Monday, 16 March 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड २९ ॥ -----

सोमवार  १६ मार्च, २०१५                                                                                                  

जसु संग हमरे जग जागिहि । भए अस बंसज भा बड़ भागिहि ॥ 
करात पितु जान कहत पुकारे ।लेइ जनम कुलतारन हारे ॥ 

भयऊ एकु इतिहास पुराने । एही बिश्यन महँ कहहि सयाने ॥ 
 उदाहरित एही प्रमुख प्रसंगे । भए जो मिथिला पति के संगे ॥ 

एक बार के भयऊ ए बाता । जनक जोग सोन तज निज गाता ॥ 
तेहि अवसरु मुख सोहि आना ।कंकनिक कलित एकु बेमाना ॥ 

तुरतै तेजस देहि सँजोही । धरमधुरज बैमान बरोही ॥ 
सबक मन बहु बिसमय भयऊ । तजइत तन उठाउ लए गयऊ ॥ 

गमनत मिथिलापति पंथ , संजमनि पुरी आए । 
कोटिक कलुख चेतस तहँ,नारक भोगत पाए ॥

मंगलवार ,१७ मार्च, २०१५                                                                                               

जनक देहि पौ परस पवाई ।बिक्ल नारक बहुंत सुख पाईं ॥ 
धर्म धुरज चलेउ जब आगे ।भय बस सबहि चिक्करन लागे ॥ 

नारक मोचन चाह सँजोई । जनक बिछोहु चहहि न कोई ॥ 
द्रवित कंठ करि करून पुकारे । कहाँ चले हे नाथ हमारे ॥ 

 परस बिस्तारि तुहरे देही । हमहि सो बाहि बहुँत सनेही ॥ 
सुनत नारकिहि जीउ पुकारी । करुनाकर नृप मन भए भारी ॥ 

उर उदधि उद उदक उदकायो । लोचन पटल  घनहि घन छायो ॥ 
चेत मनस बहु सोच बिचारै । मोर बसाहि ए जीउ सुखारे ॥ 

अजहुँ सों एहि जम नगरी, होहिहि मोर निबास । 
जहँ को सुख साँस लहि सो  मम हुत सुरग सकास ॥ 

बुधवार, १८ मार्च, २०१५                                                                                         

बहुरि मिथिला नगर के केतु । दुखित नरक जीउ के सुख हेतु ॥ 
दया भाउ हरिदै परिपूरे । होरिहि जम दुआरि के धूरे ॥ 

तेहि समउ सो दुखद दुआरे । जमराष्ट्र के पुरुख पधारे ॥ 
सत कृत करता पुरुख बिसेखे । मिथिलापति निज सौमुख देखे ॥

ठाढ़ि जनक चढ़ उडन खटोले।  परे बिहँस अस करकस बोले ॥ 
सिरोमनि हे धरम धुरीन के । भए दयाकर दारिद दीन के ॥ 

कहौ इहाँ तुअ कैसेउ आए । एहि अरगल तुम्हरे जुग नाए ॥ 
हतत हनत के पाप अपारा । अहइँ तेहि हुँत नरक दुआरा ॥ 

सुरग दुआरि जुहारि किए धर्मी तुहरे सोहि । 
इहँ के अगन्तु सोए जो, जीव जगत के द्रोही ॥ 

बृहस्पतिवार,१९ मार्च, २०१५                                                                                     

साधु समाजु न जाकर लेखा । धर्म पुरुख जासु न रेखा ॥ 
जो हत चेतस भए हिंसालू । एहि सदन तेहिं हुँत भुआलू ।। 

कर्पूरंक कलंक लगावहि ।पर्धन लूट खसोटत खावहि ॥ 
पति कुल बती पद रति बत सती । देँ गह निकार निबेरत गती ॥ 

भोग के बस्तु जिन हुँत नारी  । आए इहाँ सो पापाचारी ॥ 
अति आचरन करिहि जो पामर । आए चरत  पापाधम एहि घर ॥ 

कालस धन के लालस पासा । पापमित मित देइ जो झाँसा ॥ 
उदर परायन देइ न दाने ।अस पापधि परेउ इहँ आने ॥ 

मोरे दंड पाँस कंठनि कर ।पाइहि पामर पीर भयंकर ॥ 
बितथाभिनिबेसि मूढ़ि मानस ।दम्भि बिद्वेष उपहास बिबस ॥ 

मनसा बाचा कर्मना, सुमरै नहि श्री राम । 
काया सोन मद मोहना माया केर प्रनाम ॥

शुक्र/शनि ,२०/२१ मार्च,२०१५                                                                                                 

तेहि पापक बाँध ले आवा । बहोरि मैं भलि भाँति पकावां ॥ 
जेहि  नारकी पीर निबेरे । सुमिर उर नाउ रमा पति केरे ॥ 

धर्म प्रयाण सोए सुखारे ।पार गावं मम सदन दुआरे ॥ 
द्युति गति गम बैकुंठ जावैं । सत कृत संग परम पद  पावैं ॥ 

एहि मनुज  देहि बहु  पाप भरे ।एक राम नाउ पौ पबित करे ॥ 
जो रसरी नहीं जपनी हरे । सो पापधी इहाँ आन परे ॥ 

 दूतक पापक लेइ अनाई । तुअ सम दीठ न देइ दिखाईं ॥ 
ऐतद नृप गवनउ इहँ संगे । सब बिधि सुखप्रद भुअन प्रसंगे ॥ 

रह सबहिसुख भोग उपजोगिहु । मरनि लोक के सत्कृत भोगिहु ॥ 
 जनक पालक कन कंचन लोले । अरु अबरुधित कंठ सों बोले ॥ 

दुःखार्त जीव पुकारत, उमरे दया अतीव । 
अस कह कन कंचन झरे, तज लोचन राजीउ ॥ 

रविवार,२२ मार्च २०१५                                                                                             

कहए जनक सत कहि सब तोरे ।सुनौ नाथ एक गदनहु मोरे ॥ 
दरस नारकी दुःख जीमूता । होत मम हरिदै द्रवीभूता ॥ 

मम तन पौ तीन बहुंत सनेही । इहाँ बसन के कारन ऐही ॥ 
आरत जीउ जब मुकुति दइहौ । मोहि सुरग पयानत पइहौ ॥ 

धर्मराजु अस कृत कल्याना । होहि सुखद तव दास पयना ।। 
पलक होर बोले जम राजू । एहि जो तुहरे सोहि बिराजू ॥ 

आपन हित करता हितु संगे ।किए ए पामर बलात प्रसंगे ॥ 
रहेउ जिन सहुँ परम प्रतीती । हित संगत जस हितु की प्रीती ॥ 

लोहू संका नरक लवैया ।बरस सहस दस देत कढ़ैया ॥ 
सूकर जोनि  दे तदनन्तर । करिहउँ नपुंसक दए जोनि नर ॥ 

अबरु ए पामर.....पापधी, पर तिअ नेकहि बार । 
कूट कुटिल कुदीठ करत, भरे अंक बरिआर ॥

 तापित तोए एहि तिराइहि ,कंठनि पासक कास । 
अपनी करनी भुगत किए प्रतिछन मोचन आस ॥ 



सोमवार, २३ मार्च,२०१५                                                                                                    

अरु दरसिहि सहुँ जो कर जोरे । कुबुद्धिन कुकरम किए न थोरे ॥ 
पर धन सम्पद दीठ धरावै । सेंध लगावै लेइ चुरावे ॥ 

ऊँचे पद न लहै ऊँचाई । नीची करनी नीच कहाई । 
अबरु भाग जो आपहि भोगए । पूअ सोनित नरक तिन जोगए ।। 

बसे पापि तहँ अस उद बासे ।पिसि पाचक बसि पूअ सकासे ॥ 
अरु एही खल किए अस खोटाई । तेहि  करनि मुख बरनि न जाई ॥ 

आए घर जो अतिथि सम देवा । एही पोचक पति करे न सेबा ॥ 
अस कारन एही प्राण बिजोगे । भयउ तामिस नरक के जोगे ॥ 

भाड़ भीत भर भँवर भयंकर ।स्तक बरख दुःख सहिहि ए पामर ॥ 

ए सठ मुख पराए जनन्हि, निन्दत नहीं लजाए । 
जो को निन्दित बचन कहै, श्रवनए कान लगाए ॥ 



मंगल/ बुध ,२४/२५  मार्च,२०१५                                                                                                                                                                                   

एहि दुहु सठ बंगिहि हे भूपा । दुःख लहत परेउ अंध कूपा ॥ 
दरसिहि जो उद्बेग बिसेखे । हिती हंतत जान बिदबेखे ॥ 

धरे अबरु बिध्बंस के मंसा । करे आपहि गेह बिध्बंसा ॥ 
मरतहि रौरव  नरक अनाई । भाभरी भरे भाड़ भुँजाई ॥ 

एहि सब सठ किए पाप अपारा ।  भोगत छुटिहहि नरक दुआरा ॥ 
कृति सत्कृत तुअ धरम सँजोइहु ।  एहि हुँत इहँ के जोग न होइहु ॥ 

अजहूँ मोर कही सत मानौ । नरनागर बर लोक पयानो ॥ 
मिथिलापति पुनि पूछ बुझाईं । नाथ कहौ अस कोउ उपाई ॥ 

दुखी जीव अस सोहि हमारे । होइहि कास तिनके उद्धारे ॥ 
जनक बचन सुन जम पत कहहीं ।एहि पापक हरि चरन न गहहीं ।। 

तापर निज करमन कोष अस अस पाप सँजोहि । 
कहौ आपही मोहि एहि नरक मुकुत कस होंहि ॥  

सिद्ध सयान जनक जुग पानी । पूछे जम पति सोहि सुबानीँ ॥  
करौं जहँ कस कवन अनुठाने ।  तरपत जिउ मोचन सुख दाने ॥ 

पुनि जम ऐसेउ जुगति कहेउ । नाहु जो तुअ मोचनहि चहेउ ॥ 

निज कृतफल तिन्ह दे दीज्यौ । कवन सत्कृत सो सुनि लीज्यो ॥ 

एक समय जब भयऊ प्रभाता । बिभउ छयत निज ढरकिहि राता ॥ 
उठेउ  तुअ सो नाउ ध्याना । जो जग महत्तम पाप नसाना ॥ 

मुख जो रामहि राम उचराएँ ।  एहि पापधी ओहि पुन  धराएँ ॥ 
जमनाहर जस अस  कह पारे । बहुरि जनक तीन देइ उदारे ॥ 

 जीवन भर जो धरम सँजोईं ।  देत जनक कछु सोच न होईं ।। 
कहत जाबालि बहुरि भुआला । दुखित जीउ छुटिहहि तत्काला ॥ 

दिब्य देह धारन करे,बोले हे महराए । 
भाई कृपा बहु आपनी,दुःख सों  हमहि छढ़ाए ॥ 

प्रत्येक रसोई एक नरक  है और प्रत्येक घर एक स्वर्ग है..... 

बृहस्पतिवार २६ मार्च २०१५                                                                                            

पाए परम पद नाथ कृपालू । तुहरे हरिदै बहुंत दयालू ॥ 

छूटे प्रानि  नरक  के पासे  । गहै रूप जस सूर बिभासे ॥ 

दरस तेहि निज नयन झरोखे । जनक मनहि मन संतोखे ।। 

 हृदय हरि कर मुख हरि नामा ।चले सकल बैकुंठ धामा ॥ 

दुखित जीव के होत बिदाई । जनक बहुरि जम पूछ बुझाई ॥  
पाप करम कर कोष लहेऊ । आए नरक यह तुअहि कहेऊ ॥ 

रहे रत धरम बारता माहि । सो नर नरक पुर आवहि नाहि ॥ 
केहि तापा केहि संतापा । आन भयऊँ कृत केहि पापा ॥ 

तुम् जम तुम धर्मिनु पुरुख  दौ मोहि ए ग्यानु । 
करे करम कारन सहित बिहान संग बखानु ॥ 

शुक्रवार,२७ मार्च,२०१५                                                                                               

 मैं निर्बुद्धि मोहि बताऊ । अप कृत कारन कह समुझाऊ ॥ 
धर्म राज अस बचन उचारीं । राजन तव सब कृत सत सारी ॥ 

तुम् रघुबर के परम सनेही । तुहरे सम कृत करे न केही ॥ 
तुम भँवरे प्रभु पद अरविंदा ।तुम रसिक प्रभु रूप मकरंदा ॥ 

चहरे जस जिमि पावन गंगा । पापन्हि पाप मलिनी रंगा ॥ 
गंग बिंदु जिन रसन रसावै ।सकल मलिन मल पल पबितावै ॥ 

तव जस गायन जस रस धारा ।जो अवगाहि सो पाएं पारा ॥ 
तथापि एकलघु अघ गोसाईं । संजमनी पुर लेइ अनाईं ॥ 

एक समऊ तुम्ह बिचरत भरेउ रूप अबुद्ध  । 
चरती चातुरि अस्तनी चरन करे अवरुद्ध ॥ 

शनिवार२८मार्च २०१५                                                                                         

ऐसेउ दोष किए जो कोई । नरक दुअरिआ दरसित होई ॥  
अपने कृतफल  देइ उदारे ।एहि कर दूरए  दोष तिहारे ॥ 

लहेउ कृतफल बिबिध प्रकारा । कर्म कोष भर धर्म अपारा ॥ 
 अजहुँ एहि हेतु सुरग दुआरे । नाहु तिहारे पंथ निहारे ॥ 

हम अजान प्रभु अंतरजामी । धर्म पूँज के जान  स्वामी ॥ 
दुखी जीउ दुःख हरन गोसाईं । संजमनी पुर तोहि पठाईं ॥ 

पर नरक जो दीन दुखारे ।गहि सुख सम्पद आन तिहारे ॥ 
होउब ना  तुम अतिथि हमारे । होइब कैसे दुखी सुखारे ॥ 

अबरु  दुःख सँग  होत दुखी साधू तुहरे सोहि । 
दुखारत दीठै जहँ कहँ,निबरन तत्पर होहि ॥ 

रविवार, २९ मार्च २०१५                                                                                                   

चले सुर धाम जनक बहोरी ।  आयसु मागि दोइ कर जोरी ॥ 
कहत जाबालि हे नर नाहू । धेनु पूजन फले सब काहू ॥ 

जो की गउ के पूजन कीन्हि ।  जो मन चाहए सो सब दीन्हि ॥ 
तुमहु पयद पावनी पूजिहौ  । धरम परायन जात जनीहौ ॥ 

जब गउ सेवा टहल सकारे ।  सकल कामना पूर्ण कारे ॥  
 एक आसा के किरन बिकासी । ऋतम्भर मन भए जिग्यासी । 

जाबालि कहि सो बचन अनुहर । कांति मुख सों पूछे सादर ॥ 
धेनिहि बंदन बिधि को होई । नेमाचरन करे कस कोई ॥

मंद मुख जब कांति छाई । जाबालि मनहि मन बिहसाईं ॥ 
गौ सेवा के सकल बिधाने । बाँध फेर एहि भाँति बखाने ॥ 

नृप ब्रत धारिहि सेवा चारिहि चरवावन गउ सन गवने । 
जो जवन पवाईं सकृत महुँ आईं सकलत कर लेइ चुने ॥ 
जब बहुरावै जो चुग खावै,सेवा बिधि जस गयउ कहे । 
गउ तिसनावै जब जल पावै तबहि आपहु जल गहै ॥ 

मातु ऊँच अस्थान रहैं आप रहें नीचाए । 
निसदिन तन को डाँसते मत्सर दे निबराएं ॥ 

सोमवार, ३० मार्च, २०१५                                                                                             

गउ हुँत हरिदा आपहि आनएँ । करत नेह अपने कर दानएँ ॥ 
सेवा सुश्रुता किए अस कोई । भावें जोए माँगत मिले सोई ॥ 

सुनत जाबालि मुनि के बचना ।  ऋतम्भर चित सुरति श्री रमना ॥ 
सुचितचेतस बंदन ब्रत गहै।सुरभि सेवन्हि संकलप लहै ॥ 

सुबुधि कहे सब बिधि अनुहारै । भयउ पावनी के रखबारे ॥ 
नित प्रति दिवस चरावनु जाईं । पूजत करें नित सेवकाई ॥ 

भई मुदित जब सेवा सोंही । मानस के जस गिरा सँजोही ॥ 
हर्ष मधुरिम बोलि हे राया ।जस तुहरे उर के अभिप्राया ॥ 

जो तुहरे चितबन भाए मांगो अस बर कोइ ।  
कृपामृत सानि बानि जस मृतक जिआवनि होइ ॥ 

मंगलवार, ३१ मार्च, २०१५                                                                                               

मृदुल बरन बर बोले नाहा ।देई ऐसो सुत मैं चाहा ॥ 
पितु कुल सेबक हो बहु नीके । होए बछर जो रघुबर जी के ॥ 

सील बिरध अरु धरम परायन । अस कह राजन  उरगाए बदन ॥ 
नृप मन भावन माँग बताईं । दयामई  माँगे सो दाईं ॥ 

भाई तहँ सो अंतर्धयानए । जने राउ पुत  अबसर आनए ॥ 
चहे सोई लक्छन गहेऊ । सत्यवान सुभ नाउ धरेऊ ॥ 

दिन दिन दिवस बरस बन बीते । भगवन्मय सुत पितु मन जीते ॥ 
अमित पराक्रमि तासू सरिसा ।हेरत मिलेउब नहि चहुँ दिसा । । 

भगवनमय पुत पितु भगत,धर्म परायन जानि । 
ऐसे जनित जनाए के भूपति मन हरषानि ॥ 












  



  





































  















1 comment:

  1. नीतू जी , मैंने आपके दोहे/ छंद पढे . सभी शिल्प , कथ्य और संस्कृति से परोपूर्ण हैं बहुत धन्यवाद धन्य हैं आप
    क्षेत्रपाल शर्मा
    17.03.15शांतिपुरम , सासनी गेट आगरा रोड अलीगढ 202001

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