Tuesday, 25 April 2017

----- ।। उत्तर-काण्ड ५७ ।। -----

मंगलवार,२५ अप्रेल,२०१७                                                                                       

पुनि जलहि कर जोर जोहारे | सजिवनिहु जियन तुअहि निहारे || 
आरत जगत राम सुखदाता | त्रसित जीउ के रामहि त्राता || 

तत्पश्चात महर्षि कुम्भज ने करबद्ध होकर जल से प्रार्थना कर कहा : - हे जीवन के आधार स्वरूप ! संजीवनी भी अपने प्राण हेतु तुम्हारी ही प्रत्याशा करती है || यह संसार दुखों से परिपूर्ण है और भगवान राम सुखदाता हैं |  व्यथित जीवों की व्यथा के कारणों का निवारण करने वाले भगवान श्रीराम ही है || 

पापिन निसि सम  राम तमोहर | अँधेरिया घर राम दिवाकर || 
भव भूमि भर भारु अति भारी | छरन अपहरन भए अवतारी || 
राम पाप रूपी रात्रि के अन्धकार को हरण करने वाले पुण्य रूपी चन्द्रमा हैं | राम अज्ञान के अन्धकार को हरने वाले ज्ञान रूपी सूर्यहैं ||  संसार में भूमि जब पापों के बोझ अतिशय भारी हो गई उनका छरणोँपहरण के लिए तब भगवान ने मनुष्य रूप में जन्म लिया  ||  

भगवद रूप राम जग राखा | कीरति जासु सकल जग भाखा || 
किअहि तुरग मख हेतु नियोजन | करुँ बिनति ताहि करिहौ पावन || 

भगवद रूप में श्री राम संसार के रक्षक हैं जिनकी कीर्ति सभी गाया करते हैं उन्होंने इस अश्व को महायज्ञ हेतु नियुक्त किया है मेरी आपसे विनती है आप इसे पुनीत व पवित्र कीजिए  || 

अभिमंत्रित भा मुनिबर ताईं | उदकत उद घट कंठ पुराईं || 
सुधित जल राम सहित सबु राए | सुसंस्कारित मंडपु ल्याए || 
मुनिवर द्वारा अभिमंत्रित होकर वह जल उत्साहपूर्वक घट के कंठ में परिपूर्ण हो गया | भगवान श्रीराम सहित सभी राजागण सुधातुल्य उस जल को सुसंस्कारित यज्ञ-मंडप में ले आए | 

 धौला गिरबर छीर सम घवल अश्व न्हवाए | 
अँग अँग आभूषन संग दिब्य बसन पहिराए || 

उस जल से श्रेष्ठ धौल गिरि व् दुग्ध के समान श्वेत अश्व को स्नान करवाया और आभूषण सहित उसके अंग अंग को दिव्य वस्त्रों से सुसज्जित किया ||  

शनिवार,२९ अप्रेल,२०१७                                                                                                    

पुनि महर्षि रघुनाथहि हाथा | किए अभिमन्त्रित मंत्रहि साथा  || 
नाथ बिनेबत करत निहोरे | बोलइ चितइ तुरग की ओरे || 
तदनन्तर महर्षि कुम्भज ने वेदमंत्रों के साथ रघुनाथ जी के हस्तकमल से उस अश्व को अभिमंत्रित किया || श्री रामचंद्र जी ने अश्व का लक्ष्य करते हुवे विनयपूर्वक प्रार्थना की :-- 

सुनहु बिनति मम हे महबाहू | पूर अपूरित सुर नर नाहू || 
भू सुर गन पुरजन तेउ भरी | करौ पबित मोहि एहि अस्थरी || 
हे महाबाहु ! मेरी विनती सुनो | देवताओं व राजाओं से परिपूर्णित ब्राम्हणों व् पुरवासियों से भरीपूरी इस यज्ञ- स्थली में तुम मुझे पवित्र करो || 

अस कह भगवन सह बैदेही | परसिहि मेधि तुरग कै देही || 
भै कौतूकि बस तेहि काला | सुर गुर मुनिजन सहित भुआला || 
ऐसा कहकर भगवान श्रीराम ने सीता सहित उस मेधीय अश्व के शरीर को स्पर्श किया  | उस समय देवता,गुरु,मुनिजन सहित सभी राजा कौतुहल के वशीभूत : -- 

भए मूरति भर अचरजु भारी | जान बिचित्र यह पुर नर नारी || 
कहहि परस्पर भरुअर भामा | अहो सुमिरत जिन्हके नामा || 
विस्मित होकर मूर्ति स्वरूप हो गए  |  नर नारियों को यह बात विचित्र लगी,भद्रपुरुष एवं उनकी भार्याएँ परस्पर वार्तालाप करने लगे अहो !
जिनके नाम का स्मरण करने मात्र से -- 

जाके चरणोपासना मिटहि महतिमह पाप | 
सोइ प्रभु श्री रामचंद अस कस करिहि अलाप || 
जिनके चरणों की उपासना करने से मनुष्य महातिमह पापों से मुक्त हो जाते हैं, वही प्रभु श्री राम यह क्या कह रहे हैं ?( क्या अश्व इन्हें पवित्र करेगा ?  )

शुक्रवार,५मई,२०१७                                                                                                   

पाए पारस परस रघुबरके | मखमंडपु पसु तनु परिहर के || 
दिब्य रूप धर देउ सरूपा | प्रगस भयउ भा पुरुष अनूपा || 
यज्ञ-मंडप में श्रीरामजी के स्पर्श को प्राप्तकर पशु शरीर का परित्याग करके अश्व ने तत्काल दिव्य रूप धारण कर लिया,और देव स्वरूप मनुष्य के रूप में प्रकट हुवा | 

आगंतुक चितबत रहि गयऊ | हरिदय अतिसय बिस्मय भयऊ || 
पसरे नयन पलकन्हि ठाढ़े |  समुझ परे नहि मरम ए गाढ़े || 
यह देख आगंतुक चकित रह गए उनका हृदय विस्मय से भर गया, नेत्र प्रस्तारित हो गए पलकों ने झपकना छोड़कर नेत्रों को विस्तारित कर दिया;यह रहस्य उनकी समझ से परे था | 

भगवन आपहि सरब ग्यानी | ता सम्मुख ग्यपति सकुचानी || 
रहस ए जबु को जानिब नाही | लोकाचरन पूछेउ ताही || 
प्रभु श्रीरामचन्द्र स्वयं सर्वज्ञ हैं उनके सम्मुख संज्ञप्ति भी संकोच करने लगती है | यह रहस्य जब वहां उपस्थित जनों को ज्ञात न हुवा तब लोकाचार का पालन करते हुवे प्रभु ने उस दिव्य रूप धारी मनुष्य से प्रश्न किया | 

बिसमयवंत सुमंगलकारी | दिब्य रूप हे नर तनु धारी || 
एहि समउ तुअ करिअ का चाहू | एहि बत निगदत मोहि जनाहू || 
'हे विस्मयवंत ! शुभ मंगलकारी नर तन धारण करने वाले दिव्य स्वरूप ! इस प्रकार दिव्य रूप धारण कर  इस समय क्या करना चाहते हो ?यह मुझे बताओ | 

 
को तुम अरु कारन कवन अश्व देहि यह पाए | 
परेउ नीचइ जोनि कस सो सब कहहु बुझाए ||  
तुम कौन हो ?तुम किस कारण अश्व के  शरीर को प्राप्त हुवे ?इस नीची योनि में तुम्हारा कैसे पतन हुवा मुझे वह सब ज्ञात कराओ |'

रविवार, ०७ मई,२०१७                                                                                                

रघुपति केर बचन दै काना | रुचिर रूपु धर कहा बिहाना || 
तुम्ह सर्बग्य सर्ब ब्यापी | पुण्य पुरुष तुम अरु मैं पापी || || 
रघुपति के निर्मल वचनों को श्रवण करने के पश्चात उस दिव्य रूपधारी पुरुष ने कहा:--आप सर्वज्ञ हैं सर्वव्यापक हैं | आप पुण्य पुरुष हैं मैं महापापी हूँ | 

भीतर तुम बाहेरहु तुमही  | तव सहुँ दुरइ न कोउ बतकही || 
तथापि जोइ पूछेउ मोही | सो सब नाथ कहउँ मैं तोही || 
यद्यपि आपसे कोई वक्तव्य गोपनीय नहीं  है बाह्यभ्यंतर आपही हैं | हे नाथ !तथापि आपने जो प्रश्न किया मैं उसका उत्तर देता हूँ | 

यह देहि जेहि कारन पायउँ | प्रभु जस तोर सरन मैं आयउँ || 
पुरबल ब्रम्हन बंस  लहेऊँ | परम धर्मात्मन बिप्र रहेऊँ || 
यह अश्व देह मुझे जिस कारण प्राप्त हुई जिस भाँति मैं आपका शरणागत हुवा मैं उसका संज्ञान कराता हूँ | पूर्व में मेरा जन्म ब्राम्हण कुल में हुवा मैं एक परम धर्मात्मा विप्र था | 

मोरि बिदिता रहिअब अबाधू | पुनि  मम सोंहि भयउ अपराधू  || 
एकु दिवस मैं गयौ महबीरा | अघहारिनि सरजू के तीरा  || 
मेरी विद्व्ता अपार थी फिर मुझसे अपराध हो गया | हे तात  ! एकदिवस मैं पापहरणी सरयू नदि के तट पर गया | 

करि पितरु पूजन तरपन करिअ तहाँ अस्नान | 
सकल बिप्रन्ह प्रीति सहित देइअ बिधिबत दान || 

स्नान के पश्चात वहाँ पितृजनों पूजन व तर्पण करके विधिपूवर्क दान मानकर सभी विप्रगणों संतुष्ट किया | 

सोमवार,०८ मई,२०१७                                                                                                     

निगमागम जस रीति बखाना | बहुरि प्रभु धरेउँ तव ध्याना || 
तेहि औसर बहु जन समुदाय | नीति धर्मी जनि मम पहि आए || 
वेदोक्त रीति से फिर आपका ध्यान करने लगा | मुझे नीति-धर्मी जानकर उस समय बहुंत से जन-मानस का आगमन हुवा | 

जगरित भए मम मन मद दंभा | ताहिँ प्रबंचन करेउँ अरंभा || 
न त दूषनहि न धर्म बिचारा | भया बाँकिमन सबहि प्रकारा || 
उन्हें देखकर मेरे मनो-मस्तिष्क में मान और दम्भ जागृत हो गए,जिनके वशीभूत होकर मैने उनका प्रवंचन करना प्रारम्भ कर दिया |   दोष देखा न मनुष्योचित धर्म का विचार किया मैं सर्वथा धूर्त-कृत हो गया || 

औचकहीँ भगवन तव दासा | मह तेजसि महर्षि दुरबासा || 
भाल भूति जति भूषन साजे | भरमत  भुइ तहँ आन बिराजे || 
हे भगवन !पृथ्वी का भ्रमण करते हुवे एकाएक आपके दास महातेजस्वी महर्षि दुर्वासा का आगमन हुवा  | उनके मस्तक पर भभूति और देह पर यति वल्कल शोभा पा रहे थे || 

भर रिस गाढ़ ठाढ़ मम आगे | करकत मोहि निहारन लागे || 
तजत ज्ञान मद मान भरेउ | भइ जड़ मति मुख मौन धरेउ || 
वह अत्यंत क्रोधित होकर मेरे सम्मुख खड़े हो गए और कठोरतापूर्वक मेरे दंभ का परिक्षण करने लगे || ज्ञान त्याग करते हुवे दम्भ और अहंकार से परिपूर्ण मेरी बुद्धि जड़ हो गई  मेरे मुख ने मौन धारण कर लिया था | 

तीख सुभाउ कर मुनिबर मोरे मन महुँ दंभ | 
ब्यापहि रिस नख सिस लग निरखत मोहि अचंभ || 
मुनिवर स्वभाव से ही तीक्ष्ण हैं मेरे मन में घमंड भरा था चकित होकर वह मुझे पाखण्ड करते देखते रहे,चरण से लेकर शीर्ष तक उनपर क्रोध व्याप्त हो गया || 

मंगलवार,०९ मई,२०१७                                                                                                     

धधकत भा भरि कोह अपारा | बदन अँगीरी नयन अँगारा || 
बाचत तापसधम पाखंडा | निकसि मुख तैं ज्वाल प्रचंडा || 
अपार क्रोध से भरी मुनिवर कीमुखाकृति धधकती हुई अँगीष्टि व् नेत्र अंगार के स्वरूप हो गए | हे रे तापसधम,रे पाखंडा कहते हुवे उनके मुख से प्रचंड ज्वाला निष्काषित होने लगी | 

कटुक बचन भा लपट समाना | दहइ उरसिज बहइ मम काना || 
फरकत अधर तजत निज आपा | कहिब ए निगदन देत सरापा || 
लपटों के सादृश्य उनकी कटूक्तियां श्रुति रंध्र में प्रवाहित होकर मेरे ह्रदय भवन को दग्ध करने लगी | धैर्य का परित्याग कर फड़कते अधरों से मुझे श्राप देते हुवे कहा -- 

करिहु दम्भ अस घोर गभीरा | पतित पावनि सरजु के तीरा || 
कृत सद्कृत हित करिअ न काहू | जाउ तुम्ह पसु जिउनि लहाहू || 
परार्थ हेतु तुमने कभी कोई सद्कार्य नहीं किया और पतितों को पुनीत करने वाली सरयू के तट पर  ऐसे घोर दम्भ का प्रदर्शन कर रहे हो | जाओ अब तुम पशु योनि को प्राप्त हो जाओ |  

सुनि मुनिबर कर दिए अभिसापा | पछितावत मम उर संतापा || 
अति सभीत गहेउँ मुनि चरना | कहत पाहि प्रनतारति हरना || 
मुनिश्रेष्ठ के दिये अभिशाप को श्रवण कर पश्चाताप के कारण मेरा हृदय दुःख से भर गया |  हे शरणागतोंके कष्ट को हरण करने वाले ! किसी अनिष्ट की संभावना से अत्यंत भयाक्रांत होकर मैने उनके चरण पकड़ लिए और उनसे यह कहते हुवे रक्षा की गुहार करने लगा  | 

दंड अलप मम दोषु अति छमिब ताहि जनि भोरि | 
मिटिहि श्राप किमि कहउ जति बिनति करउँ कर जोरि || 
दंड अल्प हैं मेरे अपराध अत्यधिक हैं | हे यतिवर ! भूल मानकर आप मेरे इस अपराध को क्षमा प्रदान करें | मेरी आपसे विनति है जिससे श्राप के परिताप का निवारण हो वह उपाय कहिए | 

बुधवार,१० मई,२०१७                                                                                                    
तहिया महर्षि कृपा निधाना  | श्रापु अनुग्रह कीन्हि महाना  || 
बोले मृदु तुम रघुबर जी के | होइहु मेधि तुरंगम नीके || 
हे कृपानिधान ! तब महर्षि श्राप हेतु मुझपर महान अनुग्रह करते हुवे मृदुलता से बोले :-- तुम्हे सुन्दर तुरंग का शरीर प्राप्त होगा और तुम  रघुनाथ जी के मेधीय अश्व बनोगे | 

भगवन निज कर परसिहि तोही | ते मंडपु यह अचरजु होही || 
दम्भ बिहीन दिब्य तनु धारी | होहु परम पद के अधिकारी || 
जब भगवान श्रीराम अपने पदुम पाणि से तुम्हारा स्पर्श करेंगे तब उस पवित्र यज्ञ-मंडप यह आश्चर्य जनित घटना घटेगी,पशु शरीर का त्याग कर तुम दम्भ रहित दिव्य देह धारण करके  परम पद के अधिकार को प्राप्त  करोगे | 

घोर श्राप मुनि महर्षि दाया | भा अनुग्रह मम हुँत महराया || 
नेकानेक जनम सुर जोईं | जाकी लहनी सहज न होई || 
हे महाराज ! महर्षि का दिया वह घोर श्राप मेरे लिए अनुग्रह बन गया | अनेकों जन्म ग्रहण करने के पश्चात भी देवतादि केलिए जिसे प्राप्त करना कठिन है आपका वह दुर्लभ स्पर्श मुझे प्राप्त हुवा |  

  अहो मोर सम धन्य न कोई | लहेउँ अलभ परस तव सोई || 
प्रभु एतनेउ कृपा अरु कीजो | जोहि परम पद आयसु दीजो || 
वह अलभ्य स्पर्श मुझे आपसे प्राप्त हुवा अहो !मुझसा धन्य कोई नहीं | हेप्रभु !  आपसे विनती है इतनी कृपा और करें  मुझे आज्ञा दें परम पद मेरी प्रतीक्षा कर रहा है | 

न सोक न जनम जरा न मरनी | पहुँचि जहाँ सत करतब करनी || 
जाइ जहाँ नहि काल बिलासे  |  जाउँ अजहुँ मैं सोइ निवासा || 
जहाँ न शोक है; न जरा जन्म न ही मृत्यु है,जहाँ केवल सत्कृत करके ही पहुंचा जा सकता है | जहाँ गमन करने पर काल का विलास नहीं होता हे रघुनाथ! मैं वहां  के लिए प्रस्थान करता हूँ | 

पसु जवनि परिहार अहो  दुरेउ सकल विषाद | 
पायउँ प्रभु पुनि परम पद एहि सब तोर प्रसाद  || 
अहो !पशु योनि का परित्याग कर संसार के दुःखो से मुक्त हो आपके प्रसाद से ही मैने यह पद प्राप्त किया है | 

शुक्रवार,१२ मई,२०१७                                                                                                       

असि कह सो नर रघुपति केरे | चरत चहुँ पुर भाँवरी फेरे || 
करिअ कृपा अस कृपा निधाना | राजत अतिसय दिब्य बिमाना  || 
ऐसा कहते हुवे वह दिव्य पुरुष ने रघुपति श्रीराम चंद्र के चारों ओर परिचालन करते हुवे परिक्रमा की | कृपानिधान ने ऐसी कृपा की कि वह दिव्य विमान में विराजित होकर : -- 

अस्तुति करत सियापत नामा | गयउ तिनके सनातन धामा || 
सुनि सब दिब्य पुरुष के बानी | रामचंद्र की महिमा जानी || 
 सीतापति श्रीराम की स्तुति करते उनके सनातन धाम को प्रस्थान कर गया  | उस दिव्य पुरुष की वाणी को श्रवण कर वहां उपस्थित सभी जनों को भगवान की महिमा का ज्ञान हुवा || 

भय एकही एक आनंद मगन | छाए रहे घनबर बिसमय घन || 
सुनहु सुबुध मुनि वात्स्यायन | दंभ करत सुमिरत बरु भगवन || 
वे सबके सब परस्पर आनंद मगन हो गए उनके मुख पर विस्मय के बादल छा गए | हे महाबुद्धिमान वात्स्यायन जी! सुनिये ; दम्भ पूर्वक स्मरण करने पर भी : -- 

श्री हरि मुकुति मुकुत कर धरहीं | दम्भ तजत  भजन जोइ करहीं || 
हरि कृपा कहि जाइ तब काहा | बंदन अल्पहि गहै अथाहा || 
भगवान श्रीहरि मुक्ता स्वरूप मुक्ति प्रदान करते हैं | दंभ परित्याग कर जो उनका भजन करते हैं तब हरि की कृपा का कहना ही क्या है उन्हें किंचित वंदना में अथाह कृपा प्राप्त होती है || 

चाहि करि नित हरि सुमिरन  मिलै परम पद तासु | 
सुरन्ह हेतु अति दुर्लभ ता बिधि सुलभ सुपासु || 
संसार के कारण स्वरूप ईश्वर का निरन्तर स्मरण करने से निसंदेह परम पद प्राप्ति होती है जो देवों के लिए भी अलभ्य है वह इस विधि द्वारा सरलता से सुलभ हो जाता है || 

सोमवार, १५ मई,२०१७                                                                                                     

मुकुति रूप ए बिचित्र बैपारू | रुचिर तुरग कर देखनहारू || 
मुनिगन मन संतोष ब्यापहि | मानि कृतार्थ आपन आपहि || 
अश्व की मुक्ति का विचित्र व्यापार को  देखनेवाले मुनिजनों के मन में संतोष व्याप्त हो गया उन्होने स्वयं को कृतार्थ माना || 

प्रभु पद दरस परस कर सोई | आपहु ता सम पावन होईं || 
गुर बसिष्ठ सुरन्हि मनभावा | समुझन मैं रहि अति कुसलावा || 
प्रभु के चरणों का  दर्शन व स्पर्शन कर वह भी अश्व के जैसे पवित्र हो गए |  गुरुवर वशिष्ठ देवताओंकेमनोभावोव को ज्ञात करने में अत्यधिक निपुण थे,

बोले मृदुल सुऔसर जानी | रघुनन्दन हे सारँगपानी || 
अजहुँ सुरगन्हि करपुर दाइहु | कोटि कोटि सिरु आसिर पाइहु || 
उचित अवसर जानकर वह मृदुल वाणी में बोले :-- शार्ङ्ग धनुष धारण करनेवाले हे रघुनन्दन ! अब आप देव गणों को कर्पूर प्रदान कर अपने शीश पर उनके कोटिक सुभाशीर्वाद प्राप्त करें  ||

तासु आपहु प्रगस सो साखी | प्रमुदित होत हविर भुक भाखी || 
सुनि गुर बचन नाथ अतुराई | सुरभित करपुर अरपत दाईं || 
जिससे वे स्वयं प्रत्यक्ष प्रकट होकर प्रसन्नचित्त रूप में हविष्य ग्रहण करेंगे | गुरुवर के ऐसे वचन श्रवणकर रघुनाथ जी ने तत्परता से देवताओं को सुरभित कर्पूर अर्पण किया || 

पुनि बसिष्ठ देवन्हि कर करन लगे अह्वान | 
हुति ग्रहन हुँत प्रगसो हे अद्भुद रूप निधान || 
तत्पश्चात मुनि वशिष्ठजी देवताओं आह्वान कर कहने लगे :--  हे अद्भुत रूप के निधाता ! इस महाहवन के हविष्य को ग्रहण करने के लिए प्रकट होइये   || 

मंगलवार, १६मई,२०१७                                                                                              

सुबुध मुनि जब कीन्हि पुकारा | सकल सुरगन सहित परिवारा || 
छन महुँ मख मंडपु पग धारे | कहिअब मुनि पधारें पधारें || 
मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी के आहूत करने पर क्षण मात्र में ही सभी देवताओं ने सपरिवार वहां पदार्पण किया महर्षि ने पधारें पधारें कहते हुवे प्रसन्नता पूर्वक उनका आत्मीय स्वागत किया | 

कहत सेष बिलखत रघुराई | हबि भुक अरु अतीउ पबिताई || 
दए आसन परुसत धरिं आगे | सुरगन अस्वादन करि लागे || 
शेष जी कहते हैं : - मुने ! भगवान श्रीराम की दृष्टि पड़ने से यज्ञ हवि अत्यंत पवित्र हो गई, उत्तम आसन प्रदान कर प्रभु ने जब उसे आगंतुक अतिथि के समक्ष निवेदन किया तब इन्द्र सहित सभी देवगण उसका आस्वादन करने लगे |  

सुरन्हि नाथ खात न अघाईं | लेवनि केरि इच्छा न जाई || 
नर नारायन ब्रम्ह्महेसा | सहित अरुन रबि बरुन धनेसा || 
स्वाद सरसता के कारण देवनाथ इंद्र को तृप्ति नहीं होती थी उदर पूर्ति के पश्चात भी पाने की इच्छा बनी रहती थी | नारायण, महादेव, ब्रम्हा,वरुण कुबेर तथा : -- 

तोषित होत सबहि सो जागा | चले धाम लए निज निज भागा || 
अन्यान्य लोकपालों को जगत निधाता ने( भोजन सहित ) दान मान से सत्कार कर तुष्ट किया, सभी तृप्त हो अपना-अपना भाग प्राप्तकर अपने धाम को प्रस्थान कर गए | 

यजकरता यजमान महुँ जौ रिसि रहैं प्रधान | 
तिन्ह सबन्हि चारिहुँ दिसि राज दिये भगवान || 
होता का कार्यकर्ता यजमान में जो ऋषिगण प्रधान थे उन सबको भगवान ने चारों दिशाओं में राज्य प्रदान किया | 

शुक्रवार,२५ मई,२०१७                                                                                                  

पुनि गुर बसिष्ठ सुभागिन तेउ | पूरन हूति करतेउ कहेउ || 
यजात्मन हुँत श्रियकर कामा | करिहु सुभागवती सब भामा || 
पूर्णाहुति करके गुरुवर वशिष्ठ ने वहां उपस्थित सौभाग्यवान स्त्रियों से कहा : - सभी सौभाग्यवती भामाएं यज्ञ की पूर्ति करने वाले महाराज की संवर्द्धना ( अभ्युदय-कामना ) करें | 
  सुनि मुनि बचन सबहि उठि आईं | तकेउ तीर तरंग की नाईं ||
जिन्हनि पूजहि मह मह राजे |  जिनकी छबि छिन छबि सम भ्राजे ||
मुनीश्वर के वचन सुनकर स्त्रियां तट का लक्ष्य करती तरंगधाराओं के सदृश्य उठकर आईं | जिन्हें महतिमह राजा भी जिनका पूजन करते हैं उनकी मोहनि दीप्ति विद्युत् की सी सुशोभित हो रही थी 

ओज गहे बिधु बदन सरोजा | निदरहि ता सहुँ कोटि मनोजा ||  
सो रघुपति सिरु सकल सुहागी | लाजा कर बरखा करि लागी || 
चन्द्रमा का तेज धारण किये जिनके मुखारविन्द के सम्मुख करोड़ों कामदेव लज्जित हो रहे थे | उन भगवान श्रीराम चंद्र के शीश पर सुहागिने खिल बिखरने लगीं | 

अवभृथ अस्नान हुँत बहोरी | प्रेरिहि मुनि महर्षि कर जोरी || 
तब सब स्वजन परिजन साथा | गयऊ सरजू तट रघुनाथा || 

ते औसर जौ लोग बिलोकत चंदु बदन रघुबर के | 
एकटक थिर लोचन ते पेखतहि जात पलक न ढरके || 
चिरंतन काल ते भगवन जिनके हरिदै भवन बसे | 
समन संतापु दमन दुःख कमलारमन दरसन ललसे || 

सियहि सहित रघुनाथ सरजू तट जबु जात लखि | 
महि धरि नायउ माथ, भयउ सो आनंद मगन ||  

बुधवार, ३१ मई, २०१७                                                                                          

जिन सहुँ सर्ब लोक सिरु नाईं | जगन्मय जौ जगत गोसाईं || 
तासु  कीरति करत गंधर्बा | नट अनेक मुनि  गुरसुर सर्बा || 

बिलखहिं जहँ तहँ लोग लुगाई | तासौं नदि बीथीं अपुराईं || 
चितवत रामहि भर अनुरागे  | चलहि जात सो पाछिन लागे || 

पूरित पावन निर्मल नीरा | पहुँचिहि सबु ता सरजू तीरा || 
जानकी सहित रघुकुल दीपा | पैसत पावनि सरित समीपा || 

सरित सुधा कर सरिल सुधा सरि | हरषि प्रभो अरु प्रबसि चरन धरि || 
जगबंदित पद पंकज धूरी  | सिरो धार भइ पावन भूरी  || 

दंड प्रनाम करत बहुरि अवतरिहि महाराए  | 
संगत कर जोरि क्रमबत उतरे जन समुदाए ||  

बृहस्पतिवार,१ जून, २०१७                                                                                         

अतिसय पावन पयस प्रवाहा | कीन्हि मज्जनु सबु नर नाहा || 
निरखत निर्मल धवल हिलोले | चिरं काल लग करत किलोल || 

निकसत प्रभु सिया संग बहिरे | धौलित धौत परिधान पहिरे || 
भूषन कर पुनि सोह अपनाए | नख सिख मंजु महा छबि छाए || 

बिलसि ऐसेउ स्याम बपुधर | दीपत निसि जिमि दीप मनोहर || 
भृकुटि बिकट कच घूँघरवारे | कोटि कंदर्प कमन निहारे || 

भाल बिसाल तेज असि झलके | अखिलं लोक बिलोकन ललके || 
ते अवसर सुधि सुबुध समाजा | करन लगे अस्तुति सब राजा || 

हे गुनग्राम सर्ब सुखधाम लोचनाभिराम रघुपते | 
जन जन भव तरन सुगति साधन नित तव नामहि सुमिरते || 
धरम धरन जग बिपति हरन भए बिहड़ बन के तापसी | 
दर्प हारिनि दनुज संहारिनि को कीरति नहि आप सी || 

अनाथन केर नाथ तुम हम तुहरे प्रिय दास | 
तव पद पथ जो पाए सो भव तरि बिनहि प्रयास || 

रविवार, ०४ जून, २०१७                                                                                                

सरजू  केरे  पावन  तीरा  |  थापत   बिधिबत  हे  रघुबीरा  || 
सुबरन  सोहित मह  जग  जूपा  | निज भुजबल  जितेउ सब भूपा  || 

अन्यान्य जनपालक जेतू | भए सब बिधि दुर्लभ तिन हेतू ||  
त्रिलोकन सोइ अद्भुद सम्पद | तव कर गहत प्रभु होइ सुखप्रद || 

जनकनन्दनि सती सिय साथा | एहि भाँति भगवन जगन्नाथा || 
तीनि महा मेधिय मख तेऊ | त्रिभुवनि अनुपम कीरत गहेउ || 

राम कथा मुनि पूछिहु मोही || मति अनुरूप कहा मैं तोही || 
प्रभो चरित तीरथ समुहाई | श्रुतत सपेम सकल अघ जाई || 

परम पुनीत इतिहास ए अश्व मेध कर जाग | 
सुनहिं कहहिं मन लाई त मज्जन होहि प्रयाग || 

























Sunday, 16 April 2017

----- || चलो कविता बनाएँ || -----

हाथोँ हाथ सूझै नहि घन अँधियारी रैन | 
अनहितु सीँउ भेद बढ़े सोइ रहे सबु सैन || १ || 

रतनधि धर जलधि जागै,जागै नदी पहार | 
एक पहराइत जगै नहि ,जागै सबु संसार || २ || 
क्रमश:

जनमानस के दास भए सेवा धर्म निभाउ | 
भाउ रहते भाउ रहे अभाउ रहत अभाउ || 
भावार्थ : - भारतीय लोकतंत्र में मत को दान की श्रेणी में रखते हुवे जनप्रतिनिधि को जनमानस का सेवक कहा गया है | जो कोई प्रतिनिधि के रूप में जनमानस की सेवा करने की इच्छा रखता है वह सेवाधर्म का पालन करते हुवे उसके दुःख से दुःखी व् सुख से सुखी रहे | जहाँ ४०% से अधिक जनमानस निर्धन रेखा के नीचे जीवन यापन करता हो वहां उस प्रतिनिधि को निर्द्धंद्ध सुख उपभोग की अनुमति नहीं होनी चाहिए, अन्यथा जो अभी ४०% है उसे  १०० % होने में देर नहीं लगेगी | 

Wednesday, 5 April 2017

----- ॥ पाखंड-वाद ॥ -----

" मिथ्या द्वारा यथार्थ के स्वांग का सार्वजनिक प्रदर्शन पाखण्ड वाद है...."
दूसरे शब्दों में आप जो नहीं हैं वह होने का प्रदर्शन करना पाखण्ड वाद है,

सत्ता केर स्वाद हुँत प्रसरा पाखण्ड वाद ।  
नव नूतन नहि होइया धर्म केर उन्माद ॥ 
भावार्थ :-- धार्मिक उन्माद फैलाकर सत्ता प्राप्ति करना कोई नई बात नहीं है सत्ता के सुख भोग का परम माध्यम होने से पाखंड वाद अत्यधिक प्रचलित हुवा 

पंच परिधान पहिर के चढिया ऊंच मचान । 
देस परधान बोलिया मैं दरिदर की संतान ॥ 
भावार्थ :--बहुमूल्य वस्त्र धारण कर ऊँचे मंच पर आसीन होकर एक दिन प्रधानमंत्री बोले मैं दरिद्र की सन्तान 'हूँ '। प्रधान मंत्री होकर ये दलिदर हैं नहीं होंगे तो दरिद्र रेखा के नीचे आ जाएंगे 

प्रधान मंत्री बनकर भी इन नेताओं का  दलिदर दूर नहीं हुवा तो ये बताएं फिर और कैसे होगा । धनवान होकर
दलिदरी का पाखण्ड करना, सत्ता प्राप्त कर उसका अधिकाधिक सुख भोग करना नेहरू-गांधी के विचारों की धारा है । 
ऐसी विचार धारा के कारण ही यह  देश खण्ड-खण्ड होता चला गया ।  तीस चालीस वर्षों में अमेरिका के वासी अंतरिक्ष वासी बन गए किन्तु सत्तर वर्षों में भी भारत के वासियों के सम्मुख से आदि नहीं हटा....