Friday, 22 April 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५१ ।। -----

शुक्रवार,२२ अप्रेल, २०१६                                                                                 

प्रथम तुम रथारोहित होहू । तव सों पुनि लेहउँ मैं लोहू ॥ 
तुहरे दिए रथ गहत बीरबर । रन करिअन जो चढिहउँ तापर ॥ 

त लगिहिं बहुतक पातक मोही । बिजय सिद्धि मम सिद्ध न होहीं ॥ 
जद्यपि जति मुनि सम ममभेसा ।जूट जटालु जटिल कृत केसा ॥ 

तथापि छतरिय धर्म हमारा । करैं सदा हित सत्कृत कारा ॥ 
हम स्वयमही निसदिन दाहैँ । दिया लेइँ सो बम्हन नाहैं ॥ 

मोर दसा कर करिहु न चिंता । तुहरे रथ करि देउँ भंजिता ॥ 
होहिहु तुम्हहि पयादित पाएँ । भयो जस तव पुरबल दल राए ॥ 

पुनि रन हेतु पचारिहु मोही । ताते भल कहु बत का होही ॥ 
धर्मतस लव केरे बखाना । धीर जुगत कहिबत दे काना ॥ 

पुष्कल तब बहु बेर लग चितबत चितवहि ताहि । 
करिए कहा क कहा समुझ परे कछु नाहि ॥ 

चेतत धरि कर चापु उठाना । पनच चढ़ावत पुनि  दर्साना ॥ 
कोपत लवहु बानु अस मारे । किए छन दोउ खण्ड महि डारे ॥ 

गहे धनुष अपरंच बहोरी । औरु लगे जबु  करषन डोरी ॥ 
तब लगि उदयत सो बलवाना । करिहि भंजि तृन समतुल जाना ॥ 

धनुष हस्त कटि कसत निषंगा । हँसत हँसत किए रथहु बिभंगा ॥ 
भए धनु छिनु महु छीती छाना । भिरिहि  परस्पर दोउ बिहाना ॥ 

कबहुँ त  लव बढ़ बढ़ सर छाँड़े । कबहुँक पुष्कल अगहन बाढ़े ॥ 
नयन भवन ज्वाल कन जागे ।  अतीव बेगि जुझावनु लागे ॥ 

बहोरि लव लवलेस महुँ तीरत बान निषंग । 
दरसिहि दंतारि अस जस, को बिषधारि भुयंग ॥ 

शनिवार, २३ अप्रेल, २०१६                                                                                        

बान रूप सो बिषधरि नागा  । फुंकरत जूँ धनु  रसन त्यागा ॥ 
फुकरत फन लहरात परावा । धँसे भरत सुत उर दए घावा ॥ 

बीर सिरोमनि मुरुछा गहयउ । पीर परे मुख महि गिरि गयऊ ॥ 
गयउ अधोगत कटक मनोबल । भयउ हताहत दलपत पुष्कल ॥ 
दलपति वीर पुष्कल के हताहत होने से सेना का मनोबल गिर गया है ॥ 

हत चेतस गिरि दिए देखाई । पवन तनय तुर लेइ उठाईं ॥ 
करभर बाहु सिखर धर ताहीं । आयउ पुनि रामानुज पाहीं ॥ 

अंकबारि करि तासु सरीरा  । अरपिहि चरन त भयउ अधीरा ॥ 
पितिया सोंह न गयउ बिलोका । करिहि प्रलाप चित्त गह सोका ॥ 
उनके अचेत शरीर को अंकवार करते हुवे, रघुवीर के लघुत्तम ब्राता शत्रुधन को अर्पित किया ॥ 

नयन गगन दुःख घन गहरायो । पल्किन झलझल जल झलरायो ॥ 
जगिहि कोप बिजुरी बिकराला । दमक दमक मुख जगइँ ज्वाला ॥ 

हतास्वासश्रय सिरु नायो । का करैं अजहुँ समुझि न पायो ॥ 
तत्छन सत्रुहन मन कछु लेखे । पुनि पवन सुत हनुमत मुख देखे ॥ 

वह निराशा के आश्रय होकर फिर उन्होंने अपना सिर झुका लिया ,आगे कौन सी नीति अपनाई जाए उन्हें यह  समझ नहीं आया । वे थोड़ा रूके और कुछ मंथन किया, फिर वायु नंदन हनुमान का मुख देखें लगे ॥ 

बहुरि आयसु दत्त कहइँ महा बीर हनुमंत  । 
समर भूमि अब आपहीं  जाएँ लेउ लव प्रान ॥ 

मंगलवार, २६ अप्रेल, २०१६                                                                                      

जिनके ग्यान  अमित अनंता । मरुति नंदन दास हनुमंता ॥ 
रिपुहन अग्या सो गुनवंता । कोपत रन भुइँ गयउ तुरंता ॥

पैस तहाँ बल पौरुष जागिहि  । बेगि लवहि सैं जूझैं लागिहि ॥ 
सीध बाँध सिरु माथ निहारिहि । लच्छ भेद एकु बिटप प्रहारिहि ॥ 

भँभरत निज पर आवत देखा । छाँड़ेसि सोउ बान बिसेखा ॥ 
बज्र घोष इब गरज अपारा  । मुख भरि सतक टूक करि डारा ॥ 

गहि गहि गरुबर भूधर खण्डा । झपटत झट सिरु मारि प्रचंडा ॥ 
देइ गिरि खन घाउ पर घावा । लह लस्तकि लव हस्त उठावा ॥ 

बान बृष्टि कृत रज रज कीन्हि । उठैं धूरि कछु दरस न दीन्हि ॥ 
धुर ऊपर घन धूसर छायो । रन रंगन तब अति घहरायो ॥ 

जुलुम केस बलि लाँगुली पुनि लमनात । 
अहि निदरित कुंडली कृत सियसुत लेइ लपेटि ॥ 

चरन सरोज जनि जानकी के । सुमिरत मन मन मारि मुठीके ॥ 
बाँधेउ लवहि कुंडलित पूँछी । मुकुत तासु कास बल सहुँ छूँछी ॥ 

छूटत बहुरि बीर बलवाना । तमक ताकि तकि तकि हनुमाना ॥ 
बान बूंद सम बरखन लागे  । बोलि धार बन प्रान त्यागें ॥ 

बनावरी लव केरि चलाई । देत पीर भा बहु दुखदाई ॥ 
सकल बीरबर केर निहारे । हनुमत मुरुछा गहि महि पारे ॥ 

लव सम बान  त्याजन माही । तहँ अबरु को दरसहि नाही ॥
चरत सो ऐसेउ चहुँ  दीसा ।  लगे बधन बधछम अवनीसा ॥ 

हनुमत मुरुछित भए  मुने समाचार जब अाहि । 
कहत सेष अरिहंत तब सोक सिंधु अवगाहि ॥ 

बृहसपतिवार, २८ अप्रेल, २०१६                                                                          

रुर रुर नूपुर चरनन पूरे ।  स्याम मनिसर रतनन कूरे ॥ 
हिरन मई रथ रसन मनोहर । बहुरि रिपुहन बैस ता ऊपर ॥ 

चले आपहि बीर सन जोरे । सहुँ बलि समबल रंग न थोरे ॥ 
जहँ अति निपुन बीर बर बंका । आए गए तहँ बजा रन डंका ॥ 

मुनि दरसिहि पुनि दिरिस अनूपा । एकु सुकुँअरु रघुबर समरूपा ॥ 
सीस जटा जुट सोहहिं कैसे । रघुनंदन बन होहहिं जैसे ॥ 

चरन त्रान बिनु जति जस भेसा । होत नरेस न अहहि नरेसा ॥ 
सिलीमुखाकर करधन कस्यो । मनोहरायत उरसिज लस्यो ॥ 

तिलक माथ तेजस बदन नयन अरुन अभिराम । 
कल केयूर कलित कर धनु दाहिन सर बाम ॥ 

नील कमल सैम स्यामल देहि । अहा मनोहर सुकुँअर कस एहि ॥ 
रघुकुल मनि सम धरे सरूपा । न त यहु भूसुर नहि यह भूपा ॥ 

बहुरि कवन सो बलबन आहीं । कहि रिपुहंत सोच मन माही ॥ 
रे मम बच्छर कवन तु होहू । लेंन तुले हमरे सन  लोहू ॥ 

नगन उत्कट भट मारि गिराए । केत न केत गए खेत पराए ॥ 
तोहि कवन जनि जनक जनावा । तव सों सुभग सील न पावा ॥ 

एही चरनतुम  भयउ जयंता । सुनु मम बचन बीर बलवंता ॥ 
जगत बिदित का नाउ तिहारे । जन चहैं सब जानन हारे ॥ 

भरि नयन अचरजु रिपुहन पूछि प्रसन एहि भाँति । 
उतरु देत लवनहि बदन गहे गहन कल काँति ॥ 

शनिवार, ३० अप्रेल, २०१६                                                                                     

देस गाँउ बन नगरी गेहू । नाम पिता कुल ते का लेहू ॥ 
हो जो तुम आपहि बलवंता । मम सों जूझत होउ जयंता ॥ 

निज भुज दल बल पौरुष गहिहउ । बरबट बाजि छँड़ा लै जहिहउ । 
नहीं ठाव तनु बल पौरुष भाई । छाँड़ै पाति बाजि गह जाई ॥ 

आस कहि उद्भट बीर बिहाना । नेकानेक बान संधाना ॥ 
माथ भुजा दल तकि तकि छाँती । तजत प्रहार करिहि बहु  भाँती ॥ 

जान बिनहि तब लव कर ताता । तिरछत भौंह कोप भर गाता ॥ 
करष  सरासन रसन चढ़ावा । सन्मुख लव अरु दरस रिसावा ॥ 

कर फेरी के करिहि पुनि गगन भेद टंकारि । 
जस दमकिहि दामिनी तस भई धूनि अति भारि ॥ 

बाल मरालहि दए जस त्रासा  । छूट रसन सर चलिअ अगासा ॥ 

पाए  पवन ज्वाल कन जागे । जाज्वलमन जलावन लागे ॥ 

बलवन भुज अस बल बरखाईं । पलक समन करि देइ बुझाईं ॥ 
तदनन्तर सो बाल मराला । छाँड़ेउ कोटि बान  कराला ॥ 

घटाटोप करि गगन पुरायो । चहुँ पुर काल घटा घन छायो ॥ 
तकि तकि किए ऐसेउ प्रहारा । रिपुहन अचरजु भयउ अपारा ॥ 

खैंच धनुष रजु श्रवन  प्रजंता । दिए निबेर सब काटि तुरंता ॥ 
देखि कटत सब जब निज बाना । सकलत गुरुबर देइ ग्याना ॥ 

रिपुहन केर कठिन कोदंडा । घात बेगि किए खण्डहि खंडा ॥ 
धरनि भयउ जस मानुष हीना । धनुधर भय तस धनुष बिहीना ॥ 

दूसर धनु धरे सर जूँ प्रचरन उद्यत होहिं । 
स्यन्दनहु करि बिभंजन तीछे सरगन सोंहि ॥ 

रविवार, ०१ मई, २०१६                                                                                                    

 बाजि कुंजर कठिन कोदंडा ।  कौटुम सहित भयउ खन खंडा ॥ 
भंजि स्यंदन दूज ल्याईं । आन धनुष कर ताल समाईं ॥ 

कोप भरि बहु बान दस मारे । तीछ मुख धरि लवहि पुर बाढ़े ॥ 
साँस सँभारन पलक न देवा । सँहारत हिय जीय के लेवा ॥ 

सिमटि सिमटि तब मन भय माने । पत आयसु ते गयउ पराने ॥ 
तत् छन गाँठिनु बाँधनि बारे । लवहि भयंकर छुरप पबारे ॥ 

भयउ बिभंजित भय जस होई । घात चढ़न रहि जोग न कोई ॥ 
पुनि एकु बन बिकट बिकरारा । अरध चन्द्रमा बदनाकारा ॥ 

धावत जात समात गात सत्रुहनहि हरिदै भवन भेद धँसे । 
भीतहि पैसि त  करिअ  हताहत देत भयंकर पीर त्रसे  ॥ 
मुख पीर भरे धनु पानि धरे रथ पीठक नीचु गिर परे । 
 सकल जुगती होइ गयउ बिफल अबिचल लव टारे न टरे ॥ 

विजयार्थि राजधिराज रिपुहन मुरुछा घारि । 
रन हुँत उद्यत होत सब  लव पर करिहि प्रहारि ॥ 

मंगलवार, ०३ मई, २०१६                                                                                                  

को छुरप को मुसल लय आने । को भयंकर सर संधाने ॥ 
को परिघ लिए बाढिहि आगें । छेपत गगन प्रहारन लागे ॥ 

कुंत प्रास को परसु प्रचंडा । सूल कृपान कोउ गिरिखंडा ॥ 
सब नृप नानायुध धरि धाईं । एही बिधि लव पर करिहि चढ़ाईं ॥ 

घाउ बजा चारिहुँ दिसि घेरी । रिपुदल खरभर भयउ घनेरी ॥ 
देखि अधरम सील रन तिनके । मारि दस दस बानु गन गिन के ॥ 

बनावरी लव केरि चलाई । छतवत इत उत जुगि महराई ॥ 
खात अघात होइ सब घायल । बान मरायल थकि अंतर बल ॥ 

केतक क्रोधी धराधिप हतबत गयउ पराए । 
क्रोध बिसरत डरपत पुनि रन भू बहुर न आए ॥ 

बुधवार, ०४ मई २०१६                                                                                            

औरब भूपत केत न केता । हरिदै धरे परे रन खेता ॥ 
जागे रिपुहन ऐतक माही । गै मुरुछा सुध बुध बहराही ॥ 

देखि हताहत सकल नरेसा । जूझत भयउ जीव अवसेसा ॥ 
बहुरि बरबट महाबलि सोहैं । पालि सँभारत होइँ अगौहैं ॥ 

बोलि बचन आवत समुहाईं । धन्य धन्य तुम रे मम भाई ॥ 
दरसन में तुम बालक जैसे ।  जूझिहु जा सों होइहु तैसे ॥ 

तुहरे समर कला कुसलाता । केहि भाँति सो बरनि न जाता ॥ 
तिरछत भौं ए  कहत रजु जोरे । दरसिहु अजहुँ बिक्रम बल मोरे ॥ 

भंजत तव दरप दरपन भूमि गिराऊँ तोहि । 
पूर न पाए जो मम पन कहहु न रिपुहन मोहि ॥ 

शुक्रवार, ०६ मई, २०१६                                                                                            
कहि अस सोइ बान गहि हाथा । लवनासुर बधेउ जिन साथा ॥ 
भयबिहबल मुख्य दन्त कराला । दरसि जनु जम दूत  दंताला ॥ 

रन उन्मत जोवत धनु जीवा । निरख माथ लोचन दर गीवाँ ॥ 
बहुरि निहारत हृदय दुआरा । तसु बिदारन करिहि बिचारा ॥ 

तेज पुंज मनिसर संकासा । चरत बान दहुँ दिसा  उजासा ॥ 
चलिए पवन तासन अतुराई । उठेउ धूरि बिपुल नभ छाई ॥ 

हहरत परबत पथ तरु साखी । फरकिहि पत पत उरि गए पाँखी ॥ 
निर्घातत नद उदधि उछाहीं । अकाल प्रलयकाल जनु आहीं ॥ 

दरसत रिपुहन रूप अस सुमिरहिं लव सो भ्रात । 
जो अजूह अजेय भएउ बयरिनु मार गिरात ॥ 

सबल दल सहुँ एकल निज पावा । बिसूरत  कंठ भरि आवा ॥ 
भाउ बिभोर भए यहु कहतेउ । एहि अवसर भ्रात तुम रहतेउ ॥ 

करतेउ को आधीन न मोही । उरझिहउँ में बंधु बिनु तोही ॥ 
लवहि बिचारत रहि एहि भाँती । तबहि मरमाघत गहि छाँती ॥ 

आन लगे सो बान ब्याला । अगन काल सरिबर बिकराला ॥ 
गह हरिदै कर मुख भर पीरा । मुरुछा लहत  गिरे महि तीरा ॥ 

बयरि बिदार निवारन हारे । मुरुछा गहि मुख मुकुल निहारे ॥ 
जीतिहि रन रिपुहन बलवंता । ताहि समउ तौ भयउ जयंता ॥ 

करधन बान सिरस्त्रान, धरे धुनुरु करताल । 
दरसन में महात्मना करतन में महिपाल  ॥ 

रविवार, ०८ मई, २०१६                                                                                       

रजता राज न अँगन न अंगा । चातुरंगनी सैन न संगा ॥ 
 रन उन्मत्त पत पाल न पाली । राम सरिस रामहि सम चाली ॥ 

साजि सकल अन्य साज समाजा । महि परि मुर्छित मुख अति भ्राजा ॥ 
बिनहि सयंदन पाएँ पयादा । सर गहि निलयन  नयन बिषादा ॥ 

रिपुहन बिभरम ताहि निहारिहि । चढ़ाए रथ लय गवंन विचारहि ॥ 
उरझित निज मित रिपु कर पासा । देखि बटुक गन भयउ निरासा ॥ 

बालक मन आरत अति भारी । गहइ निमिष महँ अति अँधियारी ॥ 
पुनि आश्रमु  सब गयउ तुरंता । मातु सिया कहि सकल उदंता ॥ 

कहत कहत संताप सों हुड़किहि हरिदै सिंधु । 
अलक पलक गहराए घन बरख उठे जल बिंदु ॥ 


































Wednesday, 13 April 2016

----- ॥ गीतिका ॥ -----

----- ॥ गीतिका ॥ -----
हरिहरि हरिअ पौढ़इयो, जो मोरे ललना को पालन में.,
अरु हरुबरि हलरइयो, जी मोरे ललना को पालन में., 

बिढ़वन मंजुल मंजि मंजीरी, 
कुञ्ज निकुंजनु जइयो, जइयो जी मधुकरी केरे बन में..... 

बल बल बौरि घवरि बल्लीरी,
सुठि सुठि सँटियाँ लगइयो लगइयो जी छरहरी रसियन में.....

 पालन में परि पटिया पटीरी, 
बल बल बेलिया बनइयो बनइयो जी मोरे ललना के पालन में..... 

दए दए उहारन ओ री अहीरी, 
सुरभित गंध बसइयो बसइयो जी मोरे ललना के पालन में.....


हरिहरि हरिअ  = धीरे से 
हरुबरि = मंद-मंद 
बिढ़बन = संचय करने 
मंजि-मंजीरी = पुष्प गुच्छ, कोपलें पत्र इत्यादि 
मधुकरी केरे बन = भौंरो के वन में- मधुवन 
बल बल बौरि घवरि बल्लीरी =  आम के बौर से युक्त लतिकाएं । बढ़िया से गुम्फित कर 
पटिया पटीरी =चन्दन की पटनियाँ 
बल बल बेलिया = घुमावदार बेलियां 
उहारन = आच्छादन 
अहीरी = ग्वालन 

हरिहरि हरि तर अइयो कौसल्या के अजिरन में 
अजहुँ न बेर लगइयो कौसल्या के अजिरन में 

दए दए उहारन  दए दए बहीरी  , 
सुरभित गंध बसइयो बसइयो जी कौसल्या के अजिरन में.....

बहीरी = बुहारना 

Sunday, 10 April 2016

                                       ----- ॥ सोहर ॥ -----

सखि गाओ री सोहर जी भइने सुअवसर 
कुँअर मनोहर जी सुनु अति सुन्दर दूल्हा बनइयो जी हो, 
                                                    रामा दूल्हा बनइयो जी हो..... 
करधन करधर पाटली परिकर अरु बर बर बसन बसइयो जी हो, 
                                                     रामा बसन बसइयो जी हो.....

कल किरीट कपाला कंकनि माला अरु मनिहर रतन सजइयो जी हो 
                                                     रामा रतन सजइयो जी हो.....

चारु चँवर हलरई सिरु छतर दसई के अरु हरियर तिलक लगइयो जी हो, 
                                                      रामा लगन करइयो जी हो..... 


झीनी झीनी रतिया ओरी चारू चंदनिया,
हरी भरी मनिया अरु धौरी धौरी मुतिया में मनहर पुरट पुरइयो जी हो 
                                                                 रामा पुरट पुरइयो जी हो.....
सो बंदन वारी बांध दुअरिया देहर देहर रचइयो जी हो 
                                        रामा  देहर रचइयो जी हो.....

हरिया चन्देरी अहिबेलि घेरी  निज पटतर पट पहरियों जी हो 
                                         रामा पट पहरइयो जी हो..... 

ताराबरी झलहरी झालरिया जननी के भवन ओरमइयो जी हो 
                                            रामा भवन ओरमइयो जी हो.....


कोई लुटावे लकोहरनु कोई रुपइया 

बाबा भइया ओ मइया अरु बहिनी भुजइया तूम धेनु गैय्यानु लुटइयो जी हो  
                                               रामा धेनु गैय्यानु लुटइयो जी हो.....  

ढोलु हनि पावत मुख संख पुरावत ऐ री मुरलिया बधावा बजइयो जी हो 
                                              रामा मुरलिया बधावा बजइयो जी हो.....

ललना चिरंजीउ हो ललना जुंग जुग जियो कहि कहि हिय हिलगइयो जी हो 
                                                                   रामा हिय हिलगइयो जी हो..... 

चरन जुहारी जो करिहि कुँवर त गोदिया भर घोड़िया चढ़इयों जी हो,   
                                                            रामा घोड़िया चढ़इयों जी हो.....   

बादिहि बादल बृन्दु अगासा । झरिहि झर झर बिंदु चहुँ पासा ॥ 
भर भर कलसि करषि कर देईं । पियत पयस बूझै न पिपासा ॥ 

बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस बरुन निवासा ॥ 
कंठ ताल नूपुर दल पूरे  । गावहि झनक झनक चौमासा ।  

 । हरषित जननी  दियो निकासा ॥ 

दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन सुधाकर करिहि बिलासा ॥ 
कोमल करज जलज जय माला । पहिरावन मुख लवन ललासा ॥ 






----- ॥ सोहागी ॥ -----

हरि हरि कुँअरि पौढ़इयो जी करि पनित पलन में, 
ऐ री हरतरी न फेरइयो जी करि पनित पलन में, 
      
बिढ़वन मंजुल मंजि मंजीरी, 
कुञ्ज निकुंजनु जइयो, जइयो जी मधुकरी केरे बन में..... 

बल बल बौरि घवरि बल्लीरी,

सुठि सुठि सँटियाँ लगइयो लगइयो जी छरहरी रसियन में.....  

 पालन में परि पटिया पटीरी, 

बल बल बेलिया बनइयो बनइयो जी करि पनित पलन में..... 

दए दए उहारन ओ री बधूरी, 

सुरभित गंध बसइयो बसइयो जी करि पनित पलन में..... 


पनित करना =  सगुन हेतु प्रतिज्ञा 
हरतरी न फेरइयो = किए पर पानी न फेरना  
हरिहरि हरिअ  = धीरे से 
हरुबरि = मंद-मंद 
बिढ़बन = संचय करने 
मंजि-मंजीरी = पुष्प गुच्छ, कोपलें पत्र इत्यादि 
मधुकरी केरे बन = भौंरो के वन में- मधुवन 
बल बल बौरि घवरि बल्लीरी =  आम के बौर से युक्त लतिकाएं । बढ़िया से गुम्फित कर गांठ लगाना 
पटिया पटीरी =चन्दन की पटनियाँ 
बल बल बेलिया = घुमावदार बेलियां 
उहारन = आच्छादन 
अहीरी = ग्वालन     
                       

Saturday, 2 April 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५० ।। -----


लागि कटक दल भुज हिन् कैसे । कटे साख को द्रुमदल जैसे ॥ 
 कांत मुख भए मंद मलीना । जस को बालक केलि बिहीना ॥ 
( ऐसा कहते )परकटी सेना कैसे प्रतीत हुई  जैसे वह कटी हुई शाखा वाले वृक्ष का समूह हों ॥ और उनके कालिमा से युक्त मुरझाए हुवे मुख इस प्रकार दर्श रहे थे जैसे भुजा न हुई किसी बालक के खिलौने हो गए और वे किसी ने छीन लिए हों ॥ 

त्राहि कहत कहरत कटकाई । बल न अरु बली भेस बनाई  ॥ 
रिपुहन हरिदै दहए अतीवा । कुठार पन के रहे न सींवाँ ॥

सुनि पुनि  बालक हरिहि तुरंगा । ज्वाल नयन जरइ सब अंगा ॥ 
कहत धरनि धर सुनु हे मुनि बर ।  भंग भुजा केरे दरसन कर ॥ 

नाचत बदन अगन कन चमकहिं । अस जस धनवन दामिनि दमकहिं ॥ 
सकल कटक अस थर थर काँपिहि । भूमि कम्प जस भवन ब्यापिहि  ॥  
इस प्रकार भगवान शेष जी कहते हैं हे मुनिवर ! अपनी सेना को ऐसी भग्न बाहु की अवस्था में देख कर । शत्रुहन के मुख पर क्रोध की चंगारी ऐसे नृत्य करने लगी जैसे आकाश में चंचला नृत्य करती हो ॥ 


पीसत दंत गरजत हँकारे । पचार लवन्हि बदन पसारे ॥  

दिए रदन गन अधर दल चीन्हि । कोपु बिबस चिन्हारी दीन्हि  ॥ 

बहु रिसिहाईं  पूछ बुझाईं  दरस कटक बाहु कटे । 
कवन बीर कर काटे भुज धर ते मोर सौमुख डटे ॥ 
कहत पुनि सोइ  बाल बलबन्हि रच्छिहैं किन देवहीं । 
गह बल केते बाँच न पाइँहि जो मोरे हस्त गहीं  ॥ 
अपने सैनिकों की कटी हुई भुजाएँ देख कर बहुंत ही रोष पूर्वक प्रश्न करने लगे किस वीर के हाथों ने ये भुजाएं काटी है । वो मेरे सम्मुख तो आए फिर शत्रुधन ने कहा वह बलवान चाहे देवताओं ही रक्षित क्यों न हो उसने कितना ही बल ग्रहण क्यों न किया हो पर मेरे हाथ से नहीं बच पाएगा ॥ 

सुनि सैन सत्रुहन बचनन, किए अचरज भरि खेद । 
एक बालक श्री राम रुप, कहत बाँधि है मेद ।। 
सैनिकों ने शत्रुध्न के वचन को सुनकर आश्चर्य युक्त खेद व्यक्त कर बोले : -- एक बाल किशोर है जो श्री राम के स्वरुप ही है उसी ने उस गठीले अश्व को बांधा है ॥ 

शुक्रवार, ०८ अप्रेल , २०१६                                                                                 
सुनि एकु बालक हरिहि तुरंगा । छोभअगन किए नयन सुरंगा ॥ 
बोलि बिमूढ़  हठि बालक एहू । करन चहसि सठ जमपुर गेहू ॥ 

तब रिपुहन बिहरत निज आपा । कसेउ ताल कठिन कर चापा ॥ 
दहन तपन हरिदै न  समाहू । संग्राम हेतु होत उछाहू ॥ 

सेनाधिप काल जित बुलायो । नीति बनाउन आयसु दायो ॥
 कहि दलपति अग्या यह मोरे । सब रन साजु सँजोइल जोरें ॥ 

रचिहु अदम दुर्भेद ब्यूहा । जुगावत सबहि जेय समूहा ॥ 
अहहैं रिपु एकु बीर जयंता । बिपुल तेज बल अति बुधवन्ता ॥ 

हमरे तुरग हरिहि जो कोई । सो बालक सधारन न होई ॥ 
एहि अवसर सुनु करन चढ़ाई । चौरंगीनि लेउ बनाई ॥ 

द्युतिसमन दरपन सहुँ दै आसन सकल प्रसाधन निहार के । 
सब साज सुसाजित करिहु समाजित चातुरंग सिँगार के ॥ 
राम प्रतिरूप रूप न थोड़े सो बीरबर सुकुमार के ।  
सुनु लागत लगन समर सदन पुनि करिहु सम्मुख सँभार के ॥ 

द्योतिसमन दरपन सहुँ चातुरंग सम्भार । 
समर साज प्रसाधन सों करि सुठि सब सिंगार ॥ 

अरिहन अग्या सेन पत सकलत अदम समूह । 
सब रन साज सजाइ  के रचिहि अभेद ब्यूह ॥ 

आनि लेइ रिपुहन समुहाई । निरखत सजी धजी कटकाई ॥ 
हरनहार जहँ बालक पायो । तहाँ पयावन कहि समझायो ॥ 

इत चतुरंगिनि आगिन बाढ़िहि । पंथ जुहारत लव उत ठाढ़िहि ॥ 
दरसत बालक रूप अनूपा । कहि दलपत अह  राम सरूपा ॥ 

कहत कुँअरु हे पलक न पारे । परिहरु देउ तुरंग हमारे॥ 
अवध पति जिन्ह के गोसाईं । तिन्हके  बिकम बरनि न जाई ॥ 

गहेउ तपसि राम सम चेले । ताहि सरूप रूप तव मेले ॥ 
दरस तोहि मैं भयउँ दयालू  । कारन तव छबि सोंह कृपालू ॥ 

जिअ बिसुरत निज सुध बुध भूला । होइ चहु तुम्ह तूलमतूला ॥ 
अब लग जग जिअ हारि न काहू । तासु हृदय तुम जीतन चाहू ॥ 

सुनहु हे बीरबर कुँअर मानिहु बात न मोरि । 
रोपिहु हठ एहि अवसर त होहि राख कस तोरि ॥ 

शनिवार, ०९ अप्रेल, २०१६                                                                                      

लव मुख दर्पण छबि निज नाहा ॥ बिलखत अपलक बोलहि  बाहा ।  
जो तुम्ह मोर कहि नहि मानिहु ।  निज जीवन  बिरथा बिनसानिहु ॥ 

मैं बहु बिरधा तूम  एक बालक । कारन तुम पदचर में एक पालक ॥ 
सुनु हे रघुबर कर प्रतिरूपा । देउ परिहर सौंपि सो भूपा ॥ 

मोरी छबि अवधेश समाना । होइ चकित लव सुनि जब काना ॥ 
जबु दलपत कहि बत गुँजराँई। कछु हँसि हंस अधर तरियाँईं ॥ 

हृदय तरंग माल उमगाईं । एकु  तरि आईं एकु तरि जाईं ॥ 
एक छन अधरन दिए अलगानी । बोलि गिरा पुनि मधुरस सानी ॥ 

जे तुम मानिहु हार, मैं तुरग परिहर करिहउँ । 
कहिहु ए समाचार, राम सों भग्न दूत बन ॥ 
हे सेना पति काल जित, यदि तुम अपनी हार मान लो तो मैं इस घोड़े को छोड़ दूँगा । और  श्रीराम चन्द्र जी के सम्मुख युद्ध में हार का सन्देश देने वाले दूत बनकर सारा समाचार कहो ॥ 

लव मुख दर्पण छबि निज नाहा ॥ बिलखत अपलक बोलहि  बाहा ।  
जो तुम्ह मोर कहि नहि मानिहु ।  निज जीवन  बिरथा बिनसानिहु ॥ 

मैं बहु बिरधा तूम  एक बालक । कारन तुम पदचर में एक पालक ॥ 
सुनु हे रघुबर कर प्रतिरूपा । देउ परिहर सौंपि सो भूपा ॥ 

मोरी छबि अवधेश समाना । होइ चकित लव सुनि जब काना ॥ 
जबु दलपत कहि बत गुँजराँई। कछु हँसि हंस अधर तरियाँईं ॥ 

एक छन अधरन दिए अलगानी । बोलि गिरा पुनि मधुरस सानी ॥
नाउ धर केहि नाउ न होही । होत कीरत करनि कृत सोई ॥ 

कहत चकित तब काल जित जनमिहु तुम कुल केहि । 
कहौ बिदित सो नाउ निज तोहि पुकारसि जेहि ॥ 

रविवार, १० अप्रेल, २०१६                                                                                          

सीस जटा जुट बिबरन चाहीं  । करिहहु रन धुनि मुनि तुम नाही ॥ 
तन जति बसन बिचरहु बन एही । बसिहउ गाँव नगर कहु केही ॥ 

कहहु बीर तव नृप को होंही । तुहरी दसा जनाउ न मोही ॥ 
राज लच्छन सब अंग सुहाए । में रथि अरु तुम  पयादहि पाएँ ॥  

तुमहि कहौ दुर्दम में ऐसे । अधर्मतस तोहि जितौं कैसे ॥ 
कहत सियसुत नगर कुल नाउ । कहौ तो लेन दसा ते काउ ॥ 


सेनापति बहु कह समुझाईं । पराधीन सपनेहु सुख नाहीं ॥ 
हमहु अधीन न अंगीकारी  । कहत एहि मुख करक चिंघारी ॥ 
सेनापति कालजीत ने लव को बहुंत समझाया किन्तु पराधीनता स्वपन में भी सुख नहीं देती लव ने  फिर यह उद्दीप्त होकर कहा  हमें अधीनता  स्वीकार्य नहीं है ॥ 

में लव अहिहउँ अरु लव माही । जितिहउँ समर बीर सब काहीं ॥ 
सकुचउ न मोहि जान पयादहि । बिनहि रथि करि देउँ में तुम्हहि ॥ 
में लव हूँ और लव का अर्थ  निमेष होता है में निमेष मात्र में ही सभी शूर वीरों  को जीत लूँगा । तुम मुझे प्यादा जानकर संकोच न करो लो मैं तुम्हें भी प्यादे में परिणित कर देता हूँ  ॥ 

असि बत कहि कह सो बलवाना । चढ़ा पनच कोदण्ड बिताना ॥ 
प्रथम जनि पुनि सुरत गुरु नामा । मन ही मन कर तिन्ह प्रनामा ॥ 
सर्वप्रथम अपनी माता और फिर अपने गुरु वाल्मीकि  का नाम स्मरण करते हुवे मन ही मन उन्हें प्रणाम किया ॥ 
लगे बरखावन घन घन बान बिकट बिकराल । 
रिपुगन के जो काल बन प्रान लेइ तत्काल ॥ 


बिकट बिसिख गन बरखन लागे । घानत घन रिपु जीउ  त्यागें ॥ 
तमकि ताकि पताकिनी पाला । भींच अधर किए लोचन लाला ॥ 

 दहत बदन गह अगन प्रचंडा । करषत कसत कठिन कोदंडा ॥ 
निरखत नभ गच पनच चढ़ाईं । देत परच निज रन चतुराई ॥ 

छूटत सरगन गगन घन छाए । लगे जो जिय सो जीव न पाए ॥ 
लपकत ताहिं बीर बरबंडा । किए एक एक के सत सत  खंडा ॥ 

घमासान रन भयउ बिहाना  । छाडसि लसतकि कसि कसि बाना ॥ 
अष्टबान पुनि प्रतिहत मारे । निपत नीच दलपत भू पारे ।। 

चढ़े घात भए रथहु बिभंगा । दुहु पयादिक भयउ ता संगा ॥ 
तुरत तमीचर  करि लय आईं  । सपत धार मददान रिसाईं ॥ 

चढ़ बैठें पति छन ताऊपर ।  रन दुर्मद चलिअ अति बेगिकर॥ 
गजारूढ़  भूआलहिं देखा ।  रिपु जयंत सो बीर बिसेखा ॥ 

मारि बिहस कुल बान दस दरस दरस  दल राय । 
झपटि भीतत बिंध दियो हरिदै भवन समाए ॥ 

बृहस्पतिवार १४ अप्रेल, २०१६                                                                               

  अस बल स रन कौसल भारी । अधिपत अबरु न कतहुँ निहारीं ॥ 
बहुरि भयंकर परिघ प्रहारी । लगत तुरए जो जिअ अपहारीं ॥ 

चढ़त अगास चिक्करत धायो । चरत चपल लव काटि गिरायो ॥ 
लिए करबीर करतरी पासा ।  दुर्मद हस्ती किए बिनु नासा ॥ 

तजत सकल कल केतु समूहा । कुलत करिहि सो कुंजर कूहा ॥ 
कूदि ततछन धरिअ पद दन्ता । सीस भवन पुनि चढ़े तुरंता ॥ 

भेंट अधिपत बीर बरबंडा । मौलि मुकुट कीन्हि सत खण्डा ॥ 
गाताबरन सहस खन करिहीं । हनत मुठिका केस कर धरिहीं  ॥ 

खैंच ताहि महि देइ गिरायो । दुंदभ कोप दहन मुख छायो ॥ 
अधिपति मुख  बल निपतत भूहा ।  भेद गही निर्भेद ब्यूहा ॥ 

धारा बिष करताल गहत घात लहरात पुनि । 
भर जुग नयन ज्वाल लवनहि बधन अगुसर भए ॥ 

 चलि जल जल जोलाहल जोई । सौंट सरट कोलाहल होई ॥  
पत कर गहि कर बीर बिसेखा । लव जब नियरै आगत देखा ॥ 
और उसने ज्वाल संयोगित कृपाण धारण कर ॥ 

काटि माँझि दाहिन भुज ताहीं । खडग सहित छन गिरि महि माहीं ॥ 
देखि कर तरबारि महि पारी ।   उमगिहि कोप दहन अति भारी ॥ 

बाम भुज गरु गदाल गहावा । हतोद्यम लवनहि पुर आवा ॥ 
तीछ  तीर तैं ऐतक माही । तमकत काटि दियो लव ताहीं ॥ 

कतहुँ त मुग्दल करतल पूरा । गिरि कतहुँ कर कलित केयूरा ॥ 
धधकत धारा बिष धरंता । मुनिबर पुनि बालक बलवंता ॥ 


टूट परेउ काल के नाईं । मुकुट मंडित माथ बिलगाईं ॥ 
परे रन भुइँ बहुरि निरजूहा । भयऊ  जुगत रहित सब जूहा ॥ 

खेत होइ सेनाधिपत प्रसरित भए चहुँ ओर । 
चिक्करत बिकल करिहि सकल  कोलाहल घन घोर ॥  

मंगलवार, १७ अप्रेल २०१६                                                                                          
सकल चमुचर छोभ भरि आवा । लवनन्हि बधन चरन बढ़ावा ॥ 
होत क्रुद्ध अति  होइ अगौहाँ । सियसुत तुरत आए ता सौंहा ॥ 

रजु कसि पुनि असि मारिउ बाना । सबन्हि पाछिन देइ पराना ॥ 
चलिअ  बान  जिमि पवन अधीर । गिरहि बीर जिमी तरु नद तीरा ॥ 

लगइँ ढेरि केतक भट केरी । केतन केत चलिअ मुख फेरी ॥ 
एहि बिधि छतवत सबहिं जुझारू । अगहुँ तेउ पुनि भए पिछबारू ॥ 

भर बर लव रन भूषन भेसा । कटकु माझ बहु मुदित प्रबेसा ॥ 
चरन केहि के केहि कर बाहु । काटेउ करन नासिका काहु ॥ 

कोउ बदन भै नयन बिहीना । कोउ कवच को कुंडल हीना ॥ 
एहि बिधि सेनापति गै मारे । होइ भयंकर सैन सँहारे ॥ 

सबहि जीउ सिराए गए जिअत रहे नहि कोइ । 

चतुरंगिनि हिय जीत लव बिजै कलस कर जोइ ॥ 

एहि बिधि हतवत रिपु समुदाई । बिनु पत परवत गयउ सिराई ॥

होइ पराजय ए अनकनी  के । आए न जाईं कोउ अनीके ॥ 
परवत् = असहाय होकर 
मानस मन यह संसय जागे । लव रन पंथ जुहारन लागे ॥
रहइ सचेत नयन पथ लाईं ।   अपर अनीक करन अगवाईं ॥ 
औ फिर वह सावधान होकर पथ पर आखें लगाए और दूसरे सैनिकों के आने की बाट जोहने लगे ॥ 

सुभाग बस को को रजतंती । जोवत जीय रहे जीवंती ॥ 
पाहि पाहि कह सकल पराने । पाछु फनिस सम सायक आने ॥ 

पराबरत गत रिपुहन पाहीं । समाचार सब कहत सुनाईं ॥ 
काल सरिबर करनि एकु बाला । लहिअ काल जित मरनि अकाला ॥ 

तासु बिचित्र  रन करम बखाना । सुनि सत्रुहन बहु अचरजु माना ॥  



चितबहि चितबत  कहत तिन सोहु  ॥  भरम जाल बस  कहा तुम होहु 

कहु तो घेर घारि को माया । करहु मम सिरु कपट की छाया  ॥ 
वह स्तब्ध हुवे सैनिक से बोले कया तुम्हारी बुद्धि विभ्रमित हो गई है कहो तो छल कपट की प्रतिछाया कर इसे किसी मोह कारिणी शक्ति ने घेर लिया है ? 

बिकल त अहहि न चित्त तिहारे । काल जित अह गयउ कस मारे॥ 
सोइ मरनासन्न कस होई । जम तेहु दुर्धर्ष जो होई ॥ 

दुर्दमनिअ बल पौरुष जासू । अरु एकु बालक जीतिहि तासू  ॥ 
कहौ ताहि को जीतिहि  कैसे । जो आपही  काल कर जैसे ॥ 
वह मरणासन्न कैसे हो सकता है जो यम के द्वारा भी दुर्धर्ष हो ॥ उसे एक ही बा किशोर ने कैसे पराजित कर दिया ? जो सवमेव में ही काल स्वरुप है ॥ 

सुनिहि बीर सत्रुहन के भाषन । रक्ताम्बरी करिहि निवेदन ॥  
ना हमको को माया घेरी । ना हम किन्ही के उत्प्रेरी ।। 
शत्रुधन का ऐसा भाषण सुनकर रुधिर से सने लाल कनेर से दर्शित होते  उन वीर सैनिकों ने फिर ऐसा कहा : -- हे राजन ! न तो हमें किसी मोह कारिणी शक्ति ने ही घेरा है, और न ही हैम किसी के उत्प्रेरित ही हैं ॥ 


गहिहिं घात अघात जुधिक देह रुधिर लपटानि । 
कहिहिं  नीतिगत बचन पुनि सत्रुहन सहुँ जुग पानि ॥ 

हे राउ अहहै हम पर, तव प्रतीत की सौंह । 
जोउ दरसे जेइ नयन, कहे जोंह के तोंह ॥ 

हे राजन ! हमको तुम्हारे विश्वास की सौगंध है इन आँखों ने जो कुछ भी देखा, वह हमने यथावत कह सुनाया ॥  

बुध/ | बृहस्पति  २० / २१ अप्रेल, २०१६                                                                                     

करहिं न हम छल कपट न खेला । किया एकै सो हम पर हेला ॥ 
कालजित कर मरनि गोसाईँ । भई बीर सो बालक ताईं ॥ 

 एतक अपूरब रन कुसलाई । तासों सकल कटकु मथना ई ॥ 
 होइ जोइ अब तासु बहोरी । करहु सोइ जस मति कहि तोरी ॥ 

जिन्हनि जुझावन हुँत पठाहू । होइ चाहिब सो बली बाहू ॥ 
भट निवेदित बचन दए काना । तब रामानुज परम सुजाना ॥ 

करम नीति महुँ अति निपुनाई ।  मंत्रीबर तैं पूछ बुझाईं ॥ 
महोदय तुमहि जनाउब एही । हरिअ लियो हय बालक केही ॥ 

सरितपति सिंधु सरिस मम सकल चमूचर आहिं । 
तपन काल के ताल तुल पलक सोष बिनसाहि ॥ 


गींव भयउ गहबर के नाईं । महमन सुमति बोलि गोसाईं ॥ 
बाल्मीकि केरे आश्रमु एहि । रिषि मुनि अबरु ए निवास  न केहि ॥ 

हरनहार सुरपति त न होईं । आन तुरग हरि सके न कोई ॥ 
कै संकर भरि बालक भेसा । अरु हरनि नहि कतहुँ को देसा ॥ 

सोच बिचार मम मति अस कहहि । एहि औुसर जैहौ तहँ तुम्हहि ॥ 
लेइ संग निज सैन बिसाला । चारिहुँ पुर बल सकल भुआला ॥ 

जाए तहां अब तुम अरिहंता । बाँध  लियो छन ताहि जियन्ता ॥ 
रिपु कर करतब करत न हारे । कौतुक प्रिय रघुनाथ हमारे ॥ 

बाँध कसि ले जैहौं तहँ हार परन मैं ताहि । 
करिअ सम्मुख देखइहौं रघुबर सों सब काहि ॥ 

मेघ माल सम सप्तक घेरे । भए मोचित गए सबहिं निबेरे ॥
सरद काल नभ बरन बिछोही । सियसत पूरन सस सम सोंहीं ॥

गहए पीर तन बान पबारे।  नेकानेक बीर महि पारे ॥
बिहरति बिकल सकल कटकाई । हतबत बिनु पति चलिअ पराई ॥

धावत जब निज दल अबलोके ।  केही भाँति लव गयउ न रोके ॥
तब बलबन पुष्कल ता सोहें । छतज नयन करि होइ अगौहैं ॥

ठा ड़ रहउ कह बारहि बारा । नियरावत यहु कहत पचारा ॥
बर बर तुरंग संग सुसोही । देउँ पदचर बीर मैं तोही ॥

  तुम पयाद मैं रथरोहि तापर पद बिनु त्रान । 
कहौ मैं केहि बिधि तोहि जितौं बीर बलबान ॥