Monday, 16 March 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड २९ ॥ -----

सोमवार  १६ मार्च, २०१५                                                                                                  

जसु संग हमरे जग जागिहि । भए अस बंसज भा बड़ भागिहि ॥ 
करात पितु जान कहत पुकारे ।लेइ जनम कुलतारन हारे ॥ 

भयऊ एकु इतिहास पुराने । एही बिश्यन महँ कहहि सयाने ॥ 
 उदाहरित एही प्रमुख प्रसंगे । भए जो मिथिला पति के संगे ॥ 

एक बार के भयऊ ए बाता । जनक जोग सोन तज निज गाता ॥ 
तेहि अवसरु मुख सोहि आना ।कंकनिक कलित एकु बेमाना ॥ 

तुरतै तेजस देहि सँजोही । धरमधुरज बैमान बरोही ॥ 
सबक मन बहु बिसमय भयऊ । तजइत तन उठाउ लए गयऊ ॥ 

गमनत मिथिलापति पंथ , संजमनि पुरी आए । 
कोटिक कलुख चेतस तहँ,नारक भोगत पाए ॥

मंगलवार ,१७ मार्च, २०१५                                                                                               

जनक देहि पौ परस पवाई ।बिक्ल नारक बहुंत सुख पाईं ॥ 
धर्म धुरज चलेउ जब आगे ।भय बस सबहि चिक्करन लागे ॥ 

नारक मोचन चाह सँजोई । जनक बिछोहु चहहि न कोई ॥ 
द्रवित कंठ करि करून पुकारे । कहाँ चले हे नाथ हमारे ॥ 

 परस बिस्तारि तुहरे देही । हमहि सो बाहि बहुँत सनेही ॥ 
सुनत नारकिहि जीउ पुकारी । करुनाकर नृप मन भए भारी ॥ 

उर उदधि उद उदक उदकायो । लोचन पटल  घनहि घन छायो ॥ 
चेत मनस बहु सोच बिचारै । मोर बसाहि ए जीउ सुखारे ॥ 

अजहुँ सों एहि जम नगरी, होहिहि मोर निबास । 
जहँ को सुख साँस लहि सो  मम हुत सुरग सकास ॥ 

बुधवार, १८ मार्च, २०१५                                                                                         

बहुरि मिथिला नगर के केतु । दुखित नरक जीउ के सुख हेतु ॥ 
दया भाउ हरिदै परिपूरे । होरिहि जम दुआरि के धूरे ॥ 

तेहि समउ सो दुखद दुआरे । जमराष्ट्र के पुरुख पधारे ॥ 
सत कृत करता पुरुख बिसेखे । मिथिलापति निज सौमुख देखे ॥

ठाढ़ि जनक चढ़ उडन खटोले।  परे बिहँस अस करकस बोले ॥ 
सिरोमनि हे धरम धुरीन के । भए दयाकर दारिद दीन के ॥ 

कहौ इहाँ तुअ कैसेउ आए । एहि अरगल तुम्हरे जुग नाए ॥ 
हतत हनत के पाप अपारा । अहइँ तेहि हुँत नरक दुआरा ॥ 

सुरग दुआरि जुहारि किए धर्मी तुहरे सोहि । 
इहँ के अगन्तु सोए जो, जीव जगत के द्रोही ॥ 

बृहस्पतिवार,१९ मार्च, २०१५                                                                                     

साधु समाजु न जाकर लेखा । धर्म पुरुख जासु न रेखा ॥ 
जो हत चेतस भए हिंसालू । एहि सदन तेहिं हुँत भुआलू ।। 

कर्पूरंक कलंक लगावहि ।पर्धन लूट खसोटत खावहि ॥ 
पति कुल बती पद रति बत सती । देँ गह निकार निबेरत गती ॥ 

भोग के बस्तु जिन हुँत नारी  । आए इहाँ सो पापाचारी ॥ 
अति आचरन करिहि जो पामर । आए चरत  पापाधम एहि घर ॥ 

कालस धन के लालस पासा । पापमित मित देइ जो झाँसा ॥ 
उदर परायन देइ न दाने ।अस पापधि परेउ इहँ आने ॥ 

मोरे दंड पाँस कंठनि कर ।पाइहि पामर पीर भयंकर ॥ 
बितथाभिनिबेसि मूढ़ि मानस ।दम्भि बिद्वेष उपहास बिबस ॥ 

मनसा बाचा कर्मना, सुमरै नहि श्री राम । 
काया सोन मद मोहना माया केर प्रनाम ॥

शुक्र/शनि ,२०/२१ मार्च,२०१५                                                                                                 

तेहि पापक बाँध ले आवा । बहोरि मैं भलि भाँति पकावां ॥ 
जेहि  नारकी पीर निबेरे । सुमिर उर नाउ रमा पति केरे ॥ 

धर्म प्रयाण सोए सुखारे ।पार गावं मम सदन दुआरे ॥ 
द्युति गति गम बैकुंठ जावैं । सत कृत संग परम पद  पावैं ॥ 

एहि मनुज  देहि बहु  पाप भरे ।एक राम नाउ पौ पबित करे ॥ 
जो रसरी नहीं जपनी हरे । सो पापधी इहाँ आन परे ॥ 

 दूतक पापक लेइ अनाई । तुअ सम दीठ न देइ दिखाईं ॥ 
ऐतद नृप गवनउ इहँ संगे । सब बिधि सुखप्रद भुअन प्रसंगे ॥ 

रह सबहिसुख भोग उपजोगिहु । मरनि लोक के सत्कृत भोगिहु ॥ 
 जनक पालक कन कंचन लोले । अरु अबरुधित कंठ सों बोले ॥ 

दुःखार्त जीव पुकारत, उमरे दया अतीव । 
अस कह कन कंचन झरे, तज लोचन राजीउ ॥ 

रविवार,२२ मार्च २०१५                                                                                             

कहए जनक सत कहि सब तोरे ।सुनौ नाथ एक गदनहु मोरे ॥ 
दरस नारकी दुःख जीमूता । होत मम हरिदै द्रवीभूता ॥ 

मम तन पौ तीन बहुंत सनेही । इहाँ बसन के कारन ऐही ॥ 
आरत जीउ जब मुकुति दइहौ । मोहि सुरग पयानत पइहौ ॥ 

धर्मराजु अस कृत कल्याना । होहि सुखद तव दास पयना ।। 
पलक होर बोले जम राजू । एहि जो तुहरे सोहि बिराजू ॥ 

आपन हित करता हितु संगे ।किए ए पामर बलात प्रसंगे ॥ 
रहेउ जिन सहुँ परम प्रतीती । हित संगत जस हितु की प्रीती ॥ 

लोहू संका नरक लवैया ।बरस सहस दस देत कढ़ैया ॥ 
सूकर जोनि  दे तदनन्तर । करिहउँ नपुंसक दए जोनि नर ॥ 

अबरु ए पामर.....पापधी, पर तिअ नेकहि बार । 
कूट कुटिल कुदीठ करत, भरे अंक बरिआर ॥

 तापित तोए एहि तिराइहि ,कंठनि पासक कास । 
अपनी करनी भुगत किए प्रतिछन मोचन आस ॥ 



सोमवार, २३ मार्च,२०१५                                                                                                    

अरु दरसिहि सहुँ जो कर जोरे । कुबुद्धिन कुकरम किए न थोरे ॥ 
पर धन सम्पद दीठ धरावै । सेंध लगावै लेइ चुरावे ॥ 

ऊँचे पद न लहै ऊँचाई । नीची करनी नीच कहाई । 
अबरु भाग जो आपहि भोगए । पूअ सोनित नरक तिन जोगए ।। 

बसे पापि तहँ अस उद बासे ।पिसि पाचक बसि पूअ सकासे ॥ 
अरु एही खल किए अस खोटाई । तेहि  करनि मुख बरनि न जाई ॥ 

आए घर जो अतिथि सम देवा । एही पोचक पति करे न सेबा ॥ 
अस कारन एही प्राण बिजोगे । भयउ तामिस नरक के जोगे ॥ 

भाड़ भीत भर भँवर भयंकर ।स्तक बरख दुःख सहिहि ए पामर ॥ 

ए सठ मुख पराए जनन्हि, निन्दत नहीं लजाए । 
जो को निन्दित बचन कहै, श्रवनए कान लगाए ॥ 



मंगल/ बुध ,२४/२५  मार्च,२०१५                                                                                                                                                                                   

एहि दुहु सठ बंगिहि हे भूपा । दुःख लहत परेउ अंध कूपा ॥ 
दरसिहि जो उद्बेग बिसेखे । हिती हंतत जान बिदबेखे ॥ 

धरे अबरु बिध्बंस के मंसा । करे आपहि गेह बिध्बंसा ॥ 
मरतहि रौरव  नरक अनाई । भाभरी भरे भाड़ भुँजाई ॥ 

एहि सब सठ किए पाप अपारा ।  भोगत छुटिहहि नरक दुआरा ॥ 
कृति सत्कृत तुअ धरम सँजोइहु ।  एहि हुँत इहँ के जोग न होइहु ॥ 

अजहूँ मोर कही सत मानौ । नरनागर बर लोक पयानो ॥ 
मिथिलापति पुनि पूछ बुझाईं । नाथ कहौ अस कोउ उपाई ॥ 

दुखी जीव अस सोहि हमारे । होइहि कास तिनके उद्धारे ॥ 
जनक बचन सुन जम पत कहहीं ।एहि पापक हरि चरन न गहहीं ।। 

तापर निज करमन कोष अस अस पाप सँजोहि । 
कहौ आपही मोहि एहि नरक मुकुत कस होंहि ॥  

सिद्ध सयान जनक जुग पानी । पूछे जम पति सोहि सुबानीँ ॥  
करौं जहँ कस कवन अनुठाने ।  तरपत जिउ मोचन सुख दाने ॥ 

पुनि जम ऐसेउ जुगति कहेउ । नाहु जो तुअ मोचनहि चहेउ ॥ 

निज कृतफल तिन्ह दे दीज्यौ । कवन सत्कृत सो सुनि लीज्यो ॥ 

एक समय जब भयऊ प्रभाता । बिभउ छयत निज ढरकिहि राता ॥ 
उठेउ  तुअ सो नाउ ध्याना । जो जग महत्तम पाप नसाना ॥ 

मुख जो रामहि राम उचराएँ ।  एहि पापधी ओहि पुन  धराएँ ॥ 
जमनाहर जस अस  कह पारे । बहुरि जनक तीन देइ उदारे ॥ 

 जीवन भर जो धरम सँजोईं ।  देत जनक कछु सोच न होईं ।। 
कहत जाबालि बहुरि भुआला । दुखित जीउ छुटिहहि तत्काला ॥ 

दिब्य देह धारन करे,बोले हे महराए । 
भाई कृपा बहु आपनी,दुःख सों  हमहि छढ़ाए ॥ 

प्रत्येक रसोई एक नरक  है और प्रत्येक घर एक स्वर्ग है..... 

बृहस्पतिवार २६ मार्च २०१५                                                                                            

पाए परम पद नाथ कृपालू । तुहरे हरिदै बहुंत दयालू ॥ 

छूटे प्रानि  नरक  के पासे  । गहै रूप जस सूर बिभासे ॥ 

दरस तेहि निज नयन झरोखे । जनक मनहि मन संतोखे ।। 

 हृदय हरि कर मुख हरि नामा ।चले सकल बैकुंठ धामा ॥ 

दुखित जीव के होत बिदाई । जनक बहुरि जम पूछ बुझाई ॥  
पाप करम कर कोष लहेऊ । आए नरक यह तुअहि कहेऊ ॥ 

रहे रत धरम बारता माहि । सो नर नरक पुर आवहि नाहि ॥ 
केहि तापा केहि संतापा । आन भयऊँ कृत केहि पापा ॥ 

तुम् जम तुम धर्मिनु पुरुख  दौ मोहि ए ग्यानु । 
करे करम कारन सहित बिहान संग बखानु ॥ 

शुक्रवार,२७ मार्च,२०१५                                                                                               

 मैं निर्बुद्धि मोहि बताऊ । अप कृत कारन कह समुझाऊ ॥ 
धर्म राज अस बचन उचारीं । राजन तव सब कृत सत सारी ॥ 

तुम् रघुबर के परम सनेही । तुहरे सम कृत करे न केही ॥ 
तुम भँवरे प्रभु पद अरविंदा ।तुम रसिक प्रभु रूप मकरंदा ॥ 

चहरे जस जिमि पावन गंगा । पापन्हि पाप मलिनी रंगा ॥ 
गंग बिंदु जिन रसन रसावै ।सकल मलिन मल पल पबितावै ॥ 

तव जस गायन जस रस धारा ।जो अवगाहि सो पाएं पारा ॥ 
तथापि एकलघु अघ गोसाईं । संजमनी पुर लेइ अनाईं ॥ 

एक समऊ तुम्ह बिचरत भरेउ रूप अबुद्ध  । 
चरती चातुरि अस्तनी चरन करे अवरुद्ध ॥ 

शनिवार२८मार्च २०१५                                                                                         

ऐसेउ दोष किए जो कोई । नरक दुअरिआ दरसित होई ॥  
अपने कृतफल  देइ उदारे ।एहि कर दूरए  दोष तिहारे ॥ 

लहेउ कृतफल बिबिध प्रकारा । कर्म कोष भर धर्म अपारा ॥ 
 अजहुँ एहि हेतु सुरग दुआरे । नाहु तिहारे पंथ निहारे ॥ 

हम अजान प्रभु अंतरजामी । धर्म पूँज के जान  स्वामी ॥ 
दुखी जीउ दुःख हरन गोसाईं । संजमनी पुर तोहि पठाईं ॥ 

पर नरक जो दीन दुखारे ।गहि सुख सम्पद आन तिहारे ॥ 
होउब ना  तुम अतिथि हमारे । होइब कैसे दुखी सुखारे ॥ 

अबरु  दुःख सँग  होत दुखी साधू तुहरे सोहि । 
दुखारत दीठै जहँ कहँ,निबरन तत्पर होहि ॥ 

रविवार, २९ मार्च २०१५                                                                                                   

चले सुर धाम जनक बहोरी ।  आयसु मागि दोइ कर जोरी ॥ 
कहत जाबालि हे नर नाहू । धेनु पूजन फले सब काहू ॥ 

जो की गउ के पूजन कीन्हि ।  जो मन चाहए सो सब दीन्हि ॥ 
तुमहु पयद पावनी पूजिहौ  । धरम परायन जात जनीहौ ॥ 

जब गउ सेवा टहल सकारे ।  सकल कामना पूर्ण कारे ॥  
 एक आसा के किरन बिकासी । ऋतम्भर मन भए जिग्यासी । 

जाबालि कहि सो बचन अनुहर । कांति मुख सों पूछे सादर ॥ 
धेनिहि बंदन बिधि को होई । नेमाचरन करे कस कोई ॥

मंद मुख जब कांति छाई । जाबालि मनहि मन बिहसाईं ॥ 
गौ सेवा के सकल बिधाने । बाँध फेर एहि भाँति बखाने ॥ 

नृप ब्रत धारिहि सेवा चारिहि चरवावन गउ सन गवने । 
जो जवन पवाईं सकृत महुँ आईं सकलत कर लेइ चुने ॥ 
जब बहुरावै जो चुग खावै,सेवा बिधि जस गयउ कहे । 
गउ तिसनावै जब जल पावै तबहि आपहु जल गहै ॥ 

मातु ऊँच अस्थान रहैं आप रहें नीचाए । 
निसदिन तन को डाँसते मत्सर दे निबराएं ॥ 

सोमवार, ३० मार्च, २०१५                                                                                             

गउ हुँत हरिदा आपहि आनएँ । करत नेह अपने कर दानएँ ॥ 
सेवा सुश्रुता किए अस कोई । भावें जोए माँगत मिले सोई ॥ 

सुनत जाबालि मुनि के बचना ।  ऋतम्भर चित सुरति श्री रमना ॥ 
सुचितचेतस बंदन ब्रत गहै।सुरभि सेवन्हि संकलप लहै ॥ 

सुबुधि कहे सब बिधि अनुहारै । भयउ पावनी के रखबारे ॥ 
नित प्रति दिवस चरावनु जाईं । पूजत करें नित सेवकाई ॥ 

भई मुदित जब सेवा सोंही । मानस के जस गिरा सँजोही ॥ 
हर्ष मधुरिम बोलि हे राया ।जस तुहरे उर के अभिप्राया ॥ 

जो तुहरे चितबन भाए मांगो अस बर कोइ ।  
कृपामृत सानि बानि जस मृतक जिआवनि होइ ॥ 

मंगलवार, ३१ मार्च, २०१५                                                                                               

मृदुल बरन बर बोले नाहा ।देई ऐसो सुत मैं चाहा ॥ 
पितु कुल सेबक हो बहु नीके । होए बछर जो रघुबर जी के ॥ 

सील बिरध अरु धरम परायन । अस कह राजन  उरगाए बदन ॥ 
नृप मन भावन माँग बताईं । दयामई  माँगे सो दाईं ॥ 

भाई तहँ सो अंतर्धयानए । जने राउ पुत  अबसर आनए ॥ 
चहे सोई लक्छन गहेऊ । सत्यवान सुभ नाउ धरेऊ ॥ 

दिन दिन दिवस बरस बन बीते । भगवन्मय सुत पितु मन जीते ॥ 
अमित पराक्रमि तासू सरिसा ।हेरत मिलेउब नहि चहुँ दिसा । । 

भगवनमय पुत पितु भगत,धर्म परायन जानि । 
ऐसे जनित जनाए के भूपति मन हरषानि ॥ 












  



  





































  















Tuesday, 3 March 2015

----- ॥ टिप्पणी ३ ॥ -----

>>   कृषि उत्पाद ही वास्तविक उत्पाद है यह कौशल से उत्पन्न किए जाते है अत: कृषि कर्म एक उद्यम है । वनोपज भी उत्पाद की श्रेणी में आते हैं चूँकि यह प्राकृतिक उत्पाद है अत: इसे उद्यम से प्राप्त उत्पाद नहीं कहा जा सकता.....

अन्य उत्पाद चूँकि संचित सम्पदा का सन्दोहन मात्र हैं अत: ऐसे सन्दोहन वास्तविक उत्पाद की श्रेणी में नहीं आते.....

>> जिस गुप्त रीति से संसद में जनहित के विरुद्ध नियम रचे जा रहे हैं उसी गुप्त रीति से कभी संविधान रचा गया था इस हेतु कि भारत का अस्तीत्व ही समाप्त हो जाए और यहाँ उपनिवेशी आ आकर बसें.....

>> हमारे एक संबंधी  के यहां लडके का ब्याह था, जीतना दान- दहेज आया उतना तो प्रीति भोज में लग गया जी !....


>> संसद  कृप्या कर अपने पी.एम. को बोलना सिखाए अन्यथा जनता ने उसे जो डिराइभरी सिखाई है  .....सब भुला देगी.....

>> दानवों को देवताओं का रमण नहीं सुहाता.....

>> यदि भारत शासन को राष्ट द्रोही षड़यंत्र का ज्ञान न हो और केंद्र तथा सीमावर्ती राज्य के सत्ताधारी एक ही हो इससे स्पष्ट होता है कि यहाँ पाकिस्तान का शासन है भारत का नहीं.....

षड़यंत्र = अनिष्ट साधन के उपाय

>> यदि किसी राष्ट्र के शासन को राष्ट द्रोही षड़यंत्र का ज्ञान न हो और केंद्र तथा सीमावर्ती राज्य के सत्ताधारी एक ही हो तो इसका अर्थ यह है कि वहां सीमावर्ती देशों का शासन है.....

षड़यंत्र = अनिष्ट साधन के उपाय


>>  हम सभी धर्मों का सम्मान करते है, और हमारी कोई सीमा-बीमा न पहले थी न अब हैं जो चाहे वो घूस गया और घूस रहा है इसका परिणाम यह हुवा कि अब एक पाकिस्तान हमारे देश के बाहर है एक अंदर दोनों के द्वारा ही सीमाओं का अतिक्रमण हो रहा है.....

>> भारत के संविधान को खाँ-ग्रेसियों का संविधान यूं ही नहीं कहते इसके अनुसार कोई भी कैसा भी कहीं का भी बिदेसी यहाँ के नेताओं को फसा के उनको ब्याह के कुछ भी बन सकता है.....

>> आय-व्यय विवरणिका के सह यह भी विवरण आवश्यक है कि आप कितना व् क्या क्या उपभोग करते हैं.....
हामरे पारा में भी नौ दस करोड़ वाले हैं वो अबतक हवाईजहाज नहीं देखे हैं.....
जिसके जैसे कर्म उसकी वैसी जाति

>> पहोमि पारे पायसा,राजा के मन भाए ।
भूरि भूरि बधाई किए, जन हित हेतु बताए ॥


भावार्थ : --पड़ोसी देश पाक ने भारत की भूमि पर अपना अधिकार स्थापित किया और सत्ताधारियों ने इस कृत्य की  भूरि भूरि  प्रशंसा की ।  अब ये इस अधिकरण्य को विधि के रूप में अंगीकृत कर इसे देश के हित में बताते फिर रहे हैं ॥

>> कश्मीर में निवासरत बहुँसँख्यक वर्ग को ये अल्पसंख्यक  कहते हैं यदि ८०% जनमत संग्रह पाक के पक्ष में हो जाए तो क्या हम कश्मीर पाक को दे देंगे.....?

यदि चयनित प्रतिनिधि बलपूर्वक अथवा जनमत संग्रह से किसी क्षेत्र की भूमि अधिग्रहित कर उस अधिकरण को भूमि स्वामी के हित में कहें तो  उक्त क्षेत्र में प्रवेश करने पर ऐसे प्रतिनिधि के प्रति  उसी प्रकार व्यवहार करना चाहिए जिस प्रकार किसी देश के सीमांत देश द्वारा उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करने पर किया जाता है.….

>> कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, और पाक कांग्रेस के पेट से पैदा हुवा है.., हम इन सत्ताधारियों को पाकीसैतानी यूं ही नहीं कहते.....

>>  इण्डिया में हिन्दुओं का वर्ण कांग्रेस निर्धारित करती है, भारत में कर्म.....




राजू : -- हाँ ! ये ख़ाँ ग्रेस यदि कह दे ये नीच है.....तो है !! ये अल्पसंख्यक है.....तो है
             पाकिस्तानी तपस्वी है..... तो हैं भारतीय महमूद गजनी हैं..... तो हैं.....
             विभाजन के बखत चारखाँ थी ये, पंजख़ाँ तो बाद में हुई है, दिल्ली ने इसे छंगेज ख़ाँ बना दिया
 
>> और हमें किसी की भी अधीनता स्वीकार नहीं है.....
>> " पराधीनता सपनों में भी सुख नहीं देती"
         ----- || गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
          पराई पराधीनता की अपेक्षा अपनों की किंचित ही बुरी  होती है
          " अपनों की पराधीनता से परायी स्वाधीनता अच्छी होती है"
             विभीषण इसका उदाहरण है.....
>> भारतीय जनता पार्टी नहीं पाकिस्तानी जनता 'पार्टी' अर्थात पीजेपी है ये..,
      मस्जिद तोड़ते हुवे मिली थी, मंदिर तोड़ते हुवे खोई जाएगी.....

>> विद्यमान भारत में अभी भी आधा मुसलमानों का राज है  काश्मीर जैसी स्थिति इसे पूरा कर देगी फिर तो इसे अंग्रेजों के हाथों जाने में देर नहीं लगेगी.....

>> अच्छाइयों को बुराइयों के अधीन न होना.....

>>  उद्योग पतियों को बजट बनाने के लिए कितने में ठेका दिया था.....?

>>  यह धनिमन् रेखा ऐसी ही है कोई कोई तो इसके इतना ऊपर चला गया कि माँ -बाप को भी टी बी में ही दीखता है ॥

>> महात्मा पूंजीपतियों के भव्य भवनों में नहीं मिला करते, जो मिला करते हैं वो महात्मा नहीं होते.....
       ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
>> भारतीय लौहिक यातायात का सबसे लंबा आवक-जावक केंद्र खड़गपुर है.....
>> भारतीय लौहिक यातायात एक दुधारू गाय है कुशासकों ने इसे बीमारू बना रखा है.....
     मेरे पास यदि ग्राहक अधिक है तो मैं धंधा बढ़ाऊं  गा यदि ग्राहक अपेक्षाकृत न्यून हैं तो शो बाजी.....
>> अच्छा  होगा कि पार्टियां समय रहते अपने इन फटों को सील लें और हम फटे संविधान को,
      Because "A Stitch In Time Saves Nine, N The 'A Nine Stitch In Time Saves Ninty Nine.....'

>> बाई-फाई जैसे लक्जरी आइटम फ्री में चाहिए इस दिल्ली को.….
>> मन भर की शक़्ल- तोला भर की अक़्ल.....
>>  ऐ दिल्ली ! ये यमुना है.....नदी है.....शौचालय नहीं है.....

>>>> और ये दस लखिया सूत वाले महाराज कहते हैं निर्बल की समापती हड़पने के लिए ७० % अड़ोसी-पड़ोसी से भी पूछने की आवश्यकता नहीं है .....उठा लो बीप को !!!

एक बात तो बताइये : -- लकवा मारने पर (पक्ष का आघात )  कोई खटिया पकड़ता है कि खटिया पकड़ लिए इस लिए लकवा मारता है..... ?>> इस्कूल-अस्पताल को खेतों में देखा है क्या.....?
     इस्कूल-अस्पताल चाहिए कि मालो-सिनेमा हाल.....?

>> काला बाजारू की कलाबाजारी करके हड़पो अथवा  बिना कलाबाजारी करके हड़पो
बोले तो धरती को तो हड़पना ही है.....नई.....
>> स्वतंत्रता का संग्राम इस हेतु छेड़ा गया था कि भारत में शासन तो अंग्रेजी ही हो,  अंग्रेज 'हम' हों
अभी भी अंग्रेज तो 'हम' ही हैं शेष सभी इस 'हम' के अनुयायी हैं ॥

>> कली कुँआरी के मन भाया, आया ऐसे झूम के फाग ।
         धीरे धीरे यौवन के सब, सुरंगी रंग रहे हैं जाग ॥

>> इस पी एम ने तो नरसिम्हा राव का कीर्तिमान तोड़ दिया ये दस लाख में ही बिक गया..,
वो एक करोड़ में बिका था.....किसी हर्षद मेहता ने ख़रीदा था.....

>> मनुष्य की औसत आयु उसकी संख्या पर निर्भर करती है.....
     इस्लाम, धर्म है कि जाति है.....?
    यदि यह धर्म है तो इसको जाति मानने वालों का धर्म क्या है.....?

>> राजू : -- बिना लत्ते का भारत, रत्नों का क्या करेगा..... ? सुना ही इण्डिया को साइन फिलु हो गया है.....

 >> "ऐसे-वैसे कपडे में, कुछ न कुछ तो होगा ही....." 

 >>  ये बहुमूल्य उपहार इसी भाँति से तो बनते हैं..... 

>> पुराने कर दाताओं को यह बुद्धि थी कि वो स्वेच्छाचारी शासन में टैक्स दाय  न कर उसे धर्मादा में लगाते थे, अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करते थे..... गुंडा-पार्टी का राज है अप्रत्यक्ष तो देना पड़ेगा किन्तु प्रत्यक्ष कर धर्मादा में लगे ऐसा प्रयास करें.....

बिका यो टैक्स की बिटिया की बिदाई की बेदना तो जाणण आला ही जाणों ह.....: ( 

जिका  बिटिया कोणी वो के जा ण.....


----- ॥ यतो धर्मस्ततो जय: ॥ -----

>>  यह देश की सेना का सूत्र वाक्य होना चाहिए..... दंड व्यवस्था सत्य की रक्षा के लिए होती हैं.....जय-विजय के लिए नहीं.....

 सेना के ऊपर एक वर्ष में २'२०'०००० लाख करोड़ रूपए व्यय करने वाले भारत-शासन की सत्ताधारी पार्टियां अमेरिका के राष्ट्रपति से कहती हैं..... भैया भैया हमारे देशद्रोहियों को पाकिस्तान से ला दो न.....एक टुच्चे से संत को पकड़ने में ये तैंतीस करोड़ रूपए व्यय कराती हैं.....  


राजू : -- यदि मैँ भला बन गया, तो फिर जेल में मैं ही रहूँगा.....बाक़ी सब बाहर रहेंगे.....

मैं जेल में रहूँगा..... बाक़ी सब बाहर रहेंगे तो तुम लोग कहाँ रहोगे.....? रहेंगे की नहीं रहेंगे क्या पता.....

राजू : - एक ठो भाइट हाउस है वो भी बिना हैंडिल के दरवाजे बाला 
यहां  देखो लाल पीले सफेद पता नहीं कितने हैं.....शाहों की करनी के कारण लोग थूकते हैं इनपर..... 

बात कड़वी है किन्तु सत्य है : -- किसी माता को विवशत: एक दो रात्रि के लिए कहीं जाना हो  तो क्या वह अपनी युवा होती पुत्री को उसके  पितामह, पिता अथवा उसके युवा भ्राता  के संरक्षण में छोड़ सकती है.…. ? 

नहीं.....क्यों ? क्यों कि वो उसको गर्भवती बना देंगे.....


जहाँ पनाह, जहाँ पनाह न हुवा अली बाबा हो गया बाकी तो सब चोर हैं , स्याह दौलत स्याह दौलत न हुई कारूँ का खजाना हो गई..... ये खुल जा सिमसिम बोलेगा और सिमसिम खुल जाएगी.....

राजू : -- च. च. च. च.. भारत में भी कैसे कैसे पाखंडी बाबा हैं.....

 
 शासन वही सुशासन है जहाँ  जन सामान्य शासक हो । शासन संचालक सेवक हो, और वे लौकिक सुखों के उपभोग से परहेज करें ॥

राजू : -- हाँ ! और उस सेवक अर्थात नौकर के गाली सुनने वाले कान हों और लात खाने वाला पिछवाड़ा भी हो.....किसी को नौकरी पसंद न आए तो छोड़ कर चला जाए.....

"  अभी तक जितने आए छुपछुपा के खाए । यदि तुम शपथ ग्रहण समारोहों जैसे तुच्छ आयोजनों में सौ सौ करोड़ का अपव्यय करते हुवे झुल्ला  में बैठ के खुलमखुल्ला भी खाओगे  तो तुम्हारी फटफटिया पांच का एवरेज देने लगेगी....." 

राजू : -- मास्टर जी ! पांच माने की कितना.....? 

" जितना बिना चढ़े ढुलका के देती है न उतना.....  


ये दुष्ट मंत्री  किसानों को कहते हैं, मछली पालो, खेती-वेती छोडो खेत हमें दे दो हम उन्हें उद्योग पतियों को देंगे । 

भगवान ने उक्त श्लोक इस सन्दर्भ में कहा था कि यदि तुम कोई पुस्तक लिख रहे हो तो पुरस्कार की आशा मत कर यदि तुम ऐसा करते हो तो एक दिन तुम परम पुरस्कार को प्राप्त होओगे और साहित्य के जितने भी पुरस्कार हैं वो  तुम्हारे नाम पर दिए जाएंगे । इसलिए अपना नाम अच्छा सा रखना चाहिए ' गिरधर बैष्णव ' छै ये भी कोई नाम है..... 


विदेशी बैंकों का लेखा धारक होना बुद्धिमानी है कि विदेशी बैंक होना.....?


ऐ फ़ौजी ! तनिक इनको मानव बम दिखाओ तो.....  फूट के औउर कैसे.....

 बहुंत सस्ते में आते हैं..... बस बीस लाख और एक ठो पिट्रोल पम्प लगता है.....

हवाई जहाज ! लो ये भी कोई बम है.....उसमें राष्ट्र का प्रमुख कहाँ मरता है.....

ये रही शह.....अबसे हमरी सीवाँ का अतिक्रमण मत करना.....अउर दूसर के फटे में टाँग मत अड़ाना.....समझे.....चीनी 


राजू : -- ई सासन -प्रसासन है कि दुस्सासन है.....

तुम लोग जब हवाई जहाज में उड़ते हो तब कितने मुगालते (धोखे )में रहते हो न , कि ये जो पायलट है वो पायलट है.....देखना कहीं वो घूस देने वाला लोको पायलट न हो.....

संतों की वाणी है : --
 
चार वेद षट शास्त्र में बात मिली है दोय । 
सुख दीन्हे सुख होत है, दुःख दीन्हे दुःख होए ॥ 



बिजली उद्योग - वापस जाओ, वापस जाओ.....  

गोबर गैस बनाओ, अपनी मेट्रो स्वयं चलाओ.....टिंगटांग.....

हम कौन थे, क्या  हो गए, और क्या होंगे अभी , 
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी । 
  ----- ॥ मैथिली शरण गुप्त ॥ -----

किसानों की धरती हड़प कर उसे  उद्योग पतियों के अधिकार में देते हैं भारत के ये प्रधान मंत्री गण.....

" पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् "

भावार्थ : -- भौतक जगत के सभी जीवनीय पदार्थों में ये तीन ही वास्तविक रत्न हैं : -- अन्न, जल एवं सुभाषितं अर्थात सुन्दर विचार, इन तीन की उन्नति स्थायी होता है । आर्थिक उन्नति व्यर्थ है क्योंकि यह स्थायी नहीं होती ॥ 

Monday, 2 March 2015

----- ॥ हर्फ़े-शोशा 2॥ -----

मर्ज़ तिरा ज़ियाबर्तानिशी है ?
दो गज़ की तिरी हैसीयत नहीँ है..... 

ज़िया बैतिशी = मधुमेह 
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अपनी इज्जत अपने हाथ जोंग सँभाले रख..,
मर्दानी जनानियों वाला वो जमाना तो है नहीं.....  

सत्ता की बागडोर गोले-गोली भी तो नहीं है..,
ऐसे-वैसे को थमा सर पे फुड़वाना तो है नहीँ..... 
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रहे-रस्मो-रब्तगी से ए ग़ाफ़िल संभल..,
 कुछ बदलने से पहले तू खुद को बदल.....

रहे-रस्मो-रब्तगी = लेनदेन, मेलमिलन 
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शाहों ने ही सिपर शाम पे स्याहकारी लिखीं..,
सितारों को खलाओं में जमा करता है शेखू..... 

सिपर शाम = ढलती शाम 
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मौजे-दरिया की इयत्ता न पुछिये..,
उतर के देखिये वहां भी ज़मीं होगी.....

इयत्ता = गहराई, थाह
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शम्म -ए-रुखसार से रौशन है ये महफ़िल ? 
मैं कहूँ तेरे लबे-जू की दहक का ताब है.....  
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बिके जहां इन्साफ वहाँ की चारदीवारी तोड़ दो..,
रयत दार के रहन रखी तुम अपनी लाज मांगों.....
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खैराती माल से ही, है मलिके-मुल्क मालामाल..,
तेरे महल्ले उसका,वो ख़ानक़ाह है कि महल है.....
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मर गया वो ज़ाहिर-बीं अपनी मौत से पहले..,
हबाबी दुनिआ को जो आक़बत समझता है.....

ज़ाहिर-बीं = जाहिर परस्त, जो केवल दृष्यमान पर विश्वास करता हो
हबाबी दुनिआ = पानी के बुलबुले जैसा संसार, क्षणभंगुरी दुनिया
आक़बत = परलोक

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Shri Krshna ne Shrimad Bhagawad Gita mein spashta shabdomein kaha hai : "Yukt Ahar-viharasya, 
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ऊंचा है दरबार तेरा मेरी नीची निगाह.., 
मैं जब्हे जफ़ाशियार तेरे लबों पे आह..... 
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दुश्मन को मिरे काम से आराम नहीं है.., 
अपने को भी घर में कोई काम नहीं है.., 
दुश्मन के बड़े नाम बड़े बड़े एहतराम..,
अपना तो दुनिया में कहीं नाम नहीं है.....

जेल भी चले जाएंगे तो वांदा नई.....
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इनसानियत आदमियत की नियत हुई ऐसी.., 
जिनावरों की सफ़े-जमीन से हस्ती ही उठ गई.., 
बद अमनी बद दयानती क्या तिरी नज़र लगी.., 
कि मिरे बागो-गुलसिताँ से गुल-बहारा रूठ गईं..... 
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तू आईना-ए-हिंद है के बदरू मुजस्सम कोई..,
तेरा अक्स उतरे मुझे हर आइना बदखू लगे.., 
तेरा नसीब सवारूँ आ तेरी सीरत को सजाऊँ.., 
इस कदर बनाऊँ कि तू वजाहते-वजू लगे.....

इसे खेतों में बैठाओ कोई आबशार उतारो.., 
फिर देखो आइना-ए-तस्वीर का रंग.....

आईना-ए-हिंद = संविधान..... 
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गंगा आए गंगादास जमुना जमुनादास
तू बस मैला ढोते रहना

अपनी करनी पार उतरनी
तू बस नैया डुबोते रहना

दे जो आटा दाल वही देगा ज्वाल
तू मुंह में थूक बिलोते रहना
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पाँच दिवारी दस दरवाजे एक, बानी को दरबार..,
ता पर राजे म्हारो प्यारो, साँवरो सरकार री म्हारो स्याम जी सरकार.....
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हे री बँसरी अधर आधारे मधुबन धेनु चरैय्या..,
बैठो जमुना किनारे मोको, लागे प्यारा कन्हैय्या.....

गोरी गोरी म्हारी राधिका, साँवरो कन्हैय्या..,
यह चितवन की चोरनी वो, माखन का चोरय्या..,

छापन कलि को घाघरो घिर मटकावै कलैय्याँ..,
चारु चरन मैं झाँझरी घारे, नाचे ता ता थैय्या.....
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ये अरगवानी दामन घटाओं पे छाए..,
फ़लक पे धनक बन कयामत ही ढाए..,
कहीं साहिलों पे लहर होके रब्ता..,
कोई साज़ छेड़े गज़ल गुनगुनाए.....


अरगवानी दामन = शफ़क, लाल-शहाबी दामन
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छंद पकैया छंद पकैया कानों में रस घोलूँ..,
साली जो गल बाहीं ले तब दूजा छंद मैं बोलूँ.....
छंद पकैया छंद पकैया कैसो जे ससुराल्यो..,
माखन सी साली रख ली छाछ गल में घाल्यो.....
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हर्फ़ सियाही शिराजां किए मिरे हज़ूर को दाग़ लगे 

ग़मे-शब गफलतों ख़्वाब में सुब्हे दम को जाग लगे  
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न ज़र न जमुर्दीन न गिराँ लालो-गोहर रखना.., 
कहीं दाद मिले तू अपने फ़न में ज़ौहर रखना..... 
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सिपुर्दे ख़ाक हो के ऐ मशीर तुझे मौत आई..,
मारे शरम के मर जाता तो तेरा क्या जाता.....
मशीर = नसीहत करने वाला  
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हाशिए नसीन औ शम्म-ए- महफ़िल..,
उसकी ताज़ीर कि ताबे-निगाह होना..,
यह भी इक हासिल-कलाम है आखिर..,
उसकी किस्मत कि हर हाल तबाह होना.....

हाशिए नसीन = आस पास बैठने वाले
 ताज़ीर = सज़ा
 हासिल-कलाम = खुलासा
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कश्ती मन्ज़िले मौजूं है तेरी फ़राज कहाँ..,
नादाँ परिंदे तेरा फर्शो-फ़लक परवाज कहाँ.....

मौजूं : - सम्मुख 
फ़राज = ऊंचाई 
फ़लक परवाज = आसमान पर पहुँच 
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फ़लक की जरी तश्त है सितारों के हैं निवाले..,
हयाते-आब से भरे भरे महताबों के है प्याले.., 
जन्नत सी शबिस्ताँ कहीं ख़ाना-ए-ख्वार ख़ाँ.., 
लबों पे चश्मे-शबनम है जबाँ पे आहो-नाले..... 
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आफताब के दम पे है ये रौशने-रुखसार.., 
वरना तो महताब की हस्ती ही क्या है......
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पहले हो अमान हर ज़िस्त की हर जान की.., 
फिर जा-नमाज़ी हो गीता और कुरआन की..... 
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ज़र्रे-ज़र्रे को जेबे-महल कर जो नाज़ करता है.., 
अपनी सरजमीं के नाम को वही फ़राज करता है.....
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पहरन-ओ-सरो-पा चहदीवारी ये तिरा दर..,
 फिर लम्हे को सदियों का इन्तजार है शायद ...... 
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व्रण ह्रदय उद्गार भरे तलवार दो धारी लिखती है.., 
कलम उदर अंगार भरे चिलक चिंगारी लिखती है.....

 हृद व्रण = घायल ह्रदय 
चिलक = चमक पीड़ा पूर्वक 
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आबो-मीन जरी कारि उसपे जलवा चाँद का..,
सितारा ज़र निगारी उसपे जलवा चाँद का..... 
 ग़लताँ पेचाँ-ओ-परदाज़ 
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प्रभा से तिलक का तेज ले अरुण से ले अरुणाई..,
 चितहारू चारू चंद्रिका ने अपनी माँग सजाई..... 

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दूसरे की चुपड़ी से अपना सुखा परोसा अच्छा है.., 
शैतान के भरोसे से भगवान का भरोसा अच्छा है..... 
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तंत्र-यन्त्र कौशलता से संचालित होते हैं, जाति-धर्म धनता-निर्धनता से नहीं.....

वर्त्तमान परिपेक्ष्य में जातिगत अस्पृश्यता अर्थगत अस्पृश्यता में रूपांतरित हो गई है..,

यदि अस्पृश्यता एक गणितीय समस्या है, तो आरक्षण ऐसा सूत्र हैं जिससे इस समस्या का हल अभी तक प्राप्त नहीं हुवा, तथापि इस सूत्र का वारंवार प्रयोग हो रहा है क्यों ? क्योंकि सत्ता साधने का यह एक सिद्ध मंत्र है.....

किसी धर्म-जाति के सामाजिक उत्थान के लिए समय की आवश्यकता होती है, निर्धन को धनवान बनने में कितना समय लगता है? रातोरात का..... बेवकूफ,गर्दभ.....भैंस के आगे बिन बजा रहे हो.....

"सोते हुवे को सपने ही दिखाए जा सकते हैं"
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जिस अहिंसा के बल पर सत्ता धारी दल ने अंग्रेजों से सत्ता हड़पी थी वही अहिंसा आज उन्हें 'बांटने की राजनीति' लग रही है और हिंसा 'एकता की प्रतीक'.....यह उस दल के विचारों की विकृति है.....
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इस सत्ता धारी दल का आभामंडल इतना दिव्य है कि किसी भी विपक्ष ने उनसे यह पूछने का साहस नहीं किया कि 'गांधी जी' की ह्त्या उनके कार्यकाल में क्यूँ हुई, हिंसा रोकने के लिए संविधान में कोई प्रावधान क्यूँ नहीं किया,यह नहीं पूछा कि ये संविधान है..... या सत्ता धारी दल के विचारों की पोथी.....: )
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सत्ता, माया और पत्रकारिता इन तीन देवियों ने भारतीय संस्कृति छिन्न-भिन्न कर भारत को गर्त में धकेल दिया.....
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"एक नष्ट-भ्रष्ट तंत्र की आदर्श लोकतांत्रिक छवि गढ़ने में पत्रकारिता सबसे अग्रणी रही है....."

स्पष्टीकरण : -- छवि गढ़ना बोले तो मेकअप करना , ये तथाकथित पत्रकारिता है, फ़ोकट में कुछ नहीं करती.....
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बड़ी लिखने से ही लकीर बड़ी होती है, दूसरों की पोछने से अपनी छोटी लकीर बड़ी नहीं हो जाती

दूज लेखे पोछन से, होत  नहीं बड़ रेख ।
रेख तबहि बड़ होत है,  बड़ी जब लेख
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शासन चाहता है कि प्रशासन सदा कुहू कुहू करे और उसकी काऊँ-काऊँ पर ताली बजाता रहे.....
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आर्थिक आधार पर जो उच्च एवं उच्चतम वर्ग है, जो भोगवादी है( खाओ पियो और मौज करो का सिद्धांत), जो प्राय: दूरदर्शन एवं समाचार पत्रों में ही दृष्टिगत होता है, वह इस भ्रष्ट व्यवस्था का घोर समर्थक है  कारण स्पष्ट है भ्रष्ट व्यवस्था से ही उसके विलासिता के साधन अद्यतन रहते हैं, 
                                 एक  शिष्ट व्यवस्था में इनके विलासिता के साधनों का  बहुंत बड़ा योगदान होगा.....
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काव्यात्मक शैली में यदि  अनाचार ( दुराचरण, बुराई, अयोग्य आचरण, भ्र्ष्टाचार, कुचलन, कुरीति अभद्रता, अविशिष्ट, आचारहीन ) एक रस है तो विषयाभिरति उसका स्थायी भाव है.....  
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आज यदि भोगेगा तो कल उसे भुक्तेगा..... 
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पृथ्वी का आधे से अधिक  संदोहन विषय के विलासिताओं को संकलित करने में व्यय होता है । जीवन धन हेतु को छोड़ दें तो  भ्रष्टाचार इन्हीं विलासिताओं के उपभोग हेतु किया जाता है, अत: एक भ्रष्ट व्यवस्था को चुनते समय विकास की अपेक्षा न करें....सम्यक वितरण के अभाव में इतने सन्दोहन के पश्चात भी यदि विकास नहीं हुवा तो आगे भी नहीं होगा, अत: पहले अपना धर्म ठीक करें, जाति ठीक करें अपने विचारों को ठीक करें की भैया मुझे भ्रष्टाचार बलात्कार अनाचार को नहीं चुनना है.….

विभाजन के पश्चात भारत की प्राकृतिक सम्पदाओं का जितना दोहन हुवा है उतना सहस्त्रों वर्षों में भी नहीं हुवा..... 
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"उच्च एवं उच्चतम वर्ग को मध्यम बनाओ- गरीबी रेखा मिटाओ"
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शासन ने मध्यम वर्ग को दुधारू गाय बना दिया है जिसे वह दोह दोह कर निम्न वर्ग का पेट भरती है, और घास भी नहीं डालती..,हाँ उच्च एवं उच्चतम वर्ग को  राष्ट्रपति का  सजीला घोड़ा बना दिया है, जो बादाम खाता  हैं लात भी मारता हैं..... 
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एक खराब बात, सौ अच्छी बातों को खराब करती है.....
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 ये भ्रष्ट व्यवस्था ऐसी कसूती है, आज आप ने जिसे चुन लिया या कल जिसे चुनेंगे, परसों वही आपके धंधे को बंद कर देगा, आपकी नौकरी, आपकी आजीविका छीन लेगा..,और आप, गरीबी रेखा के नीचे आ जाएंगे और फिर कवि लोग एक बिंदु में आपकी जीवनी लिखेंगे..,

तो ? 
तू आईना-ए-हिंद है के बदरू मुजस्सम कोई..,
तेरा अक्स उतरे मुझे हर आइना बदखू लगे.., 
तेरा नसीब सवारूँ आ तेरी सीरत को सजाऊँ.., 
इस कदर बनाऊँ कि तू वजाहते-वजू लगे.....

आईना-ए-हिंद = संविधान..... 
इसे खेतों में बैठाओ कोई आबशार उतारो 
फिर देखो आइना-ए- तस्वीर का रंग 

 पहले मज़स्सम को संवारों फिर आइने बदलो..... 
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एक अचंभा ऐसा देख्या बाबा जी समझा रियो.., 
बैठा ऊंंची चौक्की पे था मीठा मीठा गा रियो.., 
रे धणी ज्ञाणी पाणी धन बहता होवै निर्मला..,
दस लाखाँ की बोतरी था भगता नु पिला रियो.....  
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सुन्दर आवरण आलेखन के प्रति आकर्षण उत्पन्न करता है, सुन्दर आलेखन लेखक के प्रति आकर्षण उत्पन्न करता है, इसमें सम्मोहन की शक्ति भी होती है..... 
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हमें नौनिहालों के मनो-मस्तिष्क में हिंदी भाषा के ज्ञान को संचित रखना होगा, अन्यथा भावि काल में वे संस्कृत के जैसे ही हिंदी भाषा के ज्ञान से भी वंचित हो जाएंगे.....
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जल ही जीवन है, जल का संरक्षण जीवन का संरक्षण है.....
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सेवा में प्रचार शब्द का कोई स्थान नहीं है, यदि सेवा अथवा सेवक का पचार होता है वह शीघ ही व्यापार और व्यापारी में परिणित हो जाता है सेवा अपने परमार्थ के उद्देश्य से भटक कर लब्धि में परिवर्तित हो जाता है । लब्धि का लोभ प्रगाढ़ होते ही कुत्सित कृत्यों से संस्पर्धा होने लगती है.....

पूर्व में प्रचार पर किया गया व्यय निम्न वर्ग के अभाव को क्वचित करता था माध्यम वर्ग की आधार भूत आवश्यकता उपलब्ध करवाता था । खेद है !  विद्यमान में यह व्यय उच्च वर्गीय संचार माध्यमों के विलास साधनों की व्यवस्था कर रहा है.....   
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 भारत देश के लिए अभाव वर्षों से अभिशाप के सदृश्य रहा  | अब यह अभाव इतना विवश हो गया है कि सत्ता इसे न केवल क्रय कर रही है अपितु अत्यंत अल्पार्घ/सहँगे में क्रय कर रही है  

अल्पार्घ/सहँगे में = सस्ते में  
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