Friday, 16 October 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४२ ।। -----

शुक्रवार, १७ अक्तूबर, २०१५                                                                   

सीस चरन धर कर धरि काना । दहत दहत महि गिरे बिहाना ॥ 
तेहि अवसर समर मुख पीठा । हा हा हेति पुकारत दीठा ॥ 

राज कुँअर मुख मुरुछा छाईं । दरसत ताहि बीर मनि राई ॥ 
दहन गरभ गह आँगन आवा । गहन गरज पुष्कल पुर धावा ॥ 

करिउ चित्कार अतिउ घन घोरा । जिमि बल्लिका गुँजहि चहुँ ओरा ॥ 
इहाँ कपिबर बीर हनुमाना । देखत उमगत सिंधु समाना ॥ 

कटक भीत धरि रूप कराला ।बीर मनि जस भयऊ ब्याला ॥ 
जोरि जोग निज बिनहि बिचारे । झपट डपट भट धरि धरि मारे ॥ 

बज्राघात करि  बीर कचारे। पाहि पाहि सब पाहि पुकारे ॥ 
पुष्कल संकट घेरे घिराए । अचिर प्रभ गति सम अचिरम धाए ॥ 

धावत आवत द्युति गति जब निज कोत बिलोकि । 
धीर बँधावत एहि कहत पुष्कल हनुमत रोकि ॥ 

निर्बल बिकल मोहि न बुझावा । महाकपि कहु केहि कर धावा ॥ 
तृनु तुल तुहीं यह कटकाई । कहु त अहहीं केत रे भाई ॥ 

रथि कछु रथ कछु गज कछु घोड़े । जानिहु मैं गनि महुँ बहु थोड़े ॥ 
असुर सैन सरि सिंधु अपारा । राम कृपा जस करिहहु पारा ॥ 

सोइ भाँति हे पवन कुमारा । संकट ते पइहौं मैं पारा ॥ 
नाउ अधर हरिदै छबि धरके । रघुबरन्हि मन सुमिरन करके ॥ 

दसा असहाए होत सहाईं  । राम नाम दुःख सिंधु सुखाईं ॥ 
संकट हरन राम कर नाऊ । ताहि तनिक संदेह न काऊ ॥ 

एहि हेतु महबीर तुम्ह रन भू बहुरत जाहु । 
तोर पीठ मैं आइहौं जयत बीर मनि नाहु ॥ 

सोमवार, १९ अक्तूबर, २०१५                                                                                

कुँअरु बचन श्रवनत हनुमाना । कहत ए बचन भयउ अकुलाना ॥ 
तात बयरु कीजो ताही सों । बुधि बल सकिअ जीति जाही सों ॥ 

कहाँ बाल दिनकर के खेला । कहाँ तेज तापस कर हेला ॥ 
महा दातार यह जनपालक । बिरध बयस यह अरु तुम बालक ॥ 

प्रनत पाल नय विद जस होई । रन भू महुँ अस कुसल न कोई ॥ 
महा प्रताप सील बलबाना । धीर धुरंधर नीति बिधाना ॥ 

सस्त्र घात में परम प्रबेका । तासों हारिहि बीर अनेका ॥ 
सिव संकर जिनके रखबारे । यह बत जानपनी तुम्हारे ॥ 

भगतिहि  केर वसीभूत रहैं सदा संकास । 
तासु  नगर गिरिजा सहित करिहहिं नंद निवास ॥ 
सानंद निवास करते हैं 

 मंगलवार, २० अक्तूबर २०१५                                                                                 

 तोर कही कपिबर मैं माना । करे भगति अस भूप सयाना ॥ 
कि भयउ बसीभूत सिउ संकर । किए अस्थापित ताहि निज नगर ॥ 

जासु चरन  स्वयम भगवाना । पूजित पाए परम अस्थाना ॥ 
बसे मम हिय सोइ रघुराई । छाँड़ मोहि अरु कतहु न जाईं ॥ 

भगत बछर रघुबर जहँ अहहीं । सकल चराचर जग तहँ रहहीं ॥ 
हारिहि अवसि जुझत जनपाला । होइहि मोर कंठ जयमाला ॥ 

धरे धीर पुष्कल अस कहेउ । होइ सो जो तासु मन चहेउ ॥ 
हित अहित पुनि हरिदै बिचारी । फिरे हनुमत करात मन भारी ॥ 

बीर मनि  कर लघु भ्रात, बीर सिंह रहि नामु । 
बहुरि तासु जुझावन पुनि चले बुद्धि बल धामु ॥ 

बुधवार, २१ अक्तूबर, २०१५                                                                                         

दुइरथ रन मैं बहु कुसलाता । सुमिरत पुष्कल मन जनत्राता ॥ 
हिरन मई रथ रसन सँभारत ।भूपत सम्मुख चले पचारत ॥ 

आवत देखि बीर मनि ताहीं । जान जुबक अस कहत बुझाहीं ॥ 
अजहुँ कोप प्रचंड भए मोरा । जुद्ध करत होवत अति घोरा ॥ 

मैं अँगार भिरिहु न मम संगा । आइहु सम्मुख होहु पतंगा ॥ 
चाहु न मरन प्रान जो चाहू । मम सों रन बिन बहुरत जाहू ॥ 

बीर मनि ऐसेउ कहि पायो । पुष्कल तत छन उत्तरु दायो ॥ 
जो तुम्ह समरोन्मुख होहू । समर बिमुख सुनु सोहि न मोहू ॥ 

सुभट सोइ जो प्रान न लोभा । सम्मुख मरन बीर के सोभा ॥ 
पुनि रघुबर भगता अस होईं । ता सों जीत सकै नहि कोई ॥ 

को राउ हो कि चहे किन सुरपत पद अधिकारि । 
लरत प्रभु कर काज करत परिहि भगताहि भारि ॥ 

बुधवार, ०४ नवम्बर २०१५                                                                                     

भरत सुत जब ऐसेउ भासा । निपट बालक समझ नृप हाँसा ॥ 
बदन हास छन माहि बिलोपा । अगन सरूप प्रगस भए कोपा ॥ 

भूपत केर कुपित जब जान्यो । बीर कुअँरु धनु धरी तान्यो ॥ 
समरोन्मत्त रसन सहारा । उरस बीस तिख बान प्रहारा ॥ 

भूप बान आगत जब लाखा । गहकर सर सरि सूल सलाखा ॥ 
छाँड़त मन भा क्रोध प्रचंडा । आगत बान भयउ बहु खंडा ॥ 

देखि बन नृप काटि निबेरे । बीर बिनासक रिपु दल केरे ॥ 
पुस्कलहू मन ही मन क्रोधा । गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा ॥ 

बहुरि धनुरु धर हाथ तान तीन तीर कस्यो । 
सीध बाँध पुनि माथ  हतत भूपत बिकल कियो ॥ 


बृहस्पति/ शुक्र  , ०५/०६ नवम्बर, २०१५                                                                                    

करत अघात बान करि घावा । बहुरि प्रचंड कोप उर छावा ॥ 
तानेउ चाप रसन सहारा  । छन महु नृप नव बान उतारा ॥ 

लगत बान बिदरित भई छाँति । गिरत परत सँभरेउ केहि भाँति ॥ 
छूटत चरे रक्त की धारा । करे कोप अति भरत कुमारा ॥ 

करधर धनु पुनि खरतर मूँहा । गहि गुन सर सत केर समूहा ॥ 
चलेउ तुर जस काल ब्याला । भयउ हताहत नृप तत्काला ॥ 

किए उर बस अस तीख प्रहारा । बीर बिभूषन देइ उतारा ॥ 
देहाबरन महि माहि गिराए । बिभंजित रथ बिनु चरनहि धाए ॥   

निरखत नृप चढ़त  नव स्यंदन  । रहेउ अचल भरत के नंदन ।।  
बहुरि बीर मनि सम्मुख  आना । प्रीत्यार्थ ए बचन बखाना ॥ 

रघुबर चरन  सरोज सम अरु तुम मधुकर रूप ।
वाकी छबि राकेस  सरिस अरु तुम कुमुद सरूप ॥

मधुकर कौमुद इब अनुरागी । भए अजहुँ मम कोप  कर भागी ॥ 
सबहि बिधि सों कुसल भूपाला । गहि गुन कोटिक बान कराला ॥ 

पुनि पुष्कल पुर करक निहारा । सीध बाँध करि तीख प्रहारा ॥ 
काल गहन घन मेघ समाना । लागेउ बृष्टि करै बहु बाना ॥ 

दसहुँ दिसा रहेउ नभ छाईं । अबरु  न कछु अरु देइ दिखाईं ॥ 
बज्र निपातत बारहीं बारा । घुर्मि घुर्मि करि धूनि अपारा ॥ 

परइ सिलीमुख सहुँ अस चमकहिं । दसहुँ दिसा जस दामिनि दमकहिं ॥ 
निज सेन संहार जब लाखा । लोहिताखि लाखत प्रतिपाखा ॥ 

धुरबह धुरीन पुष्कलहु कोटिसायुध निपात । 

रिपु ऊपर चढ़ि दौड़ के करे घात पर घात ॥ 

रविवार, ०७ नवम्बर, २०१५                                                                           

सयन मगन बन केसरि जागा । धरि धरि भट संहारन लागा ॥ 
कहँरत घाउ धरत प्रतिपाखा । जहँ लग देखि बिनासहि लाखा ॥ 

छायौ रन रव अस चहुँओरा । गर्जहिं जिमि घन घोर कठोरा ॥ 
बिदरित भए जब माथ अपारा । बिहुर बिहुर गिरि गजमनि धारा ॥ 

कटक केरि भय गयउ परायो । निर्भिक जब मुख संख पुरायो ॥ 
लखत बीर मनि  भर अति क्रोधा । छुभित जियँ अस कहत संबोधा ॥ 


भूपति तुम बिरधा बय धर के । होइहउ जोग मानादर के  ॥ 
तथापि समर माहि एहि  अवसर । परम बिक्रम मम लखिहु बीरबर ॥ 

जो महपापी जग परितापी सुरसरि तट आन परे । 
भव तारिनि कर अघहारिनि कर निंदारत दोष धरे ॥ 
सीस घमन भर करए अनादर रहेउ बिनहि अवगहे । 
तीनि सिली सों मुरुछा न देउँ त तासु लहनि मोहि लहे ॥ 

लखि बिसाल हरिदय भवन अतिसय ऊँच किवारि । 

लच्छ धरत पुष्कल बहुरि भूपत देइ हँकारि ॥    

शुक्रवार, १३ नवंबर, २०१५                                                                                     

खैंचत रसन करन लग ताना । छाँड़ेसि पुनि अगन सम बाना ॥ 
पाए पवन अरु भयउ प्रचंडा । भूपत तत्पर किए दुइ खंडा ॥ 

प्रथम खंड महि निपतत आयो । पतत सकल मंडल उजरायो ॥ 
दूज पतित नृप स्यंदनोपर । देखि दसा सर निरखत कातर ॥ 

निज जननी भगति जनित शुभफल । दूज प्रद्ल प्रदत्त कृत पुष्कल ॥ 
अवनत लोचन माथ लगायो । आतुर धनु सों छूटत धायो ॥ 

इहाँ बीर मनि केर चलाई । कातिहि बिसिख बिसिख सन जाई ॥ 
भयऊ छोभ पुष्कल मन माहि । लगा बिचारन करन का चाहि ॥ 

बिचार मगन मन सुमिरै मंगलमय एकु नाम । 
असुर निकंदन जय जय जय रघुपति राजा राम ॥

शनिवार, १४ नवम्बर, २०१५                                                                                    

जुद्धकला मैं बर बिद्बाना । छाँड़ि कोप करि  तीसर बाना ॥ 
फुँकारत अस चला मतबारा । चलि जस काल सर्प बिष धारा ॥ 

धावहिं द्रुत अस बदनु पसारा । सकल भूमि जस होंहि अहारा ॥ 

गतवत मनिमय माथ चकासा ।  कासित भए जस सूर प्रकासा ॥ 

खैंचत गगन अगन अवरेखा । भूपत काल बरन करि लेखा ॥ 

धँसत उर दंस  अस घात  कियो । घरी मह अरि मुरुछित करि दियो ॥ 

सेन नाथ जब मुरुछित पाईं । पाहि पाहि कह भयउ पराईं ॥ 

गहि सर उर जब महि परि आवा ।  दूर दूर धूरि धूरि छावा ॥ 

छबि हृदय अनुराग नयन, मुखधर रामहि राम । 
बल हीन पुष्कल बलि सों जीत लियो संग्राम ॥  

रविवार, १५ नवम्बर, २०१५                                                                                  

कहत सेष पुनि  हे मुनिराई । हनुमत बीर सिंह पहि जाईं ॥ 
बोले निज पुठबार डिठाइब । अहौ बीरबर कहु कहँ जाइब ॥ 

मरन कल रन भू न बिसारिहु । मोरे कर छन महु तुम हारिहु ॥ 
लखि बड़बोलापन कपि केरा । बीर सिंह रिस नयन तरेरा ॥ 

कोपित कर धनु धर परचारा । घन निभ गहन धुनी टंकारा ॥ 
करषत रसन करा सर बारी । करिअ धनब जिमि धारासारी ॥ 

धार धार महि गहि अस सोहा । बरखत जस पावस मन मोहा ॥ 
बान  बून्द जब लगिहि सरीरा ।  भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा ॥ 

बजर घोष कर बजर सम हनुमत मूठि तरेर । 
बीरसिंह केरी छाँति मारे देइ दरेर ॥ 

सोमवार, १६ नवम्बर, २०१५                                                                                     

परा भूमि गह घोर प्रहारा । पर साल जिमि चरन  उपारा ॥ 
छाए गहन मुरुछा मुख वाके । दरसत बिकल दस पितिआ के ॥ 

आतुर सुभाङ्गद तहँ आयो । जागत मुरुछा गै भूरायो ॥ 
रुकुमाङ्गद केहु चित चेता । आनइ धमक गयउ रन खेता ॥ 

भिरत भयंकर पुनि दुहु भाई । परचारत  हनुमत पहि आईं ॥ 
 समर पराइ डिठाइब पीठी  । दोउ बीर आगत पुनि डीठी ॥ 

धनुरथ सहित दोउ पुठबारे । लपटि  लँगूर पटकि महि डारे ॥ 
खात बेगि आघात कराला । भयउ दुनहु मुरुछित तत्काला ॥ 

सुमद के सोंह बलमित्रहु  निज निज जोरी जान । 

लरत भरत समर अभिरत हतचित भयउ बिहान ॥ 

मंगलवार, १७ नवम्बर, २०१५                                                                          

ससि शेखर सर सुरसरि धारे । भगतन के जो सोक निवारे ॥ 
निज परिजन  मुरुछित जब जानिहि । सो भगवन रन आनिहि ॥ 

इत सत्रुघन के कटक बिसाला । प्रतिजोधन तिन उत महकाला ॥ 
बिपदा गहि भगतन कर राखा । और कोउ रन  हेतु न लाखा ॥ 

पुरबल काल त्रिपुर के संगा । जुझे जेहि बिधि जासु प्रसंगा ॥ 
तासु संगत तेहि बिधि तहवाँ । रामानुज रहि रनरत जहवाँ ॥ 

समर सजाउल साजि महेसे । धरनिहि  तल हहरात प्रबेसे ॥ 
महाबली सत्रुहन कस लाखी । कि सरबदेउ सिरोमनि साखी ॥ 

भगत बिबस हित अहित बिसारे । जुझन आपहीं आन पधारे ॥ 

समर बीर जगाई पुनि सब रन साज सजाए । 
चन्द्रधर महेसर संग समरन सम्मुख आए ॥ 

बुध/बृहस्पति , १८/१९  नवम्बर, २०१५                                                                             

लखि सत्रुहन सहुँ सैन सँभारे । सकल जुझावनि साज सँवारे ॥ 
बान घनकर बरन  करि बारी । बीर भद्रन्हि  कहि त्रिपुरारी ॥ 

ए मोर भगत हेतु दुखदाई ताहि संग तुम करौ लराई ॥ 
बल माहि हनुमत एकजस पाए । नन्दीहि तासों भिरन पठाए ॥ 

कहेब दए आयसु सब काहू । भँगी तुअ सुबाहु पहि जाहू ॥ 
गयउ कुसध्वज पाहि प्रचंडा । समर बाँकुर सुमद पहि चंडा ॥ 

रुद्रगन मैं बल बीर बिसेखा । बीर भद्रहि सहुँ आगत देखा ॥ 
पुष्कल क मन रन अति रंगा ।चला दीप सहुँ जरन पतंगा ॥ 

तासु  कर पै पञ्च प्रदल उरि जस गगन बिहंग । 
चोंच भरि अरि करि घायल भए भंजित सब अंग ॥ 


  


















Saturday, 3 October 2015

----- ॥ टिप्पणी ८ ॥ -----



>> जिन्हें मंदिर में प्रवेश न मिले वे हज़ करें, मदीना जाएं..... यदि वहां भी प्रवेश न मिले तो फिर गिरजा घर जाएं.....
  
>> मुट्ठी भर लोगों की विलासिताओं का ऋण चुकता करते करते भारत वंशियों की न जाने कितनी पीढ़ियां खप जाएंगी....  

>>   गौ वंश किसानों की आर्थिक दशा सुदृढ़ करने में सहायक होता है, गौ-वंश की हत्या का अर्थ ही किसानों की हत्या । गौ-वंश के हत्यारे व् उनके समर्थक किसानों के हत्यारे हैं.....


>> राजू : -- ये पैसे वाले भी न कैसी कैसी बातें करतें हैं,आयकर विभाग  'इनको' कुछ नहीं कहता ?

" ऐ ! वो केवल मध्यम वर्ग का रक्त पीने के लिए बना हैं....."

>> पैसा व् सत्ता के लिए कुछ भी करने वालों से विश्व को भयभीत रहना चाहिए.....

>> ए  इस्नेच नरियात रथे.....? (यह ऐसे ही रेंकता रहता है क्या ? )  
     राजू : ह 
" ई दो ठो गारी हे " 
राजू : -- कब कब देना हे मास्टरजी ? 
" एक चुनाउ के पहले दूसर चुनाउ के बाद....." 

>> ऐसी टिकलियाँ तो हमरे देश मा फूटती ही रहती हैं.....
>> जदि टी बी देख के शासन चलाना बंद नहीं करेंगे तो बची-खुची साइनिंग भी जाती रहेगी.....
>> वर्तमान समय में इस्लाम " सारी कायनात हमारी है" की तर्ज पर साम्राज्यवाद की ओर बढ़ रहा है, और भारत सहस्त्र वर्षों वाली दासता की ओर बढ़ रहा है.....

साम्राज्यवाद = एक राष्ट्र को अधिकार में लेकर उसे अपने हित का साधन बनाने वाला सिद्धांत.....

>> ये देश कभी गौशाला हुव करता था, इन जैसे सत्ता के लालचियों ने इसे कसाई खाना बना के रख दिया है.....

>>  इस देश को खंड-खंड करके इस्लामिक देश बनाते जाएंगे ये पठान की औलाद.....

>> सत्ताधारी दल चाहते हैं कि वे इस धरती को दास बंनाने वालों के साथ मिलकर अत्याचार करते रहें, अनाचार करते रहें, भ्रष्टाचार करते रहें, यह धरती और उसकी संतान उसे चुपचाप सहती रहे, नहीं सहेगी तो ये दल आपस में षड़यंत्र रचकर गला दबा के उसकी बोलती बंद कर देंगे.....

और हाँ : -- कुत्त्ते तो इस देश में भी मिलते है,  और कुत्ते क्या नहीं खाते.....

>> आया जीता किसी का पिउ..,
      किसी के घर पैट्रोल पम आया.....

>> रक्त दान तब जब ग्राही किसी का जीवन न ले.....

>> नरभक्षण भी हो रहा हो तो आश्चर्य नहीं होगा.....यह विकासराज है कि दानव राज.....

>> इस पांचवीं में पांच बार अनुत्तीर्ण को ये नहीं पता कि धान का कटोरा किसको बोलते हैं.....
किसी प्राथमिक पाठशाला में भेजो इसको.....

>> महामहिम राष्ट्रपति जो भारतीय धर्म सम्प्रदाय व् जाति  का मुखौटा लगाने वालों  के कृपापात्र हैं, को  अपने शब्दों पर दृढ न रहने व् कुर्सी से चिपकने का रोग है, कृपया कोई उपचार बताएं.....

>> ये इन सत्ताधारियों के सोलहवें मार्गदर्शक हैं ९२ में शंकर दयाल शर्मा थे.....
>>  बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक गणपति उत्सव की प्रथा बंबई से प्रारम्भ  की थी.....

>> अब तो सूट छुड़ाने वाले पीरो-मौला आ गए हैं.....
एक ज्ञान तो बताइये ये पूर्व पी एम और राष्ट्रपति की काहे नहीं छुड़ाए.....
राजू : - खुद की  छूटे तो न, ए फोटो वाले.....तनिक अमरीका में दारु के साथ वाली फोटो दिखाओ तो .....

>> इन नरभक्षी पियक्कड़ दानवों के  मार्गदर्सक प्रति  पांच वर्ष में बदल जाते हैं,
एक ज्ञान तो बताइये ९२ में मार्गदर्सक कौन थे ?

राजू : -- अब उस समय कोई हो तो ज्ञान दे, तनिक अपनी पाटी का इतिहास भी पढ़  लेना चाहिए.....
>> मांस भक्षण  करके ,  गले तक चढ़ा के सब कुछ दो दो दिखता है.....दीवाली भी.....

>> नाम व् उपनाम किसी जाति व् सम्प्रदाय विशेष के  द्योतक होते हैं इन्हें धर के  इधर-उधर नहीं जाना चाहिए.....
दुनिया कहती है देखो गुजराती गौ भक्षी हो गए हैं  और गौपालक भारत क्या से क्या हो गया.....

राजू : - हाँ ! एक बात और जब ग़दर-ग़दर खेलना नहीं आता तो खेलते काहे हो.....

>> अरणों में अरण है वर्णों में है भाव । 
      शब्दों की पतवार है कागज़ की है नाव ॥ 

>> एक ज्ञान तो बताइये ये कुत्ते बिल्लियों की चाय पिता कौन था.…।  ? 

>> एक बात तो बताइये ये लोग अनशन करते थे कि गवाशन करते थे..... 

>> राजू : -- ये भी साधुसंत है  इसकी भी मत पूछो.....जात और क्या.....ज्ञान इसके पितरों से पूछ लेंगे.....
>> विद्यमान समय में विश्व को न केवल आतंक अपितु उसके समर्थकों से भी सावधान रहने की आवश्यकता है.....

Thursday, 1 October 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४१ ।। -----

बृहस्पतिवार, ०१ अक्तूबर, २०१५                                                                    

ममहय हेरे हेर न पायो । कतहुँ तोहि कहु दरसन दायो ॥ 
काज कुसल बहु हेरक मोरे । गयऊ मग मग मिलिहि न सोरे ॥ 

नारद बीना बादन साथा । गाँवहि रूचि रूचि भगवन गाथा ॥ 
राम राम जप कहँ सुनु राऊ । अहँ  नगर यह देउपुर नाऊ ॥ 

तहँ जग बिदित बीर मनि राजा । बैभव बिभूति संग बिराजा ॥ 
तासु तनय बिहरन बन आइहि । हिंसत हय सहुँ बिचरत पाइहि ॥ 

हरन हेतु सो गहे किरन कर । समर करन लिए गयौ निज नगर ॥ 
नयन धरे रन पथ महराजू । अजहुँ तुम्ह रन साज समाजू ॥ 

गह बल भारी देइँ हँकारी बर बर समर ब्यसनी । 

ब्यूहित जूह सहित समूह सों  सैन सब भाँति बनी ॥  
अतिकाय अनिप करिहि गर्जन धनबन घन बन गाजिहैँ । 
होइ धमाधम नग बन सो जुझावनि बाजनि बाजिहैं ॥ 

कवलन काल पुकारिया समर बिरध बलबीर । 
राजन धनुधर रनन रन कास लियो कटि तीर ॥ 


शुक्रवार,०२ अक्तूबर, २०१५                                                                                    

अतएव जोग जुझावन साजू । पूरनतस तुम रहौ समाजू ॥ 
रहिहउ अस्थित भू भट जूहा । रचइत सुरुचित सैन ब्यूहा ॥ 

ब्यूहित जूह रहए अभंगा । प्रबसि होए न केहि के संगा ॥ 
बाहु बली बहु बहु बुधवंता । अहहीं एकसम प्रतिसामंता ॥ 

नाहु बाहु जस सिंधु अपारा । अंतहीन जल सम बल घारा ॥ 
तापर बहु बाँकुर अवरूढ़े । पार न भयउ गयउ सो बूढ़े ॥ 

एहि हुँत तासहु सुनु मम भाई । परिहि जुझावन अति कठिनाई ॥ 
तद्यपि तुम सत धर्म अचारी । होहि जयति जय श्री तुम्हारी ॥ 

जगभर में अस बीर न होई । सके जीत सत्रुहन जो कोई ॥ 
भगवन के अस करत बखाना ।नारद भयउ  अंतरधियाना ॥ 

दुहु दल के संग्राम भए देवासुर संकास । 
ताहि बिलोकन देवगन हरष ठहरि आगास ॥ 

शनिवार, ०३ अक्तूबर, २०१५                                                                                

इहाँ अतिबलि बीर मनि राई । अनिप रिपुबार नाउ बुलाई ॥ 
हनन ढिंढोरन आयसु दाए । चेतन नागरी नगर पठाए ॥ 

डगर डगर जब हनि ढिंढोरा । करिए गुँजार नगर चहुँ ओरा ॥ 
घोषत जो कछु बचन कहेऊ । तासु गदन एहि भाँति रहेऊ ॥ 

गहे बिकट जुव भट समुदाई । कहि न सकै सो दल बिपुलाई ॥ 
जूह बांध बहु जोग निजोगे । बधि हय लहन जुझावन जोगे ॥ 

रघुकुल भूषण राजन जाके । सैनाधिप लघु भ्राता ताके ॥ 
अहहि नगर जो को बलि जोधा । समाजु सो सब भिरन  बिरोधा ॥ 

वादित श्रोता गन मध्य  भयऊ  अस निर्वाद । 
कर सूचि निपातहि महि करहि सोए निह्नाद ॥ 

रविवार, ०४ अक्तूबर २०१५                                                                                          

जेहि केहि बलबन अभिमाना । परम बली जो आपन जाना ॥ 
राजायसु लाँघिहि जो कोई । सो नृप सुत भ्राता किन होई ॥ 

दोषारोपित राज बिद्रोही । सो सब बकबुधि बध जुग होंही ॥ 
पुरजन मति जब कछु नहि  लेखे ।  नयन जुहार एक एकहि देखे ॥ 

बहुरि बहुरि रन भेरि हनाईं । निगदित गदन गयउ दुहराईं ॥ 
सुनौ बीर अस सुनि अतुराई । रहें करकनीज करतब ताईं ॥ 

यह राजग्या लाँघे  न कोए  । आयसु पालन बिलम नहि होए ॥ 
नरबर नृप कर भट बलबना । घोषित बचन सुने जब काना ॥ 

कर धनुधर कटि सर सजी काया कवच सुहाहिं । 
मन महुँ भरे रन रंजन, गवने भूपति पाहि ॥ 

सोमवार, ०५ अक्तूबर, २०१५                                                                                  

मान समर माह परब समाना । आए बीर भट भरि भरि बाना ॥ 
उर्स उदधि भए हरष तरंगा । उमग उमग उम परस उतंगा ॥ 

करे गुँजारि भीड़ अति भारी । राजित रज रज राज दुआरी ॥ 
तुरग तूल तुर रथ संचारा । आए बेगि पुनि राज कुमारा ॥ 

कला कलित कलाप के पूला । गह रत्ना भूषन बहु मूला ॥ 
फर धर खडग कवच कर गाता । सुभाङ्गद नाऊ लघु भ्राता ॥ 

करे पयान प्रान परहेला । आन अतुर रन परब समेला ॥ 
बीर सिंह भूपति के भाई । आजुध बिद्या महुँ कुसलाई ॥ 

अस्त्र सस्त्र सो सबहि बिधाना । लच्छ सिद्धि कर गहै ग्याना ॥ 
राजग्या अनुहारत सोई । राज दुआरी राजित होई ॥ 

महाराज के राज में दए आयसु अस होइ । 
बिपरीत मति होत ताहि लाँघ सकै नहि कोइ ॥ 

मंगलवार, ०६ अक्तूबर २०१५                                                                        

भूपति केरि बहिनि कर तनुभौ । आन सोउ हेले रन उत्सौ॥ 
पुरजन हो चह परिजन कोई । अमित बिक्रम बल बीर सँजोई ॥ 

चतुरंगिनि बार कटकु बनाईं । गयउ अनिप नृप पाहि जनाईं ॥ 
सबहि भाँति गह साज समाजा । तदन्नता चढ़ि ध्वजी अधिराजा ॥ 

ऐसेउ को आयुध न होहीं  । जुगावनि  जोइ राउ न जोहीं ॥ 
रचित मनोहर मनि बहु रंगा । चरिहि चरन जिमि गगन बिहंगा ॥ 

कहे सरन रहुँ ऊँचहि ऊंचे । रहउँ तहाँ जहँ रज न पहूँचे ॥ 
बाजिहि मधु मधुर मंजीरा । पुरयो सप्तक सुर दुहु  तीरा ॥ 

बजावनहार बजावहि बाजनि बहु चहुँ फेरि । 
दसहु  दिसा गुँजारत पुनि उठी रन भेरि ॥ 

बुधवार,०७ अक्तूबर, २०१५                                                                                

गहन रूप बाजत रन डंका । चले कटकु सन बहु बहु बंका ॥ 
हेल मेल पथ चरनन धरायो  । धूसर घन सों गगन अटायो ॥ 

सबहि कतहुँ घन घन रव होई । कहैं एकहि एक सुनै न कोई ॥ 
उर्स हरष मन जुगत उछाहा । नियरत रनाङ्गन नरनाहा ॥ 

जिन सों कबहूँ सस्त्र न अंगा । सिद्ध हस्त अस रथी प्रसंगा ॥ 
लेइ संग तिन सैन समूची । राजन सों रन भूमि पहूँची ॥ 

धुर ऊपर घन धूर गहायो । चारि कोत कोलाहल छायो ॥ 
राउ अनी आगम जब देखे । सत्रुहन सुमति सोंह कहि लेखे ॥ 

गहे जोइ मोरे बर बाहू । आएँ लिए निज सैन सो नाहू ॥ 

गाहे हस्त समरोद्यत बँधे माथ कर पाँति । 
ता सोहि मुठ भेटौँ मैं कहौ सुबुध किमि भाँति ॥ 

बृहस्पतिवार, ०८ अक्तूबर, २०१५                                                                      

हमरे पहिं भट को को होहिहि । जोइ समर जुझावन जोइहि ॥ 
बुधिबल सकिअ रिपु संग जयना ।जोग जोख करिहौ अस चयना ॥ 

चयन तेहि अनुसासन दीजौ । सुनहु सखा अब बिलम न कीजौ ॥ 
बोलि सुमति हे मम गोसाईं । अस तो सबहि गहे कुसलाईं ॥ 

पुष्कल महा बीर मैं बीरा । जोग जुधान रतन में हीरा ॥ 
आयुध बिद्या मैं बिद्बाना । घात करन में परम सुजाना ॥ 

नील रतन सम  अबरु ग्याता । सस्त्रीबर बहु कुसलाता ॥ 
महामहिम  के जो मन भाईं । समर बीर सो करिहि लड़ाई ॥ 

महाराज बीर मनि अरु गंगाधर सहुँ  होहिं । 
नाथ बयरु तुम कीजियो अगुसर ताही सोहि ॥ 

शुक्रवार, ०९  अक्तूबर, २०१५                                                                                      

सो महिपाल काल सम बीरा । अमित बीकाम अति अति रनधीरा ॥ 
अहहीं चतुर तुम्हारिहि नाईं । द्वंद युद्ध भा एकु  उपाई ॥ 

भिरत समर सो भूपत तुम्हहि । जितिहहु तामें किछु संसय नहि ॥ 
अबरु उचित तुअ जनि मन जैसे । करिहौ हित कृत करतब तैसे ॥ 

तुम्ह स्वयमहु परम सुजाना । खेत करन गह सबहि ग्याना ॥ 
सुनत बचन एहि सुमिरत रामा । प्रतिद्वंद्वी कर दल दामा ॥ 

रन जुझावन संकलप लेई । भिरन बीर अनुसासन देईं ॥ 
प्रतिपारत कहि निज नरनाहा । समरु कुसल उर भरे उछाहा ॥ 

अनी अगन आयसु पवन भट भट भए  चिङ्गारि । 
धू धू करत ताप धरत , समार भूमि पद धारि ॥ 

जनि = समझे 

शनिवार, १० अक्तूबर, २०१५                                                                               

कटि सर षंड कोदंड हाथा । भयउ गोचर सबहि एक साथा ॥ 
सुभट नयन उठि लखे दिवाकर । छाँड़ निषंग चढ़े जीवा पर ॥ 

चले आतुर झूँड के झूँडा । लगिहि चरन उर सिर भुजदंडा ॥ 
प्रदल खलभल केहि नहि लाखा । भयऊ पल महि बिकल बिपाखा ॥ 

छन महुँ  बहुतक बीर बिदारे । त्रासित हा हा हेति पुकारे ॥ 
सुने जब निज सेन संहारा । मनिरथ राजित राज कुमारा ॥ 

दुति गति सम गत आयउ आगे । ताके कर सर सरसर भागे ॥ 
चले गगन जिमि पुच्छल पूला । होए  दुनहु दल तूलमतूला ॥ 

चढ़े घात निपात नेक सुभट ब्याकुल होए । 
त्राहि त्राहि गुहार करे हा हा करि सब कोए ॥ 

रवि /सोम , ११ /१२  अक्तूबर, २०१५                                                                                 

बल जस सम्पद माहि समाना ।रुक्माङ्गद निज जोरि जाना ॥ 
पचार सत्रुहन भरत कुमारा । समर हेतु घन गरज पुकारा  ॥ 

कोटि कोटि भट कटक बिडारे । केत न केतक गयऊ मारे ॥ 
निर्बल घात करिहौ प्रहारा । धिग धिग धिग पौरुष तुम्हारा ॥ 

तासु मरन कछु लाह न होहीं । बीर रतन करु रन मम सोहीं ॥ 
सूर बीर बीरहि सहुँ सोहा । बिपरीत चरन बीर न होहा ॥ 

अस कह रुक्माङ्गद पचारा । सूरबीर पुष्कल हँस पारा ॥ 
छाँड़ बेगि पुनि सर संघाती । राजकुँअर करि  भेदिहि छाँती ॥ 

मर्म अघात परत भूमि उठत बहुरि अतुराए । 
 धरि भू चरन सरासन रसन खैचत श्रवन लगाए ॥ 

मंगलवार, १३ अक्तूबर २०१५                                                                                   

भयउ जर जर कोप कर भारी । बदन अंगीरि नयन अँगारी ॥ 
करक दरस दस सायक बाढ़े । आत सहुँ रिपु घात पर चाढ़े ॥ 

धकरत पुष्कल उरस दुआरी । धँसे भीत पट देइ उहारी ॥ 
करिहि एकहि एक कोप अपारा । दोउ ह्दय चहि जय अधिकारा ॥ 

देत बहुरि बहु गहन  अघाता । रुकमाङ्गद कहे अस बाता ॥ 
समर बीर प्रचंड बल जोरे । देखू अमित पराक्रम मोरे ॥ 

राजित रथ रहिहौं रसि कासा । अजहुँ तोर आठ उरिहि अगासा ॥ 
अस कहत कछु मंत्र उचारेसि  । बहुरि भँवरकास्त्र  देइ मारेसि ॥ 

हथत रथ दृढ चरन घुरमायो  । एक जोजन पुर दूर गिरायो ॥ 
आठ जोजक बहु जुगत लगावा । थिर परन  महि चिक्करत पावा ॥ 

सँभारत रथ भरत तनय किए थिर केहि बिधान । 
गिरत परत पुनि लेइ गत  पूरबबत अस्थान ॥ 

बुधवार, १४ अक्तूबर २०१५                                                                                  

सकल सस्त्रास्त्र के ग्याता । कहे भरत सुत पुनि एहि बाता ॥ 
कुँअरु ए महि तव जोग न होहीं । चाहिब सुरप सभा बसि तोही ॥ 

अजहुँ इहाँ ते होत निकासा । देउलोक मैं करहउ बासा ॥ 
प्रकोपत बहु कोप के साथा । बहुरि कठिन कर धनु धर हाथा ॥ 

उपार पथ रथ गगन उड़ायक । छाँड़त रसन तेहि मह सायक ॥ 
धावत तेजस धुर महुँ धाँसा । हथ छुट लिए रथ चला अगासा ॥ 

घात चढ़त रथ भयउ नभोका । गयउ उड़त लाँघत सब लोका ॥ 
पैठत महिरु मण्डलु माला । डपटहि  लपटि प्रचंड ज्वाला ॥ 

ज्वाल माल महकाल सम बहु बिकराल सरूप धरे । 

फुंकरत जिमि ब्याल बेताल बहु बहु शृगाल सब्द करे ॥ 
हय सारथि सहित जारत सकल भए बहुतहि भयावहे । 
बिलोकत उडुगन कहँ बिकल दहँ स्यंदन कि गगन दहे ॥ 

दहत रहत दिनमान , कुँअरहु संतापित भयौ । 
परि साँसत मैं प्रान त त्रासत त्राहि त्राहि किए ॥