Saturday, 22 May 2021

----- || दोहा -विंशी १० || ----,

 खाटे मीठ स्वादु कौ तरसै सब  परिबार | 

बिरते तापस रितु बिनहि ढारे आम अचार || १ || 


एक बार परगट पुनि तुम हो जाओ भगवान | 

नित भाँवरती धरति के साँसत में हैं प्रान || २|| 


बड़ी बड़ी मंडि ते भले छोटे छोटे हाट | 

यामें ठाटे एकै को यामें सबके ठाट || ३ || 


बड़ी चाकरी ते भली घर का छोटो काम | 

स्वामि पदवी देइ के भरपूरे धनधाम || ४|| 


लघुता मह प्रभुता बसी ए करत महबंद सिद्ध | 

लघु कुटीर उद्यम सोंह होता देस समृद्ध || ५ || 


बृहद संग जो होउते  लघु कुटीर उद्योग | 

महबंद माहि दरसते काम लगे सब लोग || ६ || 


देस तोरा महबन्द कीन्हेसि ए सिद्ध | 

लघु कुटीर उद्यम संग रहिता तू समृद्ध || ७ || 


जनता देवनि हार है नेता मंत्री गिद्ध | 

अगजग केर महबंद ए कहबत करिता सिद्ध || ८ ||


लाग्यो ऐसो देस म कोरोना को भूँड | 

धंदो गयो चूल्हा म बिकण म आगा ढूँड || ९ || 


साजन आपद काल मह करें सबहि कर दान | 

दारिद दानए सेवा श्रम धन दानए धनवान || १० || 


तमस काण्ड अतिव घना जीवन है उद्दीप | 

सार गहे बिस्वास का जलए आस का दीप || ११ || 


 दिन सबहि दुर्दिन भए रे काल राति सब रात | 

घट घट भीतर प्रान जल पल पल रीसत जात || १२ || 


ठाढ़ भया अतिपात कौ जबहि प्रान प्रत्यर्थ  || 

प्रान सोही होतब तब नहीं प्यारा अर्थ || १3 || 

भावार्थ : -जब प्राणों लेने के हेतु शत्रु सम्मुख खड़ा हो तब अर्थ प्राणों से प्रिय नहीं होता अर्थात अर्थ से प्राण प्रिय होते हैं || 

काल ए बहुतहि बिकट है समउ ए बहुत कराल | 
छाए रे नैरास केर चारिहुँ पुर घन माल || १४ || 

जिअ कहुँ जिउ ते लाए रे मरिता काहे रोए | 
आवन जावन जग रीति आज कोए कल कोए || १५ || 

8 जून 2025 

यत किंचितहु पीर देत,अधिकाधिक दुःख दाए  | 
बीच मझारी जोइ रहे,सो तो होत सुखाए ||१६ || 

भावार्थ : यत किंचित पीड़ा देता है अधिकाधिक भी दुख दाई है किसी भोग वस्तु की मध्यम स्थिति ही सुख प्रदाय  है इसलिए वर्तमान में अन्य की अपेक्षा मध्यम वर्ग अधिक सुखी है  

पाहन धरती चन्द्रमा पाहन नदी पहाड़ | 
पाहन पाहन गह नखत पाहन सब संसार ||१७ || 

सभ्यता अरु संस्कृति के जो पहरे परिधान | 
अजहुँ नाहि भारतीअ सो भारत का संविधान || १८


अहो मनुज तुमने सदा, प्रकृति से की छेड़ छाड़ | 
कहो मिला प्रतिफल क्या, भूकंप अंधड़ बाढ़ || १९ || 

सैन चतुरङ्गि सीँव खड़ी सैनि रहे ललकार |
चढ़ी सान पर लेखिनी गहे शीश पर धार ||२०|| 













----- || दोहा -विंशी९ || ----,

मानस तोरी करनि ते नाघत निज मरजाद | 

चला बिनासत तव जगत सिंधु करत घननाद || १ || 

भावार्थ :-- हे मानव ! तेरे  कृत्यों के कारण अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर समुद्र आज घोर गर्जना करता तेरे संसार को नष्ट-विनष्ट कर गया | 


सधारन जन मरि मरि गए, भया रोग बिनु हेतु | 

धरे रहे सबु राजपथधरे रहे सब सेतु || २ || 


जनता तोरे राज मह दुखड़ा सुनै न कोइ | 

चिंटी के पग घुँघरु बजे रघुबर सुनते सोइ || ३ || 


देह करी कठपूतरी काल नचावै नाच | 

नाचत नाचत थकि गिरे राम नाम भा साँच || ४ || 


धर्म कर्म बिसराइ के करिता चलिआ पाप | 

किन्ही आपनी दुरगति अपुने हाथौं आप || ५ || 


हति हति तरपाइ के रे सरप बिछी सब खाए | 

पाप परायन मानसा तिल तिल मरता जाए || ६ || 


दूषित देसाचार सों उपजे बिदेसि रोग | 

तासु मरि मरि जात अहैं हम भारत के लोग || ७ || 


रे पापि मानस तोरा भरिआ अघ का घट्ट | 

काल पास लए बिचरिआ प्रान जाए सो फट्ट || ८ || 


जिअ लेवे  जिनावर कर खाए खीँच के खाल | 

त्राहि त्राहि पुकारि करे दरसत अपुना काल || ९ || 


धरी रही धन सम्पदा धरा रहा धन धाम | 

काल पास करि लै गया न आयउ कोउ काम || १० || 


काल चाक द्रुत गति गहा बीच कील करि मीच | 

ताहि रौंदत बढ़ी रहा आयउ जो को नीच || ११ || 


त्राहि त्राहि पुकारि कहैं हम तौ अपुना दुख्ख | 

सो जिउ निज दुःख कस कहैं जिनके नाहीं मुख्ख || १२ || 


बुद्धिबल सील मानसा बिसरा प्रकृति बाद | 

ता संगत संसार मह उपजे रोग बिषाद || १३ || 


आपद काल सरूप में रोग नचावै नाच | 

कुंडली मार साधन परि बैसे अर्थ पिसाच || १४ || 


तमस कांड ए मरनि का जीवन है उद्दीप | 

सार लेय बिस्वास का जले आस कर दीप || १५ || 


दिसा दिसा मह देस की पसरा रोग बिषाद | 

आपदा कौ औसर करि फलिता पूंजी वाद || १६ || 


देस आपदा काल मह होत जात है दीन | 

पूँजी पति के सौंह भए सासक सक्ति बिहीन || १७ || 


अगनि गोल भाल धनुसर परसा परिघ परमानु | 

सो आजुध बिरथा भयउ सम्मुख एकै बिषानु || १८ || 


माँगे हमरे देस जो भगवन का परमान | 

बिनती तोसे रे जगत तिनको पराए जान || १९ || 


दुनिया जिउ जंतु ऊपर करिके अत्याचार | 

राकस होते मानस हुँत ढुंडए रोगोपचार || २० || 
















 

Thursday, 20 May 2021

----- || दोहा -विंशी८ ||----,

हरिअर हरिअर भूमि कहुँ करिकै सत्यानास | 
काँकरी के बिकसे बन वाका नाउ विकास || १|| 

नारी तोरी तीनि गति चतुरथी कोउ नाए l
पति पुत अरु बंधु बाँधव सतजन दियो बताए ll२ ||
भावार्थ :- संत जनो ने नारी की तीन ही गति बतलाई है प्रथम पति,दुजी पुत्र व तिजी बंधु-बांधव इसके अतिरिक्त उसकी चौथी कोई गति नही है यदि उसे पति त्याग दे तो वह पुत्र के पास रहे पुत्र त्याग दे तब वह बंधु बांधवों के पास रहे यदि बंधु-बांधव भी उसका परित्याग कर दे फिर तो उसकी दुर्गति होनी निश्चित है l

घन अँधेरा नगरि माहि छाए रहा चहुँ ओर |
छूट रहै साहुकारा गहि गए सो तो चोर || ३||

दो बालक सों होइगा अलप सँख्यक समाज |
बहु सँख्यक सम्राजवाद करिगा हम पे राज || ४ ||

दो बालक सों होइअहु जग मह अलपक सँख्य |
सम्राज वादि राजेगा होतब पुनि बहु सँख्य || ५||

गउ मात की सुश्रुता सो होतब पुन्य अगाधु |
गउ गह करि है सदस जस गउ हत्या अपराधु || ६||

सिच्छा ते ग्यान बड़ा बड़ा दान ते ताज |
बड़ा दीन का देवना धनी जानि ले आज|| ७ ||

जुबक जानि कै आपुनो चलिया केस रँगाय |
बूढ़ी हड्डी बोलि चूँ गिरिआ ठोकर खाए || ८||

चाहिए जब जल बाँधना, देवें रे तब छाँड़ |
दोइ दिवस घन बरखते, जहँ तहँ आवै बाढ़ || ९ ||

पर गह को कह आपना झूठा करए बखान |
रे मानस मन मूरखा तेरा गह समसान || १० ||

गह गहिने गढ़न माहि लगा रहा धनवान |
छूटे प्रान त छोड़ सब पड़िआ जा समसान || ११ |

जगति जोति जागे जगनाथा | जयजय करि जागे जग साथा ||
जोए जुग कर सहुँ सीस नवाए | पुष्कल पुष्कल कमल उपजाए ||

बरखत बून्द बीच अह खिली गगन मह धूप |
सुबरन मय छटा संगत दरसै रूप अनूप || १२ ||

घन घन स्याम रूपधर,ऐसो बरसो राम |
जग कर जोए बोलि उठे, साँचा तोरा नाम || १३ ||

सज सिंगार कर बर्तिका आई जोंहि समीप |
प्रेम अगन में जर उठा जग उजयारत दीप || १४ ||

कटि तट घट मुख परि घुँघट काँधे लट बिथुराइ |
पनघट पनघट परि चलत बरखा रितु बहुराइ || १५ ||

बहुरि बहुरि बहुराइ के तापस रही बहूर |
बहुरि बहुरन को बरखा बिलखावत आतूर || १६ ||

आत्मनिर्भर होइ के पालें गह मह गाय |
दूध दधि घृत सोंहि साजन पावैं माखन छाए || १७ ||







-----|| दोहा-विंशी 7 || -----

 ढली शाम वो सुरमई,लगा बदन पे आग | 

फिर रौशनी बखेरते लो जल उठे चराग़ || १ || 


चली बादे गुलबहार मुश्के बारो माँद | 

सहन सहन मुस्करा के निकल रहा वो चाँद || २|| 


मर्ज़ की शक़्ल लिये फिर क़ातिल है मुस्तैद | 

दरो बाम कफ़स किए फिर जिंदगी हुई क़ैद || ३ || 

कफ़स =पिंजड़ा 


ये महले मुअज्ज़म औ ये आलिशा मकान | 

नादाँ को मालुम नहीं दो दिन की है जान || ४ || 


सुन ऐ नादान तुझको है गर जान अज़ीज | 

चेहरे को हिज़ाब दे रह अपनी दहलीज़ || ५ || 


इधर मर्ज़े नामुराद और उधर तूफ़ान | 

ऐ नादा इन्सा तिरी मुश्किल में है जान || ६ || 


साहिलों पे बेख्याल दरिया करता मौज़ | 

पीछे हमला बोलती तूफानों की फ़ौज || ७ || 


बादे वारफ्तार वो तूफ़ां बे मक़सूद | 

सरो सब्ज़ दरख्तो दर हुवे नेस्तनाबूद || ८ || 


इक दिल इक जान इक सर और सौदे हज़ार | 

न दुआ पे यकीन अब न दवा का एतबार || ९ || 


इक तो ये फाँका कशी उसपे ये बीमारि | 

चार सूँ आह कू ब कू मुश्किल औ दुश्वारि || १० || 


देखि हमने जम्हुरियत तेरी रय्यत दारि | 

शहर शहर हर रह गुज़र दहशत औ बीमारि || ११ || 


कहीँ मरीज़े ग़म कहीं, दरिया औ तूफ़ान | 

कहीं गिरते जहाज़ पर, आफ़त में है जान || १२ || 


मरीज़े ग़म दरम्याँ आफ़त जदा जहान | 

आह पोशे निग़ाह में और लबों पे जान || १३ || 


सब बाज़ार बंद हैं खुला काला बज़ार | 

जमाख़ोर का ख़ूब याँ  चलता क़ारोबार || १४ || 


साहिल साहिल किश्तियाँ किश्ति किश्ति बादबाँ | 

दरिआ दरिआ नाख़ुदा लहरो लहर तूफाँ || १५ || 


है ये मुश्किल वक़्त पर नहीं हम फिक्र मंद | 

दिल है होशो हिम्मती औ हौसले बुलंद || १६ || 






-----|| दोहा-विंशी ६ || -----

जोड़ जोड़ करि होड़ मह जोड़ा लाख करोड़ | 

अंतकाल जब आ भया गया सबहि कछु छोड़ || १ || 


रोग संचारत चहुँ दिसि रोग सायिका नाहि |

करत गुहारि रोगारत जीवन साँसत माहि || २ || 


जिअ हनत ब्यापत महमारी | जन जन केरी करत संहारी || 

देस नगर कि बस्ती कि गांवाँ | गली गली पैसारत पावाँ || 

महमारी मह रूप धर करत सतत सँहार | 

हाथ धो रहे प्रान ते जन जन बिनु उपचार || ३ || 


रोग केरे कारन कहुँ पुरबल करौ अवसान | 

बहुरी कारज कीजिये तापुनि करौ निदान || ४ || 


रोगी औषध नाउ चढ़ सिंधु भई महमारि | 

काल रूपी तरंग उठै जबतब बारम्बारि || ५ || 


असाध ब्याधि ब्यापति नाही कोउ निदान || 

बिनु औषध जन जन केर साँसत मह हैं प्रान || ६ || 


करोना बिषानु भरी के चलि चुनाउ करि नाउ | 

काल नदी माझि  अहई बहुतहि बेगि बहाउ || ७ || 


काल न दरसे रैन दिन काल न दरसे भोर | 

काल न दरसे ठाउ को काल न दरसे ठोर || ८ || 


सम्बलपुरि गोठान मह मरत भूखि गौमात | 

निरदय निगम  ताहि सुखा तृनहहु हुँत तरसात || ९ || 


पबिताई बसे तहँ जहँ गौकुल करै निबास l
साजन सुचिता बसे जहँ पबिताई के बास ll १० ||
भावार्थ :- जहाँ गौवँश निवास करता है वहाँ पवित्रता का वास होता है l सज्जनो ! जहाँ पवित्रता का वास होता है
स्वच्छता भी वहीं निवास करती है

भोजन न को पाइ सकै सुचित होत संडास l
साजन सुचिता बसे तहँ जहँ पबिता कहुँ बास ll ११ ||
भावार्थ :- संडास के स्वच्छ होने पर भी वहाँ कोई भोजन नहीं करता l सज्जनो ! जहाँ पवित्रता का वास होता है स्वच्छता भी वहीं बसती है

साजन मोरे देस अब गाँव रहे नहि गाँव |
तुलसी बिनु भए आँगना नहि पीपल करि छाँव ||१२क ||

साजन मोरे देस अब,सुनी परी अमराइ |
कुहु कुहु करती कोयरी डारन सो अलगाइ || १२ख

साजन मोरे देस अब नहि हरिदय मह प्रीत |
सरगम बिहुने गीत भए सुर बिनु भा संगीत ||ग ||

पनघट भयउ नीर बिहुन भई नदी बिनु नाउ |
बिसरि कंठ सहुँ भैरवी बिसरा राग बिहाउ ||

रजस कन सों रत्नारा दरसावत दिग अंत |
पुहुप रथ बिराज कै आयो राज बसंत || १३ ||

क्यारि क्यारि कुसुम भए पथ पथ पुहुप पलास |
चहुँ पुर छटा बखेरते आयो फागुन मास || १ ४ ||


कटि तट घट मुख पट करी कहै गोपिका भोरि |
ए री सखि फागुन आयो कब आवेगी होरि || १५ ||

पाहन पाहन गह नखत, पाहन नदी पहार l
पाहन करिता धरति रे,पाहन सब संसार ll १६ ||
भावार्थ :- ये ग्रह नक्षत्र पाषाणमय है, नदी-पर्वत भी पाषाणमय ही हैँ, जीवन को धारण करने वाली धरती को भी पाषाणीय करता रे मनुष्य देख ! ये समस्त संसार पाषाण का ही है .

पाहन पाहन गह नखत, पाहन नदी पहार l
एकु धरति जी धरित्री न त, पाहन सब संसार ll १७ ||
भावार्थ :- ग्रह नक्षत्र में पाषाण ही पाषाण है, नदी-पर्वत में भी पाषाण ही पाषाण हैँ एक धरती जीवन को धारण करने वाली है अन्यथा तो समस्त संसार पाषाणीय है .

जहाँ कुलिनी कुलीन कर जहाँ कूल कुलवान l
जहाँ कुलीन कुल करतब, तहाँ दान कल्यान ll१८||
भावार्थ :- जहाँ नदी निर्मल व पवित्र करने वाली हो, जहाँ तट कुलवानो से युक्त हो जहां का कुल पुन्यकृत व विशुद्ध हो वहाँ दिया दान कल्याण करता है

सृष्टि के विध्वंश पर साधे हुवे है मौन |
प्रकृति से खेलता ये कहो समय है कौन || १९ ||

भ्रष्टाचारी घुटाला आतंकी उपजाए |
परजा तोरे तंत्र मह भया बिकाउ न्याय || २० ||




कटि तट घट मुख परि पट करी,कहै गोपिका भोरि ll
ए री सखि फागुन आयो, कब आवेगी होरि ll




Thursday, 26 March 2020

-----|| GYAAN-GANGAA || -----,

===> ''क्षुधा प्राणवान का प्रथम रोग है भोजन उसकी औषधि है.....'' 
===>'' उदर की अग्नि भोजन से शांत होती है धन से   नहीं.....''

Wednesday, 25 March 2020

----- || दोहा -विंशी 5 || ----

पसरा ब्यभिचार जबहि हिंसक भया अहार |
मानस निपजे रोग अस जाका नहि उपचार॥१ || 
भावार्थ:-- जब व्यभिचार अर्थात अनुचित यौन-संबंध ने पैर पसारे और आहार हिंसा जनित हो गया मानव ने ऐसे ऐसे रोगों को  जन्म दिया जिसका वर्तमान में कोई उपचार नहीं है | 

कुपथ्य सोंहि निपजायउ बिषानु भया बिलाए | 
जनमानस मूषक सरिस  डरपत गह भितराए ||२|| 
 भावार्थ: - कुपथ्य के कारणवश उपजा कोरोना नामक विषाणु बिलाऊ हो गया है और मानव जाति मूषक के जैसे भय के मारे घरों में दुबकी पड़ी है 

भया देस महँ महबंध, कारन रोग प्रसार |
सासन हर को चाहिये, खोलए अन भंडार॥३|| 
भावार्थ: - रोग प्रसारण के कारण देश में 'महाबंध’ घोषित हो गया अब सत्ता धारियों को चाहिए कि वह अन्न के भंडार खोल दे अन्यथा निर्धन जन मानस कोरोना से अधिक भूख के विषाणु(वायरस )से मर जाएगा | 



उड़ि उड़ि के धनी मानी लैहेंगे नव रोग |
गह कहुँ बँधना गार किए, बँधे रहेंगें लोग॥४|| 
भावार्थ:- घनाड्य व लब्ध प्रतिष्ठित वर्ग उड़ उड़ कर विदेश से नए नए रोग लाता रहेगा और सामान्य लोग इसके बचाव हेतु अपने घरों को कारावास किए बंधे पड़े रहेंगे क्यों-- ये लोकतंत्र है या बंधतंत्र ..... ? 

मेढक स्वान सर्प सहुँ भाखो मछरी माँस l
रोग ब्यापौ जगत महँ ,ताका नाउ बिकास ॥५|| 
भावार्थ :- कुत्ता बिल्ली सर्प मेढक मछली का माँस खाओ और समूचे जगत को रोगों से व्याप्त करो इसी को आधुनिक युग में विकास कहा गया - ----

 ताल थाल कंकनि संग बाजत जबहीं संख | 
साधौ रोगानु केरे, बिकसत नाही पंख ||६|| 
 भावार्थ : - सज्जनों !  हिन्दू धर्म के अनुयायियों की उपासना पद्धति में शंख ताल थाल व्  घंटिका  के प्रयोग  का एक वैज्ञानिक कारण है जब ये धातुमय वस्तुएँ निह्नादित होती है तब इनकी  ध्वनि तरंगों से आसपास के अदृश्य रोगाणु विकसित न होकर नष्ट हो जाते हैं | 


 चारि चरन पै धर्म जहँ धर्म रता जहँ लोगן
तहँ सब प्रानि सुखिहि रहैं तहँ न ब्यापत रोग ||७|| 
भावार्थ:- जहाँ धर्म अपने चार चरणों( सत्य,दया, दान, त्याग) पर स्थित होता है,जहाँ लोग धर्म निष्ठ होते है वहाँ सभी प्राणी सुख पूर्वक निवास करते है वहाँ कोई रोग व्याप्त नही होता----- 

भगवन केरि भारत पै किरपा भई अपार। 
दुरदिन महँ धन धान ते भरे पुरे भंडार ll८|| 
भावार्थ:- ईश्वर ने भारत पर असीम कृपा की दुर्दिनों में उसके भंडार को धन धान्य से परिपूर्ण किया हुआ है | 

पथ पथ जन ते सून भए, छाइ चहुँपुर साँति | 
बाकी गति बिधि के सँगत सकल कलेष क्लाँति ||९||  
भावार्थ : - पंथ पंथ  निर्जन हो गए चारों ओर शांति व्याप्त हो गई है  सिद्ध हुवा कि संसार की समस्त क्लेश क्लांति का कारण मानव व् उसकी गतिविधि ही है  |

जागा बहुरी जगत में छुआछूत का श्राप ।
आप करे तो धर्म है, आन करे तौ पाप॥१०|| 
भावार्थ:- संसार में छूआ छूत का श्राप पुनश्च जागृत हो चला है,यह छुआछूत यदि गणमान्य करें तो उत्तम जीवन चर्या है और अन्य कोई करे तो बुराई है | 

नेम किए जौ सुचिता हुँत साधु संत अवधूत ।
अजहुँ जग अपनाए रहा सोई छूआ छूत॥११|| 
भावार्थ:- वेदिक काल में ऋषि मुनियों ने स्वच्छता की अवधारणा कर जिस अस्पृश्यता के नियम का प्रादुर्भाव किया था, वर्तमान में वही नियम विश्व में जन - जन द्वारा अपनाया जा रहा है.....

भूखे को भोजन देउ, रु पिपासे को पानि | 
मतिहीन को दे मति प्रभु, मौन मुखी को बानि ||१२||  
भावार्थ : - हे प्रभु ! तू भूखे को भोजन दे प्यासे को पानी दे, मूर्खजनों को बुद्धि दे और मौन मुखी को वाणी दे। ..... नीतुसिंघल 


''क्षुधाप्राणवान का प्रथम रोग है भोजन उसकी औषधि है.....

महबँध कै नेम निबंध लखित  नहि संविधान |
तापर देस माही कस लागे ए बिधि बिधान ||१३||  
भावार्थ : - महाबन्ध अथवा लॉकडाउन का नियम निबंध भारत के संविधान की किसी धारा किसी अनुच्छेद में उल्लखित नहीं है तथापि यह विधान देश कैसे लागू हो गया ?

मानस तोरी क्रूरता तोरे अत्याचार |  
दरसत  तव हुँत आपने भगवन दिए पट ढार ||१४||  
भावार्थ : - हे मानव ! पशुओं पर तेरा अत्याचार, पाश्विकता की  परकाष्ठा को पार करने वाली तेरी क्रूरता को देखकर तेरे लिए ईश्वर ने अपने द्वार बंद कर दिए | 

तूलिका तुला माहि लिए सबद कछु साति ग्राम | 
सेर भर की रचना रचि,ले लिज्यो बिनु दाम || १ ५|| 
भावार्थ :- तूलिका रूपी तुला में कुछ सात ग्राम शब्द लिए तत्पश्चात उससे सेर भर की रचना रची इसका मूल्य नहीं है यह अमूल्य जिसेचाहिए 
वह मूल्य दिए बिना इसे ले ले | 

आस्था चारि धरम भृत नहीं पड़ौसी  लोग | 
एही कारन निपजायउ इहाँ छूत कर रोग || १६ || 
भावार्थ :--पड़ौसी देश चीन के लोग आस्था का आचरण करने वाले धर्म परायण नहीं हैं यही कारण है की वहां संक्रामक रोग व्युत्पन्न हुवा |  

त्राहि त्राहि पुकारि मरत जन जन रोग अधीन | 
हाथ ऊपर हाथ धरे बैसे सत्तासीन || १७ || 

 त्राहि त्राहि कर रोग सों जोए लोग दुहु हाथ | 
प्रभु सन्मुख बिनती करै पीर हरौ जगनाथ || १८ || 

बजै अतिगहन रन भेरि अदिरिस रिपुहु समूह | 
संहारत अति घनहि घन हारि जात जन जूह || १९ || 

रोग कारी बिषानु अह धरे रूप बिकराल | 
तासु पीरिता होइ कै जन जन मरत अकाल || २० ||