Thursday, 25 February 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ४८ ।। -----


बोले सुमति बचन ए हितप्रद । सस्त्रास्त्र विद जुद्ध बिसारद ॥ 
महाराज यहँ सब बिधि केरे । पुष्कलादि रन बीर घनेरे ॥ 

होत उपनत अधिकाधिकाई । लएँ लोहा रिपु संगत जाईं ॥ 
बायुनन्दन बीर हनुमाना । अहहि सूरता सन धनवाना ॥ 

 देहि बिसाल बजर सब अंगा । एतएव जाएँ भिरे नृप संगा ॥ 
रिपुदल गंजन  घन समुदाई । प्रबल  पवन इब करिहि पराईं ॥ 

कहत सेष महमति महमाता । एहि भाँति जनावत रहि बाता ॥ 
तबहि समर भू भूप कुमारे । धुनुरु टँकार चरन पैसारे ॥ 

पुष्कलादि बीर बलवन भूमि बिलिकत ताहि । 
निज निज रथोपर रोहित धरे धुनुरु बढ़ि आहि ॥ 

बृहस्पतिवार, २५ फरवरी, २०१६                                                                         

भिरिहि परस्पर समबल जोधा । कौतुक करत लरइ करि क्रोधा ॥ 
अस्त्र कोबिद भरत कै बेटा । करिअ गरज चम्पक तै भेंटा ॥ 

रच्छित महाबीर जी ताईं । द्वैरथ रन नीति अपनाई ॥ 
इत लख्मीनिधि जनक कुमारा । रन उछाह उर भरे अपारा ॥ 

बालसील कुस धुजा ले संगा । गरजत भिरे मोहक प्रसंगा ॥ 
बिमल रिपुंजय देइ हँकारी । दुर्बारन्हि सुबाहु पचारी ॥ 

बलमोद ते बालि सुत भिरेउ । प्रतापागरय प्रतापी तेउ ॥ 
नीलरतन लरि हरयछ संगा । सहदेउ सत्यवान प्रसंगा ।। 

महबलबंत बीर मनि राई । भूरिदेउ ऊपर चढ़ि आई ॥ 
असुताप लड़ भिरन बढ़ि आवा । उग्रासय ता संग जुझावा ॥ 

ते सबहि सूर नीति मत कर्म कुसल सब कोइ । 
आयुधि कर बिद्या संग बुद्धि बिसारद होइँ ॥ 

कूदि माझ मुनि भूमि बहोरा । करिहि द्वंद जुद्ध घन घोरा । 
मारु मारु धरु धुनि नभ छाईं । एहि बिधि बेगि सुभट सब धाईं ॥ 

हाहाकार मचइ घमसाना । निपतिहि आयुध कुलिस समाना ॥ 
बहुतक कटकु गयउ संहारी ।  परेउ जब प्रतिपख अति भारी ॥ 

पुष्कल आनत कटक सँभारे । चम्पक पुर बहु करक निहारे ॥  
जोधन पुरबल पूछ बुझाईं । कहु निज नाम जनक कर भाई ॥ 

धन्य तुम्ह तव करौं बढ़ाई । ठानिहु जो मम संग लराई ॥ 
बीरबर कुल नाउ के ताईं । यहां लराइ लरी नहि जाई ॥ 

तथापि मोर नाउ सुनि लीजो । कुल अरु बल के परचन कीजो ॥ 

बोले चम्पक ऐसेउ बिनए बचन के साथ । 

मोरे बंधु बाँधो अरु जनक जनी रघुनाथ ॥ 

अहहीं रामदास मम नामा । राम बसे जहँ तहँ मम धामा ॥ 

रघुनाथहि मोरे कुल देवा ।   प्रनमत ताहि करौं नित सेवा ॥ 

रघुकुल कीरति कीरति  मोरी  । मम बिरदाबली कछु न थोरी 

पहुमि पहुमि रन सिंधु अपारा । भगत कृपालु लगाइहि पारा ॥ 

जे हरि परिजन हिलगन कहेउँ । लौकिक दीठि परचन अब देउँ ॥ 

राजाधिराज सुरथ मम ताता । पूजनिआ बीरबती माता ॥ 

अहहीं तरु एक नाउ धर मोरा ।  ता संगत सोहित चहुँ ओरा ॥ 

बसंत रितु तरु फुरित बिकासी । तासु पुहुप जस रस कै रासी ॥ 

तथापि मधु मोहित मधुप त्याजत  तासु निकट न आवहीं । 
ताहि जोइ कहत पुकारि सोइ मनहारि नाउ मम अहहीं ॥ 
 भाल भिड़ंत कि सर संग्राम मोहि जीत सकै सो कोउ नहि । 
अजहुँ मैं दिखाउँ तोहि जे अद्भुद बिक्रम मम बाहु गहि ॥ 

बरनन केरे ब्यंजन बातन के पकवान  । 
 रसियात अघात पुष्कल कर कोदंड बितान ॥ 

शनिवार, २७ फरवरी, २०१६                                                                                   

आगत तुरई भूमि मझारी । लगे करन कोटिक सर बारी ।
गहे चाप पुनि पनच चढ़ावा । चम्पकहु बहु कोप करि धावा ॥ 

बहुरि बिदारत रिपु समुदाई । तीछ बान लख धरत चलाईं ॥ 
गाजिहि बहु बिधि धुनि करि नाना । जाहि श्रवन कादर भय माना ॥ 

इत पुष्कलहु बान बौछारें । पलक माहि सब काटि निबारे ॥ 
देखि चम्पक त भए प्रतिघाती । बाँध सीध पुष्कल कर छाँती ॥ 

संधान छाँड़ेसि सत बाना ।पुष्कल  ताहिअ तृण तुल जाना ॥ 
बन बृष्टि पुनि करिअ प्रहारा । टूक टूक करि दिए महि डारा ॥ 

निज धनु कीन्हि बलाहक सायक बिंदु अपार ।
गरजत गगन सों निपतत भए जिमि धारासार ॥ 

सोमवार, २९ फरवरी, २०१६                                                                                     

देखि बान झरि निज पुर आईं । साधु साधु कह करिहि बढ़ाईं  ॥ 
चम्पक कर सर छूटत जाहीं । कीन्हि घायल भल बिधि ताहीं ॥ 

चम्पकन्हि बीरता जब जाने । पुष्कल ब्रम्हास्त्र संधाने ॥ 
चम्पकहु कछु थोर न अहहीं । सस्त्रास्त्र बिदिया सब गहिहीं ॥ 

जानि अबरु उपाय नहि  कोई । छाँड़ेसि ब्रम्हास्त्र सोई ॥ 
दुहु अस्त्र कर तेज एक जूटे । जरि जवलमन जलन कन छूटे ॥ 

कहिहि पुरजन एकहि एक ताईं । लागिहिं प्रलयकाल नियराईं ॥ 
दोउ तेज जब भयउ एकायन । चम्पक करि देइ ताहि प्रसमन ॥ 

पुष्कल चम्पक केर यह अद्भुद कर्म लखाए ।  
ठाढ़ रहु ठाढ़ रहु कहत अनगन बान चलाए ॥ 

बुधवार, ०२ मार्च, २०१६                                                                                                 

चम्पक घात  करत परहेले । पलक प्रदल दल देइँ सँकेले ॥ 
प्रतिहति रामास्त्र परजोगे । त सर सर करिअ पनच बिजोगे ॥ 

आवत देखि बान भयकारे । काटन तिन करि रहब बिचारे ॥ 
तबहि फिरैं सो आनि सकासा । बँधि पुष्कल रन कौसल पासा ॥ 

चम्पक पुनि भुज बल दिखरायो । कासि तासु निज रथ पौढ़ायो ॥ 
भट बरूथ बँधेउ पत जाने । हार नुमान लगइँ डेराने ॥ 

मरति बार जस काल हँकारी । हाहाकार करिअ अति भारी ॥ 
सत्रुहन पहि जब गयउ पराना । देखत पूछिहिं हे हनुमाना ॥ 

मोरि पताकिनी बिजय बिलोकनी कमनिअ कोदंड धरे । 

बीर आभूषन पताका बसन संग बहु सिंगार करे ॥ 
कर कंचन दल पुनि केहि सों केहि कारन ब्याकुल भई । 
बोलि नीति पूरित बचन हनुमन तब बीर रिपुहंत तईं ॥ 

चम्पक अनि परचार पुष्कल बाँधि लेइ गयउ । 

निज दल हार बिचार सब कंचन कल कल करिहिं ॥ 

सुनि अस बचन जरिअ करि क्रोधा । रिपुहं बोलि लेउ प्रतिसोधा । 
यह हनुमान तुम अतुरै जाहू । भरत कुँअर तुर लाइ छंड़ाहू ॥ 

साधु कहत बिनु पलक गवाईं । मोचन हेतु चले कपि राई ॥ 
कुँअरु बिमोचन आगत देखा । चम्पक मन भए कोपु बिसेखा ॥ 

सतक सहस छाँड़े सर लच्छा । चलेउ नभ निभ सरप सपच्छा ॥ 
गहे गगन कर ताल पसारे । खंड खंड करि छन महि डारे ॥ 

बहुरि लमनाइ करिअ बिसाला । मारि देइ कर गहि एकु साला ॥ 
चम्पक रहि बलवंत न थोड़े । महाबीर हनुमन के छोड़े ॥ 

काटि साल करि टूक टूक तिल प्रवान तुल जान । 

गहेउ  पुनि बहुंतक सिल खंड छेप लगे हनुमान ॥  

शुकवार, ०४ मार्च २०१६                                                                                              

ताहि सबन्हि धूरि करि डारा । हनुमन उर भए कोप अपारा ॥ 
एहि बलबीर बिक्रमि बहुताई । ए सोच करत तासु पहिं आईं ॥ 

रजबल रासि कासि गहि हाथा । लिए उड़ि गयउ गगन निज साथा ॥ 
चम्पकहु ठाढ़ ताहि प्रसंगा । लगेजुझन तहहीं ता संगा ॥ 

हनुमन करन लगै मल क्रीड़ा । किए चोटिल चम्पक दए पीड़ा ॥ 
 ता सम्मुख पुनि बल दिखरावा । हाँसत कासत गहि एकु पाँवा ॥ 

सटक बार नभ फेरि फिरायो । देइ पटकि गज कुण्ड गिरायो ॥ 
धरा सयत मुख मुरुछा छाई । तासु कटकु दल तब अकुलाई ॥ 

तेहि समउ  हाहाकार करहि घोर चिक्कार । 
धावत छतवत गयउ जस गिरिहैं कतहुँ पहार ॥ 

देखि सुरथ हत सुत महि पारा । स्रबत देहि रुधिर की धारा ॥ 
चढ़ि रथ गयो हनूमन पाहीं । कहत ए बचन सराइहिं ताहीं ॥ 

अहहउ धन्य तुम्ह हनुमाना । तुहरे बिक्रम न जाइ बखाना ॥ 

तीन तैं रुधिरासन पुरि जारे । रामचन्द्र के काज सँवारे ॥ 

ताहि सँगत कछु न सँदेहा । तुम बत्सल हरि परम स्नेहा ॥ 

तुहरी सेवा केरि बड़ाई । केहि भाँति सो कहि नहि जाई ॥

मम सुत जस महि दियो गिराईं । सूरपन हुँत कहौं का भाई ॥ 

मारिहु अस भट केतनि केता । कपिबर अब तुम होउ सचेता ॥ 

एहि समउ बाँध निज नगर लै जैहौं में तोहि । 
जो कहा सो सत्य कहा, यहु मोरे प्रन होहि ॥   

रविवार, ०६ मार्च, २०१६                                                                                        

बिनित बचन बोले हनुमाना । हे भूपत हे बीर महाना ॥ 
तुम हरि चरनहि चिंतकहारी । मैं दास मैं पंथ अगुसारी ॥ 

भले मोहि लए जाहु बँधाई । मोर प्रभु तव सोंह बरियाई ॥ 
तोर हाथे मुकुति दिलइहीं । किजो सोइ जो तव मन चइहीं ॥ 

करौ बचन अरु निज पन साँचा । बीएड निगम निगदन अस बाँचा ॥ 
रामचन्द्र सुमिरत जो कोई । ताहि कबहु कछु दुःख नह होईं ॥ 

कहत सेष सुनु मुनि बिद्वाना । पवन तनय कहि बात दै काना ॥ 
पुनि पुनि सुरथ  कीन्हि बड़ाई । किए तर तेजस सान चढ़ाईं ॥ 

धरे कोदंड कास कर सीध बांध नरनाह । 
भए हताहत अस हनुमत मुख सों निकसि न आह ॥ 

मंगलवार, ०८ मार्च, २०१६                                                                                  

निसरिहि रुधिरु ताहि परहेले । झपटि धुनुरु किए खन खन खेले ॥ 
भंजिहि ताहि पनच के साथा । भूपत दूसर धनु गह हाथा ॥ 

हनुमत पुनि नृप बाह मरोड़े । रोष बदन तनाक दए तोड़े  ॥ 
एहि बिधि कुल असीति धनु षण्डा । हनुमन के कर भयउ बिखंडा ॥ 

छन चन भरि उर कोप अपारा । गर्जहि घन सम बारिहि बारा ॥ 
तब नृप सींवातीत रोष कर । साधि सासन सक्ति भयंकर ॥ 

खात घात निपते हनुमाना । तनिक बेर उठि ठाढ़ि बिहाना ॥ 
लोहित नयन ज्वाल कन भरे। रोक पथ प्रपथ सुरथ रथ धरे ॥ 

द्युति गति सम बेगि बहु, उड़ि लए गयउ अगास । 
जाइ सुदूर छांड दियो सिथिर कियो बँध पास ॥ 

गरज आन रथ चढ़ि खिसिआना । बढे बेगि रबि प्रभा समाना ॥ 
फरकत अधर संग कपिराई । किए बिध्बंसित ताहि तुराई ॥ 

एही बिधि नृप के रथ उनचासा । खेलहि खेल करिअ बिनासा ॥ 
सुरथ जब अस बल बिक्रम देखे । होई गयऊ चित्र सम लेखे ॥ 

कहि बीर तव कर्म असि होईं । करे न करिहीं अबरु न कोई ॥ 
अधुनै तुम्ह पलक हुँत होरहु  । लखिहौं साखि बाहु बल मोरहु ॥ 

खैंच धनुष मैं रसन चढ़ावा । तुम्ह पवन कर तनय कहावा ॥ 
हरि पद पदुम अरु तुम्ह चंचर । कहत सुरथ मुख ज्वाल मुखि कर ॥ 

बहुरि भयंकर बान  महुँ पसुपतास्त्र निधान । 
लच्छ अनुमान करन लग छाँड़े रसन बितान ॥ 

बुधवार, ०९ मार्च, २०१६                                                                                  

लखतहि लखत लोग कहैँ  हाए  । पशुपतास्त्र सो गयउ बँधाए ॥ 
सुमिरत राघव तब मन मन ही । बँधे पास हनुमत तत छन ही ॥ 

सहसा बँध होइ गयउ बिभंजित । किए लरईं पुनि होत बिमोचित ॥ 
देखि मुकुत मह बलबन माने । भूपत बम्हास्त्र संधाने ॥ 

धावत द्रुत आयउ सकासे । महाबीर हँसि करिअ गरासे ॥ 
देखि भूप सुमिरत रघुराई ।  दास सहुँ रामास्त्र चलाईं ॥ 

बोले हनुमन सों बहु भयऊ । कपिबर अजहुँ तुम्ह बँध गयऊ ॥ 
सियापति राम मम गोसाईं । बाँधिहु तिनके आयुध ताईं ॥ 

जिनके प्रति आदर मन मोरे । बोले हनुमन दुहु कर जोरे ॥ 
बंधेउ और न कोउ  उपाई । तुम्हिहि कहउ करौं का भाई ॥ 

 दीन दयाकर आपहीं सम्मुख प्रगसित होंहि । 

निज आयुध का पास सों लेइ छड़ाइहि मोहि ॥ 

शनिवार, १२ मार्च, २०१६                                                                                             

हनुमन नृपु कर गयउ बँधाई । पुष्कल समाचार जब पाईं । 
नयन अँगीरी भरे अँगारे । सिखर सरासन भुज बल सारे ॥ 

सम्मुख परम कोप करि आवा । देखि भरत नंदन नियरावा ॥ 
अष्ट बान बधि करिहि स्वागत । छाँड़ेसि सहसै सोइ प्रतिहत ॥ 

दोनउ दिब्यायुध धनु धारिहि । मारिहि एक एकु काटि निबारिहि ॥ 
किए अघात दुहु मंत्र पठंता । एक हति होए त दुज प्रतिहंता ॥ 

धावहि दुहु चिकार अति घोरे । करिहि सघन रन धनु रजु जोरे ॥ 
छाँडिसि पुनि नृपु एकु नाराचा । धरे दंत जिमि बिकट पिसाचा ॥ 

काटि चहे पुष्कल जब ताहीं । आनि बेगि धँसेउ उर माही ॥ 
रहैं कुँबरु तेजस बहुताईं । तथापि घात सहे न सकाई ॥ 

गिरे भूमि मुरुछा गहे छाए  नैन अँधियार । 
पाए अरिहन एहि उदंत अचरज भयउ अपार ॥ 

 तदनन्तर अनुचर तहँ आईं । देखि बाजि पुनि गयउ बँधाई  ॥ 
पूछिहि लव सों सुनहु ए आजू । भए केहि पर कुपित जमराजू  ॥ 

















Tuesday, 2 February 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ४७ ।। -----

मंगलवार, ०२ फरवरी, २०१६                                                                                    
सेंचि अविरल कर्म जल हारी । निस दिन केतु माल कर धारी ॥ 
रितु बिनु पल्ल्वहिं न नव पाता । करिहु निरंतर भरमनि बाता ॥ 

अजहुँ भई बहु करम बड़ाईं । मम पुर सों तुर निकसौ जाईं ॥ 
सुरपति बिरचि केर करि बचना । बोधिहु मोहि कुटिल कर रचना ॥ 

रगुनन्दन चरन सेउकाई । सो जन कबहु गहि न अधमाई ॥ 
भगत सिरोमनि ध्रुव प्रह्लादा । दखु बिभीषन बिनहि प्रमादा ॥ 

राम भगत अरु  अबरु जग माहि  । होइँ पद पतित कबहु सो नाहि ॥ 
जोइ  दुषठ निंदहि रघु राजू । करिहि छाए छल और न काजू ॥ 

बाँध पास तिन्हनि जमदूता । लोहित मुद्गल हतिहि बहूँता ॥ 
तुम ब्रम्हन तुम रघुबर सेबी । मैं दंड तोहि सकहुँ न देबी ॥ 

जाहु जाहु चलि जाहु तुम मोरे सौमुख सोहि । 
न ताऊ तुम्हरे प्रति कोउ मो सम बुरा न होहि ॥ 

सुरथ कहेउ बचन के साथा । तासु अनुचर गहे मुनि हाथा ॥ 
भए उद्यत देवन निकसावा । तब जग बंदित रूप दिखावा ॥ 

परिहारत पुनि सकल ब्याजा । बोले मधुर बचन जम राजा ॥ 
राम भगत नहि तुम सम कोई । मोरे मन प्रसन्न चित होईं ॥ 

देखि अबिचल भगति तुम्हारी । तुम तें अगम न कछु संसारी ॥ 
मागउ जो तव मन अभिलाषा । बनाए बहुंत अनर्गल भाषा ॥ 

तोहि प्रलोभन के प्रत्यासा । तोर  बचन झूठहि उपहासा ॥ 
कूट कपट मुनि भेस बनाईं । सुब्रत कियहुँ मैं बहुँत उपाईं ॥ 

तथापि रघुपति प्रति तोरि सेवा भई न भंग । 
अरु किन होए करिहहु तुम साधु सील सत्संग ॥ 

बुधवार, ०३ फरवरी, २०१६                                                                                          

धर्म राज संतोषित लाखे । जोग दुहुकर महिप मृदु भाखे ॥ 
जो तुम मो पर प्रमुदित होहू । यह उत्तम वार दीजो मोहू ॥ 

जब लग रघु कुल केतु न मेलहिं । तब लग मोहि काल नहि हेलिहिं ॥ 
एहि घट जीवन रीस  न रीते । तुम्हरे सोहि भय नहि भीते ॥ 

ऐवमस्तु बोले जमराजा । होंहि सिद्ध तुहरे यह काजा ॥ 
जगत कृपालु कमल कर सोंहीं । सकल मनोरथ पूरन होंही ॥ 

हरि भगति परायन नृप के प्रति । कहत प्रसंसित कहनाउत अति ॥ 
भय जम राउ अन्तरध्याना । गयउ बहुर नज लोक बिहाना ॥ 

तदनन्तर धर्म पर हरि सेवानुरत नरेस । 
फेराईं संग्राम हुँत दोहाई निज देस ॥ 

शुक्रवार, ०५ फरवरी, २०१६                                                                                   

परिहरि राम चन्द्र महराया । बाँधेउँ तुरग मैं बरियाया ॥ 
रहौ सँजोउ समर कर साजू । सबहि जुझावन हेतु समाजू ॥ 

जानत हूँ यहँ बीर घनेरे । कर्मन कला कुसल बहुतेरे ॥ 
महाराउ अस यासु दाईं । गयउ अचिरम प्रभा के नाईं ॥ 

नान सस्त्रास्त्र कर धारे । समर सूर रन साज सँवारे ॥ 
 एकु बिसाल कटकई बनाईं  । तुरंगम सम सभा गह आईं ॥ 

राउ के रहे दस सुत बीरा । सब गुन धाम महा रन धीरा ॥ 
नाम रिपुंजय चम्पक मोहक । दुर्बार प्रतापी बल मोहक ॥ 

हरयक्ष सहदेब भूरिदेबा । असुतापन जनाइ रन सेबा ॥ 
रन रंगन गहि सब मन  माही । रणन रनक सो बरनि न जाईं ॥ 

 साज समाजित संकलित संकलपित सहुँ आए । 

खेत गमन अगहुँ त अगहुँ  बड़ अभिलाष जताए ॥ 

रविवार, ०७ फ़रवरी, २०१६                                                                                 

इत रामानुज अतुराई । आगत पूछिहिं अनुचर ताईं ॥ 
कहौ मेधिअ तुरग कहँ आहिहिं  । मोर दीठ कतहुँ न दरसाहिहिं ॥ 

कछु रन बाँकुर रहि यहँ आहीं । महनुभाव हम परचित नाहीँ ॥ 
गही तुरग हठि हमहि पराईं । गयउ नगर भित लय बरियाईं ॥ 

सुन रिपुहन अनुचर कहि बाता । बोलि सुमति सो हे महमाता ॥ 
श्री मान एहि केहि कर देसू  । कहु त बसइ यहँ कवनि नरेसू ॥ 

गही तुरग काहु सो न डरिहीँ । गयउ नगर लय हठि अपहरिहीं ॥ 
तब महमंत्री सुबुध सुजाना । सिरोवनत एहि बचन बखाना ॥ 

परम मनोहर नगर एहि अहहि बिदित जग माहि । 

सकल पुरौकस हँकारत कुण्डलपुर अस ताहि ॥ 

धर्मधुरंधर नीति निधाना । तेज प्रतापु सील बलवाना ॥ 
दुःख बरजत जहँ सुख चहुँ पासा । महाबली तहँ सुरथ निबासा ॥ 

होइहिं राम चरन अनुरागी । मन मति धर्म कर्म महुँ लागी ॥ 
सोए मन क्रम बचन के ताईं । सेवारत हनुमत के नाई ॥ 

जो गहि तजित तुरग रघुनाथा । कहत रिपुहंत तिनके साथा ॥ 
मान्यबर कहु मोहि जनावा ।  चहिए करिअ का कस बर्तावा ॥ 

कहहि सुमति पुनि हे महराऊ । बारता कुसल दूत पठाऊ ॥ 
गवन सो महिपाल के पाहीं । हितकर उपाए बोधिहि ताहीं ॥ 

यह सुनि अरिहन अंगद तेऊ । बिनयानबत ए बचन कहेऊ ॥ 

बाता निपुन बालितनय सुनु हे बुधि बल धाम । 
जानत अहहूँ तुम चतुर जाहु तात मम काम ॥ 

मंगलवार, ०९ फ़रवरी, २०१६                                                                                

सुनु इहाँ तेउ कछु संकासिहि । सुरथहि बिसाल नगरि बिलासिहि ॥ 
तात तोहि अनुबोध बहूँता । जाहु तहाँ बनि रघुबर दूता ॥ 

 जानत बूझत  कि बिनु जानेउ । नाथ बाजि गहि लेइ आनेउ ॥ 
 महमात सो नाउ लए मोरा । कहहु ताहि करि देउ बहोरा ॥ 

न तरु जुझावनि साज सँवारहु । बीर माझ रन खेत पधारहु ॥ 
अंगद एवमस्तु कही पारे । रिपुहन कहि अग्या सौकारे ॥ 

गयऊ सभा त बीर समाजा । घेर घिरे बैठें महराजा ॥ 
तुलसी मंजरि गहि सिरु माथा । रसना नाउ लेति रघुनाथा ॥ 

बरनिहि तिन्हनि के कथा सादर  रहैं सुनाए । 
श्रुतिहारु तिमि पुलकिहि जिमि पियास पय पाए ॥ 

नृपहु बपुर्धर बानर देखे । रिपुहन दूत गयउ सो लेखे ॥ 
तथापि चितबत बालि कुमारा । पूछिहि तासँग एही प्रकारा ॥ 

 हे रे मनोहर कपि कुल केतु । अहो कहो आयउ केहि हेतु ॥ 
तव आगत कारन  जो जनिहउँ । ताहि अनुसर काज मैं करिहउँ ॥ 

सुनी नृप निगदन बानर राजा । मन सिँहासन अचरजु बिराजा ॥ 
रघुबर बंदन लगन रहेऊ । बोले अंगद सो नृप तेऊ ॥ 

अधिक अरु का कहउँ मैं तोही । समुझु बालि सुत अंगद मोही ॥ 
बतकही हेतु दूत बनाई । महामहिम तव पाहि पठाईं ॥ 

तुम्हरे कछु अनुपल्लब रामहि तजित तुरंग । 
अपहर अनाईं तव पहि गही बाहु बल संग ॥  

बुधवार, १० फरवरी, २०१६                                                                                     

अनायास तव सेबक ताईं । अनजानिहि भा बड़ अन्याई ॥ 
अजहुँ जोग कर हे नर नाहू । प्रमुदित मन रिपुहन पहि जाहू ॥ 

अवनत सीस चरन गहि लीजो । कहिहौ मृदुल छिमा करि दीजो ॥ 
राजपाट सुत सम्पद संगा । धरिहउ आगे सौंप तुरंगा ॥ 

न तरु  तासु सायक सों घायल । सोहत भूतल होहु मरायल ॥ 
देहु तुम्ह निज सीस कटाई । जैहु सोइ होत धरासाई ॥ 

सुनि अंगद मुख बचन अस भाँति । देइ उतरु नृप धरे बहु साँति ॥ 
कहिहउ कपि तुम सो सब साँचा । तुहरे कोउ कथन नहि काँचा ॥ 

अरिहनादि के भय सँग आतुर बँधेउ बाजि न छाँड़िहूँ । 

जबलग रघुनन्दन देहि न दरस प्रगसि नहि आन सहूँ ॥ 
पुनि जुग पानि गवन त्वरित तासु चरन प्रनयन करिहौं । 
राजु कुटुम धन धान सहित यह बृहद सैन आगे धरिहौं ॥ 

काढ़ि बयरु साईँहु सँग छत्रि धर्महि अस आहि । 
न्याय पूरित युद्ध यह अहहीं तेन्ह माहि ॥ 

शुक्रवार, १२ फरवरी, २०१६                                                                               

मैं केवल हरि दरसन कामा । समर खेत करि होहिहुँ बामा ॥ 
पधारिहि हरि न जो घर मोरे । तेहि अवसर सहित मैं तोरे ॥ 

अरिहंतादि सबहि दल गंजन । छनहि जीत कै डारिहुं बंधन ॥ 
जो मंधातारि लवनासुर । खेलहि खेल मारि अति आतुर ॥ 

जुझत हारि जिनते रन खेता । महमन बलवन केतनि केता ॥ 
बैठे इच्छाचारि बिमाना  बिद्युन्मालीहि जातुधाना ॥ 

ताहि पलक बध करिअ बिधंसा । बाँधिहु तु अस बीर अवतंसा ॥ 
अजहुँ मोहि कस लगी जनाई । तुहरी मति गइ कतहुँ पराई ॥ 

अरिहंत जिनके पितिआ भुज अति बल गहियाइँ । 
सिउ गन  प्रमुख बीर भदर जिनते पार न पाइँ ॥   

जगनपति जोइ जगद नियंता । तिनके निकट दास हनुमंता ॥ 
तमीचर निकर तिल तुल जानी । पेरि समर जस घाले घानी ॥ 

भवन भवन लगि लूम लगारी । पालक सकल लंका दिए जारी ॥ 
हरिमुख मर्कट धीस कहाहीं । तासु बिक्रम जनिहिहूँ कि नाही ॥ 

दनुज पतिहि सुत अच्छ कुमारा । देखि बिटप गहि घाट उतारा ॥ 
निज चमुचर जीवन रखबारी । देऊ सहित द्रोन नाग भारी ॥ 

लूम सीस सेखर लपटायो । धरि उठाएँ बहु फेरि ल्यायो ॥ 
जासु नाउ जपि कटिहि बँधावा । तासु दूत को बाँधि न पावा ॥ 

मरुतिं नंदन हनुमन के चारित बल कस होइ । 
यह बत भगवन जानिहैं जनिहैं अबरु न कोइ ॥ 

 शुक्रवार, १९ फरवरी, २०१६                                                                                        

जिनके चरित जगत सुख देहीं । प्रभु कबहू बिसराए न तेहीं ॥ 
एहि कारन प्रिय पवन कुमारा । बसिहि सदा हरि हृदयागारा ॥ 

 हरिहि परम प्रिय सखा सुग्रीवा । अबौ नेक बलबन्त अतीवा ॥ 
भूमिहि भाखनि जो बल जोईं । ता सम जग पाव कोइ कोई ॥ 

जोर नयन जस अरिहन चरना । जोहि पंथ सो जाइ न बरना ॥ 
कुसधुजा नील रतन महाना । अस्त्रधर रिपुताप बिद्वाना ॥ 

प्रतापाग्रय होकि सुबाहू । बिमल सुमद सरिबर जन नाहू ॥ 
बीर मनि सम सत्यानुरागी । सेवहि अरिहन चरनन लागी ॥ 

गदित नाउ धरे ते अरु तासु बिलग जनराइ । 
करिहि सेवा गहिहि चरन  जब तब अवसर पाइ ॥  

एही बीर सम सिंधु अपारा । जे जलबिंदु राम जल धारा ॥ 
ता सम्मुख तुम मसक समाना । मन बिबस बार आपनि जाना ॥ 

जेइ बचन जनि चलिहु सँभालू । अरिहन अहहीं बहुँत कृपालू ॥ 
बिनइत पदतल पलकिन रोपिहु । सुत सहित ताहि हय सौंपिहू ॥ 

बहोरि कमल नयन पहिं जइहौ । तहँ तासु दरसन करि कहिहौं ॥ 
हम सब धन्य सहित परिबारा । सफल जनम तब होहि तिहारा ॥ 

कहत सेष मुनि एहि बिधि दूता । कहिहीं हितकर बचन बहूँता ॥ 
महीपाल बोले तासंगा । मैं मन बानी करम प्रसंगा ॥ 

कहिहउँ जो नित हरि गुन गाथा ।  रहिहउँ नाइ तासु पद माथा ॥ 
त देहि अवसहि दरसन मोही । तामें कछु संसय नहि होही ॥ 

न त सकल सूर बीर अरु राम भगत कपिराइ । 
मेधिअ तुरग छड़ाइँ लए बांध मोहि बरियाइ ॥ 

सोमवार, २२ फरवरी, २०१६                                                                                   

दूत जहँ ते अजहुँ तुम जाहू । रिपुहन ते कहि बात सुनाहू ॥ 
सकल जुझाउनि साज समाजित । रहिहीं सबहि बीर छत छाजित ॥

करिहि आँगन मोर अगवाईं । अंगद मुख हँसि हंस तराई ॥ 
चले तहँ ते सेन पहिं आइहि । सुरथ कही सब बात सुनाइहि ॥ 

समर कला में बहु कुसलाता । सुनि जुधा जब सुरथ कहि बाता ॥ 
खेतकरन मन भर अति चाऊ । सब रन बीर करम कुसलाऊ ॥ 

कोप रूप गाजिहि घन घोरा । बरखि बीर रस जस चहुँ ओरा ॥ 
बाजिहि भेरिहि पनब अपारा । सुनि कादर उर जाहि दरारा ॥ 

तेहि अवसर बीर सुरथ सुत अरु चमुचर संग । 
आए घन घन नाद करत छाए गहन रन रंग ॥ 

मंगलवार, २३ फरवरी २०१६                                                                                       

प्रलयकाल जस सिंधु उछाहू । बोहत बारि बोरि सब काहू ॥ 
लेइ संग धारिहि दल धारा । रथ हय हस्ती तेहि प्रकारा ॥ 

 धार धार धावत बढ़ि आईं । ढाँकत धरनिहि देइ दिखाई ॥ 
यह जस सैन छन महि पारा । धूरि धूसर करिहि सत्कारा ॥ 

घटाटोप करि दहुँ दिसि  घेरी । बदन घन बजावहि रन भेरी ॥ 
संखनाद जब बिजय पुकारी । भय नभलग  कोलाहल भारी ॥ 

रन हुँत उद्यत नृप जब देखे । रिपुहन बिकल सुमति पुर पेखे ॥ 
बोलिहि महमन  महिपाला । घार घेर निज कटक बिसाला ॥ 

आइहि महकाल सरूप भरे अमित बल बाहु । 

अजहुँ जोउ करतब होइँ तासु हमहि समझाहु ॥