Wednesday, 2 September 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३९ ॥ -----

बुधवार ०२ सितम्बर २०१५                                                                           
सुरतत पुनि पुनि मुनि के बचना । मिटी गयो कुतरक के रचना ॥  
मैं प्रनमत सिरु दुहु कर जोरें । तदनन्तर मुनि चरन बहोरें ॥ 


तासु  कृपा अघ ओघ नसायो । हरिपद बंदन बिधि मैं पायो ॥ 
भगवन मम मन बसियो जब ते ।  रहँ तिनके नित चिंतन तब ते ॥ 

राम नाम एक जगत  प्रतापा । करात गान मोरे मुख जापा ॥ 
करि करि राम नाम गुन गायन । करत गयउँ पावन अन्यान ॥ 

भगवन दरसन नयन हिलोरे । तासंग पुलक उठे मन मोरे ॥ 
गुन गन गायन मम चित चोरे । तिनके सुमिरन सुखद न थोरे ॥ 

अहो धन्य कृतकृत्य मैं  ए मोर परम सुभाग । 
दीठी दरपन हरि छटा हरिदय में अनुराग ॥ 

जो हरि के दरसन अभिलासा । होही अवसि पूरन यह आसा ॥ 
परम मनोहर नर नारायन । सबहि भाँति तिन  भजियो रे मन ॥ 

जल सीकर महि रज गिनि जाहीं ।रघुपति चरित न बरनि सिराहीं ॥ 
बिमल कथा यह हरिपद दायन । भगति होइ सो सुनि अनपायन ॥ (उ. का. दो. ५२ )

भवसिंधु चहँ पार जो जावा । राम कथा ता  कहँ दृढ नावा ॥ 
महमन अब कहियो तुम मोही । इहँ तुहरे आगम कस  होहीं ॥ 

होइहि को सो धर्म निधाना । तुरग मेध जो मख अनुठाना ॥ 
यह सब कहि बत मोहि जनइहो । मेधि तुरग पुनि रच्छन जइहो ॥ 

सुमिरिहु हरिपद बारहि बारा । होही मनोरथ सफल तिहारा ॥ 
 मुनि के बचन सुनिहिजो कोई । परम सुखद मन अचरजु होई ॥ 

बिनीत मृदुलित बानि  में कही सबहि कर जोए । 
मुनिबर दरसन पैह के  तन मन पावन होए ॥ 

शुक्रवार, ०४ सितम्बर, २०१५                                                                             

कलिमल समन मनोमल हरनिहु । राम कथा नित मुनि तुम बरनिहु ॥  
जो किछु संसय पूछ बुझावा । सोई सबहि हम कहत जनावा ॥ 

सौनौ जथारथ बचन सप्रीती ।कुम्बुज  कर यह सुन्दर  नीती ।। 
मुनिबर के मुख कहि अनुहारे । करिहि महामख  नाथ हमारे ॥ 

हम सैबिता सेवक जिन्ह के । ए मेधिआ तुर तुरग तिन्ह के ॥ 
चारितु चरत चरत इहँ आवा । मुनि तव आश्रम हमहि डिठावा ॥ 

एहि हमरे आ गमनु प्रसंगा । कृपा करत कीजो हृद्यंगा ॥ 
अगंतुक के बचन मनभावा । श्रुतत मुनिरु मन परम उछावा  ॥ 

कहत गयउ मुख  सुधि बुधि भूले । मोर  मनोरथ तरु फल फूले ॥ 
जेहि हेतु जनि मोहि जनाई । लहउ अजहुँ सो पूरन ताईं ॥ 

मम कर सोहि रचित हवन जेतक हविहुति जोहिं । 
तेहि अगनहोत के फल अजहुँ मिलेइब मोहि ॥ 

जासु दरसन नयन  पथ जोहीँ । प्रगस रूप सो सौमुख होंही ॥ 
रह अजहुँ सो समउ अति थोरे । चरण कमल कर परसिहि मोरे ॥  

धन सरूप दरसन जग कंता । दारिद गहत होंहि धनवंता ॥ 
पवन सुत अहह हृदए लगाईं । पूँछिहि छेमकरी मम कुसलाई ॥ 


मोरि अबिचल भगति जब जोखिहि । संत सिरोमनि बहु संतोखिहि ॥ 
आरण्यक गदन कानन पाए । रीझत हनुमत चरण सिरु नाए ॥ 

ब्रम्हरिषि हरी भगत सुजाना कहइ बिनेबत मैं हनुमाना ॥ 
बोधिहौ मोहि मुनिबर कैसे । रघुबर दास चरन रज जैसे ॥ 

ते अवसर हरि भाव भरि सोह रहे हनुमान । 
पुलक उठेउ  मुनि मह रिषि तासु बचन करि कान ॥ 

रविवार ०६ सितम्बर २०१५                                                                    
हहरत हनुमत उरस लगाईं । समउ सनेहु न सो कहि जाई ॥ 
सरसित  सुहृदय भरि भरि आवा । कर्ष नयन जल धार बहावा ॥ 

आनंद सिंधु उर न समाही । उमगि उमगि उम दुहु अवगाही ॥ 
पयस मयूख प्रनत प्रतिमित से । लखित सिथिर कृत चित्र लिखित से ॥ 

हरिपद पदुम प्रीति रहि कूरे । दुहु मन मानस रस  भरभूरे ॥ 
बैठिहि दोउ एकहि एक ताईं । कलिमल हरनि कथा कहि गाईं ॥ 

मुनि रघुनाथ रहेउ ध्यान । हनुमत तब ए गदन निगदाने ॥ 
जो तुम्हरे चरन सिरु नाईं ।मुनि यहु रघुबर कर लघु भाई ॥ 

सीस बिनयबत प्रनत निहारा । सूर सेबित ए भरत कुमारा ॥ 
गन भूसित मंत्री तिन जानिहु । ठाढ़ि सुजन निज आसीर दानिहु ॥ 

यह मह तेजसी भूपति सुबाहु जाके नाम । 
हरि पद पदुम यह भाँवर करिहै तोहि प्रनाम ॥ 

सोमवार, ०७ सितम्बर, २०१५                                                                    

बिमल प्रेम बसिभूत भवानी । रघुबर चरण भगति जिन दानी ॥ 
करिहि पार भव सिंधु अपारा  । राउ सुमद सो चरन जुहारा ॥ 

मेधि तुरग आगम जब जाना  सकल राज हरि चरन प्रदाना ॥ 
सो सत्यबानहु द्विज नाथा । धरे धरनी नाय पद माथा ॥ 

हनुमत आगत परच हिलगाए । मुनिबर सबहि सादर उर लाए ॥ 
पेखि पाहुन मुनिरु प्रिय प्राना । करत स्वागत करि सन्माना ॥ 

कंद मूल फल रुचिकर राखे । अहे छुधित सब रूचि रूचि भाखे ॥ 
सुमित्रा नंदन सहित सुपासी  । रिषिबर आश्रम माहि निवासी ॥ 

प्रात उठे रबिकर रतनाई ।प्रिय संगत अलिकुल अलसाईं  ॥ 
लगए पलकिन्हि लोचन मलिनाए ।  सौच करी नर्बदा अन्हाए ॥ 

जगती जोति नयन लगे जगन लगे सब कोइ । 
अगुसरन सब उद्योगी तमुचर उद्यत होइ ॥ 

बृहस्पतिवार,१० सितम्बर, २०१५                                                              


सत्रुहन चरनन सीस नवाईं । पुनि मुनिबर निज सेबक ताईं ॥ 
सादर सुभग सिबिका बैठाए । पावन  अवध पुर देइ पठाए ॥    

सूर बंस करि जहाँ निवासा । मुनिरु नयन सो नगर सकासा ॥ 
दरसत  दूरहि भर अनुरागे । उतरि चलेउ सिबिका त्यागे ॥   

रघुबर छबि मन दरपन माही । साखिहि दरस पयादहि जाहीं ॥ 
सोहइ चहुँपुर जान समुदायो  । कहि बत कहि श्रुत बहु सुख पायो ॥ 

ता रमनीअ नगरिहि पग राखा । हरि मुख दरसन  मन अभिलाखा ॥ 
तनिक बेर मह मख मंडपु सों । सरजू तट सहुँ बीच बिटप सों ॥ 

निरखिहि नयन रघुनन्दन केरि अनूपम झाँकि । 
दुर्बादल सरिस श्र्री हरि सुभग स्यामल लाखि ॥ 

लावण लोचन दरसिहि कैसे । सरस बदन सरसीरुह जैसे ॥ 
करधन भाग धरे मृग श्रृंगा । करी गुंजन भए भूषन भृंगा ॥ 

ब्यासादि मन महर्षि घेरे । रहँ  बिराजित बीर बहुतेरे ॥ 
भात संग लखमन भुज पासा । जनाकीरनित बास बिलासा ॥ 

माँगए चहँ जो सो कर दाना । दे निधि दीनन दीन निधाना ॥ 
मान कृतारथ आपहिं आपा । मुनि मुख एकु संतोख ब्यापा ॥ 

कहँ भगवन दरसन छबि जोईं । मोर मनोरथ  पूरन होईं ॥ 
निगमागम श्रुति बेद पुराना । बाँचत जिन्ह गहेउँ ग्याना ॥

जब ते हरि दरसन कर कूरे ।  सकल सास्त्र अरथ भए  पूरे ॥ 
एहि कर हरि महिमन मैं जाना । पुनीत समउ अवधपुर आना ॥ 

 भरे हरष ब्रम्हऋषि अस कहँ बहुतक कहिबात । 
ऐसेउ निगदन निगदत भयऊ पुलकित गात ॥ 

अगम अगोचर अबर हुँत जेउ । दूरहि जोगीस सुधिजन तेउ ॥ 
सजल नयन पुलकित तन साथा । गयउ नतपट निकट रघुनाथा ॥  

पहुँच सौमुह अह धन्य कहेउ । मोरे नयन हरि दरस लहेउ ॥ 
आजु नाथ मम साखि बिराजे । सहित सुधित सुधि संत समाजे ।। 

हेल मिलत जग पुंज प्रतापा । करिहउँ बहुतक बात अलापा ॥ 
जस निरमल सुरसरि के पानी । होइहि तस निर्मल मम बानी ॥

जाज्बल मान तपोनिधाना । निज तेज सों आन जब जाना ॥ 
उठेउ जुगत कर रघु कुल केतु । मुनि मनीष के स्वागत हेतु ॥ 

सुरासुर जुगलकर करिहि आरती जिन मंगल गन ग्राम कर । 
परि पदुम चरन करि हृदयाय नमन जिन धर्म धाम प्रनाम कर ॥ 
सोइ जगत गोसाईं दस के नाईं मुनि बर चरननि सीस धरे । 
कहेउ रघुराई  पथ पथ पबिताई  जौ इहँ आपनि चरन  परे ॥ 

जगत  महिपत पद प्रनमत  बिनत जुगत कर देख । 
तपोबिरध मुनि के निलय भरि अनुराग बिसेख ॥ 

शुक्रवार ११ सितम्बर, २०१५                                                            

जान दास आपन मन माही । नहि नहि स्वामि कह सकुचाहीं ॥ 
गहे दुहु कर बरिआत उठाए । निज प्रयतम प्रभु हरषि उर लाए ॥ 

दे मान सन्मान बहु कीन्हि । मणि निरमत बार आसान दीन्हि ॥ 
अतिथि स्वागत बहु सत्कारै । लिए  पयसन  प्रभु चरन  पखारैं ॥ 

चरनोदक सर माथ चढ़ाईं । बोले बानि सनेह सुहाई ॥ 
अजहुँ सकौटुम सेबक संगा । पबित भय मैं जस जल गंगा ॥ 

पुनि देबाधिदेब सो सेईं । मुनि ललाट पट चनदन देईं ॥ 
बहुरी बहुतक मनोहर ताईं  । मधुर गिरा कर कहि गोसाईं ॥ 

यहु मेधीअ मख मंडपु जस तुहरे पथ जोहि । 
आन तव चरन अजहुँ सो अवसिहि पूरन होहि ॥ 

शनिवार, १२ सितम्बर, २०१५                                                                         

मंद मृदुल मधुरस मैं सानी । बोले रिषि हँसि कर अस बानी ॥ 
तुम महि रच्छक तुम सुर राखा । तुम कुल कृत हम तुहरे साखा ॥ 

महिसुर गन के चरन पूजिता । जग हित चिंतक केहु तुम हिता ॥   
जस सत्कृत तुहरे कर होईं । देख करिहि तिन तस सब कोई ॥ 

आन सकल सब लोक स्वामी । होही तुहरे चरन  अनुगामी ॥ 
 भव सागर भरि पाप घनेरे । भगवन चरन  भगति के प्रेरे ॥ 

बेद हीन कि  मूढ़ मति होई । राम नाम सुमिरिहि जो कोई ॥ 
पार गमन करि  पाप तरि जाहि  । सकल काम प्रद परम पद पाहि ॥ 

रामहि अधमोद्धारक रामहि पाप निवार  । 
चहुँ जुग चहुँ श्रुति राम  ते  नाम प्रभाउ अपार ॥ 

राम अधमों के उद्धारक  हैं नाम समस्त जगत का उद्धारक है चारों युग में चारों वेद में राम से  नाम का प्रभाव अधिक है ॥ 

रविवार १३ सितम्बर, २०१५                                                                  

इति कृतं बृत् बेद  इतिहासा । राम नाम सम रतन प्रकासा ॥ 
छाइहि जब अगजग अँधियारा । राम नाम करिहै उजियारा ॥ 

ब्रम्ह हंतक केर जस पापा । रघुबर तबलग गरज ब्यापा ॥ 
हिय सों कंठ रसन अवतरत उजरित रूप जबलग न उच्चरत ॥ 

तुहरे नाउ करै जब गरजन । महापात सरूप गजराजन ॥ 
हेर केर को आन निकाई । श्रुत ते डरपत होत  पलाई ॥ 

पूरबल जब सतजुग रहेऊ । सुरसरि तट बासि रिषि कहेऊ ॥ 
वेद विदुर सुधि सुबुध सुजाना । ताते मुख एहि सुने अगाना ॥ 

पाप के भय तबलग ब्यापे  । जब लग मनहर नाउ न जापै ॥ 
सर्ब निवासित हे जग जीवन ।धन्य भया मैं भए  तव दरसन ॥ 

महामुनि बोलिहि निमगन  बन्दए पद  रघुनाथ । 
सभा सदन सब कहि उठे साधु साधु एक साथ ॥ 

सोमवार, १४ सितम्बर, २०१५                                                                          

सुबुध सचिउ बुधि बिरध समाजे । महर्षि मुनिगन संग बिराजे ॥ 
करिहि प्रभो जब संत समागम  । भयउ अचरज पूरित उपागम ॥ 

हे ब्रम्हं मुनि वात्स्यायन । करिहउँ तव सहुँ वाके बरनन ॥ 
हरि  भगत नहि तुहारे समाना । मोर बचन सुनु देइ ध्याना ॥ 

मुनिबर दरसि सुरति जस रूपा । दरसएँ रघुबर सोइ सरूपा ॥ 
जस  देखेउ चित्त धरि ध्याना । तस देखाउब दिए भगवाना ॥ 

निहारए निहारनहारा । होही उर्स महुँ हरष अपारा ॥ 
तहँ बिराजित महर्षि जेऊ । कहि मनोहर बचन तिन तेऊ ॥ 

सुभग सील मम जस को नाहीं । सुधिज सकल भूमण्डल माहीं ॥ 
बिनयानबत नमत गोसाईं । सिरुनत पूछिहिं मम कुसलाई ॥ 

करे स्वागत बहु सत्कारे । परस परस मम चरन पखारे ॥ 
आजु जगत महु को मम सोई । होए न होइ न होहिं न कोई ॥ 

जाके चरन  सरोज रज  सकल बेद करि सोध । 
किए  मोर पलोवन सोए ब्रम्ह देउ संबोध ॥ 

मंगलवार, १५ सितम्बर, २०१५                                                                        

मोरे चरनोदक पयसाईं । मानिहै पबित आपनी रघुराई ॥ 
मुनि जब कहत रहए ए  प्रसंगे । तबहि  तासु ब्रम्हा भग भंगे ॥ 

अमित तेज तहँ सों निकसायो  । चकचौंहत प्रभु माहि समायो ॥ 
एही बिधि पावनि सरजू तीरा । रहँ मंडपु थित सजन सुधीरा ॥ 

चितबत चितवनि सब चितब रहे । आरन्यक साजुज मुकुति गहे ॥ 
बाजि बहु बजने चहुँ पासा । घन घन धुनि गहगहे अकासा ॥ 

ढोर मजीरु कतहुँ कल बीना । पुरयो संख सदन भए लीना ॥ 
ऐसिहि मुकुति गह न सब कोई । जोगिन्हि हेतु दुर्लभ होई ॥ 

एहि उपागम चितबत भए चित्रवत चितबनिहार । 
रघुनन्दन के चरन सहुँ  बरसे सुमनस बारि ॥ 




 

















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