Friday, 17 July 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३७ ॥ -----

शुक्रवार, १७ जुलाई, २०१५                                                               

बसेउ तहँ हरिभगत बिभीषन । बिप्र रूप धर गयउ पहिं हनुमन ।। 
दिए निज परिचय करे मिताई । हरिहिय सिय कहँ पूछ बुझाई ॥ 

कहए रहहि एक बाटि असोका ।  सोइ रूप गत मात बिलोका ॥ 
परम दुखी भा मुख अति  दीना । चरन नयन निज हिय पिय  लीना ॥ 

आगत रावन किए अपमाना । गयउ कहत दुर्बादन नाना ॥ 
गुंठे पवन सुत पल्लउ  पारे  । रघुपति दिए मुदरी सहुँ डारे ॥ 

चकित चितब मुदरी पहचानी । आन कपिहि कहि सकल कहानी ॥ 
जान हरिजन गहन भइ प्रीती । प्रभु सँदेसु गह बाढ़ि प्रतीती ॥ 

बरन बरन लागिहि  घन सरिसा । बिरमन बारिद बन बन बरिसा ॥ 
नयन पलक कोपल जल पूरे । बिरह ब्याकुल फूर न फूरे ॥ 

सजल सरोरुह नयन कपि कहे मातु धरु धीर । 
मारि निसिचर लिए जावन अइहहिं इहँ रघुबीर ॥ 

शनिवार, १८ जुलाई, २०१५                                                                      

 उदर अतिसय छुधा जब जागे । लिए आयसु फल तोरैं लागे ॥ 
सकल बाटिका देइ उजारे । मर्द मर्द निसिचर संघारे ॥ 

रखिया पुकार सुनि जब  काना । दनुपति पठए बिकट भट नाना ॥ 
आए समुख तब अच्छ कुमारा । गरज मह धुनि बिटप दै मारा ॥ 

सुत बध सुनि घन नाद पठावा । कहँ कपिहि कह बाँधि लै आवा ॥ 
एक पतंग सों  दूज पतंगा । भिरे अस घन गरज कपि संगा ॥ 

देखि ब्रम्हसर मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधसि लिए गयऊ ॥ 
कपिहि बिहँस अस कहे  दसानन । मारिहु मोर सुत केहि कारन ॥ 

लगे भूख त खायउँ मैं बाटिक तरु फर तोर । 
मोहि मारि  त मैं मार, तामें दोषु न मोर ॥ 

रविवार, १९ जुलाई, २०१५                                                                            
पूछत रे तुअ कहँ के  भूता । कहे कपि मैं राम के दूता ॥ 
करुँ बिनती अब बेर न कीजौ । सौंप रघुपति छाँड़ सिय दीजौ ॥ 

हित बत कहत बहुँत समुझायो ।दसमुख बिहँसि बिहँसि बिहुरायो ॥ 
मसक रूप कपि देइ ग्याना ।  खिसिअ कहि  तव हरिहु मैं प्राना ॥ 

आए विभीषन भ्रात प्रबोधा । मारिहु दूत ए नीति बिरोधा ॥ 
बाँधि पूँछ पुनि अगन धराईं ।नगर फेरि सब बहुं बिहसाईं ॥ 

चलत मरुत करि देह बिसाला । भवन भवन चढ़ि धरइ ज्वाला ॥ 
पूँछ अनल यह दूत न होई । दिव्य सरूप देव कहँ  कोई ॥ 

सकल सिंहल धू धू करि कूदि सिंधु मझारि । 
आन सहुँ सिय चूड़ामनि कपि कर देइ उतारि ॥ 

 सोमवार, २० जुलाई, २०१५                                                                       

करिहु नाइ सिर  नाथ प्रनामा । कहिहु सिया को छन छन जामा ॥ 
अजहुँ प्रभो लए गयउ न मोही । मोरि देह पुनि प्रान न होही ॥ 

अजर  अमर गुन निधि बरदाना । दै जनि कर हनुमंत पयाना ।। 
पार सिंधु  कपिन्ह पहिं आवा । सबहि के जिअ जनम नव पावा ॥ 

चले पुलक सब सुगींव पासा । करे सोइ कपि किए जस आसा ॥ 
गयउ सकल भेटिहि रघुवंता । करे काज पूरन हनुमंता ॥ 

मातु देइ चूड़ामनि दाईं । लेवत रघुपत उर भरि लाईं ॥ 
पूछि हनुमत  भरे निज छाँती । रहहि सीता कहौ किमि भाँती । 

तासु बिपति तहँ बिनु भलि जानिअ । बोलि हनुमत बेगि लए आनिअ ॥ 
महबलि बानर भलक बरूथा । जोड़े सैन जोग भट जूथा ॥ 

राम कृपा बल पाए कपि, भयऊ बृहद बिहंग । 
गगन महि इच्छा चरनी चले राम लिए संग ॥ 

मंगलवार, २१ जुलाई, २०१५                                                                

आनि अनी तट ताकिहि लंका । रहए तहाँ राकस मन संका ।। 
मंदोदरी कहए भय भीता । तव कुल कमल सीत निसि सीता ॥ 

 सुनहु  नाथ दीन्हौ फिराहू । अट्टाहस करए बीस बाहू  ॥ 
कहउँ तात  निज मति अनुरूपा । प्रगासिहि मनुज रूप जग भूपा ॥ 

ब्रम्ह अनामय अज भगवंता । ब्यापक अजित अनादि अनंता ॥ 
कहँ बिभीषन नीति हितकारी । रिपु महि मंडन कहत बिसारी ॥ 

मालवंत एकु सचिउ सयाना ।  दरप ते हि कर कहा न माना ॥

सचिव बाद गुरु बोलहि त्रासा । राज धर्म तन बेगिहि नासा ॥ 

दसमुख संग बनी एहि बाता । अनुज गाहे पद मारिहि लाता ॥ 
साधु  अमान सभा बस काला । गयउ गगन चर सरन कृपाला ॥ 

सरनागत निरखत कपिहि  जानि कोउ रिपु दूत । 
कहु सखा बूझि ए काहा, कहँ प्रभु सभा अहूत ॥  

बुधवार, २२ जुलाई, २०१५                                                           

अधम भेदि सठ कहए कपीसा । छल छिद्र भाव पठए दस सीसा ॥ 
भेदि  हो कि सभीत सरनाई ॥ कहैं प्रभो कपि लेइ अनाईं ॥ 

दरस राम छबि धाम बिसेखे । ठटुकि बिभीषन एकटक देखे ॥ 
रघुबर मैं दसमुख कर भाई । कोमल कहत चरन  सिरु नाईं ॥ 

उठेउ  प्रभु तुर कंठ लगावा । आप बीति सब कही सुनावा ॥ 
परिहरि जो नै  नीति निपूना । होत  कुनै सो दिन दिन दूना ॥ 

बहुरि  तकत प्रभु जलधि गभीरा । पूछे तरिअ केहि बिधि बीरा ॥ 
बिनय बरिअ अरु करिए निहोरे । कहहि उपाउ रहिए कर जोरे ॥ 

सागर तुहारे कुलगुर होई । बिभीषन बचन प्रभु सुत पोईं ॥ 
आईटी दसमुख पिछु दूत पठायो । मारैं मरकट लखन छड़ायो ॥ 

दया लगे फिरा  पुनि कर देइ लखन संदेस ।  
रिपु कटक बल बाध कहे,  नमत सीस  लंकेस ॥ 

बृहस्पतिवार,  २३ जुलाई, २०१५                                                           
धरे पाति किए चरन प्रनामा । बिहसि दसानन लिए कर बामा ॥ 
लखन बिनय बत कहत बखाना । तव कुल नासक तव अभिमाना ॥ 

देंन सिआ  दूतक कहि पारा । कोपत कीन्ह चरन प्रहारा ॥ 
इत प्रभु जलधि समुख कर जोरे । भयऊ  सो जड़ मानि न थोरे ॥ 

करत करत बिरते दिन तीना । रघुनायक भए कोपु अधीना ॥ 
जल सोषन कर चापु चढ़ावा । सभ्य सिंधु जुगकर सहुँ आवा ॥ 

नाथ नील नल कपि दुहु भाई  । परस तिन्ह  के गिरि तरियाई ॥ 
परस पाषान सेतु बँधाइब । ता चढ़ तरिअ तीर पर जाइब ॥ 

कह उपाय मन भाय यह नत सिरु सिंधु सिधाए । 
दानव दमन रघुबर मन अब  किछु संसय नाए ॥ 

स्पष्टीकरण : -छिद्र युक्त पाषाण के  भार से पानी का भार  अधिक होता है  उनके तैरने का यही वैज्ञानिक आधार था ॥ 

शुक्रवार, २४ जुलाई, २०१५                                                                                  

 बहुरि बिलम नहि किए रघुराई  ।  सेतु प्रजास करिअ दुहु भाई ॥ 
दिए ग्यान गुन  कृपा निधाना  । तर गिरि  तोय तरे पाषाना ॥ 

चल भल्लुक बिपुल कपि जूहा । आने गिरिन्ह बिटप समूहा ॥ 

 सेल बिसाल देहि कर दानी  ।  रचहि सेतु  नल नीलहि पानी ॥ 

 सुदृढ़ सुन्दर रचना बिलोके । बोलि कृपा निधि गद गद होके ॥ 

 थाप लिंग हर पूजन  करिहउँ  । पार गमनन चरन  पथ धरिहउँ । 

मालवंत सहि सुन  कपीसा ।  पठा  दूत लिए आनि  मुनीसा ॥  

 जाप जपत हर हर मह देबा । थाप लिंग करि पूजन सेबा ॥ 

बंधे सेतु जल सिंधु अपारा । देखि चढ़ी रघुबर बिस्तारा ।। 

मकर निकर जलचर समुदाई । होहि प्रगस दरसन  रघुराई  ॥ 

 नाउ धरी हरि तीर तीर रहँ बूर आनहि बोरहीं । 
कहि  न  जाइ कपि जूह भीर तहँ  उपल बोहित हो रही ॥ 
बाँध्यो पयोनिधि नीरनिधि जलधि उदधि साँचही ।
भोर बिकल भय बिहसि दसानन  कपि भलुक दस पाँचही ॥ 

भै कम्पित मंदोदरी कहँ लें चरन बहोर  । 

चाहिअ सौंपु जानकी, जौं पिउ मानहु मोर  

शनिवार २५ जुलाई, २०१५                                                                           


गहि पद  गहि अस गहबर गाता । हरि भजि अचल होत अहिवाता ॥ 
देखि प्रिया मन  भय जब जाना । कला बिबस उपजे अभिमाना ॥ 

मैं मैं करि कछु केहि न प्रबोधा । जानिहि साथ निज जग जै जोधा ॥ 
आए सभा प्रहस्त कर जोरी । चातुकरि मंत्रिन्हि मति थोरी ॥ 

तात नीति तव राज बिरोधहि । पुनि हितकर ने नीति प्रबोधहि ॥ 
कोपत दसमुख कह सुत ताईं । कहु सठ आयउ केहि सिखाई ॥ 

बैठ जाए पुनि भवन बिलासा । रिपु सिर पर भय सोच न त्रासा ॥ 
यहां सुबेल सेल अति भीरा । सैन  सहित उतरे रघुबीरा ॥ 

चाप छाँड़ेसि सर गिरइँ मुकुट ताटंक । 
देखि महरस भंग भयो रावन सभा ससंक ॥ 

रविवार, २६ जुलाई, २०१५                                                                                   
मंदोदरी उर सोच  बसाए ।   प्रानपति प्रभु सन बयरु बँधाए ॥ 
 इत असगुन उत कपि कर भीरा । करिअ बिनती नयन भर नीरा  ।। 

रघुबर भगवद रूप बखानी । बिहँसि दनुपत मोह  बल जानी ॥ 
नारि सुभाउ साँच सब भासैं । आठ अगुन उर सदा निबासै ॥ 

 जगे राम इत भा भिनसारे । पूछी  सचिवनि सभा सँभारे ॥ 
जामवंत एही मत कहि पारा । पठाइब दूत बालि कुमारा ॥ 

चरन सीस धरि सहज असंका । चला बीर रन बांकुर लंका ॥ 
पैठत दसमुख तनै हँकारी । गहि पद भांवर देइ कचारी ॥ 

कपिकुंजरगहि आन लिए, निसिचर दसमुख सोहि ॥ 
देखि अंगद सम्मुख जस कज्जल गिरि को होंहि ॥ 

मंगलवार, २८ जुलाई , २०१५                                                                     

कहि दसमुख तैं कहँ के बन्दर । मैं रघुबीर दूत दसकंधर ॥ 
होहि तात मम तोर हिताई । हित कारन तव चहहुँ भलाई ॥ 

जनक सुता सादर करि आगेँ । तजत मान भय हरि  पद लागैं ॥ 
बालि  तनय बहु भाँति प्रबोधे । काल बिबस सो कछु नहि बोधे ॥ 

उलट तासु परिचय जब जाना । कहा बंस बन अगन समाना ।। 
हम कुल घालक कहि तव साँचिहि  । अंध बधिर ऐसेउ बाँचिहि ॥ 

करिहु अपकृत हरिहु पर दारा । कुल नासक ए  करम तिहारा ॥
दिए  उतरु दससीस  करि क्रोधा । मो सों भिरिहि कवन बड़ जोधा ॥ 

बन गोचर कि बिरह बल हीना । जल्पसि जड़ कपि मोर अधीना ॥ 
दरसे न कछु रजस जिन रसिही । लघुता माझहि प्रभुता बसिहीं ॥ 

प्रीति बिरोध समान सों करिए नीति अस आहि । 
मृगपति बधि मेढुकन्हि जौं कहइ को भल ताहि ॥ 

बुधवार २९ जुलाई, २०१५                                                                    

जानब कपि हँसिहौ न दससीसा । जारि नगर तव एक ही कीसा ॥ 
बानर जाति भगत गोसाइहिं । तव मुख प्रभु गन कस न कहाइहिं ॥ 

एकै सुभट तव माह बलवाना ।दरसिहि अबरु न  तासु समाना ।। 
कवन रावन  बजाइब गाला ।  पितहि जितन एक गयउ पताला ॥ 

कहउँ सकुच को रहि एक काखा । ते कवन सत बडिहु तजि भाखा ॥ 
बीस भुज धर बीर जग जाना । कहसि लघुत नर करसि बखाना ॥ 

सूर न कहाब एहि  बत संगा । भार बहहिं खर जरिहि पतंगा ॥ 
हँसिहि दनुप कहि कहि दुर्बादा ॥ लघु मुख  अंगद बहुंत बिबादा ॥ 

बहुरि भारि दुहु भुज दंड तमकि देइ महि मारि । 

सभा माझ पन करि चरन, टारि गयऊ न टारि ॥  

बृहस्पतिवार, ३० जुलाई, २०१५                                                                        

इंद्रजीत सम बीर अनेका । झपटहि करि बल टरै न टेका ॥ 
बैठिहि सिर धर कर सब  हारे । उठा आप कपि केर हँकारे ॥ 

तोर उबार  रघुबर पद धरे । करत तेजहत  कहत किए परे ॥ 
सिंघासन  तब केहि सुहावा  । होत बिमुख जब मान बिहावा ॥ 

रिपु मद मथि  मत नीति अनेका । कहि कपि  सठ मति मान न ऐका ॥ 
गहे नयन जल हरि पद कुंजा । बहुरि धरषि कपि रिपु बल पुंजा ।। 

साँझ भवन दसकंधर आवा । प्रिया बदहि गहि चरन मनावा ॥ 
जरि पुर तुहरी हार पुकारहि । तासु कहब दसमुख न बिचारहि ॥ 

कपीस बिभीसन रिछपति रिपु बिचार जब पाए । 
जथाजोग जोगत  पाल चौगुट कटकु बनाए ॥ 

शुक्रवार, ३१ जुलाई, २०१५                                                                         

हरष रघुनाथ चरन सिरु नाए । गहे गिरि स्खर बीर सब धाए ॥ 
घटाटोप करि घेरिहि लंका । केहरिनाद बजावहि डंका ॥ 

कीस रूप धर काल पुकारा । सठ मति अपने समुझि  अहारा ॥ 
भिंडिपाल कर परसु प्रचंडा ।   चले निसाचर धर गिरखंडा ॥   

चढ़े बीर  कँगूरन्हि  कोटा । को एक एकहि कोउ  एक जोटा ॥ 
कोटि निसाचर नयन कोपत निहारि  । भिरिहि सुभट सब पचार पचारि ॥ 

नान आयुध करे ब्याकुल । भागिहि कपि बाताली तृन तुल ॥ 
भंजेउ  रथ पच्छिम द्वारा । मेघनाथ  हनुमत कर हारा ॥ 

 गहीरात काल घन गर्जहि गगन  बिबिध बिधि गोला चले  । 
सुनी मेघनाद गढ़ु घेर घिरे तमक  दुर्ग ते निकले  ॥ 
धनवंत कौसलकंत लोक ख्यात दुहु भ्रात कहाँ । 
नील नल अंगद हनुमंत द्रोही सो मम तात कहाँ ॥ 
  
करन लग रसन तान अस कहा रोष रस पाग । 
निकर निकर सर चलिहि जस चलिहि सपुच्छल नाग ।। 
         














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