Friday, 22 April 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५१ ।। -----

शुक्रवार,२२ अप्रेल, २०१६                                                                                 

प्रथम तुम रथारोहित होहू । तव सों पुनि लेहउँ मैं लोहू ॥ 
तुहरे दिए रथ गहत बीरबर । रन करिअन जो चढिहउँ तापर ॥ 

त लगिहिं बहुतक पातक मोही । बिजय सिद्धि मम सिद्ध न होहीं ॥ 
जद्यपि जति मुनि सम ममभेसा ।जूट जटालु जटिल कृत केसा ॥ 

तथापि छतरिय धर्म हमारा । करैं सदा हित सत्कृत कारा ॥ 
हम स्वयमही निसदिन दाहैँ । दिया लेइँ सो बम्हन नाहैं ॥ 

मोर दसा कर करिहु न चिंता । तुहरे रथ करि देउँ भंजिता ॥ 
होहिहु तुम्हहि पयादित पाएँ । भयो जस तव पुरबल दल राए ॥ 

पुनि रन हेतु पचारिहु मोही । ताते भल कहु बत का होही ॥ 
धर्मतस लव केरे बखाना । धीर जुगत कहिबत दे काना ॥ 

पुष्कल तब बहु बेर लग चितबत चितवहि ताहि । 
करिए कहा क कहा समुझ परे कछु नाहि ॥ 

चेतत धरि कर चापु उठाना । पनच चढ़ावत पुनि  दर्साना ॥ 
कोपत लवहु बानु अस मारे । किए छन दोउ खण्ड महि डारे ॥ 

गहे धनुष अपरंच बहोरी । औरु लगे जबु  करषन डोरी ॥ 
तब लगि उदयत सो बलवाना । करिहि भंजि तृन समतुल जाना ॥ 

धनुष हस्त कटि कसत निषंगा । हँसत हँसत किए रथहु बिभंगा ॥ 
भए धनु छिनु महु छीती छाना । भिरिहि  परस्पर दोउ बिहाना ॥ 

कबहुँ त  लव बढ़ बढ़ सर छाँड़े । कबहुँक पुष्कल अगहन बाढ़े ॥ 
नयन भवन ज्वाल कन जागे ।  अतीव बेगि जुझावनु लागे ॥ 

बहोरि लव लवलेस महुँ तीरत बान निषंग । 
दरसिहि दंतारि अस जस, को बिषधारि भुयंग ॥ 

शनिवार, २३ अप्रेल, २०१६                                                                                        

बान रूप सो बिषधरि नागा  । फुंकरत जूँ धनु  रसन त्यागा ॥ 
फुकरत फन लहरात परावा । धँसे भरत सुत उर दए घावा ॥ 

बीर सिरोमनि मुरुछा गहयउ । पीर परे मुख महि गिरि गयऊ ॥ 
गयउ अधोगत कटक मनोबल । भयउ हताहत दलपत पुष्कल ॥ 
दलपति वीर पुष्कल के हताहत होने से सेना का मनोबल गिर गया है ॥ 

हत चेतस गिरि दिए देखाई । पवन तनय तुर लेइ उठाईं ॥ 
करभर बाहु सिखर धर ताहीं । आयउ पुनि रामानुज पाहीं ॥ 

अंकबारि करि तासु सरीरा  । अरपिहि चरन त भयउ अधीरा ॥ 
पितिया सोंह न गयउ बिलोका । करिहि प्रलाप चित्त गह सोका ॥ 
उनके अचेत शरीर को अंकवार करते हुवे, रघुवीर के लघुत्तम ब्राता शत्रुधन को अर्पित किया ॥ 

नयन गगन दुःख घन गहरायो । पल्किन झलझल जल झलरायो ॥ 
जगिहि कोप बिजुरी बिकराला । दमक दमक मुख जगइँ ज्वाला ॥ 

हतास्वासश्रय सिरु नायो । का करैं अजहुँ समुझि न पायो ॥ 
तत्छन सत्रुहन मन कछु लेखे । पुनि पवन सुत हनुमत मुख देखे ॥ 

वह निराशा के आश्रय होकर फिर उन्होंने अपना सिर झुका लिया ,आगे कौन सी नीति अपनाई जाए उन्हें यह  समझ नहीं आया । वे थोड़ा रूके और कुछ मंथन किया, फिर वायु नंदन हनुमान का मुख देखें लगे ॥ 

बहुरि आयसु दत्त कहइँ महा बीर हनुमंत  । 
समर भूमि अब आपहीं  जाएँ लेउ लव प्रान ॥ 

मंगलवार, २६ अप्रेल, २०१६                                                                                      

जिनके ग्यान  अमित अनंता । मरुति नंदन दास हनुमंता ॥ 
रिपुहन अग्या सो गुनवंता । कोपत रन भुइँ गयउ तुरंता ॥

पैस तहाँ बल पौरुष जागिहि  । बेगि लवहि सैं जूझैं लागिहि ॥ 
सीध बाँध सिरु माथ निहारिहि । लच्छ भेद एकु बिटप प्रहारिहि ॥ 

भँभरत निज पर आवत देखा । छाँड़ेसि सोउ बान बिसेखा ॥ 
बज्र घोष इब गरज अपारा  । मुख भरि सतक टूक करि डारा ॥ 

गहि गहि गरुबर भूधर खण्डा । झपटत झट सिरु मारि प्रचंडा ॥ 
देइ गिरि खन घाउ पर घावा । लह लस्तकि लव हस्त उठावा ॥ 

बान बृष्टि कृत रज रज कीन्हि । उठैं धूरि कछु दरस न दीन्हि ॥ 
धुर ऊपर घन धूसर छायो । रन रंगन तब अति घहरायो ॥ 

जुलुम केस बलि लाँगुली पुनि लमनात । 
अहि निदरित कुंडली कृत सियसुत लेइ लपेटि ॥ 

चरन सरोज जनि जानकी के । सुमिरत मन मन मारि मुठीके ॥ 
बाँधेउ लवहि कुंडलित पूँछी । मुकुत तासु कास बल सहुँ छूँछी ॥ 

छूटत बहुरि बीर बलवाना । तमक ताकि तकि तकि हनुमाना ॥ 
बान बूंद सम बरखन लागे  । बोलि धार बन प्रान त्यागें ॥ 

बनावरी लव केरि चलाई । देत पीर भा बहु दुखदाई ॥ 
सकल बीरबर केर निहारे । हनुमत मुरुछा गहि महि पारे ॥ 

लव सम बान  त्याजन माही । तहँ अबरु को दरसहि नाही ॥
चरत सो ऐसेउ चहुँ  दीसा ।  लगे बधन बधछम अवनीसा ॥ 

हनुमत मुरुछित भए  मुने समाचार जब अाहि । 
कहत सेष अरिहंत तब सोक सिंधु अवगाहि ॥ 

बृहसपतिवार, २८ अप्रेल, २०१६                                                                          

रुर रुर नूपुर चरनन पूरे ।  स्याम मनिसर रतनन कूरे ॥ 
हिरन मई रथ रसन मनोहर । बहुरि रिपुहन बैस ता ऊपर ॥ 

चले आपहि बीर सन जोरे । सहुँ बलि समबल रंग न थोरे ॥ 
जहँ अति निपुन बीर बर बंका । आए गए तहँ बजा रन डंका ॥ 

मुनि दरसिहि पुनि दिरिस अनूपा । एकु सुकुँअरु रघुबर समरूपा ॥ 
सीस जटा जुट सोहहिं कैसे । रघुनंदन बन होहहिं जैसे ॥ 

चरन त्रान बिनु जति जस भेसा । होत नरेस न अहहि नरेसा ॥ 
सिलीमुखाकर करधन कस्यो । मनोहरायत उरसिज लस्यो ॥ 

तिलक माथ तेजस बदन नयन अरुन अभिराम । 
कल केयूर कलित कर धनु दाहिन सर बाम ॥ 

नील कमल सैम स्यामल देहि । अहा मनोहर सुकुँअर कस एहि ॥ 
रघुकुल मनि सम धरे सरूपा । न त यहु भूसुर नहि यह भूपा ॥ 

बहुरि कवन सो बलबन आहीं । कहि रिपुहंत सोच मन माही ॥ 
रे मम बच्छर कवन तु होहू । लेंन तुले हमरे सन  लोहू ॥ 

नगन उत्कट भट मारि गिराए । केत न केत गए खेत पराए ॥ 
तोहि कवन जनि जनक जनावा । तव सों सुभग सील न पावा ॥ 

एही चरनतुम  भयउ जयंता । सुनु मम बचन बीर बलवंता ॥ 
जगत बिदित का नाउ तिहारे । जन चहैं सब जानन हारे ॥ 

भरि नयन अचरजु रिपुहन पूछि प्रसन एहि भाँति । 
उतरु देत लवनहि बदन गहे गहन कल काँति ॥ 

शनिवार, ३० अप्रेल, २०१६                                                                                     

देस गाँउ बन नगरी गेहू । नाम पिता कुल ते का लेहू ॥ 
हो जो तुम आपहि बलवंता । मम सों जूझत होउ जयंता ॥ 

निज भुज दल बल पौरुष गहिहउ । बरबट बाजि छँड़ा लै जहिहउ । 
नहीं ठाव तनु बल पौरुष भाई । छाँड़ै पाति बाजि गह जाई ॥ 

आस कहि उद्भट बीर बिहाना । नेकानेक बान संधाना ॥ 
माथ भुजा दल तकि तकि छाँती । तजत प्रहार करिहि बहु  भाँती ॥ 

जान बिनहि तब लव कर ताता । तिरछत भौंह कोप भर गाता ॥ 
करष  सरासन रसन चढ़ावा । सन्मुख लव अरु दरस रिसावा ॥ 

कर फेरी के करिहि पुनि गगन भेद टंकारि । 
जस दमकिहि दामिनी तस भई धूनि अति भारि ॥ 

बाल मरालहि दए जस त्रासा  । छूट रसन सर चलिअ अगासा ॥ 

पाए  पवन ज्वाल कन जागे । जाज्वलमन जलावन लागे ॥ 

बलवन भुज अस बल बरखाईं । पलक समन करि देइ बुझाईं ॥ 
तदनन्तर सो बाल मराला । छाँड़ेउ कोटि बान  कराला ॥ 

घटाटोप करि गगन पुरायो । चहुँ पुर काल घटा घन छायो ॥ 
तकि तकि किए ऐसेउ प्रहारा । रिपुहन अचरजु भयउ अपारा ॥ 

खैंच धनुष रजु श्रवन  प्रजंता । दिए निबेर सब काटि तुरंता ॥ 
देखि कटत सब जब निज बाना । सकलत गुरुबर देइ ग्याना ॥ 

रिपुहन केर कठिन कोदंडा । घात बेगि किए खण्डहि खंडा ॥ 
धरनि भयउ जस मानुष हीना । धनुधर भय तस धनुष बिहीना ॥ 

दूसर धनु धरे सर जूँ प्रचरन उद्यत होहिं । 
स्यन्दनहु करि बिभंजन तीछे सरगन सोंहि ॥ 

रविवार, ०१ मई, २०१६                                                                                                    

 बाजि कुंजर कठिन कोदंडा ।  कौटुम सहित भयउ खन खंडा ॥ 
भंजि स्यंदन दूज ल्याईं । आन धनुष कर ताल समाईं ॥ 

कोप भरि बहु बान दस मारे । तीछ मुख धरि लवहि पुर बाढ़े ॥ 
साँस सँभारन पलक न देवा । सँहारत हिय जीय के लेवा ॥ 

सिमटि सिमटि तब मन भय माने । पत आयसु ते गयउ पराने ॥ 
तत् छन गाँठिनु बाँधनि बारे । लवहि भयंकर छुरप पबारे ॥ 

भयउ बिभंजित भय जस होई । घात चढ़न रहि जोग न कोई ॥ 
पुनि एकु बन बिकट बिकरारा । अरध चन्द्रमा बदनाकारा ॥ 

धावत जात समात गात सत्रुहनहि हरिदै भवन भेद धँसे । 
भीतहि पैसि त  करिअ  हताहत देत भयंकर पीर त्रसे  ॥ 
मुख पीर भरे धनु पानि धरे रथ पीठक नीचु गिर परे । 
 सकल जुगती होइ गयउ बिफल अबिचल लव टारे न टरे ॥ 

विजयार्थि राजधिराज रिपुहन मुरुछा घारि । 
रन हुँत उद्यत होत सब  लव पर करिहि प्रहारि ॥ 

मंगलवार, ०३ मई, २०१६                                                                                                  

को छुरप को मुसल लय आने । को भयंकर सर संधाने ॥ 
को परिघ लिए बाढिहि आगें । छेपत गगन प्रहारन लागे ॥ 

कुंत प्रास को परसु प्रचंडा । सूल कृपान कोउ गिरिखंडा ॥ 
सब नृप नानायुध धरि धाईं । एही बिधि लव पर करिहि चढ़ाईं ॥ 

घाउ बजा चारिहुँ दिसि घेरी । रिपुदल खरभर भयउ घनेरी ॥ 
देखि अधरम सील रन तिनके । मारि दस दस बानु गन गिन के ॥ 

बनावरी लव केरि चलाई । छतवत इत उत जुगि महराई ॥ 
खात अघात होइ सब घायल । बान मरायल थकि अंतर बल ॥ 

केतक क्रोधी धराधिप हतबत गयउ पराए । 
क्रोध बिसरत डरपत पुनि रन भू बहुर न आए ॥ 

बुधवार, ०४ मई २०१६                                                                                            

औरब भूपत केत न केता । हरिदै धरे परे रन खेता ॥ 
जागे रिपुहन ऐतक माही । गै मुरुछा सुध बुध बहराही ॥ 

देखि हताहत सकल नरेसा । जूझत भयउ जीव अवसेसा ॥ 
बहुरि बरबट महाबलि सोहैं । पालि सँभारत होइँ अगौहैं ॥ 

बोलि बचन आवत समुहाईं । धन्य धन्य तुम रे मम भाई ॥ 
दरसन में तुम बालक जैसे ।  जूझिहु जा सों होइहु तैसे ॥ 

तुहरे समर कला कुसलाता । केहि भाँति सो बरनि न जाता ॥ 
तिरछत भौं ए  कहत रजु जोरे । दरसिहु अजहुँ बिक्रम बल मोरे ॥ 

भंजत तव दरप दरपन भूमि गिराऊँ तोहि । 
पूर न पाए जो मम पन कहहु न रिपुहन मोहि ॥ 

शुक्रवार, ०६ मई, २०१६                                                                                            
कहि अस सोइ बान गहि हाथा । लवनासुर बधेउ जिन साथा ॥ 
भयबिहबल मुख्य दन्त कराला । दरसि जनु जम दूत  दंताला ॥ 

रन उन्मत जोवत धनु जीवा । निरख माथ लोचन दर गीवाँ ॥ 
बहुरि निहारत हृदय दुआरा । तसु बिदारन करिहि बिचारा ॥ 

तेज पुंज मनिसर संकासा । चरत बान दहुँ दिसा  उजासा ॥ 
चलिए पवन तासन अतुराई । उठेउ धूरि बिपुल नभ छाई ॥ 

हहरत परबत पथ तरु साखी । फरकिहि पत पत उरि गए पाँखी ॥ 
निर्घातत नद उदधि उछाहीं । अकाल प्रलयकाल जनु आहीं ॥ 

दरसत रिपुहन रूप अस सुमिरहिं लव सो भ्रात । 
जो अजूह अजेय भएउ बयरिनु मार गिरात ॥ 

सबल दल सहुँ एकल निज पावा । बिसूरत  कंठ भरि आवा ॥ 
भाउ बिभोर भए यहु कहतेउ । एहि अवसर भ्रात तुम रहतेउ ॥ 

करतेउ को आधीन न मोही । उरझिहउँ में बंधु बिनु तोही ॥ 
लवहि बिचारत रहि एहि भाँती । तबहि मरमाघत गहि छाँती ॥ 

आन लगे सो बान ब्याला । अगन काल सरिबर बिकराला ॥ 
गह हरिदै कर मुख भर पीरा । मुरुछा लहत  गिरे महि तीरा ॥ 

बयरि बिदार निवारन हारे । मुरुछा गहि मुख मुकुल निहारे ॥ 
जीतिहि रन रिपुहन बलवंता । ताहि समउ तौ भयउ जयंता ॥ 

करधन बान सिरस्त्रान, धरे धुनुरु करताल । 
दरसन में महात्मना करतन में महिपाल  ॥ 

रविवार, ०८ मई, २०१६                                                                                       

रजता राज न अँगन न अंगा । चातुरंगनी सैन न संगा ॥ 
 रन उन्मत्त पत पाल न पाली । राम सरिस रामहि सम चाली ॥ 

साजि सकल अन्य साज समाजा । महि परि मुर्छित मुख अति भ्राजा ॥ 
बिनहि सयंदन पाएँ पयादा । सर गहि निलयन  नयन बिषादा ॥ 

रिपुहन बिभरम ताहि निहारिहि । चढ़ाए रथ लय गवंन विचारहि ॥ 
उरझित निज मित रिपु कर पासा । देखि बटुक गन भयउ निरासा ॥ 

बालक मन आरत अति भारी । गहइ निमिष महँ अति अँधियारी ॥ 
पुनि आश्रमु  सब गयउ तुरंता । मातु सिया कहि सकल उदंता ॥ 

कहत कहत संताप सों हुड़किहि हरिदै सिंधु । 
अलक पलक गहराए घन बरख उठे जल बिंदु ॥ 


































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