Tuesday, 19 January 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ४६ ।। -----

रविवार, १७ जनवरी, २०१६                                                                                               

सुरापीत जम दूत कराला । पिआवहि तपित लौहु रसाला ॥ 
कर्म गति  कह मुनिरु बिद्वाने । सतत रूप एहि बचन बखाने ॥ 

जो बर बिद्या बरआचार । सों परिपूरित भरे हँकारा ॥ 
गुरु जनन्हि के करिहि अनादर । जाएँ गिरि छारा सो मरनि पर ॥ 

बहिर भूत निज धर्म समाजा । करहिहि तासु बिपरीत काजा ॥ 
दुखारत जहाँ पीर अपारा । जाएँ पतत सो नरक दुआरा ॥ 

जो उद्बेजक बचनन ताईं । पीठ फिरे लगि कारन बुराई ॥ 
दंद सूक मुख बल गिरि जाईं । दंद सूक तें जाएँ डसाईं ॥ 

पापिहि हुँत अनेक नरक, एहि बिधि भूप सुजान । 
भुगतिहि बहुतक जातना पतत तहाँ गिरि  आन ॥   

राम सरस घन कथा सुबारी । आस पिआस मनोमल हारी 
कामकोह मद मोह नसावनि । हरिदै ते संताप मिटावनि ॥ 

जिन्ह एहि बारि न मानस धोए । तेहि कर पर उपकार न होए  ॥ 
निपटत सकल नरक बधि पाँती । भुगतिहि तहँ दुःख सो सब भाँती ॥ 

जिन्हनि अतिकर सुख इहि लोका । दुःख न बियोग न रोग न सोका ॥ 
सुराग ताहि हुँत यह संसारा । न तरु परिहि सब नरक अगारा ॥ 

दान धरम सात कर्महि लागे । रघुबर पदुम चरन अनुरागे ॥ 
तपोधन तें तीर्थाटन तें । जाइहि सब दुःख परिताप  नसें ॥ 

पाप पंक लपटाइआ ता हुँत एकै उपाए । 
हरि कीरत कल कूलिनी अवगाहत पखराए ॥ 

मंगलवार, १९ जनवरी, २०१६                                                                                 

तासु अबरु एही बिषयन माही । कोउ बिचार करिअ चहि नाही ॥ 
के भगवन के मान बिभंगा । ताहि बिमल करि सकै न गंगा ॥ 

पबित ते पबित तीरथ कोई । करिअ अमल सो बल नहि जोईं ॥ 
रामहि नाम ग्राम गन सीला । राम कीरत राम कर लीला ॥ 

 बदन नयन बिनु दरस समाना । इंद्रिअग्राम गहइ न ग्याना ॥ 
हाँसत तासु चरित परहेले । कलप लग नरक निबुक न मेले ॥ 

संकट परि तव हय हे नाहू । परिहरन हंट अजहुँ तुअ जाहू ॥ 
कहत सुनत रघुपत गुन गाना । सेबक सहित करिहौ बखाना ॥ 

धार रूप बहिहि सुर धुनि जब श्रुति रंधन माहि । 
चलन फिरन के गयउ बल ता संगत बहुराहि ॥ 

शौनक मुनि अस बचन बखानी । सुनी सत्रुहन परम सुख मानी ॥ 
करिहि प्रदछिन चरन सिरु नाईं । खत सेष पुनि आयसु पाईं ॥ 

सेबक सहित चले तहँ संगा । संगहि ताहि चली चतुरंगा ॥ 
अचिरम अचर तुरग पहि आईं । पवन तनय हरि चरित सुनाईं ॥ 

रामकथा ग्यान गुन रासी । बड़ ते बड़ दुर्दसा बिनासी ॥ 
कहहिं संत मुनि श्रुति अस गावा । मिटिहि तमस प्रभु तेज प्रभावा ॥ 

कीर्तन करत  करत बिहाना । कहत देव हे कहि हनुमाना ॥ 
आम गन कीर्तन पुन संगा । होहु बियद गत जान बिभंगा ॥ 

बिहरत निज बिहार देस बाँधे बंध न कोए । 
एहि अधमतस जोनि संग तुहरे निबहन होए ॥ 

बृहस्पतिवार, २१ जनवरी, २०१६                                                                           

कहा सो देव श्रुत एहि निगदन । हरि चरित श्रुत भया  मैं पावन ॥ 
बिधि निषेध कथा यह नीकी । सीता पति की रघुबर जी की ॥ 
बिधि निषेध = क्या करें की न करें 

अजहुँ मोहि निज लोक पयावन । सानंद आयसु देउ महमन ॥ 
ब्रम्ह देव अस बचन बखाना  । चले सुरग पुनि पौढ़ बिमाना ॥ 

दरस दिरिस यह कौतुककारी । सत्रुहन मन भए अचरजु भारी ॥ 
सेवकहू  बहु बिसमय करिहीं । देव केर श्राप जस हरिहीं ॥ 

भए जड़ता ते मुकुत तुरंगा । प्रमुदित उपबन भरे बिहंगा ॥ 
होत बिहागन संग बिहागा । आतुर चहुँ पुर बिहरन लागा ॥ 

कहैं सेष भगवान पुनि मन यह भारत देस । 
चहुँ पास जहँ  एक ते एक अहँ भरपूर नरेस ॥ 

एहि बिधि भमरत चहुँ दिसि ताहीं । बिहरत सत दिनमल बिरताहीँ  ॥ 
आगत हिमगिरि संकासे । भमरिहि बहुलक देस सुपासे ॥ 

अंग देस हो कि चाहे बंगा । नृप परिपूरित देस कलिंगा ॥ 

तहाँ केरे सबहि भूपत गन । भली प्रकार किए तुरग स्तवन ॥ 

बहुरि तहँ सो चरन अगुसारे । अगत्य सुरथ  नगर पैसारे ॥ 
अदितिहि कुण्डलु निपतित होंही । भए जग बिदित नगरि ता सोही ॥ 

बन उपबन गिरिगन भरपूरी । सकल पुरीं जहँ तहँ फर फूरी ॥ 
भवन भवन बहु बरन बनाईं । बसे बसति सब भाँति सुहाईं ॥ 

पुरजन पबित पुनीत पुरंजन । करिहि न कबहुक धरमु उलंघन ॥ 
निसदिन तहाँ बहु पेम सहिता ।  सुमरित गाँवहि नित हरि चरिता ॥ 

पूजत असवत्थ तुलसी जन जन निजहि निवास । 
पाप दूरावत सबहि रहि भगवन के दास ॥ 

शनिवार, २३ जनवरी, २०१६                                                                                             

 कंचन मनी लस  कलस कँगूरा । भीत बहिर रचि पचि अति रूरा ॥ 
मंदिर मंदिर तहँ श्री साथा । सोहित रहि राजित जगनाथा ॥ 

जनमानस चेतस बहु सुचिता । बंच बिहीन छलु कपटु रहिता ॥ 
पूजिहिं जब प्रतिदिन तहँ जाईं । कूजिहिं खंकन संख पुराईं ॥ 

रसन रसन करि कंठन घाला  । राम नाम के आखर माला ॥ 
करिहि परस्पर बैर न कोई । सबहि बिपुल सुख सम्पद जोईं ॥ 

तसु हृदय हरि नाम ध्याने। कबहुँ करम फल सुरति न आने ॥ 
पावन पबित सबहि बपुधारिहि । राम कथा कथ  मनहि बिहारिहि ॥ 

जीवन जोग जुग जीउती दुरब्यसनी न होइ  । 
सबहि सदाचरनी रही द्यूति कार न कोइ ॥ 

धर्मात्मन् सदा सत भाषी । तहँ महबली नृप सुरथ बासिहि ॥ 
छबि भगवन मन दर्पन जिनके । कहँ लग बरनउँ महिमन तिनके ॥ 

पेम मगन सुनि प्रभु गुन गाथा । रहहि सदा अनंद के साथा ॥ 
तासु सकल गुन भुइँ बिस्तारिहि ।जन जान के पातक निस्तारिहि ॥ 

एक समउ पुनि कछु राज अनुचर ।रहहि बिहरत भँवरत सो नगर ॥ 
चन्दन चर्चित अस्व बिसेखे । नगर भीत पुनि आगत देखे ॥ 

नियरावत जनि यहु मन मोही । रघुबर तईं त्याजित होंही ॥ 
गयउ फ़िरट लए एही जनाईं । हर्षित राज सभा चलि आईं ॥ 

सभोचित सभासद बीच राजत रहीं नरेस । 
उतकंठित मन भाव सों अनुचर देइँ सँदेस ॥ 

सोमवार, २५ जनवरी, २०१६                                                                                   

साईं अवध नगर गोसाईं । दसरथ नंदन श्री रघुराईं ॥ 
तासु मेधीअ तुरग त्याजिहि  । भमरत चहुँ पुर इहाँ बिराजिहि । 

सुबरन पतिया सीस बँधावा । अनुचर सहित नगरु नियरावा ॥ 
धौल बरन बहु भूषन साजा । मनोहारि मनि रतन समाजा ॥ 

पीठ पर्यान बसन सुरंगा ।  गंध सार चर्चित सब अंगा ॥ 
बरनातीत मनोहर ताईं  । गहौं महानुभाव तिन जाईं ॥ 

सुरथ बहुरि एहि बचन उचारे । धन्य भाग भए आजु हमारे ॥ 
जग कर जुग जिन सादर बंदा । दरसिहि सो प्रभो मुख चंदा ॥ 

कोटिन समर सूर तैं घेरे । आए इहाँ भमरत चहुँ फेरे ॥ 

बँधहि रसना गहि अवसिहि बीर अजहुँ मम सोहि  । 
छाड़िहउँ ताहिं तबहि जब रघुबर दरसन होंहि ॥ 

मंगलवार, २६ जनवरी, २०१६                                                                                  

चिंतन रत जेहि चिरकाल सों । करिहि कृपा मो पर कृपालु सो ॥ 
मोर नयन जिनके पथ जोंइहिं  । तिनके अब सुभ आगम होइहिं ॥ 

कहत सेष अस बोलि बिहाने । भूपत अनुचर आयसु दाने ॥ 
कहैं अबिलम बेगि करजाहू  । तुरग बरियात धरि गहि लाहू ॥ 

होइ सौमुख संभरत केहू । केहि बिधि तेहिं छाँड़ न देहू ॥ 
मम मानस भरोसा ए होही । लहि लाह बड़ कहउँ मैं तोहीं ॥ 

जेहि सुलभ डीसी सकें न कोई । बिधि सुरपहु सो दुर्लभ होईं ॥ 
तेहि रघुनाथ के पद पंकज । होइहिं दरसित सुलभ बहु सहज ॥ 

धन्य सो स्वजन सुत बन्धुजन धन्य सो बाहन बाहना । 
जासु सरल सुलभ संभावन भए रघुबीर के लाहना ॥ 
मनोगति नुहार बेगि हिरनै पतिया सीस सँवार चले ।
बाँध्यौ बाँधनी पौरि तेहि मंजुल जो मनियार चले ॥ 

महराउ कहत बचन पुनि दूत द्रुत तहँ जाइँ । 
सभागत सादर अरपिहि बाँध गहि कर ल्याइँ ॥  

कहैं सतत पुनि मुनिबर ताईं । सुनिहौं अजहुँ बहुंत लय लाईं ॥ 
 सुरथ  राज अस मनुष न कोई । पर दार अपबाद रत होईं ॥ 

पर धन सम्पद दीठ धरावा । अस लम्पट तहँ कोउ  न पावा ॥ 
जीह जीह रघुबर जस गाईं । अरु को अनुचित बात न आईं ॥ 

एकु नारि ब्रति नर सब कोई । मन बच क्रम पति हितकर होईं ॥ 
करी अनहित धरि झूठ कलंका । बयरु अकारन बिरथा संका ॥ 

चलिहि बेद बिरुद्ध पथ माही । अस मानस को एकहू नाही ॥  
कृत काज कर राज के सैनी । निसदिन रघुनन्दन मुख बैनी ॥ 

तहाँ  न कोउ पापाधम सबहि धर्मानुसार । 
सुरथ देस केहि मन मति नहि को पाप बिचार ॥  

बृहस्पतिवार, २८ जनवरी, २०१६                                                                              

धरेउ ध्यान जगवंदन के । नसेउ पाप सबहि पुरजन के ॥ 
हरि सुरति जबते आन समाए । हरिदै हरिदै आनंदु छाए ॥ 

राउ सहित भए देस दुअारा । धर्म परायन जेहि प्रकारा ॥ 
तहाँ निबासित जान मानस रासी । गहे साँति मरि मरत सुपासी ॥ 

प्रभु चरित अनुहार नर नारी । होइँ परम पद के अधिकारी ॥ 
सुरथ नगरिहि दसा अस होई । होए जोग जम दंड न कोई ॥ 

पइहीं पैठ न तहँ जमदूता । त जम बोलि अह भयउ बहूँता ॥ 
एक बार पुनि धरे जति भेसा । गयउ नगर भए समुख नरेसा ॥ 

बलकल बसन सोहत तन सीस जटा जुट केस । 
पहुँच सभा गह भेंटिहि भगवद भगद नरेस ॥ 

माथ मौलि तुलसी दल साजे । रसनासन भगवान बिराजे ॥ 
तेहि समउ नृप सैनिहि ताहीं । धरम कर्म बत रहि समुझाहीं ॥ 

भरे भेस जमराज बिसेखे ।  अभ्यागत मुनिबर पुर देखे ॥ 
हस्त कमंडल कँथरी काखी । लागिहि तपो मूर्ती साखीं ॥ 

करिहि प्रनाम चरन कर जोरी । पूछिहि सादर कुसल बहोरी ॥  
पाउ पखार  बरासन दीन्हि ।श्रम जाइ बिश्राम करी लीन्हि ॥ 

तब धर्मपर धरेस धुरंधर । कहहि तासु सबिनय हे मुनिबर ॥ 
तापिहि धरा घनागम तोरे । सकल सत्कृत सुफल भए मोरे ॥ 


धन्य धन्य भए नगर दुआरे । धन्य धन्य भए साँझ सकारे ॥ 
धन्य धन्यः भए मोर अगारा । देखि पाए मुनि राय तुम्हारा ॥ 

कलिमल हरनी मंगलकर अब सो कथा सुनाहु । 
जासु श्रवन वंत जन के पग पग पाप नसाहु ॥ 

शुक्रवार, २९ जनवरी, २०१६                                                                                     

हाँसिहि मु नई सुनि नृप कहि बाता । गहि करतल दरसावत दाँता ॥ 
होइँ चकित पूछिहि नर नाहा । तव उपहासित कारन काहा ॥ 

कहिअ कृपाकर मोहि जनइहौं । सोच ब्याकुल मन सुख दइहौ ॥ 
कहि मुनि सुनु मम बत मति लाईं । हँसि कारन जनाउँ तुम ताईं ॥ 

अधुनै कहिहहु जस तुम मोही । बरनौ प्रभु कीर्ति मम सोहीं ॥ 
भगति रहस पुनि चहिहउ जाना । मन पूछतहुँ  कवनि भगवाना ॥ 

धरनि करष जस जल बस मीना । जगत जीउ तस कर्म अधीना ॥ 
करम संगति सुराग गति लाहहि । करम संगहि नरक गिरि जाहिहि ॥ 

कर्म सोहि धन सम्पदा , कर्म सोहि संतान । 
कर्म सोहि हे नरनाहु पैहि परम अस्थान ॥ 

रविवार,  ३१ जनवरी, २०१६                                                                                

सत जग कृत सुरपति जजमाना । पाइहि सुरग परम अस्थाना ॥ 
कर्महि तैं सिरजन कृतु ताईं । अद्भुद सत्य लोक लब्धाईं ॥ 

कर्म ते अतिसय सिद्धि सधाए । मरुतादि लोकेसर पद पाए ॥
तुम्हहु लागउ करि जग काजा । बंदिहु प्रनमत देउ समाजा ॥ 

तासों  उजबल जस तुम्हारा   । सकल भूमँडल लहि बिस्तारा ॥ 
नृप मन लगन एकै रघुनाथा । सुनी मुनि बचन छोभ के साथा ॥ 

हरिदे कोप अगन उपजाया । होइँ सुफल आगम जम राया ॥ 
कर्म बिसारद बम्हन ताईं । फरकत अधर बोलि खिसियाईं ॥ 

बिप्राधम सो करि न कहिहु जो नस्बर फल दाएँ । 
जग निंदा के जोग तुम अह कस भेस बनाए ॥ 














  


 





  



  






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