Friday, 16 September 2016

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

लघुवत वट बिय भीत ते उपजत बिटप बिसाल । 
बिनहि बिचार करौ धर्म पातक करौ सँभाल ॥ १ ॥ 
भावार्थ : -- एक लघुवत वट बीज के भीतर से एक विशाल वृक्ष उत्पन्न होता है । अत: पुनीत कार्य करते समय उसके छोटे बड़े स्वरूप का विचार न करें । पतित कार्य करते समय उसके छोटे बड़े स्वरूप का सौ बार विचार करें । क्षुधावन्त की क्षुधा को शांत करने के लिए अन्न का एक दाना भी पर्याप्त होता है यह एक दाना खेत में पहुँच जाए तो फिर अनेक से अनेकानेक होकर भंडार भरने में समर्थ होता है ॥  अपात्र को दिया गया एक अभिमत, दाता के नारकीय पथ को प्रशस्त करता है ॥

" संकल्प हीन मनोमस्तिष्क ही विकल्प का चयन करता है " 

जो कारज कृत कठिनतम बढ़ि बढ़ि कीजिए सोइ । 
ताहि कृतब का होइया करिअ जाहि सब कोइ ॥ २ ॥ 
भावार्थ : -- जिन पुनीत कार्यों को करना कठिन हो वह पुण्य प्रदाता कार्य होते हैं अत: उन्हें करने के लिए सदा उद्यत रहना चाहिए । जो सरल हों जिसे सभी करते हो ऐसे सत कार्य पुण्यदायक नहीं होते ॥ 

सो धर्म केहि काम कर जौ जन करै अकाम | 
बिरवा बुवावै न एकहु बैठा खावै आम || ३ || 
भावार्थ : -- वह धर्म संसार के किसी काम का नहीं जो अपने अनुयायियों को कर्म से अलिप्त कर उन्हें अकर्मण्य बनाता हो | जिसकी आम खाने में तो रुचि हो पेड लगवाने में नहीं | 

सो धर्मि केहि काम कर जौ तन करै अकाम | 
बिरवा बुवावै न एकहु बैठा खावै आम || ४ || 
भावार्थ :-- वह अनुयायी भी धर्मविशेष के किसी काम के नहीं जो अपने शरीरको कर्म से अलिप्त कर उसे अकर्मण्य बना देते हों | जिसकी आम का रसास्वादन करने में रूचि हो किन्तु अपने शरीर से पेड लगवाने में नहीं || 

सीस उतारी जब तेउ डारि दियो सद ग्रंथ | 
कर सत करतब छाँड़ियो  धरिअत चरन कुपंथ || ५ || 
भावार्थ ;-- जब से शिरोधार्य सद्ग्रन्थ अधस्तात होकर त्याज्य हो गए तब से चरण कुपपंथगामी और हस्त कृत कर्मों से विमुख हो गए  || 

आया तू संसार में देख पके पकवान | 
निसदिन खावन में रहा बिछुरे तन ते प्रान || ६ || 
भावार्थ :--कर्मों में संलिप्त जीवन की कहानी लंबी होतीहै | कर्मसे अलिप्त जीवन की कहानी केवल एक पंक्ति में संकुचित होकर रह जाती है | जीवन चरित्र ऐसा हो जिसपर ग्रन्थ लिखा जा सके ऐसा न हो कि मात्र इतना लिखे ;--  "संसार में आया था, पके पकवान देखा ,खाया और चला गया....." 

मानस देहि जनम लियो,रहियो अपनी कान | 
हरा भरा जग करा नहि करो न मरु अस्थान || ७ || 
भावार्थ :--  मनुष्य देह में जन्मे जीव को चाहिए कि वह अपनी मर्यादा में रहे | 
संसार को हरा-भरा  नहीं कोई बात नहीं उसे मरुस्थल में परिवर्तित न करे | 
उसने पुण्य नहीं किया कोई बात नहीं वह पाप तो न करे | 




Wednesday, 24 August 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५५ ।। -----

बुधवार, २४ अगस्त, २०१६                                                                                                  

सिय केर सुचितई मानद हे । तव सहुँ छदम न कोइ छद अहे ॥ 
न तरु हमहि न देवन्हि सोंही । यह कछु मन महुँ भरमन होंही ॥ 
हे मानद ! सीता की शुद्धि के विषय में आपसे न कोई दुराव है न छिपाव | तत संबंध में न हम से और न  देवताओं से ही कुछ गोपनीय है | यह जन-मानस  के मन का भ्रम मात्र ही था | 

हरहि तमस जिमि प्रगस पतंगा । दूरए मन  निभरम ता संगा ॥ 
कहत सेष मुनि जगद निधाता । भगवन जद्यपि सरब ग्याता ॥ 
जिस  प्रकार सूर्य उदयित होकर अन्धकार का हरण कर लेता है, उसी प्रकार उक्त घटना से यह भ्रम भी दूर हो गया | शेष जी कहते हैं : -- हे मुनि! जगत विधाता भगवान यद्यपि सर्वज्ञाता हैं  

तद्यपि मुनि एहि बिधि समुझायउ । सुनि असि अस्तुति सहुँ सिरु नायउ ॥ 
लषन सोंहिं बोलिहि एहि  बाता । सुमित्र सहित कृत करिहु ए ताता ॥ 
तद्यपि वाल्मीकि मुनि ने उनका प्रबोधन किया मुनि वर की ऐसी स्तुति श्रवण कर प्रभु नतमस्तक होकर लक्ष्मण से बोले :--हे तात ! तुम सुमित्र का संग प्राप्त कर यह कर्तव्य करो;

सती सिया पहिं चढ़ि रथ जाहउ। जमल सहित तुर आनि लिवाहउ ॥ 
करएँ जुग कर बिनति सब कोई  । करौ सकार अजहुँ सुत दोई ॥ 
तुम रथारूढ़ होकर युगल पुत्रों सहित धर्माचारिणी सीता को ले आओ | सब लोग करबद्ध होकर मुझसे विनति कर रहे हैं कि आप अपने दोनों पुत्रों को स्वीकार करें | 

मोर अरु मुनि केर कही कहियउ तहँ सब बात । 
अवध पुरी लेइ अइहौ कहत मात हे मात ॥ 
माता माता की गुहार कर तुम  मेरे तथा महर्षि वाल्मीकि के कहें इन वचनों को कहना  और उसे अयोध्या पुरी को ले आना |  

अहो भगवन अजहुँ मैं जइहौं । सीअहि मातु कहत समुझाइहौं ॥ 
सुनिहि जो तुहरे प्रिय सँदेसा । आनि पधारिहि सो एहि देसा ॥ 

आइहि मोर संग सिय माई । होइहि तबहि सुफल मम जाई ॥ 
अस कह लखनउ आगिल बाढ़े । प्रभो अग्या सोंहि रथ चाढ़े ॥ 

अरु मुनिबर के सिस लय संगा । सुमित्र सहित रथ भयउ बिहंगा ॥ 
पति पतियारिन अति परम सती । होहि केहि बिधि मुदित भगवती ॥ 

बिचलित मन मानस अस सोचिहि । कबहुँ हरष करि कबहुँ सकोचिहि ॥
एहि बिचहुत बिच मति बिरझाईं । अतुरए आश्रमु दिए  देखाई  । 

एहि दसा पैठि रथ चरन पथ श्रमु गयउ सिराए । 
अतुरई पुनि जगन मई जननि देइ देखाए ॥ 

रविवार, २८ अगस्त, २०१६                                                                                         

भय अस्थिर रथ चरन तरायल । तुरै तरिय तरु मंडित अस्थल  ॥ 
सिथिरीभूत सीतहि नियराए । कहत ए लखन कण्ठ  भर ल्याए ॥ 

प्राना पति हे पेम परिमिता । ज्ञानवती अति निपुन विनिता ॥ 
हे आर्ये हे मंगल करनि । बिभव अपार भव सरिता तरनि ॥ 

बहोरि कातर रूप निहारे । बोधत अस गहि पद महि पारे  ॥ 
सियहि बत्सल पेम के साथा । बिहबल होति लम दुहु हाथा ॥ 

नहि नहि कहति नयन भर पानी । देखि लषन गति करिअ ग्लानी ॥ 
भरिअ सोहाग रहिअ बिरागी । तासों एहि बिधि पूछन लागी ॥ 

जौ बेहड़ बन मुनि महर्षि प्रियकर महतिमह तपसि जन के । 
ब्याल कराल जौ भालु बाघ अरु केहर कुंजर गन के ॥ 
कंदर खोह अगम अगाध नदीं नद जो बिनहि रबि किरन के ।  
कंटक कांकर गहबर मग अँधेरि छादित जौ तरुवन के ॥ 

हरिअहि हय हेरिहि केहि, तव डग डगर भुराए । 

नगौकस ते दूर निकस कहौ इहाँ कस आए ॥  

बृहस्पतिवार ०१ सितम्बर, २०१६                                                                                 

मातु गरभ गह मुकुतिक रूपा । परगस भए मनि मुकुत सरूपा ॥ 
अराधित देउ मोरे नाथा । अहहि न धनि  सुख सम्पद साथा ॥ 

सजल नयन पुनि कहि हे नागर । जग अपकीरति कारन रघुबर ॥ 
राखेउ साँच मोहि त्यागे । होइँ कुपथ चर प्रजा न आगे ॥ 

दय बन करिअब बिरहन मोही । छाड़न काज सौंपि प्रभु तोही ॥ 
होइ ताहि सों एहि संसारा । तासु बिमल कीरत बिस्तारा ॥ 

जुग जुग लग अस्थिर कृत होईं  । तासों बड़ संतोष न कोई ॥ 
अजहुँ होउँ किन मैं बिनु प्राना । रहेँ जसोमन प्रान निधाना ॥ 


 मोर नयन हरि पेम पियासे । यह मन मंदिर बरें दिया से ॥ 
रुचिर बसन मनि भूषन साजे । मंजुल  मूरति रूप बिराजे ॥ 

हरिदयालु परम कृपालु कौसल्या महतारि । 
अहहि न आनंद अपूरित अवध सहित सुत चारि ॥ 


शुकवार, ०२ सितंबर, २०१६                                                                                            

रिपुहन भरतादि सबहि भ्राता । अहहि न सकुसल सुमित्रा माता ॥ 
चाहिब अधिक् प्रान ते मोही । दुखातीत रहहि न सुख सोंही ॥ 

कहौ अहैं कस पियतम मोरे । पूछत एहि जब करिय निहोरे ॥ 
लोचन अरु जल बोह न बोही । बालिहि लषमन पुनि सिय सोंही ॥ 

देइ सकुसल अहहि महराई । पूछत रहँ तुम्हरि कुसलाई ॥ 
सुमित सहित मातु कैकेई । आहि सकुसल सबहि हे देई ॥ 

रहिब रागि अरु जो रनिबासा । करिअ निरंतर तोर सुखासा ॥ 
गुरुजन सहित सकल गुरुनारी । दए असीस तुम होउ सुखारी ॥ 

दए असीस जनि पेम अपूरे। तोर जिआ आपन जिअ भूरे ॥ 
तुहरे पदुम चरन सिरु नाई । कुसल प्रसन कृत दोनहु भाई ॥ 

रघुनन्दन कहत ए बचन नयन नीर भर लाए । 
पालि मम कहिअ गवन बन जानकिहि जाहु लिवाए ॥ 

शुक्रवार, १६ सितम्बर, २०१६                                                                                                      

 रघुकुल मनि अब रहएँ बुलावा । तोहि ल्यावन मोहि पठावा ॥ 
ह्रदयँ रहस प्रगसभव बानी । पोषत प्रीत पलकन्हि पानी ॥ 

भरे कण्ठ यह कहिब भनीता । सुनहु सतीहि सिरोमनि सीता ॥ 
दीनदयाकर कृपानिधाना । जन जन कहत मोहि भगवाना ॥ 

होइ रहेब जगत महुँ जोई । ताकर अदरस कारन होई ॥ 
मोर मते  जौ जग करतारी । सौइ  अदरस  करम अनुहारी ॥ 

तोर बरन खंडित भए चापा । कैकेई मति भरम ब्यापा ॥ 
पितहि मरन में बन गवनन में । दनुज कर तहँ तुहरे हरन में ॥ 

बँधेउब पयधि पार तरन में । सहाय कृत केर सहायन में ॥ 
समर समर औसर जब आईं ॥ कपि भल्लुक सबु होए सहाई ॥ 

मरिहि दनु तुम्हरे मिलन में । अरु बहुरि मम पन अपूरन में ॥ 
निज बांधव सहुँ होइ सँजोगा । राज जोग करि प्रिया बियोगा ॥ 

निगदित कारज कर एकहि कारन अदरस होइ  । 

पुनि सो होत मुदित जुगित करिअब हमहि सँजोइ ॥ 


सोमवार , १९ सितम्बर, २०१६                                                                                   

जिन्ह सुधिजन के बिसद बिचारा । अदर्स करिहि सोइ अनुहारा ॥ 
भुगत भोग सो तासु नसावा । तुहरी  भुगुति बन अपूरावा ॥ 

 तुहरे प्रति मम सील सनेहा । बढ़तै गयउ नित निसंदेहा ॥ 
सोए नेह निंदक परहेला । अजहुँ तोहि बुलाउ दए हेले ॥ 

सनेह सरित दोषु कर संका । लहत मलिनपन गहत कलंका  ॥ 
दोषु धुरावत मिटिहि बिषादा । दए तबहि नेह रस असवादा ॥ 

दोषु धरिअब करिअ संदेहू । होत बिमल ते अबिमल नेहू ॥ 
देय बिपिन में तोहि त्यागा ।  भयउ बिसद अस मम अनुरागा ॥ 

तजि अहो तुम्ह मोर तईं  , करिहु न हृदय बिचार  । 
निंदक राखन किया मैं सुबुध चरन अनुहार ॥ 

रविवार, २९ जनवरी, २०१७                                                                             

दोषु धरिअब करएँ निंदाई । तासु हरिहि हमरी मलिनाई ॥ 
साधु चरित कर कहहिँ बुराइँहि । सो हतमति आपहि बिनसाइँहि ॥ 

पूरन ससि निभ निसि उजयारी । उजबरित तस कीरति हमारी ॥ 
कृत करतब किरनन जस कासिहिं । दुहु कुल दिनकर सरिस प्रकासिहिं ॥ 

हमरे बिरद करहि गुन गाना । होहि बिसद मनि मुकुत समाना ॥ 
सुनहु सिया भव सिंधु अपारग । जाहि हमरी भगति सो पारग ॥ 

तोर गुन ते मुदित रघुनाथा । येहु सँदेसु दियो मम हाथा ॥ 
दरसन पदुम चरन निज नाथा । करिहउ बिचार न चलिहु साथा ॥ 

धरिअ माथ पद पदुम परागा । मानिहु बहुरि भूरि निज भागा ॥ 
मातु सदय अब हरिदै कीजौ । मोहि  लेइ गत आयसु दीजौ ॥ 

जगज जननी लए आपनि संगत दोउ कुमार । 
चलिहु बेगि प्रान पति पहि करौ न सोचु बिचार ॥ 

मंगलवार, ३१ जनवरी,२०१७                                                                      
भई सिथिर सुनु हे महरानी ।पथ निहारति रामु रजधानी ॥ 
चढ़ि गज बैठ अधरिया ऊपर । आगिल चलिअहि दुहु जुगल कुँअर ॥ 

सुथर सिबिका कटकु सँग लागे । छाँह करिहि घन बन मग माँगे॥ 
रहिहु मध्य तुम बाहन आछे । चलिहौं मैं तव पाछहि पाछे ॥ 

एहि बिधि अवधहि नगरि पधारिहु । धरि पद रजस रजस उद्घारिहु ॥ 
निज पिय ते मिलिहउ तहँ जाईं  । मख अस्थरि दिसि दिसि ते आईं ॥ 

राज रागि सांगत ऋषि नारी । हरषिहि बिरहन तापु बिसारी ॥ 
प्रनमत कौसल्या महतारी । छाइ तासु उर आनंद भारी ॥ 

बाजनि बृंद बहु बिधि कर बाजिहि बिबिध बिधान । 
मधुर धुनि सरस राग दै गाइहि मंगल गान ॥ 

बुधवार, १ फरवरी, २०१७                                                                   

हरि निवास श्री वासिहि जैसे । धूमधाम अरु होहि न कैसे ॥ 
तव सुभागम हेतु कल्याना । जाइ मनाइहि परब महाना ॥ 

कहत सेष सुनि येह सँदेसा । कहइँ सिया एहि बचन बिषेसा ॥ 
अहहि जग पहि पदारथ चारा । अह रे मैं रिति सबहि प्रकारा ॥ 

दरिद दासि यह कहँ महराजा । समरिहिं मम तैं कहु को काजा ॥ 
पानि गहे जब मोहि बिहावा । जोइ मनोहरता तन छावा ॥ 

बसिहि रूपु सो हरिदै मोरे । ता सहुँ सब दिन रहि कर जोरे ॥ 
यह छबि उर कबहु न बिलगाई । तासु तेज सों दुइ सुत जाई ॥ 

अहहि कुँअर एहि बंस अँकोरे । हीर रुचिर बरु बीर न थोरे ॥ 
लहि बिसेख जुगता दुहु भाई । धनु बिद्या मह गह निपुनाई ॥ 

सघन बन बहु जतन तेउ पालि पौषि हौं ताहि । 
जाहु संग लए दुहु कुँअर पितु पहि काहे नाहि ॥ 

बुधवार, १५ फरवरी, २०१७                                                                         

तप तैं निज इच्छा अनुहर के । अधर नाउ धर एकु रघुबर के ॥ 
मैं बिरहन अब एहि बन रहिहौं । कीरत कृत नित हरि गुन कहिहौं ॥ 

जाइ तहाँ तुम पूजित जन के । अरु अवध कर आनंद घन के ॥ 
गहिहु चरन कह मोर प्रनामा । कहिहु कुसल सब लए मम नामा ॥ 

होत बिनैबत बोलि सपेमा । पूछिहउ पुनि सबहि के छेमा ॥ 
बहोरि भरि अनुराग बिसेसा  । दुहु बालकन्हि देइ अदेसा ॥ 

रे बच्छर तुअ पितु पहि जाहू । दए आदर अतिसय सब काहू ॥ 
मातु बंधु गुरु कह पितु देबा । गहिब चरन करिहौ बहु सेबा ॥ 

मातु चरन होएब बिलग दोउ कुँअर चहँ नाहि । 
एहि इच्छा बिनु कहब किछु राख रहे मन माहि ॥

जनि अग्या सिरुधार के  गहे एकहि एक हाथ । 
सिथिर चरन उपरि मन पुनि चलेउ लखमन साथ ॥ 

बृहस्पतिवार १६ फरवरी, २०१७                                                                        

पहुंच तहाँ दुहु सियसुत नीके । गयउ नकट बाल्मीकि जी के ॥ 
गहिब गुरुपद रहिब जुगगाथा । गयउ लखमनहु तहँ तिन साथा ॥ 

सुमिरत अकथ अनामय नामा । प्रथमहि महर्षि करिअ प्रनामा ॥ 
बहोरि महर्षि लषन प्रसंगा । चलेउ दोउ कुँअर करि संगा ॥ 

जान सभा भित कृपा निधाना । मानेउ मन न केहि बिधाना ॥ 
जागिहि दरसन कर अभिलासा । गयउ अतुरइ सबहि प्रभु पासा ॥ 

बोलिहि बन जो बिरहनि माता । करि प्रनाम कहि सो सब बाता ॥ 
सोक संग हर्ष अपूराही । धूपित पंथ मिलहि जिमि छाहीं ॥ 

जब जब लखमन सिय सुधि करहीं ।  तब तब बारि बिलोचन भरहीं ॥ 
हरिदै थल जल भए दुइ भावा ।  भयउ  मगन अरु तीर न पावा ॥ 

कहत प्रभु रे सुनहु सखे बहुरि तहाँ तुम जाइ । 
महा जतन करि कै सियहि, आनिहु लए अतुराइ ॥ 

शुक्रवार, १७ फरवरी, २०१७                                                                                    

गहि पद सबिनय दुहु कर जोरे । कहहु सिय ते ए बत कहि मोरे ॥ 
साँझ लखिहु न लखिहु तुम भोरा । करहु सघन बन तप घन घोरा ॥ 

देखिअ सुनिअ न जग बिन होइ । मम तै अबरु तकिहु गति कोई ॥ 
तुहरे हिय कछु प्रिय नहि जाना । सदा कहिहु पिय प्रान समाना ॥ 

जिअ बिनु देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरुख बिनु नारी ॥ 
तनु धनु धाम धरनि पुर राजू । पत बिहीन सबु सोक समाजू ॥ 

नाथ सबहि सुख साथ तिहारे । सरद बिमल बिधु बदनु निहारे ॥ 
पिय बिनु सुखद कतहु किछु नाही । रहसि चहत अजहूँ बन माही ॥

आपनि कहि बिसराए के पिया संग परिहारि । 
घन हठ हृदयँ बिचार करि सुनिहु न मोरि गुहारि ॥ 

शनिवार, १८ फरवरी, २०१७                                                                              

जेहि बन अस्थरि रिषि मुनि मन भाइँ । निज इच्छा ते तहाँ तुम आइँ ॥ 
दरसत मुनि पूजिहु रिषि नारी । पूर भई अभिलाष तिहारी ॥ 

अजहुँ नयन तव पंथ निहारिहि । निसदिन हिय सिय सियहि पुकारिहि ॥ 
आजु प्रीत यहु पूछ बुझाईं । तोहि काहे न देइ सुनाई ॥ 

पतिब्रतासति कतहुँ कि न होईं । गहि एकु पति गति अबरु न कोई ॥ 
होए सो जड़ चहे गुनहीना । धन बिहीन बिनु श्रम अतिदीना ॥ 

ऐसेहु पति गुन सिंधु समाना । पावहि नतरु नारि दुःख नाना ॥ 
होइबी जो पति मन अनुकूला । सुनहु सिया सो सुखकर मूला ॥ 

रहे हृदयँ गोसाइँया गहियबआदरु मान । 
सोइ जगदातम श्रीपति सह सिउ सती समान ॥ 

सोमवार, २० फरवरी, २०१७                                                                              

करहि कुलीन तिय कारज जेतु । होत सो सब पति तोषन हेतु ॥ 
पुर्बल परम पेम ते पोषा । रहा तुम्ह पर मैं परितोषा ॥ 

पाइब बिरह प्रीति अरु गाढ़हि । एहि समय परितोषु अरु बाढ़हि ॥ 
जप तप तीरथ ब्रत कि त्यागा । दान दया यहु धर्म बिभागा ॥ 

करहिं जबहिं प्रसन्नचित मोही । सोई साधन सुफल तब होंही ॥ 
पद बंदन मम तोषन तेऊ । होइब पारितोषित सब देऊ ॥ 

मम कहि नाहिन तनिक सँदेहू । अबरु बचन इब मृषा न ऐहू ॥ 
देखिअ द्रबित रूपु नरहरी के । कहेउ लषन धीरजु धरी के ॥ 

सिया अनाई हेतु कहिहु जोइ जोइ रघुराइ । 
कहिहउँ सबिनय बना अति भल सोइ सोइ तहँ जाइ ॥ 



  
 






















Friday, 5 August 2016

----- ॥ टिप्पणी १० ॥ -----

>> यह विडम्बना ही है जिस देश का आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते व् अहिंसा परमो धर्म: है वहां अधिकांश आवासीय विद्यालयों के भोजनगृह में बच्चों को मांस का भक्षण करवा कर हिंसा करना सिखाया जाता है और कक्षा में अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है.....

>> मादकता का व्यापार करने वाले व् कसाई घरों में हिंसा का खुला खेल खेलने वाले शासको का शासन तंत्र यदि लोकतंत्र है तो धिक्कार है ऐसे लोकतंत्र को..... 

>> "हिंसक मानसिकता अपराधिक प्रवृति को प्रोत्साहित करती है"
हमारे नगर में पास के एक होटल में मनुष्य का मांस ४००/- प्रतिकिलो की दरसे बिकता मिला | प्रतिरोध करने पर खाने वाले ने तर्क दिया ये मेरा खाने-पीने का अधिकार है |
क्रूरता परकाष्ठा को पार कर एक भययुक्त वातावरण निर्मित करती है
क्रूरता सदैव अवैध ही होती है |
पशुहिंसा की स्थिति ऐसी ही रही तब मनुष्य मनुष्य का ही भक्षण करने लगेगा ....

>> प्रतिदिन छत पर थोड़े से दाने व कसोरे में पानी रखिए फिर देखिये,
आपके घर के आसपास, कौंवा,चिड़िया,कबूतर कोयल गाने लग जाएंगी

राजू : --हाँ और आप घर बैठे कवि बन जाएंगे वो भी बड़े वाले.....
            किसी गधे की छोटे छोटे पॅकेज वाली नौकरी से तो येई ठीक है,
            समझे होशियारों.....? अब आत्माह्त्या मत करना.....

>> पोथि लिख लिख सबु कह मुए भयो न पंडत कोए ।
      ढाई आखर कर्म का कियो सो पंडित.....?

राजू :--होए.....

>> राजू बताओ किस गधे ने ऐसी पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खम्बा कहा था : -
१) इस गधे ने २) उस गधे ने ३) इस उस गधे ने ४) इन सभी गधों ने

राजू :-- मास्टर जी! किसी खच्चर ने कहा था ?

अच्छा तू क्या है
राजू :- हरेक बात पे पूछते हो की तू क्या है

ख़्वाब हूँ बस नजरों में मिरा आशियाना है.., 
नींदे-गफलत के वाबस्ता ये गरीब ख़ाना है..... 
>> किसी धर्म विशेष के अनुयायायियों के आराध्य का जन्म स्थल तीर्थ स्थल होता है.....
एक सामान्य से मंदिर अथवा मस्जिद अथवा गिरजाघर में और एक तीर्थ स्थल में अंतर है.....

>> कितने बरस हो गए 'बाप जी' को खाट भोगते..... ?
     प्रतियोगी परीक्षाओं में अब ये प्रश्न पूछा जाने लगा है,
      उत्तर पूछने वालों को भी पता नहीं है.....


>> हिन्दू उपासना पद्धति मरुस्थल को भी वनस्थली में परिवर्तित करने में सक्षम है
राजू : -- हाँ परीक्षा के लिए किसी मरुस्थल में एक शिव लिंग भर स्थापित कर दो  फिर देखो भारतीय धार्मिक नारियां  सींच सींच कर  पीपल, वट, आंवला, नीम, बेल, कदम्ब, आम आदि वृक्षों से  कैसे उसे दोहरा  करती हैं.
>> भारत में अब भी मुसलामानों का ही राज है, काले नोट  पर लाल किले को देखकर ऐसा मेरे को ही लगता है की आप लोंग को भी लगता है.....?
>> ' अपनी सत्ता -अपनी मुद्रा ' अब देश इस मुद्रा व्यवस्था के लिए भी तैयार रहे....
>> १५ अगस्त, १९४७ यह तिथि इतिहास के काले पन्नों पर सत्ता के लालचियों द्वारा भारत के टुकड़े टुकड़े कर सत्ता प्राप्ति की तिथि के रूप में उल्लखित होगी.....

>> राजू ! पता है इन दिनों प्रधान मंत्री क्या कहते फिरते हैं..,?
      राजू : -- क्या मास्टर जी.., ?
      " काश ! मैं पुरुष होता..,
      राजू : -- किन्तु मास्टर जी ! चुनाव से पहले तो वे कहते थे की मैं महापुरुष हूँ.....

>> अपनी बिरादरी के सहयोग से पड़ोसी कश्मीर को मार्ग बना कर देश में अंतरस्थ हो गया है , और ई मंत्री जी सीमापार कर प्रोटोकॉल मांगने गए थे ?  घर में ही काहे नहीं दे दिए.....

 राजू : -- हाँ तो जब शत्रु अपने आस-पास हो , तो इधर-उधर जाने की क्या आवश्यकता.....
             


प्रकृति से इतर मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती पाश्चात्य देशों में वैज्ञानिकों द्वारा प्रकृति से खिलवाड़ चिंतनीय व् आनुवांशिक रूपान्तरण के नाम पर जीव-जगत पर क्रूरता सर्वथा निंदनीय है चुहे इनसे सर्वाधिक पीड़ित हैं संवेदन शील लोग इसका विरोध करें |  इनके शरीरमें गुणसूत्रों (जींस )को आरोपित कर इन्हें रोगों के वाहक बनाकर यूं ही छोड़ दिया जा रहा है जिससे भविष्य में भयावह स्थिति उत्पन्न हो सकती है औषधियों की खोज अवश्य होनी चाहिए किन्तु ऐसे नहीं | रोगों का उपचार से अच्छा है हम रोगों के कारणों को समाप्त करें.....





Thursday, 4 August 2016

----- ॥ दोहा-पद॥ -----

घनक घटा गहराए जिमि भोर लखइ नहि भोर । 
झूलए झल जल झालरी मुकुताहल कर जोर ॥ 

Sunday, 31 July 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५४ ।। -----

रविवार, ३१ जुलाई, २०१६                                                                                                 

तुम त्रिकाल दरसी रघुनाथा । बिस्व बदर जिमि तुहरे हाथा ॥ 
लोगहि चरन सरन जिअ जाना  । बोधिहौ मोहि सोइ बखाना ॥ 
हे रघुनाथ ! आप त्रिकाल दर्शी हो यह चराचर विश्व आपके करतल पर रखे बद्रिका के समान है । लोकाचार के आश्रय आपने ज्ञातित प्रसंग मुझसे पूछा । 

तथापि प्रभो सबहि दिन जैसे । कहिहउ जसि करिहउँ मैं तैसे ॥ 
 सिरोमनि तुम सबहि के राई । कहौं  बृतांत  सुनहु गोसाईं ।॥ 
भावार्थ : -- तथापि प्रभु में सदैव की भांति आपकी आज्ञा का अनुशरण करूंगा ॥  आप सभी राजाओं के शिरोमणि हो  अत: हे स्वामिन  ! जो आपने पूछा मैं वह वृत्तांत कहता हूँ सुनिये  : -- 

सिरु पतिया सोहत अति भारी । प्रभो तुरग सो कृपा तिहारी ॥ 
पथ पथ पुर पुर पौरहि पौरे । बिरमन बिनहि भूमि बन भौंरे ॥ 
 प्रभो ! आपका कृपापात्र होकर भालपत्र के कारण शोभा को प्राप्त वह अश्व रहित पंथ-पंथ, नगर-नगर, द्वार-द्वार भूमि-भूमि, वन-वन  में व्यवधान से रहित होकर विचरता रहा ॥   

दिनकर कुल अस तेज प्रचंडा । निज बल केहि न होइ घमंडा ॥ 
पुरबल हय को गहिब न पारा । जो बल गरब गहिब सो हारा ॥ 
दिनकर क्वे वंश का पराक्रम आवेस प्रचण्ड है कि किसी भी राजा को अपने बल पर दर्प नहीं किया । पूर्वतस किसी ने उस अश्व का हरण नहीं किया, जिसने किया वह परास्त हो गया ॥ 

प्रभो श्री चरनन सिरु नत सब नृप सहित समाज । 
जोग जुग पानि आनि लिए अरपिहि निज निज राज ॥ 
पुरजन परिजन पुत्र-पौत्र सहित वह नृप  प्रभु के श्री चरणों में अपना -अपना राज्य समर्पित कर विनय पूर्वक नतमस्तक हुवे ॥ 

गह सकै हय जोइ अवनीसा । अहहिं कहु त को असि बिजिगीसा ॥ 
जोइ दनुजपत दसमुख हंता । जानत  ए सोए जाकर कंता ॥ 

प्रभो मनोरम तुरगम तोरे । पहुँचिहि अहिच्छत्रा पुर पौरे ॥ 
रुर रुचिर अति रमनीअ देसू । बीर सुमद तहँ बसैं नरेसू ॥ 

सुनि सो प्रबसि अस्व एकु नीके । अहहि अवध पति रघुबर जी के ॥ 
कह सँवारन नगर निकेता । बहुरि सहित सुत सैन समेता ॥ 

गए रिपुहन पहिं प्रभु पद सेबा ।  सबहि सम्पत समरपत देबा ॥ 
 बड़ बड़ पत जा सहुँ नत होई । प्रनत तव पद सुमद प्रभु सोई ॥ 

तव दरसन उर लाह लिए आयउ पाए पयाद । 
अजहुँ  डिठी निपात ताहि देवौ कृपा प्रसाद ॥    

सोमवार, १ अगस्त, २०१६                                                                                                          
करिअ रवन गयउ जब आगे । निद्रालस बस रजस कन जागे ॥ 
धावत गयउ नगर ते दूरे । घेर गिरिबन गगन भरपूरे ॥ 

 बहुरि सुबाहु नगर पगु धारा । जोहि जोइ बल सबहि प्रकारा ॥ 
तेहि के सुत दवन सुभ नामा । गहए ताहि त भयउ संग्रामा ॥ 

जूझत मुरुछा गहि महि परयो । पुष्कल बिजै कलस कर धरयो ॥ 
तब महतिमह राउ सुबाहू । आयउ खेत भरे उर दाहू ॥ 

चले समुह गरजत हनुमंता । भिरिहि तासु सो नृपु बलवंता ॥ 
ताकर ग्यानु श्राप बिलोपा । रहे न सुधि किछु उर भर कोपा ॥ 

द्युति गति गत अति बलवत मारि चरन हनुमान । 
लगे श्राप दुराए गयो बहुरिहि गयउ ग्यान ॥  

मंगलवार, ०२ अगस्त, २०१६                                                                                            

पुनि सो महिपत प्रभु कर सेबा । सौंपि चरन निज सरबस देबा ॥ 
समर कला सब बिधि कुसलाया । प्रनमत बिनय बत जोइ राया ॥ 

जाकर गाँठिल तुंग सरीरा । अहहि सुबाहु सोइ रनधीरा ॥ 
दया डिठी करि प्रभो निहारी । किजो तापर स्नेहिल बारी ॥ 

तदनंतर मेधीअ तुरंगा । चोख चरत इब भयउ पतंगा ॥ 
आयउ देउ नगर संकासा । सुहा गहि अति बसिहि केलासा ॥ 

तहँ घटे सो बिदित सबु काथा । आए इहाँ आपहि रघुनाथा ॥ 
मिलिहि बहुरि बधि बिद्युन्माली । सत्यवान नृपु बहु बलसाली ॥ 

आगिल कल कुंडल नगर चपरित चरण धराए ॥ 
भयउ समर जोए रघुबर सो सब अहिहि जनाए ॥ 

बुधवार, ०३ अगस्त, २०१६                                                                                  

बहुरि कुंडल नगर ते छूटा । बिचरत चहुँ दिसि बिनहि अगूँटा ॥ 
अजहुँ गहिब न केहि बरबंडा । निज बल करिअ न कोउ घमंडा ॥ 

]भँमरत चपल चरन जबु फेरे । तेहि औसर सघन बन घेरे ॥ 
पहुंचसि प्रभु तव तुरग मनोरम । बाल्मीकि केर नीक आश्रम । 

गयउ माझ जूं बिटप समूहा । सुनहु तहँ जौ भयउ कौतूहा ॥ 
बीर बलो एकु बालकु आयउ । सोडस बरस बयस कुल पायउ ॥ 

जति पटतर पट कर धनु धारा । रूप बरन रघुबर अनुहारा ॥ 
भाल बँधेउ पतिया पेख्यो । लिआ गहि पढ़ बतिया देख्यो ॥ 

घनक घटा गहराए जिमि भोर लखइ नहि भोर । 
सैन पाल काल जित असि करियो रन घन घोर ॥ 

बृहस्पतिवार, ०४ अगस्त, २०१६                                                                               

गह सो बीर तरल तलवारा । करा प्रहार धरातल पारा ।\ 
बहुरि कला कृत एक ते ऐका । मारिब पुष्कल सहित अनेका ॥ 

रिपुदवनहु जबु ता सहुँ गयऊ । मर्माहत कृत मुरुछा दयऊ ॥ 
लह हरिदै दुःख दारुन दाहू । फरकेउ नयन अरु दुहु बाहू ॥ 

कोपहि असि जसि कोपि न काहू । दिए अघात करि मुरुछित ताहू ॥ 
होइ बीर सो हत चित जोंही । प्रगसि अबरु एकु बालक तोही ॥ 

दरसन माहि दोउ एक रूपा । धनु कर जटा धर जति न भूपा ॥ 
प्रथम एकहि एक होइँ सहाई । बहुरि जुगत दुहु करिब लड़ाई ॥ 

हय हस्ति बट 
अँट भट मरकट भरी चतुरंगनि सैन बिभो । 
फेरि बदन धुजा पट मुख धरी लटपट भय भर नैन बिभो ॥ 
धाई थरथरी कटि घट कर पिछु पछियावैं बैन बिभो । 
उपटन चरन अह !घूँघट करी निरखिहि ऐंचा तैन बिभो ॥ 

किरीट कवच कल कुंडल मौलि मुकुट मनिहारी । 
सब सिंगार निहार सो हरि हर लियो उतारि । 

कर कोदंड कलित करे बले बलइ बल हार । 
अह सर्या कर धार सो, लेइ गयो चिन्हारि ॥ प्रभो 

शुक्रवार, ०५ अगस्त, २०१६                                                                                           

बाँध्यो गहिब दुहु कपि कंता । एकु सुग्रीव एकु हनुमंता ॥ 
कसियो बलइ रसरि कर जोरी । परन कुटिर लय गयो बहोरी ॥ 

तदनंतर कृपाकर आपही । मेधीअ तुरग देइ बहुरही ॥ 
मरनासन पुनि सैन जियावा । अह साँसत जिअ महु जिअ आवा ॥ 

लेइ गहिब सो हय सिरु नाईं । आए सरन त्रिभुवन गोसाईं ॥ 
ऐतकहि प्रभो मोहि जनाया । जिन्हनि प्रगसित सहुँ कहि पाया ॥ 

कहत अहिपत सुनहु बिद्बाना । घटना बलि जस सुमति बखाना ॥ 
बाल्मीकि कर आश्रमु नीके । बसएँ सुत जहँ जानकी जी के ॥ 

कवन सो बीर प्रभु अनुमानिहि । जानपनी सब जान न जानिहि ॥ 
राघव मंदिर महमखु होई । दीन्ही चरन मुनि सब कोई ॥ 

तहँ सहुँ आनि पधारिहि बाल्मीकि मुनि राए । 

सब बिधान अनुमान के, तासों पूछ बुझाए ॥  

रविवार, ०७ अगस्त, २०१६                                                                                   

मुनि तुहरे कुटि मम सम रूपा । कवन जमलज जौ जति न भूपा ॥ 
धनुर बिधा महुँ परम प्रबेका । समर कला कृति एक ते ऐका ॥ 

सचिउ सुमति मुख बरनै जैसे । होइ कहहु को चकित न कैसे ॥ 
किए मुरुछित रिपुहन समुहाई । हति खेत खेलाइ खेलाई ॥ 

बाँधि लियो हँसि हँसि हनुमंता । छाँड़ दियो कसि तुरग तुरंता ॥ 
कौतुक उपजिहि मन किन काहू । बालकन्हि सब चरित सुनाहू ॥ 

बाल्मीकि मुनि कहए स्वामी । नराधिपत तुम अन्तर्यामी ॥ 
तुम निधान ग्यान गुन सीला । जानिहु प्रभो सबहि नरलीला ॥ 

पूछेउ मोहि कहौं सो तुहरे मन परितोष । 
गहौ चरन कर दिजो छम जान कतहुँ मम दोष ॥ 

सोमवार, ०८ अगस्त ,२०१६                                                                                        

जौ बेला तुम जनक किसोरी । प्रान समा सिय हियप्रिय तोरी ॥ 
दोषु बिनहि परिहर बन देहू । आनि न कबहु न केहि सपनेहू ॥ 

मन क्रम बच प्रभु पद अनुरागी । देहु गरभिनि सम्पद त्यागी ॥ 
बेहड़पन अत बनहि ब्यापा । बिहरत बिहरन करिहि बिलापा ॥ 

ब्याल कराल बिहग बन घोरा । जग लग रयन बिलग न भोरा ॥ 
कातर कंठ करुना अस भारी । उपटन चरन चरिहि सुकुआँरी ॥ 

पग बिनु डग मग रिपु बहु जाती । दहइ दारुन कुररि की भाँती ॥ 
दुःख आतुर अह बिलखति रोती । मुकुता गह मुख मुकुत पिरोती ॥ 

दुखिया जनि गोसाईंया, निरखत बन मेँ ताहि । 
पुनि सादर निज परन कुटि लेइ गयो सँग माहि ॥ 


मुनि बालक करनक चुगि ल्याए । करीर नठि सुठि कुटीरु बनाए ॥ 
तहँ दुहु जम कुल दीप जनावा । दीपित द्योति दहुँ दिसि छावा ॥ 

एक कर नाउ कुस में राखेउँ । दूज लाल लव कहि भाखेउँ ॥ 
उजरै बिधु जिमि उजरै पाँखा । जुगल तनुज तिमि बढ़तै लाखा ॥ 

चारिउं बेद सहित छहुँ अंगा । भयउ कुमार पढ़िय सब संगा ॥ 
दै बिद्या सब दिया जनेऊ । होए कुसल मुनि बालक तेऊ ॥ 

आजुरबेद कि आयुध बेदा । सकल सास्त्र सहित सब भेदा ॥ 
करियउँ जगत निपुन रघुनाथा । बहोरि धरा माथ पर हाथा ॥ 

षडज ते निषाद लग जब , सुर सरगम  कर जोग । 
 मधुर मधुर गावहिं तब चितबहि चितबत  लोग ॥ 

बुधवार, १० अगस्त, २०१६                                                                                    

सत सुर माल कण्ठ कर बीना । करिहि सांगत त भयउ प्रबीना ॥ 
पूर पनब जब बजएँ मृदंगा । रंजनए छहुँ राग सहुँ रंगा ॥ 

जुगल केरि अस कौसल देखा । होहि मोहि पभु हरख बिसेखा ॥ 
परम् मनोहर श्री रामायन । तासु नितप्रति करैं सो गायन ॥ 

जानत ए के होवनिहारा । पूरबल जिन्ह रचि मैं पारा ॥ 
मधुप निकर जस मधुबन झौरहिं । करत गान तिमि बन बन भौरहि ॥ 

 कुसुम कली कुसुमित अति सौंहे ।  खंजन सहित मृगहु मन मौहें ॥ 
 गावत लय गति अति मधुराई । श्रोतस श्रुत श्रुत श्रुति सुख पाई ॥ 

श्रुति सो गायन  श्रुति सुख पावन बारि पति पुनि  एक दिवा । 
गहेउ हाथ निज साथ पुनि बिभावरि पुरी गयउ लिवा ॥ 
जुगल मुकुल मंजुल मनोहर सुर सागर करि पार गए । 
पावन पबित तव मृदुल चरित गावनि देउ आयसु दए ॥ 

जनमत भगवन लगन परि बादिहि बादल बृन्दु । 
दसानन बन सिय लिए हरि झरि झर झर जल बिंदु ॥ 

बृहस्पतिवार, ११ अगस्त, २०१६                                                                               
बादिहि बादल बृन्दु अगासा । झरिहि झर झर बिंदु चहुँ पासा ॥ 
भर भर कलसि करषि कर देईं । पियत पयस बूझै न पिपासा ॥ 

बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस बरुन निवासा ॥ 
कंठ ताल नूपुर दल पूरे  । गावहि झनक झनक चौमासा ।  

दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन प्रभाकर करिहि बिलासा ॥ 
कोमल करज जलज जय माला । पहिरावत मुख लवन ललासा ॥ 

गिरि गहबरु अरु फिरैं पयादे । कुपित जनि जब दियो बनबासा ॥ 
हरिअ हरानत हरि अरि हरियो । ल्याए हरि हरि करिअ बिनासा ॥ 

अबरु अबरु अरु गीति ग्याता । हितु हिती गन सहित हे ताता ॥ 
श्रुत बरुनप निज परिजन साथा । राजस रहस सरस सो गाथा ॥ 

अस तो सरस् पयस बहु होईं । तोर चरित ते अधिक न कोई ॥ 
सकल श्रोतस श्रवनतहि जाइहिं । चरित पयस नहि पियत अघाईं ॥  

 बरुन लोक मैं गयउँ बहोरी । करे अगवान दुहु कर जोरी ॥ 
द्रवीभूत मम बंदन करियो । पेम भाव हिय पूर न परयो ॥ 

रागिन रंग बयस गुन सोंही । बरुन जुगल पर प्रमुदित होंही ॥ 
सुनि रघुकुल मनि तजहि सगर्भा । कहिहि एहि बिधि सिया संदर्भा ॥ 


 सिय सम जग को सती न होई । अहहि अस पति बरता न कोई ॥ 
होहि सो गुन संपन्न कैसे । जोहि महि ससि सम्पदा जैसे ॥ 

सील बिरधा रूपवती रघुबर देइ बियोग । 
पतिब्रता सिय परम सती नहि त्याजन जोग ॥ 

बृहस्पतिवार, १८ अगस्त, २०१६                                                                                   

समर बीर पुनि जुगल जनावा । कहहु त असि सुभाग कहँ पावा ॥ 
मन क्रम बच ते सदा पुनीता । परिहर देँ अस जोग न सीता ॥ 

ताहि के हम सबहि सुर साखी । राम बिनु सिय बिहग बिनु पाखी ॥ 
जासु चरन नित चिंतत जेहीं । मिले तुरतै साध फल तेही ॥ 

जगत सृजन थिति लय किन होही । होत सब श्री संकलप सोंही ॥ 
जिन सोंहि भगवद ब्यौहारा । सो त मरित अमरित की धारा ॥ 

प्रभु तुम  सूर सिया संतापा । प्रभु तुम धनद सिया जल भापा ॥ 
प्रभु तुम गहबर घन सिय बारी । तव प्रिय सियहि पदारथ चारी ॥ 

ब्रम्हा शिव पद सिय सों पावा । तासु सबहि दिक् पाल जनावा ॥ 

जगदधात हे सर्ब ग्याता । जगद पिता तुम अरु सिय माता ॥


जानतहउ प्रभो आपहु, सिय नित सुधिता आहि । 
सो तो प्रिय प्रान सम तव अरु को प्रिय कर नाहि ॥ 

शनिवार, २० अगस्त, २०१६                                                                                 

नित पावन पबित सित जानत ए । प्रभु दिजौ मान जसि पुएबल दए ॥ 
साप संगत तव पराभावा । अस तौ जग को करिअ  न पावा ॥ 

सुनु मुनि प्रभु पहि गत पद गहिहउ । जे सबहि मम कही बत कहिहउ  ॥ 
बरुन नाथ कह बहुंत प्रकारा । एहि बिधि प्रगसिहि मनस विचारा ॥ 

सिया सकार जोग गोसाईं । सब निज निज मत सम्मत दाईं ॥ 
यह तुहरे जुग राज दुलारे । करिहि चरित जब गान तिहारे ॥ 

अह नर रूप धरे नारायन । बरुन पति घर गाएं रामायन ॥
सुरासुर गंधरब किन होई । भयउ कौतुक बिबस सब कोई ॥ 

सुनत सुमधुर राम कथा मन बहु रोचन होंहि । 
सब कीन्हि बढ़ाई तहँ मुदित भ्रात कर दोइ ॥ 

रविवार, २१ अगस्त, २०१६                                                                                      
लोकाधिप असीस जो देईं । तुहरे सुत सो सहरष लेईं ॥ 
रिषि महरिषि गन ते अधिकाई । दोउ मान जस कीरति पाईं ॥ 

पुण्य श्लोक पुरुष बर साथा । होवत तीनि लोक कर नाथा ॥ 
एहि औसर गहिहौ घट काँचा । गहस धर्मि निभ करिहहु नाचा ॥ 

बिधा सील गुन भूषन धारे । गहन जोग दुहु तनुज तिहारे ॥ 
सिय सुधित अब सबहि पतियारे । कुँअरु सहित प्रभु ताहि सकारें ॥ 

प्रान दान दए सैन जियाई । अहहि बहुतहि सुचित सो माई ॥ 
दीन बन्धु हे दया निधाना । प्रतीति हुँत एहि  साखि प्रवाना ॥ 

पतित अपबित पुरुष हुँत पावन हर ए प्रसंग । 
सुबरन बहुरि सुबरन हैं होइहि केत कुरंग ॥ 

Monday, 11 July 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५३ ।। -----

पहुँच आसु करि कुस कै आगे । अनेकानेक सर छाँड़न लागे ॥ 
बधि बधि भाल बदन कर बाहू । भेद मर्म दिए दारुन दाहू ॥ 

करिअ बिकलतर अस रे भाई । घायल व्यथा कहि नहि जाई ॥ 
तब कुस रिजु कस सर दस मारे । सुरथन्हि रथ सोंहि महि डारे ॥ 

पनच चढ़ेउ कठिन कोदंडा । चरत बेगवत किए खनखण्डा ॥ 
दिव्यास्त्र छाँड़ै केहि एका । दूज प्रतिहरन हनहि अनेका ॥ 

छेपायुध जो कोउ प्रहारिहि । तुरगति प्रतिहति तुरति बिदारहि ॥ 
एहि भाँति भयउ दोनहु ओरा । लोमनु हरख समर घन घोरा ॥ 

सोचि सिया कुँअरु अबु करि चाहिब कृत का मोहि । 
लेन जिआरी उद्यत अह सहुँ मम परम बिद्रोहि ॥ 

बुधवार १३ जुलाई, २०१६                                                                                         

करतब ठान लच्छ अनुमाना ।  गहेउ हस्त कटुक एकु बाना ॥ 
छूट सो काल अगन समाना । प्रजरत चला कला कृत नाना ॥ 

देख्यौ सुरथ आगत ताहीं । सोचि बिदारन जूँ मन माही ॥ 
त्योहिं कठिन कुलिस के भाँती । धँसा बेगि परिछेदत छाँती ॥ 

परा रथोपर रन हिय हारे । तरपत हे रघुनाथ पुकारा ॥ 
सारथि निज पति हतचित पावा । रन भू  सोंहि बहिर लय आवा ॥ 

हार रन हिय सुरथ गिरि गयऊ । सिया कुँअर कर बिजई भयऊ ॥ 
देखियत इयहि पवन कुमारा । सहसा एकु बड़ साल उपारा ॥ 

धावत बेगि जाइ निकट, दए बल अतुल अपार । 
झटति डारेन्हि तापर, करियहि घोर प्रहार ॥ 

द्रुम घात तैं चोट गहावा । संहारास्त्र लेइ उठावा ॥ 
अजित अमोघ सकती अस होई । लागत सीध बचै नहि कोई ॥ 

बिलोकत ताहि प्रबल हनुमाना । बिघन हरन के करिहि ध्याना । 
देत घात घन ऐतक माही । हनुमन उरसिज आनि समाहीं ॥ 

होइहि अह ब्यथक सो भारी । पीर भरत करि बहुंत दुखारी ॥ 
हतत आतुर मूरुछा दयऊ ॥ सुनु मुनिबर आगिल का भयऊ ॥ 

हनुमत होइ गयउ हतचेता । सीता नंदन तब रनखेता ॥ 
कसि कसि रिजु असि बान चलायो ।एक एक तेउ सहस बनि धायो ॥ 

लपक लपक लागेउ तिमि जिमि गहि कालहि खाहि ।  
चतुरँगनि पराई चली, कहति त्राहि मम त्राहि ॥ 

बृहस्पतिवार १४ जुलाई  २०१६                                                                                             

जान ए मरनि निकट जिमि  आई । अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥ 
कपि राजु सुग्रीउ तेहि काला । आनि सँभारेउ सैन बिसाला ॥ 

ऊंच ऊंच अति बिटप उठावा । नभ रव पूरत कुस पहिं धावा ॥ 
देइ बिदारिहि बिनहि प्रयासू । टूक टूक होइब सब आसू ॥ 

तबु कपिप्रभु एकु सेल उपारा । ताकि तमकत माथ दए मारा ॥ 
बिहुरत बनावरि  दरसत  ताहीं  । कन कन करि डारिहि छन माही ॥ 

करत धूर पुनि उड़इँ अगासा । भइ धूसर  रन भुइ चहुँ पासा ॥ 
लगन जोग मह रूद्र समाना । भए सो भूधर टिल प्रमाना ॥ 

मारि भालु कपि घायल कीन्हि । जो उचित जस तस फल दीन्हि ॥ 
बालक के बल बिक्रम अतीवा । देखिहि अचरजु भरे सुग्रीवा ॥ 

चित्रलिखित समेत कपिप्रभु चितवहि भर प्रतिसोध । 
मारि प्रताड़न एकु बिटप गहि अतिसय कृत क्रोध ॥ 

ऐतक महुँ लव के बड़ भाई । बरनायुध चुनि चापु चढ़ाईं ॥ 
पुनि चित्रकृत निज बल दिखरायो । बरुण पास कपि सुदृढ़ बँधायो ॥ 

लपटाहि जिमि कोउ उरगारी । बँधत गिरे रन भूमि मझारी ॥ 

निरखिहि जुधिक परे निज नाथा । धाएउ इत उत भय के साथा ॥ 

पुष्कल अंगद कि प्रतापाग्रय । बीरमनि हो चहे अन्यानय ॥ 
बीरसिरोमनि भ्राता दोई । बहोरि बिजै कलस कर जोई ॥ 

करत हताहत सकल  भुआला । दोउ भ्रात गहेउ जयमाला ॥ 
दोनउ भात परस्पर हेलिहि । हरषित  मनस मुदित मन मेलिहि ॥ 

गहे गुरु चरण बसिहि सघन बन भेसु धरेउ  जिमि कोउ जति । 
मख तुरग निबंधु दोनहु बंधु मह मह बीर ते बीर अति ॥ 
बाल मराल कोउ भुआल न सहुँ चतुरंगी बाहिनी । 
चले गगन सर भाल कराल तथापि जीति बिनहि अनी । 

हरखिहि सुर न त बरखिहि सुमन न कोउ अस्तुति गाए  । 
न कतहुँ दुंदुभि बजावहिं बिजित सुभट समुदाए ॥  

शुक्रवार १५ जुलाई, २०१६                                                                                     


मुदित मनस बहु हरखित गाता । बोलेउ लव सुनहु मम ताता ॥ 
होइहि तुहरी कृपा अपारा । समर सिंधु पायउँ मैं पारा ॥ 

अजहुँ भई रन बिजै हमारी । हेरै कोउ सुरति चिन्हारी ॥ 
कहत अस लव सहित निज भाई । प्रथमहि रिपुहन पहिं नियराईं ॥ 

गयउ तहाँ दुहु गहगह गहि कर । हिरनमई मनि मुकुट मनोहर ॥ 
आयउ जहँ पुष्कल महि पारे । कबेलाकृत किरीट उतारे ॥ 

बहुरी बाहु सिखर लगि पूरा । गहि तासु कल कनक केयूरा ॥
कवच कराल भाल सर चंडा । सकेरिहि कछु कठिन कोदंडा ॥ 

बांध्यो जाइ पहिं बानर राजु अरु महबली हनुमन्तहि । 
कहत लव निज भ्रात सों तात लै जइहौं कुटीरु दुनहु गहि ॥ 
तहँ मुनि बालक केलिहि ता सँग मोरु मन रोचन होइहीं ।  
राख्यो निकट तुरग थल लाई दुहु बंधु करत अस बत कही ॥ 

जोहति सुतहि पंथ जगज जननि मातु श्री सोभामई । 
थिर थिर थकी ढरयो रबि दिनु बिरत्यो अरु साँझ भई ॥
अँधेरिया जग घेरिया जग जगमग जोत जुहार करे  । 
बरति बिलग जोहहि द्वार लग दीपन मनि सार भरे ॥ 

सुभ बसन भूषन बँधि कपिगन तुरग सहित सादर चले । 
जाइ सिया पहिं अरपिहि चरन नत भेँट भूषन जे भले ॥ 
आगत देखि दुहु बाल मराल मुदित बहु लोचन भरी । 
लाइ हरिदै सनेह सहित दुइ पलकन जल बिन्दु धरी ॥ 

चकित सकुचित अंचित बदन करि ढारि दृग पट हरयरी । 
परचत कपिगन भेंट भूषन सहसा सिहरति अति डरी ॥ 
उठि त्याजत निबंधु छोरि कहि सुत जाहु दुहु कै पग परौ  । 
कपिराजु बली महबीर जे अबिलम अतुरै परिहरौ ॥ 

जे महमन हनुमन भयउ रघुबर केर सहाइ । 
भस्म भई लंका पुरी दनुपत गयउ नसाइ ॥ 

रविवार, १७ जुलाई, २०१६                                                                                        

जे बलबन कपि भल्लुक नाहा ।  कहु दोनहु अस बाँधिहु काहा। 
मारि कुटत पुनि करिहु अनादर । रे बच्छर धिक् धिक् तुहरे पर ॥ 

बोलेउ सुत सुनहु हे माता । राम नामु नृपु एकु बिख्याता ॥ 
बीर सिरो मनि बहु बलवंता । दसरथ तनय अवध के कंता ॥ 

तेज तुंग एकु तुरग त्याजे। सुबरन पतिआ भाल बिराजे ॥ 
नाउ परच बल बिक्रम बिसेखे । परन परन बिबरन यहु लेखे ॥  

बलबन आपनु समुझिहि जोई । हरिहु ताहि बढ़ सद् छत्रि सोई ॥ 
न त मम सम्मुख अवनत माथा । समरपिहु राज पाट जुग हाथा ॥ 

दरस ढिठाई महिपु की साँच कहएँ हे मात । 
अहा हठात जाई पहिं बाँध लिये बरियात ॥ 

सोमवार, १८ जुलाई, २०१६                                                                                           

 पुनि सो समर बीर बल पूरा । गरज गहन रन भेरि अपूरा ॥ 
बरूथ बरूथ भट हमहि पचारे । किए घन घोर समर गए मारे ॥ 

मौलि मुकुट एहि रिपुदवनू के । ए कल कीरिट भरत नंदनू के ॥ 
बोलिहि  मातु पुनि मुख नेहि के । गहिहु तुरग कहहु सो केहि के ॥ 

प्रथमहि हम जो तोहि जनाईं । सोए रघुबर तासु गोसाईँ ॥ 
 रे बछर तुम करिहउ न न्याए । हरिहु तुरग रघुबीर परिहाए ॥ 

अनेकानेक बीरन्हि हनिहउ । पुनि बाँध कपिगन सुठि न करिहउ ॥ 
होए ए करतब कछु भल नाही । सुनु एहि बत नहि तुमहि जनाही ॥ 

जनमदात सो पितु तुम्हारे ।  महा मेध हुँत हय परिहारे ॥ 
सुनु छाँड़त सादर कपि दोऊ । बँधे बाजि परिहरहउ सोऊ ॥ 

सुनत मातु कर बत कही बाल बीर बलवंत । 
साधे मौन मूरत भए सो एकु पल परजंत ॥ 

मंगलवार, १९ जुलाई, २०१६                                                                                   

 पुनि बालक बोलिहि रे माता । अहहीं बेद बिदित एहि बाता ॥ 
सो छत्रि धरम हमहु अनुहारे । महमन महिप समर गए हारे ॥ 

छत्री धर्म अनुहर रन आगी । लागत जनि होत न हतभागी ॥ 

बालमीक मुनिबर पाहिं पढ़े । ए सिच्छा देइ सो हमहि गढ़े ॥ 

छात्र धर्म कह कहिब ग्याता । पिता ते पुत भ्रात ते भ्राता ॥ 

सिस समुह चहे गुरु किन होईं । जूझत रन भू पाप न होई ॥ 

तद्यपि जसु तुहरे अनुसासन । बंधे बाजि बर करिअ बिमोचन ॥ 

ता संगत बहरिहिं कपि दोऊ । होइहि सोए कहब तुम जोऊ ॥ 

अपूरत निज मंजुल मुख मध्यम मधुरित बानि । 
सिरु नत बहु बिन्यानबत दोउ जोग जुग पानि ॥ 

बृहस्पतिवार, २१ जुलाई, २०१६                                                                                     

जग बंदित मातु अस कहयऊ । गए दुहु तहाँ जहाँ रन भयऊ ॥ 
लए कपीस गन आगिल बाढ़े । तुरंगम सहित दिए दुहु छाँड़े ॥ 

दुहु सुत करम कटकु बिनसाई । सुनिहि सुतहि मुख जबु जग माई ॥ 

प्रणति चरनन सुरति भगवाना । मन ही मन पुनि करति ध्याना ॥ 

सदागतिबत सबहि के  साखी । भगवन केतु कंत पुर लाखी ॥ 

कहि करुणित हे दिनकर देऊ । जौं मैँ मन क्रम बचनन तेऊ ॥ 

बंदउँ चरन श्री रघुबरहि के । भजेउँ भजन न आन केहि के ॥ 

तौ मरनासन नृपु रिपुहन्ता । अजहुँ छन महुँ होएँ जीयन्ता ॥ 

 बिरुझत बिदरत बहु बरियाईं । मोर तनय ते गयउ नसाई ॥ 

रकताकत अनी सोउ भारी । मोर सत सोहिं होए जियारी ॥ 

पतिब्रता सति जानकी जस अस बचन  उचारि ।  
तैसेउ मरति जिअत उठि बिनसि सैन सो भारि ॥ 

शुक्रवार, २२ जुलाई, २०१६                                                                                      

कहत सेष सुनु मुनि बिद्वाना । छन महुँ मुरुछा गयउ बिहाना ॥ 
जगएं जगज जिमि सयन त्यागे । मरनासन रिपुहन जिअ जागे ॥ 

लहि सुभु लच्छन गहि गुन गाढ़े  । देखि तुरग निज सम्मुख ठाढ़े ॥ 
मनि मुकुताबलि मुकुट न माथा । धनु बिनु कर भुज सिखर न भाथा ॥ 

निरजिउ परेउ अनि जिअ गयऊ । संकित मन बहु अचरज भयऊ ॥ 
चितबत चित्रकृत नयन अलोले । जागत सुबुध सुमति सहुँ बोले ॥ 

जौ नहि जति नहि कोउ भुआला । कृपा करत सो बाल मराला ॥ 
बाँधेउ बाजि बल दिखरायो । मख अपूरनन दए बहुरायो ॥ 

गहरु करब कछु लाह न आही । चलहु बेगि अबु रघुबर पाहीं ॥ 

अह लोचन पथ लाइ के जोह रहे रघुराय । 
असि कहत चढ़ि राजहि रथ समर भूमि सिरु नाइ ॥ 

शनिवार, २३ जुलाई, २०१६                                                                                       

राजत रथ रथि लेइ तुरंगा । चलइँ चरन पथ पवन प्रसंगा ॥ 
चतुरंग अनि आयसु सिरु धारे । चलिहि पाछु सबु साजु सँभारे ॥ 

बाजिहि भेरि न संख अपूरे । गयउ बेगि आश्रमु ते दूरे ॥ 
अगमु पंथ गहन बन गिरि ताला । तीर तीर तरि तरुबर माला ॥ 

देइ दरस जबु भयउ बिहंगा । तरंग माल सुसोहित गंगा ॥ 
पार गमन आयउ निज देसा । मरुत गति सों कीन्हि प्रबेसा ॥ 

 पौर पौर पुर  नगर निकाई । पुरजन परिजन  बसित सुहाईं ॥ 
कंध कठिन कोदण्ड सम्भारे । सैन सहित रिपुहन मन मारे ॥ 

बीर भरत कुँअर कर सथ लेइँ सुरथ सँग माहि । 
रथारोहित जाहिं चले रघुकुल कैरव पाहि ॥ 

सोमवार, २५ जुलाई २०१६                                                                                          

बहुरि बिहुरत चरत सब डगरी । आएँ समीप अजोधा नगरी ॥ 
अमरावति जसि अति मन मोही । रबि बंसज बन संग सुसोही ॥ 

परस नभस धुर धुजा उतोले । हरुबर हरुबर पवन हिलोले ॥ 
सोंहि रुचिर पर कोट अतीवाँ । जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ॥ 

आए  रिपुहन सुनिहि श्री रामा । सवेन सहित हय पहुंचय धामा ॥ 
कह जय जय अतिसय हरषायो । बलबन लछमन पाहि पठायो ॥ 

सैन सहित तहँ आयउ लषमन । भेंटि परबसिया भात मुदित मन ॥ 
रकतारकत चाम चहुँ पासा । पलउ पलउ जिमि पलय पलासा ॥ 

कुसल छेम बुझाई कहि भाँति भाँति बहु बात । 
बलिहि बाहु फेरब भई अतिसय पुलकित गात ॥ 

बुधवार २७ जुलाई, २०१६                                                                                       

लै रिपुहन सथ रथ महुँ बैठे । महमन लषन अवध पुर पैठे ॥ 
जहँ त्रिभुवन कर पावन पबिता । प्रभु पद परसति सरजू सरिता ॥ 

पद पद पदमन पुन्य पयूषा । सरनिहि सरनिहि सस मंजूषा ॥ 
लगए मग लग सुभग सोपाना । सोहति सारद ससी समाना ॥ 

भरत नंदनहि रिपुहन साथा । आगत दरस हरषि रघुनाथा ॥ 
सहित सुभट अति निकट बिलोके । उर अनंदु घन गयउ न रोके ॥ 

बिहबल मन मिलनब जूँ ठाड़े । तुरतई रिपुहनहि कर बाढ़े ॥ 
सघन घाउ नहि खात अघाई । पगु परि बिनय सील सो भाई ॥ 

जनु महि लुठत स्नेह समेटे । उठइ भुजा कसि बरबसि भेँटें ॥ 
गहरईं घन गिरहि जल बूंदी । पेम निमगन पलकन्हि मूँदी ॥ 

परइँ चरन भरतु नंदन सादर करइँ प्रनाम । 
उठइँ लै उर कसइँ बाहु द्रबित दरस पुनि राम ॥ 

शुक्रवार, २९ जुलाई, २०१६                                                                                         

मिलि हनुमत पुनि लमनत बाहू । सुग्रीव सहित मेलिं सब काहू । 
पग परे नृपन्हि हरिदै लाए । भेंटें उमगि सनेहि बहुताए ॥ 

समदत सन्नत सैन समाजू । छुधावंत जिमि पाए सुनाजू ॥ 
गहि पद लगे सुमति प्रभु अंका । जनु भेंटी सम्पद अति रंका ॥ 

प्रफुरित नयन ठाढत समुहाए । आयउ निकट उलसित रघुराए ॥ 
देखि सुमति गदगद गोसाईं । मधुर बचन ते पूछ बुझाईं ॥

जगकर यहु सब राजाधिराजे । पाहुन बनि इहँ आनि बिराजे ॥  
सब समेत धारिअ मम पाऊँ । बाँध क्रम कहु कवन सो राऊ ॥ 

कहौ तुरंगम कहँ कहँ गयऊ । बाँधियब केहि केहि गहयऊ ॥ 
कुसल बंधु मम कवन उपाऊ । केहि बिधि कहु ल्याए छँड़ाऊ ॥ 

कहत सुमति तुम सरबग्य कहु कह कहा जनाउँ । 
पूछिहउ मोहि जोए प्रभु सो बरनत सकुचाउँ ॥