Friday, 31 July 2015

----- ॥ स्वातंत्रता का मर्म । -----

चारि चरण जो चारिहैं सो तो धर्मी आहि । 
धरम धरम पुकार करे सेष सकल भरमाहि ।२८३६। 


भावार्थ : -- जो सत्य तप  दया व् दान का आचरण करता है वस्तुत: वही धर्मात्मा है धर्म धर्म की रट लगाए शेष सभी भ्रम की स्थिति उत्पन्न करते हैं ॥

दया धर्म का मूल है । जिसके अंत:करण में प्राणी मात्र के लिए दया हो, जिसे अपने किए पर पश्चाताप हो जिसके पूर्व के क्रियाकलापों से यह प्रतीत होता हो की अमुक अपराधी  भविष्य में  समाज, देश अथवा विश्व के लिए  उपयोगी हो सकता है  वह आतंकवादी ही क्यों न हो, दया का पात्र है ॥


>> हत्या  व्यक्तिगत उदेश्यों की पूर्ति हेतु व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की की जाती है..,

>> आतंक जन समूह की  हत्या के सह समाज देश व् विश्व में भयकारी वातावरण  निर्मित करने के लिए होता है यह विचारपूर्वक  किया जाने वाला अपराध है..,



इच्छाचारी ने लगाए जब ते आपद काल ।
उत्पाती उद्यम संग उपजे सकल ब्याल ।। 

इ बिकराल काल ब्याल अग जग रहे ब्याप । 
 एक भयकारी हेतु किए , देवे दुःख संताप ॥ 

भावार्थ : -- भारत तथा भारतीयों पर दमनकारी चक्र चलाते हुवे  जबसे इंडियन गवर्नमेंट ने आपात काल  लगाया तबसे यहाँ  उन्मत्त व् उन्मुक्त उद्योग विकसित होने लगे जिनसे अर्थ पिशाच व् आतंक वाद भी उत्पादित होने लगा । इन उत्पादों को प्रदर्शनीय प्रतिष्ठानों अर्थात शो रूम  में रखा जाने लगा ये शो रूम भारत को दास बनाने वालों के यहाँ ही खुलने लगे और इनकी शक्ति व् सम्पन्नता में वृद्धि होने लगी । एक भयकारी उद्देश्य के साथ ये उत्पाद विश्व  में व्याप्त होकर जन जन को संताप देने  लगे,  इस प्रकार भारत एक अघोषित अर्ध इस्लामिक राष्ट्र के रूपमें स्पष्ट होने लगा  ॥   

    

Friday, 17 July 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३७ ॥ -----

शुक्रवार, १७ जुलाई, २०१५                                                               

बसेउ तहँ हरिभगत बिभीषन । बिप्र रूप धर गयउ पहिं हनुमन ।। 
दिए निज परिचय करे मिताई । हरिहिय सिय कहँ पूछ बुझाई ॥ 

कहए रहहि एक बाटि असोका ।  सोइ रूप गत मात बिलोका ॥ 
परम दुखी भा मुख अति  दीना । चरन नयन निज हिय पिय  लीना ॥ 

आगत रावन किए अपमाना । गयउ कहत दुर्बादन नाना ॥ 
गुंठे पवन सुत पल्लउ  पारे  । रघुपति दिए मुदरी सहुँ डारे ॥ 

चकित चितब मुदरी पहचानी । आन कपिहि कहि सकल कहानी ॥ 
जान हरिजन गहन भइ प्रीती । प्रभु सँदेसु गह बाढ़ि प्रतीती ॥ 

बरन बरन लागिहि  घन सरिसा । बिरमन बारिद बन बन बरिसा ॥ 
नयन पलक कोपल जल पूरे । बिरह ब्याकुल फूर न फूरे ॥ 

सजल सरोरुह नयन कपि कहे मातु धरु धीर । 
मारि निसिचर लिए जावन अइहहिं इहँ रघुबीर ॥ 

शनिवार, १८ जुलाई, २०१५                                                                      

 उदर अतिसय छुधा जब जागे । लिए आयसु फल तोरैं लागे ॥ 
सकल बाटिका देइ उजारे । मर्द मर्द निसिचर संघारे ॥ 

रखिया पुकार सुनि जब  काना । दनुपति पठए बिकट भट नाना ॥ 
आए समुख तब अच्छ कुमारा । गरज मह धुनि बिटप दै मारा ॥ 

सुत बध सुनि घन नाद पठावा । कहँ कपिहि कह बाँधि लै आवा ॥ 
एक पतंग सों  दूज पतंगा । भिरे अस घन गरज कपि संगा ॥ 

देखि ब्रम्हसर मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधसि लिए गयऊ ॥ 
कपिहि बिहँस अस कहे  दसानन । मारिहु मोर सुत केहि कारन ॥ 

लगे भूख त खायउँ मैं बाटिक तरु फर तोर । 
मोहि मारि  त मैं मार, तामें दोषु न मोर ॥ 

रविवार, १९ जुलाई, २०१५                                                                            
पूछत रे तुअ कहँ के  भूता । कहे कपि मैं राम के दूता ॥ 
करुँ बिनती अब बेर न कीजौ । सौंप रघुपति छाँड़ सिय दीजौ ॥ 

हित बत कहत बहुँत समुझायो ।दसमुख बिहँसि बिहँसि बिहुरायो ॥ 
मसक रूप कपि देइ ग्याना ।  खिसिअ कहि  तव हरिहु मैं प्राना ॥ 

आए विभीषन भ्रात प्रबोधा । मारिहु दूत ए नीति बिरोधा ॥ 
बाँधि पूँछ पुनि अगन धराईं ।नगर फेरि सब बहुं बिहसाईं ॥ 

चलत मरुत करि देह बिसाला । भवन भवन चढ़ि धरइ ज्वाला ॥ 
पूँछ अनल यह दूत न होई । दिव्य सरूप देव कहँ  कोई ॥ 

सकल सिंहल धू धू करि कूदि सिंधु मझारि । 
आन सहुँ सिय चूड़ामनि कपि कर देइ उतारि ॥ 

 सोमवार, २० जुलाई, २०१५                                                                       

करिहु नाइ सिर  नाथ प्रनामा । कहिहु सिया को छन छन जामा ॥ 
अजहुँ प्रभो लए गयउ न मोही । मोरि देह पुनि प्रान न होही ॥ 

अजर  अमर गुन निधि बरदाना । दै जनि कर हनुमंत पयाना ।। 
पार सिंधु  कपिन्ह पहिं आवा । सबहि के जिअ जनम नव पावा ॥ 

चले पुलक सब सुगींव पासा । करे सोइ कपि किए जस आसा ॥ 
गयउ सकल भेटिहि रघुवंता । करे काज पूरन हनुमंता ॥ 

मातु देइ चूड़ामनि दाईं । लेवत रघुपत उर भरि लाईं ॥ 
पूछि हनुमत  भरे निज छाँती । रहहि सीता कहौ किमि भाँती । 

तासु बिपति तहँ बिनु भलि जानिअ । बोलि हनुमत बेगि लए आनिअ ॥ 
महबलि बानर भलक बरूथा । जोड़े सैन जोग भट जूथा ॥ 

राम कृपा बल पाए कपि, भयऊ बृहद बिहंग । 
गगन महि इच्छा चरनी चले राम लिए संग ॥ 

मंगलवार, २१ जुलाई, २०१५                                                                

आनि अनी तट ताकिहि लंका । रहए तहाँ राकस मन संका ।। 
मंदोदरी कहए भय भीता । तव कुल कमल सीत निसि सीता ॥ 

 सुनहु  नाथ दीन्हौ फिराहू । अट्टाहस करए बीस बाहू  ॥ 
कहउँ तात  निज मति अनुरूपा । प्रगासिहि मनुज रूप जग भूपा ॥ 

ब्रम्ह अनामय अज भगवंता । ब्यापक अजित अनादि अनंता ॥ 
कहँ बिभीषन नीति हितकारी । रिपु महि मंडन कहत बिसारी ॥ 

मालवंत एकु सचिउ सयाना ।  दरप ते हि कर कहा न माना ॥

सचिव बाद गुरु बोलहि त्रासा । राज धर्म तन बेगिहि नासा ॥ 

दसमुख संग बनी एहि बाता । अनुज गाहे पद मारिहि लाता ॥ 
साधु  अमान सभा बस काला । गयउ गगन चर सरन कृपाला ॥ 

सरनागत निरखत कपिहि  जानि कोउ रिपु दूत । 
कहु सखा बूझि ए काहा, कहँ प्रभु सभा अहूत ॥  

बुधवार, २२ जुलाई, २०१५                                                           

अधम भेदि सठ कहए कपीसा । छल छिद्र भाव पठए दस सीसा ॥ 
भेदि  हो कि सभीत सरनाई ॥ कहैं प्रभो कपि लेइ अनाईं ॥ 

दरस राम छबि धाम बिसेखे । ठटुकि बिभीषन एकटक देखे ॥ 
रघुबर मैं दसमुख कर भाई । कोमल कहत चरन  सिरु नाईं ॥ 

उठेउ  प्रभु तुर कंठ लगावा । आप बीति सब कही सुनावा ॥ 
परिहरि जो नै  नीति निपूना । होत  कुनै सो दिन दिन दूना ॥ 

बहुरि  तकत प्रभु जलधि गभीरा । पूछे तरिअ केहि बिधि बीरा ॥ 
बिनय बरिअ अरु करिए निहोरे । कहहि उपाउ रहिए कर जोरे ॥ 

सागर तुहारे कुलगुर होई । बिभीषन बचन प्रभु सुत पोईं ॥ 
आईटी दसमुख पिछु दूत पठायो । मारैं मरकट लखन छड़ायो ॥ 

दया लगे फिरा  पुनि कर देइ लखन संदेस ।  
रिपु कटक बल बाध कहे,  नमत सीस  लंकेस ॥ 

बृहस्पतिवार,  २३ जुलाई, २०१५                                                           
धरे पाति किए चरन प्रनामा । बिहसि दसानन लिए कर बामा ॥ 
लखन बिनय बत कहत बखाना । तव कुल नासक तव अभिमाना ॥ 

देंन सिआ  दूतक कहि पारा । कोपत कीन्ह चरन प्रहारा ॥ 
इत प्रभु जलधि समुख कर जोरे । भयऊ  सो जड़ मानि न थोरे ॥ 

करत करत बिरते दिन तीना । रघुनायक भए कोपु अधीना ॥ 
जल सोषन कर चापु चढ़ावा । सभ्य सिंधु जुगकर सहुँ आवा ॥ 

नाथ नील नल कपि दुहु भाई  । परस तिन्ह  के गिरि तरियाई ॥ 
परस पाषान सेतु बँधाइब । ता चढ़ तरिअ तीर पर जाइब ॥ 

कह उपाय मन भाय यह नत सिरु सिंधु सिधाए । 
दानव दमन रघुबर मन अब  किछु संसय नाए ॥ 

स्पष्टीकरण : -छिद्र युक्त पाषाण के  भार से पानी का भार  अधिक होता है  उनके तैरने का यही वैज्ञानिक आधार था ॥ 

शुक्रवार, २४ जुलाई, २०१५                                                                                  

 बहुरि बिलम नहि किए रघुराई  ।  सेतु प्रजास करिअ दुहु भाई ॥ 
दिए ग्यान गुन  कृपा निधाना  । तर गिरि  तोय तरे पाषाना ॥ 

चल भल्लुक बिपुल कपि जूहा । आने गिरिन्ह बिटप समूहा ॥ 

 सेल बिसाल देहि कर दानी  ।  रचहि सेतु  नल नीलहि पानी ॥ 

 सुदृढ़ सुन्दर रचना बिलोके । बोलि कृपा निधि गद गद होके ॥ 

 थाप लिंग हर पूजन  करिहउँ  । पार गमनन चरन  पथ धरिहउँ । 

मालवंत सहि सुन  कपीसा ।  पठा  दूत लिए आनि  मुनीसा ॥  

 जाप जपत हर हर मह देबा । थाप लिंग करि पूजन सेबा ॥ 

बंधे सेतु जल सिंधु अपारा । देखि चढ़ी रघुबर बिस्तारा ।। 

मकर निकर जलचर समुदाई । होहि प्रगस दरसन  रघुराई  ॥ 

 नाउ धरी हरि तीर तीर रहँ बूर आनहि बोरहीं । 
कहि  न  जाइ कपि जूह भीर तहँ  उपल बोहित हो रही ॥ 
बाँध्यो पयोनिधि नीरनिधि जलधि उदधि साँचही ।
भोर बिकल भय बिहसि दसानन  कपि भलुक दस पाँचही ॥ 

भै कम्पित मंदोदरी कहँ लें चरन बहोर  । 

चाहिअ सौंपु जानकी, जौं पिउ मानहु मोर  

शनिवार २५ जुलाई, २०१५                                                                           


गहि पद  गहि अस गहबर गाता । हरि भजि अचल होत अहिवाता ॥ 
देखि प्रिया मन  भय जब जाना । कला बिबस उपजे अभिमाना ॥ 

मैं मैं करि कछु केहि न प्रबोधा । जानिहि साथ निज जग जै जोधा ॥ 
आए सभा प्रहस्त कर जोरी । चातुकरि मंत्रिन्हि मति थोरी ॥ 

तात नीति तव राज बिरोधहि । पुनि हितकर ने नीति प्रबोधहि ॥ 
कोपत दसमुख कह सुत ताईं । कहु सठ आयउ केहि सिखाई ॥ 

बैठ जाए पुनि भवन बिलासा । रिपु सिर पर भय सोच न त्रासा ॥ 
यहां सुबेल सेल अति भीरा । सैन  सहित उतरे रघुबीरा ॥ 

चाप छाँड़ेसि सर गिरइँ मुकुट ताटंक । 
देखि महरस भंग भयो रावन सभा ससंक ॥ 

रविवार, २६ जुलाई, २०१५                                                                                   
मंदोदरी उर सोच  बसाए ।   प्रानपति प्रभु सन बयरु बँधाए ॥ 
 इत असगुन उत कपि कर भीरा । करिअ बिनती नयन भर नीरा  ।। 

रघुबर भगवद रूप बखानी । बिहँसि दनुपत मोह  बल जानी ॥ 
नारि सुभाउ साँच सब भासैं । आठ अगुन उर सदा निबासै ॥ 

 जगे राम इत भा भिनसारे । पूछी  सचिवनि सभा सँभारे ॥ 
जामवंत एही मत कहि पारा । पठाइब दूत बालि कुमारा ॥ 

चरन सीस धरि सहज असंका । चला बीर रन बांकुर लंका ॥ 
पैठत दसमुख तनै हँकारी । गहि पद भांवर देइ कचारी ॥ 

कपिकुंजरगहि आन लिए, निसिचर दसमुख सोहि ॥ 
देखि अंगद सम्मुख जस कज्जल गिरि को होंहि ॥ 

मंगलवार, २८ जुलाई , २०१५                                                                     

कहि दसमुख तैं कहँ के बन्दर । मैं रघुबीर दूत दसकंधर ॥ 
होहि तात मम तोर हिताई । हित कारन तव चहहुँ भलाई ॥ 

जनक सुता सादर करि आगेँ । तजत मान भय हरि  पद लागैं ॥ 
बालि  तनय बहु भाँति प्रबोधे । काल बिबस सो कछु नहि बोधे ॥ 

उलट तासु परिचय जब जाना । कहा बंस बन अगन समाना ।। 
हम कुल घालक कहि तव साँचिहि  । अंध बधिर ऐसेउ बाँचिहि ॥ 

करिहु अपकृत हरिहु पर दारा । कुल नासक ए  करम तिहारा ॥
दिए  उतरु दससीस  करि क्रोधा । मो सों भिरिहि कवन बड़ जोधा ॥ 

बन गोचर कि बिरह बल हीना । जल्पसि जड़ कपि मोर अधीना ॥ 
दरसे न कछु रजस जिन रसिही । लघुता माझहि प्रभुता बसिहीं ॥ 

प्रीति बिरोध समान सों करिए नीति अस आहि । 
मृगपति बधि मेढुकन्हि जौं कहइ को भल ताहि ॥ 

बुधवार २९ जुलाई, २०१५                                                                    

जानब कपि हँसिहौ न दससीसा । जारि नगर तव एक ही कीसा ॥ 
बानर जाति भगत गोसाइहिं । तव मुख प्रभु गन कस न कहाइहिं ॥ 

एकै सुभट तव माह बलवाना ।दरसिहि अबरु न  तासु समाना ।। 
कवन रावन  बजाइब गाला ।  पितहि जितन एक गयउ पताला ॥ 

कहउँ सकुच को रहि एक काखा । ते कवन सत बडिहु तजि भाखा ॥ 
बीस भुज धर बीर जग जाना । कहसि लघुत नर करसि बखाना ॥ 

सूर न कहाब एहि  बत संगा । भार बहहिं खर जरिहि पतंगा ॥ 
हँसिहि दनुप कहि कहि दुर्बादा ॥ लघु मुख  अंगद बहुंत बिबादा ॥ 

बहुरि भारि दुहु भुज दंड तमकि देइ महि मारि । 

सभा माझ पन करि चरन, टारि गयऊ न टारि ॥  

बृहस्पतिवार, ३० जुलाई, २०१५                                                                        

इंद्रजीत सम बीर अनेका । झपटहि करि बल टरै न टेका ॥ 
बैठिहि सिर धर कर सब  हारे । उठा आप कपि केर हँकारे ॥ 

तोर उबार  रघुबर पद धरे । करत तेजहत  कहत किए परे ॥ 
सिंघासन  तब केहि सुहावा  । होत बिमुख जब मान बिहावा ॥ 

रिपु मद मथि  मत नीति अनेका । कहि कपि  सठ मति मान न ऐका ॥ 
गहे नयन जल हरि पद कुंजा । बहुरि धरषि कपि रिपु बल पुंजा ।। 

साँझ भवन दसकंधर आवा । प्रिया बदहि गहि चरन मनावा ॥ 
जरि पुर तुहरी हार पुकारहि । तासु कहब दसमुख न बिचारहि ॥ 

कपीस बिभीसन रिछपति रिपु बिचार जब पाए । 
जथाजोग जोगत  पाल चौगुट कटकु बनाए ॥ 

शुक्रवार, ३१ जुलाई, २०१५                                                                         

हरष रघुनाथ चरन सिरु नाए । गहे गिरि स्खर बीर सब धाए ॥ 
घटाटोप करि घेरिहि लंका । केहरिनाद बजावहि डंका ॥ 

कीस रूप धर काल पुकारा । सठ मति अपने समुझि  अहारा ॥ 
भिंडिपाल कर परसु प्रचंडा ।   चले निसाचर धर गिरखंडा ॥   

चढ़े बीर  कँगूरन्हि  कोटा । को एक एकहि कोउ  एक जोटा ॥ 
कोटि निसाचर नयन कोपत निहारि  । भिरिहि सुभट सब पचार पचारि ॥ 

नान आयुध करे ब्याकुल । भागिहि कपि बाताली तृन तुल ॥ 
भंजेउ  रथ पच्छिम द्वारा । मेघनाथ  हनुमत कर हारा ॥ 

 गहीरात काल घन गर्जहि गगन  बिबिध बिधि गोला चले  । 
सुनी मेघनाद गढ़ु घेर घिरे तमक  दुर्ग ते निकले  ॥ 
धनवंत कौसलकंत लोक ख्यात दुहु भ्रात कहाँ । 
नील नल अंगद हनुमंत द्रोही सो मम तात कहाँ ॥ 
  
करन लग रसन तान अस कहा रोष रस पाग । 
निकर निकर सर चलिहि जस चलिहि सपुच्छल नाग ।। 
         














Wednesday, 1 July 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३६ ॥ -----

बुधवार  ०१ जुलाई २०१५                                                                    

धूर धूसरित पद तल छाला । गौर बरन मुख भए घन काला ॥ 
सिथिल सरीर सनेह न थोरे । दरसन प्रभु लोचन पट जोरे ॥ 

कुसल पथक संगत गहि राखिहि  । चित चितबन् चित्रकूटहि लाखिहि ॥ 
जावहि भरत जलद करि छायो । अस त सुखद पथ प्रभु  नहि पायो ॥

दरसि बासि मग  मन संदेहा ।चाल सरिस सम  सील सनेहा ॥ 
बेषु न सो सँग  सिय नहि आहीं । रामु लखन हितु होंहि कि नाहीं ॥ 

इतै भरत बन  चरन  प्रबेसे । उत किरात प्रभु दिए संदेसे ।। 
लोचन नीर भरे लघुभाई । चले तहाँ  जहँ सिय रघुराई ॥ 

चले चरन भुज प्रभु पद ओरा । बरखिहि बारि पलक पट तोरा ॥ 
उठे नाथ  बहु पेम प्रसंगा । कहुँ पट कहुँ  धनु तीर निषंगा ॥ 

परे चरन  प्रिय भरत जस उर लिए कृपानिधान । 
राम भरत मिलन बरनन किन कबि जाइ बखान ॥ 

बृहस्पतिवार, ०२ जुलाई २०१५                                                           

बिनयत भाल सिय पदुम पद धरे । परनत पुनि पुनि जोहार करे ॥ 
दिए असीस सिय बारहि बारा । उमगै उरस सनेह अपारा ॥ 

नभ सराहि सुर सुमन बरसइहिं । रघुनाथ तिनहु मात  भेंटइहि  ॥ 
परन पुंट जस सुमन समेटे । गुरु गुँह सानुज सों  तस भेंटे ॥ 

गुरबर पितु सुर बास जनावा । रघुबर  ह्रदय दुसह दुःख पावा ॥ 
भूसुत बहु बिधि  ढाँढस बँधाए  । कीन्हि काज प्रभु  बेद बताए  ॥ 

बोले पुनि मुनि देत  दुहाई । भयो बहुंत बहुरौ रघुराई ॥ 
भरी सभा भित भरत निहोरे  । कहें उचित रघुबर कर जोरे ॥ 

गुरहि  दिए अग्या सिर  धारिहौं । सुर बसे पितु कही कस टारिहौं ॥ 
ही बिधि बीते बासर चारी  । बहुरन सब जन कहि कहि हारी ।। 

गुरु अग्या सिरुधार किए गहै  राम बन राज । 
पितु कही अनुहार तजे कौसल राज समाज ॥ 

शुक्रवार, ०३ जुलाई, २०१५                                                                  

सेवौंउँ अवध पुर अवधि लगे । देवउ प्रभो मोहि सिख सुभगे ॥ 
कहे भरत तुअ जगत भरोसो । पालन  पोषन कहिहौं को सो ॥ 

पर परिजन की गह कानन की । हमरी चिंता बिरधाजन की ।। 
मातु सचिउ मुनि सिख सिरु धरिहौ । पहुमि प्रजा के  पालन करिहौ ॥ 

देइ कहत अस प्रभु पद पाँवरि । राम नाम के जस दुइ आखरि ॥ 
किए कर संपुट धरि सिरु राखा । प्रजा प्रान जामिक जिमि लाखा ॥ 

चारि दिवस पिछु अवध पुर आए । जनक राज तहँ रहें पधराए ॥ 
सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू । चले तिरहुत साजि सब साजू ॥ 

बसत भरत पुनि भयौ बिरागे । घटै तेजु कछु देह न लागे ॥ 
नंदिगांव कुटि करत निबासिहि  । धार मुनिपट सुख भोग उदासिहि ॥ 

मन मंदिर कर मूरति जिहा नाम सिय राम । 
नित पूजत पद पाँवरी करए प्रजा के काम ॥ 

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शनिवार ०४ जुलाई,२०१५                                                                     
भरत प्रीत प्रभु प्रियबर रूपा ।कहा जेहि निज मति  अनुरूपा ॥ 
कीन्ह प्रभु जो बन अति पावन । सुनहु चरित मुनि सो मन भावन ॥ 

सुरप सुत क बार बन कागा ।हतत चोँच सीता पद लागा ॥ 
चहे लेन सठ प्रभु बल परिखा । सींक धनु सायक दिए भल सिखा ॥ 

भरता लकहन जानकी साथा । रहत बारह  बरसि लग नाथा ।। 
बहुरि दिवस एक मन अनुमाने । चितकूट अब मोहि सब जाने ॥ 

बसे मुनिहि बन माँगि बिदाईं । अनुसर पुनि अत्रि  आश्रमु आईं ॥
किए अस्तुति बर सुन्दर बानी । भाव पूूरित भगति रस सानी ॥ 

अनसूया सिया निकट बिठाई । नारि धरम के चरन जनाई ॥ 
नदी नीर बिनु पिय बिनु नारी । पूर्ण सरूप होत पियारी ॥ 

चले बनही बन भगवन लखन जानकी संग । 
बिराध निपात आ तहँ रहै जहाँ सरभंग ॥ 

रविवार, ०५ जुलाई, २०१५                                                                  

हरि पद गह मुनि भगति बर पाए । जोग अगन जर हरि  पुर सिधाए ॥ 
पीछु लखन आगें रघुराई । मिलि चलें मुनि मनीष निकाईं ॥ 

दिए कुदरसन अस्थि पथ कूरे । पूछ मुनिन्ह नयन जल पूरे ॥ 
रहेउ रिषि जिन निसिचर भखने । करौं रहित कहि तिन तैं भुवने ॥ 

कुम्भज के एक सिष्य सुजाना । देइ ताहि  दरसन भगवाना ॥ 
गन ग्यान कर दिए बरदाने । बहुरी कुम्भज रिषि  पहिं आने ॥ 

आनै के जब कारन  कहेउ । चितब प्रभो मुनि अपलक रहेउ ॥ 
निसिचर मरन मंत्र गोसाईं । पूछेउँ मोहि मनुज के नाईं ॥ 

बसौं कहाँ अब पूछ बुझाइहि  । दंडक बन प्रभु बसन सुझाइहि ॥ 
पंचबटी बहै गोदावरी । नदीं बन ताल गिरि  छटा धरी ॥ 

खग मृग वृन्दार वृंदी गुंजि मधुप सुर बंध । 
आन बसिहि विभो अस जस सुबरन बसिहि सुगंध ॥ 

सोमवार, ०६ जुलाई, २०१५                                                          

सूपनखा दनुपति के बहनी । तामस चरनी राजस रहनी ॥ 
पंचबटी आईं एक बारा । कहै चितइ चिट लखन कुआँरा ॥ 

मम अनुरूप पुरुख जग नाही । तुअ सरूप को नर नहि आही  ॥ 
बरन  लखन जब अवसर दीन्हि । लाघवँ श्रुति नासा बिनु कीन्हि ॥ 

बिलकाहट गइ खर दूषन पाहीं । भ्रात पुरुख बल धिग धिग दाहीं ॥ 
पूछत कहनि कहि सकल सुनाए । बना सेन चढ़ि धूरि धुसराए ॥ 

निसिचर अनी आन जब जानी । भरि सायक हरि दिए चैतानी ॥ 
कहे दूत खर दूषन जाई । करे कृपा समुझए कदराई ॥ 

कहु सूल कृपान कहूँ संधान सर चाप ब्याप चले । 
नभ उरत निसाचर अनी उप रकत जिमि फुँकरत  साँप चले ॥ 
धनुष कठोर करे घोर टकोर रघुबीर डपटत दापते  । 
लगत सर चिक्करत उठत महि परत निसिचर निकर काँपते ॥ 

मारे सकल दल गंजन लेइ समर प्रभु जीत । 
चितव सीता सुर नर मुनि सब के भय गए बीत ॥ 

मंगलवार, ०७ जुलाई, २०१५                                                                

निबरे रिपु सिर करिहि हुँअ हुँआ । लखि सुपनखाँ खर दूषन धुआँ ॥ 
जाइ दसमुख प्रेवरिहि बहु भाँति । करसि पान सोवसि दिनु राति ॥ 

लोक बिनु रीति राज बिनु नीति । प्रनत बिनु प्रनति प्रनय बिनु प्रीति ॥ 
मसड तवे गुन मन तू ग्याना । नासिहि चेतस मद रस पाना ॥ 

तव सिर  आरति कह  उभराई । रावनु रयन नीँद  नहि आई ॥ 

चला एकला जान चढ़ि आना । कपटी मृग मारीच पयाना ॥

दसेवह कनक मनि रचित  मनोहर । निरखि सिआ बहु रीझिहि तापर ॥
कहति सुनहु रघुबीर दयाला ।आनै देहु रुचिर मृग छाला ॥

धर चाप भाथ  बाँधि कटि, लछिमनु कह समुझाए । 
करेहु रखबारि सिअ कर इहँ निसिचर बहुताए ॥ 

बुधवार, ०८ जुलाई, २०१५                                                                           

प्रभु पिछु  कपटी मृग सहुँ धाया । माया कर गै दूर पराया ॥ 
कबहुँ त प्रगटत कबहुँ गुंठाए । कबहुँ दूरत कबहूँ नियराए ॥ 

चढ़े घात करि घोर हँकारा । सुमरेसि राम लखन पुकारा ॥ 

करुन पुकारि सुनिहि जब सीता । जानि संकट भई भयभीता ॥ 

मर्म बत कहि लखनहि  पठायो  । लल जिह किए पुनि  दसमुख आयो ॥
दयामई दनुपति जति जानी । दायन दीन  भीख लै आनी ॥ 

जति भूसा धर रथ बैठावा । हाँकि लिए सिय गगन पथ जावा ॥
 बिलखत नभगत मातु बिलापहि  । आरत धूनि चहुँ पुर ब्यापहि ॥  

रामहि राम पुकारति पथ अति आरति  सिय जात । 
जानकिहि जान जटाजू खाएसि घात छँड़ात ॥ 

 आए आश्रमु अनुज सहित, देखि जानकी हीन । 
भए ब्याकुल प्रभु अस जस होत बिनहि जल मीन ॥ 

बृहस्पतिवार, ०९ जुलाई, २०१५                                                                      

गह घन नयन पलक जल धारा  । बिलपत बिरहा हेर बिहारा ॥ 
हे नद निर्झर हे नग सयनी । दरसिहौ कतहुँ मम मृगनयनी  ।। 

खग मृग मधुकर बन बन पूछा । उतरहु भयउ उतरु सों छूछा ॥ 
बन लीकहु लषनहु नहि लेखे । पर हति तब गीधपति देखे ॥ 

सिा हरण कर कहि पद लागा । हरि हरि मुख धरि देहि त्यागा ॥ 
तासु परम गति देइ उदारे । सबरीं आश्रमु चरन पधारे ॥ 

मोर सरिस को सुभग न होई ।पखारत चरन लपटहि रोई ॥ 
मैं मतिमंद अधम मम जाता ।कह हरि री सुनु मोरी बाता ॥ 

जो भद्रजन भव भाव बिहीना । दरसिहि पीन होत अति दीना ॥
मधुर मधुर रूचि रूचि फल देहा । खाए रुचित प्रभु सहित सनेहा ।। 

कहसि सबरीं  दोउ कर बाँधे । पंपा सरिह पुरी किष्कांधे ।। 
अहइ भास्करि जहँ के  राई । जाहु तहाँ प्रभु किजौ मिताई ॥ 

सोइ बन पुनि तजत चले, मन मुख धरत बिषाद । 
लखन प्रतिपल बिरह बिकल कहत नेक संवाद ॥ 

शुक्रवार, १० जुलाई २०१५                                                                          

ऋष्यमूक परबत के सीवाँ ।  सचिव सहित तहँ रहे सुगीवाँ  ॥ 
पैठेउ जुगल जान निज भाई । भयानबित हनुमंत पठाईं ॥ 

बिप्र सरूप तन रूप धराई । गयो तहाँ पूछत सिरु नाईं ॥ 

स्यामल गौर सुन्दर दोऊ । बिचरहु बन बन को तुम होऊ ।। 

कहत कथा सब निज रघुराई । हनुमत परिचय  पूछ बुझाई ॥ 

मानसि ऊन प्रगस कपि रूपा । परे चरन  परचत जग भूपा ॥ 

अनुज सहित निज नाथ समेले । जान हिती हितु सादर मेले ॥ 

हनुमत उभय साख जब दाना । लखन सकल इतिहास बखाना ॥ 

हमहि देखि परबस नारि रामहि राम पुकारि । 
अस कह कपि पति दिए तुरै दीन्हि जो पट डारि ॥ 

बसेउ बन कवन कारन पूछे अब रघुनाथ । 
कह सो बालिहि संग  जौ बीती आपनि साथ ॥ 

शनिवार, ११ जुलाई, २०१५                                                                           

करहि सदा हितु हितुहि हिताई । निबेर कुपथ सुपंथ चराई ॥ 
सुगीन प्रीत प्रतीती गाढ़ी । त रघुबर बालि बधबन बाढ़ी ॥ 

बहुरि  समुख कपि नाथ पठेऊ । तर्जत ताहि  बालि गर्जेऊ ॥ 
रामु लखन कपिपति हितु जानी । जूझन चला महा अभिमानी ॥ 

कहा  मम का दोषु गोसाईं । कहि हरी हरिहौ तिया पराई ॥ 
तब प्रभुकर गयऊ सो मारा । दखी बिकल बहु बिलपत तारा ॥ 

प्रभु उपदेसत देइ ग्याना । जीव नित्य मोहित मन जाना ॥ 
दीन्हि  पुनि पद सकल समाजा । हरिप राजु अंगद जुबराजा ॥ 

तपस बिगत बरखा आइ ऋष्यमूक के पास । 
देवन्हि गुह रुचिर रचे, किएँ रघुनाथ निबास ॥ 

रविवार, १२ जुलाई, २०१५                                                                             

 जब ते दिग आगत गिरि बस्यो । दरप दसहु दिसि दिककर लस्यो ॥ 
कुञ्ज कुञ्ज मधुकर कल रागें । बन उपबन मन रंजन लागै ॥ 

कंज कलस कर  करधन धर के । नाचिहि बरखा छम छम कर के ॥ 
नीरज नुपूर गिरि गिरि आवा । समिट समिति सरि सरित तलावा ॥ 

छुद्र भरी बही चलीं तोराई । जिमि थोरहुँ धन खल इतराई ।। 

सकल महिका हरिन्मय होई । भए सब धनिमन दीन न कोई ॥ 

कबहुँक गगन घटा घन  छाईं । कबहुँ किरन हरि चाप बनाईं ॥ 
बरखा  बरखत माँगि बिदाई । तासु बहुरत सरद  रितु आई ॥ 

पुष्कल भयउ पुष्करी खग मग खंजन आए ।  
सस सम्पन्न महि सोह रहि हरि सिय सुधि नहि पाए ॥ 

सोमवार, १३ जुलाई, २०१५                                                                   

राजतहि सुगीँवहु बिसरायो । लखन भगवन कुपित जब पायो ॥ 
गहे  बान  जब  धनुष चढ़ावा । तब अनुजहि रघुपति समुझावा ॥ 

यहां भगत हनुमंत बिचारे । राउ राम के काज बिसारे ॥ 
तेहि कहत सुगीँव  सुध पाईं । जहँ तहँ बानर दूत पठाईं ॥ 

कोप ज्वाल बर  लखमन आए । गहि कन त कपिपति अति अकुलाए ।। 

भयाभिभूत ताहि करि आगे । गत प्रभु  पहि रररत पद लागे ॥

कहत बिनइबत सहन कर जोहा । नाथ बिषय सम मद नहि होहा ॥
जाहु कह कपि जूह चहुँ ओरे । सिए  सुध लिए बिनु को न बहोरे ॥

पवन सुत पिछु बुला निकट प्रभु निज सेवक जान । 
कारज पटु तिन भान के, दिए मुद्रिका  कर दान ॥ 

मंगलवार, १४ जुलाई, २०१५                                                                   

जाइहु दिग दिग चारिहुँ फेरा । लाइहु रे मम  सिअ के हेरा ॥ 
बिरति अवधि इत सुधि नहि सीता । मारिहि पति कपि भए भयभीता ॥ 

पंथ पंथ बन पदचर देखे । रघुबर तिय जब कतहुँ न देखे ॥ 
कि तबहि अंगद सुधि कर धारे । सिय सत जोजन सागर पारे ॥ 

बुधि बिबेक बिग्यान निधाना । रीछ पति कहि  बुला हनुमाना ॥ 
पार बसे  खल सिंधु अपारा  । एहि सुनि  कपिबर गह बल भारा ॥ 

देउ उचित दिग दरसन मोही । रघुबर कारज पूरन होही ॥ 
जामवंत सों कह अस बाता । गगन पंथ पुनि दरसिहि जाता ॥ 

बार बार रघुबीर सँभार तीर गिरि जब चरन धरे । 
जलनिधि ताक तब कह मैनाक तासु थाक हरन करे ॥ 
देखिउ जात अहिन्हि के मात सुरसा एहि बात कही । 
दीन्ह आसान सुरगन मोहि केहि बिधि जावन दै नहीँ ॥ 

सोरह जोजन मुख करी  हनुमत भए बत्तीस । 
पठइ पुनि बाहिर आए माँगि बिदा नत सीस ॥ 

बुधवार, १५ जुलाई, २०१५                                                                         

रहइ सिंधु निसिचरि भयंकर । गहइ छाँय घरि खाए गगनचर ।  
ताहि मारि पुनि आगहु बाढ़े । देख  गिरबर धाए तुर चाढ़े ॥ 

पार सिंधु एकु  दुरग बिसेखा । कनक कोट करी लंका देखा ॥ 
चौपुर चौहट बाट  सुबट्टा । अतिबलि निसिचर सैन सुभट्टा ॥ 

बरनि  नहि जाए बाजि  बरूथा । गनि  न जाए पदचर रथ जूथा ॥ 
सैल माल गह देह बिसाला । बन उपबन बहु सुन्दर ताला ।। 

कोटिन्ह  भट चहुँ दिसि रच्छहीं । धेनु महिषा मनु खल भच्छहीं ॥ 
पुनि हनुमत सुमिरत जग भूपा । पैठ नगर धर अति लघु रूपा ।। 

मंदिर मंदिर सोध किए, निरिखिहि कतहुँ न मात । 
 देखि तुलसिका बृंद तहँ, भई हरष की बात ॥