Wednesday, 9 December 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४४ ।। -----

सोमवार ०७ दिसंबर,२०१५ 

पुनि सियापति राम  के हेता । लए औषध आइहिं रन खेता ॥ 
औषध सहित गयउ जब आवा । निरखत हनुमन सब सुख पावा ॥ 

भेंट तासु रिपु हो कि मिताईं । साधु साधु कह करिहिं बड़ाईं ॥ 
कपि गण महुँ अद्भुद कपि मानिहि । बली माहि बलवन पद दानिहि ॥ 

महामना माहि महातिमही । बुला मंत्रिबर सुमति सों  कहीं ॥ 
जो निर्जिउ जिय देइ जियाइहिं । करिहौं अब मैं सोइ उपाइहिं ॥ 

लए भुजदल पुष्कल पुठबारे । पुनि हरिहर उर औषध धारे ॥ 
धर ते बिहुन तासु सिर लीन्हि । जुगत मन जुत जुगावत दीन्हि ॥ 

जुगे जोहि धर सोहि सिरु, पुष्कल देह सँभारि । 
भरे हरिदय हँकारि के कथे कथन हित कारि ॥ 

बुधवार, ०९ दिसंबर, २०१५                                                                                   

एहि निगदन मुख निकसिहि जोहीं । बीर सिरोमनि पुष्कल तोहीँ ॥ 
जीअत उठि बैठे हरषाईं । भेंटत सकल हरष उर लाईं ॥ 

कटकटात पूण दन्त रिसायो । सहज सरूप समर भुइँ आयो ॥ 
बजे पुनि घन घोर रन डंका । पचारि चला बयरु सो बंका ॥ 

गयउ कहाँ सब राम बिद्रोही । आजु ताहि हठि मारिहुँ ओही ॥ 
कहँ सर गन कहँ मोर निषंगा । बोलत  अस फरकिहिं अंगंगा ॥ 

तानि कान लग कटु कोदंडा । संधान रसन बान प्रचंडा ॥ 
दरसत ऐसेउ कपिबर ताहि । कहेउ कोमलि आन तिन पाहि ॥ 

बीर भद्र मारेसि तोहि, तुम जीवन्मृत होहु । 
रघुबर चरन प्रसादु सों पुनि नव जीवन जोहु ॥ 

शुक्रवार, ११  दिसंबर, २०१५                                                                                 

रामानुजहू मुरुछित होंही । जिअन सजीवन जोहत ओहीं ॥ 
लागेउ सिउ संभु के बाना । पीर परत भए साँसत प्राना ॥ 

परेउ पूण हताहत जहँवाँ  । अस कह दोनउ गयऊ तहँवाँ ॥ 
साँसत साँस बहोरत आने । तब हनुमत औषध उर दाने ॥ 

परेउ मुरुछि कहत रे भाई । मही माहि कादर के नाईं ॥ 
तुम बिक्रमी तुम मह बलबाना । नहि को बीर तुहरे समाना ॥ 

जो मैं जतनबंत जनिकाला । अहउँ बम्हचर के परिपाला ॥ 
त सत्रुहन उठि बैठु छन माही । न तरु ब्रम्ह चरनिहि मैं नाही ॥ 

देइ पलक पट डीठ दुआरे । जिअत सत्रुहन ए  बचन उचारे ॥ 

सिउ कहँ संकर कहँ संभु, गयऊ कहँ रन छाँड़ि । 
 कहत अस रिस दहत नयन लपट बदन पर बाढ़ि ॥ 

संग्राम सूर बीर बहुतेरे । पिनाका धारिहि मारि निबेरे ॥ 
महत्मन मह बीर हनुमंता । जतनत सबन्हि किए जीवंता ॥ 

तब सब गातबरन सजोहीं ।  साजत निज निज रथ अबरोहीँ ॥ 
रोष पूरनित हरिदे संगे । करेउ धुनि घन सब रन रंगे ॥ 

बजे भेरि पुनि धनबन भेदी । चले रिपुपुर चढ़े रन बेदी ॥ 
बीरमनि सन सुभटन्हि घेरे । चले आपहिं अबहिं के फेरे ॥ 

भिरन जैसेउ सम्मुख होंही । देखि ताहि सत्रुहन अति कोहीं ॥ 
तापर दहना अस्त्र चलाईं । तासों सकल कटक दवनाईं ॥ 

अरि अरि दवारि समतूल दहत धुरोपर छाए । 

लपट चहुँ दिसि चपेटन्हि प्रचंड रूप धराए ॥  

शनिवार, १२ दिसंबर, २०१५                                                                        

देखि महायुध के दहनाई । सीवा पार कोप किए राई ॥ 
जार जार  ज्वाल कन जागे । प्रत्यरथ बरुनास्त्र त्यागे ॥ 

मरम भेदि प्रहार के ताईं । सीतारत अनीक अकुलाईं ॥ 
कंपत  जब आरत अति गाढ़े । सत्रुहन तापर बायब छाँड़े ॥ 

चले बेगि बहु बात कराली । बिभंजन (रथ ) घन भई बाताली ॥ 
घोराकार घटा घन काला । धाए धार जिमि बदन ब्याला ॥ 

होइ जोहि बाताल अधीना । चहुँ दिसि छतबत भई बिलीना ॥ 
जोइ सैन रहि सीत दुखारी । बीतत दुःख पुनि होइ  सुखारी ॥ 

बीर मनि निज अनीक दिखि जब पीर गहाहि  । 
निबारक रिपु संहारक पर्बतास्त्र चलाहि ॥ 

रविवार, १३ दिसंबर, २०१५                                                                                     

बाताली परिहरै न कोपा । लेइ केतु करि चहुँदिसि रोपा ॥ 
परा समुख परबत गतिरोधा । बिहनए भए पूरन प्रतिसोधा ॥ 

पसर बिनु जब चरन पयाने । त सत्रुहन बज्रास्त्र संधाने ॥ 
मारि चोट अघात किए घोरा । बिनसिहि उपरुध उपल कठोरा ॥

बहोरि सिल पट रहे न कोई । तिल तिल कर सब कन कन होईं । 
रिपुदल बीर बिदारन लागिहि । अंग अंग सुरंग में पागिहि ॥ 

रिसत रुधिरु कं सोहहिं कैसे । सुबरन संग सुभग के जैसे ॥ 
दरसि दिरिस यह बिसमय कारी । देख न हारे देखनहारी ॥ 

बहोरि होत रिसान, सीवाँ पार कोप करत । 
ब्रम्हास्त्र संधान बीर मनि कसै कोदंड ॥ 

सोमवार, १४ दिसंबर, २०१५                                                                                

ब्रम्हास्त्र बहु अचरजकारी । जहँ जा लागिहि तहँ रिपु जारीं ॥ 
सोए बीरमनि सन रन रंगा । चढ़ेउ रसना छाँड़ निषंगा ॥ 

तासों छूट चला रिपु ओरा । छुटत  टँकारिहि गुन घन घोरा ॥ 
 तब लग सत्रुहन कर सोहा । तुरत आन आयुध मन मोहा ॥ 

बिद्युत गति सम धाए प्रचंडा । बम्हास्त्र छन किए दुइ खंडा ॥ 
राउन्हि उर घन अघात करे । मुरुछित बिकल धरनि खसि परे ॥ 

कोपि  तीब्र लोचन न समायो । रोहित रथ सिउ निप पहि आयो ॥ 
सत्रुहन औचकहि तेहि औसर । चढ़ा प्रत्यंचा  कसे धनु सर ॥ 

आयउ बढ़ि त्रै लोचन आगे । करि गहन रन जुझावन लागे ॥ 
एक पख रामानुज एक संकर । भयउ बीच संग्राम भयंकर ॥ 

चलेउ सस्त्रास्त्र बिकट, आयुध बहुंत प्रकार । 
परे चमक चिङ्गारि कन सबहि दिसा उजियार ॥ 

बुध/बृहस्पति , १६/१७  दिसंबर, २०१५                                                                             

लरत भिरत त्रै लोचनसंगा । भए सत्रुधन्हि सिथिर सब अंगा ॥ 
आकुल हिअ अरु जिअ नहि जोहीं । तब हनुमत उपदेसन सोही ॥ 

सुमिरै मन ही मन गोसाईं । आरत नाद करत रे भाई ॥ 
धरे संभु रन रूप भयंकर । लेहि प्रान हाँ गहे धनुषकर ॥ 

तरस देन जिअ लेन उतारू । पाहि पाहि प्रनतारत हारू ॥ 
राम राम जो राम पुकारे । भए भव पारग सो दुखियारे ॥ 

कहि गए साधक सिद्ध सुजाना । दीन दयाकर कृपानिधना ॥ 
मिटे दोष सब मोर हिया के । दुराइहौ दुःख एहु दुखिया के ॥ 

सत्रुहन निगदित ए गदन जोहीं । प्रगसिहिं सम्मुख रघुबर तोहीं ॥ 
दरस प्रभो निज पीर बिजोगे । करे अस्तुति सत्रुहन कर जोगे ॥ 

कुण्डलाय शिरो कुंतलम् । लसितम्  ललित ललाटूलम् ॥
नयनाभिराम नलीन सम । श्रीराम श्याम सुन्दरम् ॥

परम धाम ज्योतिः परो । सर्वार्थ सर्वेश्वरम् ॥

सर्वकाम्योनंत लील:। प्रद्युम्नो जगद्मोहनम् ॥

कंदर्प कोटि लावण्यम । तीर्थ कोटि समाह्वयं ॥

शम्भुकोटि महेश्वराय । कोटीन्दु जगदानन्दम् ॥

सर्वदेवैकदेवता : । जगन्नाथो जगदपिता: ॥

श्री नित्य श्री : निकेतनम् । नित्यवक्ष स्थलस्थ श्रीधरं ॥

हृषिकेशाय हंसो क्षरो । पीयुषोत्पत्ति कारणम् ॥ 

स्मृतसर्वाघनाशन: । तीर्थमयी जनार्दन: ॥ 

श्रीरामो भद्र शास्वता । विश्वामित्रप्रियो दांता ॥ 
खरध्वंसी कौशलेय : । जामदग्न्य दर्प दलन: ॥ 

वेदांतपारात्मनम् । कामद् कोदंड खण्डनम् ॥ 
सत्यवाच्य विक्रमो व्रते । श्रीमान जानकी: पते ॥ 

दासरथि सद्गुणार्णव: । रविवंश रामो राघव: ॥ 
पित्राज्ञा त्यक्त राज्य : । कंदरार्पितैश्वर्य: ॥ 

चित्रकूटाप्त रत्नादृ: । यथेष्टामोद्यास्त्र: ॥  
पीताम्बरी धनुर्धर: । श्याम मनोहरम् शूर: ॥ 

महासार पुण्योदयो । ब्रह्मण्यो मुनिसोत्तम: ॥ 
देवेंद्रनंदनाक्षिहा ।  मारीचध्न : विराधहा ॥ 

 निर्गुणीश्वरादि देवा । ध्वस्तपाताल दानवा ॥ 
दण्डकारण्यवास कृते । ताडकांत कृते रघुपते ॥ 

वालि प्रमथन जनार्दन: ।  सुग्रीवस्थिरोराज्यप्रद:॥ 
जटायुषो ग्नि दातार: । धीरोदत्तगुणोत्तर : ॥ 

सिंहल द्वीप ध्वंशनम् । सुबद्धे सेतु :सागरम्  ॥  
द्वितीय सौमित्रि लक्ष्मण: । प्रहतेन्द्रजिता राघव : ॥ 

विराध दुषण त्रिशरो S रि: । दशग्रीव शिरो हर: हरि: ॥ 
पौलत्स्य वंश कृन्तन: । कुम्भकर्ण च रावणिध्न :॥ 

परं ज्योति: परं धाम । पराकाशो परोत्पर : ॥ 
परेशोपारो पारग: । सर्वभूतात्मक: शिवा ॥  

जाग दीछित पुुरुख भेष गहे हस्त मृग शृंग । 
पद्म लोचन पद्म चरन सत्रुहन भयऊ भृंग ॥ 

शनिवार, १९ दिसंबर, २०१५                                                                               

हरैं पीर जो प्रनताजन के  । सत्रुहन सो अभिराम नयनके ॥ 
साखिहि समुख जब दरसन पाए । हरिदे के सब दुख्ख दूराए ॥ 

हनुमंतहु  दरसिहि रघुनाथा । गिरे चरन बहु अचरज साथा ॥ 
ते औसर ऐसो हर्षाईं । तृषावन्त  जिमि जल दरसाईं ॥ 

जोइ भगत रच्छन हुँत आईं । पुलकित तिन्ह कहे गोसाईं ॥ 
भगतन के सब बिधि कृत पाला । भगवन हेतु जोग सब काला ॥ 

धन्य धन्य हम हे रघुनंदन । एहि औसर भए तुहरे दरसन ॥ 
कृपा सिंधु घ कृपा तिहारी । होहि बिजय कर कटक हमारी ॥ 

जोगिन्हि ध्यान गोचर रघुबर आगत जानि । 
सिव संकर होइँ अगुसर गहे चरन जुग पानि ॥ 

करिहि सुवागत करत प्रनामा । बिनयाबत एहि बचन उचारी ॥ 

हे सरनागत के भय हारी । धनुरु धारि बनचर असुरारी ॥ 

पारब्रम्ह प्रकृति के स्वामी । पुरुष रूप तुम अंतरयामी ॥ 
आपनि अंस कलावतारे। सरजत पालत जग संहारे ॥ 

साजन काल बिधात सरूपा । पालन काल चतुर भुज रूपा ॥ 

प्रलय काल में सर्ब नाउ धर । मोर रूप में भयो साखि हर ॥ 

में भगत कृतत उपकारा । बाधत तुहरे काज बिगारा ॥ 

दया सील हे दीन दयालू । छिमा मोर अपराध कृपालू  ॥ 

साँच करन कहि आपनी मो सों एहि कृत होइ । 
भगवन ता संगत अबरु मोए दोष न कोइ ॥ 

सोमवार, २१ दिसंबर, २०१५                                                                            

जानतहुँ प्रभो तोर प्रभाउब । रच्छन भगत इहाँ मैं आउब ॥ 
कहे संभु पुनि नत सिरु संगा । पुरब काल भयऊ ए पसंगा ॥ 

एकु समऊ सुनु यहु महराई । छपा नदिहि तट आन  न्हाई ॥ 
उजेनि नगरि कलस महकाला । करिहि तपस्या कठिन कराला ॥ 

धरनिहि भर के तपो निधानी । निरख तासु तप अचरज मानीं ॥ 
निरखत तपरत नृप तेहि समउ । मोरेउ मन बहु प्रमुदित भयउ ॥ 

बर दायन मम कर बढ़ि आईं ।  बोलेउ ताहि करत बड़ाई ॥ 
तुहरे तप परिपूरन होईं । मँगो भूप मो सों बर कोई ॥ 

सुरपुर के अखंड  राज मँगे भूप बर माहि । 
तासु कथनानुहार के बढे हस्त बर दाहि ॥ 

मंगलवार, २२ दिसंबर, २०१५                                                                             

तदनन्तर प्रभु मैं कहि पारें । होए देवपुर राज तिहारे ॥ 
अवधेसु के मेधीअ बाहिहिं । सैन सहित तापुर जब आहिहिं ॥ 

तब लग कृत तुहरे हित पाही । यह  सिउ सुरपुर बसति बसाही ॥ 
एहि भाँति बर दान मैं दायउँ । दिया बचन ता संग बँधायउँ ॥ 

आयउ अजहुँ समउ सो भगवन ।  सुत स्वजन सहित सो स्यंदन ॥ 
नृप तव चरन समर्पन करिहि । बंदत भव सिंधु पार उतरहिं॥ 

तब सिव सों बोले रघुराई । देवन्हि धरम भगत भलाई ॥ 
एही वसर जस रखिहउ राई । भले काज भी तुहरे ताईं ॥ 

हर के हरिदय होइँ हरि हरि हरिदै हर होइँ । 
हम दुनहु के बीच परस्पर अंतर भेद न कोइ ॥ 

बुधवार, २३ दिसंबर, २०१५                                                                          

को मूरख मलीन मति जाकी । करें भेद मुख दीठ न वाकी ॥ 
धूप किरन जिमि किरनहि धूपा । दरसित हम तिमि एक सम रूपा ॥ 

हरि हर बीच भेद जो राखा ।  होंहि तासु लोचन बिनु लाखा ॥ 
अहहीं महादेउ जो तोरे । धर्मी पुरुख भगत सो मोरे ॥ 

जैसेउ मोर चरन जुहारें । परत बिनत सो चरन  तिहारे  ॥ 
कहत शेष हे सुबुध सुजाना । रघुबीर बचनन्हि दे काना ॥ 

परसादि सों सिउ भगवंता । जिअ हीन जिअ करिहिं जीयन्ता ॥ 
बाण पीरित बीर मनि संगा । भयउ सचेत सकल चतुरंगा ॥ 

रथारोहि कि पदचर हो हितू कर हो कि हेत ।  

एहि बिधि भूपत सुत सहित सब जन भयउ सचेत ॥  


 शुक्रवार, २५ दिसंबर, २०१५                                                                      


तदनन्तर हे वात्स्यायन । धन्य धन्य सो सुरपुर राजन ॥ 
जोग नीठ कि तपोबल ताईं । केहि भाँति दुर्लभ गोसाईं ॥ 

जोगि जान जिन्ह दरस न पावा । तिन्हनि जगजीवन दरसावा ॥ 
दरस समुख भगवन श्री रामा । कुटुम सहित निप करिहि प्रनामा ॥ 

परिहि पदुम चरनन सब कोई । गहे असीर कृतारथ होईं ॥ 
मानवाकार देही गही के । भयउ सफल जीवन सबहीं के ॥ 

सारद सेष ब्रम्हादि सहिता । भयउ देवन्हि केर पूजिता ॥ 
सत्रुहन हनुमन सरिस सुजाना । करिअहि नित जिनके जस गाना ॥ 

तेहि रघुबर चरन सिरु नाईं । अरपिहि अस्व बीर मनि राई ॥ 

जानि निज भगत अनुकूल, ससिधर कहि अनुहारि । 
की समर्पित सकल राज अरु जुग कर पग धारि ॥  

सुनु बिप्रबर बहोरि रघुनाथा । हसित बिहर्षित रिपुदल साथा ॥ 
निज सेवक सों वन्दित होहीं । मंजुल मनिमय रथावरोही ॥ 

होत पीठासीत् भगवाना । छन माहि भए अन्तरध्याना ॥ 
जगवन्दित  रामहि जगजीवन । समझिहु न ताहि मनुज सधारन ॥ 

जल में थल में अम्बर तल में । भगवन ब्यापित चलाचल में ॥ 
सबके अंत: करन निवासित । श्रीबर रूप स्वयं प्रकासित ॥ 

कहेउ बचन सन पन पुराए । संकर संभुहु चरन बहुराए ॥ 
माँगत बिदा चलन जब लागे । कहत कहत ए ठाढ़ भए आगे ॥ 

राजन दुर्गम जगत में दुर्लभ बस्तु न कोइ । 
एकु रघुनंदन के सरन सबते दुर्लभ होइ ॥ 















































  



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