Monday, 16 March 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड २९ ॥ -----

सोमवार  १६ मार्च, २०१५                                                                                                  

जसु संग हमरे जग जागिहि । भए अस बंसज भा बड़ भागिहि ॥ 
करात पितु जान कहत पुकारे ।लेइ जनम कुलतारन हारे ॥ 

भयऊ एकु इतिहास पुराने । एही बिश्यन महँ कहहि सयाने ॥ 
 उदाहरित एही प्रमुख प्रसंगे । भए जो मिथिला पति के संगे ॥ 

एक बार के भयऊ ए बाता । जनक जोग सोन तज निज गाता ॥ 
तेहि अवसरु मुख सोहि आना ।कंकनिक कलित एकु बेमाना ॥ 

तुरतै तेजस देहि सँजोही । धरमधुरज बैमान बरोही ॥ 
सबक मन बहु बिसमय भयऊ । तजइत तन उठाउ लए गयऊ ॥ 

गमनत मिथिलापति पंथ , संजमनि पुरी आए । 
कोटिक कलुख चेतस तहँ,नारक भोगत पाए ॥

मंगलवार ,१७ मार्च, २०१५                                                                                               

जनक देहि पौ परस पवाई ।बिक्ल नारक बहुंत सुख पाईं ॥ 
धर्म धुरज चलेउ जब आगे ।भय बस सबहि चिक्करन लागे ॥ 

नारक मोचन चाह सँजोई । जनक बिछोहु चहहि न कोई ॥ 
द्रवित कंठ करि करून पुकारे । कहाँ चले हे नाथ हमारे ॥ 

 परस बिस्तारि तुहरे देही । हमहि सो बाहि बहुँत सनेही ॥ 
सुनत नारकिहि जीउ पुकारी । करुनाकर नृप मन भए भारी ॥ 

उर उदधि उद उदक उदकायो । लोचन पटल  घनहि घन छायो ॥ 
चेत मनस बहु सोच बिचारै । मोर बसाहि ए जीउ सुखारे ॥ 

अजहुँ सों एहि जम नगरी, होहिहि मोर निबास । 
जहँ को सुख साँस लहि सो  मम हुत सुरग सकास ॥ 

बुधवार, १८ मार्च, २०१५                                                                                         

बहुरि मिथिला नगर के केतु । दुखित नरक जीउ के सुख हेतु ॥ 
दया भाउ हरिदै परिपूरे । होरिहि जम दुआरि के धूरे ॥ 

तेहि समउ सो दुखद दुआरे । जमराष्ट्र के पुरुख पधारे ॥ 
सत कृत करता पुरुख बिसेखे । मिथिलापति निज सौमुख देखे ॥

ठाढ़ि जनक चढ़ उडन खटोले।  परे बिहँस अस करकस बोले ॥ 
सिरोमनि हे धरम धुरीन के । भए दयाकर दारिद दीन के ॥ 

कहौ इहाँ तुअ कैसेउ आए । एहि अरगल तुम्हरे जुग नाए ॥ 
हतत हनत के पाप अपारा । अहइँ तेहि हुँत नरक दुआरा ॥ 

सुरग दुआरि जुहारि किए धर्मी तुहरे सोहि । 
इहँ के अगन्तु सोए जो, जीव जगत के द्रोही ॥ 

बृहस्पतिवार,१९ मार्च, २०१५                                                                                     

साधु समाजु न जाकर लेखा । धर्म पुरुख जासु न रेखा ॥ 
जो हत चेतस भए हिंसालू । एहि सदन तेहिं हुँत भुआलू ।। 

कर्पूरंक कलंक लगावहि ।पर्धन लूट खसोटत खावहि ॥ 
पति कुल बती पद रति बत सती । देँ गह निकार निबेरत गती ॥ 

भोग के बस्तु जिन हुँत नारी  । आए इहाँ सो पापाचारी ॥ 
अति आचरन करिहि जो पामर । आए चरत  पापाधम एहि घर ॥ 

कालस धन के लालस पासा । पापमित मित देइ जो झाँसा ॥ 
उदर परायन देइ न दाने ।अस पापधि परेउ इहँ आने ॥ 

मोरे दंड पाँस कंठनि कर ।पाइहि पामर पीर भयंकर ॥ 
बितथाभिनिबेसि मूढ़ि मानस ।दम्भि बिद्वेष उपहास बिबस ॥ 

मनसा बाचा कर्मना, सुमरै नहि श्री राम । 
काया सोन मद मोहना माया केर प्रनाम ॥

शुक्र/शनि ,२०/२१ मार्च,२०१५                                                                                                 

तेहि पापक बाँध ले आवा । बहोरि मैं भलि भाँति पकावां ॥ 
जेहि  नारकी पीर निबेरे । सुमिर उर नाउ रमा पति केरे ॥ 

धर्म प्रयाण सोए सुखारे ।पार गावं मम सदन दुआरे ॥ 
द्युति गति गम बैकुंठ जावैं । सत कृत संग परम पद  पावैं ॥ 

एहि मनुज  देहि बहु  पाप भरे ।एक राम नाउ पौ पबित करे ॥ 
जो रसरी नहीं जपनी हरे । सो पापधी इहाँ आन परे ॥ 

 दूतक पापक लेइ अनाई । तुअ सम दीठ न देइ दिखाईं ॥ 
ऐतद नृप गवनउ इहँ संगे । सब बिधि सुखप्रद भुअन प्रसंगे ॥ 

रह सबहिसुख भोग उपजोगिहु । मरनि लोक के सत्कृत भोगिहु ॥ 
 जनक पालक कन कंचन लोले । अरु अबरुधित कंठ सों बोले ॥ 

दुःखार्त जीव पुकारत, उमरे दया अतीव । 
अस कह कन कंचन झरे, तज लोचन राजीउ ॥ 

रविवार,२२ मार्च २०१५                                                                                             

कहए जनक सत कहि सब तोरे ।सुनौ नाथ एक गदनहु मोरे ॥ 
दरस नारकी दुःख जीमूता । होत मम हरिदै द्रवीभूता ॥ 

मम तन पौ तीन बहुंत सनेही । इहाँ बसन के कारन ऐही ॥ 
आरत जीउ जब मुकुति दइहौ । मोहि सुरग पयानत पइहौ ॥ 

धर्मराजु अस कृत कल्याना । होहि सुखद तव दास पयना ।। 
पलक होर बोले जम राजू । एहि जो तुहरे सोहि बिराजू ॥ 

आपन हित करता हितु संगे ।किए ए पामर बलात प्रसंगे ॥ 
रहेउ जिन सहुँ परम प्रतीती । हित संगत जस हितु की प्रीती ॥ 

लोहू संका नरक लवैया ।बरस सहस दस देत कढ़ैया ॥ 
सूकर जोनि  दे तदनन्तर । करिहउँ नपुंसक दए जोनि नर ॥ 

अबरु ए पामर.....पापधी, पर तिअ नेकहि बार । 
कूट कुटिल कुदीठ करत, भरे अंक बरिआर ॥

 तापित तोए एहि तिराइहि ,कंठनि पासक कास । 
अपनी करनी भुगत किए प्रतिछन मोचन आस ॥ 



सोमवार, २३ मार्च,२०१५                                                                                                    

अरु दरसिहि सहुँ जो कर जोरे । कुबुद्धिन कुकरम किए न थोरे ॥ 
पर धन सम्पद दीठ धरावै । सेंध लगावै लेइ चुरावे ॥ 

ऊँचे पद न लहै ऊँचाई । नीची करनी नीच कहाई । 
अबरु भाग जो आपहि भोगए । पूअ सोनित नरक तिन जोगए ।। 

बसे पापि तहँ अस उद बासे ।पिसि पाचक बसि पूअ सकासे ॥ 
अरु एही खल किए अस खोटाई । तेहि  करनि मुख बरनि न जाई ॥ 

आए घर जो अतिथि सम देवा । एही पोचक पति करे न सेबा ॥ 
अस कारन एही प्राण बिजोगे । भयउ तामिस नरक के जोगे ॥ 

भाड़ भीत भर भँवर भयंकर ।स्तक बरख दुःख सहिहि ए पामर ॥ 

ए सठ मुख पराए जनन्हि, निन्दत नहीं लजाए । 
जो को निन्दित बचन कहै, श्रवनए कान लगाए ॥ 



मंगल/ बुध ,२४/२५  मार्च,२०१५                                                                                                                                                                                   

एहि दुहु सठ बंगिहि हे भूपा । दुःख लहत परेउ अंध कूपा ॥ 
दरसिहि जो उद्बेग बिसेखे । हिती हंतत जान बिदबेखे ॥ 

धरे अबरु बिध्बंस के मंसा । करे आपहि गेह बिध्बंसा ॥ 
मरतहि रौरव  नरक अनाई । भाभरी भरे भाड़ भुँजाई ॥ 

एहि सब सठ किए पाप अपारा ।  भोगत छुटिहहि नरक दुआरा ॥ 
कृति सत्कृत तुअ धरम सँजोइहु ।  एहि हुँत इहँ के जोग न होइहु ॥ 

अजहूँ मोर कही सत मानौ । नरनागर बर लोक पयानो ॥ 
मिथिलापति पुनि पूछ बुझाईं । नाथ कहौ अस कोउ उपाई ॥ 

दुखी जीव अस सोहि हमारे । होइहि कास तिनके उद्धारे ॥ 
जनक बचन सुन जम पत कहहीं ।एहि पापक हरि चरन न गहहीं ।। 

तापर निज करमन कोष अस अस पाप सँजोहि । 
कहौ आपही मोहि एहि नरक मुकुत कस होंहि ॥  

सिद्ध सयान जनक जुग पानी । पूछे जम पति सोहि सुबानीँ ॥  
करौं जहँ कस कवन अनुठाने ।  तरपत जिउ मोचन सुख दाने ॥ 

पुनि जम ऐसेउ जुगति कहेउ । नाहु जो तुअ मोचनहि चहेउ ॥ 

निज कृतफल तिन्ह दे दीज्यौ । कवन सत्कृत सो सुनि लीज्यो ॥ 

एक समय जब भयऊ प्रभाता । बिभउ छयत निज ढरकिहि राता ॥ 
उठेउ  तुअ सो नाउ ध्याना । जो जग महत्तम पाप नसाना ॥ 

मुख जो रामहि राम उचराएँ ।  एहि पापधी ओहि पुन  धराएँ ॥ 
जमनाहर जस अस  कह पारे । बहुरि जनक तीन देइ उदारे ॥ 

 जीवन भर जो धरम सँजोईं ।  देत जनक कछु सोच न होईं ।। 
कहत जाबालि बहुरि भुआला । दुखित जीउ छुटिहहि तत्काला ॥ 

दिब्य देह धारन करे,बोले हे महराए । 
भाई कृपा बहु आपनी,दुःख सों  हमहि छढ़ाए ॥ 

प्रत्येक रसोई एक नरक  है और प्रत्येक घर एक स्वर्ग है..... 

बृहस्पतिवार २६ मार्च २०१५                                                                                            

पाए परम पद नाथ कृपालू । तुहरे हरिदै बहुंत दयालू ॥ 

छूटे प्रानि  नरक  के पासे  । गहै रूप जस सूर बिभासे ॥ 

दरस तेहि निज नयन झरोखे । जनक मनहि मन संतोखे ।। 

 हृदय हरि कर मुख हरि नामा ।चले सकल बैकुंठ धामा ॥ 

दुखित जीव के होत बिदाई । जनक बहुरि जम पूछ बुझाई ॥  
पाप करम कर कोष लहेऊ । आए नरक यह तुअहि कहेऊ ॥ 

रहे रत धरम बारता माहि । सो नर नरक पुर आवहि नाहि ॥ 
केहि तापा केहि संतापा । आन भयऊँ कृत केहि पापा ॥ 

तुम् जम तुम धर्मिनु पुरुख  दौ मोहि ए ग्यानु । 
करे करम कारन सहित बिहान संग बखानु ॥ 

शुक्रवार,२७ मार्च,२०१५                                                                                               

 मैं निर्बुद्धि मोहि बताऊ । अप कृत कारन कह समुझाऊ ॥ 
धर्म राज अस बचन उचारीं । राजन तव सब कृत सत सारी ॥ 

तुम् रघुबर के परम सनेही । तुहरे सम कृत करे न केही ॥ 
तुम भँवरे प्रभु पद अरविंदा ।तुम रसिक प्रभु रूप मकरंदा ॥ 

चहरे जस जिमि पावन गंगा । पापन्हि पाप मलिनी रंगा ॥ 
गंग बिंदु जिन रसन रसावै ।सकल मलिन मल पल पबितावै ॥ 

तव जस गायन जस रस धारा ।जो अवगाहि सो पाएं पारा ॥ 
तथापि एकलघु अघ गोसाईं । संजमनी पुर लेइ अनाईं ॥ 

एक समऊ तुम्ह बिचरत भरेउ रूप अबुद्ध  । 
चरती चातुरि अस्तनी चरन करे अवरुद्ध ॥ 

शनिवार२८मार्च २०१५                                                                                         

ऐसेउ दोष किए जो कोई । नरक दुअरिआ दरसित होई ॥  
अपने कृतफल  देइ उदारे ।एहि कर दूरए  दोष तिहारे ॥ 

लहेउ कृतफल बिबिध प्रकारा । कर्म कोष भर धर्म अपारा ॥ 
 अजहुँ एहि हेतु सुरग दुआरे । नाहु तिहारे पंथ निहारे ॥ 

हम अजान प्रभु अंतरजामी । धर्म पूँज के जान  स्वामी ॥ 
दुखी जीउ दुःख हरन गोसाईं । संजमनी पुर तोहि पठाईं ॥ 

पर नरक जो दीन दुखारे ।गहि सुख सम्पद आन तिहारे ॥ 
होउब ना  तुम अतिथि हमारे । होइब कैसे दुखी सुखारे ॥ 

अबरु  दुःख सँग  होत दुखी साधू तुहरे सोहि । 
दुखारत दीठै जहँ कहँ,निबरन तत्पर होहि ॥ 

रविवार, २९ मार्च २०१५                                                                                                   

चले सुर धाम जनक बहोरी ।  आयसु मागि दोइ कर जोरी ॥ 
कहत जाबालि हे नर नाहू । धेनु पूजन फले सब काहू ॥ 

जो की गउ के पूजन कीन्हि ।  जो मन चाहए सो सब दीन्हि ॥ 
तुमहु पयद पावनी पूजिहौ  । धरम परायन जात जनीहौ ॥ 

जब गउ सेवा टहल सकारे ।  सकल कामना पूर्ण कारे ॥  
 एक आसा के किरन बिकासी । ऋतम्भर मन भए जिग्यासी । 

जाबालि कहि सो बचन अनुहर । कांति मुख सों पूछे सादर ॥ 
धेनिहि बंदन बिधि को होई । नेमाचरन करे कस कोई ॥

मंद मुख जब कांति छाई । जाबालि मनहि मन बिहसाईं ॥ 
गौ सेवा के सकल बिधाने । बाँध फेर एहि भाँति बखाने ॥ 

नृप ब्रत धारिहि सेवा चारिहि चरवावन गउ सन गवने । 
जो जवन पवाईं सकृत महुँ आईं सकलत कर लेइ चुने ॥ 
जब बहुरावै जो चुग खावै,सेवा बिधि जस गयउ कहे । 
गउ तिसनावै जब जल पावै तबहि आपहु जल गहै ॥ 

मातु ऊँच अस्थान रहैं आप रहें नीचाए । 
निसदिन तन को डाँसते मत्सर दे निबराएं ॥ 

सोमवार, ३० मार्च, २०१५                                                                                             

गउ हुँत हरिदा आपहि आनएँ । करत नेह अपने कर दानएँ ॥ 
सेवा सुश्रुता किए अस कोई । भावें जोए माँगत मिले सोई ॥ 

सुनत जाबालि मुनि के बचना ।  ऋतम्भर चित सुरति श्री रमना ॥ 
सुचितचेतस बंदन ब्रत गहै।सुरभि सेवन्हि संकलप लहै ॥ 

सुबुधि कहे सब बिधि अनुहारै । भयउ पावनी के रखबारे ॥ 
नित प्रति दिवस चरावनु जाईं । पूजत करें नित सेवकाई ॥ 

भई मुदित जब सेवा सोंही । मानस के जस गिरा सँजोही ॥ 
हर्ष मधुरिम बोलि हे राया ।जस तुहरे उर के अभिप्राया ॥ 

जो तुहरे चितबन भाए मांगो अस बर कोइ ।  
कृपामृत सानि बानि जस मृतक जिआवनि होइ ॥ 

मंगलवार, ३१ मार्च, २०१५                                                                                               

मृदुल बरन बर बोले नाहा ।देई ऐसो सुत मैं चाहा ॥ 
पितु कुल सेबक हो बहु नीके । होए बछर जो रघुबर जी के ॥ 

सील बिरध अरु धरम परायन । अस कह राजन  उरगाए बदन ॥ 
नृप मन भावन माँग बताईं । दयामई  माँगे सो दाईं ॥ 

भाई तहँ सो अंतर्धयानए । जने राउ पुत  अबसर आनए ॥ 
चहे सोई लक्छन गहेऊ । सत्यवान सुभ नाउ धरेऊ ॥ 

दिन दिन दिवस बरस बन बीते । भगवन्मय सुत पितु मन जीते ॥ 
अमित पराक्रमि तासू सरिसा ।हेरत मिलेउब नहि चहुँ दिसा । । 

भगवनमय पुत पितु भगत,धर्म परायन जानि । 
ऐसे जनित जनाए के भूपति मन हरषानि ॥ 












  



  





































  















Tuesday, 3 March 2015

----- ॥ टिप्पणी ३ ॥ -----

>>   कृषि उत्पाद ही वास्तविक उत्पाद है यह कौशल से उत्पन्न किए जाते है अत: कृषि कर्म एक उद्यम है । वनोपज भी उत्पाद की श्रेणी में आते हैं चूँकि यह प्राकृतिक उत्पाद है अत: इसे उद्यम से प्राप्त उत्पाद नहीं कहा जा सकता.....

अन्य उत्पाद चूँकि संचित सम्पदा का सन्दोहन मात्र हैं अत: ऐसे सन्दोहन वास्तविक उत्पाद की श्रेणी में नहीं आते.....

>> जिस गुप्त रीति से संसद में जनहित के विरुद्ध नियम रचे जा रहे हैं उसी गुप्त रीति से कभी संविधान रचा गया था इस हेतु कि भारत का अस्तीत्व ही समाप्त हो जाए और यहाँ उपनिवेशी आ आकर बसें.....

>> हमारे एक संबंधी  के यहां लडके का ब्याह था, जीतना दान- दहेज आया उतना तो प्रीति भोज में लग गया जी !....


>> संसद  कृप्या कर अपने पी.एम. को बोलना सिखाए अन्यथा जनता ने उसे जो डिराइभरी सिखाई है  .....सब भुला देगी.....

>> दानवों को देवताओं का रमण नहीं सुहाता.....

>> यदि भारत शासन को राष्ट द्रोही षड़यंत्र का ज्ञान न हो और केंद्र तथा सीमावर्ती राज्य के सत्ताधारी एक ही हो इससे स्पष्ट होता है कि यहाँ पाकिस्तान का शासन है भारत का नहीं.....

षड़यंत्र = अनिष्ट साधन के उपाय

>> यदि किसी राष्ट्र के शासन को राष्ट द्रोही षड़यंत्र का ज्ञान न हो और केंद्र तथा सीमावर्ती राज्य के सत्ताधारी एक ही हो तो इसका अर्थ यह है कि वहां सीमावर्ती देशों का शासन है.....

षड़यंत्र = अनिष्ट साधन के उपाय


>>  हम सभी धर्मों का सम्मान करते है, और हमारी कोई सीमा-बीमा न पहले थी न अब हैं जो चाहे वो घूस गया और घूस रहा है इसका परिणाम यह हुवा कि अब एक पाकिस्तान हमारे देश के बाहर है एक अंदर दोनों के द्वारा ही सीमाओं का अतिक्रमण हो रहा है.....

>> भारत के संविधान को खाँ-ग्रेसियों का संविधान यूं ही नहीं कहते इसके अनुसार कोई भी कैसा भी कहीं का भी बिदेसी यहाँ के नेताओं को फसा के उनको ब्याह के कुछ भी बन सकता है.....

>> आय-व्यय विवरणिका के सह यह भी विवरण आवश्यक है कि आप कितना व् क्या क्या उपभोग करते हैं.....
हामरे पारा में भी नौ दस करोड़ वाले हैं वो अबतक हवाईजहाज नहीं देखे हैं.....
जिसके जैसे कर्म उसकी वैसी जाति

>> पहोमि पारे पायसा,राजा के मन भाए ।
भूरि भूरि बधाई किए, जन हित हेतु बताए ॥


भावार्थ : --पड़ोसी देश पाक ने भारत की भूमि पर अपना अधिकार स्थापित किया और सत्ताधारियों ने इस कृत्य की  भूरि भूरि  प्रशंसा की ।  अब ये इस अधिकरण्य को विधि के रूप में अंगीकृत कर इसे देश के हित में बताते फिर रहे हैं ॥

>> कश्मीर में निवासरत बहुँसँख्यक वर्ग को ये अल्पसंख्यक  कहते हैं यदि ८०% जनमत संग्रह पाक के पक्ष में हो जाए तो क्या हम कश्मीर पाक को दे देंगे.....?

यदि चयनित प्रतिनिधि बलपूर्वक अथवा जनमत संग्रह से किसी क्षेत्र की भूमि अधिग्रहित कर उस अधिकरण को भूमि स्वामी के हित में कहें तो  उक्त क्षेत्र में प्रवेश करने पर ऐसे प्रतिनिधि के प्रति  उसी प्रकार व्यवहार करना चाहिए जिस प्रकार किसी देश के सीमांत देश द्वारा उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करने पर किया जाता है.….

>> कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, और पाक कांग्रेस के पेट से पैदा हुवा है.., हम इन सत्ताधारियों को पाकीसैतानी यूं ही नहीं कहते.....

>>  इण्डिया में हिन्दुओं का वर्ण कांग्रेस निर्धारित करती है, भारत में कर्म.....




राजू : -- हाँ ! ये ख़ाँ ग्रेस यदि कह दे ये नीच है.....तो है !! ये अल्पसंख्यक है.....तो है
             पाकिस्तानी तपस्वी है..... तो हैं भारतीय महमूद गजनी हैं..... तो हैं.....
             विभाजन के बखत चारखाँ थी ये, पंजख़ाँ तो बाद में हुई है, दिल्ली ने इसे छंगेज ख़ाँ बना दिया
 
>> और हमें किसी की भी अधीनता स्वीकार नहीं है.....
>> " पराधीनता सपनों में भी सुख नहीं देती"
         ----- || गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
          पराई पराधीनता की अपेक्षा अपनों की किंचित ही बुरी  होती है
          " अपनों की पराधीनता से परायी स्वाधीनता अच्छी होती है"
             विभीषण इसका उदाहरण है.....
>> भारतीय जनता पार्टी नहीं पाकिस्तानी जनता 'पार्टी' अर्थात पीजेपी है ये..,
      मस्जिद तोड़ते हुवे मिली थी, मंदिर तोड़ते हुवे खोई जाएगी.....

>> विद्यमान भारत में अभी भी आधा मुसलमानों का राज है  काश्मीर जैसी स्थिति इसे पूरा कर देगी फिर तो इसे अंग्रेजों के हाथों जाने में देर नहीं लगेगी.....

>> अच्छाइयों को बुराइयों के अधीन न होना.....

>>  उद्योग पतियों को बजट बनाने के लिए कितने में ठेका दिया था.....?

>>  यह धनिमन् रेखा ऐसी ही है कोई कोई तो इसके इतना ऊपर चला गया कि माँ -बाप को भी टी बी में ही दीखता है ॥

>> महात्मा पूंजीपतियों के भव्य भवनों में नहीं मिला करते, जो मिला करते हैं वो महात्मा नहीं होते.....
       ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
>> भारतीय लौहिक यातायात का सबसे लंबा आवक-जावक केंद्र खड़गपुर है.....
>> भारतीय लौहिक यातायात एक दुधारू गाय है कुशासकों ने इसे बीमारू बना रखा है.....
     मेरे पास यदि ग्राहक अधिक है तो मैं धंधा बढ़ाऊं  गा यदि ग्राहक अपेक्षाकृत न्यून हैं तो शो बाजी.....
>> अच्छा  होगा कि पार्टियां समय रहते अपने इन फटों को सील लें और हम फटे संविधान को,
      Because "A Stitch In Time Saves Nine, N The 'A Nine Stitch In Time Saves Ninty Nine.....'

>> बाई-फाई जैसे लक्जरी आइटम फ्री में चाहिए इस दिल्ली को.….
>> मन भर की शक़्ल- तोला भर की अक़्ल.....
>>  ऐ दिल्ली ! ये यमुना है.....नदी है.....शौचालय नहीं है.....

>>>> और ये दस लखिया सूत वाले महाराज कहते हैं निर्बल की समापती हड़पने के लिए ७० % अड़ोसी-पड़ोसी से भी पूछने की आवश्यकता नहीं है .....उठा लो बीप को !!!

एक बात तो बताइये : -- लकवा मारने पर (पक्ष का आघात )  कोई खटिया पकड़ता है कि खटिया पकड़ लिए इस लिए लकवा मारता है..... ?>> इस्कूल-अस्पताल को खेतों में देखा है क्या.....?
     इस्कूल-अस्पताल चाहिए कि मालो-सिनेमा हाल.....?

>> काला बाजारू की कलाबाजारी करके हड़पो अथवा  बिना कलाबाजारी करके हड़पो
बोले तो धरती को तो हड़पना ही है.....नई.....
>> स्वतंत्रता का संग्राम इस हेतु छेड़ा गया था कि भारत में शासन तो अंग्रेजी ही हो,  अंग्रेज 'हम' हों
अभी भी अंग्रेज तो 'हम' ही हैं शेष सभी इस 'हम' के अनुयायी हैं ॥

>> कली कुँआरी के मन भाया, आया ऐसे झूम के फाग ।
         धीरे धीरे यौवन के सब, सुरंगी रंग रहे हैं जाग ॥

>> इस पी एम ने तो नरसिम्हा राव का कीर्तिमान तोड़ दिया ये दस लाख में ही बिक गया..,
वो एक करोड़ में बिका था.....किसी हर्षद मेहता ने ख़रीदा था.....

>> मनुष्य की औसत आयु उसकी संख्या पर निर्भर करती है.....
     इस्लाम, धर्म है कि जाति है.....?
    यदि यह धर्म है तो इसको जाति मानने वालों का धर्म क्या है.....?

>> राजू : -- बिना लत्ते का भारत, रत्नों का क्या करेगा..... ? सुना ही इण्डिया को साइन फिलु हो गया है.....

 >> "ऐसे-वैसे कपडे में, कुछ न कुछ तो होगा ही....." 

 >>  ये बहुमूल्य उपहार इसी भाँति से तो बनते हैं..... 

>> पुराने कर दाताओं को यह बुद्धि थी कि वो स्वेच्छाचारी शासन में टैक्स दाय  न कर उसे धर्मादा में लगाते थे, अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करते थे..... गुंडा-पार्टी का राज है अप्रत्यक्ष तो देना पड़ेगा किन्तु प्रत्यक्ष कर धर्मादा में लगे ऐसा प्रयास करें.....

बिका यो टैक्स की बिटिया की बिदाई की बेदना तो जाणण आला ही जाणों ह.....: ( 

जिका  बिटिया कोणी वो के जा ण.....


----- ॥ यतो धर्मस्ततो जय: ॥ -----

>>  यह देश की सेना का सूत्र वाक्य होना चाहिए..... दंड व्यवस्था सत्य की रक्षा के लिए होती हैं.....जय-विजय के लिए नहीं.....

 सेना के ऊपर एक वर्ष में २'२०'०००० लाख करोड़ रूपए व्यय करने वाले भारत-शासन की सत्ताधारी पार्टियां अमेरिका के राष्ट्रपति से कहती हैं..... भैया भैया हमारे देशद्रोहियों को पाकिस्तान से ला दो न.....एक टुच्चे से संत को पकड़ने में ये तैंतीस करोड़ रूपए व्यय कराती हैं.....  


राजू : -- यदि मैँ भला बन गया, तो फिर जेल में मैं ही रहूँगा.....बाक़ी सब बाहर रहेंगे.....

मैं जेल में रहूँगा..... बाक़ी सब बाहर रहेंगे तो तुम लोग कहाँ रहोगे.....? रहेंगे की नहीं रहेंगे क्या पता.....

राजू : - एक ठो भाइट हाउस है वो भी बिना हैंडिल के दरवाजे बाला 
यहां  देखो लाल पीले सफेद पता नहीं कितने हैं.....शाहों की करनी के कारण लोग थूकते हैं इनपर..... 

बात कड़वी है किन्तु सत्य है : -- किसी माता को विवशत: एक दो रात्रि के लिए कहीं जाना हो  तो क्या वह अपनी युवा होती पुत्री को उसके  पितामह, पिता अथवा उसके युवा भ्राता  के संरक्षण में छोड़ सकती है.…. ? 

नहीं.....क्यों ? क्यों कि वो उसको गर्भवती बना देंगे.....


जहाँ पनाह, जहाँ पनाह न हुवा अली बाबा हो गया बाकी तो सब चोर हैं , स्याह दौलत स्याह दौलत न हुई कारूँ का खजाना हो गई..... ये खुल जा सिमसिम बोलेगा और सिमसिम खुल जाएगी.....

राजू : -- च. च. च. च.. भारत में भी कैसे कैसे पाखंडी बाबा हैं.....

 
 शासन वही सुशासन है जहाँ  जन सामान्य शासक हो । शासन संचालक सेवक हो, और वे लौकिक सुखों के उपभोग से परहेज करें ॥

राजू : -- हाँ ! और उस सेवक अर्थात नौकर के गाली सुनने वाले कान हों और लात खाने वाला पिछवाड़ा भी हो.....किसी को नौकरी पसंद न आए तो छोड़ कर चला जाए.....

"  अभी तक जितने आए छुपछुपा के खाए । यदि तुम शपथ ग्रहण समारोहों जैसे तुच्छ आयोजनों में सौ सौ करोड़ का अपव्यय करते हुवे झुल्ला  में बैठ के खुलमखुल्ला भी खाओगे  तो तुम्हारी फटफटिया पांच का एवरेज देने लगेगी....." 

राजू : -- मास्टर जी ! पांच माने की कितना.....? 

" जितना बिना चढ़े ढुलका के देती है न उतना.....  


ये दुष्ट मंत्री  किसानों को कहते हैं, मछली पालो, खेती-वेती छोडो खेत हमें दे दो हम उन्हें उद्योग पतियों को देंगे । 

भगवान ने उक्त श्लोक इस सन्दर्भ में कहा था कि यदि तुम कोई पुस्तक लिख रहे हो तो पुरस्कार की आशा मत कर यदि तुम ऐसा करते हो तो एक दिन तुम परम पुरस्कार को प्राप्त होओगे और साहित्य के जितने भी पुरस्कार हैं वो  तुम्हारे नाम पर दिए जाएंगे । इसलिए अपना नाम अच्छा सा रखना चाहिए ' गिरधर बैष्णव ' छै ये भी कोई नाम है..... 


विदेशी बैंकों का लेखा धारक होना बुद्धिमानी है कि विदेशी बैंक होना.....?


ऐ फ़ौजी ! तनिक इनको मानव बम दिखाओ तो.....  फूट के औउर कैसे.....

 बहुंत सस्ते में आते हैं..... बस बीस लाख और एक ठो पिट्रोल पम्प लगता है.....

हवाई जहाज ! लो ये भी कोई बम है.....उसमें राष्ट्र का प्रमुख कहाँ मरता है.....

ये रही शह.....अबसे हमरी सीवाँ का अतिक्रमण मत करना.....अउर दूसर के फटे में टाँग मत अड़ाना.....समझे.....चीनी 


राजू : -- ई सासन -प्रसासन है कि दुस्सासन है.....

तुम लोग जब हवाई जहाज में उड़ते हो तब कितने मुगालते (धोखे )में रहते हो न , कि ये जो पायलट है वो पायलट है.....देखना कहीं वो घूस देने वाला लोको पायलट न हो.....

संतों की वाणी है : --
 
चार वेद षट शास्त्र में बात मिली है दोय । 
सुख दीन्हे सुख होत है, दुःख दीन्हे दुःख होए ॥ 



बिजली उद्योग - वापस जाओ, वापस जाओ.....  

गोबर गैस बनाओ, अपनी मेट्रो स्वयं चलाओ.....टिंगटांग.....

हम कौन थे, क्या  हो गए, और क्या होंगे अभी , 
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी । 
  ----- ॥ मैथिली शरण गुप्त ॥ -----

किसानों की धरती हड़प कर उसे  उद्योग पतियों के अधिकार में देते हैं भारत के ये प्रधान मंत्री गण.....

" पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् "

भावार्थ : -- भौतक जगत के सभी जीवनीय पदार्थों में ये तीन ही वास्तविक रत्न हैं : -- अन्न, जल एवं सुभाषितं अर्थात सुन्दर विचार, इन तीन की उन्नति स्थायी होता है । आर्थिक उन्नति व्यर्थ है क्योंकि यह स्थायी नहीं होती ॥ 

Monday, 2 March 2015

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 2॥ -----

मर्ज़ तिरा ज़ियाबर्तानिशी है ?
दो गज़ की तिरी हैसीयत नहीँ है..... 

ज़िया बैतिशी = मधुमेह 
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अपनी इज्जत अपने हाथ जोंग सँभाले रख..,
मर्दानी जनानियों वाला वो जमाना तो है नहीं.....  

सत्ता की बागडोर गोले-गोली भी तो नहीं है..,
ऐसे-वैसे को थमा सर पे फुड़वाना तो है नहीँ..... 
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रहे-रस्मो-रब्तगी से ए ग़ाफ़िल संभल..,
 कुछ बदलने से पहले तू खुद को बदल.....

रहे-रस्मो-रब्तगी = लेनदेन, मेलमिलन 
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शाहों ने ही सिपर शाम पे स्याहकारी लिखीं..,
सितारों को खलाओं में जमा करता है शेखू..... 

सिपर शाम = ढलती शाम 
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मौजे-दरिया की इयत्ता न पुछिये..,
उतर के देखिये वहां भी ज़मीं होगी.....

इयत्ता = गहराई, थाह
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शम्म -ए-रुखसार से रौशन है ये महफ़िल ? 
मैं कहूँ तेरे लबे-जू की दहक का ताब है.....  
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बिके जहां इन्साफ वहाँ की चारदीवारी तोड़ दो..,
रयत दार के रहन रखी तुम अपनी लाज मांगों.....
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खैराती माल से ही, है मलिके-मुल्क मालामाल..,
तेरे महल्ले उसका,वो ख़ानक़ाह है कि महल है.....
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मर गया वो ज़ाहिर-बीं अपनी मौत से पहले..,
हबाबी दुनिआ को जो आक़बत समझता है.....

ज़ाहिर-बीं = जाहिर परस्त, जो केवल दृष्यमान पर विश्वास करता हो
हबाबी दुनिआ = पानी के बुलबुले जैसा संसार, क्षणभंगुरी दुनिया
आक़बत = परलोक

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Shri Krshna ne Shrimad Bhagawad Gita mein spashta shabdomein kaha hai : "Yukt Ahar-viharasya, 
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ऊंचा है दरबार तेरा मेरी नीची निगाह.., 
मैं जब्हे जफ़ाशियार तेरे लबों पे आह..... 
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दुश्मन को मिरे काम से आराम नहीं है.., 
अपने को भी घर में कोई काम नहीं है.., 
दुश्मन के बड़े नाम बड़े बड़े एहतराम..,
अपना तो दुनिया में कहीं नाम नहीं है.....

जेल भी चले जाएंगे तो वांदा नई.....
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इनसानियत आदमियत की नियत हुई ऐसी.., 
जिनावरों की सफ़े-जमीन से हस्ती ही उठ गई.., 
बद अमनी बद दयानती क्या तिरी नज़र लगी.., 
कि मिरे बागो-गुलसिताँ से गुल-बहारा रूठ गईं..... 
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तू आईना-ए-हिंद है के बदरू मुजस्सम कोई..,
तेरा अक्स उतरे मुझे हर आइना बदखू लगे.., 
तेरा नसीब सवारूँ आ तेरी सीरत को सजाऊँ.., 
इस कदर बनाऊँ कि तू वजाहते-वजू लगे.....

इसे खेतों में बैठाओ कोई आबशार उतारो.., 
फिर देखो आइना-ए-तस्वीर का रंग.....

आईना-ए-हिंद = संविधान..... 
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गंगा आए गंगादास जमुना जमुनादास
तू बस मैला ढोते रहना

अपनी करनी पार उतरनी
तू बस नैया डुबोते रहना

दे जो आटा दाल वही देगा ज्वाल
तू मुंह में थूक बिलोते रहना
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पाँच दिवारी दस दरवाजे एक, बानी को दरबार..,
ता पर राजे म्हारो प्यारो, साँवरो सरकार री म्हारो स्याम जी सरकार.....
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हे री बँसरी अधर आधारे मधुबन धेनु चरैय्या..,
बैठो जमुना किनारे मोको, लागे प्यारा कन्हैय्या.....

गोरी गोरी म्हारी राधिका, साँवरो कन्हैय्या..,
यह चितवन की चोरनी वो, माखन का चोरय्या..,

छापन कलि को घाघरो घिर मटकावै कलैय्याँ..,
चारु चरन मैं झाँझरी घारे, नाचे ता ता थैय्या.....
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ये अरगवानी दामन घटाओं पे छाए..,
फ़लक पे धनक बन कयामत ही ढाए..,
कहीं साहिलों पे लहर होके रब्ता..,
कोई साज़ छेड़े गज़ल गुनगुनाए.....


अरगवानी दामन = शफ़क, लाल-शहाबी दामन
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छंद पकैया छंद पकैया कानों में रस घोलूँ..,
साली जो गल बाहीं ले तब दूजा छंद मैं बोलूँ.....
छंद पकैया छंद पकैया कैसो जे ससुराल्यो..,
माखन सी साली रख ली छाछ गल में घाल्यो.....
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हर्फ़ सियाही शिराजां किए मिरे हज़ूर को दाग़ लगे 

ग़मे-शब गफलतों ख़्वाब में सुब्हे दम को जाग लगे  
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न ज़र न जमुर्दीन न गिराँ लालो-गोहर रखना.., 
कहीं दाद मिले तू अपने फ़न में ज़ौहर रखना..... 
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सिपुर्दे ख़ाक हो के ऐ मशीर तुझे मौत आई..,
मारे शरम के मर जाता तो तेरा क्या जाता.....
मशीर = नसीहत करने वाला  
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हाशिए नसीन औ शम्म-ए- महफ़िल..,
उसकी ताज़ीर कि ताबे-निगाह होना..,
यह भी इक हासिल-कलाम है आखिर..,
उसकी किस्मत कि हर हाल तबाह होना.....

हाशिए नसीन = आस पास बैठने वाले
 ताज़ीर = सज़ा
 हासिल-कलाम = खुलासा
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कश्ती मन्ज़िले मौजूं है तेरी फ़राज कहाँ..,
नादाँ परिंदे तेरा फर्शो-फ़लक परवाज कहाँ.....

मौजूं : - सम्मुख 
फ़राज = ऊंचाई 
फ़लक परवाज = आसमान पर पहुँच 
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फ़लक की जरी तश्त है सितारों के हैं निवाले..,
हयाते-आब से भरे भरे महताबों के है प्याले.., 
जन्नत सी शबिस्ताँ कहीं ख़ाना-ए-ख्वार ख़ाँ.., 
लबों पे चश्मे-शबनम है जबाँ पे आहो-नाले..... 
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आफताब के दम पे है ये रौशने-रुखसार.., 
वरना तो महताब की हस्ती ही क्या है......
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पहले हो अमान हर ज़िस्त की हर जान की.., 
फिर जा-नमाज़ी हो गीता और कुरआन की..... 
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ज़र्रे-ज़र्रे को जेबे-महल कर जो नाज़ करता है.., 
अपनी सरजमीं के नाम को वही फ़राज करता है.....
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पहरन-ओ-सरो-पा चहदीवारी ये तिरा दर..,
 फिर लम्हे को सदियों का इन्तजार है शायद ...... 
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व्रण ह्रदय उद्गार भरे तलवार दो धारी लिखती है.., 
कलम उदर अंगार भरे चिलक चिंगारी लिखती है.....

 हृद व्रण = घायल ह्रदय 
चिलक = चमक पीड़ा पूर्वक 
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आबो-मीन जरी कारि उसपे जलवा चाँद का..,
सितारा ज़र निगारी उसपे जलवा चाँद का..... 
 ग़लताँ पेचाँ-ओ-परदाज़ 
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प्रभा से तिलक का तेज ले अरुण से ले अरुणाई..,
 चितहारू चारू चंद्रिका ने अपनी माँग सजाई..... 

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दूसरे की चुपड़ी से अपना सुखा परोसा अच्छा है.., 
शैतान के भरोसे से भगवान का भरोसा अच्छा है..... 
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तंत्र-यन्त्र कौशलता से संचालित होते हैं, जाति-धर्म धनता-निर्धनता से नहीं.....

वर्त्तमान परिपेक्ष्य में जातिगत अस्पृश्यता अर्थगत अस्पृश्यता में रूपांतरित हो गई है..,

यदि अस्पृश्यता एक गणितीय समस्या है, तो आरक्षण ऐसा सूत्र हैं जिससे इस समस्या का हल अभी तक प्राप्त नहीं हुवा, तथापि इस सूत्र का वारंवार प्रयोग हो रहा है क्यों ? क्योंकि सत्ता साधने का यह एक सिद्ध मंत्र है.....

किसी धर्म-जाति के सामाजिक उत्थान के लिए समय की आवश्यकता होती है, निर्धन को धनवान बनने में कितना समय लगता है? रातोरात का..... बेवकूफ,गर्दभ.....भैंस के आगे बिन बजा रहे हो.....

"सोते हुवे को सपने ही दिखाए जा सकते हैं"
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जिस अहिंसा के बल पर सत्ता धारी दल ने अंग्रेजों से सत्ता हड़पी थी वही अहिंसा आज उन्हें 'बांटने की राजनीति' लग रही है और हिंसा 'एकता की प्रतीक'.....यह उस दल के विचारों की विकृति है.....
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इस सत्ता धारी दल का आभामंडल इतना दिव्य है कि किसी भी विपक्ष ने उनसे यह पूछने का साहस नहीं किया कि 'गांधी जी' की ह्त्या उनके कार्यकाल में क्यूँ हुई, हिंसा रोकने के लिए संविधान में कोई प्रावधान क्यूँ नहीं किया,यह नहीं पूछा कि ये संविधान है..... या सत्ता धारी दल के विचारों की पोथी.....: )
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सत्ता, माया और पत्रकारिता इन तीन देवियों ने भारतीय संस्कृति छिन्न-भिन्न कर भारत को गर्त में धकेल दिया.....
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"एक नष्ट-भ्रष्ट तंत्र की आदर्श लोकतांत्रिक छवि गढ़ने में पत्रकारिता सबसे अग्रणी रही है....."

स्पष्टीकरण : -- छवि गढ़ना बोले तो मेकअप करना , ये तथाकथित पत्रकारिता है, फ़ोकट में कुछ नहीं करती.....
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बड़ी लिखने से ही लकीर बड़ी होती है, दूसरों की पोछने से अपनी छोटी लकीर बड़ी नहीं हो जाती

दूज लेखे पोछन से, होत  नहीं बड़ रेख ।
रेख तबहि बड़ होत है,  बड़ी जब लेख
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शासन चाहता है कि प्रशासन सदा कुहू कुहू करे और उसकी काऊँ-काऊँ पर ताली बजाता रहे.....
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आर्थिक आधार पर जो उच्च एवं उच्चतम वर्ग है, जो भोगवादी है( खाओ पियो और मौज करो का सिद्धांत), जो प्राय: दूरदर्शन एवं समाचार पत्रों में ही दृष्टिगत होता है, वह इस भ्रष्ट व्यवस्था का घोर समर्थक है  कारण स्पष्ट है भ्रष्ट व्यवस्था से ही उसके विलासिता के साधन अद्यतन रहते हैं, 
                                 एक  शिष्ट व्यवस्था में इनके विलासिता के साधनों का  बहुंत बड़ा योगदान होगा.....
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काव्यात्मक शैली में यदि  अनाचार ( दुराचरण, बुराई, अयोग्य आचरण, भ्र्ष्टाचार, कुचलन, कुरीति अभद्रता, अविशिष्ट, आचारहीन ) एक रस है तो विषयाभिरति उसका स्थायी भाव है.....  
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आज यदि भोगेगा तो कल उसे भुक्तेगा..... 
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पृथ्वी का आधे से अधिक  संदोहन विषय के विलासिताओं को संकलित करने में व्यय होता है । जीवन धन हेतु को छोड़ दें तो  भ्रष्टाचार इन्हीं विलासिताओं के उपभोग हेतु किया जाता है, अत: एक भ्रष्ट व्यवस्था को चुनते समय विकास की अपेक्षा न करें....सम्यक वितरण के अभाव में इतने सन्दोहन के पश्चात भी यदि विकास नहीं हुवा तो आगे भी नहीं होगा, अत: पहले अपना धर्म ठीक करें, जाति ठीक करें अपने विचारों को ठीक करें की भैया मुझे भ्रष्टाचार बलात्कार अनाचार को नहीं चुनना है.….

विभाजन के पश्चात भारत की प्राकृतिक सम्पदाओं का जितना दोहन हुवा है उतना सहस्त्रों वर्षों में भी नहीं हुवा..... 
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"उच्च एवं उच्चतम वर्ग को मध्यम बनाओ- गरीबी रेखा मिटाओ"
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शासन ने मध्यम वर्ग को दुधारू गाय बना दिया है जिसे वह दोह दोह कर निम्न वर्ग का पेट भरती है, और घास भी नहीं डालती..,हाँ उच्च एवं उच्चतम वर्ग को  राष्ट्रपति का  सजीला घोड़ा बना दिया है, जो बादाम खाता  हैं लात भी मारता हैं..... 
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एक खराब बात, सौ अच्छी बातों को खराब करती है.....
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 ये भ्रष्ट व्यवस्था ऐसी कसूती है, आज आप ने जिसे चुन लिया या कल जिसे चुनेंगे, परसों वही आपके धंधे को बंद कर देगा, आपकी नौकरी, आपकी आजीविका छीन लेगा..,और आप, गरीबी रेखा के नीचे आ जाएंगे और फिर कवि लोग एक बिंदु में आपकी जीवनी लिखेंगे..,

तो ? 
तू आईना-ए-हिंद है के बदरू मुजस्सम कोई..,
तेरा अक्स उतरे मुझे हर आइना बदखू लगे.., 
तेरा नसीब सवारूँ आ तेरी सीरत को सजाऊँ.., 
इस कदर बनाऊँ कि तू वजाहते-वजू लगे.....

आईना-ए-हिंद = संविधान..... 
इसे खेतों में बैठाओ कोई आबशार उतारो 
फिर देखो आइना-ए- तस्वीर का रंग 

 पहले मज़स्सम को संवारों फिर आइने बदलो..... 
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एक अचंभा ऐसा देख्या बाबा जी समझा रियो.., 
बैठा ऊंंची चौक्की पे था मीठा मीठा गा रियो.., 
रे धणी ज्ञाणी पाणी धन बहता होवै निर्मला..,
दस लाखाँ की बोतरी था भगता नु पिला रियो.....  
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सुन्दर आवरण आलेखन के प्रति आकर्षण उत्पन्न करता है, सुन्दर आलेखन लेखक के प्रति आकर्षण उत्पन्न करता है, इसमें सम्मोहन की शक्ति भी होती है..... 
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हमें नौनिहालों के मनो-मस्तिष्क में हिंदी भाषा के ज्ञान को संचित रखना होगा, अन्यथा भावि काल में वे संस्कृत के जैसे ही हिंदी भाषा के ज्ञान से भी वंचित हो जाएंगे.....
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जल ही जीवन है, जल का संरक्षण जीवन का संरक्षण है.....
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सेवा में प्रचार शब्द का कोई स्थान नहीं है, यदि सेवा अथवा सेवक का पचार होता है वह शीघ ही व्यापार और व्यापारी में परिणित हो जाता है सेवा अपने परमार्थ के उद्देश्य से भटक कर लब्धि में परिवर्तित हो जाता है । लब्धि का लोभ प्रगाढ़ होते ही कुत्सित कृत्यों से संस्पर्धा होने लगती है.....

पूर्व में प्रचार पर किया गया व्यय निम्न वर्ग के अभाव को क्वचित करता था माध्यम वर्ग की आधार भूत आवश्यकता उपलब्ध करवाता था । खेद है !  विद्यमान में यह व्यय उच्च वर्गीय संचार माध्यमों के विलास साधनों की व्यवस्था कर रहा है.....   
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 भारत देश के लिए अभाव वर्षों से अभिशाप के सदृश्य रहा  | अब यह अभाव इतना विवश हो गया है कि सत्ता इसे न केवल क्रय कर रही है अपितु अत्यंत अल्पार्घ/सहँगे में क्रय कर रही है  

अल्पार्घ/सहँगे में = सस्ते में  
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----- ॥ हर्फ़े-शोशा ३ ॥ -----

फ़ैलसूफ़ी फ़ितरत फ़िदाई जान की बात करते थे..,
ख़राबो-खाल वो ख़ालिशे-ज़बान की बात करते थे..,
जुल्मो-जाबिरी से मिरी मुल्को मालिकी लूट के..,
कलमे-तेग़ तराश फर्ज़ो ईमान की बात करते थे..... 

संसार पर भार है क्यूँ उठे हुवे ये लोग.., 
 निरंध निराधार है क्यूँ उठे हुवे ये लोग..... 

नीम शब् औ नींद न ख्याल है न ख्वाब है.., 
ज़ब्त लब किनार चश्में-ज़द में आब है..,
याँ न कोई ज़ाब्ता न कोई सज़ा याफ़्ता.., 
चार सूँ जाबिर जब्रे जूल्म बेहिसाब है..... 


शहवते-परस्ती में हुवा मुल्हिद मैं इस क़दर..,
अब न ख़ुदा का खौफ़ है न अंजाम की परवाह.....
पूछ रहे थे जब वो ख़ैरियत ब आफ़ियत..,
तुम्हें हंसना न आया हमें रोना न आया.....

लिए ज़री सितार रोज शाम को सिया करो.....

सियाहे-शब्ब सिसक के कह रही..,
कि चराग़े-गुल पे चली हैं आरियाँ.....

तेरी यादें थीं कि ज़िगर खराश किए थी..,
हम आहो-उफ्ताद न करते तो क्या करते.....

आती है साजिद की आवाज कहीं से


दस्ते बरदार समंदर में वो किश्तियाँ भी थीं..,
नाखुदा से तक़रीब की और साहिल से जा लगी.....

तक़रीब = समीपत
नाखुदा की तफ़ावत पे न हो  कश्तियाँ ..,
तूफ़ाने-समंदर से ही होती हैं बर्बादियाँ.....
तफ़ावत =  दूरी

चश्मे-तर को किताब ज़द को रहल कहूँ.., 
महफ़िल में शम्मे-सोख को मैं ग़ज़ल कहूँ..... 

रहल = पुस्तकास्तरण 

चलती है जब तेग़ जबाने-हिन्दुस्तान की.., 
कलम हो जाती है तब कौमियत शैतान की..... 

कौमियत = राष्ट्रीयता 
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न निज़ामे-नौबती न आइन न आईनी.., 
शहवत परस्त को सरे-सवार कर दिया..... 
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इस दौरे जहाँ में मुश्किल है फरिश्ता होना.., 
इँसा को मयस्सर नहीं अब इँसा होना..... 
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मैं चराग़े-सहर हूँ जला हूँ औ बुझा हूँ.., 
रौनके -महफ़िल में कोई चाँद उतार दो.....
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अलिफ़ बे के वज़ू सिफ़र की गुफ़्तगू किए.., 
लगी हुई थी बोलिया ख़सरों पे ख़रीदार की.., 

जाँ-निसा को जाँ नहीं किसी को आबोदाँ नहीं..,

उन्हें आरजू थी किसी नफे के कारोबार की..,  

खिलअते- तन में सबकी नियतें थीं खराब ..,

ख़ाक उडी शक़्लें थीं ख़िरमने-बाज़ार की..,

रो रहा  था जाफ़राँ सिसक रही थी वादियाँ.., 

रेज़ा खूँ चप-ओ - राह रूह मिली चनार की..... 

राजू : -- ख़िर माने ? 


ख़िरमने- बाज़ार  = फसलों का बाज़ार  

चप-ओ - राह = दाहिने- बाएं 


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ये तर्क़े दुन्या और ये इल्मे इलाही.., 
वो सफ़हे सफ़हे मैं स्याही स्याही..... 
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ज़िंदा दिल मुरदार हुए मुरदारो-महल ज़िंदा हैं.., 
 ज़ेरे बारी ख़ाक किए कब्रो-कफ़न शर्मिन्दा है..... 

 ज़ेरे बारी = परेशान, नुकसान 
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वो मुझको सहीफे-आसमान सा पड़े क़ुर्आन सा पड़े..,
मैं चाहता हूँ मेरा लिखा अल्फ़ाज नजीर हो जाए.....
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किस किस का मातम करें किस किस को रोएँ..,
 एक मुफ़्तरी हर रोज मरे है हर रोज उठे हैं.....
 मुफ़्तरी  = झूठी बात  बनाने वाला
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उन दोनों का  एक जैसा काम था..,
इसका नाम था उसका बदनाम था..,
वक़्त के फ़ेरे किस्मत यूँ फ़िर गई..,
ये दरबारे ख़ास वो आम अवाम है.....
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मुस्कराते लब किनार चश्में-आब से भरे..,
किश्तियाँ तेरे नाम की थरथरा के उतरे.....
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विलायती वरक़ के साए कोई आए ..,
कुरआन उठा मुँह उठाए कोई आए..,
याँ कौन किसी के आँख में पानी है..,
सर पर लगी आग तलुओं में बुझाए.....



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कुंद से हलाल क़ुदरत कह्रे-इलाह किए..,
इन्साँ फिर अपनी करतूत पर पर्दा किए.....
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 तमाम सियादतें जब स्याह हो जातीं है ..,
इक नवाज़िश बेलौस को गुनाह हो जाती है .....
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हाय ये नौबती और ये नौबतें निशान । 
शहवार पे सवार ये शहानी आन बान ।।

 बर्बाद देह देह है  बर्बाद देहक़ान । 
नौदौलती हो के  नौ -सफ़र पे हुक्मरान ।। 

हे भगवान ! 

नौबती =पहरेदारी 
देहक़ान =किसान 
देह देह = गांव-गाँव 
नौदौलती = नया मालदार 
नौबतें निशान = नगाड़े और झंडे 


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रू-पोशीदा सियासत जब शिनास हो गई..,
फिर इक नया पोश बनाने को दे दिया ..... 
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दुनिया वही रही दुनिया वाले बदल गए..,
राही कदम वक्त से कहीं दूर निकल गए..... 

वही दीवाने -ख़ालसा वही आईने-अकबरी..,
सल्तनत वही रही बस अकबर बदल गए.., 

क़िले वही रहे किले-सर किए किलेदार नए..,
रैय्यतें महकूम रही बस मोतबर बदल गए.....
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मैं चराग़ तिरे दयार का ये रब्तगी है शब तलक..,
तेरे वास्ते कोई और है मेरा रास्ता कोई और है.....
  
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 एक सूँ खुराकें ख़ुर्द रहीं एक सूँ भूखी भूख रही..,
अब अपने हक़ की आज़ादी ढूंढ रहे निवालों में.....

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ऐ रहे-रविश तेरे बे-शाख दरख़्तों की तरह..,
मेरे मुल्क के महले भी अब बूढे हो चले हैं..... 
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रंगीनियों के भी रंगो से परे.., 
चलो आसमाँ में नए रंग भरे..,
इक सोज़े-दरिया यूँ दिल से उठे 
बनके वो कतरे नजर से गिरे 
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जलतल पंकज पँखी जागे तेरे लोचन लाग रहेँ..,
जाग रहें सब नभ के दीपक तेरे लोचन जाग रहे..,
कौसुम चरन रमझौरे झूरे भंवरे उपबन राग रहे.., 
जागे कम्बुक कोइल कागे  तेरे लोचन लाग रहे.....
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पहने थे जिनने फंदे हँस हँस के मुस्करा के..,
 करके जाँ को सदका हो गए वो चिता के..,
और ये गुंचे लिए न जाने किस चमन के..,
अल्तमस लिबासों में आएँ सर झुका के..... 

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हर नई सियासत ने इक बियाबान बना दिया..,
सब्जे जार ऐ चमन तुझे रेगिस्तान बना दिया.....
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ये पत्थरों का शहर ये पत्थरों का शहर.., 
अश्क़े -आबसार यहाँ चश्में-ज़द हैं तर..... 
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शोर न हो ऐ सुबहे इस दम तिरी इबादत गाह में..,
सो रही है शोरा-ए -शबनम बागे-गुल की बाँह में.....  
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रयनि कालहि काल लखे  भाल लखे रंग रोली.., 
रतिगर रतिक रतनाल लखे प्रीत ने प्रीती घोली..,  
मधुरिम मधुरिम थाल लखे हो गई मीठी बोली.., 
सप्त बरन कर माल रखे आई रे फिर होली..... 


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हुए परगने में पैदावार-ओ -पैकार बहुंत.., 
मगर मर्दाने-मर्दुम से कुछ न पैदा हुवा.....  



परगना  = तहसील 
मर्दाने-मर्दुम = मरद जात  

  अमलदार अमीरों की गरीबी नहीं जाती..,
इस वास्ते हिन्द की बदनसीबी नहीं जाती.....

देखना हो खुद को जाहिरो-बातिन..,
तो अपने तज़किरे का आईना देखिये..,  
गर देखना है जाहिरा-ओ- जाहो-हशम.., 
तो जीनते-महल का ज़ीना देखिये..... 

जाहिरो-बातिन = बाहर भीतर 
तज़किरा = जीवन-चरित्र 
 जाहिरा-ओ- जाहो-हशम = ऊपरी शानो-शौकत 
जीनते-महल  का ज़ीना= श्रृंगारी दर्पण की सीढ़ियाँ 

जम्हूरी ज़ेबा तन किए हम बन सँवर के आए..,
चलो आईने-आईन को अपनी शक़्लें दिखाएँ.....  

ताजो बख़्श की पोशी किए तख़सीर बदलते रहे.., 
  आईना वही रहा हम तस्वीर बदलते रहे.....  

हाजिमो-हुक्मे-वक़्त हर शरर को शऱ किए.., 
सायबाँ को सर किए हुक्मी कहीं बसर किए..... 

हाजिमो-हुक्मे-वक़्त = तात्कालिक विद्वान शासक 
हुक्मी = खता न करने वाले, आज्ञाकारी 

इक रोज़े-क़यामत हम गुज़ार आए.., 
दुआ  करो की ये शब्ब ब-ख़ैर गुजरे..... 

कहीं ज़ेवरो-जवाहर जरगर जमीं जायद कहीं..,
रहने को बहुंत कुछ है कहने को कुछ भी नहीं..... 

सुखन परवर शम्मे-अंजुमन को ग़ैर कहे.., 
शाम से ही सुब्हे दम को शब्ब-ख़ैर कहे..... 

दर-बारे आम पर तू भी वहीँ मैं भी वहीँ..,
बादे-सरंजाम पर तू कहीं और मैं कहीं.....

 तिरे अख़बार में कैफ़ियत का जो  ख़ाना है..,
ऐ पैकर वो पैकार है के पैदा का पायदाना है..... 

सब्ज़े-शादाब हो तो गुलिस्तान बनते हैं.., 
  मरे मुर्दों से तो कब्रिस्तान बनते हैं..... 

    "घर को मसान मत बनाओ" 
 "तरकारियाँ खाओ-गुलिस्तान बनाओ" 

बदनिगह की जब सरहदों पे ताक होती है..,
सोज़े दिल चाक होते हैं जमीं नापाक होती हैं..... 

एक पत्थर की भी तक़दीर सँवर सकती है.., 
शर्त ये हैं कि सलीके से तराशा जाए.....
----- ।। गुमनाम ॥ 
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उस मुरतिद मुसन्नफ़ के मुतल्लिक़ अब क्या कहें.., 
काफिरी काफ़िया भी करते हैं ख़ुदा ख़ुदा भी करते है.....

मुरतिद = इस्लाम से फिरा हुवा 
मुसन्नफ़ = लेखक 
काफिरी = काफ़िर जाति की भाषा 

 कुल्फ़ते-काफ़िया में अपनी राह किए..,
राहे-गो काफ़िला काफ़िरी गुमराह किए.....

काफ़िया = आकाश मंडल की परिधि 
काफ़िरी = काफ़िर जाति की भाषा

पील पाँ चल के पीराने पीर हो गए..,
कोट वाले फ़ाक़ा -ए -फकीर हो गए.....  
  

पील पॉंव = एक मोहरा जो तिरछे चलता है और तिरछे ही मारता है,  ऊँट   

अज़ाब शहर यारी कर सवाब हो गए..,
शहर दार खानों में ख़राब हो गए.., 
जो चराग़े शाम था सहर हो गया.., 
वो सितारे जरीगर महताब हो गए.....

शहर यारी =  बादशाही    

जब झौंका कोई जुल्फ को हवा देता है..,
तिरे लरज़िशे-लबे-जूँ का पता देता है.....  

ये महलेमिनारी महल्ले हिंदुस्तान की शान बने..,
तुगलक बाबर हुमायू अकबर-शाहजहान बने..,
सर जमीने -हिन्द की बुलंदी पर कर्दगी किए..,  
तातारी तुर्की फसादी तब मुगलई खानदान बने.....

 फसादी = विप्लव वादी  

क्या थे मुग़ल = विप्लव वादी 
महमूद गजनी = क्या था लुटेरा ये सभी यमन इन्हीं के वंशज हैं 
जब ये हिन्दुस्तान के सरताज बन कर खानदानी बन सकते है तो आतंकवादी क्यों नहीं 

मैं अपनी सनअत में सितारे सजाता चला गया.., 
  क्या मालुम था कि ये मौजूदात का तसव्वुर है..... 

सनअत = कला- कौशल 
मौजूदात = चराचर जगत  

कश्ती सरे-राह हो तो साहिलों का जिक्र क्या..,
नाख़ुदा जो हो ख़ुदा तो मंजिलों की फिक्र क्या..... 

शबे-गूँ स्याहे-नीम इत्तिला दे गई.., 
के बेनूर सितारों का हाल तबाह है.....

बख़ैरियत कलामे-सख़्त करती मिरी क़लम..,
 हज़रात को इस ज़बान से एतराज बहुंत है..... 

तख़्ते-रवाँ   शाह -बहादुर  बादे-पा सफ़र किए..,
शेरो-सुखन फ़हमी में तख्खल्लुस जफ़र किए..,
जब परवर ख़र-मस्त हुए फरंगी खराद पर चढ़े.., 
तख़्ते का तख़्ता हुआ 'जफ़र'शिकस्ता पर किए.....  

तख़्ते-रवाँ = उड़न खटोला,बैठन खटिया,  उडी मूडी मोटर 
 बादे-पा = हवा की गति से चलते हुवे 
जफ़र = विजयी 
फरंगी खराद = चर्बी पिघलाने का अंग्रेजी औज़ार 
परवर = पालनहार 
ख़र-मस्त = मूर्ख, कामी, मदमस्त 
तख़्ते का तख़्ता होना = सत्यानाश  होना 
शिकस्ता पर = असहाय, हारे हुवे 

शबे-गूँ स्याहे-नीम इत्तिला दे गई.., 
के बेनूर सितारों का हाल तबाह है.....

कश्ती सरे-राह हो तो साहिलों का जिक्र क्या..,
नाख़ुदा जो हो ख़ुदा तो मंजिलों की फिक्र क्या..... 

सुबहो एक अख़बार में ये खबर छपी थी..,
किसी बेटे के घर बाप की गर्दन नपी थी.., 
लिखा था चलो मातमी रस्मों को मिटाएं..,
वक़्त तंग है बाप को समंदर में फेंक आएँ..... 

दास्ताने-जिंदगी शीराज़ा बंद पेश्तर हुई.., 
तखल्लुस में अश्क़ लिखा और मुख्तसर हुई.....

आमदे-रफ़्तगी की फ़क़त इतनी सी दास्ताँ है..,
पैदा हुवे जवाँ-जईफ़ हुवे दफ़्न हुवे ख़ाक हुवे.....

सहरो-शब जिसके गिर्दा है इक चाँद.., 
उस जऱ-ख़ेज ज़मीन की नस्ल हूँ मैं..... 

वो रू नुमाँ हो के रंगे-हिना देखे.., 
  के आईना खुद आईना देखे..... 

इश्क़ ख़ातिरे-ग़म का तलबगार होता है.., 
कभी शबे-इंतजार कभी वस्ले-यार होता है..... 

इश्क के भी दो अलहदा रंग होते हैं..,
कभी जुदा होते हैं कभी संग होते हैं..... 

आफ़ताब रूबरू हो तो आईना भी पूर ताब होता है.., 
जो स्याह गूँ में शम्मे-रू हो वही महताब होता है..... 

 कहीँ स्याही से जंग कहीँ हवाओं से जिहाद.., 
   ऐ चराग़े-सहर तेरी हिम्मत को है दाद..... 

यहां ख्वाब भी देखें तो दौलत लगे.., 
चश्में-बाज़ार में कितनी महंगाई है..... 

 सुब्हो-शबे-तार की भी अलहदा दास्ताँ है..,
एक सफ़हे पूर सुपेद एक स्याही स्याही..... 

शब ये नीम स्याही हो तो समाँ करूँ.., 
सुख़नवर फ़रहम हो तो मजमा करूँ.., 
अमाँ तुम भी गज़ब कमाल करते हो..,
जब्र पर ज़रा सब्र हो तो कुछ बयाँ करूँ..,

 चढ़े है दस्ते महल पे खामा ख्वामखाह..,
अब तूम ही कह दो मैं तुम्हारा क्या करूँ.....

सफ़्हा-दिल पे यूं दाग़ लगाए है..,
अशआर लिखे है आग लगाए है.....  

उन दोनोँ की फ़ितरत एक जैसी थी.., 
ये ऐसा था तो वो वैसी थी..,
पूछते हैं सुखनवर अब जोड़ी कैसी है..,
बढ़िया ! न ये ऐसा है न वो वैसी है..... 

दरबारे-आम कुछ यूं सरंजाम हुआ..,
वे नाकाम हुवे बन्दे का काम हुआ..... 

ज़िन्दगी से बला की आशनाई हुई.., 
लो भला वो भी किसी की लुगाई हुई.., 
सोचा था न कहेंगे मगर कह दिए.., 
जो बात अपनी थी अब वो पराई हुई..... 

सुब्हे-सादिक औ चमकता हो महताब जूँ.., 
रूखे-रौशन से महसूर है तिरा शबाब यूँ..... 

महसूर = घिरा हुवा 

सलीबी सी ये जंग है सवाब में रहिए..,
अज़ाब से कहिए ज़रा हिजाब में रहिए..,
हदीस समझ के हके-मौरूसी पढ़ लीजिए.., 
ग़फ़लती नींद है तो शहरे-ख़्वाब में रहिये..,

इस दौर में हकीमो-हक़्क़ानी हक़ीर है.., 
लिबास रस्मी हो तो पूरताब में रहिए.....

हकीमो-हक़्क़ानी = बुद्धिमान, ईश्वराभिमुख, हक़ूक़-रब्त 
हक़ीर= टुच्चा 

सलीबी जंग = यरूशलम पर कब्ज़ा करने के लिए यमनों व् क्रिस्तानियों  के मध्य चली लम्बी लड़ाई 
हदीस = इतिहास 
हके-मौरूसी = आनुवांशिक अधिकार 


चमन को दीदेवार की अब जरुरत नहीं रही..,
नरगिस की भी रोनी सी वो सूरत नहीं रही.....

ए चाँद तेरे जाबिता-हिज़ाब पे सवाल क्यूँ.., 
सलातीना शबाव- ये हुवा है पायमाल क्यूँ ..,

जालिमो-जुरर्ति जुरमाना दे के छूट रहे..?  
जुर्म-ओ जामिना होता नहीं हलाल क्यूँ.....

जाबिता-हिज़ाब = दस्तूरी- पर्दा 
सलातीना = सुल्ताना का बहुवचन 
 पायमाल = रेहड़ी वाला माल 

फ़रज़ाना फ़रिश्तों को इक फर्ज है दुनिआ.., 
फ़ाजिर ये कहते हैं के खुदगर्ज़ है दुनिआ.....

फ़रज़ाना फ़रिश्तों = साधु-संत  
फ़ाजिर = असाधु 



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सुरमई क़लम की पुरशोख़ ग़ज़ल की..,
नक़ल तो हम ख़ुद हैं असल कोई लाए.....  
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शहरे-शाहे-वार पर हुक्मरानी आशियानें हैं..,
चार सूँ सजी हुई सियासत की ही दुकाने हैं..,

खुर्दा है तो क्या माल ये ख़ाशो-खालिश है..,
ईमाँ की सौदागिरी बख़्तर बंद बारदाने है..,

क़िब्ला-ए- आलम हजुरे बहुंत है किफ़ायती.., 
है तो  किर्मे-पीला बोलो दाम ? बस दो आने है..,

वायदा-फ़रामोशी का है बाज़ार बड़ा ही गरम.., 
इक शोरे-गुल के दरम्याँ शानों से लगते शाने हैं.., 

कहीँ पे सफरी सामाँ किसी को सदके है जाना..,
सायबानी सर पे किए यहाँ बिकते शादियाने हैं..,

कहीं पे लुत्फ़े-जिंदगी के असास फ़राहम है..,
खरीदारी का हुनर लिए सब चेहरे जानेमाने हैं..,

कहीं पे हुंडी खडी किए कोई हिसाबे-चोर हैं..,
हिस्सा रसीदी खुली हुई बंद पुलिसिए थाने है.....

शाहे-वार पर  = महा नगरीय राजपथ के ऊपर स्थित
खुर्दा = लूटा हुवा, खाया पिया हुवा
बारदाने = बोरे
क़िब्ला-ए- आलम = बादशाह, शासक
किर्मे-पिल्ला = कीड़ा.....रेशम का और किसका
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रूबरू आईना औ आईने तस्वीर..,
मेरे ख्वाबों की तकमील हो जैसे.....

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ना शमशीरे-वक्फ़ की ना कलमे-शमशीर की..,
पेशतर है ज़ख्म ज़ख्म ख़ता मिरी तकदीर की.....  
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वर्क़े-गरदानी होके यूँ शाख़सार हूँ..,  
वो गुल गुलजार है मैं ख़ार ख़ार हूँ..,
हिज्र की शामों का चराग़े-इश्क़ हूँ.., 
  
उस नग़मगी नज्म  का निगार हूँ                                                                                                             
हुस्ने-खुदादाद का मैं पैरोकार हूँ.....
    
सोजो-पिरोज हूँ रौनके अफरोज़ हूँ..,  
ज़र ख़ेज जमीनों का जमींदार हूँ.....   
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मुझे रास्तों की ख़बर नहीं उसे मंजिलों का पता नहीं..,
मेरी उम्र फिरे हैं दरबदर किसी रहबरी की तलाश में .... 
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शिकम शेर होके वो ख़ासम ख़ास गया..,
शीशा आलात था शी शा बाश हो गया.....

शिकम शी होके = पेट भर खाके 
शीशा आलात = झाड़ झंझाड़ 
शीशा बाश = अति सुकोमल 
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रिश्वत भी ताबे-रु शोख कवँल होती है..?
गज़ाला हो के फिर वो कहाँ ग़ज़ल होती है.....

गज़ाला = हिरणी होती है ( पड़ने की नई खाने की )
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अहले-क़लम में बंद की कुल्फ़तों की दास्ताँ..,
ज़ब्ते-दिल को हर कहल मकबूल तेरे शहर के.....
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मुजाबीर की ग़ैरत चल बसी सब रोने को आए.., 
तशरीफ़ रखने को फर्शे-पोश कोई दरी तो मिले..... 
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ऐ चराग़े-ग़ुल तुझमें आग जब तलक नहीं..,
रौनके-अफ़रोज़ ये चराग तब तलक नहीं.....
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सरकश ने जिसको क़लम किया, वही सर जिंदाबाद रहा..,
एक तेरी यादों के सिवा इस दिल को कुछ ना याद रहा.., 
तेरे रब्त ऐ अहले-सनम सब रिश्ते नाते भूल गए..... 

सरकश = तोपखाना 
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ख़्वाबों ख्यालों में जिसके, ख़ोजा-ओ-शीशा घर है..,
जेरे-खीसा-ओ-ख़िलअतखुरमा-ओ-मालो-तर है.., 
मख़लूको-मजहब के माने, उसके लिए लवाजिम.., 
लिल्लाह सजदे में सर है, दरबारों-पेश है ज़िम..... 

ख़ोजा = बादशाहों का नौकर 
जेरे-खीसा-ओ-ख़िलअत == मालामाल जेब वाला लिबास 
मख़लूको-मजहब =  सृष्टि और मजहब 
लवाजिम = लदान 
खुरमा-ओ-मालो-तर = खाना-खजाना 

यू मख़लूतुन्नस्ल 
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हाले-ग़ैर हल्क़ा औ दयारे-ख़ूनाबा..,
दरो-दर तूफ़ानी समंदर है गुज़रा..,
गिर्दा गिर्द गर्दो-गिल की ग़िलाज़त..,
ग़ालिबन यहां कोई लश्कर है गुजरा.....

हाले-ग़ैर = तबाह
 हल्क़ा = गाँव का समूह
गिर्दा गिर्द गर्दो-गिल की ग़िलाज़त = चारों और धूल -मिटटी की गंदगी
ग़ालिबन = कदाचित
 लश्कर = सेना
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हरेक कतरे को साहिल मयस्सर नहीं होता.., 
  जो होना चाहिए वही अक्सर नहीं होता..... 
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लिखा न गया फिर ख़ैर बंद कोई महफूज़..,
मिरे पेशवा के पेशाने-दर तख़्त ऐसा था..... 
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ये सुबहो शफ़क फूल उठी वो शाम शम्मे-रूई.., 
वक्त की रानाई भी लम्हे में माहो -साल हुई..... 
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जमीं की पैबंद होके सफ़हे हस्ती से उठ जाना था..,
उस सुखनदाँ की सुकूनत में रूदो-चंद रुबाइयाँ जी लीं.....

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मिरे ख़ामा-ए-दिल में वो तुम्हारे नाम का होना..,
तहे-पेचा होकर जूँ ख़तो को खाम का होना..,
लरज़िशे-पा हर्फ़ों का लफ्जों से लिपट जाना..,
फसले-गुल बहारों को ख़ैरे-कलाम का होना.....

 ख़ामा = क़लम
खाम = लिफ़ाफ़ा
खेरे-कलाम = अच्छी इबारत
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फिर इक अहदे-आह वो उफ्ताद हो जाए..,
ऐ मुल्क तू मुकम्मल आज़ाद हो जाए.....
अहद = प्रण
उफ्ताद = शुरूआत
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तेरे लबे-लरज़िश से निकला हर हर्फ़ किताब हुवा ..,
इक बेदारे-गिर्दे-शब ढलक के वो चश्मे-आब हुवा.....
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ताबे-दिल का सौदा किए स्याही बद-रू हो गई.., 
कलमें कुंद हो गई धार सरोबाचार बेचकर.....  
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लफ्ज़ आश्ना झलके है यूँ  किताब से.., 
खूबरूई झलक रही हो ज्यूँ गुलाब से..... 
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मुंसिफ है के मुंसिफ़ी की दुकाँ है.., 
जम्हूरियत भी तोते पाले बैठे हैं..... 
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रोज़िना शफ़क़ फूल के बा-अदब सलाम करती है.., 
सिराजे-सुबुक को शाया, सुबहो को शाम करती है.…. 

सिराजे-सुबुक = सूर्य/दीपक का तेज 
शाया = प्रकाशित
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अज़ब सी रंगीनियाँ रंगी है क़ैद ख़ानों ने.., 
रिहाई की तहरीर है सज़ा के लहज़े में..... 
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जऱ-ख़ेज जमीं है हस्ती जब तलक़..,
मुस्तक़बिल की गुजर-बसर है.., 

जिन्दों को मुश्ते-ख़ाक मयस्सर..,
मुर्दों के हासिल में मुर्दा घर है..... 

मुस्तक़बिल = आगे आने वाले 

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हिज्र की शाम को वस्ले-सुबू जरूरी है..,  
सब्जे-चमन के गुल को रंगो-बू जरूरी है.., 
मैं तो लम्हा हूँ हर हाल में गुज़र जाऊंगा.., 
तेरी कुलफ़त का भी जिक्र कू-ब-कू जरूरी है.....  

गर्दे-ग़म ख्वार की नीम सियाही रातों को 
सुबुके चाँद हू-ब-हू जरूरी है
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हमारे वालिदे-मरहूम खुर्राट मिजाज के थे उनकी गर्बीली आवाज़ से सभी दहशत खाते थे 
अपने तअल्लुक़ा में वो अपनी दीगर सख्शियत रखते थे औ क़ादिर हो के भी वो सादा-पोश जिंदगी जीते
। जाहो-हशम से वो खुद भी फ़ासिला पे रहे , औलाद को भी परे रखा ..... 

------------------------------------------------------------------------------------------------------
सब्ज़ जमीँ के जर्रे बुनकर फर्श फ़रीदा बूटी किए..,  
बारानी वो लालो-गौहर शाख़ों-पाँख पे पोया जाए..... 
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एक रास बिहारी, स्याम सलौने ( भक्तिकाल ) 
एक रास बिहारी, सजन सलौने ( रीतिकाल ) 
एक रास बिहारी, गगन सलौने ( अधुनातन, छाया काल) 

एक मन चन्दन एक चारू चितवन सुकुमारी सुठि सुन्दरी । 
सरितांवरा सी रूप की रासि रतनारि रस की भरी ॥ 

कपोल अनुरागित बदन सुहासित मुखरि मुख त मुकुत झरी । 
नत दृग अंचल अध पुष्पित पुष्कल ह्रदय जगत की पहरी ॥ 

उदबाहिनी सिरु धरी  
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ज़िंदगी वो नहीं जो हर्फ़े-सैह में बयाँ होती हो.., 
सुब्हे-दम पैदा हो के शबे-नीम जवाँ होती हो.....

हर्फ़े-सैह = तीन अक्षर 
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सुब्हे पे फ़रेफ़्ता हो के शम्म फ़ना होती है..,
सफ़हे-हस्ती से उठ के रँगी हिना होती है..... 
 रँगी = सुन्दर
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सुखनदाँ जईफ़ है इन्तजार में अज़ल होगी.., 
इक सफ़ बाबस्त कहे वो कब ग़ज़ल होगी.....
जईफ़ = बूढ़ा 
 अज़ल = मौत 
 सफ़ बाबस्त = बंदिश 

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उरेब निगाह उस पे लब कुशाई तिरी.., 
मैं तंगे-हाल गिराँबार आशनाई तिरी..,
अहद अव्वल बाद ये तबाह करती है..,  
वफ़ा परस्त लगे फिर बेवफ़ाई तिरी..… 

उरेब = तिरछी 
अहद = वादे 
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- न ये उम्र फ़रेब होती न विसाले-यार होता.., 
न जाँ आसेब होती न दिल आज़ार होता..,

अश्कों के मोतियों से होके फ़राख़ दामाँ..,
खुशखूँ खरीद लेते कहीं उर्दू बाज़ार होता..... 

 

अपुनेधरमु चरन रति राखें । अहहीं दोषु कछु सबहि साखें । 
कालप्रतिकुलसोइ निबेरे । बिसुद्धात्मन सोधन केरे ॥ 

भावार्थ : -- अपने धर्म के चरणों में प्रीति रखनी चाहिए । कुछ न कुछ दोष प्रत्येक धर्म में होता है ॥ जो देश काल के विपरीत आचरण करें उन दूषित विचारों का परिहरण कर विशुद्धात्मान द्वारा उन्हें समय समय पर शोधित करते जाना चाहिए ॥ 

दृष्टांत : --  'बलि प्रथा अधुनातन काल के सर्वथा प्रतिकूल है" 

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विभाजन के पश्चात से ही हमने नेता-मंत्रियों की जीवन-शैली, चाल-चरित्र, क्रिया-कलाप ऐसे रहे,मानो हमने  किसी महंगे व्यसन को पाल रखा है.....
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भारत देश के लिए अभाव वर्षों से अभिशाप के सदृश्य रहा  | अब यह  इतना विवश हो गया है कि सत्ता इसे न केवल क्रय कर रही है अपितु अत्यंत अल्पार्घ/सहँगे में क्रय कर रही है.....  

अल्पार्घ/सहँगे में = सस्ते में  
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अक्षर जननी के अग्न्यालय में मसि धानी दे ज्वाल..,
वर्ण समिधा संयोजित कर मुख आवरण दे लाल.., 
अर्थ भाव की व्यंजना से हविरशन को योजित कर.., 
कथा हवन आयोजित कर मिटा तमोगुण का काल..... 
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सूर्योदय हुवे बिना अँधेरे दूर नहीँ होते..,
जले औरों के बल वो दीपक सूर नहीँ होते.....

दीप बरत कुन कुन करत, गहन रहे अँधियार ।
होत सूर जब असहमत, भये जगत उजियार ।१४५८।

भावार्थ : -- दीपक के असहमत होने से अंधेरे नहीँ जाते इस हेतु सूर्य बनना पड़ता है । जब सूर्य अँधेरे से असहमत होता है तभी संसार उज्जवल होता है ॥ एक प्रबुद्ध ने खा रात विधाता का एक दोष है । किन्तु यदि रात नहीं होती तो हमें चाँद तारे दिखाई नहीं देते हमें गगन के विस्तार संज्ञान  नहीँ होता, अर्थात अँधेरे का भी अपना महत्व है.....
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जिस देश के अधिकतर निवासी निर्धन रेखा के ऊपर-नीचे हो रहे हों, और किसी एक को  पृथ्वी का सबसे मूल्यवान भवन रचाने की अनुमति हो, फिर उस देश के  संविधान में उल्लखित प्रस्तावना की धज्जियां उड़नी तय है..... 
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तू आईना-ए-हिंद है के बदरू मुजस्सम कोई..,
तेरा अक्स उतरे मुझे हर आइना बदखू लगे.., 
तेरा नसीब सवारूँ आ तेरी सीरत को सजाऊँ.., 
इस कदर बनाऊँ कि तू वजाहते-वजू लगे.....

आईना-ए-हिंद = संविधान..... 
इसे खेतों में बैठाओ कोई आबशार उतारो.., 
फिर देखो आइना-ए- तस्वीर का रंग.....

 पहले मज़स्सम को संवारों फिर आइने बदलो..... 
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न्यायपालिका की स्थिति यह हो गई है कि सर्वोच्च न्यायालय मध्यम वर्ग की पहुँच से दूर हो गया, उच्चतम न्यायालय दूर होता जा रहा है, जिला एवं सत्र न्यायालय कठिनता से उपलब्ध है, अब  न्याय के दृष्टिकोण से निम्न वर्ग की स्थिति बेचारी हो गई है.....
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"उच्च एवं उच्चतम वर्ग को मध्यम बनाओ- गरीबी रेखा मिटाओ"
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शासन ने मध्यम वर्ग को दुधारू गाय बना दिया है जिसे वह दोह दोह कर निम्न वर्ग का पेट भरती है, और घास भी नहीं डालती..,हाँ उच्च एवं उच्चतम वर्ग को  राष्ट्रपति का  सजीला घोड़ा बना दिया है, जो बादाम खाता  हैं लात भी मारता हैं..... 
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काव्यात्मक शैली में यदि  अनाचार ( दुराचरण, बुराई, अयोग्य आचरण, भ्रष्टाचार, कुचलन, कुरीति अभद्रता, अविशिष्ट, आचारहीन ) एक रस है, तो विषयाभिरति उसका स्थायी भाव है.....  
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मक्का में इस्लाम के अतिरिक्त अन्य किसी धर्म अनुयायियों का प्रवेश वर्जित है, जगन्नाथ पूरी में हिन्दुओं के अतिरिक्त अन्य किसी धर्मानुयायियों का प्रवेश वर्जित है..... क्यों ? क्योंकि संसार में शुद्ध बनी रहे वह उत्थान की  ओर अग्रसर हो पतन की ओर  नहीं.....
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पाँच दिवारी दस दरवाजे एक, बानी को दरबार.., 
ता पर राजे म्हारो प्यारो, साँवरो सरकार री म्हारो स्याम जी सरकार..... 
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यक्ष : विपक्ष कौन है ? 
संविधान : जो हारे ।  
यक्ष : किन्तु तुम्हारी संसद में सब जीत कर जाते हैं ? 
संविधान :  @&#@?
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लड़की तो कई लोग भगा के लाते हैं, किन्तु लड़की भगा के लाने वाला प्रधानमन्त्री किसी देश के पास नहीं है,  केवल हमारे पास हैं...... 
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सत्ता, माया और पत्रकारिता इन तीन देवियों ने भारतीय संस्कृति को विकृत कर भारत को गर्त में धकेल दिया.....
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ये सत्ता धारी पार्टी पक्ष में रहे, विपक्ष में रहे अथवा कहीं भी रहे, ये अपना गाना सुनाती रहेगी, बाकी सारी पार्टियां ताली बजाती रहेंगी .....और इनकी मूर्तियां बनाती रहेंगी.....रे जनता..... जनार्दन, तू उसपर बैठे कौंवे ही उड़ाते रहियो..... 

सत्ताधारी  दल एक विचार है, संविधान उसके विचारों की पोथी है, जो हमारा धर्म ग्रन्थ है, हम सब दल इसके अनुयायी हैं.....what a foolishness.....?
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इस सत्ता धारी दल का आभामंडल इतना दिव्य है कि किसी भी विपक्ष ने उनसे यह पूछने का साहस नहीं किया कि 'गांधी जी' की ह्त्या उनके कार्यकाल में क्यूँ हुई, हिंसा रोकने के लिए संविधान में कोई प्रावधान क्यूँ नहीं किया,यह नहीं पूछा कि ये संविधान है.....
या सत्ता धारी दल के विचारों की पोथी.....: ) 
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जिस अहिंसा के बल पर सत्ता धारी दल ने अंग्रेजों से सत्ता हड़पी थी वही अहिंसा आज उन्हें 'बांटने की नीति' लग रही है और हिंसा 'एकता की प्रतीक'.....यह उस दल के विचारों की विकृति है..... 
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सरकारी नौकरी यदि भ्रष्टाचार की दूकान है, तो सत्ता उसकी फैक्ट्री है.....
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औद्योगिक घरानों को संरक्षण देने की दुष्परम्परा मोहन दास करम चंद गाँधी  ने ही प्रारम्भ की थी..... 
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बानिए की सुबह दूकान से शुरू होती है मकान पे ख़त्म होती है..... 
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राष्ट्र की उन्नति के लिए किसी प्रांत का विसर्जन किया जा सकता है, किसी प्रांत की उन्नति के लिए राष्ट्र का विसर्जन नहीं किया  जा सकता..... 



जलज परे जल जल हरे, जलज परे कर नेह । 
आपनि तौ जल जल बरे, जलज जलज करि देह ॥ ११८१। 

भावार्थ : -- सिंधु ऊपर पड़ता है तो ईर्ष्या वश उसका जल हर लेता है, चंद्रमा/कमल पर पड़ता है तो स्नेह काहे करता है ।  आप तो जल जल कर बर रहा है ,  देह को मुक्ता मुक्ता किए है॥ 
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वस्तु का दुर्मूल्यन एवं मुद्रा का अवमूल्यन एक शासक की बुद्धि एवं कौशलहीनता का परिचायक है..... 
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 "मुद्रा अर्थार्जन का साधन मात्र है....." 

'धन-संपन्न एवं साधन-संपन्न, दोनों में अंतर है" 
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 "एक बिगड़ा हुवा ब्राह्मण सम्पूर्ण राष्ट्र  का विनाश कर देता है....." 
           ----- ॥ विदुर-नीति ॥ -----
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भाषा विशेषज्ञ से रहित पांच सात 'लोगों' की समिति ने भारत का संविधान रचा तदोपरांत सैन्य शक्ति का प्रयोग कर उसे मानने हेतु बाध्य किया । फिर यह गणतंत्र कहाँ हुवा..... 

भारत विभाजन का उद्देश्य क्या था ? किसी को ज्ञात नहीं.....
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एक मंदिर को ध्वस्त कर मसीद का निर्माण एक मूर्खता है, फिर उस मसीद को ध्वस्त  कर वहां पुनश्च मंदिर का निर्माण दूसरी मूर्खता है ।  दोनों ही ईश्वर के घर हैं अत: दोनों का ध्वस्तीकरण अनीश्वरीय कार्य है..... 
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विद्यमान शासकीय योजनाएं निम्न वर्ग की पहुुंच से दूर होती जा रही है, खेद का विषय है कि हमारी खनिज सम्पदा, हमारा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर उच्च वर्ग की विलासिताओं हेतु व्यय हो रहा है.….
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यथार्तस लोकतंत्र बुद्धि के घोड़े पर ही संचालित होता है, सत्ता मूर्खता की रश्मियों से ही साधी जाती है..... 
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राजकोष का धन एवं समय नष्ट कर राजनयिक भारत आते हैं  । अयोग्य व्यक्तियों के वार्त्तालाप पर आधारित एवं संचार माध्यमों के द्वारा रचित  भारत की छद्म छवि को विलासिता पूर्णित नेत्रों के खांचे में खचित कर अपने राष्ट्र के नागरिकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, उन्हें मुर्ख बनाते हैं मूर्खता की इन रश्मियों से उनकी सत्ता सधी रहती है.…. 
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महत्वपूर्ण यह नहीं है कि आप अन्यत्र होता तो क्या  करते , महत्वपूर्ण यह है कि आप जहां है वहां से क्या कर सकते हैं..... 
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जम्हूरियत के पैरोकार महलों में नहीं रहा करते.....
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हिंदू फ़ारसी भाषा का एक शब्द है । यवनों का जब भारत में पदार्पण हुवा तब वे 'स' का उच्चारण ह' करते थे ( जैसा की इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है ) शनै-शनै सिंधू पार के निवासी हिन्दू कहलाने लगे ।  वेदोक्त विचारों पर आधारित आचार-विचार, रीति-नीति, सामाजिक व्यवस्था पर विश्वास करने एवं उसका अनुशरण करने वाले भारतीय हिंदू धर्म के अनुयायी कहलाए । 

हिन्दू धर्म वस्तुत:वैदिक धर्म है । 
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"साहित्य मानव मात्र की अनुभूतियों का अभिलेख है....."
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if one wants to recognize his mistake he should write a truthful biography.....
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विधि स्वरूप में रचित कोई नियम व् सिद्धांत उसकी निर्मातृ समिति एवं उस समिति के नियंता के व्यक्तिगत विचारों का पत्रपुंज ( पुलिंदा) भी हो सकता है.....
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निर्धनता धन से नहीं अपितु कारण एवं निवारण से दूर होती है..... 
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अधिनायक तंत्र नेता ,मुखिया अथवा अनियंत्रित शक्तियों के अधीन होता है । वर्त्तमान में प्रचलित तंत्र लोकतंत्र न होकर 'अधिनायक तंत्र' हैं.....

जनतंत्र में राष्ट्र के उचित अनुचित का निर्णय जनता करती है जबकि अधिनायक तंत्र में यह निर्णय नेता करते हैं.....
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 ज्ञानेंद्रिय, चित्त, बुद्धि एवं मन इन चार वृत्तियों  के योग से अंत:करण निर्मित होता है ।

ज्ञान सर्वत्रापि है,  किसी अध्याय अध्ययन कर  हम शिक्षित भी हो सकते है विद्वज्जन  भी हो सकते हैं ज्ञानी भी हो सकते हैं.....

द्रोणाचार्य ने अर्जुन को विद्या दी, विद्या ने उसे भगवान श्री कृष्ण के ज्ञान प्राप्ति की पात्रता प्रदान की.....अन्यथा भगवान दुर्योधन को ज्ञान न देते.....यदि देते तो महाभारत युद्ध ही नहीं होता.....यह दुर्भाग्य ही था ज्ञान की पात्रता पार्थ के पास थी.....

विद्या ददाति विनयं विनयादयाती पात्रताम् ।
 पात्रता धनमाप्नोति धनाद धर्म: तत: सुखम् ॥

अर्थात  विद्या ज्ञान-योग हेतु  पात्र बनाती है.....
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"राष्ट्रवाद का समर्थक विभाजन का पक्षधर नहीं होता....."
"विभाजन वस्तुत: एक विप्लव वादी मानसिकता है....."
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जलचर थल चर गगनचर देउ दनुज नर नाग । 
उत्तममध्यम अधम खल, दस गुन बढ़त बिभाग ॥ 
 ----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : -- त्रेता युग के सन्दर्भ में गोस्वामी तुलसी दास जी कहते हैं : -- जल में रहने  वाले, थल में रहने वाले, आकाश में उड़ने वाले जीवों तथा देवता, राक्षस, मनुष्य और नाग  - इन सब योनियों में उत्तम की अपेक्षा मध्यम, मध्यम की अपेक्षा अधम और अधम की अपेक्षा निम्न- हिंसक प्राणियों की संख्या दसगुनी अधिक हुई जा रही है अर्थात उत्तम अतिशय कतिपय ही हैं ॥

इस दोहे से यह सिद्ध हो रहा है कि : -- त्रेता युग में सिंह मनुष्य के एवं मनुष्य सिंह के अनुपात में थे ।

टिप्पणी : -- वर्त्तमान समय में जीवों में सर्वोत्तम योनि अर्थात मनुष्य बहुंत अधिक हो रहे हैं तथापि प्राकृतिक असंतुलन गहरा हो गया है ।

कलियुग में मनुष्य के पश्चात याद कोई उत्तम योनि है तो वह गौ है । यदि एक मनुष्य के सापेक्ष दस गौवें हो तब पृथ्वी पर पोषण एवं ईंधन की समस्या ही नहीं रहेगी । प्राकृतिक दोहन अत्यधिक न्यून हो जाएगा । करना क्या है.....?गौवों  का संवर्द्धन और उनके चारे का प्रबंध ॥
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सफलता अर्जित करना सरल है, सफलता अद्यतन रखना अत्यंत कठिन है..... 

"सत्य की विजय किंचित.....विलम्ब से होती है....."
 -----॥ भगवान श्रीकृष्ण ॥ -----
विकास करना सरल है, विकास अद्यतन रखना अत्यंत कठिन है.....

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नेता-मंत्रियों को अगले चुनाव की चिंता रहती है, बुद्धिजीवियों को अगली पीढ़ी की.....
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जन्म एक संयोग है, मृत्यु अवश्यम्भावी है..... आत्मा को यदि मनुष्य का शरीर प्राप्त हो जाए तो यह सुसंयोग कहलाता है.....
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कुटिल वृत्ति एवं कुचलिता, किसी राष्ट्र को अनैतिकता एवं अन्याय के पंथ की ओर ले जाती हैं.....
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यह विश्व का दुर्भाग्य ही है की विद्यमान समय में 'विकसित देशों' एवं इनके अनुगामी देशों के पास अपना भविष्य सहजने की कोई योजना नहीं है..... 
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किसी राष्ट्र के जनसंचालन तंत्र का कौशल यदि पराया हो उसकी  ऊर्जा समाप्ति की ओर हो,  तब उसकी बुद्धि स्वत: ही घुटने में आ जाती है.....
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अवशेष चिन्ह बता रहे हैं यह भवन कभी वैभव से प्रदीप्त था,
वैभव से प्रदीप्त भवन प्राय: अवशेष चिन्ह बन का रह जाते हैं.....
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रंगमंचीय लट्टुओं के प्रकाश में कायर भी वीर बन जाते हैं.....
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 ----- || अज्ञात ॥ -----
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अच्छाइयों को बुराइयों के अधीन होना ही पराधीनता है.…. 
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उद्योग जगत जीवों के जीव-साधन छीन कर उन्हें जीवन हेतु देने का आश्वासन देता हैं..... 
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"भाषा भावों को प्रकाशित करने का साधन है,परिभाषा प्रकाशित भावों का संतुलित परिचय देकर उसके स्वरूप को स्पष्ट करती है....." 
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हमें संविधान से भय लगता है..... 

"जब किसी नागरिक को संविधान  से ही भय लगता हो तो वह राष्ट्र स्वतंत्र नहीं होता.....'
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जनतंत्र में मताधिकार का प्रयोग साधारण जन समूह से जनाधिन के चयन की अपेक्षा जनाधिन जनसमूह से ऐसे साधारण जन सेवक हेतु होना चाहिए जो अपनी निःस्वार्थ सेवा द्वारा उस समूह के निवासित राष्ट्र को अनुशासित व् व्यवस्थित करे..... 
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यदि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता..... तो प्रत्येक मनुष्य को  किसी न किसी धर्म का अनुयायी होना चाहिए.....

यदि किसी मनुष्य को अपना धर्म पता न हो तो क्या वह आतंकवादी है.....?  
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- भारत राम-कृष्ण की जन्म भूमि के लिए विख्यात है, नेहरू -गांधी के लिए नहीं.....

भारतीय चुनाव प्रणाली में मतदान का अर्थ मुट्ठी भर लोगों को राज करने की अनुमति देना है..... 

चुनावी रंगमंच के लट्टुओं से निर्धन घर के अँधेरे दूर नहीं हुवा करते..... 

जहां विधि के विरुद्धाचरण संदर्शित हो वहां शासन का यह कर्त्तव्य है कि वह प्रशासन को अनुशासनात्मक कार्यवाही हेतु आदेशित करे नं की पृच्छा  परीक्षा करे.....

शासकों की राजसी जीवनशैली के कारण ही भारत का प्रत्येक चौथा बच्चा कुपोषित है । अतिथि राजाधिपों के ऐतिहासिक स्वागत समारोह प्रत्येक तीसरे बच्चे के कुपोषण  का कारण बनता है.....
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एक राजाधिप की उपस्थिति यदि किसी देश ( स्थान ) को असुरक्षित करती हो तो उस राजधिप का यह कर्त्तव्य कि वह सभ्यत्व का परिचय देते हुवे उस राष्ट्र के आतिथ्य को अस्वीकार कर दे..... 

भारत में नेता राम राम कर सिंहासन तक पहुंचते हैं, मैं मैं कर आरूढ़ होते हैं, और मरा मरा कर पतित होते हैं.....

भारतीय संविधान को पढ़ कर ऐसी अनुभूति होती है जैसे आधी क़ुराने-पाक़ पढ़ ली हो.....

भारतीय संविधान मौलिकता की प्रस्तावना कर अमौलिक हेतु विशेष उपबंध करता है, यह इसका दोहरा चरित्र है.....

" अवैधानिक उपनिवेश ऐसी वस्तियाँ  हैं जहाँ  आपराधिक प्रवृत्ति व् आतंक का वास होता है यह विश्व विदित हैं....."

भारत में सभी चुनावी दल धरनों से ही उपजे हैं महाराज का कहना है कि ऐसे धरने देश को अराजक अर्थात राजा से रहित कर देते हैं यदि ऐसा है तो फिर इन दलों को जंगल में नक्सालियों के साथ होना चाहिए । संविधान में विहित चुनाव प्रणाली दलगत है व्यक्तिगत नहीं प्रश्न यह है कि महाराज को कहाँ होना चाहिए.....?  

" आत्महत्या यद्यपि एक अपराधिक कृत्य है तथापि वह  दंडनीय नहीं है ॥ यह एक समस्या है कार्य कारन व् निवारण ही इसका समाधान है "  

क्या देश के भण्डार इन पांच सात सौ लोगों के नियंत्रण में होंना चाहिए.....ये अपनी क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिए भारत को पूर्णत: 'ऐय्याश-इंडिया" बना देंगे तो फिर किसी महमूद गजनी व्  ईष्ट इंडिया कम्पनी को यहां पहुंचते देर नहीं लगेगी..... 

मुस्लिम विवाह, व्यक्तिक, वक्फ़ आदि अधिनियम का संग प्राप्त कर भारतीय संविधान ने गुप्त रूप में भारत को अर्ध इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर दिया । यह इस राष्ट्र का दुर्भाग्य रहा कि जिसने भी इस पर राज किया उसने इस घोषणा का जयघोष किया.....

भारत की जनसंख्या चाहे दस बीस खरब क्यों न हो जाए एक मुस्लिम को चार विवाह करने का अधिकार दिया गया है मुस्लिम विवाह अधिनियम में.....शेष सब को केवल मात्र एक.....  

" निकृष्ट कर्म के त्याग से ही मनुष्य उच्चतम स्थान प्राप्त करता है....."

स्वस्थ लोकतंत्र की चुनाव-प्रणाली में यदि चयक सभासद हेतु चयन न करे तो सर्वप्रथम साधारण बनना चाहिए .....

क्या कोई राष्ट्र अथवा राष्ट्र- समूह भारत के मित्र हैं, शत्रु हैं, तटस्थ हैं  ? हैं तो कौन कौन नहीं तो कौन । यदि कोई राष्ट्र शत्रु है तो  उसे किसी भी राष्ट्रीय-समारोह में आमंत्रित किया जाना चाहिए.....?  

यदि कलुषित योनिज  देश चलाएंगे तो ये देश एकदिन आतंकवादियों को हस्तांतरित हो जाएगा.....

उन्हें कुलीन ( पवित्र ) होने में फिर एक सहस्त्र वर्ष लगेंगे..... 

मुट्ठीभर विलासित वंशवादियों के हाथ से यह भारत हिंदुस्तान कहलाता हुवा यमन के हाथों हस्तांरित हो गया, फिर कई आए कई गए अंतत: मुगलों की  विलासिता  ( ऐय्याशी ) कारण यह  इंडिया कहलाता हुवा अंग्रेजों  के हाथों हस्तारंतरित हो गया । अब यह साइनिंग इंडिया, इनक्रेडिबल इण्डिया कहलाता हुवा कलुष-योनिज के हाथों में है । ऐसी विलासित में पता नहीं अब इसे कौन क्या कहलवाकर हस्तांतरित कर ले.....  

अपवाद को छोड़ दें तो भारत की स्थापत्य कला मुट्ठीभर  यमन के विलासिता का  ही परिणाम है । और ये उद्योग मुट्ठीभर अति उच्च धनीवँत की विलासिता का ही परिणाम है | सौ दो सौ वर्ष पश्चात जब ऊर्जा के स्त्रोत समाप्त हो जाएंगे तब हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इनपर थूकने जाया करेंगी.....

आवश्यकताएं रचना को समाप्त कर देती हैं,  विलासिता कल्पना शीलता को.....  

वर्त्तमान में शिखर सम्मेलन, सम्मेलन न होकर लोकतान्त्रिक राष्ट्र प्रमुखों की राजसी जीवन शैली का भौंडा प्रदर्शन बन कर रह गए हैं..... 

उद्योग जगत, नेता जगत, चित्रपट जगत, जन सामान्य की अति आवश्यकता, विलासिता, व् महति आकंक्षाओं का ही दुष्परिणाम है.....

वर्त्तमान में शिखर सम्मेलन, सम्मेलन न होकर लोकतान्त्रिक राष्ट्र प्रमुखों की राजसी जीवन शैली का भौंडा प्रदर्शन बन कर रह गए हैं..... 

 यह कुव्यवस्था का ही परिणाम है कि भारत में मदिरा अघोषित रूप से राष्ट्रिय-पेय घोषित हो गई है.....

दहशत गर्दी दुनिआ भर के हुक्मरानों की शाही-बाश और शहवत परस्ती का ही नतीजा है । यदि यह ख़त्म हो जाए तो दहशत गर्दी ख़ुद-बख़ुद ख़त्म हो जाएगी.....

तवारीख की तारीख़ों में यह जरूर दर्ज़ होगा कि एक जम्हुरूयत का सुल्तान था जो शाही महलों में रहता था। एक दहशत गर्दी का आक़ा था, चार-पांच कमरों के मकान में जिसकी बशर थी.....

पंचगव्य : -- एक गुणकारी औषधि है जो रोगों के  कारकों एवं महापातक दोषों को नष्ट करने में सहायक होती है । देसी गौ का मूत्र, गोमय, दुग्ध, दधि, घृत एवं कुशा से मार्जित जल युक्त मिश्रण को शास्त्रकारों ने  पंचगव्य कहा है । तीन भाग गोमय, तीन ही भाग दुग्ध,  दधि, एक भाग घृत शेष कुशाजल होना चाहिए । विष्णु धर्म में कहा गया है कि जितना पंचगव्य बनाना हो उसका आधा अंश गोमूत्र का होना चाहिए अर्थात  उक्त मिश्रण के समानुपात ही गौमूत्र होना चाहिए 

गोमूत्रं गोमय क्षीरम् दधि सर्पि कुशोदकम् । 
पंचगव्यमिदम् प्रोक्तम्महापातक नाशनम् ॥ 
 ----- ॥ वशिष्ट संहितायाम् ॥ -----

यह कैसी विडंबना है,यहां चुनाव में विजित प्रत्याशियों के  नाम घंटे भर में घोषित हो जाते  है,, और देश को बेच कर खाने वालों के भेद चिता में जल जाने के पश्चात भी उजागर नहीं होते.....

हम जब हाड़तोड़ परिश्रम करते हैं.....अपने बच्चों का पेट काटते हैं, धरती अपनी छांती फाड़ती है  तब कहीं जा कर देश का राजस्व एकत्र होता है...जो इन न्यायाधीशों की बहु बेटियों को सम्मान जनक जीवन प्रदान करता है.....कितने दुःख की बात है कि यही न्यायाधीश हमारी बहु बेटियों के लिए अश्लीलिलता का  नाच घर खोल रहे हैं.....

धर्म-जाति को न मानने वालों के लिए ये तीज त्योहार नहीं है.....उनके लिए न्यू ईयर है, वेलन्टाईन डे है.....और हाँ विश्व एड्स दिवस भी उन्हीं के लिए है.....

जो दुखी दिखाई देते हैं वो सदैव सुखी रहते हैं, जो सुखी दिखाई देते हैं वे सदैव दुखी रहते हैं..... 
और जो दिखाई ही नहीं देते वो .....? न दुखी रहते हैं न सुखी रहते हैं.....वो तो दुःख-सुख से परे होते हैं.....  

बम-सम रखने किसी और को आते होंगे.....फोड़ने तो हमें ही आते हैं.....  

राजू : -- ए फ़ौजी तनिक  दिखाओ तो इको दुइ फोड़ के.....एतना मोटी मोटी पगार काहे के लेते हैं.....बम फोड़ने के ही तो लेते हैं..... 

जो दुखी दिखाई देते हैं वो सदैव सुखी रहते हैं, जो सुखी दिखाई देते हैं वे सदैव दुखी रहते हैं..... 

और जो दिखाई ही नहीं देते वो .....? न दुखी रहते हैं न सुखी रहते हैं.....वो तो दुःख-सुख से परे होते हैं.....  

>> यदि चयनित प्रतिनिधि बलपूर्वक अथवा जनमत संग्रह से किसी क्षेत्र की भूमि अधिग्रहित कर उस अधिकरण को भूमि स्वामी के हित में कहें तो  उक्त क्षेत्र में प्रवेश करने पर ऐसे प्रतिनिधि के प्रति  उसी प्रकार व्यवहार करना चाहिए जिस प्रकार किसी देश के सीमांत देश द्वारा उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करने पर किया जाता है.….

हमें ऐसे काम करने चाहिए कि हम पर दूसरे गर्व करें हम स्वयं पर नहीं.....

गौ वंश एक ऐसा वंश है जिसमें सम्पूर्ण पृथ्वी के पालन पोषण की शक्ति निहित है । उसके अमृत पोषणहार है शकृत जलावन सहित सम्पूर्ण वनस्पति हेतु प्राणप्रद है वनस्पति  जीव जंतुओं का आश्रम है.....

भारतीय लोकतंत्र का पंछी मुग़लों व् अंग्रेजों के पिंजड़े में पलता है..... 

" जीव-जगत की सुरक्षा में मानव जगत सुरक्षा निहित है....."  

" जीव-जगत के प्रति हिंसक आचरण हिंसा का प्रथम चरण है....."  

धार्मिक ग्रंथों का पाठ स्पर्धा का विषय नहीं होना चाहिए.....

अपनी स्थिति में स्थिर रहना राष्ट्र- वाद है,  देश-धर्म  की सीमाओं का उल्लंघन ही अराष्ट्रवादिता है.....

वैधानिक चेतावनी : -- पापमय कृत्य से अर्जित धन-कोष व् धनकामी समस्त विश्व के स्वास्थ के लिए हानिकारक होते हैं.….

धनकामी = धन के लिए कुछ भी करने वाले

" पृथ्वी समुद्र में तैरती हुई नौका के सदृश्य है.…."
     ----- ॥ पद्म पुराण ॥ -----

----- ॥ खाल खाए खींच के- खोटे काम नीच के ॥ -----
 -----॥  जीवों का संरक्षण हो -आरक्षण नहीं उन्नयन हो ॥ -----
----- ॥  सबके मुख निवास है - विकास नहीं वो विनास है ॥ -----
----- ॥ जहाँ न कोई दास हो - वैसा ही विकास हो ॥ -----

माँसाहारी मानसा परतछ राकस अंग । 
ताकी संगती मति करो, पड़े भजन मैं भंग ॥ 
 ------ ॥ संत कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- मांसाहारी मानव को प्रत्यक्ष राक्षस ही समझना चाहिए ।  उनकी संगती नहीं करनी चाहिए कारण कि उससे  भक्ति भजन की हानि होती है ॥  

स्वप्न अचेतन मस्तिष्क के चिन्ह है, विश्वास अंधा  न हो ,   विचार ऊँचे हों निर्णय न्यायपरत हो,  मृत्यु को लक्ष्य करता सफल जीवन हों.....

 " अधर्म को धर्म में प्रवृत्त करने वाले धार्मिक-ग्रन्थ का प्रथम अध्याय अहिंसा है....."


धर्म मनुष्य को श्मशान तक ले जाता है और उसे सद्गति प्रदान करता है.....

इस्लाम संविधान के अनुसार नहीं चलता अपितु संविधान को अपने अनुसार चलाता है.....


मनुष्य जाति पशुओं का संघटनात्मक रूप है, जाति मनुष्य का संघटनात्मक स्वरूप है जाति के विघटन से समाज व् समाज के विघटन से राष्ट्र विघटित होते हैं.....

पशुओं को मर्यादाएं नहीं भाती जिसे मर्यादा नहीं भाती वह मनुष्य पशुतुल्य है..... 

जाति मनुष्य को मर्यादित करने का व् धर्म उसे अनुशासित करने का उपकरण है.....

हिन्दू, इस्लाम, कैथोलिक आदि धार्मिक सम्प्रदाय हैं धर्म नहीं है.....

 उपासना पद्धति की भिन्नता के कारण ये भिन्न हैं.....

आतंकवाद राष्ट्र के विरुद्ध किया जाने वाला अपराध है व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के विरुद्ध नहीं.....

मनुष्य का विज्ञान मनुष्य के लिए ही है, ईश्वर का विज्ञानं समस्त सृष्टि के लिए है..... 

 पृथ्वी का कालमान एक  पर्वत व मनुष्य का जीवन काल उसके चार कणों के समतूल्य है । शयनावस्था को मरणावस्था के समान  माना जाता है,अत: दो कण प्राप्त होकर भी अप्राप्य हैं इस अल्पावस्था में भी वह धन-सम्पदा, स्त्री और भूमि के लिए न केवल पृथ्वी प्रत्युत इस सृष्टि को नष्ट करने के उपाय करता आया है..... 


जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम में यह तर्क दिया गया कि भारतीय परिवार नियोजन नहीं करते इसलिए कीड़े-मकोड़े जैसे हैं । बहुतेरे कलिसाइयों के परिवार ही नहीं होते  फिर ये कीड़े-मकोड़े जैसे क्यूँ हैं ?

युद्धकाल में कागदी टुकड़ों के बदले धन मिले तो उसे प्राप्त करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए.....

विश्व का शासन प्रबंधन जब अयोग्यता को हस्तांरित होता है तब सर्वत्र अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है । जब यह विलासिता से परिपूर्ण होती है तब राष्ट्रों का दमन करने के लिए भयोत्पादक शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है जो भय मिश्रित आतंक के वातावरण का निर्माण करती है । अयोग्यता व् विलासिता की निरंतरता से इनकी जड़े सुदृढ़ होती जाती है.....

 अनुशासन हीनता को ही शासन की आवश्यकता होती है ।हमें शासित करने  के लिए चार व्यक्ति प्रस्तुत कर दिया जाता है जब अनुशासन की आवश्यकता उनको हमसे अधिक हो तब हमें उनका चयन न कर
"अधिकतम अनुशासन न्यूनतम शासन"  के सूत्र का परिपालन करते हुवे अधिकाधिक अनुशासित होकर  ऐसी चुनाव पद्धति अथवा शासन पद्धति को परिवर्तित करने के विषय का चिंतन करना चाहिए.....

संसार में धर्म का राज हो, इस हेतु मनुष्य को चाहिए कि वह सदैव धर्म के लिए ही राजनीति करे.....

शाकाहारियों का विरोधी संविधान धर्म के निरपेक्ष व् अधर्म के सापेक्ष ही होता है इससे सुख-शांति की अपेक्षा न करें.....

जहाँ अर्थ प्रधान हो जाता है वहाँ शिक्षा गौण हो जाती है.....
यह संसार ईश्वर की कृति है,यहाँ कुछ भी अनुपयोगी नहीं है.....
क्रूरता सदैव अवैध ही होती है,जहाँ यह वैध होती है वस्तुत: वहाँ कोई विधान नहीं होता.....

"किसी देश अथवा प्रदेश की विधि के अतिक्रमण से अन्यथा जीवन के अधिकार का अतिक्रमण कर किसी जीव को शारीरिक,मानसिक व साम्पत्तिक क्षति पहुंचाना वास्तव में अपराध है....."


इस अनुक्रम में >> चिड़िया के घोसले को क्षतिग्रस्त करना अपराध है.....

"लोकतंत्र तब असफल सिद्ध हो जाता है जब वह भयोत्पादक उपायों का अवलम्बन करने वाली राष्ट्र विरोधी शक्तियां द्वारा संचालित होता है....."