Thursday, 25 February 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ४८ ।। -----


बोले सुमति बचन ए हितप्रद । सस्त्रास्त्र विद जुद्ध बिसारद ॥ 
महाराज यहँ सब बिधि केरे । पुष्कलादि रन बीर घनेरे ॥ 

होत उपनत अधिकाधिकाई । लएँ लोहा रिपु संगत जाईं ॥ 
बायुनन्दन बीर हनुमाना । अहहि सूरता सन धनवाना ॥ 

 देहि बिसाल बजर सब अंगा । एतएव जाएँ भिरे नृप संगा ॥ 
रिपुदल गंजन  घन समुदाई । प्रबल  पवन इब करिहि पराईं ॥ 

कहत सेष महमति महमाता । एहि भाँति जनावत रहि बाता ॥ 
तबहि समर भू भूप कुमारे । धुनुरु टँकार चरन पैसारे ॥ 

पुष्कलादि बीर बलवन भूमि बिलिकत ताहि । 
निज निज रथोपर रोहित धरे धुनुरु बढ़ि आहि ॥ 

बृहस्पतिवार, २५ फरवरी, २०१६                                                                         

भिरिहि परस्पर समबल जोधा । कौतुक करत लरइ करि क्रोधा ॥ 
अस्त्र कोबिद भरत कै बेटा । करिअ गरज चम्पक तै भेंटा ॥ 

रच्छित महाबीर जी ताईं । द्वैरथ रन नीति अपनाई ॥ 
इत लख्मीनिधि जनक कुमारा । रन उछाह उर भरे अपारा ॥ 

बालसील कुस धुजा ले संगा । गरजत भिरे मोहक प्रसंगा ॥ 
बिमल रिपुंजय देइ हँकारी । दुर्बारन्हि सुबाहु पचारी ॥ 

बलमोद ते बालि सुत भिरेउ । प्रतापागरय प्रतापी तेउ ॥ 
नीलरतन लरि हरयछ संगा । सहदेउ सत्यवान प्रसंगा ।। 

महबलबंत बीर मनि राई । भूरिदेउ ऊपर चढ़ि आई ॥ 
असुताप लड़ भिरन बढ़ि आवा । उग्रासय ता संग जुझावा ॥ 

ते सबहि सूर नीति मत कर्म कुसल सब कोइ । 
आयुधि कर बिद्या संग बुद्धि बिसारद होइँ ॥ 

कूदि माझ मुनि भूमि बहोरा । करिहि द्वंद जुद्ध घन घोरा । 
मारु मारु धरु धुनि नभ छाईं । एहि बिधि बेगि सुभट सब धाईं ॥ 

हाहाकार मचइ घमसाना । निपतिहि आयुध कुलिस समाना ॥ 
बहुतक कटकु गयउ संहारी ।  परेउ जब प्रतिपख अति भारी ॥ 

पुष्कल आनत कटक सँभारे । चम्पक पुर बहु करक निहारे ॥  
जोधन पुरबल पूछ बुझाईं । कहु निज नाम जनक कर भाई ॥ 

धन्य तुम्ह तव करौं बढ़ाई । ठानिहु जो मम संग लराई ॥ 
बीरबर कुल नाउ के ताईं । यहां लराइ लरी नहि जाई ॥ 

तथापि मोर नाउ सुनि लीजो । कुल अरु बल के परचन कीजो ॥ 

बोले चम्पक ऐसेउ बिनए बचन के साथ । 

मोरे बंधु बाँधो अरु जनक जनी रघुनाथ ॥ 

अहहीं रामदास मम नामा । राम बसे जहँ तहँ मम धामा ॥ 

रघुनाथहि मोरे कुल देवा ।   प्रनमत ताहि करौं नित सेवा ॥ 

रघुकुल कीरति कीरति  मोरी  । मम बिरदाबली कछु न थोरी 

पहुमि पहुमि रन सिंधु अपारा । भगत कृपालु लगाइहि पारा ॥ 

जे हरि परिजन हिलगन कहेउँ । लौकिक दीठि परचन अब देउँ ॥ 

राजाधिराज सुरथ मम ताता । पूजनिआ बीरबती माता ॥ 

अहहीं तरु एक नाउ धर मोरा ।  ता संगत सोहित चहुँ ओरा ॥ 

बसंत रितु तरु फुरित बिकासी । तासु पुहुप जस रस कै रासी ॥ 

तथापि मधु मोहित मधुप त्याजत  तासु निकट न आवहीं । 
ताहि जोइ कहत पुकारि सोइ मनहारि नाउ मम अहहीं ॥ 
 भाल भिड़ंत कि सर संग्राम मोहि जीत सकै सो कोउ नहि । 
अजहुँ मैं दिखाउँ तोहि जे अद्भुद बिक्रम मम बाहु गहि ॥ 

बरनन केरे ब्यंजन बातन के पकवान  । 
 रसियात अघात पुष्कल कर कोदंड बितान ॥ 

शनिवार, २७ फरवरी, २०१६                                                                                   

आगत तुरई भूमि मझारी । लगे करन कोटिक सर बारी ।
गहे चाप पुनि पनच चढ़ावा । चम्पकहु बहु कोप करि धावा ॥ 

बहुरि बिदारत रिपु समुदाई । तीछ बान लख धरत चलाईं ॥ 
गाजिहि बहु बिधि धुनि करि नाना । जाहि श्रवन कादर भय माना ॥ 

इत पुष्कलहु बान बौछारें । पलक माहि सब काटि निबारे ॥ 
देखि चम्पक त भए प्रतिघाती । बाँध सीध पुष्कल कर छाँती ॥ 

संधान छाँड़ेसि सत बाना ।पुष्कल  ताहिअ तृण तुल जाना ॥ 
बन बृष्टि पुनि करिअ प्रहारा । टूक टूक करि दिए महि डारा ॥ 

निज धनु कीन्हि बलाहक सायक बिंदु अपार ।
गरजत गगन सों निपतत भए जिमि धारासार ॥ 

सोमवार, २९ फरवरी, २०१६                                                                                     

देखि बान झरि निज पुर आईं । साधु साधु कह करिहि बढ़ाईं  ॥ 
चम्पक कर सर छूटत जाहीं । कीन्हि घायल भल बिधि ताहीं ॥ 

चम्पकन्हि बीरता जब जाने । पुष्कल ब्रम्हास्त्र संधाने ॥ 
चम्पकहु कछु थोर न अहहीं । सस्त्रास्त्र बिदिया सब गहिहीं ॥ 

जानि अबरु उपाय नहि  कोई । छाँड़ेसि ब्रम्हास्त्र सोई ॥ 
दुहु अस्त्र कर तेज एक जूटे । जरि जवलमन जलन कन छूटे ॥ 

कहिहि पुरजन एकहि एक ताईं । लागिहिं प्रलयकाल नियराईं ॥ 
दोउ तेज जब भयउ एकायन । चम्पक करि देइ ताहि प्रसमन ॥ 

पुष्कल चम्पक केर यह अद्भुद कर्म लखाए ।  
ठाढ़ रहु ठाढ़ रहु कहत अनगन बान चलाए ॥ 

बुधवार, ०२ मार्च, २०१६                                                                                                 

चम्पक घात  करत परहेले । पलक प्रदल दल देइँ सँकेले ॥ 
प्रतिहति रामास्त्र परजोगे । त सर सर करिअ पनच बिजोगे ॥ 

आवत देखि बान भयकारे । काटन तिन करि रहब बिचारे ॥ 
तबहि फिरैं सो आनि सकासा । बँधि पुष्कल रन कौसल पासा ॥ 

चम्पक पुनि भुज बल दिखरायो । कासि तासु निज रथ पौढ़ायो ॥ 
भट बरूथ बँधेउ पत जाने । हार नुमान लगइँ डेराने ॥ 

मरति बार जस काल हँकारी । हाहाकार करिअ अति भारी ॥ 
सत्रुहन पहि जब गयउ पराना । देखत पूछिहिं हे हनुमाना ॥ 

मोरि पताकिनी बिजय बिलोकनी कमनिअ कोदंड धरे । 

बीर आभूषन पताका बसन संग बहु सिंगार करे ॥ 
कर कंचन दल पुनि केहि सों केहि कारन ब्याकुल भई । 
बोलि नीति पूरित बचन हनुमन तब बीर रिपुहंत तईं ॥ 

चम्पक अनि परचार पुष्कल बाँधि लेइ गयउ । 

निज दल हार बिचार सब कंचन कल कल करिहिं ॥ 

सुनि अस बचन जरिअ करि क्रोधा । रिपुहं बोलि लेउ प्रतिसोधा । 
यह हनुमान तुम अतुरै जाहू । भरत कुँअर तुर लाइ छंड़ाहू ॥ 

साधु कहत बिनु पलक गवाईं । मोचन हेतु चले कपि राई ॥ 
कुँअरु बिमोचन आगत देखा । चम्पक मन भए कोपु बिसेखा ॥ 

सतक सहस छाँड़े सर लच्छा । चलेउ नभ निभ सरप सपच्छा ॥ 
गहे गगन कर ताल पसारे । खंड खंड करि छन महि डारे ॥ 

बहुरि लमनाइ करिअ बिसाला । मारि देइ कर गहि एकु साला ॥ 
चम्पक रहि बलवंत न थोड़े । महाबीर हनुमन के छोड़े ॥ 

काटि साल करि टूक टूक तिल प्रवान तुल जान । 

गहेउ  पुनि बहुंतक सिल खंड छेप लगे हनुमान ॥  

शुकवार, ०४ मार्च २०१६                                                                                              

ताहि सबन्हि धूरि करि डारा । हनुमन उर भए कोप अपारा ॥ 
एहि बलबीर बिक्रमि बहुताई । ए सोच करत तासु पहिं आईं ॥ 

रजबल रासि कासि गहि हाथा । लिए उड़ि गयउ गगन निज साथा ॥ 
चम्पकहु ठाढ़ ताहि प्रसंगा । लगेजुझन तहहीं ता संगा ॥ 

हनुमन करन लगै मल क्रीड़ा । किए चोटिल चम्पक दए पीड़ा ॥ 
 ता सम्मुख पुनि बल दिखरावा । हाँसत कासत गहि एकु पाँवा ॥ 

सटक बार नभ फेरि फिरायो । देइ पटकि गज कुण्ड गिरायो ॥ 
धरा सयत मुख मुरुछा छाई । तासु कटकु दल तब अकुलाई ॥ 

तेहि समउ  हाहाकार करहि घोर चिक्कार । 
धावत छतवत गयउ जस गिरिहैं कतहुँ पहार ॥ 

देखि सुरथ हत सुत महि पारा । स्रबत देहि रुधिर की धारा ॥ 
चढ़ि रथ गयो हनूमन पाहीं । कहत ए बचन सराइहिं ताहीं ॥ 

अहहउ धन्य तुम्ह हनुमाना । तुहरे बिक्रम न जाइ बखाना ॥ 

तीन तैं रुधिरासन पुरि जारे । रामचन्द्र के काज सँवारे ॥ 

ताहि सँगत कछु न सँदेहा । तुम बत्सल हरि परम स्नेहा ॥ 

तुहरी सेवा केरि बड़ाई । केहि भाँति सो कहि नहि जाई ॥

मम सुत जस महि दियो गिराईं । सूरपन हुँत कहौं का भाई ॥ 

मारिहु अस भट केतनि केता । कपिबर अब तुम होउ सचेता ॥ 

एहि समउ बाँध निज नगर लै जैहौं में तोहि । 
जो कहा सो सत्य कहा, यहु मोरे प्रन होहि ॥   

रविवार, ०६ मार्च, २०१६                                                                                        

बिनित बचन बोले हनुमाना । हे भूपत हे बीर महाना ॥ 
तुम हरि चरनहि चिंतकहारी । मैं दास मैं पंथ अगुसारी ॥ 

भले मोहि लए जाहु बँधाई । मोर प्रभु तव सोंह बरियाई ॥ 
तोर हाथे मुकुति दिलइहीं । किजो सोइ जो तव मन चइहीं ॥ 

करौ बचन अरु निज पन साँचा । बीएड निगम निगदन अस बाँचा ॥ 
रामचन्द्र सुमिरत जो कोई । ताहि कबहु कछु दुःख नह होईं ॥ 

कहत सेष सुनु मुनि बिद्वाना । पवन तनय कहि बात दै काना ॥ 
पुनि पुनि सुरथ  कीन्हि बड़ाई । किए तर तेजस सान चढ़ाईं ॥ 

धरे कोदंड कास कर सीध बांध नरनाह । 
भए हताहत अस हनुमत मुख सों निकसि न आह ॥ 

मंगलवार, ०८ मार्च, २०१६                                                                                  

निसरिहि रुधिरु ताहि परहेले । झपटि धुनुरु किए खन खन खेले ॥ 
भंजिहि ताहि पनच के साथा । भूपत दूसर धनु गह हाथा ॥ 

हनुमत पुनि नृप बाह मरोड़े । रोष बदन तनाक दए तोड़े  ॥ 
एहि बिधि कुल असीति धनु षण्डा । हनुमन के कर भयउ बिखंडा ॥ 

छन चन भरि उर कोप अपारा । गर्जहि घन सम बारिहि बारा ॥ 
तब नृप सींवातीत रोष कर । साधि सासन सक्ति भयंकर ॥ 

खात घात निपते हनुमाना । तनिक बेर उठि ठाढ़ि बिहाना ॥ 
लोहित नयन ज्वाल कन भरे। रोक पथ प्रपथ सुरथ रथ धरे ॥ 

द्युति गति सम बेगि बहु, उड़ि लए गयउ अगास । 
जाइ सुदूर छांड दियो सिथिर कियो बँध पास ॥ 

गरज आन रथ चढ़ि खिसिआना । बढे बेगि रबि प्रभा समाना ॥ 
फरकत अधर संग कपिराई । किए बिध्बंसित ताहि तुराई ॥ 

एही बिधि नृप के रथ उनचासा । खेलहि खेल करिअ बिनासा ॥ 
सुरथ जब अस बल बिक्रम देखे । होई गयऊ चित्र सम लेखे ॥ 

कहि बीर तव कर्म असि होईं । करे न करिहीं अबरु न कोई ॥ 
अधुनै तुम्ह पलक हुँत होरहु  । लखिहौं साखि बाहु बल मोरहु ॥ 

खैंच धनुष मैं रसन चढ़ावा । तुम्ह पवन कर तनय कहावा ॥ 
हरि पद पदुम अरु तुम्ह चंचर । कहत सुरथ मुख ज्वाल मुखि कर ॥ 

बहुरि भयंकर बान  महुँ पसुपतास्त्र निधान । 
लच्छ अनुमान करन लग छाँड़े रसन बितान ॥ 

बुधवार, ०९ मार्च, २०१६                                                                                  

लखतहि लखत लोग कहैँ  हाए  । पशुपतास्त्र सो गयउ बँधाए ॥ 
सुमिरत राघव तब मन मन ही । बँधे पास हनुमत तत छन ही ॥ 

सहसा बँध होइ गयउ बिभंजित । किए लरईं पुनि होत बिमोचित ॥ 
देखि मुकुत मह बलबन माने । भूपत बम्हास्त्र संधाने ॥ 

धावत द्रुत आयउ सकासे । महाबीर हँसि करिअ गरासे ॥ 
देखि भूप सुमिरत रघुराई ।  दास सहुँ रामास्त्र चलाईं ॥ 

बोले हनुमन सों बहु भयऊ । कपिबर अजहुँ तुम्ह बँध गयऊ ॥ 
सियापति राम मम गोसाईं । बाँधिहु तिनके आयुध ताईं ॥ 

जिनके प्रति आदर मन मोरे । बोले हनुमन दुहु कर जोरे ॥ 
बंधेउ और न कोउ  उपाई । तुम्हिहि कहउ करौं का भाई ॥ 

 दीन दयाकर आपहीं सम्मुख प्रगसित होंहि । 

निज आयुध का पास सों लेइ छड़ाइहि मोहि ॥ 

शनिवार, १२ मार्च, २०१६                                                                                             

हनुमन नृपु कर गयउ बँधाई । पुष्कल समाचार जब पाईं । 
नयन अँगीरी भरे अँगारे । सिखर सरासन भुज बल सारे ॥ 

सम्मुख परम कोप करि आवा । देखि भरत नंदन नियरावा ॥ 
अष्ट बान बधि करिहि स्वागत । छाँड़ेसि सहसै सोइ प्रतिहत ॥ 

दोनउ दिब्यायुध धनु धारिहि । मारिहि एक एकु काटि निबारिहि ॥ 
किए अघात दुहु मंत्र पठंता । एक हति होए त दुज प्रतिहंता ॥ 

धावहि दुहु चिकार अति घोरे । करिहि सघन रन धनु रजु जोरे ॥ 
छाँडिसि पुनि नृपु एकु नाराचा । धरे दंत जिमि बिकट पिसाचा ॥ 

काटि चहे पुष्कल जब ताहीं । आनि बेगि धँसेउ उर माही ॥ 
रहैं कुँबरु तेजस बहुताईं । तथापि घात सहे न सकाई ॥ 

गिरे भूमि मुरुछा गहे छाए  नैन अँधियार । 
पाए अरिहन एहि उदंत अचरज भयउ अपार ॥ 

 तदनन्तर अनुचर तहँ आईं । देखि बाजि पुनि गयउ बँधाई  ॥ 
पूछिहि लव सों सुनहु ए आजू । भए केहि पर कुपित जमराजू  ॥ 

















1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (27-02-2016) को "नमस्कार का चमत्कार" (चर्चा अंक-2265) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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