Thursday, 17 September 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४० ।। -----

बुधवार, १६ सितम्बर, २०१५                                                                       

वात्स्यायन  महिमन साथा । बोले मृदुलित हे अहि नाथा ॥ 
हरन भगत कर  पीर दुखारा । किए कीरत जो बिबिध प्रकारा ॥ 

श्रवण कथा सो रघुनन्दन की । पूरन होत न मोरे मन की ॥ 
कथा कंज तुम कलित कमंडल । कंठ तालु तल करिहैं कल कल ॥ 

भयउ पिपास मोर जिग्यासा । तासु बिनहि साँसत मम साँसा ॥ 
जस जस तुम्ह  कंज कर दाईं । बढे पिपास अधिकाधिकाई ॥ 

धन्य धन्य सो बेद निधेई ।  जग जीवन जन दरसन देई ॥ 
बिनास धरमि देहि परिहाई  । तजिअ  प्रान सौमुख रघुराई ॥ 

नाथ कृपाँ कर मोह जनावा । मेधि है पुनि केहि पथ धावा ॥ 
गयउ कहु कहँ गहे कर केही । उपमातीत रमा प्रिय जेही ॥ 

किए आरती आरतिहर जिनके चरन जुहार । 
ऐसो कंत  के कीरति को बिध गहि बिस्तार ॥

बृहस्पतिवार, १७ सितम्बर, २०१५                                                                  

ससिकर सम मुनि गिरा तिहारी । रुचबर पूछ बहु मनहारी ॥ 
धीमन धुरीन धर्म धाम के । जग मंगल गुन ग्राम राम के ॥ 

सुनिहु तुम्ह बहु देइ ध्याना । मानिहु मुनि जस देइ न काना ॥ 
लाह लहन बस अनभिग सोहीं । बारहि बार पूछेउ मोही ॥ 

सुभग कथा सो सुनु अब आगे । अलस प्रभात सूर जब जागे ॥ 
केहरि नाद बीर बहुतेरे । मेधि तुरग करि ताके घेरे ॥ 

महर्षि आश्रम सों निकसावा । फिरत नर्बदा तट पहिं आवा ॥ 
देऊरचित नगर सुर नाउब । भंवर मनोहर पथ तहँ आउब ॥ 

फटिक मनि भीतिका धरि जहँ गहगहि गेह दुआरि । 
अधबर पाँख गवाँख लिए लाख रहइँ फुरबारि ॥ 

शुक्रवार, १८ सितम्बर, २०१५                                                                      

बास बास जस रजत अटाला । पास देस गह अतिगौ साला ॥ 
कंठनि जब कल कंकनि बाजे । रागिह जिमि छहुँ राग बिराजे ॥ 

गहे गोप गन गोपुर नाना । सो रचना नहि जाइ बखाना ॥ 
गचि पचि गज मुकुता के पाँती । खच रचि हरिन मनिक बहु भाँती ॥ 

 गहे गगन रस खन सस माला  । कर्षन सन सम्पन सब काला ॥ 
पद पद निर्झर नदि  नद ताला । गगन परसित परबत बिसाला ॥ 

रहैं बीर मनि नगर नरेसू  । धर्म सील तै  अघ नहि लेसू ॥ 
एक सुपूत ते राउ  के आही । नाऊ  रुक्माङ्ग अस ताही ॥ 

अमित बिक्रम अतुल अतिबल अचल सूर संग्राम । 
अमित्र घात तापत सदा देइ बिजअ परिनाम ॥ 

शनिवार, १९  सितम्बर, २०१५                                                    

एक बार रमनीअ सँग माही ।  सो नृप सुत प्रमोद बन आही ॥ 
मुख पुर मधुर मनोहर रागा ।  प्रमुदित मन बन बिहरन लागा ॥ 

तेहि अवसर बर बुधवंता के  । राजधिराज जगत कंता के  ॥ 
सुहसील राज बाह बिसेसा । सोइ प्रमुद बन देस प्रबेसा ॥ 

बाँध सिख बदन सुबरन पाँती । दमकिहि देहि धौलगिरि भाँती ॥ 
चंवर चामि कर  चारु चरचिता । तासों दरसिहि कछुक हरिता ॥ 

गहि गति अस सो जमणिमन् जमन  । करिहि बिनिंदित जमनगत पवन ॥
 हरिद असम सम  ग्रास मुख धरे । तासु सरूप कौतुहल भरे ॥

मंगल मौली  मण्डलित  सोहित सुबरन पाँति । 
सब रमनी चित्रबत भई चितबत चित्रकृत  कांति ॥ 

रविवार, २१ सितम्बर, २०१५                                                                                   

निरखत ताहि नृप सुत  रमनिआ । बोलिहि मधुरिम कहए ए बतियाँ ॥ 
हिरन्मय पाति भाल बँधाए । तासु बिकिरन रबि किरन  लजाए ॥ 

अलौकिकलोक  नयनाभिरामा । धौल बरन तन  करन स्यामा ॥ 
मनोज ओज मुख अति मन मोहि । अस सुन्दर है केहि कर होहि ॥ 

कोटि रतन कृत कलित कलापू । सही किरन सो गहि कर आपू ॥ 
लीलाबन चितबन् बिलसावा । कुंवर कमनीअ नयन लसावा ॥ 

श्रुत तिय बचन मुदित मन साथा । लीलहिं गहि कर एक ही हाथा ॥ 
बँध्यो पाति करज धर देखे । सुघर सुथर किछु आखर लेखे  ॥ 

बल बल करतल कास कर लसए रतन की रासि । 
बाँच बाँच रमनीअ सहुँ उपहासत करि हाँसि ॥ 

सोमवार, २१  सितम्बर २०१५                                                                           

सहचारिनि चकरब चहुँ पासा । राज कुँअरु हँस हँस अस भासा ॥ 
मोरे तात सौर जस होई । तासों  दूसर अबरु न कोई ॥ 

मम पितु रहत जिअत जी ताही । जीतिहि रन  जग अस को नाही ॥ 
सुख सम्पद धन धाम निधाना । महि न को मम तात समाना ॥ 

तापर सो अभिमानी राजा । अहो पाति अस लेख न लाजा ॥
भाल बँधाउब हय दिए हेला । निर्भय निलय नगर भित पेला ॥ 

पिनाकधर गिरिजापति संकर । तासु असीस जाके सिरोपर ॥ 
देउ दनुज निसिचर नर नागहु  । प्रनमत जिन बंदत पद लागहु ॥ 

मनिमय मौलि मुकुट धर चरना । राजधिराज मागेउ सरना ॥ 
बीर बलों मम पितु कर ताईं ।अस्व मेघ मख करिअ सुहाईं ॥ 

भूषन  भूषित बाजि धरि  आनौ भट एहि काल । 
तासु सरन अनुगमन करि बंध्या रह घुड़साल ॥ 

मंगलवार, २२  सितम्बर, २०१५                                                                       

गहे करज हिरण्मई पाँती  ॥ बीरमनि बर तनुज एहि भाँती ॥ 
चलि गहगह गह अगह तुरंगा । आए नगरु निज संगिनि संगा ॥ 

मुदित मीर मन अतिहि उछाहू । लोभिन बिरहा लहि जस लाहू ॥ 
राज स्यंदन बन महुँ पायो । घई किरण मैं आन लवायों ॥ 

बीस बाहु दस सीस बिनासक । अवध अधिराट् रघुकुलनायक ॥ 
राम चन्द्र जाके गोसाईं । लिखितै पतिया भाल बँधाई ॥ 

रामानुज निज सैन बिसाला । अतिबुधि अतिबलि बहु बिकराला ॥ 
चहुँ दिसि रच्छत संगत ताहीं । हेलत आपनि पुर पेलाहीं ॥ 

पतिआ  कही कहाउती कह जब गत पितु सोहि । 
बुधबान महाराज  मन कछुकहि हरष न होहि ॥ 

बुधवार, २३ सितम्बर  २०१५                                                                       


देखिअ नृप निज सुत कर काजा । तेहि प्रसंसत  मन बहु लाजा ॥ 
 कृत कर्तन कीरति जस गायो । चिन्तारत चित सोच समायो ॥ 

यह कलि करतां हरन समाना ।  आपन पो सठ अतिबलि जाना ॥ 
जासु  निकाइ सबहि को नीके । एहि तुरग तेहि बाहुबली के ॥ 

गिरजा गौरी पारबती के । जो प्रीतम प्रिय कंत सती के ॥ 
सो संकर तिन पद सिरु नावा । देउ देउ  मह देउ कहावा ॥ 

बहुरि तेउ भगवन पहि आयो । निज सुत करनिहि कहत जनायो ॥ 
सकल बचन सुनि संभु सुहासे । भूपत हरर हरत अस भासे ॥ 

तुम्हरे बर तनुभव कर भयऊ अद्भुद  काज । 
करिइहि सोइ करतब जस करिअब छत्री समाज ॥ 

बृहस्पतिवार, २४ सितम्बर, २०१५                                                                        

राजधिराज परम बुधवंता । सिंधु सुता प्रिय जग भगवंता ॥ 
जगद जीवन जासु गोसाईं । तेहि मेधि हय हरण अनाईं ॥ 

जासु नाउ जिहजपि जपि  जागी । बिराग राग राग अनुरागी ॥ 
सार रूप जिन बेद बखाना । जो मोरे चित रहए ध्याना ॥ 

ताहि जवन लीन्ह गह किरना  । रन रंगन कीन्ह अपहरना ॥ 
एहि रनाङ्गन सुनु नरनाहा ।होइहि एक एहि बहु बड़ लाहा ॥ 

हमहि भगत करि जिनके सेबा । देहि साखि दरसन सो देबा ॥ 
कामद घन दुःख दावानल के । पैह परस सो चरन कमल के ॥ 

काल प्रबंध सुभाग बस लब्धातिसय सँजोग । 
अजहुँ बहु जतन पूरबक, करिहु जवन के जोग ॥ 

शुक्र /शनि , २५/२६  सितम्बर, २०१५                                                                                            

ऐतक परहु मोहि संदेहा । रामानुज भट जाइ न लेहा ॥ 
जद्यपि रच्छित बहु तुअ ताहीं । तद्यपि बरियात लेइ जाहीं ॥ 

एही हुँत यहु मोरे मत नाहू । दुहु कर जुगत बिनयबत जाहू ॥ 
पुरजन परिजन निज सुत संगा । गहै किरन कर संग तुरंगा ॥ 

राज सहित लए  संत समाजा । दइहौ साँपि किरन रघुराजा ॥ 
चरनारविन्द दरसन कीजो । परस नयन रज सिरु धर लीजो ॥ 

सुनत संभु कर गिरा ग्यानी । कहि भूपति उरझन परि बानी ॥  
हरि  दरसन प्रभु को नहि चहहीं । पर मम छत्री धरम यह कहहीं ॥ 

मानि पुरुष राखत अपनापा । राखै आपनि ट्वेज प्रतापा ॥ 
अतुलित बुद्धि  बिक्रम बल संगा । हुँतै हवन रन होत पतंगा ॥ 

बिनु रन रिपु सरनापन्न को कर चरन गहाए । 
अधीस मैं सो अधमतस अरु कादर कहलाए ॥ 

रविवार, २७ सितम्बर, २०१५                                                                                    

औचट सरनग रिपु उपहासें । पाँवर पॉच कहत अस भासैं ॥ 
अधमी रन रननत भय खावै । सभ्येतर सम सीस झुकावै ॥ 

समुख सैन रामानुज केरी । गहगह गगन बजै रन भेरी ।। 
एहि समउ प्रभु उचित जो होई । जो मम हितकर कहअब सोई ॥ 

मैं जन पाल अरु तुम्ह जग हिता । मैं तुहरे भगत तुम्ह रखिता ॥ 
मोरे करतब करत बिचारा । अस कह प्रभु पुर चितवनिहारा ॥ 

सुनि नृप बत ससि मौलि बिहासे ।घन सम गहन बचन हँस भासे ॥ 
यह हय मम संरच्छक पइहीं । तुम्ह सोन बरियात लए जइहीं ॥ 

कोटि देउ अस बल नहि राखे । तुहरे जुधा जुझावन लाखें ॥ 

  आप रूप अवाईं इहँ जो प्रभु करवहि झाँकि । 
 करिहउँ प्रनमन बिनयबत तासु चरन सिरु राखि ॥ 

सोमवार, २८ सितम्बर, २०१५                                                                          

स्वामि सों सबक रन ठाने । यह करतन को भल नहि माने ॥ 
रनै जोइ सो तो अधमाई । कहबैत मैं यह कृत अन्याई ॥ 

सेष बीर भट मम हेतु हिना । अति अच्छम तृन सम तूल तुहिना ॥ 
धरौ चरन तुअहू रन खेता । अजहुँ भया मैं तुहरा हेता ॥ 

मोर रहत अस बीर न अहहीं  । बलात बाजि रसन लए गहहीं ॥ 
आएँ चहै त्रयलोकी नाथा । करब न सकिहइँ कछु मम साथा ॥ 

जोग पानि तब कह जनपाला । तुम रच्छक तुम मम परिपाला ॥ 
छत्री हेतु यह भल मत होइहि । जस तुम कहिहउ करिहउँ सोइहि ॥ 

इत रघुबर कर सैन दल, फिरत नगर चहुँ फेर । 
देइ मग पग चिन्ह चरत मेधि तुरग रहँ हेर ॥  

मंगलवार, २९ सितम्बर, २०१५                                                                     

हेरइ हेर मिलै कहुँ नाही । रामानुजहु ऐतेक माही ॥ 
आन लेइ निज सैन बिसाला । गहे सैनि बहु कोटि कराला ॥ 

है हुँत सबन्हि पूछ बुझाहीं  । हेरे हैहर मिलिहि कि नाहीं ॥ 
सुबरनी पतिका माथ बँधाए । सो मम दीठ किन दरसिहि नाए ॥ 

देइ उतरु का सूझ न आवै ।हय अनुचर नहि कहि सकुचावै ॥ 
बहोरि बिनै बचन के साथा । कहे नाथ सब अवनत माथा ॥ 

तुर तुरंग सम तूल तुरंगा । भय उडुगन जिमि गगन बिहंगा ॥ 
हमहि सो कतहुँ दरस न देही । करिअहिं हरन सघन बन केही ॥ 

धरा गगन पव पलन के निरवन देइ अभास । 
कहि अस सकल दल गंजन फेर नयन चहुँ पास ॥ 

बुधवार, ३० सितम्बर, २०१५                                                                               

सिथिर बदन अनुचर  अलगाई । बहुरि सुमति सों पूछ बुझाईं ॥ 
इहाँ निबासिहि को नरनाहू । हमरे हय होइहि कस लाहू ॥ 

करै परहन जेहि हय आजू । गहै केतक सैन सो राजू ॥ 
केहि के बल मन भए न संका । ठानि  बजावन को रन डंका ॥ 

एहि बिधि सत्रुहन सह महमाता । निगदित मंतु करत रहि बाता ॥ 
देवर्षि नारद ऐतक माहि । रन कौतुक तहाँ दरसन आहि ॥ 

रामानुज पुनि भयउ अगूता । किए आगत सत्कार बहूँता ॥ 
बतकहि मैं जस रह गोसाईं । रहे सो तेसेउ कुसलाई ॥ 

पलकन पल्लव पाँवड़े, श्रुति रंजन करि बानि । 
हय तैं सादर प्रस्न किए सौमुख जुग दुहु पानि ॥ 

    

 

















             

Wednesday, 2 September 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३९ ॥ -----

बुधवार ०२ सितम्बर २०१५                                                                           
सुरतत पुनि पुनि मुनि के बचना । मिटी गयो कुतरक के रचना ॥  
मैं प्रनमत सिरु दुहु कर जोरें । तदनन्तर मुनि चरन बहोरें ॥ 


तासु  कृपा अघ ओघ नसायो । हरिपद बंदन बिधि मैं पायो ॥ 
भगवन मम मन बसियो जब ते ।  रहँ तिनके नित चिंतन तब ते ॥ 

राम नाम एक जगत  प्रतापा । करात गान मोरे मुख जापा ॥ 
करि करि राम नाम गुन गायन । करत गयउँ पावन अन्यान ॥ 

भगवन दरसन नयन हिलोरे । तासंग पुलक उठे मन मोरे ॥ 
गुन गन गायन मम चित चोरे । तिनके सुमिरन सुखद न थोरे ॥ 

अहो धन्य कृतकृत्य मैं  ए मोर परम सुभाग । 
दीठी दरपन हरि छटा हरिदय में अनुराग ॥ 

जो हरि के दरसन अभिलासा । होही अवसि पूरन यह आसा ॥ 
परम मनोहर नर नारायन । सबहि भाँति तिन  भजियो रे मन ॥ 

जल सीकर महि रज गिनि जाहीं ।रघुपति चरित न बरनि सिराहीं ॥ 
बिमल कथा यह हरिपद दायन । भगति होइ सो सुनि अनपायन ॥ (उ. का. दो. ५२ )

भवसिंधु चहँ पार जो जावा । राम कथा ता  कहँ दृढ नावा ॥ 
महमन अब कहियो तुम मोही । इहँ तुहरे आगम कस  होहीं ॥ 

होइहि को सो धर्म निधाना । तुरग मेध जो मख अनुठाना ॥ 
यह सब कहि बत मोहि जनइहो । मेधि तुरग पुनि रच्छन जइहो ॥ 

सुमिरिहु हरिपद बारहि बारा । होही मनोरथ सफल तिहारा ॥ 
 मुनि के बचन सुनिहिजो कोई । परम सुखद मन अचरजु होई ॥ 

बिनीत मृदुलित बानि  में कही सबहि कर जोए । 
मुनिबर दरसन पैह के  तन मन पावन होए ॥ 

शुक्रवार, ०४ सितम्बर, २०१५                                                                             

कलिमल समन मनोमल हरनिहु । राम कथा नित मुनि तुम बरनिहु ॥  
जो किछु संसय पूछ बुझावा । सोई सबहि हम कहत जनावा ॥ 

सौनौ जथारथ बचन सप्रीती ।कुम्बुज  कर यह सुन्दर  नीती ।। 
मुनिबर के मुख कहि अनुहारे । करिहि महामख  नाथ हमारे ॥ 

हम सैबिता सेवक जिन्ह के । ए मेधिआ तुर तुरग तिन्ह के ॥ 
चारितु चरत चरत इहँ आवा । मुनि तव आश्रम हमहि डिठावा ॥ 

एहि हमरे आ गमनु प्रसंगा । कृपा करत कीजो हृद्यंगा ॥ 
अगंतुक के बचन मनभावा । श्रुतत मुनिरु मन परम उछावा  ॥ 

कहत गयउ मुख  सुधि बुधि भूले । मोर  मनोरथ तरु फल फूले ॥ 
जेहि हेतु जनि मोहि जनाई । लहउ अजहुँ सो पूरन ताईं ॥ 

मम कर सोहि रचित हवन जेतक हविहुति जोहिं । 
तेहि अगनहोत के फल अजहुँ मिलेइब मोहि ॥ 

जासु दरसन नयन  पथ जोहीँ । प्रगस रूप सो सौमुख होंही ॥ 
रह अजहुँ सो समउ अति थोरे । चरण कमल कर परसिहि मोरे ॥  

धन सरूप दरसन जग कंता । दारिद गहत होंहि धनवंता ॥ 
पवन सुत अहह हृदए लगाईं । पूँछिहि छेमकरी मम कुसलाई ॥ 


मोरि अबिचल भगति जब जोखिहि । संत सिरोमनि बहु संतोखिहि ॥ 
आरण्यक गदन कानन पाए । रीझत हनुमत चरण सिरु नाए ॥ 

ब्रम्हरिषि हरी भगत सुजाना कहइ बिनेबत मैं हनुमाना ॥ 
बोधिहौ मोहि मुनिबर कैसे । रघुबर दास चरन रज जैसे ॥ 

ते अवसर हरि भाव भरि सोह रहे हनुमान । 
पुलक उठेउ  मुनि मह रिषि तासु बचन करि कान ॥ 

रविवार ०६ सितम्बर २०१५                                                                    
हहरत हनुमत उरस लगाईं । समउ सनेहु न सो कहि जाई ॥ 
सरसित  सुहृदय भरि भरि आवा । कर्ष नयन जल धार बहावा ॥ 

आनंद सिंधु उर न समाही । उमगि उमगि उम दुहु अवगाही ॥ 
पयस मयूख प्रनत प्रतिमित से । लखित सिथिर कृत चित्र लिखित से ॥ 

हरिपद पदुम प्रीति रहि कूरे । दुहु मन मानस रस  भरभूरे ॥ 
बैठिहि दोउ एकहि एक ताईं । कलिमल हरनि कथा कहि गाईं ॥ 

मुनि रघुनाथ रहेउ ध्यान । हनुमत तब ए गदन निगदाने ॥ 
जो तुम्हरे चरन सिरु नाईं ।मुनि यहु रघुबर कर लघु भाई ॥ 

सीस बिनयबत प्रनत निहारा । सूर सेबित ए भरत कुमारा ॥ 
गन भूसित मंत्री तिन जानिहु । ठाढ़ि सुजन निज आसीर दानिहु ॥ 

यह मह तेजसी भूपति सुबाहु जाके नाम । 
हरि पद पदुम यह भाँवर करिहै तोहि प्रनाम ॥ 

सोमवार, ०७ सितम्बर, २०१५                                                                    

बिमल प्रेम बसिभूत भवानी । रघुबर चरण भगति जिन दानी ॥ 
करिहि पार भव सिंधु अपारा  । राउ सुमद सो चरन जुहारा ॥ 

मेधि तुरग आगम जब जाना  सकल राज हरि चरन प्रदाना ॥ 
सो सत्यबानहु द्विज नाथा । धरे धरनी नाय पद माथा ॥ 

हनुमत आगत परच हिलगाए । मुनिबर सबहि सादर उर लाए ॥ 
पेखि पाहुन मुनिरु प्रिय प्राना । करत स्वागत करि सन्माना ॥ 

कंद मूल फल रुचिकर राखे । अहे छुधित सब रूचि रूचि भाखे ॥ 
सुमित्रा नंदन सहित सुपासी  । रिषिबर आश्रम माहि निवासी ॥ 

प्रात उठे रबिकर रतनाई ।प्रिय संगत अलिकुल अलसाईं  ॥ 
लगए पलकिन्हि लोचन मलिनाए ।  सौच करी नर्बदा अन्हाए ॥ 

जगती जोति नयन लगे जगन लगे सब कोइ । 
अगुसरन सब उद्योगी तमुचर उद्यत होइ ॥ 

बृहस्पतिवार,१० सितम्बर, २०१५                                                              


सत्रुहन चरनन सीस नवाईं । पुनि मुनिबर निज सेबक ताईं ॥ 
सादर सुभग सिबिका बैठाए । पावन  अवध पुर देइ पठाए ॥    

सूर बंस करि जहाँ निवासा । मुनिरु नयन सो नगर सकासा ॥ 
दरसत  दूरहि भर अनुरागे । उतरि चलेउ सिबिका त्यागे ॥   

रघुबर छबि मन दरपन माही । साखिहि दरस पयादहि जाहीं ॥ 
सोहइ चहुँपुर जान समुदायो  । कहि बत कहि श्रुत बहु सुख पायो ॥ 

ता रमनीअ नगरिहि पग राखा । हरि मुख दरसन  मन अभिलाखा ॥ 
तनिक बेर मह मख मंडपु सों । सरजू तट सहुँ बीच बिटप सों ॥ 

निरखिहि नयन रघुनन्दन केरि अनूपम झाँकि । 
दुर्बादल सरिस श्र्री हरि सुभग स्यामल लाखि ॥ 

लावण लोचन दरसिहि कैसे । सरस बदन सरसीरुह जैसे ॥ 
करधन भाग धरे मृग श्रृंगा । करी गुंजन भए भूषन भृंगा ॥ 

ब्यासादि मन महर्षि घेरे । रहँ  बिराजित बीर बहुतेरे ॥ 
भात संग लखमन भुज पासा । जनाकीरनित बास बिलासा ॥ 

माँगए चहँ जो सो कर दाना । दे निधि दीनन दीन निधाना ॥ 
मान कृतारथ आपहिं आपा । मुनि मुख एकु संतोख ब्यापा ॥ 

कहँ भगवन दरसन छबि जोईं । मोर मनोरथ  पूरन होईं ॥ 
निगमागम श्रुति बेद पुराना । बाँचत जिन्ह गहेउँ ग्याना ॥

जब ते हरि दरसन कर कूरे ।  सकल सास्त्र अरथ भए  पूरे ॥ 
एहि कर हरि महिमन मैं जाना । पुनीत समउ अवधपुर आना ॥ 

 भरे हरष ब्रम्हऋषि अस कहँ बहुतक कहिबात । 
ऐसेउ निगदन निगदत भयऊ पुलकित गात ॥ 

अगम अगोचर अबर हुँत जेउ । दूरहि जोगीस सुधिजन तेउ ॥ 
सजल नयन पुलकित तन साथा । गयउ नतपट निकट रघुनाथा ॥  

पहुँच सौमुह अह धन्य कहेउ । मोरे नयन हरि दरस लहेउ ॥ 
आजु नाथ मम साखि बिराजे । सहित सुधित सुधि संत समाजे ।। 

हेल मिलत जग पुंज प्रतापा । करिहउँ बहुतक बात अलापा ॥ 
जस निरमल सुरसरि के पानी । होइहि तस निर्मल मम बानी ॥

जाज्बल मान तपोनिधाना । निज तेज सों आन जब जाना ॥ 
उठेउ जुगत कर रघु कुल केतु । मुनि मनीष के स्वागत हेतु ॥ 

सुरासुर जुगलकर करिहि आरती जिन मंगल गन ग्राम कर । 
परि पदुम चरन करि हृदयाय नमन जिन धर्म धाम प्रनाम कर ॥ 
सोइ जगत गोसाईं दस के नाईं मुनि बर चरननि सीस धरे । 
कहेउ रघुराई  पथ पथ पबिताई  जौ इहँ आपनि चरन  परे ॥ 

जगत  महिपत पद प्रनमत  बिनत जुगत कर देख । 
तपोबिरध मुनि के निलय भरि अनुराग बिसेख ॥ 

शुक्रवार ११ सितम्बर, २०१५                                                            

जान दास आपन मन माही । नहि नहि स्वामि कह सकुचाहीं ॥ 
गहे दुहु कर बरिआत उठाए । निज प्रयतम प्रभु हरषि उर लाए ॥ 

दे मान सन्मान बहु कीन्हि । मणि निरमत बार आसान दीन्हि ॥ 
अतिथि स्वागत बहु सत्कारै । लिए  पयसन  प्रभु चरन  पखारैं ॥ 

चरनोदक सर माथ चढ़ाईं । बोले बानि सनेह सुहाई ॥ 
अजहुँ सकौटुम सेबक संगा । पबित भय मैं जस जल गंगा ॥ 

पुनि देबाधिदेब सो सेईं । मुनि ललाट पट चनदन देईं ॥ 
बहुरी बहुतक मनोहर ताईं  । मधुर गिरा कर कहि गोसाईं ॥ 

यहु मेधीअ मख मंडपु जस तुहरे पथ जोहि । 
आन तव चरन अजहुँ सो अवसिहि पूरन होहि ॥ 

शनिवार, १२ सितम्बर, २०१५                                                                         

मंद मृदुल मधुरस मैं सानी । बोले रिषि हँसि कर अस बानी ॥ 
तुम महि रच्छक तुम सुर राखा । तुम कुल कृत हम तुहरे साखा ॥ 

महिसुर गन के चरन पूजिता । जग हित चिंतक केहु तुम हिता ॥   
जस सत्कृत तुहरे कर होईं । देख करिहि तिन तस सब कोई ॥ 

आन सकल सब लोक स्वामी । होही तुहरे चरन  अनुगामी ॥ 
 भव सागर भरि पाप घनेरे । भगवन चरन  भगति के प्रेरे ॥ 

बेद हीन कि  मूढ़ मति होई । राम नाम सुमिरिहि जो कोई ॥ 
पार गमन करि  पाप तरि जाहि  । सकल काम प्रद परम पद पाहि ॥ 

रामहि अधमोद्धारक रामहि पाप निवार  । 
चहुँ जुग चहुँ श्रुति राम  ते  नाम प्रभाउ अपार ॥ 

राम अधमों के उद्धारक  हैं नाम समस्त जगत का उद्धारक है चारों युग में चारों वेद में राम से  नाम का प्रभाव अधिक है ॥ 

रविवार १३ सितम्बर, २०१५                                                                  

इति कृतं बृत् बेद  इतिहासा । राम नाम सम रतन प्रकासा ॥ 
छाइहि जब अगजग अँधियारा । राम नाम करिहै उजियारा ॥ 

ब्रम्ह हंतक केर जस पापा । रघुबर तबलग गरज ब्यापा ॥ 
हिय सों कंठ रसन अवतरत उजरित रूप जबलग न उच्चरत ॥ 

तुहरे नाउ करै जब गरजन । महापात सरूप गजराजन ॥ 
हेर केर को आन निकाई । श्रुत ते डरपत होत  पलाई ॥ 

पूरबल जब सतजुग रहेऊ । सुरसरि तट बासि रिषि कहेऊ ॥ 
वेद विदुर सुधि सुबुध सुजाना । ताते मुख एहि सुने अगाना ॥ 

पाप के भय तबलग ब्यापे  । जब लग मनहर नाउ न जापै ॥ 
सर्ब निवासित हे जग जीवन ।धन्य भया मैं भए  तव दरसन ॥ 

महामुनि बोलिहि निमगन  बन्दए पद  रघुनाथ । 
सभा सदन सब कहि उठे साधु साधु एक साथ ॥ 

सोमवार, १४ सितम्बर, २०१५                                                                          

सुबुध सचिउ बुधि बिरध समाजे । महर्षि मुनिगन संग बिराजे ॥ 
करिहि प्रभो जब संत समागम  । भयउ अचरज पूरित उपागम ॥ 

हे ब्रम्हं मुनि वात्स्यायन । करिहउँ तव सहुँ वाके बरनन ॥ 
हरि  भगत नहि तुहारे समाना । मोर बचन सुनु देइ ध्याना ॥ 

मुनिबर दरसि सुरति जस रूपा । दरसएँ रघुबर सोइ सरूपा ॥ 
जस  देखेउ चित्त धरि ध्याना । तस देखाउब दिए भगवाना ॥ 

निहारए निहारनहारा । होही उर्स महुँ हरष अपारा ॥ 
तहँ बिराजित महर्षि जेऊ । कहि मनोहर बचन तिन तेऊ ॥ 

सुभग सील मम जस को नाहीं । सुधिज सकल भूमण्डल माहीं ॥ 
बिनयानबत नमत गोसाईं । सिरुनत पूछिहिं मम कुसलाई ॥ 

करे स्वागत बहु सत्कारे । परस परस मम चरन पखारे ॥ 
आजु जगत महु को मम सोई । होए न होइ न होहिं न कोई ॥ 

जाके चरन  सरोज रज  सकल बेद करि सोध । 
किए  मोर पलोवन सोए ब्रम्ह देउ संबोध ॥ 

मंगलवार, १५ सितम्बर, २०१५                                                                        

मोरे चरनोदक पयसाईं । मानिहै पबित आपनी रघुराई ॥ 
मुनि जब कहत रहए ए  प्रसंगे । तबहि  तासु ब्रम्हा भग भंगे ॥ 

अमित तेज तहँ सों निकसायो  । चकचौंहत प्रभु माहि समायो ॥ 
एही बिधि पावनि सरजू तीरा । रहँ मंडपु थित सजन सुधीरा ॥ 

चितबत चितवनि सब चितब रहे । आरन्यक साजुज मुकुति गहे ॥ 
बाजि बहु बजने चहुँ पासा । घन घन धुनि गहगहे अकासा ॥ 

ढोर मजीरु कतहुँ कल बीना । पुरयो संख सदन भए लीना ॥ 
ऐसिहि मुकुति गह न सब कोई । जोगिन्हि हेतु दुर्लभ होई ॥ 

एहि उपागम चितबत भए चित्रवत चितबनिहार । 
रघुनन्दन के चरन सहुँ  बरसे सुमनस बारि ॥