Thursday, 15 November 2018

----- ॥पद्म-पद २६ ॥ -----,

   ----- || राग-भैरवी || -----

सोहत सिंदूरि चंदा जूँ रैन गगन काल पे..,
लाल लाल चमके रे बिंदिआ तुहरे भाल पे..,

कंगन कलाई कर पियतम संग डोलते..,
पाँव परे नूपुर सों छनन छनन बोलते..,
छत छत फिरत काहे  दीप गहे थाल पे..,
जब लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे..,

चरत डगरी रोकि रोकि बूझत ए बैन कहे.., 
बिरुझे मोरे नैन सहुँ काहे तुहरे नैन कहे ..,
देइ के पट पाटली भुज सेखर बिसाल पे..,
लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे..,

गुम्फित छदम मुक्ता हीर मनि बल के रे..,
करत छल छंद बहु छन छब सी झलके रे.., 
रिझियो ना भीति केरी मनियारि जाल पे.., 


लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे.....

Wednesday, 14 November 2018

----- ॥ टिप्पणी १५ ॥ -----,

>> खेद का विषय है कि सत्तर वर्ष व्यतीत होने के पश्चात भी गांधी-नेहरू से किसी विपक्ष नहीं पूछा कि भारत विभाजन का उद्देश्य क्या था.....

>> सत्तर वर्ष व्यतीत हो गए किन्तु गांधी-नेहरू से किसी विपक्ष ने प्रश्न नहीं किया कि यदि अभारतीय मुसलमानों को ही राज देना था तो अंग्रेज क्या बुरे थे.....

>> अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश बनने के पश्चात भी ये मुसलमान भारत की छाँती पर मूंग दलते रहे इन मुसलमानों के लिए इस देस के और कितने टुकड़े होंगे.....

Thursday, 8 November 2018

----- ॥पद्म-पद २५ ॥ -----,

लाल लाल तिलक रेख बसत पिया के भाल रे..,
हिलमेलती उरु रुचिरु गज मुकुतालि माल रे''..,

पीत बसन देह बसे नैनन में नेह रे'..,
बहुरि बहुरि मोहि कसे बहियन में लेह रे..,
दीप माल थाल धरे मोरे कुमकुम करताल रे..,

गली गली मनि दीपक की अलियाँ सँवार के..,
छाँड़त रे फूरझरी श्री की आरती उतार के..,
आजु अली सुबरनी भए गगन घनकाल रे..,

देख देख छबि छटा छन लोचन अभिराम जूँ..,
बारिअहिं अंग अंग कोटिकोटि सत काम जूँ..,
झरोखन्हि लगी जुवतीं होवति निहाल रे..,

बाँकी बर करधनि कर निरखत घनस्याम से..,
चितबत चित चोरि लेहि रे झलक देत राम से..,
अपलक भए पलक चलत जब मंजुल मराल रे..,

मिलत कंठ लाई पुर के लोगन्हि बिलोक के..,
हँसत कहत कहिबत कछु डगरी रोक रोक के..,
सोहत दए पाटल पट  भुज सेखर बिसाल रे.....

----- ॥पद्म-पद २४ ॥ -----,

करतालि अस्थाल धरे  दीपन केरी मालि |
धन लखी का रूप बरे आई सुभ देवालि || 

हिरन सकासि साँझि करत करत रूपहरि भोर |
रिद्धि सिद्धि, समृद्धि संग चली गाँउ कहुँ ओर ||

पहिरी ससि कर मंजरी धरनि करी श्रृंगार |
धामधाम धन धान ते भरे पुरे भंडार ||

संपन्न सबहि काल भए भयो दारिदर दूर |
गह गह सुख सौभाग की भइ सम्पद भर पूर ||

धवल भीति पट पहिर के पहिरे मनिमय जाल |
पुरट छटा छन छबि धरत छहरत कमलिनि ताल ||

भाँति भाँति कर बस्तु लिए बैसि हाट बनिहारु |
भइ सुंदर सब गलीं भए चारु चौंक चौबारु ||

हरितक गौमय घोरि के, गह आँगन कहुँ लीप |
नव पट पहिरें गेहनी गेहि सजावहिं दीप ||

चारु चौंक पुराई के बाँधे बंदनिवार |
पुहुप भूषित भइ देहरि कंदिल देइ द्वार ||

पीत लाल हरि केसरी रंगोरी के रंग |
चित्रित कीन्हि गंगोत्री निकसत पावनि गंग ||

पाक बनाई रसवती बिंजन बहु पकवान |
मधुराई मुख घोरते मधुर मधुर मिष्ठान ||

भरे भेस मनभावते साजत सबहि सुसाज |
बहुरि पुरजन करन लगे पूजन केर समाज ||

उदये मंगल काल जब दीपक भरे अलोक |
भूति मई भू करत भए ज्योतिर्मय त्रिलोक ||

सुभ महूरत अगन धरत उजयारत चहुँ कोत |
जगमग जगमग जग करत जागिहि जगती जोत ||

जगजननि जग मंगल कर भूषन भेस सुसाजि |
कुमकुम चरनन धरत पुनि  अम्बुजासन बिराजि ||

परन बेलि के गंठि ते गुम्फित नलिन मृनाल |
ललित माल सों कलित कर किए अर्पित निर्माल |

भूषन भूषित श्री भई बसा अरुनमय भेस  |
दाहिन बाम बिराजते सोहत गिरा गनेस ||

लछित सिंदूरि साथिआ बहियन गयो लिखाए |
जगद बिभूति संग रहें गनपति सदा सहाए |

मंगल मौलि बँधेउ कर तिलक रेख दए भाल |
अक्षत कर्पूर गहे  पुनि सजी आरती थाल ||

किए नाद मुख संख पुरे बाजहिं पनव  मृदंग |
गावहिं सुमधुर बंदना पेम मुदित सब संग ||

पंचगव के चरनोदक पंच पात्र कर योग |
गहत पंचोपचार पुनि जगज्जननि गहि भोग ||

फुरझरी नभ छूटती ए सनेसा दए सुहाए |
दुख दारिद दुराई के सुख सम्पद नियराए ||

करतलों के थाल ने दीपकमाला को धारण कर लिया है, धन लक्ष्मी का रूप वरण किए शुभ-दीपावली के उत्सव का आगमन हो गया है | संध्या को स्वर्णमयी व् भोर को रजतमयी करते हुवे रीढ़ी सीधी के संग समृद्धि अब गांव की ओर चल पड़ी | अनाज की बालियों को अभरित कर धरती ने श्रृंगार किया तो अब प्रत्येक भवन धन-धान्य के भण्डार से भर गए | अब कहीं विपन्नता नहीं रही दरिद्रता को दूर करते सभी काल संपन्न काल हो गए, घर-घर सुख सौभाग्य की सम्पदा से परिपूर्ण हो गए  | इस सम्पदा को प्रकाशित करते चूने से लेपित भित्तियों में मणिमय झालरें आभारित की हुई हैं इन मणिमय झालरों की स्वर्णिम आभा विधुत की सी क्षणिक प्रभा धारण किए कमलिनी से युक्त सरोवर में बिखर रही है | विभिन्न प्रकार की वस्तुएं लेकर वणिक पणग्रंथि में विराजित  हैं | सभी गलियां और सभी चौंक-चौपंथ अत्यंत सुहावने व् शोभान्वित प्रतीत हो रही है | गायों के तत्कालोत्सर्जित हरित गोमय से घर-आँगन को लीपित कर नवल-नवल परिधानों को धारण किए गृहणियां व् गृहस्वामी दीपकों की सुसज्जा में व्यस्त हैं | द्वारों पर केला की शाखऐं प्रदानकर देहली को पुष्पाभूषणों से विभूषित किया तदनन्तर सुन्दर चौंक (आते से रचित आयाताकार चौकोण ) रचना से परिपूरित कर बंधनवार विबन्धित किए गए | पीतम, लाल हरी केसर आदि रंगों से रंगोली से गंगोत्री चित्रित की गई जहाँ से परम पावनि गंगा का उद्गम  हो रहा था| रसोई ने मुख में मधुरता घोलते मधुर-मधुर मिष्ठान के सह
अनेक प्रकार के व्यंजन व् पकवान रचित किए| मन को लुभाने वाले वेशभूषा व् सभी साज-सामग्रियों से सुसज्जित पुरजन ततपश्चात जगद-विभूति के नीराजन की तैयारी में जूट गए | मंगल बेला के उदयित होने पर दीपकों में आलोक प्रतिष्ठित हुवा,भूमि को ऐश्वर्य से युक्त करते हुवे तीनों लोक उद्दीप्त हो उठे | दिशा-दिशा को उज्जवलित कर जगताजगत को जगमग करते हुवे शभु मुहूर्त में अग्निधारण किए अखंड ज्योत जागृत हुई | जगज्जननी ने जग हेतु मंगलकर वेशाभूषणों से सुसज्जित हुईं ततपश्चात कुंकुंमाय चरणों को न्यासित करते अम्बुजासन में विराजित हुईं| पर्ण बेलों की ग्रंथियों से गूँथी नलिन मृणाल की सुन्दर मालिका कलित कर जगज्जननी को निर्माल्य अर्पित किए गए |जगद विभूति अरुणमयी वस्त्र धारणकर भूषणों से विभूषित हुईं जिनके दाहिन-वाम में माता सरस्वती व् भगवान गणेश जी विराजते सुशोभित हो रहे हैं| सैन्दूरी स्वास्तिक से लक्षित कर बही खातों में उल्लेखित किया गया 'जगद्विभूति के संगत श्री गणपति सदा सहाए रहें'|हस्त में मंगल मौली बांधकर श्री के भालपर तिलक लक्षित किया गया अक्षत व् कर्पूर ग्रहण किए तत्पश्चात आरती थाल सुसज्जित हुई |मुखापुरित शंख निह्नादित हो उठे पणव व् मृदंग आदि बजने लगे प्रेममुदित होते हुवे सभी एक साथ श्री की आरती-वंदना का गान करने लगे | पंचगव्य का चरणामृत व् पञ्च-पात्र में संयोजित पंचोपचार ग्राह्य कर नैवेद्य ग्रहण किया | नभ में छूटती फूलझड़ियां यह सन्देश देते सुशोभित हो रही हैं कि दुख-दरिद्रता दूर करते हुवे सुख-समृद्धि निकट आए | 

अस्थाल = थाल
सकासि =समरूप, जैसी
ससि मंजरी =अन्न कीबालियाँ
बनिहारु =वाणिज्यक 
चारु =सुन्दर 
हरितक गौमय =तुरंत का हरा गोवर
पट=वस्त्र 
कंदिल=केले की शाखें 
रसवती =रसोई 
बिंजन =व्यञ्जन 
समाज =तैयारी
गिरा =सरस्वती 
बहियन =बही -खाता 
परन बेलि =पान की बेले 
भाल =मस्तक 
पनव  =पणव,एक प्रकार ढोलक
पंचगव्य =देशी गाय के गोमय,मूत्र,दुग्ध,दधी,घृत का मेल
पंचोपचार =धूप,दीप,गंध,पुष्प,नैवेद्य इन पांच द्रव्यों से किया गया पूजन 
नियराना =निकट आना
सनेसा =सन्देश

Monday, 5 November 2018

----- ॥पद्म-पद २३ ॥ -----,

                 ----- || राग-ललित || -----

रैन ज्योति नैन ज्योति जगा ज्योति जग जगमगे | कनक कंगूरे कलस ज्योति अगत जगत जगरत जगे ||
नलिन ज्योति मृनाल ज्योति ताल ताल ज्योतिर्मई |
उदयत मंगल काल ज्योति घोर गहन घन तम जई ||


दमकत दीपक माल ज्योति ज्योतिर्मय सुभ दीपावली | 
भीति भीति मनि जाल ज्योति बीथि बीथि सब गली गली ||
उदयत मंगल काल ज्योति दीप बरे
तिलक लषन दिए भाल ज्योति जग जोए पानि बंदन करे |
तिलक लषन दए भाल ज्योति तिलक

करतल हिरन थाल ज्योति छजत छत छत पंगत परी |
लखत लालमलाल ज्योति छूटत जब नभ फूरझरी ||

कलित किरीट कपाल ज्योति मञ्जुलित मुख मंडलम |
धन लखि के निर्माल ज्योति सुभोदय सुभदर्शनम ||
ज्योतिर ललाटुलम |



भव ज्योति भव भूमि ज्योति ज्योति ज्योति त्रिभुवनं

भवन भवन ज्योतिर करत भूतिमई भई भगवते |
करत पूजन सब धरत ज्योति भरे भेस मन भावते |
सोहत गिरा संग गनपति दाहिन बाम बिराजते ||
गिरा ज्योति ज्योतिर्मय श्री गनपते |





Thursday, 1 November 2018

----- ॥ दोहा-द्वादश ९ ॥ -----

काँकर पाथर बोइ के जीउ दियो उपराइ |
जनमानस के राज भुइँ गई खोद सब खाइ || १ ||
भावार्थ : -  यह समूचा संसार कंकड़ -पत्थरों का है और पृथ्वी में यदि कुछ सुन्दर है तो वह जीवन है | और लोक तंत्र ने इस पृथ्वी में जीवन को उखाड़ कर केवल कंकर पत्थर के जंगल ही बोए हैं | अब तो यह 'मूर्तियों वाला भ्रष्टाचारी तंत्र' के नाम से कुख्यात होने लगा है | जीतनी भूसंपदा इस तंत्र ने उत्खात कर खाईं हैं उतनी तो सहस्त्रों वर्षों के तंत्रों ने नहीं खाई |

सत करमी सनमारगी धरम परायन जोइ | 
जाके मन सत चारिता महापुरुख सो होइ || ४ || 
भावार्थ :--जो सत्कर्मी हैं, सन्मार्गी हैं ( वह मार्ग जिससे ईश्वर की प्राप्ति हो सके ), धर्मपरायण हैं, जो शील व् सदाचारी मनोवृति के हैं वस्तुत: वही महापुरुष हैं | 


तब लग लौ लागि जब लग घट दीपक में सार |
भले करम की देहरी धरत जगत उजियार || २ ||
भावार्थ :-जब तक देह रूपी दीपक में प्राण स्वरूपी सार है शिखा स्वरूपी स्वांस तब तक ही प्रज्वलित रहेगी| यदि इस देह दीपक को सत्कर्मों की देहली पर आधारित किया जाए तो इससे न केवल एक घर, एक मंदिर अपितु समूचा जगत आलोकित होगा  |

जाके पहि संतोष धन रज में राजा सोए |
जाके पहि संतोष नहि रंक राजता होए || ३ ||
भावार्थ :-- संतोष से बढ़कर कोई सम्पति नहीं है जिसके पास संतोष रूपी धन है वह रंचमात्र सम्पति में भी राजा है | जिसके पास यह धन नहीं है  राज करता हुवा वह राजा भी दरिद्र है |

सत करमी सनमारगी धरम परायन जोइ | 
जाके मन सत चारिता महापुरुख सो होइ || ४ || 
भावार्थ :--जो सत्कर्मी हैं, सन्मार्गी हैं ( वह मार्ग जिससे ईश्वर की प्राप्ति हो सके ), धर्मपरायण हैं, जो शील व् सदाचारी मनोवृत्ति  के हैं वस्तुत: वही महापुरुष हैं | 

ऊँची पीठि पदासीत धनीवंत जो कोए | 
लबध प्रतिठित जगत बिदित महापुरुख अब सोइ || ५ || 
भावार्थ :- जो ऊँचे पद पर आसीत है, धनाढ्य है,लब्धप्रतिष्ठित है,जगतविदित है, विद्यमान समय में वही महापुरुष कहे जाते हैं | 

सब्द सुरमालि कंठ गत  करत रागाभ्यास | 
लेखन गायन बिधा पुनि करतब सरल सुपास || ६ || 
भावार्थ :- रागों के आधार पर स्वर व् शब्द मालाओं का कंठगत अभ्यास, गायन व् लेखन की विधा को अत्यंत सरलता व् सुगम्यता प्रदान करता है | 

मानस उद्धिग्न भाउ लए जब मन होत क्लांत | 
गीत भनित कर सरित बहँ तहँ अस्थिर असांत ||७ || 
भावार्थ :--जहां मनमानस उद्दिग्न व् अधीर भाव लिए क्लांति को प्राप्त हो वहां कविता गीतों की सरिता अस्थिर व् अशांत होती है | 

धीर धरे जहँ मानसा जहँ मन होत प्रसांत | 
गीत भनित कर सरित तहँ बहती  स्थिर सांत || ८ || 
भावार्थ :-- जब मनमानस धैर्य धारण किए हो और चित्त धीर-प्रशांत हो वहां कविता व् गीतों की सरिता का प्रवाह शांत व् स्थिर होता है | 



दाता मूरख आँधरा जो को जा समुझाए | 
बीन बजाए बसह सोंहि अपुना समय गवाएँ || ९ || 
भावार्थ :-- मूर्खों व् निर्बुद्धियों के लिए उपदेश नहीं होते यदि होते तो भगवान कृष्ण अर्जुन की अपेक्षा दुर्योधन से ही कहते तू युद्ध मत कर उसी प्रकार मूर्ख व् अंधविश्वासी मतदाताओं को जो कोई जाकर समझाता है वह भैस के आगे बीन बजाकर अपना समय नष्ट करता है | 

गहे बहुतक ढोलकिआ वादक अहैं अनेक |
बहु बादन का कीजिये रागै राग जब एक || १० ||
भावार्थ :-  जब एक ही राग रागान्वित हो तो वादक व् वाद्य यंत्रों का बाहुल्य व्यर्थ होता है |

आन बसे परबासिआ भारत देस अखंड |
निज संस्कृति नसाए के भयऊ खंडहि खंड || ११ ||
भावार्थ : इस अखंड भारत देश में जब प्रवासियों का वास हुवा, तब यह अखंड था अविभाजित था | इन प्रवासियों ने ही इसे दास बनाया इसे खंड-खंड किया लोग तो पीढ़ियों को जन्म देते हैं इन्होने तो देशों को जन्म दिया |  ये प्रवासी अब यहाँ भारत वासी बने बैठे हैं अपनी सभ्यता संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट कर अब ये खंड-खंड भारत और भारतीय वैश्विकपटल पर अल्पसंख्यक होकर अपने अस्तित्व व् अस्मिता के लिए संघर्ष कर रहा है 

Friday, 19 October 2018

----- ॥ दोहा-द्वादश ८ ॥ -----

 हरि मेलिते खेवटिया छाँड़ा नहीँ सुभाए | 
जीउ हते हिंसा करे दूजे कवन उपाए || १ || 
भावार्थ : - भगवान के दर्शन होने पर भी केवट जाति ने अपने स्वभाव का त्याग नहीं किया वह अब भी जीवों की ह्त्या कर हिंसारत है इसके इस स्वभाव को परिवर्तित करने की इससे बढ़ कर दूसरी कौन सा युक्ति होनी चाहिए  | 

गुरु मिलते दास कबीर छाड़ें हिंस सुभाए | 
भजन करत भए हरि भगत आपहि गुर कहलाए || २ || 
भावार्थ : - गुरु के मिलते ही कबीर दास ने हिंसा का परित्याग कर दिया फिर वह भजन कीर्तन में अनुरक्त हो हरि भक्त हो गए और स्वयं गुरु कहलाए | 

चरन साँचे पंथ चलें जुअते नहि धन धाम | 

दुनिआ कहत पुकारसी करते नहि कछु काम || ३ || 
भावार्थ : -पहले सन्मार्ग पर चलना मान सम्मान का विषय था और धन-सम्पति  भी संकलित हो जाती थी, अब सन्मार्ग पर चलकर धनसम्पति का संकलन कठिन हो गया है ऊपर से लोक-समाज अपमानित कर कहता है अरे ! कुछ कामवाम नहीं करते क्या ? 


पाछिन के अनुहार अस चलिया अधुना वाद | 
सील गया सनेह गया गई मान मरयाद || ४ || 
भावार्थ : - पाश्चात्य संस्कृति के अनुशरण से  ऐसे आधुनिक वाद का चलन हुवा कि लोगों में शीलता रही न परस्पर स्नेह ही रहा और मान और मर्यादा भी जाती रही | 

माता पिता गरब करत भेजो लाल बिदेस | 
बूढ़ भए तो कोस कहे बहुरत नहि रे देस || ५ || 
भावार्थ : - माता-पिता ही झूठा लोक सम्मान प्राप्त करने हेतु पहले तो गर्व करते अपनी संतान को विदेश भेजते हैं, फिर  जब बुढ़ापा आता है  तब देस नहीं लौटने पर आधी-व्याधि से घिरे उन्हें कोसते हैं | 'चंदन पड़िया चौंक में ईंधन सों बरि जाए' (संत कबीर ) चंदन होने पर भी वहां उनका उपयोग ईंधन के सदृश्य होता है | 

निग्रहित मन कृपन कर जो करिए मित ब्यौहार | 
करम अनुहारत पाइहैं सब निज निज अधिकार || ६ || 
भावार्थ : - सामर्थ्यवान यदि संयमित मन व् कृपण हस्त कर फिर मितव्यवहार करे तो कर्मानुसार सभी को अपना अपना अधिकार प्राप्त होगा और कोई भी अधिकारों से वंचित नहीं होगा | 

गगन परसति अटालिका काचे पाके गेह | 
कहबत माहि गेह सोइ जहाँ पले अस्नेह || ७ || 
भावार्थ : - ये गगनस्पर्शी अट्टालिकाएं, ये कच्चे-पक्के घर !! वस्तुत: घर वही है जहाँ स्नेह परिपोषित होता हो | 

   
  मातपिता बिनु गेह जहँ नेह बिहुन संतान | 
  सो बस्ती बनमानुष की सो तो जुग पाषान || ८ || 
भावार्थ : - जहाँ गृह मातपिता से रहित हों जहाँ संतान स्नेह से वंचित हो ऐसी बस्ती वनमानुषों की बस्ती है और वह काल पाषाण काल है | 

करनी बिहून कथनी करत श्रोता केर अकाल | 
करनी कथनी संग करि सो सुनी गई सब काल || ९ || 
भावार्थ : -करनी विहीन कथनी श्रोता का अकाल कराती है वहीँ यदि कथनी को करनी की संगती प्राप्त हो तो वह  सभी कालों ( भूत भविष्य वर्तमान )में सुनी जाती रही है | 

आन बसे परबासिआ बिगड़े तासहुँ देस   | 
बिगरे भोजन बासना बिगड़ गयो परिबेस || १० || 
भावार्थ : - जबसे पराए देशों के निवासी इस देश में आ बेस और यहाँ पराई संस्कृतियों का अनुशरण होने लगा तबसे यह साकारित देश विकृति को प्राप्त हो गया जिससे इसके देशाचार, आहार-विहार यहाँ तक की वेश भूषा और  भाषा भी विकृत हो गई  | 

जनता तेरे राज की महिमा अपरम्पार | 
दाता भेखारी कियो भेखारी दातार || ११ || 
भावार्थ : - हे जनता तेरे शासन की महिमा तो अपरम्पार है तूने सामर्थ्यवान को भिखारी और असमर्थ को दातार बना दिया  | 

बार लगे न भूति लगे कछु बिनसावन माहि | 
जग भर केरि जुगुति लगे पुनि बिरचावन ताहि || १२ || 
भावार्थ : - सृष्टिकर्ता की सृष्टि में कुछ विनष्ट करना हो तो न समय लगता न धन, किन्तु उसे पुनर्निर्माण करने में संसारभर की युक्तियाँ (धन श्रम समय आदि ) लग जाता है |  इसलिए कुछ  विनष्ट करने से पूर्व हमें सौ बार विचार करना चाहिए |