Saturday, 10 January 2015

----- ॥ ज्ञान -गंगा ॥ -----

" आत्महत्या यद्यपि एक अपराधिक कृत्य है तथापि वह  दंडनीय नहीं है ॥ यह एक समस्या है कार्य कारन व् निवारण ही इसका समाधान है "  


करतन कारन फल संग जग अपकीरिति होइ । 
बय भय सँग स्वनिर्यनै ,प्रान हनै निज कोइ ।२२३९ । 
भावार्थ : -- मानस मनस जब किसी कार्य कारण व् परिणाम से जग दुष्कीर्ति  के भय प्रसंग अथवा परिस्थियों के वशीभूत आत्म निर्णायक होकर स्वयं को मृत्यु का दंड देता है उसे आत्महत्या कहते हैं । 
स्पष्टीकरण १ : -- आत्महत्या का नाटक एक दंडनीय कृत्य है 
स्पष्टीकरण २ : -- कार्य कारण यदि विधि द्वारा विहित उपबंधों में कोई अपराध है तब अभियुक्त उतने दंड का ही भागी होगा.....

भारत में एक किसान इस हेतु आत्महत्या करता  है कि शासकों ने उसकी धरती अधिग्रहित  कर ली यदि वह अपने कृत्य में असफल होने पर उसे ऐसे संत्रास के संग न्यायालय दंड भी देगी । 

दूसरा किसान  ऋण ग्रस्त होकर आत्महत्या करता है असफल होने पर उसे ऋण भी देना होगा और दंड भी भोगना पड़ेगा अर्थात शासक किसानों को न जीने देते है न मरने..... 

Thursday, 1 January 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड २६ ॥ -----

 बृहस्पतिवार, ०१ जनवरी, २०१५                                                                                     

मत्स्यावतार तुम्ह धारे । श्रुति रच्छत संखासुर मारे ॥ 
माह पुरुख तुम सब कुल मूला । तुहरए सत सों  जग फल फूला ॥ 
अपने मत्स्यावतार धारण कर वेदन की  शंखासुर का वध किया । हे पुरुषोत्तम आप सभी कुल के मूल पुरुष हैं आपका ही सत्व प्राप्त कर यह जग फलाफूला है ॥ 

सेष महेसहु महि कह देखे । सारदहु का तुअ केहि न लेखे ॥ 
तिनके सहुँ कहँ मैं अग्यानी । कहँ मोरी अनबाचित बानी ॥ 
भगवान शेष क्या महेश ने भी आपके महात्म्य का वर्णन किया आप शारदा क्या किसी के भी बोधसे अतीत हैं ॥ फिर इनके सम्मुख कहाँ मैं अज्ञानी कहाँ मेरी यह अन्वाचित ( गौण , हीन ) वाणी ॥ 

भगवन गन सकलन अस होई । तिन गावन समरथ नहि कोई ॥ 
गाँठ गदन सुठि बरन के पाँति ।अरपत अस्तुति हार एहि भाँति । 
भगवान के गुणों का संकलन ही ऐसा है कि इनका पूर्ण-गायन करने में कोई समर्थ नहीं है । इसप्रकार कथनों में सुन्दर वर्णों को ग्रंथित कर राजन ने भगवान श्रीराम के चरणों में स्तुति हार का अर्पण कर : - 

बहुरि नत नयन करत प्रनामा । गदगद गिरा लेइ प्रभु नामा ॥ 
मंजुल  मुख मंगल मुद भ्राजू । नीति प्रीति पालक रघुराजू ॥ 
तदननतर अवनत नयन से उन्हें परंम किया । गदगद गिरा से युक्त होकर राजन का मुख श्री राम का मंत्र जाप करने लगा ॥ नीती एवं प्रीति के पालक भगवान श्रीरामचन्द्र के मंजुल मुखारविंद में मंगलकारी प्रसन्नता सुशोभित होने लगी ॥ 

 भाव भगति उर भरि अस भावा । उठए बन घन नयन जल छावा ॥ 
गदै बचन बानि सरबसु से । गहन सुमनसु श्रवन ससि रसु से ॥ 
भक्त की श्रद्धा एवं भक्ति ने भगवान के हृदय को ऐसे भावों से भर दिया वह गहन स्वरूप उतिष्ठ होकर उनके नयन रूपी गगन में व्याप्त हो गया ॥ उन्होंने फिर उनके मुख से ऐसी सरसता सम्पूरित वाणी निकली जो ग्रहण करने में कुसुम के समान व् श्रवण करने शशि-सुधा के सरिस थी ॥ 

रे बछर तुम्हरी भगति, मम सद भगत सरूप । 
प्रसादु पावत अजहुँ तुअ, होहु चतुर्भुज रूप ॥ 
( उन्होंने कहा ) : -- वत्स ! तुम्हारी भक्ति मेरे सत्य भक्त के स्वरूप ही है । प्रसाद प्राप्त कर अब तुम भी चतुर्भुज रूप प्राप्त करोगे ॥ 

शुक्रवार, ०२ जनवरी, २०१५                                                                                                  

 तुहरे जाप जतन अस होईं । तिन गहि मोहि जपिहि जो कोई ॥ 
दरसि सो जब चतुर भुज रूपा । पाहि परम पद हे नरभूपा ॥
तुम्हारे स्त्रोत वचन व् प्रभु दर्शन का यत्न है उसे ग्रहण कर जो कोई मेरा वंदन करेगा  वह मेरे चतुर्भुज स्वरूप के दर्शन का अधिकारी होगा और हे महराज !वह परम पद को प्राप्त करेगा ॥  सुनि प्रभु गिरा आनि जो संगा । मुद महिपत सह सुजन प्रसंगा ॥
होत कृतारथ प्रभु पुर  लाखे । पदुम चरनिन्हि प्रसादु भाखे ।।  
भगवन की वाणी श्रवण पान करके महिपत अत्यधिक हर्षित हुए साथ आए  स्वजनों  का प्रसंग कर कृतार्थ होकर प्रभु की ओर दृष्टि स्थिर किए उनके पदरविन्दों का पवित्र प्रसाद ग्रहण किया । 

तबहि कनक कल कंकनि जोई । सौंह एकु जान प्रगसित होई ॥
ते अवसरु सो धर्मा चारी । भए प्रभु के जो कृपाधिकारी ॥

भगवन के अग्या ले पारे । ये संगिनि सँग जान पधारे ॥
रहि मंत्री धुर धर्म परायन । सब तीरथ सेवन किए ब्रम्हन ॥

करम्ब बदन भगवान गुन गाए । एह हुँत चतुर भुज दरसन पाए ॥
अस सूतकृत तपसि का भूपा ॥ भयऊ सकल चतुर्भुज रूपा ॥

जो देवन्ह के हेतु रहँ दुर्लभ अस्थान । 
ऐसो भगवद्धाम को, लेईं चले बिमान ॥   

शनिवार, ०३ जनवरी, २०१४                                                                                                     

संख गदा चक पद्म सँभारे। सबहीँ चतुर भुज रूप धारे ॥ 
बिहसित बदन तन घन स्यामा । छावत छन छबि नयनाभिराम ॥ 

सील चरन सत सुचित सुभावा । सबहि भरि हरि भगति भावा ॥ 
कंकनि कल कुण्डल केयूरा । कंठ चरन  कर कानन पूरा ॥ 

चरन पदुम जस कर कमलिन किए । अलि बल्लभ निभ जस मुख लस लिए ॥ 
अधर दलोपर अरुन अधारे । सुदरसु सुबसित सुधा पधारे ॥ 

पर पुरंजन आए जो संगे । हरषिहि दरसत  दिरिस बिहङ्गे ॥ 
बीथि गत पंगत किए बिमाना । बजे दुन्दुभि धुनी दिए काना ॥ 

ते समउ तहँ एकु त्रिमुखी, भाव भरे अस भारि । 
भगवद बिरह प्रभाउ बस भयउ चतुर भुज धारि ॥ 

रविवार, ०४ जनवरी, २०१५                                                                                                     

देखिहि जब एहि अद्भुद बाता । कि ब्रम्हन भए चतुर भुज गाता ॥ 
अस अनुरागि इहाँ को नाहैं  । धन्य धन्य कहि सबहि सराहैं ॥ 

गंगागम तट कृत अस्नानै । काँची तब सब पद प्रस्थानै ॥ 
तपसि सूतकृत राजन रागी । कहत चले सो भए बढ़ भागी ॥ 

कथत कथा नत सतत सरूपा । कह सुमति एहि गिरि सोइ भूपा ॥ 
आन जहाँ प्रभु मान बढ़ाइहिं । तब परबत पूजित पद पाइहि ॥ 

अरसिहि तिन्हनि जो नर नारी । होहि परम गति के अधिकारी ॥ 
जो सुभग नील गिरी गुन गाइहि । तासु महत्तम सुनिहि सुनाइहि ॥ 

दोउ परम पद पाए के जाइअहि ब्रम्ह लोक । 
ते बरनन सुनत सुमिरत रहए न को दुःख सोक ॥ 

इहाँ आन जो भगत दए भगवन दरस हँकार । 
सो भव सिंधु संग तरै  होइहि बेड़ा पार ॥ 


पूज्यनीय चरण 

सोम/मंगल , ०५/०६ जनवरी, २०१५                                                                                                      

रघुबर सरूप सहसै आखी । मातु सिआ लखि लख्मी साखी ॥ 
जग श्रीक रूप दंपति दोई । कारनहु केर कारन होई ॥ 

अजहुँत प्रभु हवि भवन अधाने । अस्व मेध कृत के पन ठाने ॥ 
मह पापक हो ब्रम्हन हंता । पतित पबित सो  होहि तुरंता ॥ 

कहत सुमति मह सचिव पुरंजन । रामानुज हे दसरथ नंदन ॥ 
यह अवसर तुम्हरे तुरंगा । ऊँच गान भए गगन बिहंगा ॥ 

पूजित पबित गिरिबर नियराएँ । हमहि थान गत सीस परनाएँ ॥ 
महमते तहँ भगत जो जाइहि । अघहीन होत  परम पद पाइहि ॥ 

कहैं नाथ अहि जब बरनत रहि सुमति महिमा प्रभो के । 
मरुत गति साथा हे द्विज नाथा तब हय भयउ नभोके ॥ 
पद पाँख बिताने पवन समाने नील गिरि नियरु अवने । 
अरिहंतहु धाए तिन पीछू आए बिप्र बर हे महामुने ॥ 

उपकृत सत्रुहन आपुनो परम सुभागी मान ।  
चरन प्रसादु पवाए के, पबित पयस किए पान ॥ 

तदनन्तर गिरि छिनु भर होरे । हय हरितक पत पुल मुख जोरे ॥ 
भरत उदर तृन चरत अगूता । मरुत तस तेजस गति सँजूता ॥ 

सत्रुहन सन लखमी निधि राजू ।सनग भयंकर बाहि बिराजू ॥ 
पुष्कल सह राजन बहुतेरे । जगत कहत रच्छत है घेरे ॥ 

कोट करे बहु कोटिक बीरा । ओट किए चले धीरहि धीरा ॥ 
चरत चक्राका पुर नियराईं । रहि पालित जो सुबाहु ताईं ॥ 

पैठत तहँ राजन के बेटा । खेलत रहा खेत आखेटा ॥ 
जब मेधि अस्व पर दीठ धरे । भयउ अपलक चित गयऊ हरे ॥ 

हंसा बरन चन्दन चर्चिता । तिलक लच्छत अच्छत अर्चिता ॥ 
लसित लवन लघु करन स्यामा । कांत बदन नयनाभिरामा ॥ 

मूरधन पर हिरन मई पतरी सोहा पाए ।
भीत बरन सिंगार किए मौली माल बँधाए ॥  

बुधवार, ०७ जनवरी, २०१५                                                                                                      

जस मुकुलित कौसुम बन राँचै । गाहे दमन मुखरित मुख बाँचे ॥ 
पढ़ अविरत समुझत अभिप्राया । अहनीक (अह्नीक )अहो मुख निकसाया ॥ 

 मोर तात जिअत जिअ ऐसेउ । ऐतक घमन किए को कैसेउ ॥ 
करे कवन साहस अस गाढ़ा । हतिहि तिन्ह मम सर गुन बाढ़ा ॥ 

ऐसेउ कहत तमगत ताका । अजहुँ मोरे बान असलाका ॥ 
रुहोरोद्गत अमोघ अघातिहि । सररत चरत अरिहत सँघातिहि ॥ 

साखा लखि जस फूर पलासा । होही प्रफूरित उर चहुँ पासा ॥ 
देखु बीर मम भुज बल भारी । कसे कैसेउ करषत नारी ।। 

करिहौ कोदन कासि कै कोटि कोटि सर बारि । 
केत न केतक साहसी, मम साहस सँग हारि ॥ 

बृहस्पतिवार, ०८ जनवरी, २०१५                                                                                         

दमन तुरंग तुर पठाई दियो । सहरष सेन पति सों कहियो  ।।  
महामते मम सेन सँभारू । जोग जुधित जुब जुधा जुझारू ॥ 

एहि बिधि उत्कट सुभट सुसाजे । जुझाउनी सब साज समाजे ॥ 
दमन सौमुह खेह डट गयऊ । ते समउ सो बिकट रूप भयऊ ॥ 

मेधीअ अस्व के अनुहारी । एही माझ तहँ आन पधारी ॥ 
होत  ब्याकुल बाराही बारा । पँवर परस्पर पूछत हारा॥ 

महराउ जिन जग्य जुगाईं । जासु भाल चीठी चिन्हाई ॥ 
दीठ दिरिस औचक कहँ दूरे । बाँधि लियो को का पथ भूरे ॥ 

अरितापद प्रतापाग्रै दरसे सौमुंहु जोंह । 
डटे रहिहिं सेन कोइ जुझाउ साज सँजोह ॥ 

शुकवार, ०९ जनवरी, २०१५                                                                                                       

बिरोचित मुख धुनी उचारए । गरजत घन जस सार न धारए । 
प्रतापाग्रै संग भट बोले । बरसन बन कस हुलस हिलोले ॥ 

लागिहि है तिनके पहि आहीं । न तरु गरजहिं अस कोउ नाहीं ॥ 
सुनत सोइ भट के अस बचना । सेन सँजुह रच ब्यूह रचना ॥ 

 एकु दूतक तिन पाहि  पठाईं । दूतक  तहँ गत पूछ बुझाईं ॥ 
मेधिअ है कहु कहाँ बँधायो ।  प्रभु परिचय का जान न पायो ॥ 

जुगुत नयन बन मति के आँधे । तसु किअं कहँ ले गत बाँधे ॥ 
रहि बलबन बहु राज कुँआरा । करे लस्तकधृ करक निहारा ॥ 

भालपत मौली माल कलिते । तिलकित लच्छन संग लंकृते ॥ 
हंसा बरन करन स्यामा । कांत बदन नयनाभिरामा ॥ हाँ वोई वोई 

जग्य जुगित जबान जबन होइहि मम पुर माहि । 
बन बलसूदन अस बचन बोले बल दे बाहि ॥ 

शनिवार, १० जनवरी, २०१४                                                                                                    

जीत सके  मोहि सो सहुँ आए । बँधे बाजि बरियात छँढ़ाए ॥ 
ए सुनि पलक दूतक बहु रोषा । किए अपनै बस रोष न पोषा ॥ 

प्रभु परिचित कर एक छन होरा । बाहरी थान सों हाँस बहोरा ॥ 
दमन बदन जो बचन कहायो  । जस के तस गत कहत सुनायो ॥ 

प्रतापागै लखए भयकारा । बदन अँगिरी नयन अँगारा ॥ 
सुनरन मय रथ चौहय केरे । हस्त पूँछ भाँबर कर घेरे ॥ 

बाहित बाहु बली लिए संगा ।  चलए चरन पथ पवन प्रसंगा ॥ 
गयउ निकट यह कहत निहारै । हम कटक कठिन तुअँ सुकुआँरे ॥ 

जुधिक जुबक बालक जान, बहु बिधि कह समुझाइ । 
जगत प्रभु के प्रभूतिभृति का तुअ जानत नाहि ॥ 

रविवार, ११ जनवरी,२०१४                                                                                         

सूर सिरौमनि सबक जासू । तापर करिषिहु है कर तासू ॥ 
दनु राज जिन लंकापति कहैं । एकै उपपंखिहि दस मुख गहैं ॥ 

अहम मति सोए हहरत  काँपा । सहेउ  न सके प्रभो प्रतापा ॥ 
में जम दूतक चहरे काला । होहि अवसि तव मरनि अकाला ॥  

बाँध बाजि निज नगर पठायो  । अधबल घट घर समर उछायो ॥ 
रे फिरकी फिर फिरत तुरंता । मुचित हय सो भयउ बय बंता ॥ 

केलि करत कल हेलत मेला । बालकपन के तौ एहि खेला । 
 दमन उर भवन भयउ अटाला । बसे जहँ  एकु हरिदै बिसाला ॥ 

एहि श्रवन  रदन अछादन सहस सुहास सजाए । 
बीर बरन निर्भय बचन, अतुलित बल दरसाए ॥   

सोमवार, १२ जनवरी, २०१५                                                                                                 

समुझ सेन तृन तूल तुहीना । कहि चाहे हो जल बिनु मीना ॥ 
दिवस तमस हो रयन अँजोरे । सूर बीर के मुख नहि मोरे ॥ 
शूर-वीर रण  से विमुख नहीं हुवा करते 

जुधिक कुशल बाँकुर बलबाना । होहि  सो मोहि देउ प्रमाना ॥ 
जुधिक जुबक को बालक माना । कल्प रचित कृत चरित बखाना ॥ 

भले भवन अब बायन दिन्हा । सो भ्रम माटी जो मोहि न चिन्हा ॥ 
बरन बचन सन का रन खेले । अजहुँ भयऊ भल सोंहि  भेले ।। 

बीरति बालक पन की बेला । समर खेत देखिहऊ खेला ॥ 
बोले जो रन आँगन माही । सूर बीर जग सोइ कहाहीं ॥ 

ऐतक कहत सुबाहु कुँआरा । धरे धुनुर कर दिए टंकारा ॥ 
लच्छ लखत सत सर संधाना । खैच करन लग रसन बिताना ॥ 

धुनुर गगन गुन द्युति भए भयउ सर घन भारि । 
द्यु प्रगस अस बरखे जस बरखे धारासारि ।।  

मंगलवार, १३ जनवरी, २०१५                                                                                               

प्रतापागै प्रपत सर षंडा । अस्फूर्त किए खंडब खंडा ।। 
देखि दमन भए लाल भभूका । धुबित धूति द्यु धूतक धूँका ॥

तिगुने सतक तेजनक साधे । प्रतापाग्रे उरस दिए बाधे ॥ 
कर धरे सर सर धरे छाँती । रुधिरुद्गत निपते एहि भाँती ॥ 

भजन भगति बिमुख निपाति हि । पतझर रितु निपतत जस पातिहि ॥ 
बहुरि दमन मुख संख पुरायो । गहबर घर जस घन (हथोड़ा ) गरजायो ॥ 

निपतित बीर भरे प्रतिसोधा । उठए बेगि अरु बोल सक्रोधा ॥ 
तृन तूल तुअ मोहि लेखिहउ  । अजहुँ मम अमित बिक्रम देखिहउँ ॥ 

ऐसेउ कहत सान सुधारे । दान बान गुन भर बौझारे  ॥ 
धुनुर रसन कासित अस छूटे । देइ अगन फुरु झूरी फूटे ॥ 

चले गगन लखि अस नयन जस घन गहरत  गाजि । 
प्यादिक चरन कर संग, गयऊ हत गज बाजि ॥ 

बुधवार, १४ जनवरी, २०१५                                                                                                       

कुअँरु दमन अचिरम प्रतिरोधा । सौमुह रिपु एहि कह सम्बोधा ॥ 
गरब पूरित निगदन उचारा । समर सूर एहि बचन हमारा ॥ 

मोर बान के एक ही मारा  । करिहि रथी रथ पतन तुहारा ॥ 
होतब सोए कहा मैं जोई । मोर कहे जो पूर न होई ॥ 

जुगति बाद के जो कुसलाई । मोह बिबस किए बेदु बुराई ॥ 
सयनि इहँ सो नरक मैं जागे । जो पातक मम सिरु लागे ॥ 

बहुरि सिखर सिर  अगन ज्वाला । होइ तड़ित जस बारिद माला ॥ 
बिक्रराल काल भयऊ भाथा । निकर चढ़े धनु सेखर साथा ॥ 

दीपित दीप सम दिरिसा होए  दैदीपमान । 
छाँड़ेसि अमन चहुँ दिसा, काल अगन सम बान ॥ 

बृहस्पतिवार, १५ जनवरी, २०१५                                                                                   

गरजत तर्जत घनकत घोरा । चले बेगि बहुरी रिपु ओरा ॥ 
धारा सार समरूप सायक । किए धनु गुन पारक दल नायक ॥ 

छाँड़े अस तर करष कुआँरा । धारा सारहु हंत न पारा ॥ 
निकर निकर सर निकरत कैसे । बन गोचर पथ रघुबर जैसे ॥ 

धीर जुगुत उर पैठिहि कैसे । बसत बन प्रभु बहुरि घर जैसे ॥ 
ऐ अघात उर ऐसेउ  भेंटा । कहेउ जस सुबाहु के बेटा ॥ 

दलप के मुख मूरुछा छाई । रथ पद पतत भए धरासाई ॥ 
सारथि लिए रथ पदक पौढ़ाए । रन खेह संग बहुरि बहिराए ॥ 

चहुँपुर हाहाकार किए भागए तहँ रन बीर । 
रिपुहंत जहँ घेर रहे , समर सूर के भीर ॥  

शुक्रवार, १६ जनवरी, २०१५                                                                                               

इहँ परिकर समर सूर संगा । जान सैनि मुख सकल प्रसंगा ॥ 
करे रोष पूछिहि अरिहंता । पीसत बचन दंत सँहु दंता ॥ 

रघुबर राजु स्यन्द बँधाए ।  सूर सिरोमनि दलपति हराए ॥ 
बाहु सिखर ऐतक  बर जोई । कहौ बीर ऐसे को होई ॥ 

सुबाहु सुत दल गंजन भारिहि । ते सोंह जुझत दलपत हारिहि ॥ 
सेन श्रवन कर क्रोध अपारा । दृग चढ़ बरखिहि बिपुल अँगारा ॥ 

 अजिरु रंग किए रन अगवानी । बेगि चरन पुनि सत्रुहन आनी ।। 
भयउ हीं हाय बाहि बिकिरना । केत गज कुम्भ भय बिदीरना ॥ 

देखए  दिरिस अँगारिहि जागे कनक ज्वाल । 
छितरत छन कपोलक सन कन पट लग किए लाल ॥ 

शनिवार, १७ जनवरी, २०१५                                                                                                  

पलक पँखी पत प्रहरत लोले । रामानुज  भभकत मुख बोले ॥ 
आजुधी होए कोइ ऐसोइ । जोइ भुज कुँअर दमन बल जोए ॥ 

सुनि सत्रुहन पुष्कल मह बीरा । दमन दलन तुर होहि अधीरा ॥ 
रन कर्मन उर भरे उछाहा । बिनै बचन कहि हे दलनाहा ॥ 

कहाँ लघुबर कुँअर सुकुँआरा । कहाँ दल गन्जु दास तुहारा ॥ 
गहेउ रबिकुल तिलक प्रतापा । तपन भवन ( युद्धभूमि ) कहु तिन को तापा ॥ 

जग कारन गहेउ गुन रासिहि । अस प्रभु के है कर को कासिहि ॥ 
दास अजहुँ रन अजिरु पधारिहि । रघुबर के सब काज सँवारिहि ॥ 

तुहरे बदन चिंतन जस घन गह गहे अगास । 
मम किरिआ कानन देत, बरखत होहि उजास ॥ 

रविवार, १८ जनवरी, २०१५                                                                                             

जो प्रतिपति के हार न करिहौं । चितहरनिहि हरि सुरति न धरिहौं ॥ 
प्रभु भाव भजन रसन बियोगए। मोरि पंथ सो पातक जोगए ॥ 

जो सुत बिलगित जननिहि चरना । मान तीरथ अबर कहुँ परना ॥ 
जगे जननि प्रति भाव बिरोधा । सो पातक मोहि लेहि सोधा ॥ 
जो कोई पुत्र अपनी जननी के चरण से पृथक होकर किसी अन्य तीर्थ को माता मान उसे प्रणाम करता है और जननी के साथ विरोध करता  है ऐसे पाप भी मुझे ढूंड लें ॥ 

पुष्कल मुख पन बचन अलापे । सत्रुहन मन अति हर्ष ब्यापे ।। 
रन ठानन हंट आयसु देईं । चलेउ भरत सुत अनी लेईं ॥ 

साज सहित तहँ चरण पधारे । रहे जहां कुल तिलक कुँआरे ॥ 
देखि जुझावन पुष्कल आनी । सेन जय घोष किए अगवानी ॥ 

सुभट परिकर राउ कुँअर सौमुख चरन अगोहि । 
रन उद्यत दुहु मुठ भिरत, निज निज रथ अति सोहि ॥ 

सोम/मंग ,१९,२० जनवरी, २०१५                                                                                             

बरन तुला बरनन जस तोले । धरि मुख पुष्कल किछु एक बोले । 
सुनौ दमन जब में रन आना । तुम्हारी हार हुँत पन ठाना ॥ 

भरत तनय मम पुष्कल नामा । करिहउँ पूरित तव रन कामा ॥ 
सूर सैनिहि सँभार निहारौ । बहुरत अपने कोत सँभारौ । 

दमन अधरु सजि सहज सुहासा । करए भरत सुत के उपहासा ॥ 
भूपति सुबाहु  मोहि जनावा  । बहोरि  दमन मैं नाउ पावा ॥ 

मम  कर निसदिन पितु चरन  गहे  । एहि  कारन पातक दूर रहे ॥ 
बिजई माल बिजईस अधीना । होत ताल जस जल बस मीना ॥ 

  जय तिलक चिन्ह चीन्हिहि  जिन गंजन के सीस । 
बिजय माल लंकृत करिहि तासु कंठ बिजईस ।।  


लखिहउँ अमित बिक्रम तुअ मोरे । अस निगद दमन देइ टँकोरे । 
खैंच सरासन लेइ बिताना । छाँड़ेसि अस तेजसी बाना ॥ 

चरत सररत  खगोलक ढाँके । पूछे सूर केतु कहँ झाँके ॥ 
बिगूचत बिगत बाध प्रकासा । गाहे गहन घन काल अगासा॥ 

धुति गति गत गज बाजि भेंटे । लपट लपेटत चोट चपेटे ॥ 
सकल सैन बहु दिए संतापा । केतु ब्यापत धरि हरि चापा ॥ 

जो पुष्कल  अरी बीर बिनासा । दमन बिक्रम निरखेउ सकासा ॥ 
मुख सों अगनई  मंत्र उचरे । धरि एकु परदल धनुराचित करे ॥ 

खैंच लगे लक लस्तक,लपक तमक तक ताड़ ॥ 
रिपुन्हि सिर्षोपर पलक ,गुन करषत दिए छाँड़ ॥ 

बुधवार, २१  जनवरी २०१५                                                                                                

छूटत प्रगत भयउ बिकराला । बेगि चरत प्रगासिहि ज्वाला ॥ 
सिली मुख सिखी कन उदगारे । छन रन भवन छदत छतनारे ॥ 

  बरै झरझर गिरै चहुँ पासा ॥ झुरसत सुभट गहत संत्रासा ॥ 
प्रलय अगन सम भय प्रलयंकर । किए सु बिहिन भर रूप भयंकर ॥ 

एकै बान मुख दसन प्रहारा । धावत भट पिछु हतत पचारा ॥ 
दमन बिलोकत बारात बरूथा । चहुँ कोत अधमरे भट जूथा ॥ 

आजुधी काल के कुसलाई । सुध बरुनाजुध् मूठ गहाई ॥ 
छूटत बन घन गहन गहावा । अपलाबित रस दहन बुझावा ॥ 

रहे जल जल भए जल जल पल पल पुष्कल सैन । 
गज बाजि भट गहि हिमबल करए ताल रन ऍन ।।  

बृहस्पतिवार  २२जनवरी २०१५                                                                                                   
बरखे जस घन रास एहि भाँती । प्रतिभट उरस परे बहु सांती ॥ 
पुष्कल छिन छब जब छत देखे । कबि भट हहरत पत सम लेखे ॥ 

अगन बरुन कर गयउ बिनासा । छतबत भट निपते चहुँ पासा ॥ 
क्रोध सिखी कन बरनइ लाला । लागे लोचन बरे ज्वाला ॥ 

बाइब अस्तर किए अभिमंतर । बृहद बान धर किए धनु ऊपर ॥ 
तदनन्तर मंतर के प्रेरे । बात केतु कर कोपत घेरे ॥ 

बेगि सेन घन घन छितराई । भयउ छितरित प्रपत के नाई ॥ 
पुष्कल अधर कौसुम बिकासे । एकु सुवासित बास निवासे ॥ 

देखे दमन भट बरूथ  बिगसै बात  प्रचंड । 
 नग अस्तर करत प्रस्तर, बाँधि सीध कोदंड ।।  

शुक्रवार, २३ जनवरी, २०१५                                                                                               

छूटत परबत सर करखे । रिपुदल सिरु जस परबत बरखे । 
बातज पटल पलक लिए सोधे । प्रकोपिर रूष मुख अवरोधे ॥ 

पुष्कल जब दल बल बिनु जानइ । धर धनु बजर बान संधानइ ॥ 
बजर बजर कर दिए अस धौंके । निपते परबत तिल तिल हो के ॥ 

बारे सिखर सुर गरज अघाते । कुंवर दमन उर भवनन घाते ।। 
बाध बिंध लिए भवन चपेटे । ब्याकुल दमन परि रन खेटे ।। 

देखि परे दल पति बलवाना । नीति निपुण रथ सारथि आना ॥ 
बाहु बली मुख मुरुछा छाई । अरस इ दिरिस ह्रदय अकुलाई ॥ 

धरए उपपाँखि कोस भर अजिरु सोहि दूराए । 
तासु समर बीर भय कर, बहोरि इत उत धाए ॥ 

शनिवार, २४ जनवरी, २०१५                                                                                                 

राउ धानि भट धावत आईं । सकल बार्ता कहत सुनाईं ॥ 
छतबत दमन मुख मुरुछा गहे । पत सोंह हहरत एहि बत कहे ॥ 

इहाँ कंठ जय माल गहाईं । भरत तनय चित प्रभु सुरताईं ॥ 
बिजय तिलक लक धर बिजईसा । बयस बान  के देइ असीसा ॥ 

बहुरि सूरत रघुबर कहि  बाता । लरत हतेउ न केहि अघाता ॥ 
तदनन्तर बाजिहि रनभेरी । रणांगण चहुँपुर लिए फेरी ॥ 

साधुबाद दे बिजय निनादे । बाद बृंद धर बादक बादे ॥ 
हर्ष अरिहंत असीरु दीन्हि  । भूरिहि भूरि प्रसंसा कीन्हि ॥ 

कहत सेष मुनिबर उहाँ, भर मुख धूरहि धूर । 
स्त्रबाट रुधिरू सिरु लिए जब हार आए रन सूर ॥  

शुक्रवार, ३० जनवरी, २०१५                                                                                                
देखि सुभट सौमुह  लिए आने । हतप्रभा मुख छबिरु मलियाने ॥ 
सुबाहु सांति करत भट सोका । सुत के करनी पूछ बिलोका ॥ 

 रकताकत तन बसन अधारे । देत उतरु  भट बोल निहारे ।।  
सुबरन मई बरन अवरेखे । पटरी बध हैं आनत देखे ॥ 

मान रिपु हीन तृन समतूला । बाँध रसन भए तूलमतूला ॥ 
उत रघुबर इत सुकुवर संगी । उत अनीकिनी इत चतुरंगी ॥ 

दूनौ धारि धर दुहु दुहु धारी । किएँ रन लोमन हर्षन कारी ॥ 
अस्त्रजीबी करे सर बारी ।धार धरे जस धारा सारी ॥ 

कुँवर के सर घात संग रच्छक भयउ अचेत । 
तब रिपु चहुँ पुर घेर किए लिए भट केतनकेत ॥ 

शनिवार, ३१ जनवरी, २०१५                                                                                    

भयउ धुनुरु घन बान फुहारा । बरखिहि आन बिपुल  धारा ॥ 
कासि कृपान ऐसेउ चमकिहि । जस रिसि चहुँ दिसि दामिनि दमकिहि ॥ 

तदनन्तर रन भयउ भयंकर । प्रतिसुर रूप धर प्रलयंकर ॥ 
करै कुँवरु अति करक प्रहारा । बिजइ कलस धरि बारहि बारा ॥ 

तबहि भरत सुत आगिन बाढ़े । कर्ष धनुकर बजर सर छाँड़े ॥ 
सर सर कर उर घर  भितराई । बीर दमन मुख मुरुछा छाई ॥ 

सेबक मुख सब उदंत जब जाने । निकस सुबाहु तहँ चले आने ॥ 
अस्त्र  सस्त्र गह बिबिध प्रकारा ।  रिपु रनन जहाँ पंथ जुहारा ॥  

सुबरन भूषित रथ बाहि , चरए गगन भरि छार । 
लखत आगत सुबाहु तब लिए रन साज सँभार ॥ 

रवि/सोम , ०१ फ़रवरी, २०१५                                                                                                  

रहे अनुजात सुकेतु  नावा । सुबाहु सैन संग चलि आवा ॥ 
गदा गदन मैं परम प्रबीना । एके घात हत बाधए तीना ॥ 

भूप एकु तनुभव संग आईं । लहै सकल रन कौसलताई ॥ 
तासु सुभ नाउ रहि चतरंगा । गहि कौसल रन चातुर अंगा ॥ 

एकु अबरु तनुज सन महुँ चारए । बिचित्र नाउ तिन कहत पुकारए ॥ 
रथ राजित दुहु रन रणन बढ़े । रिपु सैन दलन पद दान चढ़े ॥

दमन रन गति सुने जब काना । मन ही मन बहुतहि  दुःख माना ।। 
हिरनमई रथ राजित ए हेतु । कोपत तिन संग चढ़े सुकेतु ॥ 

रहेउ संग रन बाँकुर सैनी अनेकानेक । 
समर कला कौसल माहि  रहिहीं सबहि प्रबेक ॥ 

मंगलवार, ०३ फ़रवरी, २०१५                                                                                      

दमन बदन भट के अबरेखे । रुधिरोगत पीरा जब देखे । 
सुबाहु हरिदए बहु रोष भरे । रन हुँत रनकत रथ रसन धरे ॥ 

रनत कारु कर अजिरु जब आए । रथोपस्थित सुत मुरुछित पाए ॥ 
किए तन धार धार तलबारी । देख दस भयऊ दुःख भारी ॥ 

लख कातर धर कर परसाखी । हलरए हरिअ हराहरि पाखीं ॥ 
बहत रुधिरु तन बदन बिदारे । मृदुल परस पल  ओस फुहारे ॥ 

हलर हरिअ पट नयन निकेते । अवचेतस मन हरिअ सचेते ॥ 
हरिअ नयन पत पूर्ण खोले । दमन उठत रथ बैसत बोले ॥ 

कहँ तर कहँ तूनी कोदंडा । कहँ दलपत पुष्कल उद्दण्डा ॥ 
कहँ  सैनी कहँ सेन बिसाला । कहँ तिनके रथ गज दन्त ब्याला ॥ 

मोर अमोघ बान भेद गहै  ऐसेउ घात । 
रन भुइँ सों पीठ डिठाए गयऊ कहँ हे तात ॥ 

बुधवार, ०४ फ़रवरी, २०१५                                                                                                       

सुनत बचन भए भाव बिभौरे। सुबाहु सुत लिए काँख अँकोरे ॥ 
दरसत तात नयन भए चोरे । अवनत मस्तक दमन लजोरे ॥ 

चढ़े घात गहि गहन अघाता । भरे रकत जिमि केतु प्रभाता ॥ 
पितु प्रति उमरै घन अनुरागा । भगति पूरित सीस पग लागा ॥ 

तनुभव पुर पितु कातर लाखे । करए पवन पुनि लोचन पाँखे ॥ 
 निज कंचन रथ दए बैठाईं । बहोर धरम कर्म कुसलाई ॥ 

सेना बाहि सोंह सम्बोधे । कलिक ब्यूहक ब्यूह बोधे ।। 
कहत बाहि अस ब्यूह रचाएँ । जिन्हनि रिपुदल भेद ना पाए ॥ 

अस ब्यूहित सैन संग समर बीर बल जोहि । 
तासु आश्रय बिजय कलस अवसि हमहि कर होहि ॥ 

बृहस्पतिवार, ०५ फरवरी , २०१५                                                                                               

महराउ जैसे बोध कराए, सेनाधिप तस ब्यूह रचाए ॥ 
कंठ कला कृत किए चितरंगा । करे सुकेतु मुकुल मुख संगा ॥ 

दुहु भूप कुअँरु भए दुहु पाँखी । कटकाकृति कलिक सोहि लाखी ॥ 
रथ गज बाजि पयादिक संगे । साजिहि सैनि सहित सब अंगे ॥ 

मध्य माहि गह सैन बिसाला । पुंग भाग गहि बीर भुआला ।। 
एहि  बिधि सकलित सब जुब जूहा । दल नायक कल कलिक ब्यूहा ॥ 

रचनाकृति  कृत कटक अभेदे । महराउ सो सादर निबेदे ॥ 
चक ब्यूह बर बिचित्र बनाई । किए भरु  भूरिहि भूरि बड़ाई ॥ 

अश्रु जब मेघाडम्बरी, छतर सिरोपर सारि । 
कहत अहिपत हे मुनिबर, लगे भयंकर धारि ॥ 

शुक्रवार, ०६ फरवरी २०१५                                                                                                    

दरस तेहि बर बानि गभीरा । सुमति सोंह बोले रन बीरा ॥ 
हम सों बिहुर के पंथ भुराए । हमरे हैं  कहँ आन पैठाए ॥ 

सुमति भूपति नाउ मुख लैही । चक्राका पूरी परिचन  दैही । 
यह  नगरी जो नागर बासै । सो हरि चरन्हि पयस पियासे ॥  

हरि भगति सोहि भए अघ हीना । इहाँ सब तोषि नहि को दीना ॥
राउ सदा निज तिय अनुरागे  । अस बर रागि बर माहि माँगे ॥ 

पराए धन परदार दुआरा  । सीध दीठ धर चरन जुहारा ॥ 
एहि अवसरु सुत सह परिवारे । अहहीं उपनत समुह तिहारे ॥ 

मानस भवन  कानन निकुंजा । भग नंदु भजन अलि बन गुंजा ॥ 

करे  प्रतिपादन कतहु अन्यान्य बिषय बत कही न गहै । 
लहि लबध लहनी जोइ प्रजा जनी छ भाजन कर धन लहै ॥ 
(राम राज्य का कर पांच लाख की आय में तीस सहस्त्र मुद्रा ) 
हरि बुद्धि सहित भाऊ पूरित नृप ब्रम्हनि सदा पूजिहीं । 
 बन अलि बृंदा  हरि पदारविंदा गहै गहगह गूजिही ॥ 

सेवत धर्मंन आपनी, बिमन पराया धर्म । 
जो परम पद हेतु जोइ,करैं सोइ सब कर्म ॥ 

शनिवार, ०७ फरवरी, २०१५                                                                                                               

अमित सुभट सब समर जुझारा । कौसल महु को पाए न पारा ॥ 
गहि भुज  अतुलित बल सब कोई । तिन्हके तूल जुधिक न होई ॥ 

होत महा रन हम सों साईँ । तनुभव गति जब देइ सुनाई ॥ 
नयन अँगिरी रोष अँगार भर ।भए उपनत नृप रन एहि अवसर ॥ 

पुनि सत्रुहन सौरथ संबोधे ।कलिक ब्यूह रचना प्रबोधे ॥ 
अमित्र तपन लिए रच मुख पाँखे । सुबाहु पंखि पुंग महि राखे ॥ 

कहु अस रन बांकुर को होहीं । जो ब्यूह भंजन बल जोहीं ॥ 
कहहु बेगि अहहीं  को बीरा । कहत सत्रुहन भयऊ गभीरा ॥ 

तब समर बीर लखी निधि,सब रन साज सँजूह । 
पान उठाए सोंह लहै,भंजन कलिक ब्यूह ॥  

वीरवार, ०८ फरवरी, २०१५                                                                                                        

रघुबर बंधु लषन के नाईं । पुष्कल तिनके बने सहाई ॥ 
बहोरि सत्रुहन जब आयसु दए । रिपुताप रतन नील उग्रासय ॥ 

बीरमर्दन सुभट किए संगे । गवने लख्मी  निधिहि प्रसंगे ॥ 
सौं मुख भाग सुकेतु सँभारे । लख्मी निधि एहि बचन उचारे ॥ 

जनक पूरी पति पिता हमारे । लख्मी निधि मो कहत पुकारे ॥ 
जोई सकल दानउ कुल नासे । छाँड़उ तासु बाजि निज पासे ॥ 

न तरु मोरे घात उर खाइहु । जमपुरी केर दुअरी जाइहु ॥ 
बीर केसर कही कर काना । सेकेतु धनु धर बेगि बिताना ॥ 

लखत लख्मी निधि गह गुन,खैंच करन लग सारि । 
बान बून्द जल धार किए, करेउ बृष्टि अपारि ।।  

सोमवार, ०९ फरवरी , २०१५                                                                                      

सुकेतु सरन सर बारि निरखे । कुटिल भृकुटि लोचन कर तिरखे । 
ताजे लखी निधि बिसिख कराला । लहलहात जिमि चले ब्याला ।। 

तेजस गह सिरु उरत  अस धाए । जिमि सूर सान समन सुधराए ॥ 
बिकल होहि सब उद्यम ताके । सुकेतु सर सर काट नहाके ॥ 

चरत सररत छ सर के पाँती । लगि सुकेतु के छेदत छाँती । 
करै  घात जब तसु प्रहारा । कोपित बीसि बान दए मारा ।। 

बहुरि कटु सार मुख धार धरे । लखमी निधि गन गुन संग करे ॥ 
चारि  सायक बाजि बल थाका । एकु रथ भांजत काटि पताका ॥ 

एकु रथ जोजक अपने मस्तक घात खात महि परयो । 
एकु रसन सहित सुकेतु गहित सरासन खन खन करयो ॥ 
एकु कोपि भरे उर भवन तरे बेगि भीति छत हतयो । 
अस रन कौसल निरख भट सकल लखि निधि चितबत चितयो ॥ 

रथ हो कि सूत बाहि हो जो रन साज सँजोहिँ । 
बिगरै जान सुकेतु गहि कर माहि गदा अगोहिँ ॥ 

मंगलवार, १० फरवरी, २०१५                                                                                                  

गदा गदन महुँ अति कुसलाई । आत निकट रिपु देइ दिखाई ॥ 
रहि तीख सार घन सम भारी । रथी लखी निधि बिरथ निहारी ॥ 

दुनउ रनी दुहु कुसल अपारा । मार एकु एकहि करें प्रहारा ॥ 
औचक लखि निधि गदा उठायो । कोप सिंधु उर भरी ल्यायौ ॥ 

चाह करे उर चोट चपेटे । बेगि चरत सुकेतु झपेटे ॥ 
लेइ लूटि अपने कर धारे । फिरै लखि निधि उर दे मारे ॥ 

देख गदा गयऊ रिपु साथा । कूदि लखी निधि रीतै हाथा ॥ 
बरनै कबित बरन बिनु गाथा । लरए बीर कर बिनु धनु भाथा ॥ 

बहोरि दुनहु दल गंजन, लरत पचारि पचारि । 
गुथे कर माहि कर गहे, चरण चरण महुँ घारि ॥ 

बुधवार, ११ फरवरी,२०१५                                                                                                           

जोग जुझाए छाँति सों छाँती । उठइँ झपटिहि बेगि एहि भाँती ॥ 
हतं एकु एकहि दोनउ चाहैं । दुहु केहि बिधि  हते न हताहैं ॥ 

लरत लरत जब भए सिथिराईं । क्राँत होत  मुख मुरुछा छाई ॥ 
कर भाल धरे रन भूमि परे ।गगन धरा धूर धूसर करै ॥ 

मल्ल क्रिडा जस कौसल जोई । देखि जो कोइ हतप्रभ होईं ॥ 
दल बल पुरुध देखनिहारै । धन्य धन्य सब कहत पुकारे ॥ 

सुबाहु हो कि लखी निधि होहीं । सोत बचन मैं दोनउ सोंही ॥ 
करत गंजन के जसोगाना । निज निज दल के करैं बखाना ॥ 

कहत अहिपत हे मुनिबर, पुनि चित्रांगि कुमार । 
क्लिक कंठ राजित रहत,सरथ किरन कर धार ॥ 

बृहस्पतिवार, १२ फरवरी, २०१५                                                                                                   

नेक बीर जस घेर घिराईं । तासु सुहा मुख बरनि न जाई ॥ 
बिष्नु भगवान बारहबतारा । प्रबासिहि जोह जलधि जल धारा ॥ 

भई धारि तस धार के पाँति । चत्रंगी प्रबिसि भगवन के भाँति ॥ 
करम कारमुक करक कठोरा ।मेघ गरज सरि करत टँकोरा ॥ 

करश प्रत्यंचा कटि कर करे । कारन पर गयउ कूरपरे ॥ 
मारि बान  मुख बेगि झपट्टा  । चिक्करहि महि परिहि बहु भट्टा ॥ 

तेज बान बहु तीख प्रहारए । कोटि कोटि भट बाधित कारए ॥ 
भयौ गगन जस घन घन घोरा ।भए  भुइँ तस रन घनघोरा ॥ 

मचे चिकार कठोर जिमि गरजि घटा नभ फोर । 
तब पुषका एकु छोर, पहोमी पद अर्पन किए ॥ 

शुक्रवार,१३ फरवरी, २०१५                                                                                          

लरत भिरए पूण दोउ कुमारे । दोनो जुझत लगे मनिहारे ॥ 
पुष्कल सुठि भरम बान चढ़ाए । चित्रांग सुरथ गगन घुरमाए ॥ 

भयउ एकु तब बात अद्भुता । चक्करत रथ निज बाहि सँजुता ॥ 
भरमखग भवन एक छन होरे । बिसूरित मन पुनि चरन बहोरे ॥ 

तेहि अवसरु  चित्रांग बोले । पुष्कल तुअजस रथ उत्तोले ॥ 
जैसेउ अमित बिक्रम दरसाए । अस तो कहुँ कतहुँ देइ दिखाए ॥ 

घुरमिहि अगास जस रथ बाइहि । अस कर्मन रनि बहुंत सराइहि ॥ 
दरसिहु अजहँबल बिक्रम मोरे । दरसत तीन रनि तिनका तोरें ॥ 

तदनन्तर चित्रांग कर गहै भयंकर बान । 
जोग सरासन सिर संग जोगित कर गुन  कान ॥ 

शनिवार, १४ फरवरी,२०१५                                                                                             
बाँधे किरन बान निज पासा । पुष्कल रथ लिए फिरै अगासा ॥ 
बाहिनी बाहि सारथि सागै । बिहग के भाँति चिकरन लागै ॥ 

देखि तनुज के रन चित्रकारी । सुबाहु मन भए अचरजु भारी ॥ 
जो पुष्कल दमनए बहु बीरा । केहि  भाँति भयऊ भू थीरा ॥ 

रहि चित्रांग सयंदनारोहि । रहेउ संगी सूत कर जोहि ।। 
बरे रन बीथि जुते सत बाहि ।  जासु अंग अंग सुबरन दाहि ॥ 

चाप तान एकु बान प्रचंडा । भयउ सयंदन जब खन खंडा ॥ 
जब रिपु पद दूज  रथ लिए बोहि । पुष्कल सायक नासेउ सोहि ॥ 

एहि बिधि रन भुइ रनत रिपु,बरेउ  दस रथ षंड । 
पुष्कल के तीख बान मुख, गन किए दस दस खंड ॥  

रविवार, १५ फरवरी, २०१५                                                                                            

 आए चित्रांग रन बहु रंगे ।  एकु अति  बिचित्र स्यंदन संगे ॥ 
लोहित मुख लोचन भरि रोषा । पंच भल्लक करे कर कोषा ॥ 

मह तेजसी भरत के लाला । लखत करे लख तिलकित भाला ॥ 
सकल भाल मुठ एक करताला । रहैं जासु मुख दंस कराला ॥ 

चलत चपल किए प्रखर प्रहारा । ले पल पुष्कल चोटिल कारा ॥ 
भयऊ चोट बिकट चिनगारी । लगे नयन पट बरे अँगारी ॥ 

भास् पास गह भभक पचारी  । भर भभरी भयऊ भयकारी ॥ 
पुष्कल अनल बान संधाने । ठान हतन रिपु उर पर ताने ॥ 

रोष अँगारी  जौह, तपन दीधिति  नयन करे । 
किरन किवारी सोंह, बदन तपत कंचन करे ॥