Sunday, 10 November 2019

----- || दोहा -विंशी 4 || ----,

जिउ हते न हिंसा करें देय ना केहि सूल | 
धर्म बरती रहत गहैं  साक पात फल फूल || १ || 
भावार्थ : - किसी जीव की हत्या न  किसी की हिंसा करें  ही किसी को कष्टापन्न करें  | हमें धर्मानुकल आचरण करते हुवे अपने आहार में  शाक पात फल फूल ही ग्रहण करना चाहिए   | 

अभेद नीति न जानिहै का कंचन का काँच | 
धौल कहा रु काल कहा कहा झूठ का साँच || २ || 
भावार्थ : - स्वर्ण क्या है और कांच क्या है धवला क्या है काला क्या है सत्य क्या असत्य क्या है,  अभेद नीति को यह ज्ञात नहीं होता  | 
काया तौ छिन भंगुरिहि एक दिन वाका अंत | 
सद कृत करम संग रहै जनम जनम परजंत || ३ || 
भावार्थ :- क्षण भंगुर इस  काया का एक दिन अंत होना निश्चित है किए गए उत्तम कर्म नित्य हैं जो जन्म जन्म तक साथ देते हैं | 

करै न कर सद करम को चलै न पद सद पंथ | 

रे कलि तेरो काल मैँ बँधे पड़े सद ग्रंथ || ४ ||
भावार्थ : - हस्त कोई सद्कर्म कर्म नहीं करते, चरण सत्पथ पर नहीं चलते अरे कलि ! तेरे काल में सद्ग्रन्थ बंधे पड़े रहते हैं इनका अध्ययन कोई नहीं करता | 

ए अनंत ब्रह्माण्ड महँ  रतिक नहीं परिमान | 
समुझै मानस मद भरा आपन पो भगवान् || ५ || 
भावार्थ : - इस अनंत ब्रह्माण्ड में अणु मात्र भी परिमाण नहीं है तथापि अहंकार से भरा मूर्ख मानव स्वयं को ईश्वर तक संज्ञापित करने लगा है 

कौसुम कर रस मधु अहै, पाहन कर रस पानि | 
देहि कर रस रुधिरु अहै, अनतस कर रस बानि || ६ || 
भावार्थ : - पुष्प का रस मधु है तो पाषाण का रस पानी है रक्त देह का रस है तो वाणी अंतस का रस है | 

खेलत होरि स्याम घन भीजत हैं सबु अंग | 
चढ़ बिनु उतरत ए री सखि फीके तोरे रंग || ७ || 
भावार्थ : - घनस्याम/काले बादल होली खेल रहे हैं और सभी अंग भीग रहे हैं, ए री सखी ! ये तेरे रंग फीके हैं जो चढ़े बिन उतरते ही चले जा रहे हैं || 

आज की कहावत :-
जाके पहि धन संपदा, अजहुँ सोइ गुनवान ॥
संपद न पूछौ साधु की पूछ लिजै ग्यान॥८ || 



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