Saturday, 26 December 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४५ ।। -----

शनिवार २६ दिसंबर, २०१५                                                                                           
सदा रघुबर सरन महुँ रहियो । कर छबि नयन चरन रहि गहियो ॥ 
स कह सर्जन के करतारी । जग पालक जग प्रलयंकारी ॥ 

उपदेसत  पुनि सिउ भगवाना । भयउ आपहु अन्तरध्याना ॥ 
एहि बिधि तज सुर नगर निवासा । अनुचर संग चले कैलासा ॥ 

बहुि बीर मनि भंवर समाना । भगवन पदुम चरन करि ध्याना ॥ 
आपहु लेइ कटक चतुरंगा । चले महबीर सत्रुहन संगा ॥ 

राम चरित जस सिंधु अपारा ।  एहु एकु तीर तरंगित धारा ॥ 
करत जे जसगान अवगाहीं । गावहि सपेम सुनिहि सुनाहीँ ॥ 

रोग सोक बियोग संग तिन संताप न जोहिं ।  
सिअ राम पेम रस पाए के जीवन रसमय होंहि ॥

सोमवार, २८ दिसंबर, २०१५                                                                                      

कहत अहिपत पुनि हे द्विजबर । तदनन्तर सो बाजि मनोहर । 
मोर पंख मनि चँवर सुसोहित । कोटिक समर सूर सों रच्छित ॥ 

भारत के अंते अस्थाना । हेमकूट परबत जग जाना ॥ 
सहस दसह जोजन लमनायो । बिस्तारित चहुँ पास पुरायो ॥ 

धातु जुगत सिखि श्रृंग सुसोभा  । रजत संग सुबरन मन लोभा ॥ 
तलहट एकु उद्यान बिसाला । जाके तीर तीर तरुमाला ॥ 

रचे धरा जिमि सिरु कल केसा । मार्जक जस तहँ बाजि प्रबेसा ॥ 
महमन जात तहाँ तिन संगा । भए एकु  अचरज कारि प्रसंगा ॥ 

ताहि कहउँ मैं तोहि सुधीरा । अकस्मात सुनु तासु सरीरा ॥ 
टारे न टरे भए जड़ताई । केहि भाँति नहि चलिहि चलाईं ॥ 

ठाढ़ि तहाँ अविचल तुरग प्रतीति नग संकास । 
औचक पुकारि करत पुनि गयऊ सत्रुहन पास ॥ 

 जाइ सब बृत्तांत सुनाईं । नहि जानत हम कस गोसाईं ॥ 
भयउ तासु जड़तम सब अंगा । बिचरत गए अह जहाँ तुरंगा ॥ 

ताहि बिचारत पुनि कछु कीजो । जो करि उचित जान सो कीजो ॥ 
सत्रुहन पल्किन पट बिस्तारै । भए चौपट दुहु नयन दुवारे ॥ 

लिए संग निज सुभट मुनिराए । तुरतै तासु निकट चली आए ॥ 
सरभस चरत फिरिहि सब देसा । होहि दसा अस रहि न अँदेसा ॥ 

गहे चरन पुष्कल निज बाही । किए जुगत उपरे न उपराही ॥ 
टारे जब नहि टरे तुरंगा । पूछिहि सत्रुहन सुमतिहि संगा ॥ 

होइँहि अस काह कि गहिहि सकल देहि जड़ताए । 
अजहुँ इहाँ मंत्रि बर करि चाहिअ कवन उपाए ॥ 

बुधवार, ३० दिसंबर, २०१५                                                                            

जेहि सों चालक बल बहुराए । महोदय करिहउ सोइ उपाए ॥ 
गतिहि कोउ मत मतिगति तोरे ।  कहे मंत्रि एहि नहि बस मोरे ॥ 

जानिहुँ मैं प्रभु आँखन देखी । तासों अतीत मोहि न लेखी ॥ 
दरस बिषय होइहिं जग जोहीं । ताहि माहि मोरे गति होंही ॥ 

हेर फिरत अब सब बन डेरे । चाहिए करि अस रिषि मुनि हेरे ॥ 
जो यह जानन में कुसलाता । भई इहाँ अस कस एहि बाता ॥ 

सत्रुहन पुनि निज अनुचर ताईं । कुसल रिषि मुनि करिअ हेराईं ॥ 
एक अनुचर प्राचिहि दिक् पठाए । चरत सो जोजन भर चलि आए ॥ 

चलिअ बदन हरखनि पवन बिषाद घन बिथुराइ । 
तहाँ ते एकु अति सुंदर आश्रमु दिए देखाइ ॥ 

 मानुस सन पसु पाँखि जहाँ के । बिचरहि बैर  भाव बिसरा के  ॥ 
कारन सबहिं  गंगा अस्नाए । तासु सकल अघ गयउ दूराए ॥ 

होइहि रुचिर रहस्य चहुँ फेरे ।  रहि आश्रमु शौनक मुनि केरे ॥  
लिए रनी सब बात के हेरा । चरन फेर आइहिं निज डेरा ॥ 

 भइ अतिसय बिसमय कर बानी । समाचार जब कहत बखानी ॥ 
अनुचर जैसेउ निगदन कहीँ । हरखिहि सत्रुहन बहु मन मनही ॥ 

हनुमन पुष्कलादि लिए संगा । आए मुनिहि पहि तूल तुरंगा ॥ 
गहे चरन सुमिरत श्री रामा । भयउ दंडबत करिहि प्रनामा ॥ 

बलबन में महा बलबन सत्रुहन आवब जान । 
शौनक मुनि किए स्वागत  पाद्यार्ध प्रदान ॥ 

बृहस्पतिवार, ३१ दिसंबर, २०१५                                                                                

भेंट सपेम  दीन्हि सुआसन । बैठे सब सुनि मुनि अनुसासन ॥ 
किए बिश्राम जब श्रम बहुराई । सकुचत मुनिबर पूछ बुझाईं ॥ 

काँकरि पथ बन भूमि पहारा । करि केहरि सा सरित अपारा ॥ 
काल ब्याल कुरंग बिहंगा । चतुरंगिनी कटकु लिए संगा ॥ 

घन ते घन बन गोचर जैसे । मारग अगम फिरिहु कहु कैसे ॥ 
दूर भरे पग  करिहि बखाना । लमनाए माग दूर है जाना ॥ 

सुनि सत्रुहन मुनिबर कर बाता । भए मुदित भई पुलकित गाता ॥ 
हिलगिहि तसं पुनि जुग पानी । ए निगदत भई गदगद बानी ॥ 

मुनिबर एकु नीक निकुंज कली कुसुम बिकसाए । 
घुर्मित मोर तुरग तहाँ, अकस्मात् चलि आए ॥ 

शनिवार २ जनवरी, २०१६                                                                                  

प्रबसित तहँ एकु उपबन तीरा । भयउ तासु जड़वंत सरीरा ॥ 
हमरे मन अतिसय दुःख पाईं ।सूझे  नहि पुनि कोउ उपाई ॥ 

देखि गात स्तम्भित तुरंगे भए सब दीन तासु दुःख संगे । 
हमरे जस बड़ भागि न कोई । दैवात तोर दरसन होईं ॥ 

आरत  अरनव मन अवगाहीं  । मुनिबर तुम तरिता बनु पाहीं ॥ 
सोच करिअ उर दारुन दाहा । तुरग दसा कहु कारन काहा ॥ 

याहू संकट मोचित जस होहीं । कहउ सो बिधि कृपाकर मोही ॥ 
सत्रुहन पार्रिहि पूछ बिधाना । तब शौनक मुनिबर बिद्बाना ॥ 

दृग द्वारि पट ढार के, छिनुभर् धरे ध्यान । 
तनिक बेर लयलीन रह सकल रहस लिए जान ॥ 

प्रफुरित होत चकित भए नैना । पुनि सत्रुहन सन  बोलि ए  बैना ॥  
बैठे  संसय सरि के तीरा ।  सत्रुहन श्रवन होए  गम्भीर ॥ 

भयउ तुरग कस गात स्तम्भा । कारन किए मुनि कहन अरंभा ॥ 
अहहीं गौड़ नाउ एक देसा । जहँ एकु बहु  रमनीक प्रदेसा ॥ 

सातिक नामि द्विज तहँ बासिहिं । जसु तेज चहुँ पास प्रकासिहिं ॥ 
करिहीं तप कावेरी कूला । छन पल पहर रयन दिन भूला ॥ 

एक दिन पयस दुज पवन पयाएँ । तीजे दिन सो कछुहू न पाए ॥ 
चलिहिं नेम ब्रत तप एहि भाँती । ऐसेउ बिरत रहि दिन राती ॥ 

सर्ब नासी काल तबहिं, गहे दंड कर पास । 
तपन चरन रत द्विजन्हि गयउ संग लए फाँस ॥  

सोमवार, ४ जनवरी, २०१६                                                                                  


पहिरत रतन अभूषन नाना । सातिक नामि सो बिप्र बिहाना ॥ 
सोहामान बिमान चढ़ेऊ । मेरु गिरि कर सिखर उतरेऊ ॥ 

जम्बालिनि जहँ बहि चलि आई । बसिहि तासु तट रिषि मुनिराई ॥ 
तपन चरन  रत मगन ध्याना । रयन रयन बिनु दिनु दिनु बिन जाना ॥ 

सोए द्विज कीन्हि तहँ बासा । रहिहि अनंदित करिहि निबासा ॥ 
पुनि मनगत अभिलाषा जागे । सुर कामिनि सों बिहरन लागे ॥ 

कामोन्मत्त मन अस रंगा । बसिहि तहाँ रिसि महरिसि संगा॥ 
किए बर्ताउ न जाइ बखाना । भरे घमन करेउ अपमाना ॥ 

तासु उद्दंड अजहुँ त बढ़े अधिकाधिकाइ । 
रिषि मुनि हेतु सो ब्रम्हन, भयऊ अति दुःख दाइ ॥ 

मंगलवार, ०५ जनवरी, २०१६                                                                                    

दुखित रिषिहि मन कोपु ब्यापा । रिसत बिप्रन्हि दीन्हि श्रापा ॥ 
काढ़ि बचन पुनि अति खिसियाईं । होहु कपटी निसाचरु जाई ॥ 

तुम्हरे बदन गहे बिकारा । केहु भाँति नहिं जाइ सँवारा ॥ 
सुनिहि श्राप मिटिहि अभिमाना । बिप्रन्हि मन बहुतहि दुःख माना ॥ 

जल बिनु बिकल मीन के नाईं । बोले सभीत सीस झुकाईं । 
सयान सुजान दीनदयाला । श्राप अनुगह करिहु कृपाला ॥ 

मैं लघुबर बड़ मम अपराधा । अपकारत तुम्हहि मैं बाधा ॥ 
अनुग्रह करि तब रिषिहि सयाने । मधुर रूप एहि  बचन बखाने ॥ 

रघुबर कर तजि तुरग इहँ अइहीं कालहि पाएँ । 
होइहहु तब साप मुकुत करत ए  कछुक उपाएँ ॥  

बृहस्पति /शुक्र , ०७/ ०८ जनवरी , २०१६                                                                                     

तेहि औसर त्याजित तुरंगा । करिहु  अचर नज बेगि प्रसंगा ॥ 
सुमधुर आम कथा तब होंही ।मिलिहीँ श्रवन सुअवसर तोहीं ॥ 

गाहे सीस भयंकर श्रापा । होइहि तब तासों उदयापा ॥ 
अस्व गात थंभित जस होईं । करिहि श्रापित राकस सोई ॥ 

रिषिहि कहि हरि कीर्तन ताईं  । करिहौ राम कथा सुखदाई ॥ 
लागिहि श्राप कटिहि समूला । होइहिं सकल दसा अनुकूला ॥ 

रिपुदल बीर दमन करतारी । करि सत्रुहन मन अचरजु भारी ॥ 
कर्म बचन बड़ गूढ़ गभीरा । कहि हरिअर पुनि रन धीरा ॥ 

सातिक  नाउ धर ब्रम्हन कर्म संग मुनिराए । 
अमरावती पैठत पुनि लहिहि राकस सुभाए ॥  

कर्मानुसार गति जस होंही । तेहि बरनत कहउ मुनि मोही ॥ 
जेहि करम जस जमपुर लाही । कहिअ बुझाइ मोहि जनि ताही ॥ 

बोले मुनि हे हंसकबंसा । धन्य तुम्ह रघुकुल अवतंसा ॥ 
तव बुधि सदा बचन अस बूझिहि । तासु अबर अरु कछु नहि सूझिहि ॥ 

चाहहु सुनै कर्म गति गूढ़ा । कीन्हिहु प्रस्न मनहु अति मूढ़ा ॥ 
तुम्हहि बिषय बिदित सब होईं । अहहि ताहि संदेहू न कोई ॥ 

तथापि हित हुँत पूछ बुझाहू । मुनिबर मुख पूनि पुनि सुनि चाहू ॥ 
कर्म लेख धरि बिचित्र सरूपा । तेहि के गतिहि गहि बहु रूपा ॥ 

तात सुनिहु सादर मन लाईं । सुनिही सो भव मोचन पाईं ॥ 

जो सठ अपकारी परधन पर नारी उपर कुडीठ धरे । 
भोग बुद्धि कर पुनि बरियाई तापर अधिकार करे ॥ 
तासु बाँधि महाबली जम कर  दूत धरी ले जइहीं । 
काल रसी तिन करषत कसी तामसी नरक गिरइहीं ॥ 

जातुहु तब लगि राखिहि जब लगि सहस बरस नहि पुरने । 
गहि कर दंड जमदूत प्रचंड पापकन्हि हनिहि घने ॥ 
पाप भोग तैं एहि बिधि भल भाँति  भोगत सो जातना । 
बाराहु जोनि जनमत पल पल लहे पुनि दुःख दारुना ॥ 


पाए बहुरि मानस जोनिहि क्रमबत सोई पाप करे । 
पुरबल जनम केर कलंक संसूचित चिन्हार धरे ॥ 
जो निज भरिमा भरिमन हुँत करें द्वेष पर प्रानिन्हि से । 
पापभिरत सो पापक निपतत अँध तामसि नरक बसे ॥ 

जौ परहंता हतिरंता सो रौरव गिरएँ जाइहीं । 
तहँ कोपत रुरु पंखि छिति छत तेहि के देहि खाइहीं ॥ 
निज तात द्रोहि ब्रम्हन बिद्रोहि काल सूत नरक परे । 
लमनत जो खेतानुगत सहस दस जोजन लग पसरे ॥ 

चतुस्तनी बिद्रोही कर देइ दंड आघात । 
पचइहीं ताहि जमराज किंकर नरक निपात ॥  

शनिवार, ०९ जनवरी, २०१५                                                                            

गौ तन रोम बरस गिनि जोरे । पचिहिं तहँ सो समउ न थोरे ॥ 
जोग पुरुख बिनु जो नर नाहू । देइ दंड अन्यानय काहू ॥ 

लोभ बिबस बिप्रन्हि दुःख दाइहिं । सोए नरक सो बहु दुःख पाइहिं ॥ 
तहाँ दूत सठ बदन बराहू । देइ ताहि तस दारुन दाहू ॥ 

सेष पाप तब कस निबराहीं । खल जोनिहि जब जनमत जाहीं ॥ 
कहत जति पुनि करम गति आगे । सत्रुहन चेत धरत सुनि लागे ॥ 

मोह बिबस बिप्रन्हि गउ केरे । जीवन हेतु द्रब्य धन हेरे ॥ 
पठाइ जब परलोक बिधाता । सो अँधकूप नरक गिरि जाता ॥ 

जो को आपनि लौलुपताईं । जीहातुर मधुरान्न पाईं ॥ 
न त देवन्हि न सुहृदय देहीं। गिरएँ जाइ कृमि भोजन तेहीं ॥ 

सुबरन कर अपहरन करि बिप्रन्हि धन अप हारि । 

संदंस नरक पतत सो भुगतिहि दुःख अति भारि ॥ 

मंगलवार, १२ जंनवरी, २०१६                                                                                     


पेट परायन जो मति मूढ़ा । भरत पुरत निज तन भए बूढ़ा ॥ 
अबरु आप तें जनिहि न आनै । लेइ जान जग देइ न जानै ॥ 

तप्तक तापित तैल पुरावा । कुम्भी पाक गिरइँ सो जावा ॥ 
पामर पुरुख भोगमति संगा । चाहिँ गमन अगम्या प्रसंगा ॥ 

लोहित मूरति दूत तपइहीं  । तासंगत अँकबार करइहीं ॥ 
जो मद उन्मत निज बल ताईं । लंघिहि बेद बचन बरियाईं ॥ 

पयसत रकत अमिष सो खाहीं । बैतरनी अरनी अवगाहीं ॥ 
छूद्र गेहिनि द्विज भए गेही । पुयोद नरकु निपातत तेहीं ॥ 

दँतुला दूत अस पेरिहि जस पेरन पेराइँ । 
तहाँ केर निबासित काल होतबहुँत दुःख दाइ ॥ 

शुक्रवार, १५ जनवरी, २०१६                                                                                         

जो धूत कृत कुचाल कुसाजा । संत जनहि सों करिहि ब्याजा ॥ 
दंभि खल दल दर्प कल ताईं । बैसस नरकहि जात गिराई ॥ 

सबरनी जोनि बीर त्याजिहि । अस पामर सहुँ लाजहु लाजिहि ॥ 
बीरहि कुण्ड सो जाए गिराए । पयसन छाँड़ि तिन बीर पियाएँ ॥ 

जो खल जल जल लाग लगावैं । देइ गरल धन द्रव्य चुरावैं ॥ 
महपापक अपहारिहि गाँवा । सारमयादन सो गिरि आवा ॥ 

करिहि संचय पाप कर रासी । बोले असाँच बहुंत सुपासी ॥ 
देइ अधमी असाँची साखिहि । अबीचि नरक जम तिन्ह राखिहि ॥ 

धरत केस करषन करत नीच सीस करि डारि । 
कहरत कलपत तहाँगत भुगत दुखारत भारि ॥ 

Wednesday, 23 December 2015

----- ॥ टिप्पणी ९ ॥ -----

>> राजू : -- हगने की कहीं प्रतियोगिता हो तो ये हगरू प्रथम स्थान प्राप्त  करेगा.....

>> ग़रज़ी गराँ कीमती उस चीज का क्या कीजिये,
        मिले जो गरीबे-ग़म से गुज़रने के बाद ही.....

>>  अधिकोषों ( बैंक ) में संचित हमारा धन लेकर भगोड़े उद्योगपति  नहीं भागेंगे इसकी क्या गारंटी है ?
धनादेश से भुगतान की अनिवार्यता समाप्त की जाए.....

कर चोरों और ऋण खोरों को विदेश भगाने में सभी सत्ताधारी मास्टर हैं.....जहाँ  सांसद ही देश का धन लेकर विदेश भाग रहे हों वहां कौन सा तंत्र होगा.....?

>> राष्ट्र-पुत्र बना देना चाहिए इस कार्टूनिष्ट को, जिन्हें माता से भय लगता हो आजकल ऐसे सपूत मिलते कहाँ हैं.....
>> पर्यावरण असंतुलन व् बढ़ते प्रदूषण के धक्के से ही विगत कई पी- एम. असाध्य रोगों से पीड़ित होकर गिरे और खटिया पकड़ के उठे, एक तो अब तक नहीं उठे हैं ।  ये भी चुन ले कि किस खटिया में गिरना है.....

>> आओ हम देसी गायों का पालन पोषण कर उसे किसी निर्धन निर्व्यसनी गोपाल को प्रदान करें,स्वयं के सह  देश को स्वस्थ् व् सुपोषित करने का संकल्प लें.....

राजू : -- और संसद के भोजन का क्या ? बनाने वाले जाने उसमें क्या क्या करते होंगे.....


>> मैने एक दूधवाली वाली से बोला संसद में बैठकर दही खाना कितना सरल है और गांय पालना कितना कठीन है, तो उसने कहा सरलता से प्राप्त हुवा दूध असली नहीं होता, होगी वो कुत्ते- बिल्लियों के दूध की दही.....

>> जनादेश की धज्जियाँ उड़ाती हुई संसद है ये.....

>> किसी चिटफंड कम्पनी के जैसे काम करती हुई सरकार,
     जन- साधारण का पैसा सकेल कर पांच साल में चम्पत होने वाली सरकार,
     यदि संसद में बैठकर उद्योग पतियों के हित में नियम बनाकर नीतियां निर्धारित करेगी तो कोई मानेगा.....? 

राजू : -- हाँ बजट भी यद्योगपतियों के हित में ही बनाएगी और किसानों के हित में दिखाएगी, चिटफंड के पैसे कोई उद्योग पति ही बनता है किसान नहीं इसीलिए.....  

>> मुल्क रियाज़त से बना करते हैं सियासत से नहीं..... सियासत बने मुल्क मुल्क नहीं होते..... 

>> राजू : - हाँ तो ! सत्ता के लालचियों द्वारा खेंची गई सीमा रेखाओं को कौन मानता है..... 

>> मिनिस्टर राजू : -- खोली है जो खाली हो जाएगी.....? 

 " उधर देख " 

मिनिस्टर राजू : -- किधर ? 

" उत्त्तर भारत की ओर.....देख खोली कैसे खाली हो रही है म्लेच्छ की नहीं.....भारत की 
क्यों ? क्योंकि सेना भारतीय नहीं है...... 

>> यदि सैन्यायुध कबाड़ न होते सैनिक कबाड़ी न होते, सेना भारतीय होती तब न केवल विभाजित भारत प्रत्युत शेष भारत भी म्लेच्छों से मुक्त हो गया होता..... 

>> गोरे नील की खेती को विवश करते थे, काले बिजली की खेती को विवश करते हैं और किसानों से खेत छीन कर उन्हें उद्योगों के बंधुआ श्रमिक होने पर विवश करते हैं, आज साप्ताहिक हाट में एक नई साड़ी मात्र इकत्तीस रूपए में उपलब्ध है और दाल डेड सौ रूपए प्रति किलो में, क्यों? क्योंकि उद्योगों को बिजली रेवड़ी जैसे बाँटी जा रही है , चोरी से दी जा रही है, श्रमिकों का शोषण  हो रहां है उद्योगों के टैक्स का अता-पता नहीं..... 

>> तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा, तुम मुझे बड़ा हाऊस दो मैं तुम्हें धंधा दूँगा, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें ढेंगा दूगा..... 

इस लेन-देन की कुत्सित मानसिकता ने भारत को सवतंत्र होने ही नहीं दिया, पंद्रह अगस्त ने जहां  जनांदोलन का  दमन कर दिया वहीँ छब्बीस जनवरी ने भारत को दास बनाए रखा । 


>> राजू : -- हाँ ! इसके जैसे तो कुत्ते-बिल्ली भी नहीं लड़ते 
             कल मटर के छिलके से झाँक के टर्र टर्र करता बोला मेरी पुनर्जन्म की कहानी सुनाओ न.....

मैं बोला पहले ये बता तू इस ग्रीन हाऊस में कैसे पहुँचा.....वो बोला यही तो कहानी है.....


>>  राजू : - मास्टर जी ! आप महात्मा काहे नहीं बन जाते..... ? 

" बन तो जाऊँ पर बड़ा हाऊस कौन देगा.....? 

राजू : -- मास्टर जी ! इंटरनेट में सेयर कीजिए न वहाँ देने वाले बहुंत हैं..... 
>> तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा, तुम मुझे बड़ा हाऊस दो मैं तुम्हें धंधा दूँगा, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें ढेंगा दूगा..... 

इस लेन-देन की कुत्सित मानसिकता ने भारत को सवतंत्र होने ही नहीं दिया, पंद्रह अगस्त ने जहां  जनांदोलन का  दमन कर दिया वहीँ छब्बीस जनवरी ने भारत को दास बनाए रखा । 
>> बहुत से फूल वाले ने यो भी बेरो कोणी कि उनको रतन जीवित भी सै की नहीं, समृति में कार्यक्रम आयोजित हो रिया था । भई दो चार फोटो सोटो दिखाओ और वस्तु स्थिति से अवगत कराओ..... 

औरों को लकवा आ आ कर मारता है, ये 'फूल' वाले लकवे को जा जा के मारते हैं , लगे तो गी ही.....

>> जाति क्या है इस भू. पू. प्रधानमंत्री की.....?

लड़का जब " आवारा गेंद" हो जाए तो वो मोटरसाइकिल उठाए फिरता है,
और कोई प्रधानमंत्री जब " आवारा गेंद" हो जाए तो वह हवाई जहाज उठाए फिरता है.....

हत्यारा डाकू धरे डाकू पकड़े चोर । 
पकड़ो पकड़ो चोर कह चोर मचावै सोर ॥ 

राजू : - सोर नहीं बाबा श्योर श्योर,

" ये शोर वाला शोर है "
राजू : - ये श्योर है
,तेरे को ज्यास्ती आता है

नई तेरे को आता है

पंजे छक्के कहीं के

चुप बे फूल

" बैठ जाओ.....बैठ जाओ.....
हराम खोर सहिंष्णु बन.....
अच्छा तू बना दे.....
ये भी कोई तरीका है.....
ये हमारी राष्टीय माँ  है.....
अच्छा फिर दादा कौन है.....
ये ले कुर्सी.....
ये ले अंडे.....
ये ले ये ले.....

सेवक स्वामि सबहि कू, पेट भरन सो काज । 
घुप अँधेरी नगरी में अनजाने करि राज ॥  
भावार्थ : - जहां सेवक हो अथवा स्वामी सभी स्वार्थ के परायण होकर अपने पेट की चिंता में ही लगे रहते हैं वहां नीति व् नियमों के अभाव में फिर पराए का शासन हो जाता है ॥ 













Wednesday, 9 December 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४४ ।। -----

सोमवार ०७ दिसंबर,२०१५ 

पुनि सियापति राम  के हेता । लए औषध आइहिं रन खेता ॥ 
औषध सहित गयउ जब आवा । निरखत हनुमन सब सुख पावा ॥ 

भेंट तासु रिपु हो कि मिताईं । साधु साधु कह करिहिं बड़ाईं ॥ 
कपि गण महुँ अद्भुद कपि मानिहि । बली माहि बलवन पद दानिहि ॥ 

महामना माहि महातिमही । बुला मंत्रिबर सुमति सों  कहीं ॥ 
जो निर्जिउ जिय देइ जियाइहिं । करिहौं अब मैं सोइ उपाइहिं ॥ 

लए भुजदल पुष्कल पुठबारे । पुनि हरिहर उर औषध धारे ॥ 
धर ते बिहुन तासु सिर लीन्हि । जुगत मन जुत जुगावत दीन्हि ॥ 

जुगे जोहि धर सोहि सिरु, पुष्कल देह सँभारि । 
भरे हरिदय हँकारि के कथे कथन हित कारि ॥ 

बुधवार, ०९ दिसंबर, २०१५                                                                                   

एहि निगदन मुख निकसिहि जोहीं । बीर सिरोमनि पुष्कल तोहीँ ॥ 
जीअत उठि बैठे हरषाईं । भेंटत सकल हरष उर लाईं ॥ 

कटकटात पूण दन्त रिसायो । सहज सरूप समर भुइँ आयो ॥ 
बजे पुनि घन घोर रन डंका । पचारि चला बयरु सो बंका ॥ 

गयउ कहाँ सब राम बिद्रोही । आजु ताहि हठि मारिहुँ ओही ॥ 
कहँ सर गन कहँ मोर निषंगा । बोलत  अस फरकिहिं अंगंगा ॥ 

तानि कान लग कटु कोदंडा । संधान रसन बान प्रचंडा ॥ 
दरसत ऐसेउ कपिबर ताहि । कहेउ कोमलि आन तिन पाहि ॥ 

बीर भद्र मारेसि तोहि, तुम जीवन्मृत होहु । 
रघुबर चरन प्रसादु सों पुनि नव जीवन जोहु ॥ 

शुक्रवार, ११  दिसंबर, २०१५                                                                                 

रामानुजहू मुरुछित होंही । जिअन सजीवन जोहत ओहीं ॥ 
लागेउ सिउ संभु के बाना । पीर परत भए साँसत प्राना ॥ 

परेउ पूण हताहत जहँवाँ  । अस कह दोनउ गयऊ तहँवाँ ॥ 
साँसत साँस बहोरत आने । तब हनुमत औषध उर दाने ॥ 

परेउ मुरुछि कहत रे भाई । मही माहि कादर के नाईं ॥ 
तुम बिक्रमी तुम मह बलबाना । नहि को बीर तुहरे समाना ॥ 

जो मैं जतनबंत जनिकाला । अहउँ बम्हचर के परिपाला ॥ 
त सत्रुहन उठि बैठु छन माही । न तरु ब्रम्ह चरनिहि मैं नाही ॥ 

देइ पलक पट डीठ दुआरे । जिअत सत्रुहन ए  बचन उचारे ॥ 

सिउ कहँ संकर कहँ संभु, गयऊ कहँ रन छाँड़ि । 
 कहत अस रिस दहत नयन लपट बदन पर बाढ़ि ॥ 

संग्राम सूर बीर बहुतेरे । पिनाका धारिहि मारि निबेरे ॥ 
महत्मन मह बीर हनुमंता । जतनत सबन्हि किए जीवंता ॥ 

तब सब गातबरन सजोहीं ।  साजत निज निज रथ अबरोहीँ ॥ 
रोष पूरनित हरिदे संगे । करेउ धुनि घन सब रन रंगे ॥ 

बजे भेरि पुनि धनबन भेदी । चले रिपुपुर चढ़े रन बेदी ॥ 
बीरमनि सन सुभटन्हि घेरे । चले आपहिं अबहिं के फेरे ॥ 

भिरन जैसेउ सम्मुख होंही । देखि ताहि सत्रुहन अति कोहीं ॥ 
तापर दहना अस्त्र चलाईं । तासों सकल कटक दवनाईं ॥ 

अरि अरि दवारि समतूल दहत धुरोपर छाए । 

लपट चहुँ दिसि चपेटन्हि प्रचंड रूप धराए ॥  

शनिवार, १२ दिसंबर, २०१५                                                                        

देखि महायुध के दहनाई । सीवा पार कोप किए राई ॥ 
जार जार  ज्वाल कन जागे । प्रत्यरथ बरुनास्त्र त्यागे ॥ 

मरम भेदि प्रहार के ताईं । सीतारत अनीक अकुलाईं ॥ 
कंपत  जब आरत अति गाढ़े । सत्रुहन तापर बायब छाँड़े ॥ 

चले बेगि बहु बात कराली । बिभंजन (रथ ) घन भई बाताली ॥ 
घोराकार घटा घन काला । धाए धार जिमि बदन ब्याला ॥ 

होइ जोहि बाताल अधीना । चहुँ दिसि छतबत भई बिलीना ॥ 
जोइ सैन रहि सीत दुखारी । बीतत दुःख पुनि होइ  सुखारी ॥ 

बीर मनि निज अनीक दिखि जब पीर गहाहि  । 
निबारक रिपु संहारक पर्बतास्त्र चलाहि ॥ 

रविवार, १३ दिसंबर, २०१५                                                                                     

बाताली परिहरै न कोपा । लेइ केतु करि चहुँदिसि रोपा ॥ 
परा समुख परबत गतिरोधा । बिहनए भए पूरन प्रतिसोधा ॥ 

पसर बिनु जब चरन पयाने । त सत्रुहन बज्रास्त्र संधाने ॥ 
मारि चोट अघात किए घोरा । बिनसिहि उपरुध उपल कठोरा ॥

बहोरि सिल पट रहे न कोई । तिल तिल कर सब कन कन होईं । 
रिपुदल बीर बिदारन लागिहि । अंग अंग सुरंग में पागिहि ॥ 

रिसत रुधिरु कं सोहहिं कैसे । सुबरन संग सुभग के जैसे ॥ 
दरसि दिरिस यह बिसमय कारी । देख न हारे देखनहारी ॥ 

बहोरि होत रिसान, सीवाँ पार कोप करत । 
ब्रम्हास्त्र संधान बीर मनि कसै कोदंड ॥ 

सोमवार, १४ दिसंबर, २०१५                                                                                

ब्रम्हास्त्र बहु अचरजकारी । जहँ जा लागिहि तहँ रिपु जारीं ॥ 
सोए बीरमनि सन रन रंगा । चढ़ेउ रसना छाँड़ निषंगा ॥ 

तासों छूट चला रिपु ओरा । छुटत  टँकारिहि गुन घन घोरा ॥ 
 तब लग सत्रुहन कर सोहा । तुरत आन आयुध मन मोहा ॥ 

बिद्युत गति सम धाए प्रचंडा । बम्हास्त्र छन किए दुइ खंडा ॥ 
राउन्हि उर घन अघात करे । मुरुछित बिकल धरनि खसि परे ॥ 

कोपि  तीब्र लोचन न समायो । रोहित रथ सिउ निप पहि आयो ॥ 
सत्रुहन औचकहि तेहि औसर । चढ़ा प्रत्यंचा  कसे धनु सर ॥ 

आयउ बढ़ि त्रै लोचन आगे । करि गहन रन जुझावन लागे ॥ 
एक पख रामानुज एक संकर । भयउ बीच संग्राम भयंकर ॥ 

चलेउ सस्त्रास्त्र बिकट, आयुध बहुंत प्रकार । 
परे चमक चिङ्गारि कन सबहि दिसा उजियार ॥ 

बुध/बृहस्पति , १६/१७  दिसंबर, २०१५                                                                             

लरत भिरत त्रै लोचनसंगा । भए सत्रुधन्हि सिथिर सब अंगा ॥ 
आकुल हिअ अरु जिअ नहि जोहीं । तब हनुमत उपदेसन सोही ॥ 

सुमिरै मन ही मन गोसाईं । आरत नाद करत रे भाई ॥ 
धरे संभु रन रूप भयंकर । लेहि प्रान हाँ गहे धनुषकर ॥ 

तरस देन जिअ लेन उतारू । पाहि पाहि प्रनतारत हारू ॥ 
राम राम जो राम पुकारे । भए भव पारग सो दुखियारे ॥ 

कहि गए साधक सिद्ध सुजाना । दीन दयाकर कृपानिधना ॥ 
मिटे दोष सब मोर हिया के । दुराइहौ दुःख एहु दुखिया के ॥ 

सत्रुहन निगदित ए गदन जोहीं । प्रगसिहिं सम्मुख रघुबर तोहीं ॥ 
दरस प्रभो निज पीर बिजोगे । करे अस्तुति सत्रुहन कर जोगे ॥ 

कुण्डलाय शिरो कुंतलम् । लसितम्  ललित ललाटूलम् ॥
नयनाभिराम नलीन सम । श्रीराम श्याम सुन्दरम् ॥

परम धाम ज्योतिः परो । सर्वार्थ सर्वेश्वरम् ॥

सर्वकाम्योनंत लील:। प्रद्युम्नो जगद्मोहनम् ॥

कंदर्प कोटि लावण्यम । तीर्थ कोटि समाह्वयं ॥

शम्भुकोटि महेश्वराय । कोटीन्दु जगदानन्दम् ॥

सर्वदेवैकदेवता : । जगन्नाथो जगदपिता: ॥

श्री नित्य श्री : निकेतनम् । नित्यवक्ष स्थलस्थ श्रीधरं ॥

हृषिकेशाय हंसो क्षरो । पीयुषोत्पत्ति कारणम् ॥ 

स्मृतसर्वाघनाशन: । तीर्थमयी जनार्दन: ॥ 

श्रीरामो भद्र शास्वता । विश्वामित्रप्रियो दांता ॥ 
खरध्वंसी कौशलेय : । जामदग्न्य दर्प दलन: ॥ 

वेदांतपारात्मनम् । कामद् कोदंड खण्डनम् ॥ 
सत्यवाच्य विक्रमो व्रते । श्रीमान जानकी: पते ॥ 

दासरथि सद्गुणार्णव: । रविवंश रामो राघव: ॥ 
पित्राज्ञा त्यक्त राज्य : । कंदरार्पितैश्वर्य: ॥ 

चित्रकूटाप्त रत्नादृ: । यथेष्टामोद्यास्त्र: ॥  
पीताम्बरी धनुर्धर: । श्याम मनोहरम् शूर: ॥ 

महासार पुण्योदयो । ब्रह्मण्यो मुनिसोत्तम: ॥ 
देवेंद्रनंदनाक्षिहा ।  मारीचध्न : विराधहा ॥ 

 निर्गुणीश्वरादि देवा । ध्वस्तपाताल दानवा ॥ 
दण्डकारण्यवास कृते । ताडकांत कृते रघुपते ॥ 

वालि प्रमथन जनार्दन: ।  सुग्रीवस्थिरोराज्यप्रद:॥ 
जटायुषो ग्नि दातार: । धीरोदत्तगुणोत्तर : ॥ 

सिंहल द्वीप ध्वंशनम् । सुबद्धे सेतु :सागरम्  ॥  
द्वितीय सौमित्रि लक्ष्मण: । प्रहतेन्द्रजिता राघव : ॥ 

विराध दुषण त्रिशरो S रि: । दशग्रीव शिरो हर: हरि: ॥ 
पौलत्स्य वंश कृन्तन: । कुम्भकर्ण च रावणिध्न :॥ 

परं ज्योति: परं धाम । पराकाशो परोत्पर : ॥ 
परेशोपारो पारग: । सर्वभूतात्मक: शिवा ॥  

जाग दीछित पुुरुख भेष गहे हस्त मृग शृंग । 
पद्म लोचन पद्म चरन सत्रुहन भयऊ भृंग ॥ 

शनिवार, १९ दिसंबर, २०१५                                                                               

हरैं पीर जो प्रनताजन के  । सत्रुहन सो अभिराम नयनके ॥ 
साखिहि समुख जब दरसन पाए । हरिदे के सब दुख्ख दूराए ॥ 

हनुमंतहु  दरसिहि रघुनाथा । गिरे चरन बहु अचरज साथा ॥ 
ते औसर ऐसो हर्षाईं । तृषावन्त  जिमि जल दरसाईं ॥ 

जोइ भगत रच्छन हुँत आईं । पुलकित तिन्ह कहे गोसाईं ॥ 
भगतन के सब बिधि कृत पाला । भगवन हेतु जोग सब काला ॥ 

धन्य धन्य हम हे रघुनंदन । एहि औसर भए तुहरे दरसन ॥ 
कृपा सिंधु घ कृपा तिहारी । होहि बिजय कर कटक हमारी ॥ 

जोगिन्हि ध्यान गोचर रघुबर आगत जानि । 
सिव संकर होइँ अगुसर गहे चरन जुग पानि ॥ 

करिहि सुवागत करत प्रनामा । बिनयाबत एहि बचन उचारी ॥ 

हे सरनागत के भय हारी । धनुरु धारि बनचर असुरारी ॥ 

पारब्रम्ह प्रकृति के स्वामी । पुरुष रूप तुम अंतरयामी ॥ 
आपनि अंस कलावतारे। सरजत पालत जग संहारे ॥ 

साजन काल बिधात सरूपा । पालन काल चतुर भुज रूपा ॥ 

प्रलय काल में सर्ब नाउ धर । मोर रूप में भयो साखि हर ॥ 

में भगत कृतत उपकारा । बाधत तुहरे काज बिगारा ॥ 

दया सील हे दीन दयालू । छिमा मोर अपराध कृपालू  ॥ 

साँच करन कहि आपनी मो सों एहि कृत होइ । 
भगवन ता संगत अबरु मोए दोष न कोइ ॥ 

सोमवार, २१ दिसंबर, २०१५                                                                            

जानतहुँ प्रभो तोर प्रभाउब । रच्छन भगत इहाँ मैं आउब ॥ 
कहे संभु पुनि नत सिरु संगा । पुरब काल भयऊ ए पसंगा ॥ 

एकु समऊ सुनु यहु महराई । छपा नदिहि तट आन  न्हाई ॥ 
उजेनि नगरि कलस महकाला । करिहि तपस्या कठिन कराला ॥ 

धरनिहि भर के तपो निधानी । निरख तासु तप अचरज मानीं ॥ 
निरखत तपरत नृप तेहि समउ । मोरेउ मन बहु प्रमुदित भयउ ॥ 

बर दायन मम कर बढ़ि आईं ।  बोलेउ ताहि करत बड़ाई ॥ 
तुहरे तप परिपूरन होईं । मँगो भूप मो सों बर कोई ॥ 

सुरपुर के अखंड  राज मँगे भूप बर माहि । 
तासु कथनानुहार के बढे हस्त बर दाहि ॥ 

मंगलवार, २२ दिसंबर, २०१५                                                                             

तदनन्तर प्रभु मैं कहि पारें । होए देवपुर राज तिहारे ॥ 
अवधेसु के मेधीअ बाहिहिं । सैन सहित तापुर जब आहिहिं ॥ 

तब लग कृत तुहरे हित पाही । यह  सिउ सुरपुर बसति बसाही ॥ 
एहि भाँति बर दान मैं दायउँ । दिया बचन ता संग बँधायउँ ॥ 

आयउ अजहुँ समउ सो भगवन ।  सुत स्वजन सहित सो स्यंदन ॥ 
नृप तव चरन समर्पन करिहि । बंदत भव सिंधु पार उतरहिं॥ 

तब सिव सों बोले रघुराई । देवन्हि धरम भगत भलाई ॥ 
एही वसर जस रखिहउ राई । भले काज भी तुहरे ताईं ॥ 

हर के हरिदय होइँ हरि हरि हरिदै हर होइँ । 
हम दुनहु के बीच परस्पर अंतर भेद न कोइ ॥ 

बुधवार, २३ दिसंबर, २०१५                                                                          

को मूरख मलीन मति जाकी । करें भेद मुख दीठ न वाकी ॥ 
धूप किरन जिमि किरनहि धूपा । दरसित हम तिमि एक सम रूपा ॥ 

हरि हर बीच भेद जो राखा ।  होंहि तासु लोचन बिनु लाखा ॥ 
अहहीं महादेउ जो तोरे । धर्मी पुरुख भगत सो मोरे ॥ 

जैसेउ मोर चरन जुहारें । परत बिनत सो चरन  तिहारे  ॥ 
कहत शेष हे सुबुध सुजाना । रघुबीर बचनन्हि दे काना ॥ 

परसादि सों सिउ भगवंता । जिअ हीन जिअ करिहिं जीयन्ता ॥ 
बाण पीरित बीर मनि संगा । भयउ सचेत सकल चतुरंगा ॥ 

रथारोहि कि पदचर हो हितू कर हो कि हेत ।  

एहि बिधि भूपत सुत सहित सब जन भयउ सचेत ॥  


 शुक्रवार, २५ दिसंबर, २०१५                                                                      


तदनन्तर हे वात्स्यायन । धन्य धन्य सो सुरपुर राजन ॥ 
जोग नीठ कि तपोबल ताईं । केहि भाँति दुर्लभ गोसाईं ॥ 

जोगि जान जिन्ह दरस न पावा । तिन्हनि जगजीवन दरसावा ॥ 
दरस समुख भगवन श्री रामा । कुटुम सहित निप करिहि प्रनामा ॥ 

परिहि पदुम चरनन सब कोई । गहे असीर कृतारथ होईं ॥ 
मानवाकार देही गही के । भयउ सफल जीवन सबहीं के ॥ 

सारद सेष ब्रम्हादि सहिता । भयउ देवन्हि केर पूजिता ॥ 
सत्रुहन हनुमन सरिस सुजाना । करिअहि नित जिनके जस गाना ॥ 

तेहि रघुबर चरन सिरु नाईं । अरपिहि अस्व बीर मनि राई ॥ 

जानि निज भगत अनुकूल, ससिधर कहि अनुहारि । 
की समर्पित सकल राज अरु जुग कर पग धारि ॥  

सुनु बिप्रबर बहोरि रघुनाथा । हसित बिहर्षित रिपुदल साथा ॥ 
निज सेवक सों वन्दित होहीं । मंजुल मनिमय रथावरोही ॥ 

होत पीठासीत् भगवाना । छन माहि भए अन्तरध्याना ॥ 
जगवन्दित  रामहि जगजीवन । समझिहु न ताहि मनुज सधारन ॥ 

जल में थल में अम्बर तल में । भगवन ब्यापित चलाचल में ॥ 
सबके अंत: करन निवासित । श्रीबर रूप स्वयं प्रकासित ॥ 

कहेउ बचन सन पन पुराए । संकर संभुहु चरन बहुराए ॥ 
माँगत बिदा चलन जब लागे । कहत कहत ए ठाढ़ भए आगे ॥ 

राजन दुर्गम जगत में दुर्लभ बस्तु न कोइ । 
एकु रघुनंदन के सरन सबते दुर्लभ होइ ॥ 















































  



Friday, 20 November 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४३।। -----

 शुक्रवार, २० नवम्बर, २०१५                                                                  
 झाँक चकत अस रकत प्रकासा । ढाक ढँकत जस फुरिहि पलासा ॥ 
सूल सूल भए फूलहि फूला । सोइ दसा गहि हस्त त्रिसूला ॥ 

पुनि पुष्कल जय राम पुकारा । काटि निबार पलक महि पारा ॥ 
बिकट रूप धर गर्जहि कैसे । ताड़त तड़ित गहन घन जैसे ॥ 

छतज नयन उर जरइ न थोरे । कोपवंत पुष्कल रथ तोरे ॥ 
निज त्रिसूलन्हि कटत बिलोका । भयउ प्रबल रन रहइ न रोका ॥ 

रुद्रानुचर के बेग प्रसंगा । भंजेउ रथ भयउ बिनु अंगा ॥ 
गयउ पयादहि रथ परिहारे । बीर भद्रहि कसि मूठि प्रहारे ॥ 

बहुरि एकहि एक मुठिका मारएँ  । घात घहट दुहु मानि न हारएँ ॥ 
लरिहि बिजय दुहु करि अभिलासा । चहहिं परस्पर प्रान निकासा ॥ 

रयनि बासर निरंतर जुझत रहै एहि भाँति । 
लरत बिरते चारि दिबस, पर नहीं उर साँति ॥  


शनिवार, २१ नवम्बर, २०१५                                                                                 

पंचम दिवस कोप के साथा । बीर भद्रन्हि कंठ गहि हाथा ॥ 
बाहु मरोरत महि महुँ  डारा । चोट गहत  भै पीर अपारा ॥ 

बीर भद्रहु पुष्कल पग धारिहि  । घुर्मावत नभ बारम बारहि ॥ 
भुज उपार पछाड़ महि पारे । मरति बार पुष्कल चित्कारे ॥ 

मुने अस बीर गति गहि पुष्कल । कासित करन्हि कंचनि कुंडल ॥ 
काट सो सिर गरज घन घोरा । फेरीबार फिरिहि चहुँ ओरा ॥ 

भंगी भय अस रन भूमि ब्यापे । जो देखिहि सो थर थर काँपे ॥ 
कुसल बीर सत्रुहन पहि जाईं । समाचार एहि कहि सिरु नाईं ॥ 

पुष्कल घेऊ बीर गति बीरभद्रहि कर सोहि । 
सुनेउ अस त सत्रुध्नन्हि करन भरोस न होंहि ॥ 

रवि/ सोम , २२/ २३  नवम्बर, २०१५                                                                             

भरे नयन सुनि सकल बखाना । सत्रुहन मन बहुतहि  दुःख माना ॥ 
कंपत ह्रदय धरा सम डोलिहिं । सोकाभिभूत नयन हिलोलिहि ॥ 

उठे ताप  घन पलक जल छाए । बरख घन बिरमन बदन भिजाए ॥ 

सोक मग्न सत्रुहन जब पायो । सिव संकर बहु बिधि समझायो ॥ 

कठिन जे दुःख न जाइ बिलोका । तथापि रे तुम परिहरु सोका ॥ 

जेहिं समुख मह प्रलयंकारी । पंच दिवस लग किए रन भारी ॥ 

देइ प्रान रच्छत निज पाला । धन्य धन्य सो बीर निराला ॥ 

जोए दच्छ महत्तम निज जाना । जासों होएसि  मम अपमाना ॥ 

तेहि मारि संघारिहि जोई । येहु  बीर भद्र अहहीं सोई ॥ 

एतेउ तुम्ह सोक परिहारौ । हे मह बली उठौ रन कारौ ॥ 

सत्रुहन परिहर सोक, पुनि कोप करत संभु प्रति । 
नयनायन जल रोक, धरि धनु लोहितानन किए ॥ 

मंगलवार, २४ नवम्बर, २०१५                                                                                   

बहुरि बान संधान धनुरयो । रघुबंसि के पानि महुँ पुरयो ॥ 
ताकि तमक बितान झरि लाईं । दरसिहि धारा सार के नाईं ॥ 

उत सहुँ सिव संकर के छाँड़े । बिदार बदन द्युति सम बाड़ें ॥ 
गयउ गगन बे गुत्थमगुत्था । दुहु दलगंजन के सर जुत्था ॥ 

काल गहन नभ घन गम्भीर । भिरिहि घन सैम एकहिं एक तीरा ॥ 
अवलोकत ऐसेउ घमसाना । सबन्हि जन के मन अनुमाना ॥ 

जहँ लोक संहारन कारी । सम्मोहक प्रलयंकर भारी ॥ 
चेतन हरत सबन्हि मन मोहीं । अवसि प्रलय के आगम होंही ॥ 

दुहुरनकार निहार के कहै निहारनहारि । 
एकु अधिराज रामानुज, दूजे त्रय सिक धारि ॥ 

बुधवार, २५ नवम्बर, २०१५                                                                          

भयऊ बिमिख पासपर दोई । राम न जाने अब का होई । 
दोनउ बीर बिराम न लेहीं । गहिहीं बिजय कलस कर केहीं ॥ 

एहि बिधि सत्रुहन अरु ससि सेखर। करिहिं सतत संग्राम भयंकर ॥ 
दिवस एकादस लग एहि भाँती । समर भूमि उर परे न साँती ॥ 

दिवस दुआदस संभु बिरुद्धा । तर्जत अति सत्रुहन बहु क्रुद्धा ॥ 
तोय तीर तूनीर त्याजे । चढ़ि गुन गगन टी गढ़ गढ़ गाजे ॥ 

चलेउ ब्रम्हायुध बिकराला । चहसि अबोध बधन मह काला ॥ 
रहेउ जिमि मह देउ प्यासे । पयसिहि हँस हँस पयस सकासे ॥ 

तासों सुमित्रा नंदनहि भइ अचरज अति भारि । 
करिए चहिअ अब कृत कवन लगे ए करन बिचारि॥ 

बृहस्पतिवार, २६ नवम्बर, २०१५                                                                           

एहि बिधि सोच बिचारत रहिहिं । देबाधिदेउ एकु सर लहहिं ॥ 
तासु बदन सिखि कन छतराइहिं । सत्रुहन के उर सदन उतराइहिं ॥ 

भयउ बिकलतर बेध्यो हियो । सत्रुहन हतचेत धरनि गिरियो ॥ 
हय कि गज कि रथी कि पदचारी । तेहि अवसर भरे भट भारी ॥ 

सकल सेना हां हा हँकारी । पाहि पाहि मम पाहि पुकारी ॥ 
गहे तीर गह  पीर बिसेखा । सत्रुहन जब मुरुछित गिरि देखा ॥ 

हनुमत तुर गत भुज भरि ल्याए । प्रथम तिन्ह स्यंदन पौढ़ाए ॥ 
रच्छन हुँत पुनि राखि रखौते । आप जुझावन होंहि अगौते ॥ 

सीस ससि सिर गंग गहे भूषित कंठ भुजङ्ग । 
जोगत बाहु बल हनुमत, कोपत भिरि ता संग ॥ 

शुक्रवार, २७ नवम्बर, २०१५                                                                                                  

एकै नाम निज रसन अधारे । राम राम हाँ राम उचारे ॥ 
रिसभर खरतर पूँछ हलराए । निज दल बीर के हर्ष बढ़ाए ॥ 

समर सरित तट चरन धरायो । बहोरि  तरत रुद्र पहि आयो ॥ 
देबाधिदेब बधन कर इच्छा । ऐसोइ कहत करिहि प्रदिच्छा ॥ 

धरम बिपरीत चरन करिअहहु । राम भगत हति हनन करि चहहु ॥ 
जो रघुबीर चरन अनुरागी ।भै अजहुँ मम दंड के भागी ॥ 

बीएड बिदुर मुनि मुख कहि पारा । सुना ए पुरबल बहुतहि बारा ॥ 
पिनाक धारि रूद्र अस होहू । राम चरन  सुमिरन रत होहू ।। 

मुनि बर  बदन कहे बचन, असत  भयउ हे राम । 
राम भगत सत्रुहन संग करिहहु तुम संग्राम ॥ 

शनिवार, २८ नवम्बर, २०१५                                                                              

जब ऐसेउ कहा हनुमंता  । कहे ए  निगदन गिरिजा कंता ॥ 
हे कपिबर तुम बीर महाना । तुहरी  कही फुरी मैं माना ॥ 

धन्य धन्य तुम पवन कुमारा । ध्न्य धन्य प्रभु पेम तिहारा ॥ 
राम जासु जस आप बखाना  । तुहरे  काज जगत कल्याना ॥ 

अगजग जिन बंदिहि कर जोरे । जथारथ में सोइ पति मोरे ॥ 
भगवान जेहि तुरग परिहाई । बीरमनि तिन्ह बाँधि लवाईं ॥ 

रघुबर जिन्ह तुरग करि  रखे । सो सत्रुहन तेहि हरनत लखे ॥ 
जोइ बीर रिपु दल दमनावा । रच्छत हय  तापर चढि  आवा ॥ 

तासु भगति बस आपनि पायउँ । ताहि रच्छन रन भूमि आयउँ ॥ 

भगवान भगत सरूप है भगत रूप भगवान । 
भगत राख करि चाहिये राखें जेन बिधान ॥ 


सोमवार, ३० नवंबर, २०१५                                                                    

सुनत बचन सिउ भगवंता के । भरि रिस सों उर हनुमंता के ॥ 
छोभित एकु सिलिका कर धारे । ताहि तासु बहि महि दै मारे ॥ 

गहे स्यंदन सील अघाता । भंजित हति रन भूमि निपाता ॥ 
कतहुँ त सारथि कतहुँ त चाका । कतहुँ केतु अरु कतहुँ पताका ॥ 

चितबत नंदी पत रथहीना । लरत पयादहि बदन मलीना ॥ 
 उठेउ तुरत अस  निगदत धाए । भगवन मोरे पुठबार पधाएँ ॥ 

भूतनाथ नंदी करि बाही ।मारुत सुत  बयरु  बरधाही ॥ 
लोहितानन गाढिहि अतीवा । पारग भयउ कोप के सींवा ॥ 

लम्ब बाहु बरियात पुनि लिए एक साल उपार। 
घोर पुकार हनेसि  उर किए बहु बेगि प्रहार ॥ 

मंगलवार, १ दिसंबर, २०१५                                                                            

ज्वाल सरिस तीनि  सिखि षण्डा । गाहे हस्त अस सूल प्रचंडा 
अगनाभ टूल तेजस जाका । रहि तेजोमंडित मुख वाका ॥ 

अहो गोल सम सूल बिसेखे ।  आपनि पुर जब आगत देखे ॥ 
हनुमत ताहि बेगि करधरके । किए भंजित पुनि तिल तिल कर के ॥ 

दिसत दिसत भए खंडहि खंडा । गहे हस्त पुनि सक्ति प्रचंडा ॥ 
बदन कि उदर कि पुठबार कि पुच्छल । सबहि कतहुँ सों अहहीं लोहल ॥ 

लागि सक्ति उर संभु चलाईं । छनभर हनुमत बहु बिकलाईं ॥ 
भयऊ श्रमित कछु मुरुछा भई । छन महुँ अनाइ  छन महूँ गई ॥ 

बहोरि एकु अति भयंकर बिटपन्हि लिए उपाऱ । 
अहि माली के उर माझ हनेसि घोर पुकार ॥ 

बुधवार, ०२ दिसंबर, २०१५                                                                                 

अहि भूषन  कर कंठ लपेटे । महाबीर के चोट चपेटे  ॥ 
 हहरत इत उत सकल ब्याला । सरर प्रबिसिहि बेगि पाताला ॥ 

बहुरि मदनारि मुसल चलाईं । करत रखावनि कुसल उपाई ॥ 
महाबली भुज अस बल घारे । बिरथा गयऊ सबहि प्रहारे ॥ 

तेहि अवसर राम के दासा । कोप वसन कर बदन निवासा । 
उपात् परबत लिए एक हाथा । डारि संभु उर बहु बल साथा ॥ 

सैल धारासार बौझारे । ताकि त्मक लक तकि तकि मारे ॥ 
धरिहि उपल खंडल बहु खंभा । पुनि बरखावन लगे अरंभा ॥ 

सागर सरित भयउ उदवृत जिमि भयक्रांत भू कंपिहि । 
खन खन भित भित भिदरित गिरि अस सिरपर जस गिरहि महि ॥ 
प्रमथ मह झोटिंग गन सहित भई भयाकुलित सकल अनी । 
 सत्रुध्नन्हि सैन बाहिनी इत लागिहि बहु भयावनी ॥ 

होइहि उपल प्रपात नंदी बिहबल दरस्यो । 
छन चन खात अघात महदेउ ब्याकुल भयो ॥ 

बृहस्पति/शुक्र , ०३/०४  दिसंबर, २०१५                                                                       

देखि संभु महबीर प्रभाऊ । बोले मृदुलित हे कपिराऊ ॥ 
कमल नयन पद केर पुजारी । धन्य धन्य सेबिता तिहारी ॥ 

तुहारे भुज जस बल दरसायो । भगत प्रबर तुम मोहि अघायो ॥ 
तव बल बक्रम कीन्हि बड़ाई । मोर कोस सो सबद न भाई ॥ 

दान जाग यत्किंचित तप तैं  । रे भगत हेतु सुलभ नहीं मैं ॥ 
बेगसील हे बीर महाना । एतएव मँगिहु को बरदाना ॥ 

संभु अस कथ कथन जब लागे । हनुमत हँसत तब भय त्यागे ॥ 
पुनि मनमोहि गिरा कर बोले । हे डमरू धर हे बम भोले ॥ 


हे  गिरिजा पति गिरि बंधु अरु किछु  चाह न मोहि । 
रघुबर चरन प्रसाद सों दिए  समदित सब किछु होहि ॥ 

सियापति रघुनाथ के नाईं । मम रन कौसल तोहि अघाईं ॥ 
एहि हेतु तव कहे अनुहारा । माँगिहि बर यह  दास  तिहारा ॥ 

गहे बीर गति बीर भद्रहि कर । लरत भिरत हत परेउ भूपर ॥ 
अस कहत हनुमत कहि ए पुष्कल । हमरे पाख केरे बीरबल ॥ 

यह रामानुज सत्रुधन होई । मुख मंडल मुरुछ गहि सोई ॥ 
अबरु बहुतक सूर ता संगे ॥ गहे बान तन भयउ निषङ्गे ॥ 

होवत छतबत गहत प्रहारे । मुरुछा गहिं गिरि महि हारे ॥ 
रखिहु तिन्ह निज गन के साथा । धरिअ रहिहौं सिरोपर हाथा ॥ 

खँडरन तन प्रभु होए न तिनके । सिउ सनक जतन करें जिनके ॥ 
द्रोन गिरिहि अस औषधि होंही । निरजीउ जिउ जियावत जोंही ॥ 

 लेन गिरिहि सो औषधी मोही आयसु दाहु  । 
संभु द्रवित हिय सों कहे हाँ हाँ अवसिहि जाहु ॥ 

शनिवार, ०५ दिसंबर, २०१५                                                                      

देवधिदेव अनुमति दयऊ । सकल द्वीप उलाँघत गयऊ ॥ 
आए छीर सागर के तीरा । आए अचिर  हनुमत महबीरा ॥ 

 इहाँ सिव संभु निज गन सहिता । पुष्कलादि के भयउ रच्छिता ॥ 
उत पहुंचत गिरि द्रोन महाना । औषध हुँत उद्यत हनुमाना ॥ 

हस्त गहत परबत हहराहीँ । राखनहर सुर निरखत ताहीं ॥ 
कहत एहि बत भए कुपित बहुँता । को तुम आइहु इहँ केहि हुँता ॥ 

छाँड़ौ सठ अस कस तिन गहिहू । परबत कहँ कत लिए गत चहिहू ॥ 
सुरन्हि केर बचन दए काना । बिनयंनबत बोले हनुमाना ॥ 

बीर मनि के नगरी में होइँ बिकट संग्राम । 
एक पाख अहैं सिउ संभु  दूज पाख श्री राम ॥ 

सोमवार, ०७ दिसंबर, २०१५                                                                 

तब हनुमान घटना क्रम बँधाए । उभय दिसि  की सब कथा सुनाए  ॥ 
जोधत बहु बलबीर हमारे ।  रूद्र कर तैं गयउ संहारे ॥ 


तिन्हनि हुँत मैं गिरि लए जैहौं । जीवनोषधिहि देइ जियैहौं ॥ 
जिन्ह के बिक्रम अपरम होईं । प्रदरस् तिन्ह गरब  करि जोईं ॥ 

परबत लिए गत जो अवरोधहि । सो सठ  मोरे संगत जोधिहि ॥ 

तीन पापिन बहु रन खेलइहौं । एकै पलक जम भवन पठइहौं ॥ 

अब औषधिहि चहे गिरि दाहू । गहे बीर गति बीर सुबाहू ॥ 

लेइ ताहि में अचिरम जैहौं । निर्जीवन जन जीवन दैहौं ॥ 

पवन कुमार केर बचन सुनि करि सकल प्रनाम । 
ते औषध कर देइहीं जासु सजीवन नाम ॥