Friday, 19 June 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३५ ॥ -----


मंगलवार, १६ जून २०१५                                                                                             

दिए रघुबर सिय सिर सिंदूरी । भूर भुअन जिमि सस कर कूरी ॥ 
देख निहारिहि देखनहारे । निर्निमेष सुध बुधी बिसारे ॥ 

जेउनार बहु भाँति रचताए । जनक सादर जनेत बुलवाए ॥ 
जथाजोग पद पीढन दीन्हि । बिनै बत बहुँत सुश्रुता कीन्हि ॥ 

परुसनी बान चारि भाँति के । भरि भरि भजन बहुंत जाति के ॥ 
छरस बिंजन बहु रुचिरु रसोई । रस रसमस गन सकै न कोई ॥ 

सिअ सिअबर छब लखि तित छाहीं । मनियारिन मनि मन मन माहीं ॥ 
जसि रघुबर ब्याहु बिधि गाहा । सकल कुँअर तसि करनि बियाहा ॥ 

दयो अमित नाना उपहारे । हंस हिरन हरिमनि सिंगारे ॥ 
कंकन किंकनि नूपुर नौघर । कनक बसन आभूषन बर बर ॥ 

दायो जौतक जनक बहूँती  । दिए दान जिमि सकल भव भूती ॥ 
बहुरन की अब बेला आई । दसरथ सह बधु माँगि बिदाई ॥ 

जनक राज के दिए  दाए  को कर बरनि न जाए । 
छह मास लग अहोरि के, पुनि बरात बहुराए ॥ 

शुक्रवार,१९जून २०१५                                                                                           

भर हरिदै मातु उर लाई । जाट सुता गन चारि सिखाईं ॥ 
चारि अतिथि उर देउ सरूपा । लाखिहि लोचन भर भर भूपा ॥ 

प्रमुदित मानस निछाबरि करिहीं । सिआ पद बारहि बार बहरहीं ॥ 
मंँगै बिदा रघुबर नत सीसा । भ्रात सहित बहु पाएं असीसा ॥ 

कुँअरि  चढ़ाईं पलक पालकी । बहुरि बरात दसरथ लाल की ॥ 
करुनारन बिरहा भइ मेहा । बरसात भीजत सकल बिदेहा ।। 

दरसिहिं मग मग लोग लुगाईं । तासु नयन सुख कही न जाई ॥ 
जग लग सुखकर दिवस पुनीता । पहुँची अबध जनेत लिए सीता ॥ 

पथ जुहारत हारत जब आबत अकनि बरात । 
लगैं  सँवारन  निज सदन पुरजन पुलकित गात  ॥ 

रविवार, 21 जून 2015                                                                                                        

दरसन सिया राम के जोरी | पुरजन लोचन ललक न थोरी || 
सगुन केर सुभ साज सुगंधा | बरसिहि सुर कर सुरभित गंधा || 

सकुचत अच्छत फुर पत  रोरी | लखत तुलसि  मंजरि  कर जोरी || 
सुस्वागत के साज समाजे  | लवन  लाज एक संग बिराजे || 

सँजो सबन्हि कनक मय थारी  | खनकन रत कर धरी द्वारी || 
जोउनि दरस दसा अस होई | मनुज नयन  कहि सके न कोई || 

पुनि गुरुबर अग्या कह पारे | रघुकुल मनि पद पुर  पैसारे || 
राय जोहार किए नर नारी | देखि  दुलहिनि उहार उहारी || 

लोक बेद कहि  बिधि अनुहार | किए दुआर किछु मंगल चारे | 
सुवासिनि रिती रही  न कोई | नेग जोग जस रुचि तस जोईं || 

सोध सुदिन सुभ लगन में कर कंकन दिए छोर | 
होअहि सबहि मन मंगल मोदु बिनोदु न थोर  || 

मुनिबर जब तें राम बिबाही |  भे नित नव मङगल जग माही || 
सघन तोख घन  घर घर बरखे |   घन घनकर सुख संपत करखे || 

एही बिधि किछु सुख दिवस बिहाने | पुनि  दसरथ  के मन महुँ आने || 
रघुबीर जुबराज पद दायउ | सुअवसर गुरहि जाइ सुनायउ || 

श्रवण समीप भए सित केसा | एहि  कृत मोहि करे उपदेसा ||  
राजतिलक के भयउ समाजा   |  भले लगन भल काल  बिराजा || 

सुर की प्रेरि गिरा की आगी | कैकेइ  के बचन जा लागी ||  
कोप भवनन बहु स्वाँग भरे |  दसरथ दिए बर के माँग  करे || 

मूढ़ मंदमति मंथरा, कैकइ की एक चेरि । 
कुबरी कुटिल कुचाल करि, कन खौरी मति फेरि ॥ 

सोमवार, २२ जून २०१५                                                                                            

पठबए भूप भरतु ननिअउरें । भरी कुबेष कोपु गृह पँउरें ॥ 
भरत हुँत जुबराजु पद चहती । दिए दुइ बर देन गई कहती ॥ 

दाएँ भूप भरतहि अभिषेका । कह कटु कटुक माँगए बर एका । 

दूजी माँग राम बनबासा । चौदह बरिस बिसेष उदासा ॥ 

रसन रसन धनु मन सर बानी । लच्छ राउ जिन जियँ नहि जानी ॥
नृप हिअ  राम तिलक अभिलासा  । श्री कांत मुख छाए हतासा ॥ 

भई  भीर  इत राज दुआरी  । राज तिलक के किए तैयारी ॥ 
नयन नयन रय रयन निहारे । चितबहि भोरु चौंक चौबारे ॥ 

उत केकइ बहु बिधि समुझायो । सूखित कंठु सिथिल भए रायो ॥ 
भाई भोर नृप राम बुलाईं । दिए  दुइ बार नृप मातु बताईं ॥ 

हतचेत चितबत सुत पितु रामहि राम पुकारि । 
राम जान निज बनबास सुस्मित बदन निहारि ॥ 

मंगलवार, २३ जून, २०१५                                                                                                    

करुनायन सुकोमल सुभाऊ । कहसि मातु सो सब मन भाऊ ॥ 
सुने अवनिप रामु पग धारे । निरखहिं  कातर पलक उघारे ॥ 

 लागि दुःख पाउ अति लघु बाता । कह अस कहि रघुबर निज ताता 
परे चरन पुनि माँग बिदाई । चले बसन घन बन रघुराई ॥ 

थंभ रहँ जहँ  सुनइ जो कोई । धुरज धूरि जस धीरजु खोई ॥ 
कहहि करक कैकइहि कुबाता । होइहि दुर्बाचस कस माता ॥ 

कौसल्या पहिं गए गोसाईं । देइ असीस उर भर ल्याई ॥ 
जानि नहि नृप केहि अपराधा । देन बास बन एहि दिन साधा ॥ 

बिधाता केरि गति रहि  सदा बाम सब काहु  । 
चारु चन्द्रमा चित्र लिखत  लखत लखत लिखि राहु ॥ 

बुधवार, २४ जून २०१५                                                                                                

सुनि सब चलन चहति सिय साथा । तनु  बिनु जिआ तिआ बिनु नाथा ॥ 
कराल ब्याल काल बन भूरि । कहँ बिष बटि कहँ सजीवन मूरि ॥ 

भय के दुःख सनेह के घेरे । कहै बचन जनि सिय बहुतेरे ॥ 
दीन दसा करि देखि न जाई । कहइ चलहु पुनि बन रघुराई ॥ 

गाहे चरन सासु उर लीन्ही । असीस सहित बहु सिख दीन्ही ॥ 
होउ अचल अहिबात  अभंगे । जब लगि जग जमुना जल गङगे ॥ 

उत लखमनहु चलन कहि पारा । दास दास मैं दास तिहारा ॥ 
मात पितु  गुर पद सेवकाई । तिन्ह सों गरुबर भए रघुराई 

गत जनि पहिं कहि माँगु बिदाई । चलो बेगि सब साज सजाई ॥ 
अपनी साध सिद्ध जब जानी । कैकइ मुनि भाजन लिए आनी ॥ 

बंदत बिप्रबर गुर गहे चरन रघुबर बनबास चले । 
सीस जटा किए बलकल तन  जग तें होत उदास चले ॥ 
बिरहाहु बिरहन रूप भरि कहि चौदह बरसि प्रबास चले । 
रामु बियोग सब लोग भाषि रे भानु कुल के  प्रकास  चले ॥ 

सीस जटाल बलकल तन मुनि के भेसु बनाए । 
राम बनिता बंधु सहित चले बिपिन रघुराए ॥ 

बृहस्पतिवार, २५ जून २०१५                                                                                           

सकल अवध बिरहागन दाहू । का पुरजन अरु का नर नाहू ॥ 
गुरबर बसिष्ट लगे द्वारे । बिरह बदन रअरु  अगन उभारे ॥ 

आरत मुख दुःख सोक बिषादू  । सकल विषादन वादन नादू ॥ 
पुरजन परिजन जिअहि न जाना । भयउ निबिड़ सब भवन मसाना ॥ 

हरिदै हरिदै होए अधीरे । सिआ सहित भए राम बहीरे ॥ 
 लए आयसु रथ बेगि बनाई । गए सुमन्त्र  रहँ जहँ रघुराई ॥ 

रखे सम्मुख बहोरि कर जोही । करि बिनति रथ रामावरोही ॥ 
प्रथम दिवस लगि जन भय साथा । बसत तमसा तीर रघुनाथा ॥ 

सोक  श्रम बस पलक पट झूरे । सोए लोग जब अगजग भूरे ॥ 
छाँड़ चले नहि आन उपाई  । शृंग बेर पुर पद पैठाईं ॥ 

नेकानेक प्रसंग कहि नाथ गंग अन्हाइ । 
सुधि गुँह निषाद भेंट भरि भगवन दरसन धाए ॥ 

शुक्रवार, २६ जून, २०१५                                                                                            

बसि बन कारण नाथ जनाईं । किसलयमय साँथरी रचाईं ॥ 
दोना  भरि जल दिए फल फूले । खाए रुचिर तहँ प्रभु सुत भूले ॥ 

भोर भाई जग जीवन जागे । सुमन्त्र फिरन प्रबोधन लागे ।। 
बिनहि राम सुमनतर बहुराईं।  बहुरि बनिक जिमि तजत कमाई ॥ 

पार गमनु गंगा तट आवा । मँगे नाउ केवटु न अनावा ॥ 
जासु परसत  सिला भै नारी । कहाँ कठिन यह नाउ हमारी ॥ 

पाउँ पखारिहुँ  चहौं न खेवा । कहए गमनु प्रभु देउ ए सेवा ॥ 
पखारि पयस पय सपरिवारा । राम लखन सिअ पार उतारा ॥ 

सकुचि नाथ कछु देवन नाही । सिय पिय कर मनि मुदरी दाहीं ॥
किए गुहार प्रभु पर नहि लेई । फिरत बार लहुँ कहत फिरेई  ॥ 

सिय लखनहि सखा गुह सहि पहुंचे तीरथ राज । 
किए निमज्जन सिउ बंदन जोग रहँ भरद्वाज ॥ 

शनिवार, २७ जून २०१५                                                                                            

गहे चरन प्रभु अवनत सीसा । दिए असीस बहु मुदित मुनीसा ॥ 
भाव भगति आनंद अघाने । माँग बिदा तहँ संग पयाने ॥ 

उतरि तट जमुना जी अन्हाएँ  । सकल लोचन दरसन सुख पाएँ ॥ 
बोधि फिरब प्रभु सखा निषादा । त्रान हीन चलि पाँउ पयादा ॥ 

गाँव निकट चहँ जहँ कहँ  जावैं । दरसन आस नारि  नर धावैं ॥ 
एक चितबन् चितबहि  अनुरागे । एक चितबत चित सँग मह लागे ॥ 

गाँउ न जाने नाउ न जाने । जग मह प्रभु कहँ गए पहचाने ॥ 
छुधा उदर भाँवर रहि काया । सीस धूप धर पदतल छाया ॥ 

गिर गहबरी पंथ पथरारी । तापर साथ सुकुअरी नारी ॥
लखन भ्रात पद प्रेम पियासे । सिया राम से राम सिया से ॥ 

गुंजहि मधुरित मधुप जहँ बन सर सेल सुहाए । 
श्रमित भ्रात सिय सहित प्रभु बालमीकि कुटि आए ॥ 

रविवार, २८ जून २०१५                                                                                                      

धन्य भए मुनि कीन्हि प्रनामा । पाए पहुना रूप श्री रामा ॥ 
जेहि भाँति बन रानी दीन्हि । सबहि कथा तस बरनन कीन्हि ॥ 

मुनिबर बिनीत बचन उचारे । धन्य भाग बन आप पधारे ॥ 
रहौं कहाँ  मैं पूछेउँ मोहि  । तुहरे निबास कहाँ नहि होंहि ॥ 

जिन्हनि हरि तुअ प्रान  पियारे । बसिहु जहाँ अभिलाष तिहारे ॥ 
चित्रकूट गिरि  कामना करहीं । जोहहि अत्रि  कबु हरि  पद धरहीं ।। 

कोलकिरात रचे दुइ साला । चित्रकूट अस बसेउ कृपाला ॥ 
प्रमुदित जल थल गगन बिहारी ।  धन्य मान् बेहड़ बन चारी ।। 

धन्य धन्य चित्रकूट भुइ बेलि बिटप बन जाति । 
परसि चरण राज रघुबरहि धन्य धन्य दिन राति ।। 

सोमवार, २९ जून २०१५                                                                                                 

बन मग पग पग बिधि सोधे । कॉल किरातिहि पंथ प्रबोधे ॥ 
 द्युति दिया सिय पिया प्रसंगा । सासु ससुर भए मुनि तिय संगा ॥ 

सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा । बैठे बटोहि दिवस गवाँवा ॥ 
झांकत रथ हरि दरसन तरसे । पाए हीन भरि लोचन बरसे ॥ 

पूँछहि जन जन पूँछहि रानी । कहहु कहाँ पर उतरु न आनी ॥ 
तरपत पितु निज मान अभागे  । परे धरा पुनि प्रान  त्यागे ॥ 

बिबिध भाँति सब करहि बिलापा । नगरी घर घर सोक ब्यापा ।। 
धावत दूत भारत पहिं आईं । संसइत मन चरन  बहुराई ॥ 

पूछ कुसल तहँ सबहि की अपनी कही बुझाइ  । 
कपट नीर भरि कैकई क्रमबत बोल बताइ ॥ 

मंगलवार, ३० जून २०१५                                                                                                 

सुनत भरत उर दुःख भर भारी । तात  तात चित्कार पुकारी ॥ 
तड़पत जल बिनु मीन जिअन मेँ । भ्रात भवन नहि तात मरन मेँ ॥ 

जान बेनु बन अगन अभागे ।  कलपत कौसल्या हिय लागे ॥ 
बीति  करुनामई जगराती । डाह क्रिया कीन्हि एहि भाँती ॥ 

मरन पूरब भूपति  सँदेसा । बुला भरत मुनि करि उपदेसा ॥ 
राज तिलक जब साज समाजे । चले देन बन रामहि राजे ॥ 

तमसा तट  भए  प्रथम निवासू । गोमती तीर दूसर बासू ॥ 
श्रृंग बेर पर पावनि गंंगा । करे पार लिए सब जन संगा ॥ 

प्रयाग राज सहित प्रभो जहँ जहँ  बस बसाए । 
भाव बिहबल हॉट भारत तहँ तहँ परनत जाएँ ॥ 















































Monday, 1 June 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३४ ॥ -----

सोमवार,०१ जुन, २०१५                                                                                            

कौसिक लए रस बिहँस बतायो ।  चितबत जनक पुलकित कहि रायो ॥ 
तिन्हनि दिनकर बंस जनावा ।दसरथ तनुज रूप तिन पावा ॥ 

ते बर धुरीन धर्म धुरी के । अहहिं अवनिपत अबध पुरी के  ॥ 
पाए परच पुनि मुदित बिदेहू । बहुरि बहुरि प्रभु लखत सनेहू ॥ 

लेइ बिदा नृप चरन जुहारे । नगरी दरसन आन पधारे  ॥ 
भमरन रत पथ  पथ जग रूपा । दृग दरपन छबि लखत अनूपा ॥ 

जो देखे सो चितबत पायो ।देखि केहि किन समुझ न आयो ॥ 
लगिहै जुवतीं नयन गवाखेँ । रघुबर रूपनेह भर लाखेँ ॥ 

गौर बरन एक साँवरो,  दोनउ बाल मराल । 
देइ रुचिर सिर चौंतनी चले मोहनी चाल ॥ 

मंगलवार, ०२ जून, २०१५                                                                                   

जनक राज धिए चले बिहाने ।सिउ धनु भंजन के पन दाने ॥ 
जिन राजन कर भंजन होही । बिनहि बिचार सिअ बरिहि सोही ॥ 

सुनि पन सजि सब राउ समाजा । सिआ बरन अभिलाख बिराजा ॥ 
किए संगत  दोनउ सुकुआँरे । धनुमख दरसन मुनिहु पधारे ॥ 

चहुँ पुर कंचन मंच बिसाला । बैठिहि नगर सहि महिपाला ॥ 
धरएँ तमक तकि करएँ घमंडा । टार न टरिहि कटुक कोदंडा ॥ 

लगे उठावन सहस दस राए । कर्मुक तापर उठे न उठाए ॥ 
जनक राज मन भयउ दुखारी । अस तौ रहिहि कुँअरि सुकुँआरी ॥ 

लखत जनक प्रभु मुख परितापा । उठे सहज भंजन  सिउ चापा ॥ 
पावन आयसु मुनि बर देखे । दियो हरष आसीस बिसेखे ।। 

राजभवन उदयित होत रघुबर कासि किसोर । 
बिकसे संत सरोज सब भई बिभासित भोर ॥ 

बुधवार, ०३ जून २०१५                                                                                                             

रसमस दरस रही जो कोई । लोमहरष  तन हहरन होई ॥ 
नयन सुपुत सुमनस जस लागे ।पाए पलक पल्लव जस जागे ॥ 

निज प्रनमन गुरु चरन पठावा । राम कुँअर तुर धनुर उठावा ॥ 
उठत नभोगत  मंडलकृतिलहि । दमकिहि कर जस दामिनि दमकिहि ॥ 

रघुबर छन भीतर दिए तोरा ।भयऊ भुवन रवन घन घोरा ॥ 
परे भूतर होत दुइ खंडा । करे जयति जय सुर मुनि षण्डा ॥ 

दरसत रहँ सब नयन उघारे । चितबत पलकिनि चिक नहि डारे ॥ 
एक घन गर्जन एक जय बानी । रहि रसमई दुनहु रस सानी ॥ 

संख नुपूर सुर संगत बाजिहि  झाँझ मृदंग । 
चहुँ पुर सुमधुर रागिहीं रागिनि रंजन रंग ॥ 


बृहस्पतिवार,०४ जून २०१५                                                                                        

धनुहत नृप भए अस श्री हीना । होत दिवस जस दीप मलीना ॥ 
मंचासित नर घर घर जावैं । रुचितत रतिबत कहत बतावैं ॥ 

री सिउ के कोदंड कठोरा । रघु केरव कर गयऊ तोरा ॥ 
गह गह पुरजन धन कर लीन्हि । बारिहि फेर निछाबर दीन्हि ॥ 

सिअ सुबदन चितई कृपायतन । पाए चातकी स्वाति जलकन । 
पलक पाति रहि बरन बिहीना । लिखे  राम की नयन अधीना ॥ 

हिय सरोजल नयनाराबिंदु । प्रमुदित प्रगसिहि ओसु के बिंदु ॥ 
सखीं माँह सिय सोहति कैसे । निसिगन माँह महानिसि जैसे ॥ 

बहोरि सोए सुभ अबसर आए  जनि कुँअरि कर जयमाल धराए ॥ 
गहि दुहु करसुन्दर जय माला । चली मंद गति बाल मराला ॥ 

मन महि रामहि चाह करि हरिहरि चरि  नियराइ । 
प्रियबर प्रति अति प्रीत बस, पहनाइब नहि जाइ ॥ 

शुक्रवार, ०५ जून २०१५                                                                                                    
 लखत पिया निज मुख सकुचाईं । रघुबर मन ही मन सुहसाईं ॥ 
जो सुमाल कर बास सुबासी । संगत सिय पिय निलय निबासी ॥ 

गावहिं मंगल सकल सहेली । जुगित बाहु बल सिय उर हेली ॥ 
उदधि गान भए सुर घन बाहीं   । जुग  कर कौसुम जर बरखाहीं ॥ 

तिनउ लोक लग जस बिस्तारै । बरे सिया धनु भंजनहारे ॥ 
राम सिया जुग लागिहि कैसे । मयन महा सुख सँजूगि जैसे ॥ 

कहै सखी पद गहु बहु प्रीती । गौतम तिय गति सुरति सभीती ॥ 
दरस सिया के सरल सुभावा । प्रियबर उरस बढे प्रिय भावा ॥ 

तेहि अवसर संकर धनु  भंजन के धुनि पाए । 
भृगुकुल रूपी कमल के  तेज तूर तहँ आए ॥ 

शनिवार, ०६ शनिवार, २०१५                                                                                              

तपसी बसन बदन रतनारे । तापस तपन जस नयन उतारे ॥ 
जनक राज अगुसर सहुँ आयो । प्रणमत पद सिय कर परनायो ॥ 

 सुनि जस तस धनु भंजित पावा । परबह प्रसारत बहुंत रिसावा ॥ 
लिए कुठार कर जहाँ मुनीसा । किए रघुबर अगुसर तहँ सीसा ॥ 

भृगुपति चिक्कर लगन अगनि के । भयउ बचन घन रघुकुल मनि के ॥ 
कोपित पवन अँगारि जगारैं । नाथ निगदन बिंदु बौछारें  ॥ 

जानिहि  मुनि जस प्रभो प्रभावा । अवतरि  राम रूप हरि आवा ॥ 
हे मनु मानस के कल  हंसा । मँगत छिमा अस  करेँ  प्रसंसा ॥ 

मंद मलिन प्रभ मुख लहे रहे सहुंत कर जोरि । 
छिमा मंदिर छिमा दियो जयकर चरन बहोरि ॥ 

रवि/सोम ,०७/०८  जून, २०१५                                                                                               

गयऊ मिटे लगन पथ सूला ।रघुबर सिरपर बरखिहि  फूला ॥ 
राजित करतल कुसल प्रबीना ।सुमधुर सुर कीन्हि कल बीना ॥ 

ढोर हुडुक झाझर कर  साजे । गहगह गगनन घन घन बाजे ।। 
झंझिया कर झंझरी सुहाए । सुर मंडली मुख मधुरिम गाए ॥ 
झार्झर =ढोलबजाने वाला 
सुमुख सुलोचनि मिल करि जूहा  ।  मिलिहि रागिनिहि राग समूहा ॥ 
गावहि सुन्दर  मंगलचारा । छावहि चहुँपुर मोदु अपारा ॥ 

होइहऊँ किमि चित चीता के । भयउ भय भीत चित  सीता के ॥ 
चिंतन रत मन बहु दुःख जोई  ।निबरिहि भय अब चिंत न कोई ॥ 

जनम दारिद जिमि पारस पावा । जनक राज मुख अस दरसावा ॥ 
कहहि मुनि भई सिआ पिआ की । करौ  नाथ अब रीति बिहा की ॥ 

जनक जाइ कुल बिराध बुझाओ । कल कुसल पुनि बोलि पठायो ॥ 
बेद बिदित सब रीति नुहारे । नौ दुलहनि से  नगर सिँगारे ॥ 

कलापावली किए कुञ्ज गली किए कनक कदलि कील कसे । 
मुनगि धरई के मनि गठियई के हरिद बेनु बल बिलसे ॥ 
बीच बीच बधि रचि चीरि कोरि पचि परन मई मनि मालरी  । 
बेली बनई रूचि रुचिरई के झूरत झौरि झालरी ॥ 

बहु रंगी बिहँगी गूँजहि कूजहि कतहुँ भूरि भूरि भँवरे । 
कलस भरे मंगल द्रव्य कर धरे देवन्हि अनुकृति करे ।। 
चौँक पुरायो बहु भाँति सुहायो रंगोरी रंग भरी । 
मनोभवँ कर फंद परी बर बंदनिबारी द्वारि घरी ॥ 

बहु निकट निकट  बटिक बटी बट पुरट पट पहिरन दियो । 
छीन छाम छबि छन उडुगन छूटत दहरी तट लग लग्यो ॥ 
मंगल घट सजे दंड धुजा धजे पताक पथ पथ पहरे । 
पथ राज भए सुरजस पंकज पत जस सौरभित सुगंध भरे ॥ 

 दीपांकुर धरी  मनिमय मँजरी मंजुल मनोहारनी । 
जेहि मंडपु दुलहि बेदेहि केहि कबि सों जाइ न बरनी ॥ 
दूलहु राम जहाँ बरहि सो ठाम तिनहु  लोक उजागरे । 
सों जनक भवन के सुहा भुवन के सोइ प्रति घर घर घरे ॥  

जेहि नयन तिरहुत लखे भूरि भुअन दस चारि । 
ऊँच सदन सन नीच लग जग सुख सम्पद सारि ॥ 

बसइ लखी नगर घर घर भेष भरे जहँ साखि । 
तेहि के सुहा सेष सहि सारद सकुचहिं भाखि ॥ 

मंगलवार, ०९ जून, २०१५                                                                                                 

जनक अवध पुनि दूत पठायो । सिउ धनु भंजन देत बधायो । 
बारि बिलोचन कह बहु बतिया । दिए दूत कर लगन के पतिआ ॥ 

पाए अवध पति लगन प्रस्ताउ । नीर नयन हिय भरे प्रिय भाउ ॥ 
लिखे सरस अस बरन बिदेहा । दसरथ के मन भरे सनेहा ॥ 

तब दूत नृप निकट बैठाईं । पूछ बिकल सकल कुसलाईं ॥ 
दूत द्रवित कहि कह सब बाता । बजाउ बाज सजाउ बराता ॥ 

उठे जनक पुनि आदर साथा । दिए पतिआ बसिष्ठ के हाथा ॥ 
गुरुबर मुख जब पाए सँदेसा ।होहि रागि उर हरष बिसेसा ॥ 

सजि बिधुबदनी रति मदन बिनिंदत जहँ तहँ मिलि लगिहिं भलीं । 
सँमरिहि नागर सहि उमगत मुद महि मग गह गह गलीं गलीं   ॥ 
 सिंगरहि पत नद सहि  परवत रतिबत  कुञ्ज कुञ्ज कौसुम कलीं । 
कतहुँ  बेद  धुनि करिहिं मुनि कतहुँ त उच्चरहिं बिरदाबली ॥ 

राम नगर सदैव सुहावन तदपि रीत कृत लगि पावना । 
पताक पट तोरन माल बनाउन बिलखि नबल बिहावना ॥ 

दूतिन्ह देत निछावरि दसरथ केर दुआरि  । 
 सजिहै बराति सुठि सुभग  भीड़ परी अति भारि ॥ 

बुधवार, १० जून २०१५                                                           

सहजन स्वजन गुर पुर लोगे । सुबुध सूजन सुधि सचिव सुजोग ॥ 
रथि हय  गज रथ केतनि केता । चले अवध पति जुगत जनेता ॥ 

थांल धरी द्वारि कुल नारी । करि आरती कुसुम रस बारी ॥ 
बनइ न बरनत बनी बराता । होंहि सगुन सुन्दर सुभदाता ॥ 

भरत बयस सब छरे छबीले । पहिरे भूषन बसन सजीले ॥ 
बाहन सिबिका हय कर कासे । भरे बस्तु पुर बहिर निकासे ।। 

पथ पथ सबजन सथ जब नाचिहि । रँगे रागिनी रंजन राँचिहि ॥ 
बीच बीच रचि बास सुबासीं । पाए सकल सुख सम्पद रासी ॥ 

भए आनंद समुद रूप जनेत उर न समाए । 
एहि बिधि बहु कौतुक करत जनक पुरी नियराए ॥ 

शुक्रवार, १२ जून,२०१५                                                                                           

बाजत बाजने दिए सुनाई  ।  आतिथेय अगुसर अगवाईं ॥ 
कंठ माल दिए किए जोहारे । आउ भगत कर बहु सत्कारे ॥ 

होइहि मधुर मिलन हिल मेला । मेलिहि जिमि दुइ मंगल बेला ॥ 
हरित दुब  दधि दीप धरि थारी । किए आरती द्वाराचारी ॥ 

बहु सुपास जन वास  सुगंधे । चारिहि दिसि स्वजन कर बंधे ॥ 
कनक कलस रस कोपर थारी  । भरे बिबिध भोजन रसियारी ॥ 

लिए बरातिन्हि बीच बिहारें । मृदुलित मधुर भास् मनुहारें ॥ 
आह जनक जी की पहुनाई । मुकुत कंठ सब करें बढ़ाई ॥ 

मिलि  पितु सों राम लखमन बधे मोह के पास । 
जनक सहित जनेत सबहि लेन  आए जनवास ॥ 

शनिवार, १३ जून २०१५                                                                                              

धारिअ पाउ नेउता दीन्हि  । भयउ समउ अब सबिनय कीन्हि ॥ 
यह सुनि चले अवध के राजा । सहित संत गुरु राज समाजा ॥ 

चारि बंधु सोहहि रथ संगा । जात  नचावत चपल तुरंगा ॥ 
राम जेहि बार तुरग बिराजे । बिभवत बिभावरी मुख लाजे ॥ 

मणिमान पलान सुमोति  जरे । किंकनि  किरन सुजोति कर भरे ॥ 
प्रीत पुलक उद उदधि उछाहू  । चले सिया रघुबीर बिआहू ॥ 

जानि  आवत जनेत दुआरी । चलि परछन सुठि कुँअर कुँआरी ॥ 
सकल सुमंगल द्रव्य सँभारी । सजा आरती चलि  कुल नारी ॥ 

करहिं सकल कल गान द्वारा । कीन्हि बिदित सुमंगल चारा ॥ 
करें आरती दुलहु निहारहि । भूरि भूरि मनि भूषन बारहिं ॥

देखिं राम बर रूप मन जो सुखु भा सिअ मात । 
सारद सेषु महेसु मुख को बिधि बरनि न जात ॥ 

रवि/सोम , १४/१५  जून, २०१५                                                                                         

सैम सामध होअहि समधौरा । समदिहि जिमि दुहु पौरक पौरा ॥ 
जनकु सकल बरात सनमानी । दाए पान बिनती मुख बानी ।। 

राम मंडप आगमन सुहाए । जनकु सादर अवधेसु ल्याए । 
कहे कुअँरि गुरु आनइ  जाईं । सखि सँवारि सिअ आन लवाईं ॥ 

धरे धरा हरियर पद ताला ।बाजिहि  नुपूर मंजुल माला ॥ 
बैठि हरिअ बहु रघुबर बामा । भयउ जुगल जुग पूरनकामा ॥ 

पट पल्लब बल कृत कल कुंजे  । पढिहिं बेद मुनि कल धुनि गुंजे ॥ 
हवन सँजोबल भूसुर भाखी । गहहि अगन सुख आहुत साखी ॥ 

परमिलित कुअँरि परिमल करतल कुँअरु पानि गहन कियो । 
किए बेद बिधान लोक सहित जनि जनक कनिआँ दान दियो ॥ 
पट पल्लब जोरि दोउ बिधिबत लेइ लगि  कल भाँवरी । 
 सुनि बंदी मुख बिबिध हरष सुरगन  कुसुम झरि करि हरिअरी  ॥ 

दुलहिन  बर अनुरूप लखि परस्पर सकुचित हियँ । 
सिय बर लगन अनूप निरख  निज नयन सबहि कहि ॥ 

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३३ ॥ -----


शनिवार,१६ मई २०१५                                                                                     

एकु साधन उपदेसौ ऐसा । मिटे तासोंहि सबहि कलेसा । 
राम सरिस अरु देउ न कोई । राम सरिस अरु ब्रत नहि होई ॥ 

तासों बढ़के  जोग न दूजा । राम जाग जप रामहि पूजा ॥ 
 राम नाम मुख जो जपधारी । होत  परम पद के अधिकारी ॥ 

तासु नाम जिन हरिदै  आवै । तीन लोक के संपत पावै ॥ 
दीन दुखित जन के दुखनासी । राम नाम एक सुख के रासी ॥ 

जोमन सुमिरत राम ध्याने ।  भजनान्द भगति फल दाने ॥ 
सकल  देउ मैं एक रघु नायक । मनस्कान्त मनोरथ दायक ॥ 

सुरत  राम उर नाम मुख लाए । चण्डालहि परम गति को पाए ॥ 

धाम परायन बेदु बिद, मुनिबर तुहरे सोहि । 
पार गमन भाव परम पद बहोरि काहु न जोहि ॥

रविवार, १७ मई, २०१५                                                                                                    

गूढ़ रहस  एहि प्रगस बखाना । तव सम्मुख मैं निज अनुमाना । 
अजहुँ भए जस तुहरे बिचारा । करिहौ तेसेउ ब्योहारा ॥ 

रघुकुल मैं एक नाम  प्रबेका । तिनके पूजन बिधि जग  ऐका ॥ 
राम देउ एक अबरु  न दूजा  । एकही  ब्रत तिनकी पद पूजा ॥ 

एकही मंतर रघुबर नामा । एकहि धर्म तिनके गुन गामा ॥ 
भजनन जब तुम सब बिधि  बरिहौ । राम नाम  कीर्ति मुख धरिहौ ॥ 

तब तव हुँत भव सिंधु महाना । होही तुहिन गउ खूर समाना ॥ 
अस कह लोमस  मुख उरगावा । बहुरि प्रसन मैं पूछ बुझावा ॥ 

भव तरन जस तुम बरने एकै राम भगवान । 
भगवदीय तिन्हनि मुने  पूजिहि केहि बिधान ॥ 

सोम/मंगल ,१८/१९  मई २०१५                                                                                      

 सुनि  मोर बचन सुबुध सुजाना ।क्रत आपही राम ध्याना ॥ 
प्रभु पद पदुम लीन लय  लायो । बहुरि मोहि सब बात बतायो ॥ 

करे ध्यान साधक एहि भाँति । धरे हरिदै धीरज  बहु  साँति ॥ 
अबध पुरी मन सुरत बिचारेँ । बैठिहि बैठिहि पैठ दुआरे ॥ 

गिर बन कानन जहँ  भरपूरी । परम बिचित्र मंडप रचि रूरी ॥ 
कनक कलस कंकनि खंकारै । संख पुरत मुख राम पुकारे  ॥ 

भीत कलप तरु दरसित होइहि । मँगे जोइ सो सो देवइ सोइहि ॥ 
मूल भाग सिंहासन राजे । तापर श्री रघुनाथ बिराजे ॥ 

ललित लालरी  मनि हरी हरी रसरी के भंबर परे । 
धबल धौरहर बसन सरोबर नीलरत्नांग तरे ॥ 
तीर तीरजोपर रजि रबिकर छबि के हीर घरे । 
कलित कियारी कौसुम कलिबर हरबत पत पत प्रहरे ॥ 

दुइ पुर हाथा चौपद साथा अलिप्रिय आसन बंध्यो । 
सिखर सिरोघर तमस काँड हर सिखाधर मिहिर मण्ड्यो ॥ 
मनसकामद सबहि बिधि सम्पद् सुखद अतिसय सुन्दरम् । 
तापर राजित दसकंधर जित करुणासील रघुवरम् । 

कंबु-कर्पूर-वपुधर धवलम्  दुर्वादलम् सम स्यामलम् ॥ 
शेष-शंकर मुनिवर मनोरम सुरेन्द्र कर वन्दितम् ॥
मनोजवि वदन पूर्णेंद कमन कांत निंदये |
ललाट चित्तचोरकम्  दिव्यार्द्ध चन्द्रये ॥

कुंडलित केश काल शुभाकृत भाल विभूषित लोलिते  ।
मकराकारम् कर्णपूर मौलि मुकुट-अलंकृते ॥
वदन सभा सद दंष्ट्रासित रद वेद वाचस्पतये ।
जपा:कौसुम प्रभासभास काशि कास प्रकाशिते ॥
रसन मृणालय रसालयाधरालि वल्लभ विलासितम् ।
शंखाकृत कंठ कलित  नय निगमागम निवासितम् ॥ 
पर्णावास वर्णानुप्रास सुभाष पाश सुषोभिते  । 
पर्ण पर्ण  वर्णोद्दष्ट कर्ण वर्ण वर्ण सुमंत्रिते ॥

ऊर्जस्वान् ऊर्ध्वमान केसरी भुज शेखरौ ।
कल केयूरौ कटकाङ्कितौ विशाल बाहु धारणौ ॥
उर्मिकाभिर्भूषितौ उषपकर ऊरू लम्बने ।
विस्तीर्ण वक्षो लक्ष्याधिप लक्ष्मीश: शुभ शंसिनौ ।।

श्रीवत्साद्य लक्ष्माद्वमन मनोहरम् शोभाकरम् ।
सुवक्षणावर उदरोपर वलग्न नाभ् विराजितम् ॥
मणि काञ्चनाय मणींद्राय मध्य-स्थली मण्डले ।
सौंदर्य वर्च् वर्द्धनाय् ऊरु सन्धिन् निर्मले ।।
 कोमालाङ्कुशेनाङ्गुले सुलेखायवरेखया ।
ध्येयध्यानिनौ युतान्वित पद प्रतलोति मृदुलया ॥

जय जय जय करुनानिधे रघुबर दीन दयाल ।
जयति जग -वंद्याग्रणी जय जय भगत कृपाल ॥

राम रूप कर्ण अधार राम नाम करतार ।
अस साधन सों होइहउ तुअ भव सागर पार ॥ 

रविवार, २४ मई, २०१५                                                                                                     

प्रभु अस्तुति  रस सरस सुहावा । सीकस मन रसमस सुख पावा  ॥ 
रसातले रोमाबलि ठाढ़ी । पुनर पयस के लालस बाढ़ी ॥ 

कहत  अरण्यक हे मुनिराया । रघुपति कथा कहहु करि दाया ॥ 
सतगुरु  अपने सेबक ताईं  । पूछिहु सो सब कहत बुझाईं ॥ 

मुनिबर जदपि बहु भाँति प्रबोधिहि  । कहौ बहुरि सीस समझ अबोधिहि ॥
जहँ कछु संसउ मन मोरे । करौ कृपा  बिनवउँ कर जोरे ॥ 
सो कारन  मो कहौ बिचारा ।  निर्गुनि ब्रम्ह सगुन बपु धारा ॥ 
राम अवतार होइहि काहू । लघु विरदावलि मोहि बुझाहू ॥ 

कहौ मुने सो चरित अपारा ।बसे बिपिन किमि रावन  मारा ॥ 
रजे रजासन जस सुख सीला ।कहौ मो सहुँ सबहि  सो लीला ॥ 

राम रहस रस अबर अनेका । कहौ सकल अति  बिमलबिबेका ॥ 
जो सेबक आरत अधिकारी । साधु सुजन जन  देइ निबारी ॥ 

जो बचन मैं पूछा नहि राखिहु मुने न गोइ । 
कृपा करत कहिहहु तिन्ह होहि अबरु जो कोई ॥ 

सोमवार,२५ मई २०१५                                                                                        

 जो भगवन भाव भूषन रूपा । हितकर बिमल बिधौ सरूपा ॥
पत्र पुष्प गंध  फल जल चन्दन ।  लेइ तिन करत प्रभु पद वंदन ॥

रसनासन श्री राम विराजे । होइहि सरल सहज सब काजे ॥
भक्ति सिंधु जो नित अवगाहें । तीन लोक के सम्पद लाहैं ॥

जाना परम भगत जब तोही । मोरे मन मानस  रस रोही ॥
हंस नाद किए उठे तरंगे । किए संगत श्री राम  प्रसंगे ॥

 संभु सनक सुक सेष मनीषा । बंदउ जासु चरन बागीसा ॥
सकल जगत आरत  जब जाने  । अवतरत निज कीरति बिताने ॥

जो जग मोहन जो जग दीसा । तपोधन जोगीस के ईसा ॥
सगुन रूप ए हेतु अवतरिहीं । जब मनु तिनकी कीरति करिहीं ॥

यह भव सागर गहन अपारा । श्री राम रूप करणाधारा ॥
होत दुखारत करिए पुकारिहि । करनधार तिन पार उतारिहि ॥ 

सक्ति सरूप दयामयी अल्हादिनि श्री  संग ।
चारि श्री बिग्रह धरे अस, प्रगसे भुइ श्री रंग ॥ 
बृहस्पतिवार, २८ मई २०१५                                                                                                    

हरि गन अगणित अमित अपारा ।कहउँ तदपि निज मति अनुहारा ॥ 
राम जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र सब एक ते ऐका ॥ 

तसु जनम के अगध  कहानी । सावधान सुनु सुबुध सुजानी ॥ 
द्रवउ दसरथ अजिर बिहारी  । राम नाम जग जस बिस्तारी ॥ 

पुरइन  काल त्रेता जुग मही  । दिनकर बंस धारक जन्मही  ॥ 
 जब बपुधारे । मुनिबर मंगल मंत्र उचारे ॥ 

जनम लियो जय जय रघुबीरा कामनई घन स्याम सरीरा ॥ 
मनुज रूप प्रगसे श्री कंता । दरस नयन हरषे सब संता ॥ 

करुना सुख सागर सहित दरस चारि सिसु भ्रात ।
अवध पुर पुरंजनी सन,गद गद भए पितु मात ॥  

सुने  जनम बन कानन कानन । फूर पात भए प्रफूरित नयन ॥ 
चली सरजु बहु सरस सुहावा । चारिहि पुर नुपूर सुर छावा ॥ 

मधुर रुदन जब देइ सुनाईं । बहती कहती जहँ तहँ धाई ॥ 
गफर घर मनहर बाजि बधावा । दिए भूप जो जेहि मन भावा ॥ 

चले बाल हरी पायहि पाया । मयन बदन ओदन लपटाया ॥ 
हरि हरि हरि जब भयउ किसोरा । मनस्कान्त रूप चित चोरा ॥ 

बाहु सिखर धनु कंधर भाथा । रहे सदा लखमन तिन साथा ॥ 
तदनन्तर पितु आयसु दाने । पढ़ें सबहि गुरु गेह पयाने ॥ 

गुरुबर के अनुहार किए ऐसेउ ब्यबसाए  । 
बहोरि अल्पहि काल मैं बिद्यानिधि कहलाए  ॥ 

 शुक्रवार,२९ मई २०१५                                                                                                   

लखन सहित पुनि अंतरजामी । गाधि तान्या के भए अनुगामी ॥ 
असुर हनन मख राखन रायो । दोनउ सुत महर्षि कर दायो ॥ 

स्याम गौर भ्रात अति सुन्दर । जितबारु रहे दुनहु धनुर्धर ॥ 
पीत पट  कटि भाथ कसि लस्यो  । जेहि दरसिहि तेहि मन बस्यो॥ 

निसा घोर घन तम गम्भीरा । चले जात मुनिबर रघुबीरा  ॥ 
बहुरि भयंकर बन भित पेले । तहँ ताड़का राकसी मेले ॥ 

हँस हँस करकस करक हँकारै । बारहि बार बिघन मग डारै ॥ 
प्रभो मुनिबर  के आयसु पाए । मार तेहि परलोक पैठाए ॥ 

लगे मुनि घर हवन करन राम लखन रखबारि । 
धाए मारीच बिघन किए गर्जन कर अति भारि ॥ 

शनिवार,३० मई २०१५                                                                                                 

फरहीन सर ऐसेउ मारा । गिरे  सत जोजन जलधि  पारा ॥ 
सुबाहु निसिचर के लघु भ्राता । चढ़े अगन सर करे अघाता ॥ 

मरे असुर सब निर्भय होईं ।  अजहुँ  मुनिरु न सतावहिं कोई ।| 
आगिल भेँटिहि  गौतम नारी । श्राप बिबस पाहन तन धारी ॥ 

सचिपति संग कीन्हि प्रसंगा । श्रापत् मुनि भए पाहन अंगा ॥ 
रघुबर चरनन जब परसाई । बहुरि जथारथ रूप लहाई ॥ 

दरसत रघुनायक कर जोरी । गई पति लोक नाथ बहोरी ॥ 
जहाँ निवासिहि जनक तनीआ ।चले सोई पुरी रमनीआ ॥ 

किए सांगत मुनि संत समाजे । भँवरत भूपत भवन बिराजे ॥ 
धरे सभा तहँ पंथ निहारे । संभु धनुष निज खंडनहारे ॥ 

 चितबहि चकितहि जनक जिमि,चितबत चंद चकोर । 
पूछत परिचय दीठवत दसरथ राज किसोर ॥ 


































----- ॥ उत्तर-काण्ड ३२ ॥ -----

शुक्रवार ०१ मई, २०१५                                                                                                     

दरसै चहुँ दिसि काल सरुपा । उग्र सन अन गन दनुज कुरूपा ॥ 
बिगलित बसन बिगलितहि केसा । बिडालित नयन बदन कलेसा ॥ 
चारों दिशाओं में काल स्वरूप उग्र दंष्ट्र के सह अनगिनत भयंकर दैत्य दिखाई देने लगे । वे सभी चितरित केश लिए नग्न अवस्था में थे उनकी लोचन विडाल के सरिस थे उनका वादन पीड़ा देने वाला था ॥ 

को मुख हीं बिपुल मुख काहू । बिनु पद कर को बिनु पद बाहू ॥ 
बिपुल नयन को नयन बिहीना । रहेउ एकु एकु दरसिहि तीना ॥ 
कोई तो मुख हीन  कोई बहुमुखी था कोई चरण व् हस्त से रहित कोई चरण व् भुजाओं से रहित था ।  कोई नयन  से रहित कोई बहुंत से नयन लिए था,  वे  सभी एक के तीन दिखाई दे रहे थे ॥ 

तेहि समउ रघुबर के बाँकुर । ब्याकुल मनस  भयउ भयातुर ॥ 
छल छादन ऐसेउ भयाने । भरमत एकु सों एकु भय माने ॥ 
उस समय रघुवीर के रन बांकुर व्याकुल मनस से भयभीत हो उठे । चाल के आच्छादन ने ऐसा भय व्युत्पन्न किया कि भ्रमवश वे एक दूसरे को ही शत्रु मान परस्पर शत्रुता कर बैठते ॥ 

 बरषि धूरि कीन्हेसि अँधियारा ।सूझ न आपन  हाथ पसारा ॥ 
भट लोचन माया अस देखे । सब कर मरण बना एहि  लेखे ॥ 

समुझत भा उत्पात महाने । दीठ पीठ सब निज हित जाने ॥  
मुठिका मैं रथ रस्मी धारे । सत्रुहन जी तब आन पधारे ॥ 
यह संज्ञान करते हुवे कि कोई भयंकर उत्पात हुवा है दृष्ट पृष्ठ में ही सबने अपना हित जाना । तभी मुष्टिका में  रथ की रश्मी कसे  शत्रुध्न का आगमन हुवा ॥ 

प्रथम नाउ भगवान, प्रनत नयन सुमिरन करे । 
धनुर बन संधान, पुनि रन भू निरखत चरे ॥ 

सर्वप्रथम उन्होंने  प्रणमित नयन से भगवान श्रीराम का स्मरण किया  । तत्पश्चात  धनुष में बाण का संधान करते हुवे समस्त रण भूमि का निरिक्षण करते चले ॥ 

अमित तेज बर बिक्रम सँजोऊ । तिन तूल तेजस्बी न  कोऊ ।| 
कराल रूप राकसी माया ।  भवबत काँपत अनि अतिकाया  ॥ 

सत्रुहन  मोहनास्त्र चलाईं । महाभिमानि गई बिनसाई ॥ 
करक नयन पुनि गगन निहारे । लखत  असुर सर गन बौछारें ।| 

चरत चमक ऐसेउ चकासे । प्रभा हीन सब दिसा प्रभासे ॥ 
नभस केतन तमस लिए घेरी । हक्कारत हत हेर निबेरी ॥ 

हीर मणि मुख हिरनई  पाँखी ।लाकहि बन जन पर लाखीं ॥ 
काल सरप जनु चले सपच्छा । भीतर थित राकस कर लच्छा ॥ 

लगत जान पख काटि निबारे । किए खान खंडित महि महु डारे ॥ 
छितरित जान बिलोकत कैसे । पच्छ हीन मंदर गिर जैसे । 

बिमान नसेउ जान तब राकस भयउ रिसान । 
सत्रुहनिहि भाव प्रतिरूप  करे बान संधान ॥ 

शनिवार ०२ मई २०१५                                                                                           

कालरूप धर गहि कर राका । रहे बिकट सम सलक सलाका ॥
भरे मुठी धनु  गन अस राखिहि । सीध बँधे रामानुज लाखिहि ॥

भर बहु घमन गरज किए ऐसे । कल गहन घन गरजत जैसे ॥
सत्रुहन भुजहु बहुल बल जोगे । बाजजु बाजबास्त्र  प्रजोगे ॥
वाजयु = शक्तिशाली

द्युतिगति गत बियत ब्यापे । दनुज कटक  तन थर थर कांपे ॥
प्रपत तमकत तीख जब ताका ।  जहँ तहँ भागि चले सब राका ॥

सन्मुख होइ न सके ते अवसर । धावै सरपट चरन सीस धर ॥
लगे गात आजुध बिकराला । खात अघात  भूत बेताला ॥


नयन नासिका मुख करन सीस केस बिथुराए ।
वियतगत पतत बाय सम निपतत देइ दिखाए ॥ 


रविवार ०३ मई २०१५                                                                                                  

बिलोकत अजुध बिकट कराला । दुर्बादत सो दनुज ब्याला ॥
 पासुपत नाउ अस्त्र प्रजोगे । धनु  मुख  जीवा जोग बिजोगे ॥

नभ चढ़ि बरखि बिपुल अँगारी । रघुबर बीर बिधुंसन कारी ॥
चपर चरत  चहुँ कोत ब्यापे  । ताप दहत दिग कुंजर कांपे ॥

सत्रुहन तेहि ब्यापत लेखे ।निज दिग कुंजर काँपत देखे ॥
धार सत्र एक नाउ नरायन । छाँड़त तुरवत करे निवारन ॥

जारन जवान अगन कण जोई । सकल अजुध छन सीतल होई ॥
भयउ गगन अस बाण बिलीना । होत बिलीन मीर जस मीना ॥

भरे बदन अति रोष बिद्युन्माली निरख एहि ।
एकु त्रिसूल  कर कोष,हतन सत्रुहन ठान धरे ॥ 

मंगलवार, ०५ मई २०१५                                                                                                  

धरे हाथ एकु सूल बिसेखे । निसिचर जब नियरावत देखे ।|
लिए एक सर अध चंदू अकारे । काटि सूल सत्रुहन महि डारे ॥

कुण्डल कलित कल कारन सहिता । हरि कीर्तन सन श्रवन रहिता ॥
हरि दरसन बिनु लोचन संगे । देहि साथ किए सीस  विभंगे ।|

 देखि भ्रात अस भंजित गीवाँ । बढ़े करत उग्र छोभ अतीवा ॥
गरज घोर कर यहु कहि आवा । अस बांकुर मैं बहुंत खिलावा ॥

कास  धमूका धमक जब  धाए  । सत्रुहन खुरधारि बान चलाए ।।
लागिहि कंठ उरे नभ माथा । परे भुइ तन चरन  कर साथा ॥

बिलगित सिरु के साथ  दोउ देहि महि पर परे । 
राकस भयउ अनाथ दोनउ दल पत के मरे ॥ 

बुधवार, ०६ मई २०१५                                                                                        

 आए सम्मुख सबहि  जुग हाथा | डरपत धरि सत्रुहन पद माथा ॥
तासु बड़ेपन  बोले नहि नहि । कह अस पाँमर अरु अति डरपहि ॥

बाहु बली कहँ तुहरे नाईं । हत मति हमरे पति चढ़ि आईं ॥
भरे घमन सिरु मति नहि आहू  । करुना करत हमहि छम दाहू ॥

सरनारपक  पर कृपा कीजो  । अभय दान प्रस्तर कर दीजो ॥
अस दनुज हय किरन कर लीन्हि । सादर चरन समर्पन कीन्हि ॥

श्रुतत दनुज के करून पुकारी । सत्रुहन के हरिदै भय भारी ॥
करुनाकर रघुबर के नाईं । रामानुज सबहि छमा  दाईं ॥ 


मधुर मनोहर जय निनाद कर बिजित कलस अलंकृते ।
सबहि सेन दल बल बल मर्दल हनत कुनिका झंकृते ॥
 
मंद ताल  दय रे रतिमय मंजुल मजीर मुरज उठे । 
चहुँपुर श्रुतिसुख  भट मयूख मुख संख सुर भर बज उठे ।। 



सर चाप कर सूल भिटक बर बीर बपुर्धर सोहहीं ।
घन अलक अछादन तड़ित नयन बदन छबि मन मोहहीं ॥ 
पीत परिकर उपबीत कटि पर रन आभूषन सज उठे । 
लसत लहलहत सुबरन  रजत नभ रंजत रज रज उठे ॥ 

अह नय रवनय सब बीर बलय सुरमय जय घोष करे ।
 है गज राजे पादुक छाजे साजे चातुरंग रे ॥
 अगज जगज लग घन घन सम गरज उठे   
सहस किरन  निन्दत गरुअत गज गामिन के ध्वज उठे । 

हरि हरि मुँगिया मनहरि मुतिया भरि कीर्ति श्री राम की । 
गूंथ गहरी सब कंठ घरी सुर माला सुख धाम की ॥ 
दुर्जय दनु प्रमय होत अभय अरुनोदय सूरज उठे ।
प्रसन्नचित पयासय लीन लय पल्लबित पंकज उठे ॥


किसलय कौसुम कर भरे, चढ़े  जान सुर  जूथ ।
गह गह धरापर बरखिहि हरसिहि बीर बरूथ ॥ 

अतिसुरभित सुख बास सों  ओतप्रोत चहुँ कोत । 
कटक पल्लबाधार भए पल्लब पल्लब होत ॥ 
पल्लवाधार = शाखा 

बृहस्पति / शुक्र , ०७ /०८ मई २०१५                                                                                   

अपहर्ता दनुज तैँ हय जब पाए । पुष्कल सहित सत्रुहन हरषाए ॥ 
दुर्जय बिद्युन्माली मारे । परम प्रबल दानउ दल हारे ।। 

रामानुज सैम बीर न होई । जय जय रघुबर कहँ सब कोई ॥ 
यह समाचार बहु सुख दयऊ । सबहि मुनि निर्भय होइ गयऊ ।।

चले सत्रुहन सैन सह आगे । चलेउ भूपत रथ सन  लागे ॥
बहोरि जवन किरन  जब छाँड़े ।  उदकत पद उत्तरु दिसि बाढ़े ॥

मुकुट किरन  भए हर्श अपारा । चपर चरण चहुँ कोत  बिहारा ।
रहि रन भूषन जासु अधीना । रहे सबहि सो बीर प्रबीना ॥

सब पथ सजयो जब रथ रजयो गहे करष कर सारथी । 
लपटत परन चरनन्हि परयो रजत रजतंत रथी ॥ 
 वियद गत  भामरत आयो तहाँ 
क़हत अहि पत नर्बदा नद निरापद  बह आई जहाँ ।

कंकन जलके पदुम पत तल के तरंगित माल पुरयो  । 
हरिअर चलके सुर कल कल के कानन्हि कलित करयो ॥
भई बसतिमय बसि अतिसय रिसि महरिसि के समाज से ।
नील रतन रस दए अस दरस जलाजल के ब्याज से ॥

चहु कोत ब्याकुल कंठ पयस दरस के आस ।
पयसिनी सहुँ होत प्रगस  दय पय हरे प्यास ॥

चितबत चित्र सब  नयन उरेहे  । एकु पुरनइ कुटि दरसन देहे ॥ 
रहे पलासित परनाधारे ।उहरित लोचन  परन  उहारे ॥ 

सरन सरन सरसिज सरसौंहे । सरस मयूखि सरिन्मुख मोहैं ॥ 
सींकत जल सीकर जब परसे । हलबाट तपरत पत पत हरसे ॥ 

चातुर भद्रक परम ग्यानी । सत्रुहन दरस नील रस पानी ॥ 
जिग्या  ने पय  प्यास जगाए । नय कुसलय सुमति समुख जताए ॥ 

महानुभाव बिलोकत जोई । परन गह सो  केहि के होई ॥ 
सुमति कहए जो तट दरसायो । तहँ एकु मुनिबर ओक बसायो ।।

जप तप संजम  नेम रत सो सेअहिं परलोक । 
प्रभु पदानुरत जग बिरत, भूर सबहि सुख सोक ।। 

शनिवार, ०९ मई २०१५                                                                                          

बिरति बिबेक बिनय बिग्याना ।बोध जथारथ बेद  पुराना ॥ 
तापर मन मद मान न कोऊ । तेहि सम ग्यानद एकु दोऊ ॥ 

जे जी जो को पाप जनावा । तिनके दरस धुअत  दूरावा ॥ 
मुनि के अरण्यक सुभ नाऊ ।  तीरथ ए तासु तपस प्रभाऊ ॥

जे चितबन् दरपन मलियानी। मुनिबर के छबि मलिन  नसानी ।|
एहि हुँत प्रथम चरन सिरु नाहू । निज संसय तिन ताहि बुझाहू ।|

सोए मुनिस्वर रघुबर ही के । तुहरै सम अनुचर सिय पी के  ॥
कमल नयन के पदारबिंदा ।रसिक 
रूप रसत  मकरन्दा ॥

बौमित बपुरधर बन घर किए अस  तप घन  घोर । 
रयनि के रोर न जाने भोर न जाने भोर ॥


सोमवार, ११ मई,२०१५                                                                                                                    

सुमति रसन बर बरन सुहाने| धर्म जुगत एही बचन बखाने ॥
बहोरि सत्रुहन पालक न होरे । करे संग में  अनुचर थोरे ॥

बिनीत भाव उर नयन निहोरे । चले पयादहि दुहु कर जोरे ॥
सकल जन  प्रबिसत  तपो धामा । बिनत नयन तिन करे प्रनामा ॥

रघुबर अनि निज सम्मुख पाईं । मुनि हतप्रभ मुख पूछ बुझाईं ॥
भयऊ कहाँ सँजोग तिहारे । कहौ इहाँ  कैसेउ पधारे ॥ 

मुनिबर  नयन प्रसन जब देखे ।  भरे मुख बचन  भाउ बिसेखे ॥ 
बागबिदग्ध सुमति नत सीसा । होत बिनय बत कहे  मुनीसा ।। 

अधुना सकलित जोउ सब प्रभु मख बीड उठाए । 
हय  रच्छनरत यहां हम आपनि दरसन आए ॥ 
इस समय भगवान श्रीराम चन्द्र जी ने अश्वमेधीय यज्ञ के अनुष्ठान का संकल्प लिया है । एतेव त्यागे गए मेधीय अश्व की रक्षा करते हम यहाँ आपके दर्शन हेतु उपस्थित हुवे हैं ॥

बुधवार, १३ मई,२०१५                                                                                            

सकल बिबिधसुभ  साज सँजोई । स मख करि किछु लाह न होई ॥ 
अस सत्कृत अल्पहि पुन दावैं ।  करता छनु भंगुर फल पावैं ॥ 

रमानाथ रघुबीर हमारे । वैभव पद के देवनहारे ।। 
तिन्ह तजत अन्यानै पूजे । ता समतूल मूरख न दूजे ॥ 

एकु रघुबर के सुमिरन सोही  । परबत पाप  राइ सैम होंही ॥ 
जो भगवन के चरन  त्यागे ।  जागादि प्रपंच माहि लागे ॥ 

जे ब्रत बिरथा धरत कलेसा । प्रभु अद्वैत अगुन हृदयेसा ॥ 
सकाम  पुरुख हो कि निहकामा । चिंतहि चितहि सदा श्री रामा ॥ 

सीस चरन धरि  मन नुरति मुख प्रभु नाउ  धराए । 
हरिदै बसति बसाए के  सकल पाप दूराए ॥ 

 बृहस्पतिवार, १४ मई, २०१५                                                                                          
एकु समय मैं ग्यान  पिपासू । महा तत्त्व पयस अभिलासू  ।। 
तीरथ तीरथ डेरा डेरा । सद ग्यानदा भरमत हेरा । 

ते अवसर पुनि मोहि एकु दिवस । मुनिबर लोमस मिलिहि भागबस ।। 
 तीरथ सेवन हेतु मुनिराए । सुरग लोक तर भँवर तहँ आए ।। 

तासु चरन मैं करत प्रनामा । परच देत कहेउँ निज नामा ॥ 
रहे आसु मोरे मन माहीं । पूछा तिन तैं कह गोसाईं ॥ 

यह अद्भुद मनस तन धारे । होइहि कस भव सागर पारे ॥ 
मन मानस यहु जगी पिपासा । ग्यान पायस तुहरे पासा ॥ 

तुम उदक बाह मैं उद बाही ।तुम ग्यानदा अरु मैं गाही ॥ 
मोरे कहे बचन दए काना । बहोरि बोले मुनि  बिद्बाना ॥ 

मोर कहि बत भाव सहित सुनिहौ धरे ध्यान । 
जोग  जाग जम ब्रत नियम,अरु एक साधन दान ।। 

शुक्रवार, १५ मई, २०१५                                                                                    

पार गण भव साधन नाना  । मैं संछेप सरूप बखाना ॥ 
साधन साधकता जो जाने । चढ़त जान सो सुरग पयाने ॥ 

एकु अबरु रहस्य जानत अहिहउँ ।तुहरे सम्मुख प्रगसत कहिहउँ ॥ 
सबहि पाप जो देइ  नसावै  । भव सिंधु सो पार लए जावै । 

भगवन पद रति भगति न जानिहु  । तिन्हनि ते उपदेस न दानिहु ॥ 
दंभि सदा मद मूरख लोगे  । कहु त कहँ उपदेस के जोगे ।। 

करे जो भगति संग द्वेसा । अस  साटक हुँत नहि उपदेसा ॥ 
तन पट सुचित कपट  मन माही । तिन्ह सहुँ  ए उपदेओ नाही ॥ 

चारारि के वसति रहित बेस जोइ उर साँति ।
अस भगत एहि  गूढ़ रहस बरन कहौ सब भाँति ।।