Saturday, 26 December 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४५ ।। -----

शनिवार २६ दिसंबर, २०१५                                                                                           
सदा रघुबर सरन महुँ रहियो । कर छबि नयन चरन रहि गहियो ॥ 
स कह सर्जन के करतारी । जग पालक जग प्रलयंकारी ॥ 

उपदेसत  पुनि सिउ भगवाना । भयउ आपहु अन्तरध्याना ॥ 
एहि बिधि तज सुर नगर निवासा । अनुचर संग चले कैलासा ॥ 

बहुि बीर मनि भंवर समाना । भगवन पदुम चरन करि ध्याना ॥ 
आपहु लेइ कटक चतुरंगा । चले महबीर सत्रुहन संगा ॥ 

राम चरित जस सिंधु अपारा ।  एहु एकु तीर तरंगित धारा ॥ 
करत जे जसगान अवगाहीं । गावहि सपेम सुनिहि सुनाहीँ ॥ 

रोग सोक बियोग संग तिन संताप न जोहिं ।  
सिअ राम पेम रस पाए के जीवन रसमय होंहि ॥

सोमवार, २८ दिसंबर, २०१५                                                                                      

कहत अहिपत पुनि हे द्विजबर । तदनन्तर सो बाजि मनोहर । 
मोर पंख मनि चँवर सुसोहित । कोटिक समर सूर सों रच्छित ॥ 

भारत के अंते अस्थाना । हेमकूट परबत जग जाना ॥ 
सहस दसह जोजन लमनायो । बिस्तारित चहुँ पास पुरायो ॥ 

धातु जुगत सिखि श्रृंग सुसोभा  । रजत संग सुबरन मन लोभा ॥ 
तलहट एकु उद्यान बिसाला । जाके तीर तीर तरुमाला ॥ 

रचे धरा जिमि सिरु कल केसा । मार्जक जस तहँ बाजि प्रबेसा ॥ 
महमन जात तहाँ तिन संगा । भए एकु  अचरज कारि प्रसंगा ॥ 

ताहि कहउँ मैं तोहि सुधीरा । अकस्मात सुनु तासु सरीरा ॥ 
टारे न टरे भए जड़ताई । केहि भाँति नहि चलिहि चलाईं ॥ 

ठाढ़ि तहाँ अविचल तुरग प्रतीति नग संकास । 
औचक पुकारि करत पुनि गयऊ सत्रुहन पास ॥ 

 जाइ सब बृत्तांत सुनाईं । नहि जानत हम कस गोसाईं ॥ 
भयउ तासु जड़तम सब अंगा । बिचरत गए अह जहाँ तुरंगा ॥ 

ताहि बिचारत पुनि कछु कीजो । जो करि उचित जान सो कीजो ॥ 
सत्रुहन पल्किन पट बिस्तारै । भए चौपट दुहु नयन दुवारे ॥ 

लिए संग निज सुभट मुनिराए । तुरतै तासु निकट चली आए ॥ 
सरभस चरत फिरिहि सब देसा । होहि दसा अस रहि न अँदेसा ॥ 

गहे चरन पुष्कल निज बाही । किए जुगत उपरे न उपराही ॥ 
टारे जब नहि टरे तुरंगा । पूछिहि सत्रुहन सुमतिहि संगा ॥ 

होइँहि अस काह कि गहिहि सकल देहि जड़ताए । 
अजहुँ इहाँ मंत्रि बर करि चाहिअ कवन उपाए ॥ 

बुधवार, ३० दिसंबर, २०१५                                                                            

जेहि सों चालक बल बहुराए । महोदय करिहउ सोइ उपाए ॥ 
गतिहि कोउ मत मतिगति तोरे ।  कहे मंत्रि एहि नहि बस मोरे ॥ 

जानिहुँ मैं प्रभु आँखन देखी । तासों अतीत मोहि न लेखी ॥ 
दरस बिषय होइहिं जग जोहीं । ताहि माहि मोरे गति होंही ॥ 

हेर फिरत अब सब बन डेरे । चाहिए करि अस रिषि मुनि हेरे ॥ 
जो यह जानन में कुसलाता । भई इहाँ अस कस एहि बाता ॥ 

सत्रुहन पुनि निज अनुचर ताईं । कुसल रिषि मुनि करिअ हेराईं ॥ 
एक अनुचर प्राचिहि दिक् पठाए । चरत सो जोजन भर चलि आए ॥ 

चलिअ बदन हरखनि पवन बिषाद घन बिथुराइ । 
तहाँ ते एकु अति सुंदर आश्रमु दिए देखाइ ॥ 

 मानुस सन पसु पाँखि जहाँ के । बिचरहि बैर  भाव बिसरा के  ॥ 
कारन सबहिं  गंगा अस्नाए । तासु सकल अघ गयउ दूराए ॥ 

होइहि रुचिर रहस्य चहुँ फेरे ।  रहि आश्रमु शौनक मुनि केरे ॥  
लिए रनी सब बात के हेरा । चरन फेर आइहिं निज डेरा ॥ 

 भइ अतिसय बिसमय कर बानी । समाचार जब कहत बखानी ॥ 
अनुचर जैसेउ निगदन कहीँ । हरखिहि सत्रुहन बहु मन मनही ॥ 

हनुमन पुष्कलादि लिए संगा । आए मुनिहि पहि तूल तुरंगा ॥ 
गहे चरन सुमिरत श्री रामा । भयउ दंडबत करिहि प्रनामा ॥ 

बलबन में महा बलबन सत्रुहन आवब जान । 
शौनक मुनि किए स्वागत  पाद्यार्ध प्रदान ॥ 

बृहस्पतिवार, ३१ दिसंबर, २०१५                                                                                

भेंट सपेम  दीन्हि सुआसन । बैठे सब सुनि मुनि अनुसासन ॥ 
किए बिश्राम जब श्रम बहुराई । सकुचत मुनिबर पूछ बुझाईं ॥ 

काँकरि पथ बन भूमि पहारा । करि केहरि सा सरित अपारा ॥ 
काल ब्याल कुरंग बिहंगा । चतुरंगिनी कटकु लिए संगा ॥ 

घन ते घन बन गोचर जैसे । मारग अगम फिरिहु कहु कैसे ॥ 
दूर भरे पग  करिहि बखाना । लमनाए माग दूर है जाना ॥ 

सुनि सत्रुहन मुनिबर कर बाता । भए मुदित भई पुलकित गाता ॥ 
हिलगिहि तसं पुनि जुग पानी । ए निगदत भई गदगद बानी ॥ 

मुनिबर एकु नीक निकुंज कली कुसुम बिकसाए । 
घुर्मित मोर तुरग तहाँ, अकस्मात् चलि आए ॥ 

शनिवार २ जनवरी, २०१६                                                                                  

प्रबसित तहँ एकु उपबन तीरा । भयउ तासु जड़वंत सरीरा ॥ 
हमरे मन अतिसय दुःख पाईं ।सूझे  नहि पुनि कोउ उपाई ॥ 

देखि गात स्तम्भित तुरंगे भए सब दीन तासु दुःख संगे । 
हमरे जस बड़ भागि न कोई । दैवात तोर दरसन होईं ॥ 

आरत  अरनव मन अवगाहीं  । मुनिबर तुम तरिता बनु पाहीं ॥ 
सोच करिअ उर दारुन दाहा । तुरग दसा कहु कारन काहा ॥ 

याहू संकट मोचित जस होहीं । कहउ सो बिधि कृपाकर मोही ॥ 
सत्रुहन पार्रिहि पूछ बिधाना । तब शौनक मुनिबर बिद्बाना ॥ 

दृग द्वारि पट ढार के, छिनुभर् धरे ध्यान । 
तनिक बेर लयलीन रह सकल रहस लिए जान ॥ 

प्रफुरित होत चकित भए नैना । पुनि सत्रुहन सन  बोलि ए  बैना ॥  
बैठे  संसय सरि के तीरा ।  सत्रुहन श्रवन होए  गम्भीर ॥ 

भयउ तुरग कस गात स्तम्भा । कारन किए मुनि कहन अरंभा ॥ 
अहहीं गौड़ नाउ एक देसा । जहँ एकु बहु  रमनीक प्रदेसा ॥ 

सातिक नामि द्विज तहँ बासिहिं । जसु तेज चहुँ पास प्रकासिहिं ॥ 
करिहीं तप कावेरी कूला । छन पल पहर रयन दिन भूला ॥ 

एक दिन पयस दुज पवन पयाएँ । तीजे दिन सो कछुहू न पाए ॥ 
चलिहिं नेम ब्रत तप एहि भाँती । ऐसेउ बिरत रहि दिन राती ॥ 

सर्ब नासी काल तबहिं, गहे दंड कर पास । 
तपन चरन रत द्विजन्हि गयउ संग लए फाँस ॥  

सोमवार, ४ जनवरी, २०१६                                                                                  


पहिरत रतन अभूषन नाना । सातिक नामि सो बिप्र बिहाना ॥ 
सोहामान बिमान चढ़ेऊ । मेरु गिरि कर सिखर उतरेऊ ॥ 

जम्बालिनि जहँ बहि चलि आई । बसिहि तासु तट रिषि मुनिराई ॥ 
तपन चरन  रत मगन ध्याना । रयन रयन बिनु दिनु दिनु बिन जाना ॥ 

सोए द्विज कीन्हि तहँ बासा । रहिहि अनंदित करिहि निबासा ॥ 
पुनि मनगत अभिलाषा जागे । सुर कामिनि सों बिहरन लागे ॥ 

कामोन्मत्त मन अस रंगा । बसिहि तहाँ रिसि महरिसि संगा॥ 
किए बर्ताउ न जाइ बखाना । भरे घमन करेउ अपमाना ॥ 

तासु उद्दंड अजहुँ त बढ़े अधिकाधिकाइ । 
रिषि मुनि हेतु सो ब्रम्हन, भयऊ अति दुःख दाइ ॥ 

मंगलवार, ०५ जनवरी, २०१६                                                                                    

दुखित रिषिहि मन कोपु ब्यापा । रिसत बिप्रन्हि दीन्हि श्रापा ॥ 
काढ़ि बचन पुनि अति खिसियाईं । होहु कपटी निसाचरु जाई ॥ 

तुम्हरे बदन गहे बिकारा । केहु भाँति नहिं जाइ सँवारा ॥ 
सुनिहि श्राप मिटिहि अभिमाना । बिप्रन्हि मन बहुतहि दुःख माना ॥ 

जल बिनु बिकल मीन के नाईं । बोले सभीत सीस झुकाईं । 
सयान सुजान दीनदयाला । श्राप अनुगह करिहु कृपाला ॥ 

मैं लघुबर बड़ मम अपराधा । अपकारत तुम्हहि मैं बाधा ॥ 
अनुग्रह करि तब रिषिहि सयाने । मधुर रूप एहि  बचन बखाने ॥ 

रघुबर कर तजि तुरग इहँ अइहीं कालहि पाएँ । 
होइहहु तब साप मुकुत करत ए  कछुक उपाएँ ॥  

बृहस्पति /शुक्र , ०७/ ०८ जनवरी , २०१६                                                                                     

तेहि औसर त्याजित तुरंगा । करिहु  अचर नज बेगि प्रसंगा ॥ 
सुमधुर आम कथा तब होंही ।मिलिहीँ श्रवन सुअवसर तोहीं ॥ 

गाहे सीस भयंकर श्रापा । होइहि तब तासों उदयापा ॥ 
अस्व गात थंभित जस होईं । करिहि श्रापित राकस सोई ॥ 

रिषिहि कहि हरि कीर्तन ताईं  । करिहौ राम कथा सुखदाई ॥ 
लागिहि श्राप कटिहि समूला । होइहिं सकल दसा अनुकूला ॥ 

रिपुदल बीर दमन करतारी । करि सत्रुहन मन अचरजु भारी ॥ 
कर्म बचन बड़ गूढ़ गभीरा । कहि हरिअर पुनि रन धीरा ॥ 

सातिक  नाउ धर ब्रम्हन कर्म संग मुनिराए । 
अमरावती पैठत पुनि लहिहि राकस सुभाए ॥  

कर्मानुसार गति जस होंही । तेहि बरनत कहउ मुनि मोही ॥ 
जेहि करम जस जमपुर लाही । कहिअ बुझाइ मोहि जनि ताही ॥ 

बोले मुनि हे हंसकबंसा । धन्य तुम्ह रघुकुल अवतंसा ॥ 
तव बुधि सदा बचन अस बूझिहि । तासु अबर अरु कछु नहि सूझिहि ॥ 

चाहहु सुनै कर्म गति गूढ़ा । कीन्हिहु प्रस्न मनहु अति मूढ़ा ॥ 
तुम्हहि बिषय बिदित सब होईं । अहहि ताहि संदेहू न कोई ॥ 

तथापि हित हुँत पूछ बुझाहू । मुनिबर मुख पूनि पुनि सुनि चाहू ॥ 
कर्म लेख धरि बिचित्र सरूपा । तेहि के गतिहि गहि बहु रूपा ॥ 

तात सुनिहु सादर मन लाईं । सुनिही सो भव मोचन पाईं ॥ 

जो सठ अपकारी परधन पर नारी उपर कुडीठ धरे । 
भोग बुद्धि कर पुनि बरियाई तापर अधिकार करे ॥ 
तासु बाँधि महाबली जम कर  दूत धरी ले जइहीं । 
काल रसी तिन करषत कसी तामसी नरक गिरइहीं ॥ 

जातुहु तब लगि राखिहि जब लगि सहस बरस नहि पुरने । 
गहि कर दंड जमदूत प्रचंड पापकन्हि हनिहि घने ॥ 
पाप भोग तैं एहि बिधि भल भाँति  भोगत सो जातना । 
बाराहु जोनि जनमत पल पल लहे पुनि दुःख दारुना ॥ 


पाए बहुरि मानस जोनिहि क्रमबत सोई पाप करे । 
पुरबल जनम केर कलंक संसूचित चिन्हार धरे ॥ 
जो निज भरिमा भरिमन हुँत करें द्वेष पर प्रानिन्हि से । 
पापभिरत सो पापक निपतत अँध तामसि नरक बसे ॥ 

जौ परहंता हतिरंता सो रौरव गिरएँ जाइहीं । 
तहँ कोपत रुरु पंखि छिति छत तेहि के देहि खाइहीं ॥ 
निज तात द्रोहि ब्रम्हन बिद्रोहि काल सूत नरक परे । 
लमनत जो खेतानुगत सहस दस जोजन लग पसरे ॥ 

चतुस्तनी बिद्रोही कर देइ दंड आघात । 
पचइहीं ताहि जमराज किंकर नरक निपात ॥  

शनिवार, ०९ जनवरी, २०१५                                                                            

गौ तन रोम बरस गिनि जोरे । पचिहिं तहँ सो समउ न थोरे ॥ 
जोग पुरुख बिनु जो नर नाहू । देइ दंड अन्यानय काहू ॥ 

लोभ बिबस बिप्रन्हि दुःख दाइहिं । सोए नरक सो बहु दुःख पाइहिं ॥ 
तहाँ दूत सठ बदन बराहू । देइ ताहि तस दारुन दाहू ॥ 

सेष पाप तब कस निबराहीं । खल जोनिहि जब जनमत जाहीं ॥ 
कहत जति पुनि करम गति आगे । सत्रुहन चेत धरत सुनि लागे ॥ 

मोह बिबस बिप्रन्हि गउ केरे । जीवन हेतु द्रब्य धन हेरे ॥ 
पठाइ जब परलोक बिधाता । सो अँधकूप नरक गिरि जाता ॥ 

जो को आपनि लौलुपताईं । जीहातुर मधुरान्न पाईं ॥ 
न त देवन्हि न सुहृदय देहीं। गिरएँ जाइ कृमि भोजन तेहीं ॥ 

सुबरन कर अपहरन करि बिप्रन्हि धन अप हारि । 

संदंस नरक पतत सो भुगतिहि दुःख अति भारि ॥ 

मंगलवार, १२ जंनवरी, २०१६                                                                                     


पेट परायन जो मति मूढ़ा । भरत पुरत निज तन भए बूढ़ा ॥ 
अबरु आप तें जनिहि न आनै । लेइ जान जग देइ न जानै ॥ 

तप्तक तापित तैल पुरावा । कुम्भी पाक गिरइँ सो जावा ॥ 
पामर पुरुख भोगमति संगा । चाहिँ गमन अगम्या प्रसंगा ॥ 

लोहित मूरति दूत तपइहीं  । तासंगत अँकबार करइहीं ॥ 
जो मद उन्मत निज बल ताईं । लंघिहि बेद बचन बरियाईं ॥ 

पयसत रकत अमिष सो खाहीं । बैतरनी अरनी अवगाहीं ॥ 
छूद्र गेहिनि द्विज भए गेही । पुयोद नरकु निपातत तेहीं ॥ 

दँतुला दूत अस पेरिहि जस पेरन पेराइँ । 
तहाँ केर निबासित काल होतबहुँत दुःख दाइ ॥ 

शुक्रवार, १५ जनवरी, २०१६                                                                                         

जो धूत कृत कुचाल कुसाजा । संत जनहि सों करिहि ब्याजा ॥ 
दंभि खल दल दर्प कल ताईं । बैसस नरकहि जात गिराई ॥ 

सबरनी जोनि बीर त्याजिहि । अस पामर सहुँ लाजहु लाजिहि ॥ 
बीरहि कुण्ड सो जाए गिराए । पयसन छाँड़ि तिन बीर पियाएँ ॥ 

जो खल जल जल लाग लगावैं । देइ गरल धन द्रव्य चुरावैं ॥ 
महपापक अपहारिहि गाँवा । सारमयादन सो गिरि आवा ॥ 

करिहि संचय पाप कर रासी । बोले असाँच बहुंत सुपासी ॥ 
देइ अधमी असाँची साखिहि । अबीचि नरक जम तिन्ह राखिहि ॥ 

धरत केस करषन करत नीच सीस करि डारि । 
कहरत कलपत तहाँगत भुगत दुखारत भारि ॥ 

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