Tuesday, 25 April 2017

----- ।। उत्तर-काण्ड ५७ ।। -----

मंगलवार,२५ अप्रेल,२०१७                                                                                       

पुनि जलहि कर जोर जोहारे | सजिवनिहु जियन तुअहि निहारे || 
आरत जगत राम सुखदाता | त्रसित जीउ के रामहि त्राता || 

पापिहि घनतम राम तमोहर | अँधेरिया घर राम दिवाकर || 
भव भूमि भर भारु अति भारी | छरन अपहरन भए अवतारी || 

भगवद रूप राम जग राखा | कीरति जासु सकल जग भाखा || 
किअहि तुरग मख हेतु नियोजन | करुँ बिनति ताहि करिहौ पावन || 

अभिमंत्रित भा मुनिबर ताईं | उदकत उद घट कंठ पुराईं || 
सुधित जल राम सहित सबु राए | सुसंस्कारित मंडपु ल्याए || 

 निर्मल जल तैं छीर सम घवल अश्व न्हवाए | 
अँग अँग आभूषन संग दिब्य बसन पहिराए || 

शनिवार,२९ अप्रेल,२०१७                                                                                                    

पुनि महर्षि रघुनाथहि हाथा | किए अभिमन्त्रित मंत्रहि साथा  || 
बहुत बिनेबत करत निहोरे | बोलइ चितइ तुरग की ओरे || 

सुनहु बिनति मम हे महबाहू | पूर अपूरित सुर नर नाहू || 
भू सुर गन पुरजन तेउ भरी | करौ पुनीत एहि मख अस्थरी || 

तदनन्तर प्रभु सह बैदेही | परसिहि मेधि तुरग कै देही || 
 भै कौतूकि बस तेहि काला | सुर गुर मुनिजन सहित भुआला || 

भए हतप्रभ भर अचरजु भारी | जान बिचित्र यह पुर नर नारी || 
कहहि परस्पर भरुअर भामा | अहो सुमिरत जिन्हके नामा || 

जाके चरणोपासना मिटहि महतिमह पाप | 
सोइ प्रभु श्री रामचंद अस कस करिहि अलाप || 









Sunday, 16 April 2017

----- || चलो कविता बनाएँ || -----

हाथोँ हाथ सूझै नहि घन अँधियारी रैन | 
अनहितु सीँउ भेद बढ़े सोइ रहे सबु सैन || १ || 

रतनधि धर जलधि जागै,जागै नदी पहार | 
एक पहराइत जगै नहि ,जागै सबु संसार || २ || 

क्रमश:

Wednesday, 5 April 2017

----- ॥ पाखंड-वाद ॥ -----

" मिथ्या द्वारा यथार्थ के स्वांग का सार्वजनिक प्रदर्शन पाखण्ड वाद है...."
दूसरे शब्दों में आप जो नहीं हैं वह होने का प्रदर्शन करना पाखण्ड वाद है,

सत्ता केर स्वाद हुँत प्रसरा पाखण्ड वाद ।  
नव नूतन नहि होइया धर्म केर उन्माद ॥ 
भावार्थ :-- धार्मिक उन्माद फैलाकर सत्ता प्राप्ति करना कोई नई बात नहीं है सत्ता के सुख भोग का परम माध्यम होने से पाखंड वाद अत्यधिक प्रचलित हुवा 

पंच परिधान पहिर के चढिया ऊंच मचान । 
देस परधान बोलिया मैं दरिदर की संतान ॥ 
भावार्थ :--बहुमूल्य वस्त्र धारण कर ऊँचे मंच पर आसीन होकर एक दिन प्रधानमंत्री बोले मैं दरिद्र की सन्तान 'हूँ '। प्रधान मंत्री होकर ये दलिदर हैं नहीं होंगे तो दरिद्र रेखा के नीचे आ जाएंगे 

प्रधान मंत्री बनकर भी इन नेताओं का  दलिदर दूर नहीं हुवा तो ये बताएं फिर और कैसे होगा । धनवान होकर
दलिदरी का पाखण्ड करना, सत्ता प्राप्त कर उसका अधिकाधिक सुख भोग करना नेहरू-गांधी के विचारों की धारा है । 
ऐसी विचार धारा के कारण ही यह  देश खण्ड-खण्ड होता चला गया ।  तीस चालीस वर्षों में अमेरिका के वासी अंतरिक्ष वासी बन गए किन्तु सत्तर वर्षों में भी भारत के वासियों के सम्मुख से आदि नहीं हटा....







Wednesday, 8 March 2017

----- ॥ सेंदुरी रंग -धूरि ॥ -----

उरियो रे सेंदुरी ऐ री रंग धूरि, 
पलहिं उत्पलव नील नलिन नव जिमि जलहिं दीप लव रूरि । 
ललित भाल दए तिलक लाल तव तिमि सोहहि छबि अति भूरि ॥ 

हनत पनव गहन कहत प्रिया ते अजहूँ पिय दरस न दूरि । 
करिअ बिभावर नगर उजागर  सजि बेदि भवन भर पूरि ॥ 

तरहि पटतर परिहि अम्बारी मनियरी झालरी झूरि । 
बंदनिवार बाँधेउ द्वार धरि चौंकिहि चौंक अपूरि ॥ 

आगत जान बरु सुमुखि सुनयनि गावहि सुभगान मधूरि । 
सगुन भरि थार करिहि आरती करि मंगलाचार बहूरि ॥ 

चली मंजु गति प्रिया पियहि पहि अरु छूटहि कुसुम अँजूरि । 
जलज माल जय कलित कंठ दय नत सीस चरन रज पूरि ॥ 





Monday, 6 March 2017

----- ॥ सेंदुरी रंग -धूरि ॥ -----


उनिहौ रे सेंदुरी ऐ री रंग धूरि 
पलहि उत्पलव नील नलिन नव जिमि जलहि दीप लव रूरि । 
तरु तमाल दए तिलक भाल तव तिमि सोहिहि छबि अति भूरि ॥ 

बिभौ बदन घन स्याम सुन्दर सिरौपर पँखी मयूरि । 
पहिरै सुरुचित पीत झगुरिया धरि मधुराधर बाँसूरि  ॥ 

बजति भली करधन छली करी कर कंकनि सँग केयूरि ॥ 
कल धुनि करत भाँवरि भरत जबु थिरकत चरन नुपूरि ॥ 

घुटरु घटि बँट काँछ कटि तट पटिअरि धूपटि अपूरि । 
गिरियों लटपटि त उठि कपटि कह लपटि आध अधूरि ॥ 

पाउँ परस करि लीज्यो दरस न त इन्ह कर दरसन दूरि ॥ 

Friday, 3 March 2017

----- ॥ रंग -धूरि ॥ -----


उरियो नहि सेंदुरी ऐ री रंग धूरि 
कुञ्ज गलिअ  कर कुसुम कलिअ यहु अजहूँ न पंखि अपूरि  ॥ 
कहइ बिसुर बल बल गल बहियाँ  ओहि जोरे अंज अँजूरि ॥ 

अंक ही अंक गहि पलुहाई मैं कल परसोंहि अँकूरि  ॥ 
एहि मधुबन रे मोरे बाबुल इहँ बिहरिहु धरे अँगूरि ॥ 

चरनहि नुपूर सिरु बर बेनी, कानन्हि कंचन्हि फूरि ॥ 
बोलहि मिठु जिमि चाँचरि बोलै अरु तुम अति करर करूरि ॥ 

निरखहि नीरज नयन झरोखे तुम रंज न देहु बिंदूरि ॥ 
दय घटा घन छटा मन मोही न त दमकिहि दमक बिजूरि ॥ 

मन चन्दन मुख मनियरचन्दा बालिपन बिहुर नहि भूरि ॥ 
फेरी भँवर कतहुँ फिरजइयो इहँ अइयो कबहुँ बहूरि ॥ 


Wednesday, 1 March 2017

----- ॥ राग भैरवी ॥ -----

काहे न मानस जनम गवाए,
जग नर नारि चारि बस करियो,भोगहि भूरि बिषय अधिकाए । 
हाटहि हाट बैस चौहाटे, बिचवइ कर कर बिकता जाए । 
नीची करनी नीच न करनी, उँच उँच ऊँचे मोल बिकाए । 
देह अमोली बहु समझायो, ओहि केहि बिधि समुझ न आए । 
करतब कारन कर गहे दोइ, रह बस रैन दिवस अलसाए । 
करिया उद उद्योग न कोइ, कर बिनहि जिन सोचए तीन पाए । 
अकंटक केहि साथर केरी नीँद भर से डास डसाए । 
रहै अकारथ करम भरोसे, अरु सोँ बिरथा श्रम उपजाए । 


Thursday, 23 February 2017

----- ॥ फाग ॥ -----

धरे रुरियारे रंग, बन फिरिति पतंग,  दए फगुनिया पुकारि के होरी में..,
मनि मोतियाँ ते भरी बलपरी फूरझरी छरहरी डोरी डार के होरी में..,

रंग लाल लाल बिहंग लाल लाल,
गगन गगन उरति पतंग लाल लाल, 

बूझती अली अली उरि चलि गली गली सखी कलियाँ सँवार के होली में..,
कहँ छुपे मनहरिया  केसरिया साँवरिया  दुअरिया ढार के होरी में..,

अहो चाले है मराल कनक केसरी करताल,
स्याम राग संग धरे रंग थाल थाल, 

घुँघरी घरी घर्घरी कटि धरी गहन घाघरी घार के होरी में..,
सुठि भृकुटि तरेर ठकि मुख तीन सेर दे मीठी मीठी गार के होरी में..,

अहो झाँझरि जड़ाऊ बाँधे पाँउ पाँउ, 
झनक झनक झुमरि बजे है गाँउ गाँउ,

रूपु हरी रूपु भर हे री हेरि घर घर घेरि चौंक चौबार के होरी में
सबु नगर ढिंढोर करी बुँदौरी को घोर भर भर पिचकार के होरी मे..,

अहो भाँवरि भरत तिरत डोल डोल, 
करत निरत थिरत थाप दे ढोल ढोल,   

आयो द्वारिका को नाथ
ग्वाल बाल साथ 
मोर मुकुट माथ 
अधरन पे बंसरी सँवारे.....
                      ---- ॥ राग मारवा, बसंत ॥ ----- उड़ री रंग धूरि चहुँ पासा,
बादिहि बादन बृन्दु अगासा । उड़ री रंग धूरि चहुँ पासा ॥ 
फूरहि फूर पंखि दल पूरे । बासहि बास बसंत सुबासा  ॥  
बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस रास बिलासा ॥ 
सरसि सरसई सरिरुह सौंहैं ।सरित सरोजल कह उछ्बासा ॥ 
दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन प्रभाकर भास बिभासा ॥ 
घोरिहि घन रस बन रस राजा । कर महु कर धर करिहु कुहासा ॥  
बहुरी बदरि बहुर बदराई । बहुरि बदरि न बहुर चौमासा ॥ 
कर्पूर गौर बौरि अमराई । हरिअर हरिअर हरिअर बासा ॥ 
कोयरि कोयरि कूजत बोलहि । पालौ पालौ पलहि पलासा ॥  
चटक छटा फर जीर जँबीरी । झलहिं चँवर सों जौर जवासा ॥ 

Tuesday, 21 February 2017

----- ।। उत्तर-काण्ड ५६ ।। -----

अति बिनैबत  धरत महि माथा । लषन प्रनाम करत रघुनाथा ॥ 
लखि अपलक अरु पलक न ठाढ़े । अबिलम मरुत बेगि रथ चाढ़े ॥ 

कल कीरन कर भर करषाई । सियहि आश्रमु चले अतुराई ॥ 
तेजस बदनु भावते जी के । रघुनाथ तनय अतिसय नीके ॥ 

बहोरि भर अनुराग बिसेखे । बिहँसि महर्षि ताहि पुर देखे ॥ 
कहब बछरु धरु कण्ठ कूनिका । गाउ सुठि को सुर संगीतिका ॥ 

सिउ सारद नारदहि सुहाना । रघुबरहि कृत चरित कर गाना ॥ 
गुरु अग्या करतल बर बीना । गावहि हरिगुन गान प्रबीना ॥ 

प्रगसो दानव दैत निकंदन प्रगसो हे नयनाभिराम । 
प्रगसो हे महि भारु अपहरन प्रगसो हे ललित ललाम ॥ 
कुकर्म महु लीन अति मलीन मन करे सबु मति कर बाम । 
दीन हीन सुख गुन बिहीन भए भरे हम धरे धन धाम ॥ 

प्रगसो अनाथन केरे नाथ हे प्रगसो सिया बर राम । 
तरपत परबसु पियास मरत पसु बहत सुरसरि सबु ठाम । 
तुम बिनु खल दल बल गह भए भल पूर सब साधन साम ॥ 
भगति बिमुख जग कारन चरनहि भजहिं न करहिं प्रनाम ॥ 


खलदल दवन भुवन भय भंजन प्रगसो भानुकुल भाम । 
प्रगसो भगवन दुर्दोषु दहन अपहन मोह मद काम ॥ 
भ्रष्ट अचार अस भा संसार भए सबु अलस अलाम ॥ 
जहँ तहँ बाधि बिबिध ब्याधि जग करिअति अति छति छाम ॥ 

करि करि पाप कहैं  पाप नहि किछु गहैं मुए कठिन परिनाम । 
हे कमलारमन करो अवतरन करन बिस्व बिश्राम ॥   
तव मंगल करन लाए पथ नयन सब दिनु सब रितु सब जाम ॥  
हे अवतारी अवतार गहन बरो बपुष घन स्याम ॥  

 जग संताप देइ ताप करै घोर घन घाम । 
आरत भूमि पुकारती प्रगसु हे तरुवर राम ॥ 

शनिवार, २५ फरवरी, २०१७                                                                       

कातर भूमि पाप भर भारी । धेनु रूप धरि करिअ गुहारी ॥ 
पुनि दोनहु बालक बड़भागे । हरि अवतरन कथा कहि लागे ॥ 

भाव भेद पद छंद घनेरे । पुन्यकृत चरित चितरित केरे ॥ 
धर्म धुरंधर बिधिकर साखी । भगवान भगति भाँति बहु भाखी ॥ 

भनत भनितिहि भदर भर भेसा । किए अबिरत पतिब्रत उपदेसा ॥ 
नेम बचन दृढ़ भ्रात स्नेहा । काल परे अनुहरि सब गेहा ॥ 

सुबिरति जति गुरु भगति बखाना । अनुगम अनुपम सबहि बिधाना ॥ 
दरसिहि जहँ साईँ समुहाना । सेबक नीति मूरतिमाना ॥ 

निबध निपुण नय नीति सुरीति । निगदिहि निर्मल प्रीति प्रतीति ॥ 

कलि कलुष बिभंजन जहां पापीजन निज हाथ । 
भू भय हरन पाप दमन दंड दिये रघुनाथ ॥ 

रविवार, २५ फरवरी, २०१७                                                                                       

गाएँ सुमधुर बाँध सुर दोई । मंत्र मुग्ध सब श्रुत सुखि होईं ॥ 
परे मूर्छि सिद्ध गंधर्बा । हतचित चकित सुराग सुर सर्बा ॥ 

सुनत सहित अनगन  महिपाला । होइहिं मोहित जगद कृपाला ॥ 
मोह मगन मन धीरे न धीरा । आनंद घन नयन बह नीरा ॥ 

पुनि पंचम सुर गान अधीना । प्रेम सरित  बहि होइहिं लीना ॥ 
रह अस्थमबित हिलहिं न डोलहिं । चित्र लिखित सम अबोल न बोलहिं ॥ 

पुनि महर्षि दोनहु सुत तेऊ । कृपा समेत इ बचन कहेऊ ॥ 
तुम्हरी मति अस बल सँजोई । कि नीति कुसल नहि तुअ सहुँ कोई ॥ 

अजहुँ पहिचानउ  तेहि ए पूजनिय पितु तुहार । 
जाइ करिहौ तनके प्रति, पुत्रोचित ब्यबहार ॥ 

सोमवार, २६ फरवरी, २०१७                                                                        

सुनि मुनि बचन आएँ दुहु आगे । बिनय भाउ ते चरनहि लागे ॥ 
मातु कर करि करि सेउकाई । भए निर्मल हरिदै दुहु भाई ॥ 

नए सिरु पद देखि रघुराई । प्रेम मुदित दुहु लिए उर लाई ॥ 
सुत सुरूप महुँ मूरतिमाना । प्रगसि धर्म मम किए अनुमाना ॥ 

सहज मनोहर मुख अति नीके । दोउ तनय श्री रघुबर जी के ॥ 
सभा बिराजित सकल समाजा । नगर नारि नर सुर मुनि राजा ॥ 

चितवहि सचकित तिन्हनि ओरा । चितए  चकित जिमि चंदू चकोरा ॥ 
मानेउ सत्य सरिस सती की । पति भगति श्री जानकी जी की ॥ 

कहत सेष मुनि लषन पुनि, गवन  रिषि तपोधाम । 

दीन्हि असीस सिय चरन सिरु धरि करत प्रनाम ॥  

शुक्रवार, १० मार्च, २०१७                                                                                     

निरख बिनयसील लछमन आए । सुनी पुनि जनि निज जान बोलाए ॥ 
जोरे हृदयँ लोचन कर पानी । कहहि ससनेह करुनित बानी ॥ 

रघुकुल कैरब मोहि त्यागे । दिए बियोग घन किए बन आगे ॥ 
एहि गुह गोचर घर घन घोरे । करिअहिं नाथ सुहरिदय मोरे ॥ 

त्यागु जोग बहुरि अपनाई । एहि जग केहि सुहाव न भाई ॥ 
चरनन्हि तृन पात फल फूला । परे भूमि न चढ़ेउ बहूला ॥ 

चलौं अजहुँ कस कहउ अतेवा । मोरे भाग न प्रभुपद सेबा ॥ 
रहिहउँ आश्रमु बाल्मिकी के । सुरति धरत नित रघुबर ही के ॥ 

सुनत लछमन सियहि बचन मातु कहत गोहारि । 
लेय उसाँस निरासु भरि कातरि डीठ निहारि ॥  

शनिवार, ११ मार्च, २०१७                                                                              

कहत लछमन सुनहु महतारी । लाए  नयन मग होइहि हारी ॥ 
बुला पठइँ प्रभु बारहि बारा । सेष रुचिरु जस होइ तिहारा ॥ 

मन क्रम बचन चरण रति होई । कहहु मातु परिहरहि कि सोई ॥ 
सुकुता गह बसि मनि सम रूपा । दीपक दिनकर किरन  सरूपा ॥ 

बसिहि देह जनि जिअ के नाई । नाथ तोहि तस हृदयँ बसाईं ॥ 
(तथापि ) पति अपराधु पति ब्रता नारी । धरिअ उरस न मनहि महुँ घारी ॥ 

करउँ बिनति पुनि पुनि जुग हाथा । चढ़ि स्यंदन चलहु मम साथा ॥ 
मानिहि पति सिय देउ समाना । अकनि सोइ सबु बचन बिहाना ॥ 

प्राति प्रतीति पुकारि उत मुनि तिय कहि  अनुहारि । 
प्रभु परिहरि गति न दूसरि चलि अस नीति बिचारि ॥  

बुधवार, २९ मार्च, २०१७                                                                                            

बेदिन मुनिगन करिअ प्रनामा । चढ़ि रथ सिरु नत तापसि बामा ॥ 
सुमिरि मनहि मन रघुबर नामा । परस पद लिए दरस मन कामा ॥ 

सील सनेहिल भूषन साजै । सहज सुहावन बसन बिराजै ॥ 
भाउ प्रबन मन बेषु बनावा । जिमि उदयित बिधु बदन सुहावा ॥ 

यहु मंगल मूरति ममता की । सदा सहाय सीम समता की ॥ 
होइ लगाउब केहि न काहू । रोकइँ  न चहत कहत न जाहू ॥ 

गहि गहि बहियाँ लपटहि डगरी । अजहुँ दूरि न पिय केरि नगरी ॥ 
चलहि स्यंदन चरन अतूरी । होइँ तपु बन नयन ते दूरी ॥ 

पारग घन गिरिगन मनियारी । अतुरै दरसिहि अवध दुआरी ॥ 
नाघि नगरि चलि जाति निहारी । भरिअ बिलोचन बरसिहि बारी ॥ 

प्रबसित सो पावन पुरी, पहुँचिहि सरजू तीर । 
रहें बिराजित आपहीं जहँ गुरु सन रघुबीर ॥ 

शुक्रवार , ३१ मार्च, २०१७                                                                            

 लखनु सहित सो परम सुभागी । उतरि जाइ तहँ प्रभु पग लागी ॥ 
परसत पिय पद पदुम परागा । बिरागिनि मन भरीं अनुरागा ॥ 

सुर तरंगिनि बहीं चलि आईं । होत सतीरथ सिंधु समाई ॥ 
भर आँचरहि नयन जर मोती । मिलहि मिलहि जिमि दीपक जोती ॥ 

जानकी साथ जानकि नाथा । दुनहु निज मरजाद के साथ ॥ 
दरसत बदन मनोहर पिय के । ससि सरि सीतर भए हिय सिय के ॥ 

मिलइ बिभो सहुँ जगद बिभूती॥ मेलिहि मुकुता मनि सहुँ सूतीं || 

नूपुरामुखर पद अवध पधरयो प्रनता जन नत माथ रे । 
जगन्निवास वरदवास भए जग नाथ जानकी साथ रे ॥ 
 हे हंस धुनी कल वादिनी केहि कृति कुसल करतल गहौ । 
गाउ सुमधुर साध सबहि सुर वद को सुखप्रद श्रुति कहौ ॥ 

साधक गन सुरसाधहीं करुनाहू करुनाइ । 
करुनाधीन करुनानिधि रामु सिया समुहाइ ॥ 
सोमवार,०३ अप्रेल,२०१७                                                           


बनहि बिपति बिबरन नहि पूछहिं । आरत बदन बयन सबु बरनहि ॥ 
बीतै दिवस न जामिनि बीती । दीप धुजा बस रस रस रीती ॥ 

अगजग लग जोतिर जस जागे । जागिहि जोति पलक न लागे ॥ 
कहिय दहिय हिय पियहि बिहीना । सियहि जियहि जिमि जल बिनु मीना ॥ 

तलफत भए छन कल्प समाना । घनबर अल्प न लाइ मलाना ॥ 
नैन निराजन आँज अँजोरे । घोरिहि घेर निसा घन घोरे ॥ 

जियति धरि जियँ पियहि जिय जानी । मन तनि सोच न हानि ग्लानी ॥ 
प्रभु छबि हरिदै दरपन लाखे  । पूजि चरन मन मंदिर राखे ॥ 

फिरिहि बिकल बन धरिअ छिलावा । परिअहि निज चरनन तल घावा ॥ 
बारहि बार आपु बोलाईं | धरिअ देही रहि प्रान पठाई || 

जाइ जहँ तहँ तुम्हहिं अहेरे । बिहुरन दए दुख दुसह घनेरे ॥ 

बूड़हि नाहि तीरहि अह बिरहा उदधि अपारु । 
करनधार करु धार नहि को बिधि पाए न पारु ॥ 
शनिवार, ०८ अप्रेल,२०१७                                                                     

गहइ बनहि घन सूल सलाका | कहइ बिनहि सबु देइ भलाका || 
दीन दसा दृग दरसि न जाई | बरसि कहसि हे नाथ दुहाई || 

देइ द्वारि पलक पट ढारे | राम राम हाँ राम गुहारे || 
दुइ छन होर हरुअ हिलोले | सूझ परइ न कहइ का बोलेँ || 

आवत रसन बरन अवरूझे | बिनबत कुसल छेम पुनि बूझे || 
होइ कुसल कस जोइ अनाथा | सबहि मंगल नाथ तव साथा || 

रघुकुल दिनकर नयन अगासे | उदइ गहन बिरहन निसि नासे || 
कृत कृपा केतु भा भोर अलस | पयस पयस भा हरिदय मानस || 

 परम पेम मय हृदय ते कल कर कलस सँजोइ | 
धरि सीस महि गहि चरनहि अरपिहि सरसिज दोइ || 

पेम पूरित नैन जल जोरे । नाथ छमिबो दोषु जो मोरे ॥ 
बोलिअ बिकल बैन बैदेही । बिधि बध्यो सबु दोषु न केही ॥ 

एहु सुअवसरु कहिअ रघुनाथा । करिहउँ पूरन मख तव साथा ॥ 
नाइ माथ सहुँ बाल्मीकि के । आसिर बचन  लहे प्रिय जी के ॥ 

नत मस्तक सहुँ ब्रम्ह रिसिहिं के । सुभगासीस गहीं सबही के ॥ 
कौसल्या कि मातु कैकेई । गईं प्रनमन सबु साधु देईं ॥ 
साधु -देवी 
पगु परसत उर हर्ष न थोरे । देइ असीसहिं लेइ अँकोरे ॥ 
देखीं जब पगपरि बैदेही । भेंटि कैकेइ भईं सनेही ॥ 

देइ असीस उर उदधि उमगि पेमानुराग । 

दुहु सुत सहित चीर जियौ रहिहौ भरिअ सुहाग ॥ 

मंगलवार,११ अप्रेल,२०१७                                                                     
रामचंदु कर प्रिय परिनीता | सतवति सती साध्वी सीता || 
परिजन सहित सबहि पहिं जाई | कीन्हि प्रनाम अति हरषाई || 

कुंभज आइ देखि जूँ सीया | मुदित भयो सो नहीं कथनीया || 
रघुबरहि दिसि बाम बैठारे | अरु सुबरन मइ मूरति टारे || 

बैसिहि बेदि रामु बैदेही | सोभा सकै न  कहि मुख केही || 
बैसि बिभो जनु जगद बिभूति | प्रगसहि भू नव नव भव भूती || 

अपूरहि पौर पुर नर नारी | भए नभ थल कोलाहल भारी ||  
चहेउ  दीठि सबु एकहि बारा | रामसिया के मिलइ निहारा || 

गहि कमंडल मुनि मंडल पुनि किए समिदाधान | 
जुगे पानि निर्मल बानि करिहि अनल अह्वान || 

रविवार,१६ अप्रेल,२०१७                                                                                            

करसि बेदु धुनि अति मृदु बानी | बहसि मंद जिमि नदि के पानी || 
सरस वती मुनि कंठ बिराजिहि | करन लगे रघुबर मख काजहि || 

पुनि परम बुधि सुधि साधु  सुभाए | गुर बसिष्ठ सोंहि पूछ बुझाए || 
दरसिहि बेद सोइ सबु भयऊ | अबर कवन करतब रहि गयऊ || 

एहि मह मख हे गुर गोसाईँ | बोलिहि गहबरु घन के नाई || 
जाग जोग सब काजु अपूरे | राखिहि जौ भूसुर परिपूरे || 

अजहुँ बिधिबत करिहु सो पूजन  | श्रुतत रघुपत एहि श्रुति सुख बचन || 
कुंभज परम पूजनिअ जाने | पूजत ताहि प्रथम सनमाने || 

उदार रूप नाना बिधि तनु मनु भावनु चीर | 
गज रथ तुरग धेनु धरनि हिरन जड़ित मनि हीर || 

प्रीति दायक बस्तु गहित दीन्हि बहुतक भार | 
कृत कृत प्रभु मुनि तिय सहित कीन्हि अति सत्कार || 

तिया सहित च्यवन रिषिहि पूजत भले बिधान | 
समदत सबहि सम्पद ते दिए बहु आदर मान || 

मंगलवार,१८ अप्रेल,२०१७                                                                                         

एहि बिधि रहि रिषि महर्षि जेता | सकल तपसी ऋत्वजहि समेता || 
बस्तु अनेक सुभ मंगल करन | रूचिहि बिचार बहु पहिरावन || 

भूषन भरे भार दए भूरी | देइ मान लीन्हि पग धूरी || 
दीनहीन दुखि अंधहि लोचन | देत दान दुःख करत बिमोचन || 

सुख सुसंपद सहित गोसाईँ | मधुर मधुर भोजन बिरताईं || 
दिए दान अस बेदु अनुहारे  | सबहि तोषु परिपोषनहारे  || 

आदर मान पेम पद पूजा | करिहि अस कि करि सकै न दूजा || 
रघुनन्दन कर दायन देखे | कुंभज मुनि भय मुदित बिसेखे || 

अश्व नहावन सुभ घरि जानी | मँगावनु सुधा सरिबर पानी || 
रानिन्ह सहित चौसठु राईं | बहुरि अतुरै निकट बोलाईं || 

नव सप्त श्रृंगार सोंहि श्री सोहित सिय साथ | 
कनक कलसि कर धरे जल चले लेन रघुनाथ ||

बृहस्पतिवार, २० अप्रेल,२०१७                                                                          

हिरन मई गागरि गहि हाथा | आगे सिया सहित रघुनाथा || 
धूपापत छाँहीँ के नाई | पाछु चले तीनिउ लघु भाई || 

मांडवी भरत संग सुहावै | उरमिला लखनु मन अति भावै || 
श्रुतिकीरति रिपुदवनु प्रसंगा | कांतिमति पुष्कल कै संगा || 

लक्ष्मीनिधिहि कोमला साथा | मोहना के सोह कपि नाथा || 
सुरथहि संगत सुमनोहारी | उदधि धरे सबु भयउ कहारी || 

एहि बिधि रहि अरु जेतक रायो | बसिष्ठ रिषि जल लेन पठायो || 
सीत पुनीत पुण्य पयसु गही | सरजू तट गयउ सो आपहीं || 

बाँचत बंदि बेदु बचन बहु बिधिबत तहँ जाइँ | 
किए अभिमन्त्रित तासु जल भए सो अरु सुभ दाइ ||