Sunday, 31 July 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५४ ।। -----

रविवार, ३१ जुलाई, २०१६                                                                                                 

तुम त्रिकाल दरसी रघुनाथा । बिस्व बदर जिमि तुहरे हाथा ॥ 
लोगहि चरन सरन जिअ जाना  । बोधिहौ मोहि सोइ बखाना ॥ 
हे रघुनाथ ! आप त्रिकाल दर्शी हो यह चराचर विश्व आपके करतल पर रखे बद्रिका के समान है । लोकाचार के आश्रय आपने ज्ञातित प्रसंग मुझसे पूछा । 

तथापि प्रभो सबहि दिन जैसे । कहिहउ जसि करिहउँ मैं तैसे ॥ 
 सिरोमनि तुम सबहि के राई । कहौं  बृतांत  सुनहु गोसाईं ।॥ 
भावार्थ : -- तथापि प्रभु में सदैव की भांति आपकी आज्ञा का अनुशरण करूंगा ॥  आप सभी राजाओं के शिरोमणि हो  अत: हे स्वामिन  ! जो आपने पूछा मैं वह वृत्तांत कहता हूँ सुनिये  : -- 

सिरु पतिया सोहत अति भारी । प्रभो तुरग सो कृपा तिहारी ॥ 
पथ पथ पुर पुर पौरहि पौरे । बिरमन बिनहि भूमि बन भौंरे ॥ 
 प्रभो ! आपका कृपापात्र होकर भालपत्र के कारण शोभा को प्राप्त वह अश्व रहित पंथ-पंथ, नगर-नगर, द्वार-द्वार भूमि-भूमि, वन-वन  में व्यवधान से रहित होकर विचरता रहा ॥   

दिनकर कुल अस तेज प्रचंडा । निज बल केहि न होइ घमंडा ॥ 
पुरबल हय को गहिब न पारा । जो बल गरब गहिब सो हारा ॥ 
दिनकर क्वे वंश का पराक्रम आवेस प्रचण्ड है कि किसी भी राजा को अपने बल पर दर्प नहीं किया । पूर्वतस किसी ने उस अश्व का हरण नहीं किया, जिसने किया वह परास्त हो गया ॥ 

प्रभो श्री चरनन सिरु नत सब नृप सहित समाज । 
जोग जुग पानि आनि लिए अरपिहि निज निज राज ॥ 
पुरजन परिजन पुत्र-पौत्र सहित वह नृप  प्रभु के श्री चरणों में अपना -अपना राज्य समर्पित कर विनय पूर्वक नतमस्तक हुवे ॥ 

गह सकै हय जोइ अवनीसा । अहहिं कहु त को असि बिजिगीसा ॥ 
जोइ दनुजपत दसमुख हंता । जानत  ए सोए जाकर कंता ॥ 

प्रभो मनोरम तुरगम तोरे । पहुँचिहि अहिच्छत्रा पुर पौरे ॥ 
रुर रुचिर अति रमनीअ देसू । बीर सुमद तहँ बसैं नरेसू ॥ 

सुनि सो प्रबसि अस्व एकु नीके । अहहि अवध पति रघुबर जी के ॥ 
कह सँवारन नगर निकेता । बहुरि सहित सुत सैन समेता ॥ 

गए रिपुहन पहिं प्रभु पद सेबा ।  सबहि सम्पत समरपत देबा ॥ 
 बड़ बड़ पत जा सहुँ नत होई । प्रनत तव पद सुमद प्रभु सोई ॥ 

तव दरसन उर लाह लिए आयउ पाए पयाद । 
अजहुँ  डिठी निपात ताहि देवौ कृपा प्रसाद ॥    

सोमवार, १ अगस्त, २०१६                                                                                                          
करिअ रवन गयउ जब आगे । निद्रालस बस रजस कन जागे ॥ 
धावत गयउ नगर ते दूरे । घेर गिरिबन गगन भरपूरे ॥ 

 बहुरि सुबाहु नगर पगु धारा । जोहि जोइ बल सबहि प्रकारा ॥ 
तेहि के सुत दवन सुभ नामा । गहए ताहि त भयउ संग्रामा ॥ 

जूझत मुरुछा गहि महि परयो । पुष्कल बिजै कलस कर धरयो ॥ 
तब महतिमह राउ सुबाहू । आयउ खेत भरे उर दाहू ॥ 

चले समुह गरजत हनुमंता । भिरिहि तासु सो नृपु बलवंता ॥ 
ताकर ग्यानु श्राप बिलोपा । रहे न सुधि किछु उर भर कोपा ॥ 

द्युति गति गत अति बलवत मारि चरन हनुमान । 
लगे श्राप दुराए गयो बहुरिहि गयउ ग्यान ॥  

मंगलवार, ०२ अगस्त, २०१६                                                                                            

पुनि सो महिपत प्रभु कर सेबा । सौंपि चरन निज सरबस देबा ॥ 
समर कला सब बिधि कुसलाया । प्रनमत बिनय बत जोइ राया ॥ 

जाकर गाँठिल तुंग सरीरा । अहहि सुबाहु सोइ रनधीरा ॥ 
दया डिठी करि प्रभो निहारी । किजो तापर स्नेहिल बारी ॥ 

तदनंतर मेधीअ तुरंगा । चोख चरत इब भयउ पतंगा ॥ 
आयउ देउ नगर संकासा । सुहा गहि अति बसिहि केलासा ॥ 

तहँ घटे सो बिदित सबु काथा । आए इहाँ आपहि रघुनाथा ॥ 
मिलिहि बहुरि बधि बिद्युन्माली । सत्यवान नृपु बहु बलसाली ॥ 

आगिल कल कुंडल नगर चपरित चरण धराए ॥ 
भयउ समर जोए रघुबर सो सब अहिहि जनाए ॥ 

बुधवार, ०३ अगस्त, २०१६                                                                                  

बहुरि कुंडल नगर ते छूटा । बिचरत चहुँ दिसि बिनहि अगूँटा ॥ 
अजहुँ गहिब न केहि बरबंडा । निज बल करिअ न कोउ घमंडा ॥ 

]भँमरत चपल चरन जबु फेरे । तेहि औसर सघन बन घेरे ॥ 
पहुंचसि प्रभु तव तुरग मनोरम । बाल्मीकि केर नीक आश्रम । 

गयउ माझ जूं बिटप समूहा । सुनहु तहँ जौ भयउ कौतूहा ॥ 
बीर बलो एकु बालकु आयउ । सोडस बरस बयस कुल पायउ ॥ 

जति पटतर पट कर धनु धारा । रूप बरन रघुबर अनुहारा ॥ 
भाल बँधेउ पतिया पेख्यो । लिआ गहि पढ़ बतिया देख्यो ॥ 

घनक घटा गहराए जिमि भोर लखइ नहि भोर । 
सैन पाल काल जित असि करियो रन घन घोर ॥ 

बृहस्पतिवार, ०४ अगस्त, २०१६                                                                               

गह सो बीर तरल तलवारा । करा प्रहार धरातल पारा ।\ 
बहुरि कला कृत एक ते ऐका । मारिब पुष्कल सहित अनेका ॥ 

रिपुदवनहु जबु ता सहुँ गयऊ । मर्माहत कृत मुरुछा दयऊ ॥ 
लह हरिदै दुःख दारुन दाहू । फरकेउ नयन अरु दुहु बाहू ॥ 

कोपहि असि जसि कोपि न काहू । दिए अघात करि मुरुछित ताहू ॥ 
होइ बीर सो हत चित जोंही । प्रगसि अबरु एकु बालक तोही ॥ 

दरसन माहि दोउ एक रूपा । धनु कर जटा धर जति न भूपा ॥ 
प्रथम एकहि एक होइँ सहाई । बहुरि जुगत दुहु करिब लड़ाई ॥ 

हय हस्ति बट 
अँट भट मरकट भरी चतुरंगनि सैन बिभो । 
फेरि बदन धुजा पट मुख धरी लटपट भय भर नैन बिभो ॥ 
धाई थरथरी कटि घट कर पिछु पछियावैं बैन बिभो । 
उपटन चरन अह !घूँघट करी निरखिहि ऐंचा तैन बिभो ॥ 

किरीट कवच कल कुंडल मौलि मुकुट मनिहारी । 
सब सिंगार निहार सो हरि हर लियो उतारि । 

कर कोदंड कलित करे बले बलइ बल हार । 
अह सर्या कर धार सो, लेइ गयो चिन्हारि ॥ प्रभो 

शुक्रवार, ०५ अगस्त, २०१६                                                                                           

बाँध्यो गहिब दुहु कपि कंता । एकु सुग्रीव एकु हनुमंता ॥ 
कसियो बलइ रसरि कर जोरी । परन कुटिर लय गयो बहोरी ॥ 

तदनंतर कृपाकर आपही । मेधीअ तुरग देइ बहुरही ॥ 
मरनासन पुनि सैन जियावा । अह साँसत जिअ महु जिअ आवा ॥ 

लेइ गहिब सो हय सिरु नाईं । आए सरन त्रिभुवन गोसाईं ॥ 
ऐतकहि प्रभो मोहि जनाया । जिन्हनि प्रगसित सहुँ कहि पाया ॥ 

कहत अहिपत सुनहु बिद्बाना । घटना बलि जस सुमति बखाना ॥ 
बाल्मीकि कर आश्रमु नीके । बसएँ सुत जहँ जानकी जी के ॥ 

कवन सो बीर प्रभु अनुमानिहि । जानपनी सब जान न जानिहि ॥ 
राघव मंदिर महमखु होई । दीन्ही चरन मुनि सब कोई ॥ 

तहँ सहुँ आनि पधारिहि बाल्मीकि मुनि राए । 

सब बिधान अनुमान के, तासों पूछ बुझाए ॥  

रविवार, ०७ अगस्त, २०१६                                                                                   

मुनि तुहरे कुटि मम सम रूपा । कवन जमलज जौ जति न भूपा ॥ 
धनुर बिधा महुँ परम प्रबेका । समर कला कृति एक ते ऐका ॥ 

सचिउ सुमति मुख बरनै जैसे । होइ कहहु को चकित न कैसे ॥ 
किए मुरुछित रिपुहन समुहाई । हति खेत खेलाइ खेलाई ॥ 

बाँधि लियो हँसि हँसि हनुमंता । छाँड़ दियो कसि तुरग तुरंता ॥ 
कौतुक उपजिहि मन किन काहू । बालकन्हि सब चरित सुनाहू ॥ 

बाल्मीकि मुनि कहए स्वामी । नराधिपत तुम अन्तर्यामी ॥ 
तुम निधान ग्यान गुन सीला । जानिहु प्रभो सबहि नरलीला ॥ 

पूछेउ मोहि कहौं सो तुहरे मन परितोष । 
गहौ चरन कर दिजो छम जान कतहुँ मम दोष ॥ 

सोमवार, ०८ अगस्त ,२०१६                                                                                        

जौ बेला तुम जनक किसोरी । प्रान समा सिय हियप्रिय तोरी ॥ 
दोषु बिनहि परिहर बन देहू । आनि न कबहु न केहि सपनेहू ॥ 

मन क्रम बच प्रभु पद अनुरागी । देहु गरभिनि सम्पद त्यागी ॥ 
बेहड़पन अत बनहि ब्यापा । बिहरत बिहरन करिहि बिलापा ॥ 

ब्याल कराल बिहग बन घोरा । जग लग रयन बिलग न भोरा ॥ 
कातर कंठ करुना अस भारी । उपटन चरन चरिहि सुकुआँरी ॥ 

पग बिनु डग मग रिपु बहु जाती । दहइ दारुन कुररि की भाँती ॥ 
दुःख आतुर अह बिलखति रोती । मुकुता गह मुख मुकुत पिरोती ॥ 

दुखिया जनि गोसाईंया, निरखत बन मेँ ताहि । 
पुनि सादर निज परन कुटि लेइ गयो सँग माहि ॥ 


मुनि बालक करनक चुगि ल्याए । करीर नठि सुठि कुटीरु बनाए ॥ 
तहँ दुहु जम कुल दीप जनावा । दीपित द्योति दहुँ दिसि छावा ॥ 

एक कर नाउ कुस में राखेउँ । दूज लाल लव कहि भाखेउँ ॥ 
उजरै बिधु जिमि उजरै पाँखा । जुगल तनुज तिमि बढ़तै लाखा ॥ 

चारिउं बेद सहित छहुँ अंगा । भयउ कुमार पढ़िय सब संगा ॥ 
दै बिद्या सब दिया जनेऊ । होए कुसल मुनि बालक तेऊ ॥ 

आजुरबेद कि आयुध बेदा । सकल सास्त्र सहित सब भेदा ॥ 
करियउँ जगत निपुन रघुनाथा । बहोरि धरा माथ पर हाथा ॥ 

षडज ते निषाद लग जब , सुर सरगम  कर जोग । 
 मधुर मधुर गावहिं तब चितबहि चितबत  लोग ॥ 

बुधवार, १० अगस्त, २०१६                                                                                    

सत सुर माल कण्ठ कर बीना । करिहि सांगत त भयउ प्रबीना ॥ 
पूर पनब जब बजएँ मृदंगा । रंजनए छहुँ राग सहुँ रंगा ॥ 

जुगल केरि अस कौसल देखा । होहि मोहि पभु हरख बिसेखा ॥ 
परम् मनोहर श्री रामायन । तासु नितप्रति करैं सो गायन ॥ 

जानत ए के होवनिहारा । पूरबल जिन्ह रचि मैं पारा ॥ 
मधुप निकर जस मधुबन झौरहिं । करत गान तिमि बन बन भौरहि ॥ 

 कुसुम कली कुसुमित अति सौंहे ।  खंजन सहित मृगहु मन मौहें ॥ 
 गावत लय गति अति मधुराई । श्रोतस श्रुत श्रुत श्रुति सुख पाई ॥ 

श्रुति सो गायन  श्रुति सुख पावन बारि पति पुनि  एक दिवा । 
गहेउ हाथ निज साथ पुनि बिभावरि पुरी गयउ लिवा ॥ 
जुगल मुकुल मंजुल मनोहर सुर सागर करि पार गए । 
पावन पबित तव मृदुल चरित गावनि देउ आयसु दए ॥ 

जनमत भगवन लगन परि बादिहि बादल बृन्दु । 
दसानन बन सिय लिए हरि झरि झर झर जल बिंदु ॥ 

बृहस्पतिवार, ११ अगस्त, २०१६                                                                               
बादिहि बादल बृन्दु अगासा । झरिहि झर झर बिंदु चहुँ पासा ॥ 
भर भर कलसि करषि कर देईं । पियत पयस बूझै न पिपासा ॥ 

बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस बरुन निवासा ॥ 
कंठ ताल नूपुर दल पूरे  । गावहि झनक झनक चौमासा ।  

दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन प्रभाकर करिहि बिलासा ॥ 
कोमल करज जलज जय माला । पहिरावत मुख लवन ललासा ॥ 

गिरि गहबरु अरु फिरैं पयादे । कुपित जनि जब दियो बनबासा ॥ 
हरिअ हरानत हरि अरि हरियो । ल्याए हरि हरि करिअ बिनासा ॥ 

अबरु अबरु अरु गीति ग्याता । हितु हिती गन सहित हे ताता ॥ 
श्रुत बरुनप निज परिजन साथा । राजस रहस सरस सो गाथा ॥ 

अस तो सरस् पयस बहु होईं । तोर चरित ते अधिक न कोई ॥ 
सकल श्रोतस श्रवनतहि जाइहिं । चरित पयस नहि पियत अघाईं ॥  

 बरुन लोक मैं गयउँ बहोरी । करे अगवान दुहु कर जोरी ॥ 
द्रवीभूत मम बंदन करियो । पेम भाव हिय पूर न परयो ॥ 

रागिन रंग बयस गुन सोंही । बरुन जुगल पर प्रमुदित होंही ॥ 
सुनि रघुकुल मनि तजहि सगर्भा । कहिहि एहि बिधि सिया संदर्भा ॥ 


 सिय सम जग को सती न होई । अहहि अस पति बरता न कोई ॥ 
होहि सो गुन संपन्न कैसे । जोहि महि ससि सम्पदा जैसे ॥ 

सील बिरधा रूपवती रघुबर देइ बियोग । 
पतिब्रता सिय परम सती नहि त्याजन जोग ॥ 

बृहस्पतिवार, १८ अगस्त, २०१६                                                                                   

समर बीर पुनि जुगल जनावा । कहहु त असि सुभाग कहँ पावा ॥ 
मन क्रम बच ते सदा पुनीता । परिहर देँ अस जोग न सीता ॥ 

ताहि के हम सबहि सुर साखी । राम बिनु सिय बिहग बिनु पाखी ॥ 
जासु चरन नित चिंतत जेहीं । मिले तुरतै साध फल तेही ॥ 

जगत सृजन थिति लय किन होही । होत सब श्री संकलप सोंही ॥ 
जिन सोंहि भगवद ब्यौहारा । सो त मरित अमरित की धारा ॥ 

प्रभु तुम  सूर सिया संतापा । प्रभु तुम धनद सिया जल भापा ॥ 
प्रभु तुम गहबर घन सिय बारी । तव प्रिय सियहि पदारथ चारी ॥ 

ब्रम्हा शिव पद सिय सों पावा । तासु सबहि दिक् पाल जनावा ॥ 

जगदधात हे सर्ब ग्याता । जगद पिता तुम अरु सिय माता ॥


जानतहउ प्रभो आपहु, सिय नित सुधिता आहि । 
सो तो प्रिय प्रान सम तव अरु को प्रिय कर नाहि ॥ 

शनिवार, २० अगस्त, २०१६                                                                                 

नित पावन पबित सित जानत ए । प्रभु दिजौ मान जसि पुएबल दए ॥ 
साप संगत तव पराभावा । अस तौ जग को करिअ  न पावा ॥ 

सुनु मुनि प्रभु पहि गत पद गहिहउ । जे सबहि मम कही बत कहिहउ  ॥ 
बरुन नाथ कह बहुंत प्रकारा । एहि बिधि प्रगसिहि मनस विचारा ॥ 

सिया सकार जोग गोसाईं । सब निज निज मत सम्मत दाईं ॥ 
यह तुहरे जुग राज दुलारे । करिहि चरित जब गान तिहारे ॥ 

अह नर रूप धरे नारायन । बरुन पति घर गाएं रामायन ॥
सुरासुर गंधरब किन होई । भयउ कौतुक बिबस सब कोई ॥ 

सुनत सुमधुर राम कथा मन बहु रोचन होंहि । 
सब कीन्हि बढ़ाई तहँ मुदित भ्रात कर दोइ ॥ 

रविवार, २१ अगस्त, २०१६                                                                                      
लोकाधिप असीस जो देईं । तुहरे सुत सो सहरष लेईं ॥ 
रिषि महरिषि गन ते अधिकाई । दोउ मान जस कीरति पाईं ॥ 

पुण्य श्लोक पुरुष बर साथा । होवत तीनि लोक कर नाथा ॥ 
एहि औसर गहिहौ घट काँचा । गहस धर्मि निभ करिहहु नाचा ॥ 

बिधा सील गुन भूषन धारे । गहन जोग दुहु तनुज तिहारे ॥ 
सिय सुधित अब सबहि पतियारे । कुँअरु सहित प्रभु ताहि सकारें ॥ 

प्रान दान दए सैन जियाई । अहहि बहुतहि सुचित सो माई ॥ 
दीन बन्धु हे दया निधाना । प्रतीति हुँत एहि  साखि प्रवाना ॥ 

पतित अपबित पुरुष हुँत पावन हर ए प्रसंग । 
सुबरन बहुरि सुबरन हैं होइहि केत कुरंग ॥ 

Monday, 11 July 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५३ ।। -----

पहुँच आसु करि कुस कै आगे । अनेकानेक सर छाँड़न लागे ॥ 
बधि बधि भाल बदन कर बाहू । भेद मर्म दिए दारुन दाहू ॥ 

करिअ बिकलतर अस रे भाई । घायल व्यथा कहि नहि जाई ॥ 
तब कुस रिजु कस सर दस मारे । सुरथन्हि रथ सोंहि महि डारे ॥ 

पनच चढ़ेउ कठिन कोदंडा । चरत बेगवत किए खनखण्डा ॥ 
दिव्यास्त्र छाँड़ै केहि एका । दूज प्रतिहरन हनहि अनेका ॥ 

छेपायुध जो कोउ प्रहारिहि । तुरगति प्रतिहति तुरति बिदारहि ॥ 
एहि भाँति भयउ दोनहु ओरा । लोमनु हरख समर घन घोरा ॥ 

सोचि सिया कुँअरु अबु करि चाहिब कृत का मोहि । 
लेन जिआरी उद्यत अह सहुँ मम परम बिद्रोहि ॥ 

बुधवार १३ जुलाई, २०१६                                                                                         

करतब ठान लच्छ अनुमाना ।  गहेउ हस्त कटुक एकु बाना ॥ 
छूट सो काल अगन समाना । प्रजरत चला कला कृत नाना ॥ 

देख्यौ सुरथ आगत ताहीं । सोचि बिदारन जूँ मन माही ॥ 
त्योहिं कठिन कुलिस के भाँती । धँसा बेगि परिछेदत छाँती ॥ 

परा रथोपर रन हिय हारे । तरपत हे रघुनाथ पुकारा ॥ 
सारथि निज पति हतचित पावा । रन भू  सोंहि बहिर लय आवा ॥ 

हार रन हिय सुरथ गिरि गयऊ । सिया कुँअर कर बिजई भयऊ ॥ 
देखियत इयहि पवन कुमारा । सहसा एकु बड़ साल उपारा ॥ 

धावत बेगि जाइ निकट, दए बल अतुल अपार । 
झटति डारेन्हि तापर, करियहि घोर प्रहार ॥ 

द्रुम घात तैं चोट गहावा । संहारास्त्र लेइ उठावा ॥ 
अजित अमोघ सकती अस होई । लागत सीध बचै नहि कोई ॥ 

बिलोकत ताहि प्रबल हनुमाना । बिघन हरन के करिहि ध्याना । 
देत घात घन ऐतक माही । हनुमन उरसिज आनि समाहीं ॥ 

होइहि अह ब्यथक सो भारी । पीर भरत करि बहुंत दुखारी ॥ 
हतत आतुर मूरुछा दयऊ ॥ सुनु मुनिबर आगिल का भयऊ ॥ 

हनुमत होइ गयउ हतचेता । सीता नंदन तब रनखेता ॥ 
कसि कसि रिजु असि बान चलायो ।एक एक तेउ सहस बनि धायो ॥ 

लपक लपक लागेउ तिमि जिमि गहि कालहि खाहि ।  
चतुरँगनि पराई चली, कहति त्राहि मम त्राहि ॥ 

बृहस्पतिवार १४ जुलाई  २०१६                                                                                             

जान ए मरनि निकट जिमि  आई । अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥ 
कपि राजु सुग्रीउ तेहि काला । आनि सँभारेउ सैन बिसाला ॥ 

ऊंच ऊंच अति बिटप उठावा । नभ रव पूरत कुस पहिं धावा ॥ 
देइ बिदारिहि बिनहि प्रयासू । टूक टूक होइब सब आसू ॥ 

तबु कपिप्रभु एकु सेल उपारा । ताकि तमकत माथ दए मारा ॥ 
बिहुरत बनावरि  दरसत  ताहीं  । कन कन करि डारिहि छन माही ॥ 

करत धूर पुनि उड़इँ अगासा । भइ धूसर  रन भुइ चहुँ पासा ॥ 
लगन जोग मह रूद्र समाना । भए सो भूधर टिल प्रमाना ॥ 

मारि भालु कपि घायल कीन्हि । जो उचित जस तस फल दीन्हि ॥ 
बालक के बल बिक्रम अतीवा । देखिहि अचरजु भरे सुग्रीवा ॥ 

चित्रलिखित समेत कपिप्रभु चितवहि भर प्रतिसोध । 
मारि प्रताड़न एकु बिटप गहि अतिसय कृत क्रोध ॥ 

ऐतक महुँ लव के बड़ भाई । बरनायुध चुनि चापु चढ़ाईं ॥ 
पुनि चित्रकृत निज बल दिखरायो । बरुण पास कपि सुदृढ़ बँधायो ॥ 

लपटाहि जिमि कोउ उरगारी । बँधत गिरे रन भूमि मझारी ॥ 

निरखिहि जुधिक परे निज नाथा । धाएउ इत उत भय के साथा ॥ 

पुष्कल अंगद कि प्रतापाग्रय । बीरमनि हो चहे अन्यानय ॥ 
बीरसिरोमनि भ्राता दोई । बहोरि बिजै कलस कर जोई ॥ 

करत हताहत सकल  भुआला । दोउ भ्रात गहेउ जयमाला ॥ 
दोनउ भात परस्पर हेलिहि । हरषित  मनस मुदित मन मेलिहि ॥ 

गहे गुरु चरण बसिहि सघन बन भेसु धरेउ  जिमि कोउ जति । 
मख तुरग निबंधु दोनहु बंधु मह मह बीर ते बीर अति ॥ 
बाल मराल कोउ भुआल न सहुँ चतुरंगी बाहिनी । 
चले गगन सर भाल कराल तथापि जीति बिनहि अनी । 

हरखिहि सुर न त बरखिहि सुमन न कोउ अस्तुति गाए  । 
न कतहुँ दुंदुभि बजावहिं बिजित सुभट समुदाए ॥  

शुक्रवार १५ जुलाई, २०१६                                                                                     


मुदित मनस बहु हरखित गाता । बोलेउ लव सुनहु मम ताता ॥ 
होइहि तुहरी कृपा अपारा । समर सिंधु पायउँ मैं पारा ॥ 

अजहुँ भई रन बिजै हमारी । हेरै कोउ सुरति चिन्हारी ॥ 
कहत अस लव सहित निज भाई । प्रथमहि रिपुहन पहिं नियराईं ॥ 

गयउ तहाँ दुहु गहगह गहि कर । हिरनमई मनि मुकुट मनोहर ॥ 
आयउ जहँ पुष्कल महि पारे । कबेलाकृत किरीट उतारे ॥ 

बहुरी बाहु सिखर लगि पूरा । गहि तासु कल कनक केयूरा ॥
कवच कराल भाल सर चंडा । सकेरिहि कछु कठिन कोदंडा ॥ 

बांध्यो जाइ पहिं बानर राजु अरु महबली हनुमन्तहि । 
कहत लव निज भ्रात सों तात लै जइहौं कुटीरु दुनहु गहि ॥ 
तहँ मुनि बालक केलिहि ता सँग मोरु मन रोचन होइहीं ।  
राख्यो निकट तुरग थल लाई दुहु बंधु करत अस बत कही ॥ 

जोहति सुतहि पंथ जगज जननि मातु श्री सोभामई । 
थिर थिर थकी ढरयो रबि दिनु बिरत्यो अरु साँझ भई ॥
अँधेरिया जग घेरिया जग जगमग जोत जुहार करे  । 
बरति बिलग जोहहि द्वार लग दीपन मनि सार भरे ॥ 

सुभ बसन भूषन बँधि कपिगन तुरग सहित सादर चले । 
जाइ सिया पहिं अरपिहि चरन नत भेँट भूषन जे भले ॥ 
आगत देखि दुहु बाल मराल मुदित बहु लोचन भरी । 
लाइ हरिदै सनेह सहित दुइ पलकन जल बिन्दु धरी ॥ 

चकित सकुचित अंचित बदन करि ढारि दृग पट हरयरी । 
परचत कपिगन भेंट भूषन सहसा सिहरति अति डरी ॥ 
उठि त्याजत निबंधु छोरि कहि सुत जाहु दुहु कै पग परौ  । 
कपिराजु बली महबीर जे अबिलम अतुरै परिहरौ ॥ 

जे महमन हनुमन भयउ रघुबर केर सहाइ । 
भस्म भई लंका पुरी दनुपत गयउ नसाइ ॥ 

रविवार, १७ जुलाई, २०१६                                                                                        

जे बलबन कपि भल्लुक नाहा ।  कहु दोनहु अस बाँधिहु काहा। 
मारि कुटत पुनि करिहु अनादर । रे बच्छर धिक् धिक् तुहरे पर ॥ 

बोलेउ सुत सुनहु हे माता । राम नामु नृपु एकु बिख्याता ॥ 
बीर सिरो मनि बहु बलवंता । दसरथ तनय अवध के कंता ॥ 

तेज तुंग एकु तुरग त्याजे। सुबरन पतिआ भाल बिराजे ॥ 
नाउ परच बल बिक्रम बिसेखे । परन परन बिबरन यहु लेखे ॥  

बलबन आपनु समुझिहि जोई । हरिहु ताहि बढ़ सद् छत्रि सोई ॥ 
न त मम सम्मुख अवनत माथा । समरपिहु राज पाट जुग हाथा ॥ 

दरस ढिठाई महिपु की साँच कहएँ हे मात । 
अहा हठात जाई पहिं बाँध लिये बरियात ॥ 

सोमवार, १८ जुलाई, २०१६                                                                                           

 पुनि सो समर बीर बल पूरा । गरज गहन रन भेरि अपूरा ॥ 
बरूथ बरूथ भट हमहि पचारे । किए घन घोर समर गए मारे ॥ 

मौलि मुकुट एहि रिपुदवनू के । ए कल कीरिट भरत नंदनू के ॥ 
बोलिहि  मातु पुनि मुख नेहि के । गहिहु तुरग कहहु सो केहि के ॥ 

प्रथमहि हम जो तोहि जनाईं । सोए रघुबर तासु गोसाईँ ॥ 
 रे बछर तुम करिहउ न न्याए । हरिहु तुरग रघुबीर परिहाए ॥ 

अनेकानेक बीरन्हि हनिहउ । पुनि बाँध कपिगन सुठि न करिहउ ॥ 
होए ए करतब कछु भल नाही । सुनु एहि बत नहि तुमहि जनाही ॥ 

जनमदात सो पितु तुम्हारे ।  महा मेध हुँत हय परिहारे ॥ 
सुनु छाँड़त सादर कपि दोऊ । बँधे बाजि परिहरहउ सोऊ ॥ 

सुनत मातु कर बत कही बाल बीर बलवंत । 
साधे मौन मूरत भए सो एकु पल परजंत ॥ 

मंगलवार, १९ जुलाई, २०१६                                                                                   

 पुनि बालक बोलिहि रे माता । अहहीं बेद बिदित एहि बाता ॥ 
सो छत्रि धरम हमहु अनुहारे । महमन महिप समर गए हारे ॥ 

छत्री धर्म अनुहर रन आगी । लागत जनि होत न हतभागी ॥ 

बालमीक मुनिबर पाहिं पढ़े । ए सिच्छा देइ सो हमहि गढ़े ॥ 

छात्र धर्म कह कहिब ग्याता । पिता ते पुत भ्रात ते भ्राता ॥ 

सिस समुह चहे गुरु किन होईं । जूझत रन भू पाप न होई ॥ 

तद्यपि जसु तुहरे अनुसासन । बंधे बाजि बर करिअ बिमोचन ॥ 

ता संगत बहरिहिं कपि दोऊ । होइहि सोए कहब तुम जोऊ ॥ 

अपूरत निज मंजुल मुख मध्यम मधुरित बानि । 
सिरु नत बहु बिन्यानबत दोउ जोग जुग पानि ॥ 

बृहस्पतिवार, २१ जुलाई, २०१६                                                                                     

जग बंदित मातु अस कहयऊ । गए दुहु तहाँ जहाँ रन भयऊ ॥ 
लए कपीस गन आगिल बाढ़े । तुरंगम सहित दिए दुहु छाँड़े ॥ 

दुहु सुत करम कटकु बिनसाई । सुनिहि सुतहि मुख जबु जग माई ॥ 

प्रणति चरनन सुरति भगवाना । मन ही मन पुनि करति ध्याना ॥ 

सदागतिबत सबहि के  साखी । भगवन केतु कंत पुर लाखी ॥ 

कहि करुणित हे दिनकर देऊ । जौं मैँ मन क्रम बचनन तेऊ ॥ 

बंदउँ चरन श्री रघुबरहि के । भजेउँ भजन न आन केहि के ॥ 

तौ मरनासन नृपु रिपुहन्ता । अजहुँ छन महुँ होएँ जीयन्ता ॥ 

 बिरुझत बिदरत बहु बरियाईं । मोर तनय ते गयउ नसाई ॥ 

रकताकत अनी सोउ भारी । मोर सत सोहिं होए जियारी ॥ 

पतिब्रता सति जानकी जस अस बचन  उचारि ।  
तैसेउ मरति जिअत उठि बिनसि सैन सो भारि ॥ 

शुक्रवार, २२ जुलाई, २०१६                                                                                      

कहत सेष सुनु मुनि बिद्वाना । छन महुँ मुरुछा गयउ बिहाना ॥ 
जगएं जगज जिमि सयन त्यागे । मरनासन रिपुहन जिअ जागे ॥ 

लहि सुभु लच्छन गहि गुन गाढ़े  । देखि तुरग निज सम्मुख ठाढ़े ॥ 
मनि मुकुताबलि मुकुट न माथा । धनु बिनु कर भुज सिखर न भाथा ॥ 

निरजिउ परेउ अनि जिअ गयऊ । संकित मन बहु अचरज भयऊ ॥ 
चितबत चित्रकृत नयन अलोले । जागत सुबुध सुमति सहुँ बोले ॥ 

जौ नहि जति नहि कोउ भुआला । कृपा करत सो बाल मराला ॥ 
बाँधेउ बाजि बल दिखरायो । मख अपूरनन दए बहुरायो ॥ 

गहरु करब कछु लाह न आही । चलहु बेगि अबु रघुबर पाहीं ॥ 

अह लोचन पथ लाइ के जोह रहे रघुराय । 
असि कहत चढ़ि राजहि रथ समर भूमि सिरु नाइ ॥ 

शनिवार, २३ जुलाई, २०१६                                                                                       

राजत रथ रथि लेइ तुरंगा । चलइँ चरन पथ पवन प्रसंगा ॥ 
चतुरंग अनि आयसु सिरु धारे । चलिहि पाछु सबु साजु सँभारे ॥ 

बाजिहि भेरि न संख अपूरे । गयउ बेगि आश्रमु ते दूरे ॥ 
अगमु पंथ गहन बन गिरि ताला । तीर तीर तरि तरुबर माला ॥ 

देइ दरस जबु भयउ बिहंगा । तरंग माल सुसोहित गंगा ॥ 
पार गमन आयउ निज देसा । मरुत गति सों कीन्हि प्रबेसा ॥ 

 पौर पौर पुर  नगर निकाई । पुरजन परिजन  बसित सुहाईं ॥ 
कंध कठिन कोदण्ड सम्भारे । सैन सहित रिपुहन मन मारे ॥ 

बीर भरत कुँअर कर सथ लेइँ सुरथ सँग माहि । 
रथारोहित जाहिं चले रघुकुल कैरव पाहि ॥ 

सोमवार, २५ जुलाई २०१६                                                                                          

बहुरि बिहुरत चरत सब डगरी । आएँ समीप अजोधा नगरी ॥ 
अमरावति जसि अति मन मोही । रबि बंसज बन संग सुसोही ॥ 

परस नभस धुर धुजा उतोले । हरुबर हरुबर पवन हिलोले ॥ 
सोंहि रुचिर पर कोट अतीवाँ । जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ॥ 

आए  रिपुहन सुनिहि श्री रामा । सवेन सहित हय पहुंचय धामा ॥ 
कह जय जय अतिसय हरषायो । बलबन लछमन पाहि पठायो ॥ 

सैन सहित तहँ आयउ लषमन । भेंटि परबसिया भात मुदित मन ॥ 
रकतारकत चाम चहुँ पासा । पलउ पलउ जिमि पलय पलासा ॥ 

कुसल छेम बुझाई कहि भाँति भाँति बहु बात । 
बलिहि बाहु फेरब भई अतिसय पुलकित गात ॥ 

बुधवार २७ जुलाई, २०१६                                                                                       

लै रिपुहन सथ रथ महुँ बैठे । महमन लषन अवध पुर पैठे ॥ 
जहँ त्रिभुवन कर पावन पबिता । प्रभु पद परसति सरजू सरिता ॥ 

पद पद पदमन पुन्य पयूषा । सरनिहि सरनिहि सस मंजूषा ॥ 
लगए मग लग सुभग सोपाना । सोहति सारद ससी समाना ॥ 

भरत नंदनहि रिपुहन साथा । आगत दरस हरषि रघुनाथा ॥ 
सहित सुभट अति निकट बिलोके । उर अनंदु घन गयउ न रोके ॥ 

बिहबल मन मिलनब जूँ ठाड़े । तुरतई रिपुहनहि कर बाढ़े ॥ 
सघन घाउ नहि खात अघाई । पगु परि बिनय सील सो भाई ॥ 

जनु महि लुठत स्नेह समेटे । उठइ भुजा कसि बरबसि भेँटें ॥ 
गहरईं घन गिरहि जल बूंदी । पेम निमगन पलकन्हि मूँदी ॥ 

परइँ चरन भरतु नंदन सादर करइँ प्रनाम । 
उठइँ लै उर कसइँ बाहु द्रबित दरस पुनि राम ॥ 

शुक्रवार, २९ जुलाई, २०१६                                                                                         

मिलि हनुमत पुनि लमनत बाहू । सुग्रीव सहित मेलिं सब काहू । 
पग परे नृपन्हि हरिदै लाए । भेंटें उमगि सनेहि बहुताए ॥ 

समदत सन्नत सैन समाजू । छुधावंत जिमि पाए सुनाजू ॥ 
गहि पद लगे सुमति प्रभु अंका । जनु भेंटी सम्पद अति रंका ॥ 

प्रफुरित नयन ठाढत समुहाए । आयउ निकट उलसित रघुराए ॥ 
देखि सुमति गदगद गोसाईं । मधुर बचन ते पूछ बुझाईं ॥

जगकर यहु सब राजाधिराजे । पाहुन बनि इहँ आनि बिराजे ॥  
सब समेत धारिअ मम पाऊँ । बाँध क्रम कहु कवन सो राऊ ॥ 

कहौ तुरंगम कहँ कहँ गयऊ । बाँधियब केहि केहि गहयऊ ॥ 
कुसल बंधु मम कवन उपाऊ । केहि बिधि कहु ल्याए छँड़ाऊ ॥ 

कहत सुमति तुम सरबग्य कहु कह कहा जनाउँ । 
पूछिहउ मोहि जोए प्रभु सो बरनत सकुचाउँ ॥