Friday, 16 October 2015

----- ।। उत्तर-काण्ड ४२ ।। -----

शुक्रवार, १७ अक्तूबर, २०१५                                                                   

सीस चरन धर कर धरि काना । दहत दहत महि गिरे बिहाना ॥ 
तेहि अवसर समर मुख पीठा । हा हा हेति पुकारत दीठा ॥ 

राज कुँअर मुख मुरुछा छाईं । दरसत ताहि बीर मनि राई ॥ 
दहन गरभ गह आँगन आवा । गहन गरज पुष्कल पुर धावा ॥ 

करिउ चित्कार अतिउ घन घोरा । जिमि बल्लिका गुँजहि चहुँ ओरा ॥ 
इहाँ कपिबर बीर हनुमाना । देखत उमगत सिंधु समाना ॥ 

कटक भीत धरि रूप कराला ।बीर मनि जस भयऊ ब्याला ॥ 
जोरि जोग निज बिनहि बिचारे । झपट डपट भट धरि धरि मारे ॥ 

बज्राघात करि  बीर कचारे। पाहि पाहि सब पाहि पुकारे ॥ 
पुष्कल संकट घेरे घिराए । अचिर प्रभ गति सम अचिरम धाए ॥ 

धावत आवत द्युति गति जब निज कोत बिलोकि । 
धीर बँधावत एहि कहत पुष्कल हनुमत रोकि ॥ 

निर्बल बिकल मोहि न बुझावा । महाकपि कहु केहि कर धावा ॥ 
तृनु तुल तुहीं यह कटकाई । कहु त अहहीं केत रे भाई ॥ 

रथि कछु रथ कछु गज कछु घोड़े । जानिहु मैं गनि महुँ बहु थोड़े ॥ 
असुर सैन सरि सिंधु अपारा । राम कृपा जस करिहहु पारा ॥ 

सोइ भाँति हे पवन कुमारा । संकट ते पइहौं मैं पारा ॥ 
नाउ अधर हरिदै छबि धरके । रघुबरन्हि मन सुमिरन करके ॥ 

दसा असहाए होत सहाईं  । राम नाम दुःख सिंधु सुखाईं ॥ 
संकट हरन राम कर नाऊ । ताहि तनिक संदेह न काऊ ॥ 

एहि हेतु महबीर तुम्ह रन भू बहुरत जाहु । 
तोर पीठ मैं आइहौं जयत बीर मनि नाहु ॥ 

सोमवार, १९ अक्तूबर, २०१५                                                                                

कुँअरु बचन श्रवनत हनुमाना । कहत ए बचन भयउ अकुलाना ॥ 
तात बयरु कीजो ताही सों । बुधि बल सकिअ जीति जाही सों ॥ 

कहाँ बाल दिनकर के खेला । कहाँ तेज तापस कर हेला ॥ 
महा दातार यह जनपालक । बिरध बयस यह अरु तुम बालक ॥ 

प्रनत पाल नय विद जस होई । रन भू महुँ अस कुसल न कोई ॥ 
महा प्रताप सील बलबाना । धीर धुरंधर नीति बिधाना ॥ 

सस्त्र घात में परम प्रबेका । तासों हारिहि बीर अनेका ॥ 
सिव संकर जिनके रखबारे । यह बत जानपनी तुम्हारे ॥ 

भगतिहि  केर वसीभूत रहैं सदा संकास । 
तासु  नगर गिरिजा सहित करिहहिं नंद निवास ॥ 
सानंद निवास करते हैं 

 मंगलवार, २० अक्तूबर २०१५                                                                                 

 तोर कही कपिबर मैं माना । करे भगति अस भूप सयाना ॥ 
कि भयउ बसीभूत सिउ संकर । किए अस्थापित ताहि निज नगर ॥ 

जासु चरन  स्वयम भगवाना । पूजित पाए परम अस्थाना ॥ 
बसे मम हिय सोइ रघुराई । छाँड़ मोहि अरु कतहु न जाईं ॥ 

भगत बछर रघुबर जहँ अहहीं । सकल चराचर जग तहँ रहहीं ॥ 
हारिहि अवसि जुझत जनपाला । होइहि मोर कंठ जयमाला ॥ 

धरे धीर पुष्कल अस कहेउ । होइ सो जो तासु मन चहेउ ॥ 
हित अहित पुनि हरिदै बिचारी । फिरे हनुमत करात मन भारी ॥ 

बीर मनि  कर लघु भ्रात, बीर सिंह रहि नामु । 
बहुरि तासु जुझावन पुनि चले बुद्धि बल धामु ॥ 

बुधवार, २१ अक्तूबर, २०१५                                                                                         

दुइरथ रन मैं बहु कुसलाता । सुमिरत पुष्कल मन जनत्राता ॥ 
हिरन मई रथ रसन सँभारत ।भूपत सम्मुख चले पचारत ॥ 

आवत देखि बीर मनि ताहीं । जान जुबक अस कहत बुझाहीं ॥ 
अजहुँ कोप प्रचंड भए मोरा । जुद्ध करत होवत अति घोरा ॥ 

मैं अँगार भिरिहु न मम संगा । आइहु सम्मुख होहु पतंगा ॥ 
चाहु न मरन प्रान जो चाहू । मम सों रन बिन बहुरत जाहू ॥ 

बीर मनि ऐसेउ कहि पायो । पुष्कल तत छन उत्तरु दायो ॥ 
जो तुम्ह समरोन्मुख होहू । समर बिमुख सुनु सोहि न मोहू ॥ 

सुभट सोइ जो प्रान न लोभा । सम्मुख मरन बीर के सोभा ॥ 
पुनि रघुबर भगता अस होईं । ता सों जीत सकै नहि कोई ॥ 

को राउ हो कि चहे किन सुरपत पद अधिकारि । 
लरत प्रभु कर काज करत परिहि भगताहि भारि ॥ 

बुधवार, ०४ नवम्बर २०१५                                                                                     

भरत सुत जब ऐसेउ भासा । निपट बालक समझ नृप हाँसा ॥ 
बदन हास छन माहि बिलोपा । अगन सरूप प्रगस भए कोपा ॥ 

भूपत केर कुपित जब जान्यो । बीर कुअँरु धनु धरी तान्यो ॥ 
समरोन्मत्त रसन सहारा । उरस बीस तिख बान प्रहारा ॥ 

भूप बान आगत जब लाखा । गहकर सर सरि सूल सलाखा ॥ 
छाँड़त मन भा क्रोध प्रचंडा । आगत बान भयउ बहु खंडा ॥ 

देखि बन नृप काटि निबेरे । बीर बिनासक रिपु दल केरे ॥ 
पुस्कलहू मन ही मन क्रोधा । गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा ॥ 

बहुरि धनुरु धर हाथ तान तीन तीर कस्यो । 
सीध बाँध पुनि माथ  हतत भूपत बिकल कियो ॥ 


बृहस्पति/ शुक्र  , ०५/०६ नवम्बर, २०१५                                                                                    

करत अघात बान करि घावा । बहुरि प्रचंड कोप उर छावा ॥ 
तानेउ चाप रसन सहारा  । छन महु नृप नव बान उतारा ॥ 

लगत बान बिदरित भई छाँति । गिरत परत सँभरेउ केहि भाँति ॥ 
छूटत चरे रक्त की धारा । करे कोप अति भरत कुमारा ॥ 

करधर धनु पुनि खरतर मूँहा । गहि गुन सर सत केर समूहा ॥ 
चलेउ तुर जस काल ब्याला । भयउ हताहत नृप तत्काला ॥ 

किए उर बस अस तीख प्रहारा । बीर बिभूषन देइ उतारा ॥ 
देहाबरन महि माहि गिराए । बिभंजित रथ बिनु चरनहि धाए ॥   

निरखत नृप चढ़त  नव स्यंदन  । रहेउ अचल भरत के नंदन ।।  
बहुरि बीर मनि सम्मुख  आना । प्रीत्यार्थ ए बचन बखाना ॥ 

रघुबर चरन  सरोज सम अरु तुम मधुकर रूप ।
वाकी छबि राकेस  सरिस अरु तुम कुमुद सरूप ॥

मधुकर कौमुद इब अनुरागी । भए अजहुँ मम कोप  कर भागी ॥ 
सबहि बिधि सों कुसल भूपाला । गहि गुन कोटिक बान कराला ॥ 

पुनि पुष्कल पुर करक निहारा । सीध बाँध करि तीख प्रहारा ॥ 
काल गहन घन मेघ समाना । लागेउ बृष्टि करै बहु बाना ॥ 

दसहुँ दिसा रहेउ नभ छाईं । अबरु  न कछु अरु देइ दिखाईं ॥ 
बज्र निपातत बारहीं बारा । घुर्मि घुर्मि करि धूनि अपारा ॥ 

परइ सिलीमुख सहुँ अस चमकहिं । दसहुँ दिसा जस दामिनि दमकहिं ॥ 
निज सेन संहार जब लाखा । लोहिताखि लाखत प्रतिपाखा ॥ 

धुरबह धुरीन पुष्कलहु कोटिसायुध निपात । 

रिपु ऊपर चढ़ि दौड़ के करे घात पर घात ॥ 

रविवार, ०७ नवम्बर, २०१५                                                                           

सयन मगन बन केसरि जागा । धरि धरि भट संहारन लागा ॥ 
कहँरत घाउ धरत प्रतिपाखा । जहँ लग देखि बिनासहि लाखा ॥ 

छायौ रन रव अस चहुँओरा । गर्जहिं जिमि घन घोर कठोरा ॥ 
बिदरित भए जब माथ अपारा । बिहुर बिहुर गिरि गजमनि धारा ॥ 

कटक केरि भय गयउ परायो । निर्भिक जब मुख संख पुरायो ॥ 
लखत बीर मनि  भर अति क्रोधा । छुभित जियँ अस कहत संबोधा ॥ 


भूपति तुम बिरधा बय धर के । होइहउ जोग मानादर के  ॥ 
तथापि समर माहि एहि  अवसर । परम बिक्रम मम लखिहु बीरबर ॥ 

जो महपापी जग परितापी सुरसरि तट आन परे । 
भव तारिनि कर अघहारिनि कर निंदारत दोष धरे ॥ 
सीस घमन भर करए अनादर रहेउ बिनहि अवगहे । 
तीनि सिली सों मुरुछा न देउँ त तासु लहनि मोहि लहे ॥ 

लखि बिसाल हरिदय भवन अतिसय ऊँच किवारि । 

लच्छ धरत पुष्कल बहुरि भूपत देइ हँकारि ॥    

शुक्रवार, १३ नवंबर, २०१५                                                                                     

खैंचत रसन करन लग ताना । छाँड़ेसि पुनि अगन सम बाना ॥ 
पाए पवन अरु भयउ प्रचंडा । भूपत तत्पर किए दुइ खंडा ॥ 

प्रथम खंड महि निपतत आयो । पतत सकल मंडल उजरायो ॥ 
दूज पतित नृप स्यंदनोपर । देखि दसा सर निरखत कातर ॥ 

निज जननी भगति जनित शुभफल । दूज प्रद्ल प्रदत्त कृत पुष्कल ॥ 
अवनत लोचन माथ लगायो । आतुर धनु सों छूटत धायो ॥ 

इहाँ बीर मनि केर चलाई । कातिहि बिसिख बिसिख सन जाई ॥ 
भयऊ छोभ पुष्कल मन माहि । लगा बिचारन करन का चाहि ॥ 

बिचार मगन मन सुमिरै मंगलमय एकु नाम । 
असुर निकंदन जय जय जय रघुपति राजा राम ॥

शनिवार, १४ नवम्बर, २०१५                                                                                    

जुद्धकला मैं बर बिद्बाना । छाँड़ि कोप करि  तीसर बाना ॥ 
फुँकारत अस चला मतबारा । चलि जस काल सर्प बिष धारा ॥ 

धावहिं द्रुत अस बदनु पसारा । सकल भूमि जस होंहि अहारा ॥ 

गतवत मनिमय माथ चकासा ।  कासित भए जस सूर प्रकासा ॥ 

खैंचत गगन अगन अवरेखा । भूपत काल बरन करि लेखा ॥ 

धँसत उर दंस  अस घात  कियो । घरी मह अरि मुरुछित करि दियो ॥ 

सेन नाथ जब मुरुछित पाईं । पाहि पाहि कह भयउ पराईं ॥ 

गहि सर उर जब महि परि आवा ।  दूर दूर धूरि धूरि छावा ॥ 

छबि हृदय अनुराग नयन, मुखधर रामहि राम । 
बल हीन पुष्कल बलि सों जीत लियो संग्राम ॥  

रविवार, १५ नवम्बर, २०१५                                                                                  

कहत सेष पुनि  हे मुनिराई । हनुमत बीर सिंह पहि जाईं ॥ 
बोले निज पुठबार डिठाइब । अहौ बीरबर कहु कहँ जाइब ॥ 

मरन कल रन भू न बिसारिहु । मोरे कर छन महु तुम हारिहु ॥ 
लखि बड़बोलापन कपि केरा । बीर सिंह रिस नयन तरेरा ॥ 

कोपित कर धनु धर परचारा । घन निभ गहन धुनी टंकारा ॥ 
करषत रसन करा सर बारी । करिअ धनब जिमि धारासारी ॥ 

धार धार महि गहि अस सोहा । बरखत जस पावस मन मोहा ॥ 
बान  बून्द जब लगिहि सरीरा ।  भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा ॥ 

बजर घोष कर बजर सम हनुमत मूठि तरेर । 
बीरसिंह केरी छाँति मारे देइ दरेर ॥ 

सोमवार, १६ नवम्बर, २०१५                                                                                     

परा भूमि गह घोर प्रहारा । पर साल जिमि चरन  उपारा ॥ 
छाए गहन मुरुछा मुख वाके । दरसत बिकल दस पितिआ के ॥ 

आतुर सुभाङ्गद तहँ आयो । जागत मुरुछा गै भूरायो ॥ 
रुकुमाङ्गद केहु चित चेता । आनइ धमक गयउ रन खेता ॥ 

भिरत भयंकर पुनि दुहु भाई । परचारत  हनुमत पहि आईं ॥ 
 समर पराइ डिठाइब पीठी  । दोउ बीर आगत पुनि डीठी ॥ 

धनुरथ सहित दोउ पुठबारे । लपटि  लँगूर पटकि महि डारे ॥ 
खात बेगि आघात कराला । भयउ दुनहु मुरुछित तत्काला ॥ 

सुमद के सोंह बलमित्रहु  निज निज जोरी जान । 

लरत भरत समर अभिरत हतचित भयउ बिहान ॥ 

मंगलवार, १७ नवम्बर, २०१५                                                                          

ससि शेखर सर सुरसरि धारे । भगतन के जो सोक निवारे ॥ 
निज परिजन  मुरुछित जब जानिहि । सो भगवन रन आनिहि ॥ 

इत सत्रुघन के कटक बिसाला । प्रतिजोधन तिन उत महकाला ॥ 
बिपदा गहि भगतन कर राखा । और कोउ रन  हेतु न लाखा ॥ 

पुरबल काल त्रिपुर के संगा । जुझे जेहि बिधि जासु प्रसंगा ॥ 
तासु संगत तेहि बिधि तहवाँ । रामानुज रहि रनरत जहवाँ ॥ 

समर सजाउल साजि महेसे । धरनिहि  तल हहरात प्रबेसे ॥ 
महाबली सत्रुहन कस लाखी । कि सरबदेउ सिरोमनि साखी ॥ 

भगत बिबस हित अहित बिसारे । जुझन आपहीं आन पधारे ॥ 

समर बीर जगाई पुनि सब रन साज सजाए । 
चन्द्रधर महेसर संग समरन सम्मुख आए ॥ 

बुध/बृहस्पति , १८/१९  नवम्बर, २०१५                                                                             

लखि सत्रुहन सहुँ सैन सँभारे । सकल जुझावनि साज सँवारे ॥ 
बान घनकर बरन  करि बारी । बीर भद्रन्हि  कहि त्रिपुरारी ॥ 

ए मोर भगत हेतु दुखदाई ताहि संग तुम करौ लराई ॥ 
बल माहि हनुमत एकजस पाए । नन्दीहि तासों भिरन पठाए ॥ 

कहेब दए आयसु सब काहू । भँगी तुअ सुबाहु पहि जाहू ॥ 
गयउ कुसध्वज पाहि प्रचंडा । समर बाँकुर सुमद पहि चंडा ॥ 

रुद्रगन मैं बल बीर बिसेखा । बीर भद्रहि सहुँ आगत देखा ॥ 
पुष्कल क मन रन अति रंगा ।चला दीप सहुँ जरन पतंगा ॥ 

तासु  कर पै पञ्च प्रदल उरि जस गगन बिहंग । 
चोंच भरि अरि करि घायल भए भंजित सब अंग ॥ 


  


















1 comment:

  1. दीप पर्व की सादर शुभ कामनाएं

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