहीं है उसपर पापों का भार | रे मनुष्य ! तेरे जीवन की नैया इस संसार सागर से कैसे पार होगी | 

कहता सबते काल का चाका घुरमत जाए | 
जैसी करनी कारिये तैसो ही फल पाए || २ || 
भावार्थ : - काल का  चक्र घूमते हुवे सबसे कह रहा है ये मैने देखा है कि जो जैसी करनी करता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है | 

खूंटे बाँध कसाई के कान्हा तोरि गाय | 
आया द्वारे पाखँडि कापट भेष बनाए || ३ || 

भावार्थ : - हे कन्हाई तेरी गाय को कसाई के खूंटे बाँध कर अब कपट वेश धारण किए पाखंडी द्वार पर आ खड़ा हुवा | 

दास करता ए देस का पराया सो समुदाय | 
वाकी मलिनी संस्कृति ए भारत की नाए || ४ || 
भावार्थ : - यह पारा समुदाय इस देश का दासकर्ता है इसकी मलिन संस्कृति भारत की संस्कृति नहीं है |
 एहि भव सिंधु समान है माया जल के मान  | 
तीरे सो तो देउता डूबे सो पाषान || ५ || 
भावार्थ : - यह संसार सिंधु व् सांसारिक प्रपंच जल के समान है जो इन प्रपंचों में अनुरक्त रहा वह पाषाण कहलाया और जो तैर गया वह देवता कहलाया | 
कपोत कनका खाए के बैसे जबहि मुँडेर | 
बीट संगत निपजावै पीपर बट के पेड़ || ६  || 
भावार्थ : कपोत कनका खाकर जब  मुंडेर पर विराजित होते हैं वहां तब वह अपने बीट से पीपल व् वट का वृक्ष उपजाते हैं ( इनके द्वारा खाने  के पश्चात पीपल व् वट के बीज की एक  विशेष प्रक्रिया होतीहै तथा बीट से निष्कासित होने के पश्चात् ही यह उगते हैं  ) इस हेतु पक्षियों में कपोत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है |  

जुबता तपती दुपहरी बालपना परभात | 
ढरती बयस साँझ अहै मरनी कारी रात || ७ || 
भावार्थ : - बालकपन प्रभात के तुल्य है तो यौवनावस्था तपती दोपहर के समदृश्य है ढलती वृद्धवयस ढलती संध्या के तुल्य है तो मृत्यु काली रात्रि के सदृश्य जहाँ अंतत शयन करना है | 

साँझि भइ दीप मनोहर, धरे द्वारि द्वारि ।
मंदिर मंदिर सुमधुरिम, घंटिहि करत गुँजारि ॥ ८ || 
भावार्थ : - संध्या होते ही मनोहर दीपक द्वार द्वार पर स्थापित हो गए मंदिरों में घंटिकाएँ सुमधुरिम गूंज कर रही हैं | 

घनकत कारी बादरी, बजै गगन मै ढोल ।
कृष्णा कृष्णा बोल सखि, राधे राधे बोल ॥ ९ || 
भावार्थ : - काली घटा घनक रही है और  गगन में ढोल बज उठे हैं हे सखी ! कृष्ण कृष्ण बोलकर राधे राधे बोल | 

अँधन  को प्रभो ऑख दे, बहरे को दे कान।
गूँगे के मुख बोल दे, रू मूरख को ग्यान ॥ १० || 
भावार्थ : - हे प्रभु !अंधों को दृष्टि प्रदानकर बधिर को कर्ण प्रदानकर गूंगे के मुख को वाणी से युक्त कर और मूर्खों को ज्ञान प्रदान कर | 

जाम घोष उदघोषते, भई सुनहरी भोर ।
उतरे दिनकर अरुन सहुँ, गहे अस्व की डोर ॥११ || 
भावार्थ : - रात्रि के प्रहरी के उद्घोषणा करते ही सुनहरी भोर हो गई अश्व की रश्मियाँ ग्रहण किए दिनकर अपने सारथी अरुण के साथ धरती पर अवतरित हुवे  | 

बूँद बूँद मसि धानि भइ,कागद भए खन खेड़ ।
बिअ के आखर सोँ चलौ, लेखें पौधा पेड़ ॥१२ || 
भावार्थ : - मसि धानी बुँदे हो गई कागद खेत खंड हो चले हैं  चलो अक्षरों के बीज रोपकर हम उसपर पेड़पौधे लिखते हैं | 

नैन गगन परि छाए रे मोरा स्याम घना।
मृदुल मंद मुसुकाए रे मोरा स्याम घना॥१३ || 
भावार्थ : - मेरे श्यामघन नैन गगन पर आच्छादित हो रहे हैं और वह मृदुल मंद विहास करते हैं | 

र सौं राजा राम लिखे घ संगत घन स्याम ।
जबहिं कछु लेखै लिखनी,लेखै हरि का नाम ॥१४ || 
भावार्थ : - र से राजा राम लिखे घ से घनश्याम लिखे यह लेखनी जब भी कुछ लिखे तो केवल हरि का नाम लिखे 

तन बिनु दुखी कोई मन बिनु धन बिनु कोउ उदास ।
थोरे थोरे सब दुखी, सुखी राम का दास ॥१५ || 

दूषक जन कहनी कहैं,ऐसी मरनी होए ।

ओछी करनी करि चलें, और हँसे ना कोए ||१६ || 

सासन कर अधिकारु दए जहँ के सासन तंत्र ।
दास करिता बसाए रहँ, नहि सो देस सुतंत्र ॥१७ || 
भावार्थ:- जहाँ का शासन तंत्र अपने ही दासकर्ताओं को शासन का अधिकार देकर उन्हें वसवासित रखता है वह देश स्वतंत्र नहीं होता ।.....

लोक जाग जगरीति नहि होतब जहाँ सबेर |
घनियारि रैन रहे तहँ ब्यापत घन अँधेर || १८  ||
भावार्थ : - जहाँ लोक जागृति न हो जनमानस स्वकर्तव्य के विषय में सचेत न हों वहां स्वातंत्र का प्रभात होने पर भी नियम व् नीतियों का अभाव रूपी घना अन्धेरा व्याप्त करती दासता की काली रात्रि ही रहती है |

नियत नियंतन जोग हैं, नेम निबंधन सोए ।
बिधि सम्मत होई के, नीतिमान जो होए ॥१९-क  || 
जन हुँत पालन जोग हैं, नेम निबंधन सोए ।
बिधि सम्मत होई के, नीतिमान जो होए ॥१९-ख || 


भावार्थ :- " वही नियम-निबंधन नियंत्रण व निर्धारण के योग्य हैं जो विधि सम्मत होकर लोक-व्यवहार के निर्वाह हेतु नियत की गई नीति के अनुसार आचरण करने वाले हों....."
 " वही नियम-निबंधन जन-सामान्य द्वारा पालन योग्य हैं जो विधि सम्मत होकर लोक-व्यवहार के निर्वाह हेतु नियत की गई नीति के अनुसार आचरण करने वाले हों....."

उदाहणार्थ:- यदी राजा व नेता लोग यह नियम निर्धारित कर दें कि अब से कोई भोजन नहीं करेगा, जो करेगा वह 1सहस्त्र मुद्रा से दण्डित किया जाएगा । यह नियम दमनकारी व विधि के असम्मत होने के कारण जन-सामान्य द्वारा पालन योग्य नहीं है.....

दान करे न दया करें सत्कृत करे न कोइ | 
धर्म परायन जन अजहुँ  उदरपरायन होइ || २० || 
भावार्थ :- दया करते हैं न दान करते हैं न ही कोई सत्कर्म ही करते हैं, जो लोग कभी धार्मिक प्रयोजन में संलग्न रहते हैं वह अब केवल अपने उदर पूर्ति में संलग्न रहते हैं | 

Sunday, 29 September 2019

----- ॥ दोहा-पद 36॥ -----

  ----- || राग-मेघ मल्हार || -----


बहुर बहुर रे बावरि बरखा, री बहुरयो पावस मास रे,
बिहुरन अबरु बेर न कीज्यो,कहे तव बाबुला अगास रे ||

पिय कर नगरिहि पंथ जुहारै,नैनन्हि लाए थकि गै हारे,
लखत लखत पलकन्हि भइँ पाथर तोर आवन करि आस रे ||

जनम दात कइँ दहरि पराई, जग माहि असि रीति बिरचाई,
हँसि कहँ सखिआँ तिआ सुहावै बासत निज पियहि के बास रे ||

पलक माहि पलकनि भए पाँखी, अरु भैं पंखि उरे दिनु राती,
तोहि बिरमत भए बहु बेरिआ, अजहुँ बहुरो पिय के पास रे ||

भावार्थ : - अरी बावरी बरखा पावस मास लौट गया अब तुम भी लौट जाओ,तुम्हारे बाबुल आकाश कह रहें हैं -अब लौटने में और अधिक विलम्ब न करो || तुम्हारे आने की आस में तुम्हारे प्राणाधार की नगरी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है  पंथ देखते उसकी आँखें शिथिल हो गई और तुम्हारी प्रतीक्षा करते करते उसकी पलकें निश्चल सी हो गई हैं || जन्मदाता की देहली पराई होती है इस संसार ने ऐसी ही रीति बनाई है सखियाँ हंस कर कहती है - स्त्री अपने प्राणनाथ के गृह में निवास कराती हुई सुशोभित होती है || पलकों में पलक पंखों में परिणित हो गए रयान और दिवस पंक्षी बनकर उड़ गए (ऐसा ही होता है ) तुझे पिता के गृह में पधारे बहुंत समय हो गया अब तुम अपने प्रिय के पास लौट जाओ ||
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Thursday, 13 June 2019

----- ॥पद्म-पद 35 ॥ -----,

------ || राग-मेघमल्हार | -----
गरजि गरजि बरखा ऋतू आई
घोरि घटा एक एक परछाई

गरजि गरजि नभ घन आए ,
बादत मधुर मधुर अल्हादत नदि परबत परी पधराए | १ |
घुमरि घटा छननन झनकारे देखु बरखत छत छत छाए |
झुनुरु झुनुरु करि झरि झरि बुँदिआ कसि रसियन माहि अपुराए | २ |
रुर नुपूरन्हि के रूप धरी बनि झाँझरिआ परि पाए |
ऐ री सखि एहि दमकिहि दामिनि कि कटि कौधनिआ कौंधाए | ३ |
करन धार कौ आँचर देई पुरट पट अध् सीस धराए |
निरखि छटा छन छबि असि नीकी लोगन्हि मन अति सुख पाए | ४ |
सींचत तरु बन उपबन डोलै गहे अमरित घट अभराए |
दए जल पीपलि बट हरियावत पुनि पनघट गई पधराए | ५ |
धरेउ ओंठ कर कियौ अँजुरी दुइ बूँद कै आस लगाए |

गहि घट ओंक झट दे घारी जूँ तट तट प्यासत पाए | ६ |
घोर घाम सिरु तिसत कंठ बहु आह पथिक पंथ पेखाए |
करसि करसि कर दए भरि कलसी तापर नहीं पिअत अघाए | ७ |
अतिअ मीठ मिसिरी रस लागै देहु और कहत सकुचाए |
चलिए अजहुँ सखि संभु दुआरे कहा  नैनन सोंहि दुराए ? | ८ |
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आए पावस पाहुन पिया रे
अंजन सहुँ कारे कारे
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----- || राग -भैरवी || -----
बादल तोरी पालकी पवन कहारा
घन साँवरा सलौना तोरा साजन जग सोंहि न्यारा |
हंस दियो रे हिरन दियो रे दियो हीर को दहेज्यो
भूरि भूषन न्यौछारि तोहि पियहि के द्वारि भेज्यौ
मनि रतनन कौ आगर तोरा बाबुल प्यारा प्यारा
बिजुरी चुनरिया सीस पट देइ के
पुरट करि कंकनिया कौंधन  तट देइ के
कंठ घरी बूंदन करि मुतियन के हारा
बादल तोरी पालकी पवन कहारा...
माथ तोरे लाल करी ललटीका लोलती
कानन परी कुंदन की कुण्डलिआ बोलती
बरखाती बुंन्दतोरे मुतियन के हारा

 सूरज जटी चंदा जटी अरु  तारन जटी चूनरी
मनि मरकत करि मूँदरी


आगे पाछे परिजन ते नैना बचाई के
संग झलक लेत चलत तोरी छटा छब पै रिझाई के

हेरी घोर घटा चित्त चोर तोरा प्रीतम हरियारा
सिंगारा

Tuesday, 4 June 2019

----- ॥ टिप्पणी 21 ॥ -----,

ओवैसी के बयान "हम किरायदार नहीं,बराबर के हिस्सेदार हैं" को किस नज़र से देखा जाये?
  • भारत में सभी मुस्लिमों का उत्तर होगा - हाँ ! सही तो कह रह हैं…..
  • और भारत वंशी के उत्तर : - हम पहले इंसान है, इंसान का भाई चारा होना चाहिए, जातिवाद क्यूँ है, मुस्लिम मेरा भाई, हम सब एक डाल के पंछी, हाँ हाँ मुसलिम भाई आप भारतीय हो मेरा घर ले लो मेरी दौलत भी ले लो, ये क्या धर्म की दकियानूसी बातें हैं, मैं फालतू विषय पर बहस नहीं करता, राष्ट्र क्या होता है ?  ये ओवैसी कौन है ? हमारे पूर्वज एक थे दे दो..... आदि आदि 
  • भारत शासन द्वारा अब तक ऐसी राष्ट्र विरोधी शक्तियों के विरुद्ध कार्यवाहीकर तत्काल उसे कठोर दंड दे देना चाहिए था | किन्तु आश्चर्य है उसने ऐसा नहीं किया | क्या भारत का संविधान इतना अक्षम है ? क्या वह अपनी अखंडता की रक्षा करने में निर्बल सिद्ध हो रहा है अथवा सत्तधारियों का अंतस काला है ? भारत की सत्ता सुख भोग लिए नहीं है यदि ये सत्ताधारी भारतीय है उन्हें भारत से प्रेम है तो वह अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें |
  • चार टुकड़े होने के पश्चात भारत का आधे से अधिक भाग मुस्लिमों के पास है औवैसी जाएं वहां | यदि प्रत्येक ५० वर्षों में एक जिन्ना जन्म लेता रहा तो भारत बचेगा कहाँ ?
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धर्म साधारण व् विशिष्ट ये दो प्रकार के होते हैं 
विशिष्ट धर्म वस्तुत: ईश्वर के उपासना की एक पद्धति है संसार में १४ प्रकार के विशिष्ट धर्म हैं यदि हम सभी उपासना पद्धतियों का अनुशरण करेंगे तो  ईश्वर पर ध्यान केंद्रित नहीं होगा इसलिए किसी एक पद्धति का अनुशरण कर हमें ईश्वर की उपासना करनी चाहिए आप धर्म परिवर्तित कर सकते हैं किन्तु यह स्मरण रहे कि कोई परिवर्तन तभी  स्वीकार्य योग्य है जब वह संसार के लिए कल्याणकारी हो