Monday, 24 July 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

श्रम करम गौन करत तब भयऊ अर्थ प्रधान | 
पददलित भए दीन हीन गहे मान धनवान || १ || 
 भावार्थ : -- श्रम व कर्म को गौण कर जन संचालन व्यवस्था में अर्थ प्रधान हो गया,  इस प्रधानता से दरिद्र पद दलित होने लगे व् धनाढ्य मान्यवर हो गए  |

होइब अर्थ बिहीन जो जिनके भेस भदेस | 
विलासित भवन तिन्हने निरुधित भयउ प्रवेस || २ || 
भावार्थ : -- अब जो कोई दरिद्र है जिसका भेष भद्दा है भव्य-भवनों एवं अर्थ पतियों के सभा-सदन में उसका प्रवेश निषिद्ध हो गया |

अर्थ प्रधान बिधान ने दियो रेख एक खींच | 
ऊँचे कू  ऊँचे कहे नीचे कू कह नीच || ३ || 
भावार्थ : -- अर्थ की प्रधानता को स्वीकार्य करने वाले संविधानों ने एक रेखा खींची जिसे निर्धन रेखा कहा गया | जो इस रेखा के ऊपर होते वह अब  सभ्रांत हो गए और सभ्य कहलाने लगे जो इसके नीचे होते वह क्षुद्र होकर
अछूत हो गए और नीच कहलाने लगा |  

Saturday, 22 July 2017

----- ॥ टिप्पणी १२ ॥ -----

>> पवित्र ग्रंथों के सार में ईश्वर होते हैं, भारत का संविधान के सार में अपवित्र नेता क्यों हैं.....?

>> भगवन पाहि पहुँचावै दरसावत सद पंथ |
धर्मतस सीख देइ सो जग में पावन ग्रन्थ || 
भावार्थ : - ग्रन्थ मनुष्य का मार्गदर्शन करते हुवे उसे ईश्वर के पास पहुंचाता हो | जो ग्रन्थ धर्म का अनुशरण कर मनुष्य को सत्य, दया, दान के सह त्याग व् तपस्या की शिक्षा देता हो वह ग्रन्थ पवित्र होता है.....
>> गौरक्षकों का प्रतिरोध का ढंग यद्यपि  बुरा है भगत सिंग के जैसे उनका  आशय बुरा नहीं है, जबकि गौ हत्यारों का आशय बुरा है अमानवीय है.....
मनुष्य एक शक्तिशाली प्राणी है वह मनुष्योचित धर्म की मर्यादा में रहे.....
इस हेतु  : -- दंड की व्यवस्था वहां भी और यहां भी हो.....

>> मनुष्य को यह अधिकार किसने दिया कि वह धरती के पेड़ों को नोच दे और उसके जीव-जंतुओं का रक्तपान कर उनकी खाल खा जाए, उनपर इसलिए क्रूरता करे कि वह निर्बल व् निरीह हैं.....? उनके मुख में वाणी नहीं है.....?

>> 'यतो धर्मस्ततो जय:'
अर्थात : - जहाँ धर्म होता है वहां जीत होती है'
सर्वोच्च न्यायालय का यह आदर्श वाक्य है
धर्म किसे कहते हैं..... ? सर्वोच्च न्यायालय जनमानस को बताए.....

>> वर्तमान परिदृश्य में कांग्रेसियों का बनाया संविधान भगत सिंग की मृत्यु दंड को भी सही कहता..... स्वतंत्रता के नाम पर कोई मनुष्य को कैसे मार सकता है भई.....   

Tuesday, 18 July 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

धरम अनादर मति करो होत जहाँ अवसान | 
ताहि  कंधे पौढ़त सो पहुँचे रे समसान || १ || 
भावार्थ : --  सत्य,तप,दया और दान आदि धर्म साधारण धर्म है जो सभी मनुष्यों होना चाहिए |  विशिष्ट धर्म का भी अनादर नहीं करना चाहिए, जीवन रूपी संध्या के अवसान होने पर धर्म के कंधे उठकर वह श्मशान पहुंचता है |

मुए जगत निरबसन कियो  धरम दियो ओहार | 
बासत पुरबल देहि कै करिया सो उद्धार || २ || 
भावार्थ : - मृत्यु के पश्चात दुनिया जब मनुष्य को निर्वस्त्र करती है, तब धर्म ही उसे वस्त्र देता है |  दुर्गन्ध आने के पूर्व धर्म ही मृत शरीर का उद्धारकर्ता है |  

भोजन बासा बसन जब भै जिअ के चिन्हारी | 
ताहि प्रबंधन अर्थकर करिअब नीति अनुहारि || ३ || 
भावार्थ : -- सभ्यता के पश्चात जब भोजन वस्त्र व् आवास मनुष्य के  जीवन हेतु आवश्यक साधन हो गए तब कतिपय नीतियों का अनुशरण करते हुवे उसने अर्थ को प्रबंधित किया |

अर्थात : --  मनुष्य द्वारा अर्जित किये गए धन को किस प्रकार प्रबंधित किया जाए कि वह सरलता पूर्वक इन आवश्यक साधनों को प्राप्त कर सके यह उपक्रम अर्थ -प्रबंधन कहलाया |

दूसरे शब्दों में : -- सार्वजनिक राजस्व और उसके आय-व्यय की व्यवस्था ही अर्थ-व्यवस्था है |

भोजन बासा बसन जब भै जिअ के चिन्हारी | 
ताहि प्रबंधन अर्थकर करिअब नीति अनुहारि || ३-क || 
भावार्थ : -- सभ्यता के पश्चात जब भोजन वस्त्र व् आवास मनुष्य के  जीवन हेतु आवश्यक साधन हो गए तब कतिपय नीतियों का अनुशरण करते हुवे उसने अर्थ को प्रबंधित किया |

जब गगन तेउ औतरी  घन बासिनि बिद्युत | 
बहुतक साधन संग सो भयऊ जटिल बहूँत || ३-ख || 
भावार्थ : -- और जब घन निवासिनी का धरती पर प्राकट्य हुवा और विद्युत् का आविष्कार हुवा तब इन आवश्यक हेतु के सह अन्यान्य संसाधनों की व्यवस्था के फलस्वरूप अर्थ नीतियां जटिल होती गई | 

एक अर्थ हेतु स्वारथ एक परमारथ हेतु | 
यहाँ अधर्माधीनता यहाँ धरम के सेतु || ४ || 
भावार्थ : -- सत्ता के लालच ने अर्थ को दो भागों में विभक्त कर दिया | अब अर्थ एक स्वहित के हेतु और एक परहित के हेतु व्यवस्थित होने लगा | जहाँ  स्वहित हेतु व्यवथित होता वहां यह अधर्म के अधीन होता जहाँ परहित के हेतु व्यवस्थित होता वहां यह धर्म के द्वारा मर्यादित रहता, अर्थात उत्तम रीति से यह प्राप्त किया जाता और उत्तम नीति से यह व्यय किया जाता.....

लोह लेत जग लोहिता भयउ लोह कर जोइ   | 
दोहत कोयर सब कतहुँ कोयर कोयर होइ || ५ || 
भावार्थ : - मध्य कालीन युग में लोहा पृथ्वी से निष्कासित होकर जब मनुष्य के हाथ में आया तब कलह-क्लेष से  उसने संसार को रक्त से लाल कर दिया  | आधुनिक काल के प्रारम्भ में जब कोयले का भी दोहन होने लगा तब उसकी करनी से चारों ओर मलिनता व्याप्त हो गई |

छूटत गया बधावना छूटत गए सब ग्रंथ | 
कलि का चाका गति गहा लोहल भए जब पंथ || ६ || 
भावार्थ : -- पृथ्वी के संग्रह का रहस्योद्घाटन होते ही उसकी संचित धन-सम्पदा  शनै: शनै:  रिक्त होने लगी | जब वह लोहपंथी हो गई तब आधुनिक काल का पहिया द्रुत गति से संचालित होने लगा |  

आठ जुग के ठाट जुटे, परे देह पर पाँखि | 
चरन धरा कू छाँड़ के  गगन धरे तब लाखि || ७ || 
भावार्थ : -- मानव के संसाधन अब देखते ही बनते थे उसकी देह में जैसे पंख उग आए हों उसके चरण धरती पर न पड़कर गगन पर धरे दिखाई पड़ने लगे   | जितनी सुख-सुविधाएं उसने इस एक काल में संकलित की  उतनी सभी कालों को मिलाकर भी नहीं की  |  १०० -१५० वर्षों में पृथ्वी का जितना दोहन हुवा विगत कालों में उसका १% भी नहीं हुवा |

समय पुरब उद्यम बिनहि, भाग तेउ अधिकाह  | 
पाप करम उपजाइया सुख साधन करि लाह  || ८ || 
भावार्थ : -- उद्यम के बिना समय से पूर्व और भाग्य से अधिक सुख साधनो की लालसा ने कुत्सित कर्मों को उत्पन्न किया  |

अधिकाधिक की दौड़ जनि जोड़ जोड़ की होड़ | 
लाखोँ लाख लिखा भयो  कौड़ी भयउ करोड़  || ९ || 
भावार्थ : -- अधिकाधिक सुख उपभोग के फेर ने फिर संग्रह करने की प्रतिस्पर्धा उत्पन्न की अब करोड़ों की धन-सम्पत्ति अल्प व्  लाखों की धन-संपत्ति अत्यल्प हो गई |

कतहुँ त भ्रष्ट चरन चरे, कतहुँ त अत्याचार | 
आचरन करि कदाचरन बिकरित भयउ बिचार || १० || 
भावार्थ : -- यह विकृत विचारों की परिणीति थी कि निर्द्वन्द्व सुख-उपभोग व्  अधिकाधिक संग्रह की प्रवृत्ति ने   कहीं भ्रष्टाचार तो कहीं अत्याचार का चलन कर दिया , सदाचरण विलुप्त होने लगा कदाचरण ही अब सदाचरण हो चला |

दुराचरन अपनाए भए  करतब काज मलीन | 
धर्म सेतु बिसुरत अर्थ होतब पाप अधीन || ११ || 
भावार्थ : -- दुराचरणों को अंगीकार किये जाने के कारण  कुत्सित कार्य करणीय कार्य हो गए परिणामतस  अर्थ धर्म की मर्यादा से विहीन होकर पाप के अधीन हो गया |









Saturday, 15 July 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

अबिकसित तन मति अरु मन बिनु कारज कुसलात | 
अस जनमानस संग सो  देस दरिद कू पात || १ || 
भावार्थ : -- जहाँ शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास से न्यून व् कार्य कुशलता के अभाव से युक्त जनमानस हो वह राष्ट्र दरिद्रता को प्राप्त होता है.....

जहँ नही मितब्यईता जहँ ब्यसन के बास |
जहँ कर उद्यम हीन तहँ दलिदर करे निवास || २ ||
भावार्थ : - जिस राष्ट्र में मितव्यविता न हो व्यसनों का वास हो, हस्त परिश्रम से हीन हों उस राष्ट्र में दरिद्रता निवास करती है.....

निर्द्वंद्व सुख भोग जहां अधिकाधिक अभिलास |
नव नवल प्रत्यास तहाँ होत दरिद के बास || ३ ||
भावार्थ : - जहाँ जनमानस के सुख-दुःख की चिंता से रहित होकर सुखों का उपभोग किया जाता हो,लोभ व् लालसा के कारण अभिलाषाऐं अधिकाधिक हों, जहाँ नित नव नवल वस्तु के प्रयोग की अभ्यस्तता हो, वहां दरिद्रता का निवास होता है ||

हठ धर्मिता पच्छ पात जहँ नित कलह क्लेस |
संपन ते संकटापन होत जात सो देस || ४ ||
भावार्थ : -- जहाँ हठधर्मिता हो, पक्षपातिता हो जहाँ नित्य कलह क्लेष हो वह संपन्न राष्ट्र संकटापन्न होता चला जाता है |

आसुरी सम्पद कर गहे होत जात जो पीन | 
रीतत सोधन सम्पदा करत देस कू दीन || ५ ||
भावार्थ : -- जो जनमानस अनुचित साधनों से धन-सम्पति अर्जित कर समृद्ध होता जाता है वह राष्ट्र की भू- सम्पदा को रिक्त कर उसे दरिद्र करता जाता है |

जो धन माँगे छाँड़ के अर्जन केर उपाए | 
सो तो मित  सुदामा सम  सदा दरिद कहलाए || ६ ||
भावार्थ : - जो राष्ट्र अथवा जो जनमानस धनार्जन की युक्तियों को न मांग कर धन की मांग करता है, वह मित्र  सुदामा के जैसे छटी का दरिद्र कहलाता है | 

पुरबल महु निज करगहे खेट खेह खलिहान | 
गेह गेह संपन रहे रहे देस धनवान || ७ ||
भावार्थ : -- प्राचीन भारत में इन्हीं गावों और खेत-खलिहानों से घर घर में विभूति विराजमान रहती थी और अपनी समृद्धि के लिए यह राष्ट्र विश्व भर में प्रसिद्ध था | 

सोइ देस खेटक खेड सोइ खेह खलिहान |
दीन दुखि धनहीन होत तरपत मरे किसान || ८ ||

भावार्थ : - अब वही देश है ,वही गाँव-खेड़े हैं खेत खलिहान भी वही हैं, किन्तु किसान की दशा दयनीय है वह तड़पते हुवे प्राण दे रहा है उसके गृह में दरिद्रता क्यों विराजित है इस प्रश्न का उत्तर हमें ढूंढ़ना ही होगा |


धनी के उतरु दान है निर्धन के धन-धाम | 
अधर्मी के उतरु धरम दूषन दंड बिधान || ९ || 
भावार्थ : - धनी यदि एक प्रश्न है तब दान उसका उत्तर है, निर्धन यदि एक प्रश्न है तब धन-सम्पति उसका उत्तर है, अधर्मी यदि एक प्रश्न है तब धर्म उसका उत्तर है, अपराध यदि एक प्रश्न है तब दंड विधान उसका उत्तर है |

अर्थात : - यदि कोई प्रश्न है तब उसका उत्तर भी अवश्य होगा.....

जहाँ दरिदर दान करत, समरथ करत त्याज |
दोषि सत कह करि नृप तप तहाँ धरम कर राज || १० || भावार्थ -- जहाँ दरिद्र दान करता हो, समर्थ त्याग करता हो, जहाँ अपराधी सत्य कहता हो और शासक तपस्या करता हो वहां धर्म का राज होता है |

अजहुँ त हमरे देस में दारिद भया दातार | 
समरथ लज्जा परिहरत मांगे हाथ पसार || ११ || 
भावार्थ : -- विद्यमान भारत में लोभ और लौलुपता के वश निर्लज होकर समर्थ उद्योगपति हाथ पसारे मत की मांग करता है और निर्धन दातार बनकर उस मत को दान करके स्वयं को धन्य मानता है | धिक्कार है ऐसे उद्योगपति पर.....

 







----- ॥ टिप्पणी ११ ॥ -----

>> इसी लिए गांधी को लोग पाखंडी कहते हैं, अनशनोपवास के ढोंग से सत्ता हथिया कर वह भारत को पूर्ण हिंसावादी राष्ट बनाना चाहते थे.....गांधी को  पाखण्ड  वाद  का  प्रणेता  भी  कहा  जाता  है.....   

>> राष्ट्र पति जी ! दीन दरिद्रों को जीत नहीं काम चाहिए ,रोटी चाहिए किन्तु आपके भवन की भव्यता उन्हें यह देने नहीं देती.....

>>  आली-ज़नाब ! आपके बदन की ये नेहरु कट अचकन ग़रीब-गुरबा को खुराके-ख़ुर्द से भी महरूम रखती है.....

>> " धर्म की उपस्थिति मनुष्य को मनुष्य के रूप में निरूपित करती है....."
   
व्याख्या : -  दया, तप, दान व् सत्य आदि साधारण धर्म  प्रत्येक मनुष्य में उपस्थित होना चाहिए यदि यह नहीं है तब वह पशु के तुल्य है.....

>> 'तरवे नमोस्तुते'   
(वृक्ष को नमस्कार हो ) 
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे | 
फलान्यपि परार्थाय वृक्षा : सत्पुरुषा इव || 

भावार्थ : - वृक्ष सज्जनों की भाँति स्वयं धूप में तपकर दूसरों के लिए छाया करते हैं, फलों को भी दूसरों को प्रदान कर देते हैं.....
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>> तोरि खाए फल होहि भल, तरु काटे अपराधु || 
भावार्थ : -- तुलसी दास जी कहते हैं फल तोड़कर खाना और जनमानस से यथोचित लाभ लेना उत्तम है पेड़ काटकर फल लेना और अनुचित कर लगाकर जनमानस को कष्ट देना हितकर नहीं है.....

>> मुसलमानों के आगमन से पूर्व यह देश भारत ही कहलाता था सिंधु नदी के तट पर बसने के कारण यह सिन्धुस्थान के नाम से भी प्रसिद्ध था | फिर मुसलमान आए ये 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे स्थान को स्तान कहते थे कालांतर में मुसलमानों ने अपने राज में इसे हिन्दुस्तान के नाम से सम्बोधित किया, इस शब्द युग्म का वास्तविक अर्थ है सिंधु नदी के तट पर बसने वाले लोगों का देश.....

>> लोकतंत्र में आपही भयऊ बहुतक दोस | 
अवर दोषु पुनि बोहि के गिरिहि चलत दुइ कोस || 
 भावार्थ : --  लोकतंत्र स्वयं दोषयुक्त है, अन्य जन संचालन तंत्रों के दोषों के भार को वहन कर यह अधिक दूर नहीं चल पाएगा | 



>>   अमलदार अमीरों की गरीबी नहीं जाती..,
      इस वास्ते हिन्द की बदनसीबी नहीं जाती.....

>> हम ऐसे शासन तंत्र द्वारा संचालित हो रहे हैं जहाँ क्रूरता और बर्बरता के लिए खुली छूट है और उसके प्रतिरोध के लिए दंड.....

>> एक डाकू भी अपने दल का नेतृत्व करता है.....,
एक महापुरुष ही सन्मार्ग प्रदर्शित करता हैं वह चाहे शासन में हो अथवा अनुशासन में.....

>> जनमानस के दास भए सेवा धर्म निभाउ |
भाउ रहते भाउ रहे अभाउ रहत अभाउ ||

भावार्थ : - भारतीय लोकतंत्र में मत को दान की श्रेणी में रखते हुवे जनप्रतिनिधि को जनमानस का सेवक कहा गया है | जो 


कोई प्रतिनिधि के रूप में जनमानस की सेवा करने की इच्छा रखता है वह सेवाधर्म का पालन करते हुवे उसके दुःख से दुःखी व् सुख से सुखी रहे | जहाँ ४०% से अधिक जनमानस निर्धन रेखा के नीचे जीवन यापन करता हो वहां उस प्रतिनिधि को निर्द्धंद्ध सुख उपभोग की अनुमति नहीं होनी चाहिए, अन्यथा जो अभी ४०% है उसे १०० % होने में देर नहीं लगेगी |

>> आतंकवाद से सामना करने में अपनी असफलता पर क्षतिपूर्ति का घूँघट करते ये नपुंसक सत्ताधारी प्राय: टी. वी, व् समाचार पत्रों के पीछे छुपे पाए जाते हैं.....

>> ये काम भारत की प्रभुता और अखण्डता अक्षुण्ण रखने की शपथ लेने वाले सत्ताधारियों का है |  सारे काम बुद्धिजीवी करेंगे तो ये क्या करेंगे.....?

>>विद्यमान समय की पत्रकारिता विश्वसनीय नहीं रही,  अब तो मीडिया से पत्रकारिता ढूंढनी पड़ती है, इससे प्राप्त तथ्य को जांच-परख कर ही अपना विचार व्यक्त करना चाहिए.....

>> जनमानस गधे के जैसे पैसा कमाए, फटे हुवे कच्छे बनयान में रहकर रूखी सुखी खाए और अपनी इस सारी कमाई को पंच परिधान पहनने, वायुयान में विराज विदेशों में, होटलों, भव्य भवनों, गुलछर्रे उड़ाने के लिए इन मंत्रियों के चरणों में अर्पित कर दे  तब तो वह साहूकार अन्यथा कर चोर.....क्यों.....?



>> यह कर व्यवस्था का नहीं यह नेताओं के निर्द्वंद्व सुख उपभोग का विरोध है जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के भी विरुद्ध है | यदि यह न हो तो जनमानस पर कर का भार अति न्यून हो सकता है.....

Tuesday, 11 July 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

सब जगज जन भगवन कृत इहँ कन कन उपजोगि | 
जो कहँ ए केहि जोग नहि सो तो मानसि रोगि || ११ || 
भावार्थ : -- यह चराचर जगत ईशवर की कृति है यहां कण-कण उपयोगी है | जो यह कहता पाया जाए कि यह जीव अथवा अजीव किसी योग्य नहीं वह मानसिक रोगी है | उसके परिजनों को उसका उपचार करवाना चाहिए, यदि परिजन न हों तब सबंधित राष्ट्र उसके उपचार की व्यवस्था करे.....

राष्ट्र की समृद्धि व्यक्ति की समृद्धि सुनिश्चित करती है, व्यक्ति की समृद्धि राष्ट्र की समृद्धिसुनिश्चित करे यह आवश्यक नहीं..... 

साधारन असाधारन धन संपद कुल दोइ | 
असाधारन जनहित हुँत अखिल जगत कर होइ || १ || 
भावार्थ : - धन-संपदाएँ दो प्रकार की होती है एक साधारण  व् एक असाधारण  | असाधारण संपदाएँ व्यक्ति अथवा राष्ट्र की न होकर जनकल्याण हेतु समस्त विश्व की होती है | 


जैसे: -  ज्ञान  की  सम्पदा एक असाधारण है.....

तीनि भाँति कर होइहीं  साधारन भव भूति | 
एक निज दुज जन जन हेतु तीजी देस बिभूति || २ || 
भावार्थ : -- साधारण धन-संपदाएँ तीन प्रकार की होती हैं,  एक संपदा व्यक्ति के निजि उपयोग हेतु, एक सार्वजनिक उपयोग हेतु, एक राष्ट्र के उपयोग हेतु |

जन मानस की सम्पदा धरनि धेनु धन धाम | 
श्रम सील होत कमाइए करतब भल भल  काम || 3 || 

भावार्थ : -- राष्ट्र में भूमि- भवन, धान-धेनु, रुपया-पैसा, रत्न -मणि आदि सम्पदाएँ जन-मानस के निजि स्वामित्व हेतु होती हैं, जिसे वह उत्तमोत्तम कार्य करते श्रम पूर्वक अर्जित करे | वह ऐसा कार्य न करे जिससे जीवन के अधिकार का अतिक्रमण होता हो |

कूप बापि बन बाटिका घाट हाट बट सेतु | 
जाताजात के साधन सम संपद सब हेतु || ४ || 
भावार्थ : -- नलकूप, ताल-तालाब, वनवाटिका, नदियों के घाट, व्यापार मंडी, मार्ग, सेतु  एवं यातायात के साधन जैसी संपति, सार्वजनिक संपति होकर सर्वजन हेतु होती है |

नदी नदिपत बन परबत सकल खनिक खनि खान | 
राज कोष सम्पदा के  देस होत श्री मान || ५ || 
भावार्थ : - राष्ट्र की प्रभुसत्ता में सीमाबद्ध भूखंड के अंतर्गत स्थित भूमि, नदियाँ, समुद्र, खनित खनिज, समस्त खानें व् राजकोश आदि सम्पदा, राष्ट्र के स्वामित्व में होकर राष्ट्र की सम्पदा होती है | 

खेत जोत श्रम साध के निपजावे जो नाज | 
धनार्जन हेतु जै तौ सबते उत्तम काज || ६ || 
भावार्थ : -- श्रम की साधना करते हुवे खेत जोत कर अन्न का उत्पादन धनार्जन करने की सबसे उत्तम वृत्ति है | 


घर की संचित सम्पदा खोद खोद के खाए | 
दारिद होतब जात तब सो तो बिनहि कमाए || ७ || 

भावार्थ : -- वास्तविक उत्पादन में कठोर परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है | जब जनमानस कठोर परिश्रम न कर राष्ट्र की संचित व् संरक्षित सम्पदा को उत्खाद करते हुवे निजि सम्पति एकत्रित कर समृद्ध होता जाता है तब वास्तविक अर्जन के अभाव में वह राष्ट्र दरिद्र होता जाता है | 

एक सँजोइ सुकरम ते एक कुकरम ते सँजोइ | 
यह तो दैबिअ सम्पदा येह आसुरी होए || ८ || 
भावार्थ : -  वर्जित कृत्यों व् दुर्वृत्ति द्वारा अर्जित की गई धन-सम्पति आसुरी, तथा विहित कृत्यों व् सद्वृत्ति द्वारा अर्जित की गई धन -सम्पति, दैविक कहलाती है | 

धरनि धाम ते मानसा नीर नाज ते देस |
सरब जन की  सम्पति सों धनी होत परिवेस || ९ || 
भावार्थ : -- भूमि- भवन, धान-धेनु, रुपया-पैसा, रत्न -मणि   जन- मानस को व् जल, अन्न, उत्तम विचार, नदियों, खनिज आदि सम्पदा  देश को कूप, ताल-तालाब, वनवाटिका, sनदियों के घाट,  मार्ग, सेतु  जैसी सार्वजनिक संपति देश के परिवेश को समृद्ध करती हैं.....

राजा बासै झोपड़ा, चरन पादुका हीन | 
रचिया जो पथ राजसी, सो तो अर्थ बिहीन || १० || 
भावार्थ : --  जिस देश का राजा चरण- पादुका से रहित होकर  झोपड़ियों में निवास करता हो, वहां राजपथ जैसी सार्जनिक सम्पति  व्यर्थ होकर राजा की दरिद्रता का वर्धन करती हैं.....

रह जब संचित सम्पदा तब सम्पत सब काल | 
सीस पड़े को आपदा, जन जन होत निहाल || ११ ||  
भावार्थ : -- जिस राष्ट्र में संयत व्यवहार से सम्पदाएँ संचित रहती हैं उस राष्ट्र के भूत भविष्य और वर्तमान तीनों काल सुखमय होते है, वहां आने वाली पीडियां जन्मजात धनी होती हैं | आपदा ग्रस्त होने पर भी वहां कुछ अभाव नहीं होता.....

उद्यम मन ते धन लख्मी आलस मन ते हानि || 
माया के बंधन पड़े तामें ऐंचा तानि || 
----- || संत कबीर दास || ----
भावार्थ :- उद्यमशीलता लाभ जनित लक्ष्मी की जननी है  | आलस्य दरिद्रता का जनक है |  जनमानस जब विलासिता के बंधन में पड़ता है यब वह अपनी मातृ भूमि की खाल खाने पर भी उतारू हो जाता है ||