Tuesday, 16 December 2014

----- ॥ उत्तर-काण्ड २५ ॥ -----

तेहि समु एक जान मनोहर । देऊ लोक सों आन धरा पर ॥ 
हंस रूप उजरित मनियारा । चले पुलकस बैकुन द्वारा ॥ 
उसी समय देव लोक से एक मनोहारी विमान धरती पर उतरा जो हंस के समरूप उज्जवल था उसपर विराजित होकर पुल्कस् वैकुण्ठ द्वार की ओर चल पड़ा ॥ 

तहाँ निबास किछु समउ होरे । पंच कोस पिछु आनि बहोरे ।। 
तीन मुख कुल पुनि जनम जुगाए । पूज बिसुनाथ परम पद पाए ॥ 
वहां कुछ समय तक निवास कर पुनश्च कासी में उसका आगमन हुवा । एक ब्रम्हं कुल में जन्म लेकर विश्वनाथ की पूजा-वंदना करते वह परम पद को प्राप्त हुवा ॥ 

जद्यपि रहि अति पापि सुभावा ।तथापि सुधिजन संग प्रभावा ॥ 
दिए जम दूतक पीर भयंकर । सिला परस कर लेइ सकल हर ॥ 
यद्यपि वह अति  दुष्ट स्वभाव का था तथापि सुबुद्धि जान के संगती का प्रभाव ऐसा हुवा कि यम दूतों ने उसे जो भयंकर पीड़ा दी थी शालिग्राम  के  स्पर्श ने वह पीड़ा हरण कर ली ॥ 

सालगाँउ के सिला अगाना । कथत कथानक हो न बिहाना ॥ 
तेहि ते में किछु कहा बखानी । करन पुनीत हेतु निज बानी ॥  
(इस प्रकार हे )

बिष्नऊ चरन को मरना सन को  हृदय भवन सिला धरें । 
ललाटपटल पर हरिप्रिया धर राम नाउ मुख सुमिरैं ॥ 
तुलसी दल दिए पद पयद पिए सो भव सागर सोंह उतरे । 
करन देह पावन भव सिंधु तरन हरि सिला पूजन करें ॥  

 सिला पूजन पान पयस, दे भव कूप निकार । 
बिंदु मह सिंधु समाहित, कहा किछु एकहि सार ॥ 

बुधवार, १७ दिसम्बर, २०१४                                                                                           

खत सुमति हे सुमित्रा नंदन । गंडकी गंग अनुपम बरनन ॥  
सुनत महातम सह भावारथ । रतन गींउ मन भयउ कृतारथ ॥ 

तेहि तहाँ तीरथ अस्नाने । तरपत पितृजन अर्चिष्माना  ॥ 
धन धान सहित भूरिहि भेषा । दिए दीनन कर दान बिसेखा ॥ 

सत्कृति कृत भए हरष बहूँता । बिष्नु सिला पद पूजन हूँता ॥ 
गहत नदी  हरी सिल चौवीसा । सदर पदुम पद धरे सीसा ॥ 

चन्दन तुलसी जल उपचारे । चढ़ा चरन पूजत सत्कारे ॥ 
तदनन्तर धीमान धरेसा । पुरुषोत्तम मंदिरु प्रबेसा ॥ 

एहि  बिधि क्रमबत पयानत, पहुंचे सो सुभ धाम । 
तरंगित पयधि पद जहाँ, सुरसरि करे प्रनाम ॥ 

गंगा -सागर 

बृहस्पतिवार, १८ दिसंबर, २०१४                                                                                       

सिथिल श्रम बहुल पथरिल पंथा । तहँ गत बिगत पथिल भए श्रंथा ।। 
पथ एक त्रइ मुख पथक बिसेखा ।  नीलांचल थरी पूछ देखा ।। 

जहँ के पाहन हिरन सकासे  । बसिहिं तहँ श्री हरिहि सुपासे ॥ 
देवासुर दुहु सीस नवावैं । कृपाकर सोइ ठाउँ बतावैं ।। 

भ्रमहं चित बहु अचरज होहीं । कहि बड़ सादर भूपत सोंही ॥ 
जिन भगता जग बंदित कहहीं । पावन परबत इहहि त रहहीं ॥ 

जान को कारन दरस न आए । पथक पुनि पुनि ए बचन दुहराए ॥ 
नीलाचल गिरी के अस्थाना । कृत फल दानत होहि महाना ॥ 

रहिही यहांहि सो थरी जहाँ मोहि अस्नात । 
चतुर्भुज रूप सरूपी दरसिहि कोल किरात ।। 

शुक्र/शनि , १९/२० दिसम्बर, २०१४                                                                                                    

प्रभु दरसन लोचन पथ जोईं । सुनि अस भूपत ब्यथित होईं । 
कहे दुखित मन बिप्रबर सोंही । मो पभु चरन दरस कस होहीँ ॥ 

नीलाचल गिरि दए देखाई  ।  तासु हेतु कहु को जुगताई ।। 
किए तन कंपन बदन हिलोले । बिचलित होत द्विजबर बोले ॥ 

हमहि समागम कर अस्नाना । तनिक समउ होरएँ एहि थाना ॥ 
गिरिरु दरस जब लग नहि होई । सिथिर इहाँ  सो फिरिहि न कोई ॥ 

भगत बछर कृपालु अघ हरहीं । हमहि सो अवसि उपकृत करहीं ॥ 
हरि भजन मह जासु मन लागा । भगत प्रभु कबहु करे न त्यागा ॥ 

सम डीठि लखें जग रछित रखेँ,  देवाधिदेउ सिरुमने । 
दरस जिग्यासु पथिबृंद तासु करौ कल सुकीर्तने ॥  
सुनी पथक गिरा होत अधीरा तट तीरथ सनान किए । 
पुनि पन धारी अनसन कारी प्रभु दरसन के प्रन लिए ॥ 

करत प्रभो गुन गान तिसनित कंठ आए प्रान । 
करे न पयसन पान, प्रभु दरसन मुख ररन धर ॥  

सोत बचन कहि दीन दयालू । जय जग जीवन जगत कृपालू ॥ 
सगुन श्री बिग्रह धारन हारे। खेल दल दलन लेहु अवतारे ॥ 

जासु  तनुभव भगत प्रह्लादा ।देइ दुसह दुःख दनुज प्रमादा ॥ 
ताहि सरिस नहि जग को ताता । देइ अगन नग सिखर निपाता ॥ 

दंड पास कर जल अवगाहा । रूप धरे तब तुअ नर नाहा ॥ 
संकट तंतु कटे तत्काला ।पीर परे तहँ प्रगसि कृपाला ॥ 

करे प्रभो अस मोहनि लीला । बसे गवन घन बिपिन करीला ॥ 
मात पिता के अग्याकारी । भगत बछर जग पालन हारी । 

देवन्हि मुनि सिरौमनि, हे दीनन के नाथ । 
कोटि अघ होत भसम तव चरन लगे जब हाथ  ॥ 

रविवार, २१ दिसंबर, २०१४                                                                                                

तव मानस जिन्हनि प्रिय माने । आए भगत जन सो अस्थाने ॥ 
देवासुर बंदित जगदीसा । जहँ तुहरे पद तहँ मम सीसा ॥ 

प्रभु महिमा कबहु न बिसराओ । पीर परे जहँ तुअ सुख दायो ॥ 
तुहरे नाउ जोकीर्त  कारी । सो पारगमन के अधिकारी ॥ 

सतजन मुख कहि सुनि सत होहीं । दरसन अवसिहि होहिहि मोही ॥ 
कहत सुमति भूपत एहि भाँती । प्रभु कीर्तन करै दिनु राती ॥ 

छिनु भर हुँत बिनु करे बिश्रामा । नीँद नयन बिनु सुख भए बामा ॥ 
चरत फिरत होरत एक साँसे । भासिनु को एहि कह संभासे ॥ 

आह अजहुँ त दरस परे, प्रभु के अनुपम झाँखि ।
भरे ह्रदय जर झरे भए नयन ढरे बिनु पाँखि ॥  

सोमवार, २२ दिसंबर, २०१४                                                                                                

तब करुनाकर जगदाधारे । कृपा पूरबक सोच बिचारे । 
करत महिमन मम भगति सहिता । ए जनपालक भए पाप रहिता ॥ 

आरत बस जस मोहि पुकारा । होइहि दरसन के अधिकारा ॥ 
हिय होत द्रवित प्रभु कंठ भरे । कहि मन मानस अजहुँ का करें ॥ 

जटा मंडल सिरु केस बनाए । कमंडल धार जति भेस बनाए ॥ 
धरि जब दाहिन हाथ त्रिदण्डा । मंजुल मुख लसि तेज प्रचंडा ॥ 

सगुन सरूप गयऊ समीपा । ब्रम्हन तपसी देख अधीपा ॥ 
ललकित लोचन पलक हिलोले । ॐ नमो: नारायन बोले ॥ 

सन्यासी सौंह सीस नवाए । अरग दए सादर आसन  दाए ॥ 

आउ भगत बिधिबत करत, बोले अस सुठि बोल । 
महमन मोरे भाग के  नहि जग महि को मोल ॥ 

मंगलवार, २३ दिसंबर,२०१४                                                                                                  

 भई कृपा बहु नाथ हमारे । साधु पुरुख दरसन कर पारे ॥ 
तुहरे दरसन सुभ मैं माना। होहि दरस अजहुँ त भगवाना ॥ 

कहै मुदित तब दया निधाना । सुनौ मम बचन देइ धिआना ॥ 
निज ग्यान बल संग भुआला । जानिहुँ मैं सब बचन त्रिकाला ॥ 

कहत प्रभो बत कही हमारे । दए धिआन सुनिहौ चित धारे ॥ 
अगहुँ दिवस अपराह्न काला । नयन दरस तव देहि कृपाला ॥ 

जो दरसन बिधिहु नयन न लभा । तुहरे हेतु भयउ अति सुलभा ॥ 
भगता एक तुअ एक तव रागी । तुहरे मंत्री सन ए बैरागी ॥ 

सह तुहरे नगरी के बासी । करम्ब नाउ एक संन्यासी ॥ 
जो तंतु बय जाति के होई । सूत कर्मि जिन कँह सब कोई ॥ 

श्रुति मुख सुरन्हि सहित जिन अभिबन्दें सुर नाथ । 
पबित परबत सिखरोपर चढिहु सबहि के साथ ॥ 

बुधवार, २४ दिसंबर, २०१४                                                                                                         

भगवन भयउ अंतर धिआना । राउ सहर्षित अचरज माना ॥ 
दुबिधि उपजि तपसी सन पूछे । जे भुइँ जिन जति बिनु भए छूछे ॥ 

ज्ञान पूरित बत कहि मोही । ब्रम्हन सो सद्जन को होही ॥ 
एहि अवसरु बहोरि कँह गयऊ ।  दिरिस कतहुँ सो दरस न दयऊ ॥ 

जटिल जटा धर अबर न कोई । साखि पुरुषोत्तम रघुबर होंईं॥ 
तुहरे चरन रति प्रभु अति भाए । तासु कर्ष सों इहँ चले आए ॥ 

कल अपराह्न काल जौं ही  । गिरी अगोचर गोचर होहीं ॥ 
परिक्रमा कर सिखर अबरोहू । प्रभो दरसत कृतारथ होहू ॥ 

ब्रम्हन कहे बचन रहे , अमरित सोंह सुपास । 
भूपत  चित चिंतन जने  , उपरत किए तिन  नास ॥ 

बृहस्पतिवार, २५ दिसंबर, २०१४                                                                                             

रतनगीउँ मन मीर उछाही । पुलकित नयन नंद घन छाहीं ॥ 
भगवन दरसन घन घन करखे । भव सरूप पलक सों बरखे ॥ 

सब कहुँ  उद मुद मंगल पूरा । नाचे तब बन मनस मयूरा ॥ 
दरनत दारुन दुःख संतापा । बन बन सुख बन बचस् ब्यापा ॥ 

राग रंग कर ताल प्रसंगे । कहुँ सहुँ सप्तक सुर एक संगे ॥ 
गह करतल कल कुनिका कूँजे । धरे आधार कहूँ गोमुख गूँजे ॥ 

गहत गगन गहबर घन गाजे ।पनबानक कहुँ  दुंदुभि बाजे ॥ 
हँसत कहि बत भूपत सुजाना । प्रतिछन किए भगवन गुन गाना ॥ 

बिगते दिवस सुमिरन सन , भजन कीर्तन माहि । 
संगम तट सुख सयन किए, रयन गहन जब छाहि ॥ 

शुक्रवार, २६ दिसंबर, २०१४                                                                                                       

सपन छाए गह एक छबि लेखा । निज कर धरि हरि लच्छन देखा ॥ 
धरे चतुर्भुज रूप अनूपा । देखे दृग प्रभु प्रगस सरूपा ॥ 

परिचरनि सक सुभ चिन्ह धरे । श्री हर चरनिन्हि बंदन करे ॥ 
दरस नरेसु दिरिस अद्भूता । अचरजु सह भए हरष बहूँता ॥ 

मनो काम जब पूरन पारे । भई नाथ कहि कृपा तुहारे ॥ 
प्रात नींद जब भई पराई । तपसी ब्रम्हनि बुला पठाईं ॥ 

सपन सदन जस छबि देखावा । तपसी चित्रकृत कहत सुनावा ॥ 
तपसि बदन भए बिसमय भारी । चितबत मुख एहि बचन उचारी ॥ 

सयन  काल सपन दरपन  दरसिहि जो भगवान । 
चारि बिभूषन चिन्हनि, चहहीं तोहि प्रदान ॥ 

शनिवार, २७ दिसंबर, २०१४                                                                                            

बजए मंजरि संग करताला । तदनन्तर अपराह्न काला ॥ 
भूपत सहसइ गगन निहारे । चढ़े जान घन देउ बिहारै ॥ 

बरखिहि सुमन कही मुनि बृंदा । जय जय जय जय नन्द मुकुंदा ॥ 
उचरे मुख बचन तेहि काला । हन्य धन्य तुअ धन्य भुआला ॥ 

प्रगसिहि चतुर भुज रूप धारी । भए तुअ दरसन के अधिकारी ॥ 
देवन्हि जस अस कही पारे । बही बाहि श्रुति रन्ध्र उतारे ॥ 

परबत पबित जगत बिख्याता । प्रगासिहि अस जस सूर प्रभाता ॥ 
हंस कनक चमकत चहुँ ओरा ॥  सिखर कर सुहा रहे न थोरा ॥ 

सोचए भूपत का कतहुँ, अगनी प्रगसित होइ । 
स्थिर कांति कर धरे कि  धुति नाथ का कोइ ॥ 

रविवार, २८ दिसंबर २०१४                                                                                                 


तपसी ब्रम्हन गिरि जब देखे । सुभ लच्छन भूपत कहि लेखे ॥ 
जहाँ चतुर भुज दर्शित होईं । महमन अहहीं एहि गिरि सोई ॥ 

भए नत मस्तक रत्ना गीवाँ । मदन कंट के रहे न सीवाँ ॥ 
कहत बहुरि बहु करत प्रनामा । धन्य धन्य मैं भयऊँ रामा ॥ 

तुम् अभिरूपम  मैं अभिलाखी ॥ पबित गिरि मोहि दरसहि साखी ॥ 
सूत कृत मंत्री संग रागी । दरस गिरि कहैं भए बड़ भागी ॥ 

अभिजय नाउ मुहुरत जागे । पथिक सिखर अवरोहन लागे ॥ 
पुरयो संख चले सुर साजी । अमित अगास दुंदुभी बाजी ॥ 

चढ़त परबत सिखरोपर, बिचत बिटप धर सोहिं । 
मनिक खचित परम सुंदर, देउर दर्सित होहिं ॥  

सोम,मंगल  २९/३०  दिसंबर, २०१४                                                                                          

सरजन करता जगत प्रपंची । जहां आन निस दिवस बिरंची ॥ 
करैं आरती बंदना गाएँ । प्रभु पदुम चरण नबैद चढ़ाएँ ॥ 

दरस देउ निभ निलय उजारे । रतन गीव तहँ पद पैसारे ॥ 
एक बर आसन देइ दिखाई । मनिक जटित सुभ दसन डसाईं ।। 

दरसत जिन मनि मंडप लाजएँ । तापर चतुर भुज प्रभु बिराजएँ ॥ 
बिस्व सेन सन चण्ड प्रचंडा । किए परिचरजा अनुचर षंडा ॥ 

करभर हलरए प्रस्तर पाँखी । झलकए मुदित मनोहर झाँखी ॥ 
भर चाँवर एक कर हलरायो । सीस छतर एक कर भर छायो ॥ 

एक धनुधर एक धारा सारी  । एक कर सोहित बल अरु ढारी ॥ 
 बहुरि बहुरि नृप लएँ प्रभु नामा । रागि संगि किए चरन  प्रनामा ॥ 

लए पयसन किए प्रथमहिं मज्जन मुख बेद बचन उचारिते । 
अरगोपचयन किए चरन अर्चन चन्दन बसन लसिते ॥ 
मंजुल मंजरि पुला पुरायो हँसि हँसि रसना कस्यो । 
सिरु उतरायो कंठ घरायो हृदय भवन धरि लस्यो ॥ 

दिनकर बंस भूषन जब  कल भूषन अभराए । 
कोटि कमान बिनिंदित किए छबि अस नयन सुहाए ॥ 

सथर दीपन चिन्हित किए कंचन थार सजाए । 
तापर  दीपन बरति बार जगमग जोत जगाए ॥ 

ब्रम्हन कंठी गाँठ किए, श्री हरि गुन समुदाए । 
मति अनुहारत आपनी सकलित तोम सुनाए ॥ 

समयोचित ब्यंजन कर रूचि रूचि भोग लगाए ।
बादन बृंद बंदन किए, बदन आरती गाए ।। 

बुधवार, ३१ दिसंबर, २०१४                                                                                                             

सर्बेसर हे अंतरजामी । अगज जगज के तुम्ह स्वामी ।। 
त्रिगुन परे तव मूरत साखी । कारज कारन ते भिनु लाखी ॥ 

महा सार सन चरन पूजिते । कंज नाभ के संग उपजिते ॥ 
सिंधु सयन हे पुरुख पुराना । आदि काल के तुम सब थाना ॥ 

रूद्र रूप के प्रादुरभावा । प्रभु नयन सन भयउ समभावा ॥ 
बर्धन छय फल तीनि बिकारा । तिन्ह सो रहित रूप तिहारा ॥ 

कतहुँ चेतन कतहुँ जड़ताई । सो सब आपहि संग जनाई ॥ 
अचेत कन चेतन बल घारिहु । अस जड़तस जग चेतस कारिहु ॥ 

अजर अमर दिक् कर जगदीसा । तुम्ह दिगंबर बिष्नु बागीसा ।।  
तुम डिक मंडल अरु दसउँ दिसा । तुम दिनु रयन भोर तुम निसा ॥ 

भगत रच्छन पाप हरन, धर्म स्थापन हेतु । 
निज नुरूप गुन गहत भए, प्रगति पंथ के सेतु ।।  












































Monday, 1 December 2014

----- ॥ उत्तर-काण्ड २ ४ ॥ -----

बजइहि बजौनि बिबिध बजाने । भेरी तुरही पनब निसाने ।।  
गहगह गगन धुनी घन  होई । ब्रम्हानंद मगन सब कोई ॥ 

बजे संख कतहुँ कल कूनिका । मिलि मंगल तान सुर धूनिका ॥ 

भयउ भृंग बहु रंग बिहंगे । गूँजत कूँजत चले प्रसंगे ॥ 

राग सहित छहु रागिनि जागे । सबहि पथिक ए कहत चले आगे ॥ 

दीनदया मय हे दुखहारी । ताप  सोक भय  भंजन कारी ॥

पुरुषोत्तम नाउ बिख्याता । कृपा सील सुख सम्पद दाता ॥ 
मनिक रतन धन चाहिए नाही । हम तव श्री दरसन के लाही ॥ 

जयकार करत बढ़ चले, तीर्थ हेतु बटोहि ।
सुन्दर सैल सरि सर धर मग छबि अतिसय सोहि ॥ 


मंगलवार ०२ दिसंबर, २०१४                                                                                                       

ठाउँ ठाउँ दै भजन सुनाईं । परम सुभग बिसनौ मुख गाईं ॥ 
कतहूँ भाव भगति रस साने । होइहीं गोविन्द गुन गाना ॥ 

करिहि गान बहु तान तरंगे ।बादन मंडलि मिल एक संगा ॥ 
होत राउ रंजन बहु भाँती । परे अयासी मन सुख साँती ॥ 

करिहि आपहू हरिगुन गाना । होर छिनभर कीन्ह पयाना ॥ 
आए पथ जब काँजी नरेसा । दरसे तीर तीरथ बिसेसा ॥ 

होइहि सकल अभ्युदय कारी । अभ्युदर्थि भए सेवनहारी ॥ 
तासु महिमा ब्रम्हंजन गावैं । श्रुत श्रवण सुख पवत जावैं ॥ 

जितारि श्रमजित महराउ, रहेउ कृपा निधान । 
दरसे जहाँ दीन दुखी, देइ अनुकूल दान ॥  

बुधवार, ०३ दिसंबर, २०१४                                                                                      

पुरंजन राउ सन जो आने । किए अनेक तीर्थ अस्नाने ॥ 
अभरे तन निर्मल जल चीरा । भयउ पबित अति भब्य सरीरा ॥ 

दिखे नदी एक आगिन बाढ़े । लिखे चित्र सोंह  जहँ तहँ ठाढ़े ॥ 
कलिकल सकल पाप दूरानी । बहि कलकल गहि सीतल पानी ॥ 

सालग्राम हिय अंतर धारी । करे चकित बहु चक चिन्हारी ॥ 
 बैठे पंगत मुनि समुदाई । तीर तरंगित माल सुहाई ॥ 

भूपत चतबन सुखु न समावै । मुनि सन परिचय पूछ बुझावै ॥ 
तपों निधि मुनि संग सोइहि । पावन नदी नाउ को होइहि ॥ 

जल दर्पन नभ छाए छबि, किए तिसय अल्हाद । 
जहँ धरती गगन उपबन, मेल करें संवाद ॥ 

बृहस्पतिवार, ०४ दिसंबर, २०१४                                                                                                         

मंगल गिरा मुनिरु बिद्बाने । अद्भुद तीरथ महत बखाने ॥ 
तासु नाउ गण्डकी तटिनी । सालीगाउँ अरु नारायनी ॥ 

अवस्थित पबित परबत पासू । देवासुर दुहु सेविन जासू ॥ 
निर्मल जल उत्ताल तरंगा । करिअहि पातक जूह बिभंगा ॥ 

डीआरएस प्रस मन मानस संगे । कर्म जनित जल पान प्रसंगे ॥ 
जलधृत उद्धृत बानी ताईं । दहे अखिल पातक समुदाईं ॥ 

सनातन समउ पाप बिसेखे । लिपत प्रजा जब बिरंचि देखे ॥ 
गंड अस्थल जल कन ढुलिकाए । सो कन अघहन धेना जनाए ॥ 

कंठ कलित श्रीमाल  तरंगाई तुलित तीर । 
सूर किरन कर भाल  उज्जबल मुख लिए उतरी ॥  

शुकवार, ०५ दिसंबर, २०१४                                                                                                     

 परसत पौर जो पबित सलिला । किए चूरन घन पातक सिला ॥ 
अस पूण जल परसे जो कोई । तासु  गर्भ गह  पीर न होई ॥ 

भित चक चित पाहन परगासे । जिमि रतनन सन नद तन  लासे ॥ 
चक लखनक जस लक लाखी । सोए भगवन श्री बिग्रह साखी ॥ 

पूज्य परम हित हरि प्रभूता । तासु माहि भए  प्रादुर भूता ॥ 
लिए सालगांव चक चिन्हारे । जो भगता नित पूजन कारें ॥ 
सो सद अचारी अभरन भरें । लोभ लब्धन लालस न करें ॥ 
होत बिमुख परधान परदारा । किए पूजन सो परम पुजारा ॥ 

गण्डकी सालि गाँउ एक  दुअरिका चक चीन्ह । 
यहु दोउ सौक जनम के,  पातक हरन कीन्ह ॥ 

शनिवार, ०६ दिसंबर, २०१४                                                                                                

हो चहे सहस पापाचारहि । साल गाँउ जो चरन  पखारिहि ॥ 
आचमन पयस उदर गहाइहि  । पातक समूह पार लगाइहि ॥ 

चतुर बरन मग बेद बताइहि  । सूद्रहु पदरचत मुकुति पाइहि ॥ 
महामुनि कथनत पुनि कल कूजे । सलगांव पद तिया न पूजे ॥ 

जो को तिय कल्यान चहइहौ । साल गाउँ के पद न पुजइहौ ॥ 
बैदभ हो चाहे हो सिँधुरी । सील परस सों रखिहौ दूरी ॥

परिसिहि जोउ मोह के पासा । होही सकल सदकृत के नासा ॥ 
तासु सीस गहि पातक भारी । तुरतै मिलिहीं नरक दुआरी ॥ 

ब्रम्ह बधिक होए चाहे, केतक पापाचारि । 
अस्नान पयस पान होहि , परम पदक अधिकारि ॥ 

रविवार, ०७ दिसंबर, २०१४                                                                                          

संख सलिल खँखन चक चंदन । ताम पत्र पखारित पद पयसन ॥ 
 निबेदित तुलसी हरि नाउ सन । साल गाँउ के सील संकलन ॥ 

जोग पदारथ नवल समूहा । दहन समरथ अखिल अघ जूहा ॥ 
रतन गींउँ नाऊ नर नाहा । मन्मनस् अतुलित मति लाहा ॥ 

मुनि माह रिषि गन अस्थिर चेता । श्रुति बित्त सिद्ध साँति निकेता ॥ 
वेद सार के जाननहारे । करत नाद संसूचन कारे ॥ 

जो कोई तीरथ अस्नानए । पूजत भगवन पद पय पानए ॥ 
किए भगतिहि सब बिधि मख ताईं । होत धर्म सो बरनि न जाई ॥

 भगति जोग संग पाइहि एक एक अमरित बूँद । 
बूंद बूंद भीत होइहि षडभग जुगित समूंद ॥ 

सोमवार, ०८ दिसम्बर, २०१४                                                                                             

प्रभु मूर्त सम सँख्या पूजैं । सँख्या माहि त्याजत दूजै ॥ 
अस दुइ सील पूजे न कोई । चौ छ आठहि अरचनि होई ॥ 

बिषम सँख्याहु पूजित होई । एकम पंच सत नवल सँजोई ॥ 
बिषम अंक महु बिषमक तीना । होइहि पूजन जोग बिहीना ॥

एकु प्रभो दुआरका पुरी के । लिए दूजन गण्डकी नदी के ॥ 
जहँ दोनउ एकु संगत होई । तहँ सिंधुग सुरसरि थित होई ॥ 

संकलित सिला हो जो रूखी । होत बयस सह लखी बिमूखी ॥ 
अल्पक आयु करत कुल दीना । ता सह होत कीरत  बिहीना ।। 

अर्चक आयु बर्धन कर, लखीवान किए सोए  ।  
जोइ मनोहर चिकनहर चित्ताकर्षक होए । 

मंगलवार, ०९ दिसंबर, २०१४                                                                                               

किए जो मनोकामना धन की । कुल कीरत सन बय बर्धन की ॥ 
सालगाँउ सो गेह अधारएँ  । अर्घ चरन  धर पूजन कारएँ ॥ 

एहि लोक हो चहे परलोका । पूरन काम सरूप बिलोका  ॥ 
जो मन मानस होए सुभागा । जासु चित हरि चरनन्हि लागा ॥ 

नत समउ नत करत प्रनामा । लिए रसन श्री हरिहि के नामा ॥ 
पास चाहे रहे थित छाँती । धरे सिला निअरउ किमि भाँती ॥ 

प्रान लहन जब काल पथ जोए । मरनासन मुख अस्फुरित होए ॥ 
सालगाउँ  के जो सुभ नामा  । गवने प्रानक सो हरि धामा ॥

प्राग काल  एहि सुठि बचन  कहे रहे अमरीस । 
ए तीनउ भूमण्डल पर, मोरे साखि सरूप ॥ 

बुधवार, १० दिसम्बर,२०१४                                                                                                

सालगाउँ ब्रम्हन अवधूता । होत अस्थित जहँ एक सँजूता ॥ 
अघ हरन अस रूप मैं धारा । पातक जन करतन उद्धारा ॥ 

 जो निज परिगह के हित चहहीं । साल गाँउ पद पूजन कहहीं ॥ 
होए आपहु कृतारथ सोहीं  । तासु पितुजन परम पद जोहीं ॥ 

बीतकाम मद मतसर रागी । जसु रति प्रभु चरनिन्हि लागी ॥ 
तिन तैं कथा कथत बिभासे । दिए उद्धरन प्रागितिहासे ॥ 

रहे मगध नाऊ एक देसा । धर्म निरंक कर्म अवसेसा ॥ 
तहँ एक पुलकस जाति निबासिहि । सबर कहत जन जन संभासिहि ॥

करत उत्पात बाध बधत जंतु अनेकानेक । 
पर धन डीठि धरत करें अपकृति एक ते ऐक ॥ 

पुल्कस = एक कलुष-योनि जिसकी व्युत्पत्ती ब्राम्हण व् क्षत्राणी से मानी जाती है 

बृहस्पतिवार, ११ दिसम्बर, २०१४                                                                                   

काम क्रोध सहुँ होत प्रमादा । फिरै बन बन बितथ मर्यादा ।। 
एकु समउ सोए मनुज ब्याधा । भँवरत किए बन जीवन बाधा॥ 

जान बिनु बध मोह के पासा । तासु मरनि आनइ संकासा ॥ 
धरे दंड कर जम के दूता । दरसिहि अस जस को भूता ॥ 

गालु असिक लहि लमनिहि दाढ़े । ताम केस नख नासिक बाढ़े ॥ 
लौहु पास लिए दूतक कोई । दरसिहि जो को हत चित होई ॥ 

लोहित लोचन काल कलूटे । चाप चरन बाढ़त चहुँ खूँटे ॥ 
बधिक मनुज मन ही मन काँपे । जान मुख संग को प्रभु जापे ॥ 

बन जीवन भयभीत पापी अस करे करतब । 
तेहि प्रान लो जीत,पैठत निकट दूत कहे ॥ 

शुक्रवार, १२ दिसंबर, २०१४                                                                                                 

 बन जन जीवन के हत्यारे । कबहुँ कोउ सद करम न कारे ।।  
भाव न माने भगति न माने । तुहरे मुख हरि भजन न जाने ॥  

सदकृत जग हित करे न काही । श्री नारायन सुमिरैं नाही ॥ 
छुभित  दूत ब्याध सो बोले । हरिअर हरिदै भवन हिलोले ॥ 

एहि हुँत तुअ तैं  अग्या होहिहिं। सदन राज जम पथ जोहिहिं ॥ 
देइ संकु कर हमहि अहोरे । करत घात घन लेइ बहोरे ॥ 

तुअ कहुँ कुम्भी पाक दीठाहि । रौरव नरक द्वार पैठाहि ॥ 
अस कह संकु गहै कर दूता । लिए गत उद्यत बढे अगूता ॥ 

तबहि एकु हरिचरननुचर, महात्मन तहँ आए । 
जब जम दूत कर मुद्गर, दंड पास दरसाए ॥  

पुलकस अस्थिति देख, दयाबंत भगवन भगत । 
करुना भाव बिसेख, बन जल निलयन निधि भरे ॥ 

शनिवार, १३ दिसंबर, २०१४                                                                                             

जब पुलकस हे नाथ पुकारा । नीर भरे मन मनस बिचारा ॥ 
मोर होत अपबृत्त अभागी । होए न कठिन दंड के भागी ॥ 

जम दूतक त बढ़े चहुँ खूँटे । तिन सों कोउ जुगत कर छूटें ।। 
कृपालु मुनिस्वर ए बिचार कर । दाहिन कर तल बिष्नु सिला धर ॥ 

पद परछाल पुलकस नियराए । तुलसी दल जुगित पयस पयाए ॥ 
राम नाउ गन गान बखाने । मस्तक बिष्नु बल्लभा  दाने ॥

अरु हृदय भवन हरि सिला धरे । जम दूत बहुर न गुहार करे ॥ 
पटक प्रस्तर बत पथ जोही । सिला परस पिस पिष्टक होही ॥ 

संख चक गदा पदम हरि , अनुचर धरे अगोए । 
धर्मराज के दंड सों, पुलकस मोचित होए ॥ 

रविवार, १४ दिसंबर, २०१४                                                                                                   

पापक हिआ जब निर्भय कृते । बोलि सभोचित बिनई सहिते ॥ 
कहु तुअँ केहि अग्या अधीना । अधर्म कृत बस भए दय हीना ॥ 

ए मरनासन त बिष्नउचारी । पूजनीअ पुनि बपुधर धारी ॥ 
कवन हेतु किमि हे रे आँधे । धरे दंड कर पाँसुल बाँधे ॥ 

सुनि  मुनि गिरा कहे जम दूता । किए एहि  पापक  पाप बहूता ॥ 
धर्म राज अग्या अनुहारी ॥ धर्म राज सठ पंथ जुहारी ॥ 

उन्मग किए न केहि उपकारा । हिंसालु बन जीउ पिरारा ॥ 
तिन ते महतम दूषन होई । प्रानथ पथ गत हो जो कोई ॥ 

महा बधिक तिन्ह बाधित करे अनेको बार । 
पर सम्पद कर आपुना, दीठ धरे परदार ॥ 

सोमवार, १५ दिसंबर, २०१४                                                                                                 

करे दोष खल सबहि प्रकारा । नत समु दिस नाथ गुहारा ।। 
दिए धरनि दुःख सकल सुख भोगे । एहि सठ अहहि न मोचन जोगे ॥ 

तब बिष्नु दूत भए अभिभूता । बोले सप्रेम हे जमदूता ॥ 
होए चहे को केत पिरारे ।  सिला परस मह पातक जारे ॥ 

लगे ज्वाल कनक समतूला । दहे तासु सकलित अघ  पूला ॥ 
रम नाम कहि कानन जासू । नेसए पाप तेहि बिधि तासू ।। 

जान बिनु तुम्ह  भयउ अधीरा । अजहुँ पबित  भए तासु सरीरा । 
तासु परस को सुभगहि पावा । ए पारस मनि पाप दूरावा ॥ 

ऐतक  कहत बिष्नु दूत, अधर दुआरि लगाए । 
जम दूत फिरै जम सदन, सकल प्रसंग सुनाए ॥  





   
















  







  


















Sunday, 16 November 2014

----- ॥ उत्तर-काण्ड २३ ॥ -----

रविवार, १६ नवम्बर, २०१४                                                                                             

सकल जगत जो रखे सुपासे, तहाँ सोए त्रय लोकि निबासे ॥ 
मोर करे सत करम प्रभावा । द्वारवती दरस मैं पावा ॥ 

अबर भगत जो दरसन पावैं । सकल हनन के दोषु दुरावै ॥ 
तहाँ सयमंतु पाँचक नामा । अहहैं एकु अघ हरनै धामा ॥ 

बीर भुइँ कुरु खेह के साथा । देखेहउँ कासी बिसनाथा ॥ 
तहँ सिरु जटिल जटा धर गंगे । तारक ब्रम्हन  नाउ प्रसंगे ॥ 
कासी मुकुति हेतु उपदेसा । पूजिहि जिन नित जपत महेसा ।। 
तासु भूमि जब धरे त्रिसूले । भानुमती निज पथ नहि भूले ॥ 

मनिकर्निका नाउ गहै , पवित तीरथ एकंग । 
लवनाकर मेलन बहे  , उत्तरु बाहिनि गंग ॥ 

सोमवार, १७ नवम्बर, २०१४                                                                                                    

देखा में अस धाम अनेका । सभी अपनपौ परम प्रबेका ॥ 
भुआलू बात कहुँ मैं साँची । घटे मोहि सन जोई काँची ॥ 

होइ रही तहँ जोइ प्रसंगा । हहरि अजहुँ लग मम अंगंगा ॥ 
सब धर्म धूरि जब भमनयऊँ  । काँची के गिरि तब गमनयऊँ ॥ 

तहाँ दीठ  जस दिए देखाईं । अबरु कतहुँ अस दरस न पाईं ॥ 
ते प्रसंग जो सुनिहि सुनाइहि । सनातन ब्रम्ह के पद पाइहि ॥ 

सुर सरिता अँगना  बिस्तारै। सबुइ समउ पद पदुम  पखारें ॥ 
सिखारोपर जब दीठ निपाता । देखा तहँ मैं कोल किराता ॥  

रहि सोइ चतुर्भुज रूप, सिखारोपर धनु धारि । 
बिहरक अरु बिहीन तिलक, फूल मूल फल हारि ॥ 

मंगलवार, १८ नवंबर, २०१४                                                                                                    

भयउ मोहि संदेहू महाना । निरखत तिन्हनि मन महु आना ॥ 
अहो एही धनबिन बन चारी । कैसे भयउ चतुर भुज धारी ॥ 

जोइ बिक्रम बैकुंठ निबासा । दए अभास तिनके संकासा ॥ 
 निगमागम लेखित अबलेखा । जितारि पुरुखिन्हि कू मैं देखा ।। 

प्रभु सरूप किरात कास पाइहिं । जो परिचारक हरि नियराइहि ॥
संख चक्र गदा धरि धनु भाथा । जेहि बिधि सोहहि तासु हाथा ॥ 

कंठ माल बर मुख पर  कांति । दरसि  काहु किरात  हरि भांति ॥ 
भी चिट जब गहनइ संदेहू । पूछ मैं हे सुजन सनेहू ॥ 

कहँ बेहड़ बिपिन गोचर, कहँ यहु रूप अनूप । 
कहु को तुम्ह अरु कैसेउ, पाए चतुर्भुज रूप ॥ 

बुधवार, १९ नवम्बर, २०१४                                                                                                            

सुनि अस तिनके मुख हँसि आनी । दिए उत्तरू पुनि बर मृदु बानी ॥ 
इहँ केर बिसमय पिंडदाना । भयउ ब्रम्हन महिमा न जाना ॥ 

कैसेउ पिंड दायन काऊ । चतुर्भुज धारि रहस बुझाऊ ॥ 
कहत बात जो बचन बखाने । सो बरनइ अरु मैं दिए काना ॥ 

परबत चर एकु जात हमारा । जंबुक तरु फर भखत बिहारा ॥ 
भमनत भमनत निज सख सोही । मंजू अनोहर सिखरु अरोही ॥ 

दीठ दुआरि  दिरिस का देखे । कला कुसल कृत कलस बिसेखे ॥ 
सो अलख अनुपम अद्भुद कृति । मनि रतन जड़ित सुठि सुबरन भिति ॥ 

जासु काँति अस कासि जस कासत कासिक क़ासि । 
प्रकास पुंजी के पालक, अन्धकार के नासि ॥ 

बृहस्पतिवार, २० नवम्बर, २०१४                                                                                    

बालक चित्कृति चितब सकोचा । रह चितबत मन ही मन सोचा ॥ 
यहु कलकृति जस कला सँजोई । निरखे न कतहुँ अस कृति कोई ॥ 

गमन भीत मन कमना जागी । चाप चरन बालक बड़ भागी ॥ 
मंदिरु भीत भवन जब गयऊ । रघुबर  साखी दरसन भयऊ॥ 

मुनि मनीषि रिषि मनु दनु देवा । नारद सारद किए अति सेबा ॥ 
कल कुंतल किरीट केयूरा । कंठ श्री संग बपुधर पूरा ॥ 

कारन मनोहर कुण्डल कासे । जुगल चरण तुलसी पत बासे ॥ 
मंगल परिकर संग अराधे । चतुर भदर बंदइ सुर साधे ॥ 

कतहु कल कुनिक कंठ प्रमादे । नभ गर्जहि नग सिख निहनादे ॥ 
सची नाथ किए सेवा जाकी । दरसत  भगवन के अस झाकी ॥ 

जग बंदित चरन सुरगन, धूप नबैद चढ़ाए। 
अस श्रीनिगरह के निकट, बालक डरपत आए ॥  

शुक्रवार, २१ नवम्बर, २०१४                                                                                                     

सुर हुँत दुर्लभ मनु हुँत अलभा । बालक हेतु भयउ सो सुलभा ॥ 
बिभु श्री बिग्रह प्रीतिबत लाखे। धरे अँजुरी जब तिन्ह भाखे ।। 

सोई भयउ चतुर भुज रूपा । बैकुंठ बसे बिष्नु सरूपा ॥ 
परिकर धर जब गमनु बहोरा । हमहि मनु  अचरजु भय न थोरा ॥ 

पूछि लोगन्हि बारहि बारा । भयऊ अस कस रूप तिहारा ॥ 
बालक बरनन जोइ बखाने । सुनि तिन औरहु बिसमय माने ॥ 

नील नग मूरधन मैं गमना । दरसेउ साखि सहुँ श्री रमना ॥ 
रहे देव सह साखिहि बेदा ।  चढ़ाए चरन ओदन  नबेदा ॥ 

पूजनर्चन पूरन कर बहुरि सकल सुर लोग  । 
सुभागबस ए भगत भयो, तनिक अंस के जोग ॥ 

शनिवार, २२ नवम्बर, २०१४                                                                                                     

मधुर प्रसादु मैं जब भाखा । भयऊँ चतुर भुज रूप साखा ॥ 
होए अचरजु तुम्ह सम मोही । मम रूप ऐसेउ कस होही ॥ 

मुनिबर अस रह हमहि सुभागीं । उर्लभ दरसन के भए भागी । 
अरु अन्नादि प्रसादु जो पाए । भाव पूरनित सबहि मिल खाए ॥ 

रहि ओदन बहु रुचिरु रसारी ।  उतरे सो जब अधर दुआरी ॥ 
प्रबसित रसना देस बिहारे । कंठागत जब उदरु पधारे ॥ 


भगवद कृपा ऐसेउ होई । भगत बछर तन रूप सँजोई ॥ 
कहे लोग मुनि साधु सिधारउ । तुअहि तहाँ  प्रभु दरस निहारौ ॥ 

जग बंदित पद प्रनिधान, ओदन प्रसादु जोहु । 
बिप्रनाथ हम सत्य कहएँ, रूप चतुर भुज होहु ॥   

मुनिवर जोइ  आयसु दिए हम सोइ कहि बुझाए  । 
अनुहारत मति आपनी कहनी सबहि सुनाए ॥ 


रविवार २३ नवंबर, २०१४                                                                                                     
कहि मुनिबर श्रुत  हे जनपाला । किरातिन्हि के बचन रसाला । 
होए तहाँ  अस अचरजु मोही । लोम हरष बहु पुलकित होही ॥ 

चितबत चित भित हरिनै रचिता । लवन लसिता मनि रतन खचिता ॥ 

देवायन  नग सिखर अधारे । साखि रूप रघुनाथ हमारे ॥ 

दरस हेतु  मम चरन अरोही । देइ नयन प्रभु दरसन मोही ॥ 

हस्त परिकर सिरु सूर धूपा । पैं प्रसादु भएँ सोइ सरूपा ॥ 

अजहुँ मोहि प्रभु  गर्भ न घालहि । बपुर्धर गर्भ पीर न पालिहि ॥ 

कहत भूमिसुत हे मह राऊ । सो दुःख हरण तहँ तुअहि जाऊ ॥

मनीषि मुख गिरा श्रुत भए, पुलकित सकल सरीर । 
प्रच्छत तीर्थाटन बिधि, प्रजापत भए अधीर ॥ 

सोमवार, २४ नवम्बर, २०१४                                                                                        

मुनिरु तीर्थाटन बिधि बताए । सुनए सो जग बंदित प्रभु पाए ॥ 
काल पास कंठ सब गहाइहि । कोउ काल सोंह  जित न पाइहि ॥ 

छन भंगूर जग जंजाला । भए अबिनासी जगत भुआला ॥ 
भगवन भव बंधन सन परे । मानत अस तासु  नित भजन करें ॥ 

काम क्रोध मद लोभरि चारा । भय दम्भ चहे केहि प्रकारा ॥ 
भगवन्मय होइहि जो लोगए  । जीवन महु सो दुःख नहि भोगए ॥ 

करे जोई साधु सत्संगा । रहि पलछन सो ज्ञान प्रसंगा ॥ 
साधु सूजन भलमन सोई । जासु कृपा केहु दुःख न होई ॥ 

षट बिकार जित सोए जन दाएँ जोए  उपदेस । 
किए मोचित भव बंधन, रहे न कोउ कलेस ॥ 

मंगलवार, २५ नवम्बर, २०१४                                                                                                    

तीरथ साधु सन हेल मिलाए । तासु दरस घन  पाप दूराए ॥ 
जो जन तीरथ करन  पयाने  । भव भीति सोई करिहि बिहाने ॥ 

जहँ  निसदिन निर्मल जल बासे । साधु सुजन के संग सुबासे ॥ 
तीर्थकर जस बिधि आगाने । मुनिबर पुनि तेसेउ बखाने ॥ 

प्रथमहिं घर सहि कुटुम त्यागिए  । प्रियजन तिय तनुभव बैरागिए ॥ 
राम नाम मुख जपत निरंतर । दत्तचित्त भगवन सुमिरन कर ।। 

एक कोस जोइ होइ पयाना ।  छउर क्रिया कर करें सनाना ॥ 
कारन पाप त केस अधारिहि । जो मनुस  तीरथ पथ चारिहि । 

पाप केस अस देइ त्यागें  । मुंड मस्तक लिए चले आगे ॥ 
काम क्रोध करें न लवलेसा । बर तीर्थोपयोगी भेसा ॥ 

संघाटिका हीन लगुडि  कलित कमण्डलु हाथ । 
चाररि रच्छित ह्रदय लिए चले चरन के साथ ।। 

बुधवार, २६ नवम्बर, २०१४                                                                                             

जो तीरथ पथ बिधिबत जाइहि ।सोए सेवन सकल फल पाइहि ॥ 
मानस मन कर चरन सँहिताए । भिद बिद्या तप कीरत बसाए ॥ 

 जासु निलय श्री हरि धुन लागी ।  होहि  जथारथ फल के भागी ॥ 
हे  भगत बछर हे गोपाला । सरनागत के तुम प्रतिपाला ॥ 

जगत जोग तव सोंह  को नाहि । भव बंधन सन  पाहि मम पाहि ॥ 
जो रसना जे मंत्र उचारे । साधत हित भव सिंधु उतारे ॥ 

जावै साधन सन जो कोई । कर्म परिनाम भाजित होई ॥ 
बाहि भार जिन कंध अधारी । भयउ सोए अध के अधिकारी ॥ 

मारग चरत पयादहि जाईं । भाग फल न त मिलहिं चौथाई ॥ 

बिनु मन ते चहे को के कथन ते अर्धन फल मिलिहि अवसि । 
तीर्थंकर कहत तीर्थगमनत  करे कलुषित करमन बिनसि ॥ 
 पर जब पथ चारे बिधि अनुहारें  तबहि पाइहि फल सही । 
नृप अस तव सौमुख मम लघु मुख बिधि भेद किछु एक ही कही ॥ 

भूपत बिधिबत अजहुँ तुअ तुर तीर्थ पथ जाउ । 

भगवद भगति प्रसादु सह प्रभु दरसन फल पाउ ॥ 

बृहस्पतिवार, २७ नंवम्बर, २०१४                                                                                      

कहत सुमति मोरे गोसाईं । भूपत मुनिरु चरन सिरु नाईं ॥ 
चलि उर बिहबल बायु हिलोले । कपाट उतकरषत हिंडोले । 

नृप पुरबासिन सह परिवारे । अपने सन  ले गवन बिचारे ॥ 
बहुरि सुबुध सचिवन्हि बुलाईं । प्रगस मनोगति आयसु दाईं॥ 

नागर जनिन्हि दैं संदेसा । जोगएँ सो उपजोगी भेसा ॥ 
हरि पौरी दरसन अभिलाहेँ । तीर्थ हुँत जो चलेउ चाहैं ।। 

पुरी पुरउकस बर पुरंजनी । पत्नी पत बालक जनक जनी ॥  
धन धावन साधन अनुरागे । जासु लगन अनीति महि लागे ।।

ऐसेउ पतपानि हीन कुटुम संग का लेन । 
लेन लेन की लाग महुँ जाने ना कछु देन ॥

शुक्रवार, २८ नवम्बर, २०१४                                                                                               

जिनके चित प्रभु सुरत न आना । सोए सौकरिक जूह समाना ॥ 
राम नाम एक मुख जो लीन्हि । अंतर तमस प्रभामय कीन्हि ॥ 

हेरि सरन दुखि मन जो कोई । प्रभो चरन सम कोउ न होई ॥ 
गुंफ मनि गुन गिरा मनोहर । सत्यनाथ महमात श्रवन कर ॥ 

कर्ष मीर मन हरष हिलोरा  । जुगित पुरउकस हनत ढिंढोरा ॥ 
भूपत जेसेउ आयसु दाए । जस के तस जन करन्हि धराए ।। 

पुरबासिन् सादर संबोधे । तीरथ समाचार कह बोधे ॥ 
प्रभो चरन दरसन प्रत्यासी । परबासि हो कि कोउ निबासी ॥ 

पबित परबत रोहन जोग, जोरत रहउ समाज । 
हरि दरसन सँग लए गवन जोग रहे महराज ॥ 

शनिवार, २९ नवम्बर, २०१४                                                                                                  

दरस रघुनाथ चरनारबिंदु । सकल भव सिंधु होहि सम बिंदु ॥ 
करिहौ गउ खुर न्यास समाना । जस निगमागम कहत बखाना ॥ 

परिचारक परिकर भूषित कर ।  होइहु तुअहिहु सरूप श्रीधर ॥ 
एहि  बिधि रघुबर चरन धिआनी । सकल सोक संताप दूरानी ॥ 

सचिउ का पुरी का संकासा । नृप अदेस सर्वत्र उदभासा ॥ 
सचिउ की भाव पूरित भनिता । जन जन हुँत भई अनंदयिता ॥ 

अवसर हुँत  घर धरे सुबेसा । भरे बपुर्धर सुन्दर भेसा ॥ 
निकस समाजत भवन बहारे । भूपति प्रति सब प्रगसि अभारे ॥

ब्रम्हन आनत आसिर दानत धनुधृ छत्रि तिन् संग खड़े । 
साज सँभारे बिबिध प्रकारे बैस सहित अगहुँ बढे ॥ 
भव सिंधु अपारा पावन पारा  उरसति उतकरष भरे 
धर्माचारी सेवा कारी छुद्रहु संग संग चरे ।। 

सूत कृत का सूतक भिद नत केवट का तेलि । 
सूत मगध बंदी बैदु करे सकल हिल मेलि ॥  

रविवार, ३० नवंबर, २०१४                                                                                  

धवल स्याम बरन महुँ पागे । भरी भोर भूपत उठि जागे ॥ 
संधि बंदन कीन्ह अनहाए  । तपस्बी बर  ब्रम्हन बुला पठाए॥ 

तासु आसीर आयसु लीन्हि । तीरथ हेतु निकाससी कीन्हि ॥ 
आगि आगि चलेउ महराई । पिछु पिछु पुरबासिंहि आईं ॥ 

नभ चस जस अनगन नख घेरे । घेरि पुरंजन तस बहुतेरे ॥ 
 कोसांतर भर जब चले आए । सब बिधिबत भद्रा करन कराए ॥ 

कर दंड कमण्डलु कलित करे । तीरथोपजोगी भेस भरे ॥ 
एही बिधि मह तेजस जनपाला । भद्रकरन कृत त्रिपुण्डित भाला ॥ 

काम क्रोध सो रहित मन कर दिए बहुतक दान । 
भगवन सुमिरन लयन किए, बहुरी करे पयान ॥ 


 




















  



























Monday, 3 November 2014

----- ॥ उत्तर-काण्ड २२ ॥ -----

रविवार, ०२ नवम्बर, २०१४                                                                                                   

दरस दुअरिआ महा रिषि आए । हरषत अगुबन  प्रभो उठि धाए ॥ 
पालउ हरित नयन भए थारिहि  । अँसुअन पयसन पाँउ पखारिहि  ॥ 
महर्षि को जब आते देखा  तब प्रभु श्रीराम चन्द्र जी उनके स्वागत हेतु दौड़ पड़े । पलकें दूर्वादल हो गईं लोचन थाल हो गए पयस हुवे अश्रुओ से प्रभु ने मुनि को अर्घ्य-पाद्य आदि अर्पित किया ॥  

चरण धूरि तव भवन बिराजे । आजु पबित भए हबि सह साजे ॥ 
कहि प्रभु मुनि मैं परम सुभागा । ससि सम गिरा भरे अनुरागा ।। 
तब प्रभु ने चंद्रमा के समान शीतल व् अनुराग पूरित वाणी से कहा हैं : --मुनि यह मेरा परम सोभाग्य है कि आपकी चरण-धूलि इस भवन में  विराजित हुई आज आपने सामग्रियों सहित यज्ञ को पवित्र कर दिया । 

सुनि मुनि सीत गिरा भगवन की । भई जल मई छबि लोचन की ॥ 
भए ऐसेउ पेम अतिरेका । हरषे रोमन अलि  प्रत्येका ॥ 
भगवान की शीतल वाणी को श्रवण कर उनके नेत्रों की छवि जलमई हो गई । प्रेम के निरंतर पोषित होने से उनके शरीर का रोम-रोम हर्षित हो उठा ॥ 
 बोले मुनिबर हे सद्चारी । धर्म बीथि के राखनहारी ॥ 
सर्बथा एहु उचित मैं माना । करिहू जस बिप्र कर सम्माना ॥ 
तब मुनिवर बोले : - हे धर्म मार्ग के रक्षक ! हे सदाचारी ! जिस प्रकार आप ब्राम्हणों का अभिनन्दन कर रहे हैं उसे मैं सर्वथा उचित मानता हूँ । 

अचिंतनी तपो बल इत सत्रुहन दृग दरसाइँ  । 
जग बंदित ब्रह्म बल के करेउ भूरि बड़ाइँ ॥ 
शेष जी कहते हैं -- मुने ! महर्षि च्यवन के अचिंतनीय तपोबल के दर्शन कर इधर शत्रुध्न ने विश्ववन्दित ब्रम्ह्बल की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की । 

सोमवार, ०३ नवम्बर, २०१४                                                                                                   

सत्रुहन मन ही मन महु सोचे । कहँ तपसी कहँ कामज पोचे ॥ 
एक के अंतर भयऊ सुचिता । दुज  के बिषय भोग निहिता ॥ 
वे मन में विचार करने लगे कि कहाँ तो तपोबल से युक्त तपस्वी कहाँ तपोबल विहीन व्यभिचारी लम्पट । एक का अंत:करण विशुद्ध व् पवित्र होता है दूसरे का विषय भोग में संलिप्त रहता है । 

कहँ पारस मनि सम बल तापा । जासु परस हरि जग संतापा ॥ 
कहँ भोग बिषय तप बल हीना । करे जगत जो ताप अधीना ॥ 
कहाँ पारसमणि समान तपोबल जो अपने स्पर्शमात्र से संसार के संतापों का हरण कर लेता है कहाँ तपोबल से विहीन के विषय भोग जो संसार को सन्तापो के अधीन करते हैं । 

सोच मगन सत्रुहन मुनि धामा । चार घरी लग करे बिश्रामा ॥ 
पुनि पयषिनि कर किए पय पाना ।  तुषित कंठ हरिदै सुख माना ॥ 
इस प्रकार विचार करते हुवे कुछ समय के लिए मुनिवर के आश्रम में विश्राम कर पयोष्णी नदी का जल पिया कंठ की तृप्ति से हृदय ने सुख का अनुभव किया ॥ 

 तुरंगहु पान  पुनि दुह सलिला । चलेउ अगहु मग अल्क अलिला ॥ 
निरख जूथ निकसत घन गाछे । चले साज लए पाछहि पाछे ॥ 
मेधिय तुरंग भी पयोष्णी नदी का जल पीकर आगे के मार्ग प् चलने लगा जो वृक्ष की पंक्तियों से युक्त था । सैन्य समूह ने जब उसे घने वन के मध्य से निकलते देखा तब सामग्रियों सहित वह भी उसके पीछे चलने लगा ॥ 

कछु रथ सथ कछु पयादिक, कछुक तुरग अवरोहि । 

को ढाल भाल बिकराल, को कोदंड सँजोहि ॥ 
कुछ रथों पर, कुछ घोड़ों और हाथियों पर,कुछ पयादिक ही चल रहे थे कोई ढाल, कोई विकराल भाला कोई धनुष  धारी था । 

सत्रुहनहुँ भए अनुगामिन, सहित सेन चतुरंग । 
सत अस्व जुगित  रथोपर बिराजत सुमति संग ॥ 
इस प्रकार सुमति का संग प्राप्त सप्त अश्वी रथ पर विराजित शत्रुध्न ने चतुरंगिणी सेना के साथ तुरंग के मार्ग अनुगमन किया । 

मंगलवार, ०४ नवम्बर, २०१४                                                                                       

दिन मुख अनीक आगिन  बाढ़े ।  अपराह्न जब दिनकर गाढ़े ॥
अनीकिनी  तहवाँ चलि आई । राजत रहे जहँ बिमलु राई ॥
प्रात:काल हुवा सेना आगे बढ़ने लगी अपराह्न के समय जब सूर्य देव जब पूर्ण तेज से युक्त थे तब सेना वहां पहुंची जहाँ राजा विमल का राज था । 

रत्नातट नगरी नाउ धरे । झरी झर झर निर्झरी नियरे ॥
राउ जब सेवक सोंह श्रवने । रामानुज सैन संग अवने ॥
 उस नगरी का नाम रत्नातट था जिसके निकट झर झर करता झरना दृष्टिगत हो रहा था । सेवकों के  माध्यम से राजा ने सुना यहाँ सैन्य सहित भगवान राम के अनुज का आगमन हुवा है । 

मेधिया तुरग बिनु अवरोधा । सजै साज सों सकल सुजोधा ॥
बाहिनी संग अस सैन सुहाए । चातुर बरन  कह  बरनि न जाए ॥
अनवरोधित उस मेधीय अश्व को संरक्षित करती सेना श्रेष्ठ योद्धाओं से युक्त वाहनियों द्वारा इस प्रकार सुशोभित है कि उसके चातुर्य अंग के वर्णन नहीं किया जा सकता  ॥ 
सुनत पैठि नृप सत्रुहन पाही । तुरग तूल  गति चरण  गहाही ।।
राज पाट सब आगे राखा । सौपत सरबस कातर लाखा॥
यह सुनकर राजा श्रवण मन की गति के समतुल्य चरणों की गति गहन कर शत्रुध्न के पास पहुंचे ।  राजपाट सौप कर उन्हें अपना सर्वस अर्पण कर दिया और कातर दृष्टि से निहारने लगे ॥ 

कहि न सकहि किछु प्रेम बस, जोग रहे दुहु पानि । 
बहोरि हरिअरि भाउ भरि , बोले अस मृदु बानि ॥  
प्रेम के वश कुछ कहने में असमर्थ हो रहे थे ।  फिर दोनों हाथ जोड़कर भाव पूरित मृदुल वाणी से वह मंद स्वर में बोले : -- 

बुधवार, ०५ नवम्बर, २०१४                                                                                                       

 कथनत मैं काजु सोइ  करिहउँ । दएँ जो आयसु सो सिरु धरिहउँ ॥ 
ललकि लगे कर चरन छड़ाईं । नहि नहि कहि लखमन उर लाईं ॥ 
हे राजन ! आप जो भी आज्ञा देंगे में उसे सिरोधार्य करूँगा आप जो कहेंगे में वही कार्य करूँगा ॥ शत्रुघ्न ने उन्हें अपने चरणों में नतमस्तक देखकर नहीं नहीं कहते हुवे उन्हें चरणों से विलग कर ह्रदय से लगा लिया ॥ 

मैल मलिन प्रभु पंथ बिजोगे । मोर चरन नहि तव कर जोगे ॥ 
राज पाट पुनि सुत कर दीन्हि । नेकानेक सुभट सन कीन्हि ॥ 
(यह  कहते हुवे कि ) मेरे चरण मलिन व् प्रभु के पथ से वियोजित हैं यह तुम्हारे प्रणाम के योग्य नहीं है । राजपाट पुत्र को सौंपकर अनेकों कुशल युधिकों को साथ लिया । 

धनुधर पुंजित सर भर भाथा । चले बिमलहु अरिहंत साथा ॥ 
नन्द घोष सब मुख गुंजारे । जय जय जय रघु नाथ पुकारे ॥ 
सर समूह से भरीपूरी तूणीर व् धनुष धारण कर राजा विमल भी अरिहंत के संग चल पड़े । सभी मुखों से मनोरम हर्षध्वनि गुंज उठी, अयोध्या पति श्री रघुनाथ का कर्णप्रिय जयघोष होने लगा । 

जोइ जोइ रायसु मग आने  । यहु  नन्द घोष जब दिए काने ॥ 
मेधिआ तुरग करैं प्रनामा । कटक कोट को रहे न बामा ॥ 
मार्ग में जिस जिस राजा ने इस जयघोष को सुना सभी ने मेधीय अश्व नतमस्तक हो गए ।  करोड़ों सैनिकों से सुशोभित होते हुवे भी किसी ने उनका विरोध नहीं किया । 

नाना भोजन भोग परोसएँ । मनिक रतन सत्रुहन परितोषएं ॥ 
आगे चले रघुबर के भाई । पहुमिहि अतिसय पंथ लमाई ॥ 
वे नाना भोग सामग्रियों से सत्कार कर वे शत्रुध्न को मणि रत्न व् धन भेंट में देते । पृथ्वी ने मार्ग  दूर तक बड़ा लिया थे अश्व का अनुगमन करते शत्रुध्न आगे चले । 

 एहि भांति बढ़त जात एक ,  देखे ऊँच पहाड़ । 
भर अचरज सत्रुहन चरन , रही गयउ तहँ ठाड़ ।। 
इस प्रकार मार्ग पर बढ़ते हुवे शत्रुध्न जो एक ऊंचे पर्वत के दर्शन हुवे ।  आश्चर्य में डूबे शत्रुघ्न के पग वहीँ स्थिर हो गए । 

बृहस्पतिवार, ०६ नवम्बर, २०१४                                                                                              

 चकित होत बोले मंत्रीबर । ए भूधर हैं कि हैं  रजताकर ॥ 
सिखा सिखा सित कर अति सोही । श्रीमन कहु ए कवन के होंही ॥ 
चकित होकर उन्होंने कहा : -- हे मंत्रिवर ! यह पर्वत है कि कोई रजत की खान है इसकी प्रत्येक शिखा शुभ्रता से सुशोभित हो रही है ।  श्रीमान ! कहो यह पर्वत किसका है ? 

यह अद्भुद सुंदर अवरेखा । श्रेनि करन अस कतहुँ न देखा ॥ 
अवनत होत परसइ अगासा । का इहाँ कोउ देउ निबासा ।। 
इसकी अद्भुत सुंदर रेखाएं इसका ऐसा श्रेणीकरण और कहीं नहीं दिखाई दिया । यह नतमस्तक होकर आकाश को स्पर्श कर रहा है क्या यहाँ कोई देव निवासरत है ? 

करे केतु कोमल कल कांति । चितबत पावत चितवन सांति ।। 
सत्रुहन मन अस जगि जिग्यासा । सरि सौमुख जस जगे पिपासा ।।
शोभा का वर्धन करने वाली किरणों की सुकोमल दीप्ती का दर्शन कर मेरे थकित नयन को शान्ति की अनुभूति हो रही है । जिस प्रकार सरिता के सम्मुख  पिपाशा जागृत होती है उसी प्रकार शत्रुध्न के मन में जिज्ञासा जागृत हुई ॥ 

सुबुध सुमतिहु अस उतरु दाईं । जस पनिहारिन जस तीस  बुझाईं ॥ 
निरखउ नग निभ  नयनभिराम । रजताभ धर  नील धरि नामा ॥ 
बुद्धिवंत सुमति ने इस प्रकार उत्तर दिया जैसे कोई पनिहारी पिपासु की प्यास का हरण करती हैं । आप जिस नयनाभिराम पर्वत के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं रजत की आभा लिए हुवे वह नीलांचल पर्वत है । 

फटिक  प्रस्तर सिखा धर इहाँ रतन फटिक मनोहरश्रेनि  ।  
चहुँ कोत प्रस्तरित होत, सँवरइ मनिबेनि ॥ 

शुक्रवार, ०७ नवम्बर, २०१४                                                                                                   

सिल सिल भरि जस स्वेतांबर । एतद् लागिहि अतीउ मनोहर ।। 
एहि दिरिस चित्र ते निरख न पाए । अबर तिय पर जो दीठि धराए ॥ 

जो हरि गुन सनमान न दीन्हि । जो तिन्ह पर भरोस न कीन्हि ॥ 

मह पुरुषन्ह जो पथ दरसाएँ  । तासु बिमुख रचे निज रचनाएँ ॥ 

श्रौत स्मार्त धर्म न माने । अपनै आपहि समुझि सुजाने ॥

रहत दीठ जो दीठ न जोईं । तिन्हनि ए दिरिस दरस न होई ॥
वेदोल्लखित  विचारों की अवमानना 

बिपनई पन नील अरु लाहा । धरि धंधक दधिज द्विज  नाहा ॥
मुकुलित मोहित मद बिहबलिता । होइ सोइ एहि दरस बंचिता ॥

जो पालक कनिआँ नहि दानें । लोभु बिबस तिनके पन ठानै ॥
कोऊ बरन होए जो कोई । तेहु ए सुभाग लहन न होई  ॥

सील सती के चरित पर, मलइहि जोउ मलान । 
पसु पटतर आपहि चरए,  दाए न को कर दान ॥ 

शनिवार, ०८ नवम्बर, २०१४                                                                                                       

आप पकावैं आपहि खावैं । पर सम्पद कुडीठी धरावैं ॥ 
जो निज दहरि दुवरिआ आने । छुधा पीरित करै अपमानै ॥ 

जौ प्रतिहस्तक केरि प्रतीती ।घातत तिन  प्रति  करें कुरीती ॥ 
जासु दुजन के मान न भावै । दूजि सुख सम्पद न सुहावै ॥ 

भजन बिमुख हरि कथा न गावैं । तेहु इ दरसन दरस न पावैं ॥ 
प्रति प्रस्तर अति  पावन  होई । हरि निबास अरु सुहा सँजोईं ॥ 

इहँ सुरन्हि के मौलि मूर्धन् । बिनैबत होत  नत परसि चरन ॥ 
जो सतजन के अनुचर होई । सोइ दरस जुगता संजोईं ॥ 

कारन जहँ पुन्यातमन्, भगवन बिराजमान । 
तासु पथ अनुगामिन जो, सोई तहँ लग आन ॥  

रविवार, ०९ नवम्बर, २०१४                                                                                               

नेति नेति जिन  बेद  निरूपा । निजानन्द निरुपाधि अनूपा ॥ 
घन बाहन सन सुर बहुतेरे । जिनके पदुम चरन रज हेरे ॥ 

 बाँचत महा बचन बेदंता । जिन्ह उद्बोधि बिदु सों संता ॥ 
महमहिमन श्रीमन गोसाईं । मह गिरी माहि बसति बसाईं ॥ 

जो एहि नील गिरिहि अवरोइहि। प्रभु पद नत पुन कर्मन जोइहि ॥ 
पूजन पर कर गहत प्रसादा  । चातुर भुज सरूप सो होइहि ॥ 

सुनु एहि कथा पुनीत पुरानी । जिन किछु सुधिजन लोग बखानी॥ 
काँची पुरी नाउ एकु देसू । रत्न गींउ तहँ बसइ नरेसू ॥ 

सुहा सम्पद सों सम्पन, पूरब में हे तात । 
जन श्रुति संबाध संग, रहि जो जग बिख्यात ।।  

सोमवार, १० नवम्बर, २०१४                                                                                                   

रचे पचे पथ परिगत पाली । रही अतीव सुसमृद्ध साली ।। 
द्विजोचित कृत करैं निरंतर । बसइ ऐसेउ तहाँ द्विजबर ॥ 

सकल जन जीवन के हितकारि  । द्रवउ सो दसरथ अजिरु बिहारि ॥ 
तिनके कीर्तन हुँत  उछहही । तहाँ प्रति जुधिक रजतन्तु लहहि ॥ 

परधन परतिय न दीठ धराएँ । रन भूमि  सोंह न पीठ डिठाएँ ॥ 
लख भेदि लहैं रिपु सन  लोहा । किए दूरापतन पर बिद्रोहा ॥ 

करए खेति बिपनन कनधारी ।सुभ बृत्ति सन जिअत बैपारी ॥ 
रखे रघुबर चरन अनुरागा ।  छुद्रा सेवा धर्म महि लागा ॥ 

सब मुख भवन जिहा पलन, किए प्रभु राम बिश्राम । 
चारि रच्छक राख रखे, दया दान सत दाम  ॥ 

मंगलवार, ११ नवम्बर, २०१४                                                                                                     

अधमी मनुज कि पाँवर पोचे । पाप करमन मन सो न सोचे ॥ 
नेम नयन सबहिं सम लाखएँ । धर्मबान जन मुख सत भाखएँ ॥ 

कभु दुखदाई बोल न बोले । जहँ न्याय कहुँ मिले न मोले ॥ 
को चितबन् धन लोभ न जोईं । निरर्थक कोप  करैं न कोई ॥ 

जुगता अनुहर किए श्रम काजे । सील बिरध जहँ घर घर राजे ॥ 
लाभ लब्ध हुँत चित नहि लोभा । लसत लावनी श्री की सोभा ॥ 

रह जहँ फलद सुखद सब काला। लैह नीति हित लोक भुआला ।। 
प्रजा तईं कर लेइ छटाँके । ता ते अतीउ कबहु  न ताके ॥ 

पालिहि प्रीत सहित एहि भाँती । बिते समउ सह बहु सुख साँती 

तिनकी पतिब्रता पतिनी के, नाउ रह बिसालाखि । 
एकु दिवस भूपति तापुर,  लख अस प्रियतस भाखि ॥  

बुधवार, १२ नवंबर, २०१४                                                                                                            

 सुख धन सन धनि भए सब लोगे । प्रिए तव तनुभव भयउ सुजोगे ।। 
मह बिष्नु केर प्रसादु सोंही । कोउ अवसादु होहि न मोही ॥

कहत राउ अब लग हे देई ।  को तीरथ के भयउँ न सेई ॥ 
मन महुँ उपजिहि एक अभिलाखा । देउ धाम देखउँ मैं साखा ॥ 

धरम धाम महतम मैं जाना । जहँ लग जीवन किए कल्याना ॥ 
रहे जोइ निज उदर परायन । बिषयनुरत पूजै न भगवन ॥ 

एतदर्थ सुनौ हे कल्यानी । राज प्रसासन दे पुत पानी ॥ 
यहु रज प्रभुता भए अति भारी । अजहुँ कुँअरु भुज सिखरु सँभारी ॥ 

तीर्थाटन हुँत चलन चहिहूँ  । तव सन पबित हृदय सों कहिहूँ ।। 
मनोभाव अस प्रगस भुआला । धिआनस्थ भए सँधिआ काला ॥ 

अरध रयन भयउ मसिपन, नयन नीँद जब लेखि । 
एकु तपसी ब्रम्हात्मन्, सपनेहु माहि पेखि ॥ 

बृहस्पतिवार, १३ नवम्बर, २०१४                                                                                            

भजनन भनितत भए भिनुसारे । उठे भूप नित कर्मन कारे ॥ 
उताबर चरन सभा गह गयउ । बीच सिहासन बिराजित भयउ ॥ 

ऐतक महु दृग देइ दिखाई । एक कंथिन ब्रम्हन कृष काई ॥ 
बलइत बलकल कटि कउचीना । मूर्धन् जटा मंडल  धीना ॥ 

छड़ि  कमंडलु धरे एक हाथा । लसित नयन तेजसि मुख साथा ॥ 
तीरथ भरमन सेवन संगा । भयउ पबित पाबन अंगंगा ॥ 

निरखि तपसि जब रत्ना गीवाँ । रहे न हृदै हर्ष के सीवाँ ॥ 
नत मस्तक कर जोग जुहारी । दुर्बा पयसन पाँउ पखारी ॥ 

आतिथेय अतिथि ब्रम्हन सादरासन दीन्हि । 
भए श्रम प्रसम परिचय लिए , सप्रसय प्रश्न कीन्हि ॥  

शुक्रवार, १४ नवंबर, २०१४                                                                                              

मुनिरु  दरस रह रोग न पीरा । पाप रहित भए दरसि सरीरा ॥ 
बसि जिन्ह बसति दीन दुखारे । रच्छा हुँत तहँ आप पधारेँ ॥ 

अजहुँ मैं बयोगत बिरध भया । महत्मन करउ मोहि पर  दया ॥ 
तुम बिद्वज्जन कहु समझाऊ । धरम धाम को मोहि सुझाऊ ॥ 

गर्भ बास तन पीर सँजोई । ताहि हरन समरथ जो होई ॥ 
तुम तपोबिरध सिद्ध समाधी । सर्वज्ञात तुम  परम उपाधी ॥ 

ब्रम्हं पुनि अस बोल बताईं । तुहरी सेवा बहु सुखदाई ॥ 
राजन मन जूँ जगि जिग्यासा । करे साँत मुनि बहुंत सुपासा ॥ 

अतिथिजन के सतकर्ता हे महनिअ महिपाल । 
हरे पीर सो सुरति एक, रघूद्वेह दयाल ॥ 

शनिवार, १५ नवम्बर, २०१४                                                                                                    

देखिहुँ मैं नग नदी अनेका । पातक हरनिहि पुरी प्रबेका ॥ 
अनेकानेक जनपद में देखा । प्रानथ पथ गत चित  अवरेखा ॥ 

तापी सरजू नगरि अजोधा । हरि  दुआरि अवन्ती बिबोधा ॥ 
बिमला काँची पुर मैं पेखा । सागर गमनि नर्बदा देखा ॥ 

तिनके दरसन पाप  नसावें । किए मनोरथ सो पूर पावैं ॥ 
जो कोउ हाटक तीरथ करे । कोटि हनन के सो पाप हरे ॥ 

मल्लिक मंदरु जग बिख्याता । पाप नसाउब  मुकुति प्रदाता ॥ 
सेबित देबासुर दुहु साखा । सोइ दुआरवती मैं लाखा ॥ 

धरे नूपुर चरन गौर बरन जहँ परम पाउनी गउमती ॥
जासु जल साखी कंजनी लाखी गहि गगनागना गती ।। 
सय जो साई लए कहलाईं मुकुत दाई जिन श्रुति कहे । 
पुन प्रत्यास इहाँ जोइ निबासे  कलि प्रभाउ बिनु रहे ॥ 

बन गोचर का गगन चर का कृमि कीट पतंग । 
पाहनहु चक्रक चिन्हिते, तहँ के मानस संग ॥