Thursday, 17 September 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४० ।। -----

बुधवार, १६ सितम्बर, २०१५                                                                       

वात्स्यायन  महिमन साथा । बोले मृदुलित हे अहि नाथा ॥ 
हरन भगत कर  पीर दुखारा । किए कीरत जो बिबिध प्रकारा ॥ 

श्रवण कथा सो रघुनन्दन की । पूरन होत न मोरे मन की ॥ 
कथा कंज तुम कलित कमंडल । कंठ तालु तल करिहैं कल कल ॥ 

भयउ पिपास मोर जिग्यासा । तासु बिनहि साँसत मम साँसा ॥ 
जस जस तुम्ह  कंज कर दाईं । बढे पिपास अधिकाधिकाई ॥ 

धन्य धन्य सो बेद निधेई ।  जग जीवन जन दरसन देई ॥ 
बिनास धरमि देहि परिहाई  । तजिअ  प्रान सौमुख रघुराई ॥ 

नाथ कृपाँ कर मोह जनावा । मेधि है पुनि केहि पथ धावा ॥ 
गयउ कहु कहँ गहे कर केही । उपमातीत रमा प्रिय जेही ॥ 

किए आरती आरतिहर जिनके चरन जुहार । 
ऐसो कंत  के कीरति को बिध गहि बिस्तार ॥

बृहस्पतिवार, १७ सितम्बर, २०१५                                                                  

ससिकर सम मुनि गिरा तिहारी । रुचबर पूछ बहु मनहारी ॥ 
धीमन धुरीन धर्म धाम के । जग मंगल गुन ग्राम राम के ॥ 

सुनिहु तुम्ह बहु देइ ध्याना । मानिहु मुनि जस देइ न काना ॥ 
लाह लहन बस अनभिग सोहीं । बारहि बार पूछेउ मोही ॥ 

सुभग कथा सो सुनु अब आगे । अलस प्रभात सूर जब जागे ॥ 
केहरि नाद बीर बहुतेरे । मेधि तुरग करि ताके घेरे ॥ 

महर्षि आश्रम सों निकसावा । फिरत नर्बदा तट पहिं आवा ॥ 
देऊरचित नगर सुर नाउब । भंवर मनोहर पथ तहँ आउब ॥ 

फटिक मनि भीतिका धरि जहँ गहगहि गेह दुआरि । 
अधबर पाँख गवाँख लिए लाख रहइँ फुरबारि ॥ 

शुक्रवार, १८ सितम्बर, २०१५                                                                      

बास बास जस रजत अटाला । पास देस गह अतिगौ साला ॥ 
कंठनि जब कल कंकनि बाजे । रागिह जिमि छहुँ राग बिराजे ॥ 

गहे गोप गन गोपुर नाना । सो रचना नहि जाइ बखाना ॥ 
गचि पचि गज मुकुता के पाँती । खच रचि हरिन मनिक बहु भाँती ॥ 

 गहे गगन रस खन सस माला  । कर्षन सन सम्पन सब काला ॥ 
पद पद निर्झर नदि  नद ताला । गगन परसित परबत बिसाला ॥ 

रहैं बीर मनि नगर नरेसू  । धर्म सील तै  अघ नहि लेसू ॥ 
एक सुपूत ते राउ  के आही । नाऊ  रुक्माङ्ग अस ताही ॥ 

अमित बिक्रम अतुल अतिबल अचल सूर संग्राम । 
अमित्र घात तापत सदा देइ बिजअ परिनाम ॥ 

शनिवार, १९  सितम्बर, २०१५                                                    

एक बार रमनीअ सँग माही ।  सो नृप सुत प्रमोद बन आही ॥ 
मुख पुर मधुर मनोहर रागा ।  प्रमुदित मन बन बिहरन लागा ॥ 

तेहि अवसर बर बुधवंता के  । राजधिराज जगत कंता के  ॥ 
सुहसील राज बाह बिसेसा । सोइ प्रमुद बन देस प्रबेसा ॥ 

बाँध सिख बदन सुबरन पाँती । दमकिहि देहि धौलगिरि भाँती ॥ 
चंवर चामि कर  चारु चरचिता । तासों दरसिहि कछुक हरिता ॥ 

गहि गति अस सो जमणिमन् जमन  । करिहि बिनिंदित जमनगत पवन ॥
 हरिद असम सम  ग्रास मुख धरे । तासु सरूप कौतुहल भरे ॥

मंगल मौली  मण्डलित  सोहित सुबरन पाँति । 
सब रमनी चित्रबत भई चितबत चित्रकृत  कांति ॥ 

रविवार, २१ सितम्बर, २०१५                                                                                   

निरखत ताहि नृप सुत  रमनिआ । बोलिहि मधुरिम कहए ए बतियाँ ॥ 
हिरन्मय पाति भाल बँधाए । तासु बिकिरन रबि किरन  लजाए ॥ 

अलौकिकलोक  नयनाभिरामा । धौल बरन तन  करन स्यामा ॥ 
मनोज ओज मुख अति मन मोहि । अस सुन्दर है केहि कर होहि ॥ 

कोटि रतन कृत कलित कलापू । सही किरन सो गहि कर आपू ॥ 
लीलाबन चितबन् बिलसावा । कुंवर कमनीअ नयन लसावा ॥ 

श्रुत तिय बचन मुदित मन साथा । लीलहिं गहि कर एक ही हाथा ॥ 
बँध्यो पाति करज धर देखे । सुघर सुथर किछु आखर लेखे  ॥ 

बल बल करतल कास कर लसए रतन की रासि । 
बाँच बाँच रमनीअ सहुँ उपहासत करि हाँसि ॥ 

सोमवार, २१  सितम्बर २०१५                                                                           

सहचारिनि चकरब चहुँ पासा । राज कुँअरु हँस हँस अस भासा ॥ 
मोरे तात सौर जस होई । तासों  दूसर अबरु न कोई ॥ 

मम पितु रहत जिअत जी ताही । जीतिहि रन  जग अस को नाही ॥ 
सुख सम्पद धन धाम निधाना । महि न को मम तात समाना ॥ 

तापर सो अभिमानी राजा । अहो पाति अस लेख न लाजा ॥
भाल बँधाउब हय दिए हेला । निर्भय निलय नगर भित पेला ॥ 

पिनाकधर गिरिजापति संकर । तासु असीस जाके सिरोपर ॥ 
देउ दनुज निसिचर नर नागहु  । प्रनमत जिन बंदत पद लागहु ॥ 

मनिमय मौलि मुकुट धर चरना । राजधिराज मागेउ सरना ॥ 
बीर बलों मम पितु कर ताईं ।अस्व मेघ मख करिअ सुहाईं ॥ 

भूषन  भूषित बाजि धरि  आनौ भट एहि काल । 
तासु सरन अनुगमन करि बंध्या रह घुड़साल ॥ 

मंगलवार, २२  सितम्बर, २०१५                                                                       

गहे करज हिरण्मई पाँती  ॥ बीरमनि बर तनुज एहि भाँती ॥ 
चलि गहगह गह अगह तुरंगा । आए नगरु निज संगिनि संगा ॥ 

मुदित मीर मन अतिहि उछाहू । लोभिन बिरहा लहि जस लाहू ॥ 
राज स्यंदन बन महुँ पायो । घई किरण मैं आन लवायों ॥ 

बीस बाहु दस सीस बिनासक । अवध अधिराट् रघुकुलनायक ॥ 
राम चन्द्र जाके गोसाईं । लिखितै पतिया भाल बँधाई ॥ 

रामानुज निज सैन बिसाला । अतिबुधि अतिबलि बहु बिकराला ॥ 
चहुँ दिसि रच्छत संगत ताहीं । हेलत आपनि पुर पेलाहीं ॥ 

पतिआ  कही कहाउती कह जब गत पितु सोहि । 
बुधबान महाराज  मन कछुकहि हरष न होहि ॥ 

बुधवार, २३ सितम्बर  २०१५                                                                       


देखिअ नृप निज सुत कर काजा । तेहि प्रसंसत  मन बहु लाजा ॥ 
 कृत कर्तन कीरति जस गायो । चिन्तारत चित सोच समायो ॥ 

यह कलि करतां हरन समाना ।  आपन पो सठ अतिबलि जाना ॥ 
जासु  निकाइ सबहि को नीके । एहि तुरग तेहि बाहुबली के ॥ 

गिरजा गौरी पारबती के । जो प्रीतम प्रिय कंत सती के ॥ 
सो संकर तिन पद सिरु नावा । देउ देउ  मह देउ कहावा ॥ 

बहुरि तेउ भगवन पहि आयो । निज सुत करनिहि कहत जनायो ॥ 
सकल बचन सुनि संभु सुहासे । भूपत हरर हरत अस भासे ॥ 

तुम्हरे बर तनुभव कर भयऊ अद्भुद  काज । 
करिइहि सोइ करतब जस करिअब छत्री समाज ॥ 

बृहस्पतिवार, २४ सितम्बर, २०१५                                                                        

राजधिराज परम बुधवंता । सिंधु सुता प्रिय जग भगवंता ॥ 
जगद जीवन जासु गोसाईं । तेहि मेधि हय हरण अनाईं ॥ 

जासु नाउ जिहजपि जपि  जागी । बिराग राग राग अनुरागी ॥ 
सार रूप जिन बेद बखाना । जो मोरे चित रहए ध्याना ॥ 

ताहि जवन लीन्ह गह किरना  । रन रंगन कीन्ह अपहरना ॥ 
एहि रनाङ्गन सुनु नरनाहा ।होइहि एक एहि बहु बड़ लाहा ॥ 

हमहि भगत करि जिनके सेबा । देहि साखि दरसन सो देबा ॥ 
कामद घन दुःख दावानल के । पैह परस सो चरन कमल के ॥ 

काल प्रबंध सुभाग बस लब्धातिसय सँजोग । 
अजहुँ बहु जतन पूरबक, करिहु जवन के जोग ॥ 

शुक्र /शनि , २५/२६  सितम्बर, २०१५                                                                                            

ऐतक परहु मोहि संदेहा । रामानुज भट जाइ न लेहा ॥ 
जद्यपि रच्छित बहु तुअ ताहीं । तद्यपि बरियात लेइ जाहीं ॥ 

एही हुँत यहु मोरे मत नाहू । दुहु कर जुगत बिनयबत जाहू ॥ 
पुरजन परिजन निज सुत संगा । गहै किरन कर संग तुरंगा ॥ 

राज सहित लए  संत समाजा । दइहौ साँपि किरन रघुराजा ॥ 
चरनारविन्द दरसन कीजो । परस नयन रज सिरु धर लीजो ॥ 

सुनत संभु कर गिरा ग्यानी । कहि भूपति उरझन परि बानी ॥  
हरि  दरसन प्रभु को नहि चहहीं । पर मम छत्री धरम यह कहहीं ॥ 

मानि पुरुष राखत अपनापा । राखै आपनि ट्वेज प्रतापा ॥ 
अतुलित बुद्धि  बिक्रम बल संगा । हुँतै हवन रन होत पतंगा ॥ 

बिनु रन रिपु सरनापन्न को कर चरन गहाए । 
अधीस मैं सो अधमतस अरु कादर कहलाए ॥ 

रविवार, २७ सितम्बर, २०१५                                                                                    

औचट सरनग रिपु उपहासें । पाँवर पॉच कहत अस भासैं ॥ 
अधमी रन रननत भय खावै । सभ्येतर सम सीस झुकावै ॥ 

समुख सैन रामानुज केरी । गहगह गगन बजै रन भेरी ।। 
एहि समउ प्रभु उचित जो होई । जो मम हितकर कहअब सोई ॥ 

मैं जन पाल अरु तुम्ह जग हिता । मैं तुहरे भगत तुम्ह रखिता ॥ 
मोरे करतब करत बिचारा । अस कह प्रभु पुर चितवनिहारा ॥ 

सुनि नृप बत ससि मौलि बिहासे ।घन सम गहन बचन हँस भासे ॥ 
यह हय मम संरच्छक पइहीं । तुम्ह सोन बरियात लए जइहीं ॥ 

कोटि देउ अस बल नहि राखे । तुहरे जुधा जुझावन लाखें ॥ 

  आप रूप अवाईं इहँ जो प्रभु करवहि झाँकि । 
 करिहउँ प्रनमन बिनयबत तासु चरन सिरु राखि ॥ 

सोमवार, २८ सितम्बर, २०१५                                                                          

स्वामि सों सबक रन ठाने । यह करतन को भल नहि माने ॥ 
रनै जोइ सो तो अधमाई । कहबैत मैं यह कृत अन्याई ॥ 

सेष बीर भट मम हेतु हिना । अति अच्छम तृन सम तूल तुहिना ॥ 
धरौ चरन तुअहू रन खेता । अजहुँ भया मैं तुहरा हेता ॥ 

मोर रहत अस बीर न अहहीं  । बलात बाजि रसन लए गहहीं ॥ 
आएँ चहै त्रयलोकी नाथा । करब न सकिहइँ कछु मम साथा ॥ 

जोग पानि तब कह जनपाला । तुम रच्छक तुम मम परिपाला ॥ 
छत्री हेतु यह भल मत होइहि । जस तुम कहिहउ करिहउँ सोइहि ॥ 

इत रघुबर कर सैन दल, फिरत नगर चहुँ फेर । 
देइ मग पग चिन्ह चरत मेधि तुरग रहँ हेर ॥  

मंगलवार, २९ सितम्बर, २०१५                                                                     

हेरइ हेर मिलै कहुँ नाही । रामानुजहु ऐतेक माही ॥ 
आन लेइ निज सैन बिसाला । गहे सैनि बहु कोटि कराला ॥ 

है हुँत सबन्हि पूछ बुझाहीं  । हेरे हैहर मिलिहि कि नाहीं ॥ 
सुबरनी पतिका माथ बँधाए । सो मम दीठ किन दरसिहि नाए ॥ 

देइ उतरु का सूझ न आवै ।हय अनुचर नहि कहि सकुचावै ॥ 
बहोरि बिनै बचन के साथा । कहे नाथ सब अवनत माथा ॥ 

तुर तुरंग सम तूल तुरंगा । भय उडुगन जिमि गगन बिहंगा ॥ 
हमहि सो कतहुँ दरस न देही । करिअहिं हरन सघन बन केही ॥ 

धरा गगन पव पलन के निरवन देइ अभास । 
कहि अस सकल दल गंजन फेर नयन चहुँ पास ॥ 

बुधवार, ३० सितम्बर, २०१५                                                                               

सिथिर बदन अनुचर  अलगाई । बहुरि सुमति सों पूछ बुझाईं ॥ 
इहाँ निबासिहि को नरनाहू । हमरे हय होइहि कस लाहू ॥ 

करै परहन जेहि हय आजू । गहै केतक सैन सो राजू ॥ 
केहि के बल मन भए न संका । ठानि  बजावन को रन डंका ॥ 

एहि बिधि सत्रुहन सह महमाता । निगदित मंतु करत रहि बाता ॥ 
देवर्षि नारद ऐतक माहि । रन कौतुक तहाँ दरसन आहि ॥ 

रामानुज पुनि भयउ अगूता । किए आगत सत्कार बहूँता ॥ 
बतकहि मैं जस रह गोसाईं । रहे सो तेसेउ कुसलाई ॥ 

पलकन पल्लव पाँवड़े, श्रुति रंजन करि बानि । 
हय तैं सादर प्रस्न किए सौमुख जुग दुहु पानि ॥ 

    

 

















             

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