Tuesday, 16 December 2014

----- ॥ उत्तर-काण्ड २५ ॥ -----

तेहि समु एक जान मनोहर । देऊ लोक सों आन धरा पर ॥ 
हंस रूप उजरित मनियारा । चले पुलकस बैकुन द्वारा ॥ 
उसी समय देव लोक से एक मनोहारी विमान धरती पर उतरा जो हंस के समरूप उज्जवल था उसपर विराजित होकर पुल्कस् वैकुण्ठ द्वार की ओर चल पड़ा ॥ 

तहाँ निबास किछु समउ होरे । पंच कोस पिछु आनि बहोरे ।। 
तीन मुख कुल पुनि जनम जुगाए । पूज बिसुनाथ परम पद पाए ॥ 
वहां कुछ समय तक निवास कर पुनश्च कासी में उसका आगमन हुवा । एक ब्रम्हं कुल में जन्म लेकर विश्वनाथ की पूजा-वंदना करते वह परम पद को प्राप्त हुवा ॥ 

जद्यपि रहि अति पापि सुभावा ।तथापि सुधिजन संग प्रभावा ॥ 
दिए जम दूतक पीर भयंकर । सिला परस कर लेइ सकल हर ॥ 
यद्यपि वह अति  दुष्ट स्वभाव का था तथापि सुबुद्धि जान के संगती का प्रभाव ऐसा हुवा कि यम दूतों ने उसे जो भयंकर पीड़ा दी थी शालिग्राम  के  स्पर्श ने वह पीड़ा हरण कर ली ॥ 

सालगाँउ के सिला अगाना । कथत कथानक हो न बिहाना ॥ 
तेहि ते में किछु कहा बखानी । करन पुनीत हेतु निज बानी ॥  
(इस प्रकार हे )

बिष्नऊ चरन को मरना सन को  हृदय भवन सिला धरें । 
ललाटपटल पर हरिप्रिया धर राम नाउ मुख सुमिरैं ॥ 
तुलसी दल दिए पद पयद पिए सो भव सागर सोंह उतरे । 
करन देह पावन भव सिंधु तरन हरि सिला पूजन करें ॥  

 सिला पूजन पान पयस, दे भव कूप निकार । 
बिंदु मह सिंधु समाहित, कहा किछु एकहि सार ॥ 

बुधवार, १७ दिसम्बर, २०१४                                                                                           

खत सुमति हे सुमित्रा नंदन । गंडकी गंग अनुपम बरनन ॥  
सुनत महातम सह भावारथ । रतन गींउ मन भयउ कृतारथ ॥ 

तेहि तहाँ तीरथ अस्नाने । तरपत पितृजन अर्चिष्माना  ॥ 
धन धान सहित भूरिहि भेषा । दिए दीनन कर दान बिसेखा ॥ 

सत्कृति कृत भए हरष बहूँता । बिष्नु सिला पद पूजन हूँता ॥ 
गहत नदी  हरी सिल चौवीसा । सदर पदुम पद धरे सीसा ॥ 

चन्दन तुलसी जल उपचारे । चढ़ा चरन पूजत सत्कारे ॥ 
तदनन्तर धीमान धरेसा । पुरुषोत्तम मंदिरु प्रबेसा ॥ 

एहि  बिधि क्रमबत पयानत, पहुंचे सो सुभ धाम । 
तरंगित पयधि पद जहाँ, सुरसरि करे प्रनाम ॥ 

गंगा -सागर 

बृहस्पतिवार, १८ दिसंबर, २०१४                                                                                       

सिथिल श्रम बहुल पथरिल पंथा । तहँ गत बिगत पथिल भए श्रंथा ।। 
पथ एक त्रइ मुख पथक बिसेखा ।  नीलांचल थरी पूछ देखा ।। 

जहँ के पाहन हिरन सकासे  । बसिहिं तहँ श्री हरिहि सुपासे ॥ 
देवासुर दुहु सीस नवावैं । कृपाकर सोइ ठाउँ बतावैं ।। 

भ्रमहं चित बहु अचरज होहीं । कहि बड़ सादर भूपत सोंही ॥ 
जिन भगता जग बंदित कहहीं । पावन परबत इहहि त रहहीं ॥ 

जान को कारन दरस न आए । पथक पुनि पुनि ए बचन दुहराए ॥ 
नीलाचल गिरी के अस्थाना । कृत फल दानत होहि महाना ॥ 

रहिही यहांहि सो थरी जहाँ मोहि अस्नात । 
चतुर्भुज रूप सरूपी दरसिहि कोल किरात ।। 

शुक्र/शनि , १९/२० दिसम्बर, २०१४                                                                                                    

प्रभु दरसन लोचन पथ जोईं । सुनि अस भूपत ब्यथित होईं । 
कहे दुखित मन बिप्रबर सोंही । मो पभु चरन दरस कस होहीँ ॥ 

नीलाचल गिरि दए देखाई  ।  तासु हेतु कहु को जुगताई ।। 
किए तन कंपन बदन हिलोले । बिचलित होत द्विजबर बोले ॥ 

हमहि समागम कर अस्नाना । तनिक समउ होरएँ एहि थाना ॥ 
गिरिरु दरस जब लग नहि होई । सिथिर इहाँ  सो फिरिहि न कोई ॥ 

भगत बछर कृपालु अघ हरहीं । हमहि सो अवसि उपकृत करहीं ॥ 
हरि भजन मह जासु मन लागा । भगत प्रभु कबहु करे न त्यागा ॥ 

सम डीठि लखें जग रछित रखेँ,  देवाधिदेउ सिरुमने । 
दरस जिग्यासु पथिबृंद तासु करौ कल सुकीर्तने ॥  
सुनी पथक गिरा होत अधीरा तट तीरथ सनान किए । 
पुनि पन धारी अनसन कारी प्रभु दरसन के प्रन लिए ॥ 

करत प्रभो गुन गान तिसनित कंठ आए प्रान । 
करे न पयसन पान, प्रभु दरसन मुख ररन धर ॥  

सोत बचन कहि दीन दयालू । जय जग जीवन जगत कृपालू ॥ 
सगुन श्री बिग्रह धारन हारे। खेल दल दलन लेहु अवतारे ॥ 

जासु  तनुभव भगत प्रह्लादा ।देइ दुसह दुःख दनुज प्रमादा ॥ 
ताहि सरिस नहि जग को ताता । देइ अगन नग सिखर निपाता ॥ 

दंड पास कर जल अवगाहा । रूप धरे तब तुअ नर नाहा ॥ 
संकट तंतु कटे तत्काला ।पीर परे तहँ प्रगसि कृपाला ॥ 

करे प्रभो अस मोहनि लीला । बसे गवन घन बिपिन करीला ॥ 
मात पिता के अग्याकारी । भगत बछर जग पालन हारी । 

देवन्हि मुनि सिरौमनि, हे दीनन के नाथ । 
कोटि अघ होत भसम तव चरन लगे जब हाथ  ॥ 

रविवार, २१ दिसंबर, २०१४                                                                                                

तव मानस जिन्हनि प्रिय माने । आए भगत जन सो अस्थाने ॥ 
देवासुर बंदित जगदीसा । जहँ तुहरे पद तहँ मम सीसा ॥ 

प्रभु महिमा कबहु न बिसराओ । पीर परे जहँ तुअ सुख दायो ॥ 
तुहरे नाउ जोकीर्त  कारी । सो पारगमन के अधिकारी ॥ 

सतजन मुख कहि सुनि सत होहीं । दरसन अवसिहि होहिहि मोही ॥ 
कहत सुमति भूपत एहि भाँती । प्रभु कीर्तन करै दिनु राती ॥ 

छिनु भर हुँत बिनु करे बिश्रामा । नीँद नयन बिनु सुख भए बामा ॥ 
चरत फिरत होरत एक साँसे । भासिनु को एहि कह संभासे ॥ 

आह अजहुँ त दरस परे, प्रभु के अनुपम झाँखि ।
भरे ह्रदय जर झरे भए नयन ढरे बिनु पाँखि ॥  

सोमवार, २२ दिसंबर, २०१४                                                                                                

तब करुनाकर जगदाधारे । कृपा पूरबक सोच बिचारे । 
करत महिमन मम भगति सहिता । ए जनपालक भए पाप रहिता ॥ 

आरत बस जस मोहि पुकारा । होइहि दरसन के अधिकारा ॥ 
हिय होत द्रवित प्रभु कंठ भरे । कहि मन मानस अजहुँ का करें ॥ 

जटा मंडल सिरु केस बनाए । कमंडल धार जति भेस बनाए ॥ 
धरि जब दाहिन हाथ त्रिदण्डा । मंजुल मुख लसि तेज प्रचंडा ॥ 

सगुन सरूप गयऊ समीपा । ब्रम्हन तपसी देख अधीपा ॥ 
ललकित लोचन पलक हिलोले । ॐ नमो: नारायन बोले ॥ 

सन्यासी सौंह सीस नवाए । अरग दए सादर आसन  दाए ॥ 

आउ भगत बिधिबत करत, बोले अस सुठि बोल । 
महमन मोरे भाग के  नहि जग महि को मोल ॥ 

मंगलवार, २३ दिसंबर,२०१४                                                                                                  

 भई कृपा बहु नाथ हमारे । साधु पुरुख दरसन कर पारे ॥ 
तुहरे दरसन सुभ मैं माना। होहि दरस अजहुँ त भगवाना ॥ 

कहै मुदित तब दया निधाना । सुनौ मम बचन देइ धिआना ॥ 
निज ग्यान बल संग भुआला । जानिहुँ मैं सब बचन त्रिकाला ॥ 

कहत प्रभो बत कही हमारे । दए धिआन सुनिहौ चित धारे ॥ 
अगहुँ दिवस अपराह्न काला । नयन दरस तव देहि कृपाला ॥ 

जो दरसन बिधिहु नयन न लभा । तुहरे हेतु भयउ अति सुलभा ॥ 
भगता एक तुअ एक तव रागी । तुहरे मंत्री सन ए बैरागी ॥ 

सह तुहरे नगरी के बासी । करम्ब नाउ एक संन्यासी ॥ 
जो तंतु बय जाति के होई । सूत कर्मि जिन कँह सब कोई ॥ 

श्रुति मुख सुरन्हि सहित जिन अभिबन्दें सुर नाथ । 
पबित परबत सिखरोपर चढिहु सबहि के साथ ॥ 

बुधवार, २४ दिसंबर, २०१४                                                                                                         

भगवन भयउ अंतर धिआना । राउ सहर्षित अचरज माना ॥ 
दुबिधि उपजि तपसी सन पूछे । जे भुइँ जिन जति बिनु भए छूछे ॥ 

ज्ञान पूरित बत कहि मोही । ब्रम्हन सो सद्जन को होही ॥ 
एहि अवसरु बहोरि कँह गयऊ ।  दिरिस कतहुँ सो दरस न दयऊ ॥ 

जटिल जटा धर अबर न कोई । साखि पुरुषोत्तम रघुबर होंईं॥ 
तुहरे चरन रति प्रभु अति भाए । तासु कर्ष सों इहँ चले आए ॥ 

कल अपराह्न काल जौं ही  । गिरी अगोचर गोचर होहीं ॥ 
परिक्रमा कर सिखर अबरोहू । प्रभो दरसत कृतारथ होहू ॥ 

ब्रम्हन कहे बचन रहे , अमरित सोंह सुपास । 
भूपत  चित चिंतन जने  , उपरत किए तिन  नास ॥ 

बृहस्पतिवार, २५ दिसंबर, २०१४                                                                                             

रतनगीउँ मन मीर उछाही । पुलकित नयन नंद घन छाहीं ॥ 
भगवन दरसन घन घन करखे । भव सरूप पलक सों बरखे ॥ 

सब कहुँ  उद मुद मंगल पूरा । नाचे तब बन मनस मयूरा ॥ 
दरनत दारुन दुःख संतापा । बन बन सुख बन बचस् ब्यापा ॥ 

राग रंग कर ताल प्रसंगे । कहुँ सहुँ सप्तक सुर एक संगे ॥ 
गह करतल कल कुनिका कूँजे । धरे आधार कहूँ गोमुख गूँजे ॥ 

गहत गगन गहबर घन गाजे ।पनबानक कहुँ  दुंदुभि बाजे ॥ 
हँसत कहि बत भूपत सुजाना । प्रतिछन किए भगवन गुन गाना ॥ 

बिगते दिवस सुमिरन सन , भजन कीर्तन माहि । 
संगम तट सुख सयन किए, रयन गहन जब छाहि ॥ 

शुक्रवार, २६ दिसंबर, २०१४                                                                                                       

सपन छाए गह एक छबि लेखा । निज कर धरि हरि लच्छन देखा ॥ 
धरे चतुर्भुज रूप अनूपा । देखे दृग प्रभु प्रगस सरूपा ॥ 

परिचरनि सक सुभ चिन्ह धरे । श्री हर चरनिन्हि बंदन करे ॥ 
दरस नरेसु दिरिस अद्भूता । अचरजु सह भए हरष बहूँता ॥ 

मनो काम जब पूरन पारे । भई नाथ कहि कृपा तुहारे ॥ 
प्रात नींद जब भई पराई । तपसी ब्रम्हनि बुला पठाईं ॥ 

सपन सदन जस छबि देखावा । तपसी चित्रकृत कहत सुनावा ॥ 
तपसि बदन भए बिसमय भारी । चितबत मुख एहि बचन उचारी ॥ 

सयन  काल सपन दरपन  दरसिहि जो भगवान । 
चारि बिभूषन चिन्हनि, चहहीं तोहि प्रदान ॥ 

शनिवार, २७ दिसंबर, २०१४                                                                                            

बजए मंजरि संग करताला । तदनन्तर अपराह्न काला ॥ 
भूपत सहसइ गगन निहारे । चढ़े जान घन देउ बिहारै ॥ 

बरखिहि सुमन कही मुनि बृंदा । जय जय जय जय नन्द मुकुंदा ॥ 
उचरे मुख बचन तेहि काला । हन्य धन्य तुअ धन्य भुआला ॥ 

प्रगसिहि चतुर भुज रूप धारी । भए तुअ दरसन के अधिकारी ॥ 
देवन्हि जस अस कही पारे । बही बाहि श्रुति रन्ध्र उतारे ॥ 

परबत पबित जगत बिख्याता । प्रगासिहि अस जस सूर प्रभाता ॥ 
हंस कनक चमकत चहुँ ओरा ॥  सिखर कर सुहा रहे न थोरा ॥ 

सोचए भूपत का कतहुँ, अगनी प्रगसित होइ । 
स्थिर कांति कर धरे कि  धुति नाथ का कोइ ॥ 

रविवार, २८ दिसंबर २०१४                                                                                                 


तपसी ब्रम्हन गिरि जब देखे । सुभ लच्छन भूपत कहि लेखे ॥ 
जहाँ चतुर भुज दर्शित होईं । महमन अहहीं एहि गिरि सोई ॥ 

भए नत मस्तक रत्ना गीवाँ । मदन कंट के रहे न सीवाँ ॥ 
कहत बहुरि बहु करत प्रनामा । धन्य धन्य मैं भयऊँ रामा ॥ 

तुम् अभिरूपम  मैं अभिलाखी ॥ पबित गिरि मोहि दरसहि साखी ॥ 
सूत कृत मंत्री संग रागी । दरस गिरि कहैं भए बड़ भागी ॥ 

अभिजय नाउ मुहुरत जागे । पथिक सिखर अवरोहन लागे ॥ 
पुरयो संख चले सुर साजी । अमित अगास दुंदुभी बाजी ॥ 

चढ़त परबत सिखरोपर, बिचत बिटप धर सोहिं । 
मनिक खचित परम सुंदर, देउर दर्सित होहिं ॥  

सोम,मंगल  २९/३०  दिसंबर, २०१४                                                                                          

सरजन करता जगत प्रपंची । जहां आन निस दिवस बिरंची ॥ 
करैं आरती बंदना गाएँ । प्रभु पदुम चरण नबैद चढ़ाएँ ॥ 

दरस देउ निभ निलय उजारे । रतन गीव तहँ पद पैसारे ॥ 
एक बर आसन देइ दिखाई । मनिक जटित सुभ दसन डसाईं ।। 

दरसत जिन मनि मंडप लाजएँ । तापर चतुर भुज प्रभु बिराजएँ ॥ 
बिस्व सेन सन चण्ड प्रचंडा । किए परिचरजा अनुचर षंडा ॥ 

करभर हलरए प्रस्तर पाँखी । झलकए मुदित मनोहर झाँखी ॥ 
भर चाँवर एक कर हलरायो । सीस छतर एक कर भर छायो ॥ 

एक धनुधर एक धारा सारी  । एक कर सोहित बल अरु ढारी ॥ 
 बहुरि बहुरि नृप लएँ प्रभु नामा । रागि संगि किए चरन  प्रनामा ॥ 

लए पयसन किए प्रथमहिं मज्जन मुख बेद बचन उचारिते । 
अरगोपचयन किए चरन अर्चन चन्दन बसन लसिते ॥ 
मंजुल मंजरि पुला पुरायो हँसि हँसि रसना कस्यो । 
सिरु उतरायो कंठ घरायो हृदय भवन धरि लस्यो ॥ 

दिनकर बंस भूषन जब  कल भूषन अभराए । 
कोटि कमान बिनिंदित किए छबि अस नयन सुहाए ॥ 

सथर दीपन चिन्हित किए कंचन थार सजाए । 
तापर  दीपन बरति बार जगमग जोत जगाए ॥ 

ब्रम्हन कंठी गाँठ किए, श्री हरि गुन समुदाए । 
मति अनुहारत आपनी सकलित तोम सुनाए ॥ 

समयोचित ब्यंजन कर रूचि रूचि भोग लगाए ।
बादन बृंद बंदन किए, बदन आरती गाए ।। 

बुधवार, ३१ दिसंबर, २०१४                                                                                                             

सर्बेसर हे अंतरजामी । अगज जगज के तुम्ह स्वामी ।। 
त्रिगुन परे तव मूरत साखी । कारज कारन ते भिनु लाखी ॥ 

महा सार सन चरन पूजिते । कंज नाभ के संग उपजिते ॥ 
सिंधु सयन हे पुरुख पुराना । आदि काल के तुम सब थाना ॥ 

रूद्र रूप के प्रादुरभावा । प्रभु नयन सन भयउ समभावा ॥ 
बर्धन छय फल तीनि बिकारा । तिन्ह सो रहित रूप तिहारा ॥ 

कतहुँ चेतन कतहुँ जड़ताई । सो सब आपहि संग जनाई ॥ 
अचेत कन चेतन बल घारिहु । अस जड़तस जग चेतस कारिहु ॥ 

अजर अमर दिक् कर जगदीसा । तुम्ह दिगंबर बिष्नु बागीसा ।।  
तुम डिक मंडल अरु दसउँ दिसा । तुम दिनु रयन भोर तुम निसा ॥ 

भगत रच्छन पाप हरन, धर्म स्थापन हेतु । 
निज नुरूप गुन गहत भए, प्रगति पंथ के सेतु ।।  












































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