Thursday, 1 October 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४१ ।। -----

बृहस्पतिवार, ०१ अक्तूबर, २०१५                                                                    

ममहय हेरे हेर न पायो । कतहुँ तोहि कहु दरसन दायो ॥ 
काज कुसल बहु हेरक मोरे । गयऊ मग मग मिलिहि न सोरे ॥ 

नारद बीना बादन साथा । गाँवहि रूचि रूचि भगवन गाथा ॥ 
राम राम जप कहँ सुनु राऊ । अहँ  नगर यह देउपुर नाऊ ॥ 

तहँ जग बिदित बीर मनि राजा । बैभव बिभूति संग बिराजा ॥ 
तासु तनय बिहरन बन आइहि । हिंसत हय सहुँ बिचरत पाइहि ॥ 

हरन हेतु सो गहे किरन कर । समर करन लिए गयौ निज नगर ॥ 
नयन धरे रन पथ महराजू । अजहुँ तुम्ह रन साज समाजू ॥ 

गह बल भारी देइँ हँकारी बर बर समर ब्यसनी । 

ब्यूहित जूह सहित समूह सों  सैन सब भाँति बनी ॥  
अतिकाय अनिप करिहि गर्जन धनबन घन बन गाजिहैँ । 
होइ धमाधम नग बन सो जुझावनि बाजनि बाजिहैं ॥ 

कवलन काल पुकारिया समर बिरध बलबीर । 
राजन धनुधर रनन रन कास लियो कटि तीर ॥ 


शुक्रवार,०२ अक्तूबर, २०१५                                                                                    

अतएव जोग जुझावन साजू । पूरनतस तुम रहौ समाजू ॥ 
रहिहउ अस्थित भू भट जूहा । रचइत सुरुचित सैन ब्यूहा ॥ 

ब्यूहित जूह रहए अभंगा । प्रबसि होए न केहि के संगा ॥ 
बाहु बली बहु बहु बुधवंता । अहहीं एकसम प्रतिसामंता ॥ 

नाहु बाहु जस सिंधु अपारा । अंतहीन जल सम बल घारा ॥ 
तापर बहु बाँकुर अवरूढ़े । पार न भयउ गयउ सो बूढ़े ॥ 

एहि हुँत तासहु सुनु मम भाई । परिहि जुझावन अति कठिनाई ॥ 
तद्यपि तुम सत धर्म अचारी । होहि जयति जय श्री तुम्हारी ॥ 

जगभर में अस बीर न होई । सके जीत सत्रुहन जो कोई ॥ 
भगवन के अस करत बखाना ।नारद भयउ  अंतरधियाना ॥ 

दुहु दल के संग्राम भए देवासुर संकास । 
ताहि बिलोकन देवगन हरष ठहरि आगास ॥ 

शनिवार, ०३ अक्तूबर, २०१५                                                                                

इहाँ अतिबलि बीर मनि राई । अनिप रिपुबार नाउ बुलाई ॥ 
हनन ढिंढोरन आयसु दाए । चेतन नागरी नगर पठाए ॥ 

डगर डगर जब हनि ढिंढोरा । करिए गुँजार नगर चहुँ ओरा ॥ 
घोषत जो कछु बचन कहेऊ । तासु गदन एहि भाँति रहेऊ ॥ 

गहे बिकट जुव भट समुदाई । कहि न सकै सो दल बिपुलाई ॥ 
जूह बांध बहु जोग निजोगे । बधि हय लहन जुझावन जोगे ॥ 

रघुकुल भूषण राजन जाके । सैनाधिप लघु भ्राता ताके ॥ 
अहहि नगर जो को बलि जोधा । समाजु सो सब भिरन  बिरोधा ॥ 

वादित श्रोता गन मध्य  भयऊ  अस निर्वाद । 
कर सूचि निपातहि महि करहि सोए निह्नाद ॥ 

रविवार, ०४ अक्तूबर २०१५                                                                                          

जेहि केहि बलबन अभिमाना । परम बली जो आपन जाना ॥ 
राजायसु लाँघिहि जो कोई । सो नृप सुत भ्राता किन होई ॥ 

दोषारोपित राज बिद्रोही । सो सब बकबुधि बध जुग होंही ॥ 
पुरजन मति जब कछु नहि  लेखे ।  नयन जुहार एक एकहि देखे ॥ 

बहुरि बहुरि रन भेरि हनाईं । निगदित गदन गयउ दुहराईं ॥ 
सुनौ बीर अस सुनि अतुराई । रहें करकनीज करतब ताईं ॥ 

यह राजग्या लाँघे  न कोए  । आयसु पालन बिलम नहि होए ॥ 
नरबर नृप कर भट बलबना । घोषित बचन सुने जब काना ॥ 

कर धनुधर कटि सर सजी काया कवच सुहाहिं । 
मन महुँ भरे रन रंजन, गवने भूपति पाहि ॥ 

सोमवार, ०५ अक्तूबर, २०१५                                                                                  

मान समर माह परब समाना । आए बीर भट भरि भरि बाना ॥ 
उर्स उदधि भए हरष तरंगा । उमग उमग उम परस उतंगा ॥ 

करे गुँजारि भीड़ अति भारी । राजित रज रज राज दुआरी ॥ 
तुरग तूल तुर रथ संचारा । आए बेगि पुनि राज कुमारा ॥ 

कला कलित कलाप के पूला । गह रत्ना भूषन बहु मूला ॥ 
फर धर खडग कवच कर गाता । सुभाङ्गद नाऊ लघु भ्राता ॥ 

करे पयान प्रान परहेला । आन अतुर रन परब समेला ॥ 
बीर सिंह भूपति के भाई । आजुध बिद्या महुँ कुसलाई ॥ 

अस्त्र सस्त्र सो सबहि बिधाना । लच्छ सिद्धि कर गहै ग्याना ॥ 
राजग्या अनुहारत सोई । राज दुआरी राजित होई ॥ 

महाराज के राज में दए आयसु अस होइ । 
बिपरीत मति होत ताहि लाँघ सकै नहि कोइ ॥ 

मंगलवार, ०६ अक्तूबर २०१५                                                                        

भूपति केरि बहिनि कर तनुभौ । आन सोउ हेले रन उत्सौ॥ 
पुरजन हो चह परिजन कोई । अमित बिक्रम बल बीर सँजोई ॥ 

चतुरंगिनि बार कटकु बनाईं । गयउ अनिप नृप पाहि जनाईं ॥ 
सबहि भाँति गह साज समाजा । तदन्नता चढ़ि ध्वजी अधिराजा ॥ 

ऐसेउ को आयुध न होहीं  । जुगावनि  जोइ राउ न जोहीं ॥ 
रचित मनोहर मनि बहु रंगा । चरिहि चरन जिमि गगन बिहंगा ॥ 

कहे सरन रहुँ ऊँचहि ऊंचे । रहउँ तहाँ जहँ रज न पहूँचे ॥ 
बाजिहि मधु मधुर मंजीरा । पुरयो सप्तक सुर दुहु  तीरा ॥ 

बजावनहार बजावहि बाजनि बहु चहुँ फेरि । 
दसहु  दिसा गुँजारत पुनि उठी रन भेरि ॥ 

बुधवार,०७ अक्तूबर, २०१५                                                                                

गहन रूप बाजत रन डंका । चले कटकु सन बहु बहु बंका ॥ 
हेल मेल पथ चरनन धरायो  । धूसर घन सों गगन अटायो ॥ 

सबहि कतहुँ घन घन रव होई । कहैं एकहि एक सुनै न कोई ॥ 
उर्स हरष मन जुगत उछाहा । नियरत रनाङ्गन नरनाहा ॥ 

जिन सों कबहूँ सस्त्र न अंगा । सिद्ध हस्त अस रथी प्रसंगा ॥ 
लेइ संग तिन सैन समूची । राजन सों रन भूमि पहूँची ॥ 

धुर ऊपर घन धूर गहायो । चारि कोत कोलाहल छायो ॥ 
राउ अनी आगम जब देखे । सत्रुहन सुमति सोंह कहि लेखे ॥ 

गहे जोइ मोरे बर बाहू । आएँ लिए निज सैन सो नाहू ॥ 

गाहे हस्त समरोद्यत बँधे माथ कर पाँति । 
ता सोहि मुठ भेटौँ मैं कहौ सुबुध किमि भाँति ॥ 

बृहस्पतिवार, ०८ अक्तूबर, २०१५                                                                      

हमरे पहिं भट को को होहिहि । जोइ समर जुझावन जोइहि ॥ 
बुधिबल सकिअ रिपु संग जयना ।जोग जोख करिहौ अस चयना ॥ 

चयन तेहि अनुसासन दीजौ । सुनहु सखा अब बिलम न कीजौ ॥ 
बोलि सुमति हे मम गोसाईं । अस तो सबहि गहे कुसलाईं ॥ 

पुष्कल महा बीर मैं बीरा । जोग जुधान रतन में हीरा ॥ 
आयुध बिद्या मैं बिद्बाना । घात करन में परम सुजाना ॥ 

नील रतन सम  अबरु ग्याता । सस्त्रीबर बहु कुसलाता ॥ 
महामहिम  के जो मन भाईं । समर बीर सो करिहि लड़ाई ॥ 

महाराज बीर मनि अरु गंगाधर सहुँ  होहिं । 
नाथ बयरु तुम कीजियो अगुसर ताही सोहि ॥ 

शुक्रवार, ०९  अक्तूबर, २०१५                                                                                      

सो महिपाल काल सम बीरा । अमित बीकाम अति अति रनधीरा ॥ 
अहहीं चतुर तुम्हारिहि नाईं । द्वंद युद्ध भा एकु  उपाई ॥ 

भिरत समर सो भूपत तुम्हहि । जितिहहु तामें किछु संसय नहि ॥ 
अबरु उचित तुअ जनि मन जैसे । करिहौ हित कृत करतब तैसे ॥ 

तुम्ह स्वयमहु परम सुजाना । खेत करन गह सबहि ग्याना ॥ 
सुनत बचन एहि सुमिरत रामा । प्रतिद्वंद्वी कर दल दामा ॥ 

रन जुझावन संकलप लेई । भिरन बीर अनुसासन देईं ॥ 
प्रतिपारत कहि निज नरनाहा । समरु कुसल उर भरे उछाहा ॥ 

अनी अगन आयसु पवन भट भट भए  चिङ्गारि । 
धू धू करत ताप धरत , समार भूमि पद धारि ॥ 

जनि = समझे 

शनिवार, १० अक्तूबर, २०१५                                                                               

कटि सर षंड कोदंड हाथा । भयउ गोचर सबहि एक साथा ॥ 
सुभट नयन उठि लखे दिवाकर । छाँड़ निषंग चढ़े जीवा पर ॥ 

चले आतुर झूँड के झूँडा । लगिहि चरन उर सिर भुजदंडा ॥ 
प्रदल खलभल केहि नहि लाखा । भयऊ पल महि बिकल बिपाखा ॥ 

छन महुँ  बहुतक बीर बिदारे । त्रासित हा हा हेति पुकारे ॥ 
सुने जब निज सेन संहारा । मनिरथ राजित राज कुमारा ॥ 

दुति गति सम गत आयउ आगे । ताके कर सर सरसर भागे ॥ 
चले गगन जिमि पुच्छल पूला । होए  दुनहु दल तूलमतूला ॥ 

चढ़े घात निपात नेक सुभट ब्याकुल होए । 
त्राहि त्राहि गुहार करे हा हा करि सब कोए ॥ 

रवि /सोम , ११ /१२  अक्तूबर, २०१५                                                                                 

बल जस सम्पद माहि समाना ।रुक्माङ्गद निज जोरि जाना ॥ 
पचार सत्रुहन भरत कुमारा । समर हेतु घन गरज पुकारा  ॥ 

कोटि कोटि भट कटक बिडारे । केत न केतक गयऊ मारे ॥ 
निर्बल घात करिहौ प्रहारा । धिग धिग धिग पौरुष तुम्हारा ॥ 

तासु मरन कछु लाह न होहीं । बीर रतन करु रन मम सोहीं ॥ 
सूर बीर बीरहि सहुँ सोहा । बिपरीत चरन बीर न होहा ॥ 

अस कह रुक्माङ्गद पचारा । सूरबीर पुष्कल हँस पारा ॥ 
छाँड़ बेगि पुनि सर संघाती । राजकुँअर करि  भेदिहि छाँती ॥ 

मर्म अघात परत भूमि उठत बहुरि अतुराए । 
 धरि भू चरन सरासन रसन खैचत श्रवन लगाए ॥ 

मंगलवार, १३ अक्तूबर २०१५                                                                                   

भयउ जर जर कोप कर भारी । बदन अंगीरि नयन अँगारी ॥ 
करक दरस दस सायक बाढ़े । आत सहुँ रिपु घात पर चाढ़े ॥ 

धकरत पुष्कल उरस दुआरी । धँसे भीत पट देइ उहारी ॥ 
करिहि एकहि एक कोप अपारा । दोउ ह्दय चहि जय अधिकारा ॥ 

देत बहुरि बहु गहन  अघाता । रुकमाङ्गद कहे अस बाता ॥ 
समर बीर प्रचंड बल जोरे । देखू अमित पराक्रम मोरे ॥ 

राजित रथ रहिहौं रसि कासा । अजहुँ तोर आठ उरिहि अगासा ॥ 
अस कहत कछु मंत्र उचारेसि  । बहुरि भँवरकास्त्र  देइ मारेसि ॥ 

हथत रथ दृढ चरन घुरमायो  । एक जोजन पुर दूर गिरायो ॥ 
आठ जोजक बहु जुगत लगावा । थिर परन  महि चिक्करत पावा ॥ 

सँभारत रथ भरत तनय किए थिर केहि बिधान । 
गिरत परत पुनि लेइ गत  पूरबबत अस्थान ॥ 

बुधवार, १४ अक्तूबर २०१५                                                                                  

सकल सस्त्रास्त्र के ग्याता । कहे भरत सुत पुनि एहि बाता ॥ 
कुँअरु ए महि तव जोग न होहीं । चाहिब सुरप सभा बसि तोही ॥ 

अजहुँ इहाँ ते होत निकासा । देउलोक मैं करहउ बासा ॥ 
प्रकोपत बहु कोप के साथा । बहुरि कठिन कर धनु धर हाथा ॥ 

उपार पथ रथ गगन उड़ायक । छाँड़त रसन तेहि मह सायक ॥ 
धावत तेजस धुर महुँ धाँसा । हथ छुट लिए रथ चला अगासा ॥ 

घात चढ़त रथ भयउ नभोका । गयउ उड़त लाँघत सब लोका ॥ 
पैठत महिरु मण्डलु माला । डपटहि  लपटि प्रचंड ज्वाला ॥ 

ज्वाल माल महकाल सम बहु बिकराल सरूप धरे । 

फुंकरत जिमि ब्याल बेताल बहु बहु शृगाल सब्द करे ॥ 
हय सारथि सहित जारत सकल भए बहुतहि भयावहे । 
बिलोकत उडुगन कहँ बिकल दहँ स्यंदन कि गगन दहे ॥ 

दहत रहत दिनमान , कुँअरहु संतापित भयौ । 
परि साँसत मैं प्रान त त्रासत त्राहि त्राहि किए ॥ 
































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