Thursday, 26 June 2025

----- || दोहा- विंशी 15 ||-----

जोग विचार भगवन को जाहि लगावै भोग l 
सातिक भोजन ताहि सब कहत पुकारे लोग l१l
योग्यता का विचार कर जो भोज्य पदार्थ ईश्वर को भोग स्वरूप अर्पित किया जाता है वह भोजन सात्विक प्रकृति का होता है ऐसा भक्त लोग कहते हैं

माया मछुआरिन भइ भए भव बंधन जाल l
आन मीन सम जौ फसे ग्रसे तिनन्ही काल l२l यह संसार एक बंधन जाल जिसमें माया ही मछुवारिन है जो भी इस माया के रूपी जाल में मत्स्य बनकर इसमें आ फंसता है वह काल बनकर उसे ग्रस लेती है
कहो गुरुबर कवन अहै, गहेउ जोइ ग्यान l जाके अन्तर करुन है,  गुरु बर ताही मान l३l कहिए तो गुरुवर कौन हैं जिसने ग्रहण किया हो जिसका अंतस करुन हो उसे गुरु वर मानना चाहिए
बेद पुरान निगमागम मुनिवर किन्ह प्रबंधु l कल जुग माहि होत जात द्विज जन द्विज बंधु l४|
वेदों पुराणों निगमागमो प्रबंध श्रेष्ठ मुनियों ने किया है किन्तु खेद है कि कलयुग में वही ब्राम्हण मुनि जन कर्महीन द्विज होते जा रहे हैं

लोभ लाह केर बस भय परबासिहि जौ लोग । 
धन संपत्ति छाँड़ सो तौ आनै रोग बियोग॥५|| 
लोभ लब्ध के वशीभूत जो लोग प्रवासी हो गए हैं वह धन सम्पति को वहीँ छोड़कर रोग वियोग साथ लेकर आते हैं 

पुरजन परिजन छाँड़ निज गह द्वार ते दूर । 
देखु ए भोर के भूरे साँझी रहे बहूर ॥६II 
पुर्जनों परिजनों को त्याग कर अपने गृह द्वार से दूर देखों इन प्रवासियों को ये भोर के भूले हैं जो सांझ को लौट रहे हैं | 

साजन काचे आम ते सुनी परी अमराइ । 
सुस्वादु अचार एहि रितु घारै कैसे माइ॥७II  
साजन अबके कच्चे आमों से अमराइयाँ सुनी पड़ गई हैं अब माताएं इस ऋतु में सुस्वादु अचार कैसे घारेंगी 

सासक कह तस चालिते जन जन भए कल यंत्र। 
सासन तंत्र परि भरुअर भया प्रसासन तंत्र ॥८II  
जन जन कलयंत्र  सदृश्य हो चले हैं शासक कहे वैसे संचालित होना होगा इस शासन तंत्र पर प्रशासन तंत्र भारी हो गया अर्थात भारत पर अधिकारी तंत्र राज गया है 

बृहद संगत जौ होउते लघु कुटीर उद्योग । 
महबंध माहि दरसते, काम लगे सब लोग ॥९II  
यदि वृहद् के साथ लघु कुटीर उद्योग होते तब कोरोनाकाल के महाबंद में सभी लोग काम में लगे हुवे दर्शते | 

प्रति दिन पहिरत दरसते, नवल नवल परिधान । 
ऐतिक कापर कहुहु कहँ रखिते रे श्रीमान ॥१०II 
प्रतिदिन जो नएनए परिधान धारण किए दिखाई देते हैं कहिए तो ये लब्धप्रतिष्ठित श्रीमान इतने वस्त्रों को रखते कहाँ है |  

गुरुवर हेरन मैं चला,हेर न मिलया कोए l
मैं पापि अधम मो सोह, बड़ा जगत को होए ll११II
मेरा ह्रदय श्रेष्ठ गुरु का अन्वेषण करने चला किन्तु कोई नहीं मिला मेरा ह्रदय अतिशय पापी है एतएव मुझसे बड़ा गुरु जगत में कोई न होगा  

सस्त्र चलए तौ कदाचित हते न एकहु सांस l 
बुद्धिमत कर बुद्धि चलत सरबस होत बिनास ll१२II  
विदुर नीति : शस्त्र चलने से कदाचित एक सांस भी न आहत हो किंतु बुद्धिमान की बुद्धि चलती है तो सर्वत्र विनाश होता है

नेताजी अपराध के धरे सीस परि हाथ l 

जब तब कियो धूर्तता प्रजा तंत्र कर साथ l१३l ....

नेता जी ने अपराध को प्रोत्साहित किया हुवा है वह जब तब प्रजातंत्र के साथ धूर्तता करते दिखाई देते हैं | 


अपराध अपराधी का, देखे धर्म न जात l 
चोरी हत्या लूट सो, करे हिंस उत्पात l१४l .....
अपराधी का अपराध धर्म जाति में भेद नहीं करता वह चोरी ह्त्या लूट के साथ बहुंत से हिंसक उत्पात करता है | 

जहाँ बिरधपन श्रम करे,बालक गहे ग्यान | 
जहाँ युवा त्याग करे, सो तो देस युवान II१५II 
जहां वृद्धवयस श्रम करती हो जहाँ बाल्यपन ज्ञान ग्रहण करता हो जहाँ युवावस्था त्याग करती हो वह देश तरुण और महान होता है

धर्म जाति सो उपकरन जौ परिचय जतलाए | 
एहि जनावत कवन तुम्ह अबरु कहँ ते आए II१६II 
''धर्म और जाति वह उपकरण है जो आपकी पहचान निर्दिष्ट कर यह संसूचित करते हैं कि आप कौन हैं कहाँ से आए हैं |.....''

कंठ व्याल भाल शशि: शंभु शिव शंकराय l 
नमामि शंभु वल्लभाय हरि ॐ नम: शिवाय II१७|| 

समझ बूझ कर बरतिये, तब लग है बरदान ।
अन्यथा मानव के लिए है अभिशाप विज्ञान ॥१८II 
सोच विचार कर व्यवहार किया जाए तब तक विज्ञान वरदान हैं अन्यथा वह अभिषाप सिद्ध होगी 
 
सत् कृत बहु श्रम पूरित अर्जित जो कर दान । 
जन मानस हे देस के,लो उसका संज्ञान ॥१९ II 
हे भारत का जन मानस! तुम्हें सत्य कार्यों व अतिशय श्रम पूर्वक अर्जित किए कर स्वरूप राजस्व के दान का संज्ञान लेना चा

पराइ चाकरि ते भला, घर का छोटा काम l 
जामे स्वामि पद गहे, लहे जगत में नाम l२०l
किसी दूसरे की नौकरी बजाने से घर का छोटा काम उत्तम होता है घर का काम हमें किसी के दास से इतर स्वामी के पद पर प्रतिष्ठित करता है और दुनिया में शाख यश कीर्ति का कारक बनता है




Monday, 16 June 2025

----- || दोहा- विंशी 14 ||-----

भरे दया के भाव से,देख घाव गंभीर l

दे रक्त प्राण दान दे,वही है रक्त वीर ll१ || 


घर घर होती बेटियाँ, पढ़ लिख कर गुणवान l

यह शिक्षा फलीभूत जब, रखे पिता का मान ll२|| 


समझ बूझ कर बरतिये, तब लग है बरदान ।
अन्यथा मानव के लिए है अभिशाप विज्ञान ॥३|| 

जिउते मिरतक होत बस,लगे पलक कुल दोए ।
कलजुग तोरे काल में, समुझे नाही कोए ॥४||

प्रसर पंथ पर चरण धर, उड़ा उतंग विमान । 
वियत गमन करतेआह! गिरा तरु पत्र समान ||५||   
प्रसर पंथ = रनवे

नियम की मर्यादा का, होता जब अवमान l 
युग में विध्वंश करता, निष्फल तब निर्माण ll६|| 

यह युग निर्माण का पर, मरती नीति नृशंस l 
बल से फिर होता क्यों, दुर्बल का विध्वंश ll७|| 

बरखा आती देख के,खिले खेत खलिहान । 
करषन करतल हल गहे,खिलखिल चले किसान॥८||   
कर्षन = खिंचना, जोतना

रचना होती आपनी, जब लग अपने पास l 
जोइ चढ़ चौहाट बिकी, सो तो सत्यानास ll९|| 

शब्द शब्द को देखता शब्द शब्द को लेख l 
शब्द नित रूप बदलता,शब्द शब्द को देख ll१०|| 

शब्द शब्द को देखता शब्द शब्द को लेख l 
शब्द शब्द को लेखता शब्द शब्द को देख ll११|| 

गली गली जोगी फिरे,चाहे जो रख लेय l 
जे सेवक ताहि के जो,मोल कहे सो देय ll१२||

राष्ट्र रक्ष के लक्ष्य का, विपक्ष प्रथम प्रतिरोध l 
होता पक्ष प्रत्यक्ष तथापि,करता नित्य विरोध ll१३|| 

परिरक्ष्य होकर वक्ष पर,सहते शत्रु का क्रोध l 
हम रण दक्ष फिर क्रोध का,क्यों न लें प्रतिशोध ll१४|| 

कवन मीत तटस्थ कवन रखत ताहि कर सूचि l 
समरांगन उद्यत करो ता पुनि सैन समूचि ll१५|| 
कौन से देश तटस्थ है और कौन मित्र हैं इसकी सूचि रखते हुवे तब फिर समर भूमि में समूची सेना को इस हेतु तैयार करनी चाहिए

साजे सैन्य साज संग रिपु सुनौ एहि संदेस l 
समरांगन माहि उद्यत हमरा भारत देस ll१६|| 

गली गली मदिरा बिक,चौंक चौक में मांस l 
गह गह जुबा बाल बिरध,भए व्यसन केदास ll1७|| 

गली गली मदिरा बिके,गौरस ढूंढ न पाए ll 
खूंटे बंध कसाई के, सांसत गौ तड़पाए ll१८|| 

सखि घन कै बरसे बिन रे,बूझे नाहि प्यास ।
आस नही दूजे की बस, एकै राम की आस ।।१९|| 

तापत धरति सूख भी,घोर जरावै घाम । 
निरखै नभपथ अब सबहि,कब बरसोगे राम ।।२०|| 











 

 





















Sunday, 8 June 2025

----- || दोहा- विंशी १२ ||-----

 सिंहासन राम बिराजे,साजै राज द्वारि |

देव मुनिहि सन भगत जन,करत चरन जोहार ||१ ||   


मानिक मुकुता रतन मनि, सुबरन मई द्वार | 

पचि कोरि कुसुम अहिबेलि बँधेउ बँदनिवार ||२|| 


सुलभ भई भगवत कथा, सरल भयो हरि नाम l

भजत भगत जन भव तरत,करत जगत कै काम ||३||


सुन्दर जाकी बानि अति, सुन्दर जाका भेष l 
धन्य धन्य सो भगत जन, धन्य धन्य सो देस ll४|| 

राम नाम सुख आयतन राम नाम सुख धाम l
जय जय नयन अभिराम जय, राम राम सिय राम ll5|| 

पूजन वंदन आरती करत राम गुण गान l
जोड कर सब लोग कहे जय जय कृपानिधान ll६|| 

फेर बारी बारे जी जसुदा बारहिबार l  
प्रगसे भगवन प्रेम बस, सरबस दय नौछार ll७|| 

धरम करम माहि आडंबर करतब दरसै लोग
अजहुँ धुरीन कर सौमुह बिसइ ए सोचन जोग ll८II

एकाक दिसि प्रवाह लेय धर्मादा दरसात l खेती तबहि उपजए जब चहुँ दिसि घन बरसात ll९ II

वर्तमान में धर्मादा एकल दिशिक प्रवाहित होता दर्शित हो में रहा प्रतीत हो रहा है कृतफल स्वरूपी उपज तभी उत्पन्न होती है जब वर्षा या धर्मादा चारों दिशाओं में वर्षता है

चींटी कै पग घुंघरु बजे सुनत रामजी सोए l 
करत कृपा सहाय होत भगत होए जौ कोए ll१०II  

निर्मम के रे करतली दाया मत का हीर |  
सो तो कसाई कर कस दावै जी को पीर II११ II 
भावार्थ : -निर्मम निर्दयी के करतल में अपने मत का हीरा रख दिया देखो जिसको तुमने मत देकर सिहांसन का सुख दिया  वह कैसे कसाइयों के हाथों जीवों को कष्ट दे रहा है 

जी तो सबके भीत है सबके भीतर प्रान | 
मार सबहि कहुँ पीर दए गहे सबकी देह समान II१२II 
भावार्थ : - जी तो सबके भीतर है प्राण भी सबके भीतर होते हैं | चोट तो सबको पीड़ा देती है लाल रक्त धारण किए देह तो सबकी एक समान होती है पशु को इसलिए पीड़ा दें क्योंकि भगवान ने उसे वाणी नहीं दी वह तुम्हे कुछ कह नहीं सकता |

सत्तासीत स्वारथी करता षड़यंत्र है | 
राजा का सा भेस भर कहे देस स्वतन्त्र है II१३II 

राग वृन्द गह कंठ सह भासै जौ निज भास् | 
सरगम लय संगत होत सुर के करत बिकास II१४II  
भावार्थ :- राग वृन्द ग्रहण किया कंठ के सह निजभाषा में वार्ता करने से सरगम लय की संगत होते हुवे स्वर का विकास करती है |

साँझी प्रभात रात दिन तात मात सों भ्रात l 
पुलकित गात नवात सिस दरसत जन मग जात॥१५|| 
:- परम पिता श्री राम माता जानकि के साथ भ्राता लक्ष्मण सांध्य प्रभात दिवस रात सभी काल में मार्ग पर चले जा रहे है भक्त जन पुलकित देह से सिरोनत हो उनके दर्शन का लाभ प्राप्त कर रहे हैं . . . . .

गीता में उपदेस यह देय रहे भगवान l 
जीवन ज्ञानोपासना करतब कर्म प्रधान ll१६|| 
:-- श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण यह उपदेश दे रहे हैं कि जीवनयात्रा ज्ञान उपासना कर्तव्य योग्य कर्म इन त्रयकाण्डों की प्रधानता से युक्त रहे.....
 



मुनि देउ नारद ग्यान बिसारद गयउ सनकादिक पही l
पुनि ग्यान जागा सहित बिरागा जब ल्याए कथा गंग गही ll

कथा माझ जब भगति बिराजी l बैसत हरिदय अतिसय साजी ll
सुपुत ग्यान संग बैरागा l सुनत कर तारि धुनि पुनि जागा ll
लमनी घन घन दाड़ लए घन घन कारी मूँछ l 
जो रमें न हरि भजन में तन्हकी जाति पूछ ll

पाहन का सार जल है भू का सार ग्यान l
देव का सार देव हैं,जगत सार भगवान ll

बेद पुरान निगमागम मुनिवर किन्ह प्रबंधुl 
कल जुग माहि होत जात द्विज जन द्विजबंधु ll

पद पद मैं परबत नदी बट बट मैं बन राए l
यह संपत्ति जगपति की सोच समझ बरताएं ll





----II राग ललित II---- ललित लाल लव तिलक भाल तल लसत लावनि लोचनम् I

गहगहत गांठ परि गाँठि,चलत पंथ परि पंथ l कहहु बंधु ए निबरे कस,पठत ग्रंथ परि ग्रंथ ll

नित नव पीढ़ि सो जनमत साधन अस भरमात l जस अति द्रुत गति संगत कलजुग बिरता जात ll अर्थ: नित नव पीढ़ी संग उत्पन्न होते ( अकादस पीढ़ि के संगणक आ गए किन्तु संताने अभी दूसरी तीसरी पीढ़ी की जन्म ली हैं)साधन ऐसा भ्रमित कर रहे है जैसे ये कलयुग सामान्य गति से अन्यथा शीघ्रता पूर्वक व्यतित हो रहा है

दिन बिरता भाअँधेरा करत दीप कर बात l
कहत संत सज्जन, तासु अँधियारा नहि जात ll
संत सज्जन कहते हैं दिवसावसान पश्चात्य अँधेरा हो गया अब केवल दीपक की वार्ता करने मात्र से अँधेरा दूर नहीं होता अर्थात अँधेरा तो दीपक जलाने से दूर होगा केवल वार्ता भर से नहीं

सस्य श्यामल धरा मह,पाहन दे उपजाए l 
बीपिन कियो सब काँकरी,सब कानन बिनसाए ll .... .

होउते जोअधिकाधिक लघु कुटीर उद्योग | 
घर घर माहि दरसते  काम लगे सब लोग || 
वृहद उद्योगों की अपेक्षा यदिलघु उद्योग अधिकाधिक होते तो घर घर में लोग काम से लगे होते हैं वृहद् उद्योग उतना काम नहीं देता जितना लघु उद्योग देते हैं यदि देते तोआजीविका विहीन लोगों का वर्ग खड़ा नहीं होता 

----- || दोहा- विंशी ११ ||-----

8 जून 2025 

सत दया तप धर्म दान, जाका नेम बिधान | 

भारत के लोग सो जो, भारत की संतान ||१  ||


अधुनातन का संविधान है एक छद्मन ग्रन्थ | 
अधरम का आधार ये पराधीन का पंथ || २  || 

चित्र लेख उल्लेखति चित्रकार की कूचि | 
सूक्ति सूत्र स्वरूप यह भारत भूमि समूचि || ३  || 

चार धर्म के देवता जिसके हैं अधिराज |
यह भारत का गण यही भारत का गणराज || ४  || 

गौ गौरी गंगा संग करे ॐ आह्वान | 
यह भारत की संस्कृति यह भारत की पहचान ||५ ||   
 

यह भारत की देहली यह यह है देश द्वार | 
अतिथि देवो भव: सदा, भारत का संस्कार ||६||   

तपोभूमि स्वरूप यह मेरा भारत देश | 
तीन देव रक्षा करें ब्रह्मा विष्णु महेष || ७ || 


हिंसारत की सरन थली यह पच्छिम बंगाल  | 
निसदिन बैभव भूति ते होत जात कंगाल || ७ || 

पीली पीली पागड़ी केसरियो पहिरान |  
रँग रँगीलो म्हारो प्यारो राजस्थान || ८ || 

कोपर थाली खीर भरि रसिलौ रे पकवान | 
रँग रँगीलो म्हारो प्यारो राजस्थान || ९ || 

बोली बोले मिश्री सी लगे लौन की खान | 
रँग रँगीलो म्हारो प्यारो राजस्थान || १०|| 

बजे ढमक ढम ढोलका कंठ सुरिलो तान | 
रँग रँगीलो म्हारो प्यारो राजस्थान || ११ || 

 पाथरी भी बोल पड़े करे देस गुण गान 
रँग रँगीलो म्हारो प्यारो राजस्थान || १२ || 

धूरि धूरि धौल गिरि सी धरे राजसी बान | 
रँग रँगीलो म्हारो प्यारो राजस्थान || १३ || 

महराणा जी रो मूरति धरे हाथ किरपाण |
|रँग रँगीलो म्हारो प्यारो राजस्थान || १४ || 

भारत के हृदय स्थित सुन्दर मध्यपदेश | 
सदैव विश्व शांति का देता यह सन्देश ||१५||