Sunday, 15 May 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५२ ।। -----


सोमवार, ०९ मई, २०१६                                                                                      

माई तुहरे राज दुलारा । लरत लरत मुरुछित महि  पारा ॥ 
एकु हय तज निज मग बन आईं । छाँडिसि जिन्ह केहि महराई ॥ 

पढ़ि पतिया ता सिरु संवराईं । रिसत पुनि बाँधेउ बरिआई ॥ 
गहे रसन हरन  करि लीन्हा । भले घर जनि बायन दीन्हा ॥ 

गहि चतुरंगिनि सेन बिसाला । धरिअ नाउ निज जगद कृपाला ॥ 
कहहि पाति सो नृप जग जाना । गरुत मान बहुतहि सनमाना ॥ 

 बरजत हठि गहि रहइ तुरंगा । भय भयंकर समर ता संगा ॥ 
जोग बान  धनु रसन बिताना । काँपी भूमि सेष  अकुलाना ॥ 

सम्मुख रिपुदल गंजन भारी । जीतिहि जग तापर महतारी ॥ 
तोर तनुज ऐसेउ जुझायो । करत पराजित मारि गिरायो ॥ 

तदनन्तर ते उठि धाइ लरिहि बहोरि बहोरि । 
लागि नयन परसिहि करन धुनुरु रसन सर जोरि ॥ 

बुधवार, ११ मई, २०१६                                                                                           

चढ़ि चढ़ि रिपुदल करिहि प्रहारा । जीतिहि पुनि पुनि तनुज तिहारा ॥ 
आएँ जोइ को ता समुहाई । गिरी महि परि न त गयउ पराई ॥ 

दलनायक नृप मुरुछा देऊ  । बिहनई बिजै कलस गहेऊ ॥ 
परे भूमि कछु कल बिहाई । महिपत मुरुछा गयउ दुराई । 

 करि करि केहरि नाद पचारा । करष पनच भर नयन अँगारा ॥ 
बधि लवनासुर सो सर जोरा । छाँड़त भयउ रवन घन घोरा  ॥ 

गयउ गगन गहि अगन अपारा । मेलि पवन भू चरन उतारा ॥ 
चरत बेगि पुनि हरिदै घाता । तव सुत पुकारेसि हा भ्राता ॥ 

सबल दल बादल अह भिरिहि एकल बाल बीर बलवान ते । 
पैसि हरिदै पुर बधि लवनासुर दिए मुरुछा तेहि बान ते ॥ 
कातर निहार महि गिरति बार जोग पानि जनि जनि जपयो । 
जुगत जगत महि  महतिमहिपत धर्म बिरुद्ध संग्राम कियो ॥ 

नीरज नीरज नयन में मन मंदिर में राम । 
अनुरनन चारु चरन में मुखरित नूपुर दाम ॥ 

शुक्रवार, १३ मई, २०१६                                                                                          

निर्मल जल कल कंठ पुराई । गइ नदि कूल कलस भरि लाई ॥ 
परन कुटी गन अजिरन सींचे ।  बैसि जगज जनि तरु बर नीचे ॥ 

गहबर गुहा बिटप घन घोरा । कंकर कंटक कठिन कठोरा ॥ 
बसि बट छाँह भई बनबासी । चातक पलक पिय प्रेम पियासी ॥ 

तापस तिय  तन भेस बिराजा । मन अनुरक्त चरन रघुराजा ॥ 
लिखिहि बिधाता जोग बिजोगा । बसिहि महबन तजे सब भोगा ॥ 

लसत तहाँ मुनि मंडल कैसे । बिकसि महजल पदुमदल जैसे ॥ 
सीस नवहि जनि सोहति कैसे । सोहहि लख्मी मूरति जैसे ॥ 

करि केहरि बृक निकर कपिंदा । खग मृग घिरि तप मगन मुनिंदा ॥ 
सब साथहि एकु नाथ न साथा । सोइ साँथरि सोए बन गाथा । 

चित्त लीन पिय चरन में मृग लोचन आकास । 
राम अवध सिया बन में साँस साँस उछबास ॥ 

रविवार, १५ मई, २०१६                                                                                          

 बिथरित दिनु राति जेहि भाँती । मातु बिरह गति कहि किंमि जाती ॥ 
बिहरत नभ जब नयन बिहंगा । भारभूत भए जलज प्रसंगा ॥ 

बटुक कहन रत कहरत बानी । घनकत श्रवन रंध्र महुँ आनी ॥ 
पलक पाँखि भू चरन उतारिहि । बालकन्हि हहरात निहारिहि ॥ 

जगज जननी जानकी माता । धर धीरजु सुनि सब कहि बाता ॥ 
बिषाद बस भरि मनस ग्लानी । बोलि  नेहमय मंजुल बानी ॥ 

आहु निरदय कवन सो राई । करि यह करतन दया न आई ॥ 
दल बिनु निर्बल बालक जोधा । निज बल मद ता संग बिरोधा ॥ 

 अधरम के कर मति मलिनाई । मम लरिका सों जाइ जुझाईं ॥ 
साँच असाँच न खलभल देखा । दलबादल बल पाए बिसेखा ॥ 

धिंगई धरासाई किए भेद हृदय दय बान । 
मदोद्धत बस आपुनो मन महुँ बहु बड़ जान ॥ 

मम सुत प्रमथित मारि गिरइहीं । कहहु सो नृप अजहुँ कहँ जइहीं ॥ 
यह प्रभुता अरु यहु मनुसाई । प्रमदित छात्र करम बिसराई ॥ 

एही बिधि सती जानकी माता । मुनि बालक सहुँ कहि रहि बाता ॥ 
बीर कुसहु तहँ ऐतक माही । महरिसि सहित कुटी पद दाहीं ॥ 

निरख ब्याकुल मुख्य जननी के । द्र्वन् दीठ दारुन दुःख जी के ॥ 
तापस नयन गगन घन घारिहि । पाहन बदन नीर निर्झारिहि ॥ 

करष गिरा करि बचन  कठोरा । बोलहि चितइ जननि की ओरा ॥ 
मोरे रहत तोहि पर ऐसे । आन परे विपदा कहु कैसे ॥ 

संग्राम सूर बीरबर रिपु मर्दन लघु भ्रात । 
दरसि न मोहि कतहुँ कहा भाँवरही हे मात ॥ 

मंगलवार, १७ मई, २०१६                                                                                     

करुनामय मन धीर धराईं । बोलहि सोक सनेहिल माई ॥ 
रे सुत जहँ लग मोहि जनाया । त्यागिहि मेधि तुरग एकु राया ॥ 

भँवर भूमि यहँ आ निकसाहीं । लव बरियात बांधेउ ताहीं ॥ 
रन कृत बिजित सबै संसारा । पिछु पिछु सो नृपु आन पधारा ॥ 

 स्याम करन हरन जब जाना । तुहरे भ्रात संग रन ठाना ॥ 
बहोरि ता सहुँ आयउ जोई । जूझत मार् गिरायउ सोई ॥ 

मरियो जब रच्छक बहुतेरे । सबल दल बादल एकल घेरे ॥ 
नृपकर मुरुछित भयउ बिहाना । बाँधनि परियो उर गह बाना ॥ 

मुनि बालक आएं बहोरि जोइ गयउ ता संग । 
तहँ जस दरसिहि तस मोहि कहि सो सकल प्रसंग ॥ 

बुधवार, १८ मई,२०१६                                                                                                   

जोग समउ रे सुत तुम आयउ । ता सों मम उर कछु हरुयायउ ॥ 
बलवन बीर कवन सो नाहू । लए बालक तहँ जाइ जनाहू ॥ 

रिपुहु दमन रन भूमि पौढ़इउ । बरियात निज भ्रात छँड़ाइहउ ॥ 
कुस बीरोचित उत्तरु देबा । जननी जान अजहुँ तुम लेबा ॥ 

तोरे सों तहँ मोर गयंदू । बंधन मोचित भए मम बंधू ॥ 
बोहित सैन होकि महि पाला । साधिहुँ तापर धनुष कराला ॥ 

आवैं अमर देउ जो कोई । ता पुनि साखि रुद्र किन होई ॥ 
तीछ बान  बरु  मारिहुँ ओही । अजहुँ रोध न सकहिं को मोही ॥ 

समर भुइँ पौढ़ाए दहौं , करत ब्याकुल ताहि । 
भ्रात लवहि छड़ाए लहौं, रुदन करौ तुम नाहि ॥   

 बृहस्पतिवार, ९ मई , २०१६                                                                                 

जो को सूर बीर रन रंगा | भिरिहि अबिचल सबल दल संगा || 
गहत मुरुछा गिरैं जब कोई |सोइ जगत कीरति कर होई || 

होइ बिमुख जो समर पराना | तिन्ह कर  हुँत कलंक न आना || 
खत सेष श्रुत कुस के बचना | भई मुदित मुनि बर सुभ लछना || 

नाना आयुध दय  उर लायो | बिजै हेतु निज आसिर दायो || 
कहि पुनि समर खेत सुत जाहू | मुरुछित लवनहि लेइ छँड़ाहू || 

जननी कर अनुसासन पायो |  तन कल कुंडल कवच चढायो  || 
सँवरत बाहु सिखर धनु बाना | परस चरन बहु बेगि पयाना || 

नयन अगन अँगार धरत चरत पयादहि सोए  | 
समर काम संग्राम भू , द्रुत गत उपनत होए ||  

रविवार, २२ मई, २०१६                                                                                      

पैसत तहँ लव देइ दिखाई । तब लगि मुरुछा गयउ बिहाई ॥ 
जूझत जिन्ह रिपुहन्हि दाया । रसरि बस रथ रहेउ बँधाया ॥ 

देखि रन भू भ्रात कुस आयो । प्रमुदित भए मन बदन लसायो ॥ 
पाए पवन जिमि दहन दहाईं । दरसि सहोदर तसहि सहाई ॥ 

रथ सो आपनु आप छँड़ावा । संग्राम हेतु छूटत धावा ॥ 
रिपु समूह रहि चहुँ दिसि ठाढ़े । करात बिकल लव साहस गाढ़े ॥ 

प्राग दिसा ते कुस बढ़ि आगे । सकल बीरन्हि मारन लागे ॥ 
कोपत लव पाछिन दिसि तेईं । हनत सबहि उत्पीरन देईं ॥ 

एक पुर लव कर सिली मुख, दुज सों कुस के बान ॥ 

सबल सैन सही न सकीं साँसत में भए प्रान ॥ 

बर बर आयुध ढार प्रहारिहि । सबु बीरबर समर हिय हारिहि ॥ 
गहबर गरुअ पलक हरुआई । दरसिहि बिनु पत तरु के नाई ॥ 

तोय निधि जूँ तरंग उताला । तासम भयउ कटकु बिसाला ॥ 
हॉट छुभित रन भँवर समाईं । छतवत आईटी उत गयउ पराई ॥ 

कोउ समर हुँत ठाढ़ न होईं । अकाल मरन चहत नहि कोई ॥ 
तेहि समउ रिपुगन दमनंता । समर जीत संताप दयंता ॥ 

जाकर रूप लवहि सम लागिल । तासु जुझावनु हुँत बढ़ि आगिल ॥ 
चितइ चितब ता सम्मुख आवा । गयउ निकट स पूछ बुझावा ॥ 

लरिहु स कहु कवन तुम्ह हे रे मह बलवान ।
रूप रंग माहि अहहू निज लघु  भ्रात समान ॥ 

मंगलवार, २४ मई, २०१६                                                                                                 

गहिहउ सुत बल बाहु अपारा । कवन गाँउ क का नाउ तिहारा ॥ 
कवन जननि को जनिमन दाता । कहहु स्याम मनोहर गाता ॥ 

पाति ब्रता धर्म अनुपाला । जनक सुता सिय के हम बाला ॥ 
बाल्मीकि मुनि पाल्यो ताता । पूजौं तासु चरन दिनु राता ॥ 

दुःख पर हमहि जन्म जो देबा । करत  सदा सो जनि कर सेबा ॥ 
घन बन गोचर हम बनबासी । मुनिबर कुटिया रहए सुपासी ॥ 

सब बिधि बिद्या माहि प्रबीना । बाल्मीकि गुरुकर दीना ॥ 
तासु नाउ लव कुस मम नाऊ । अब तुम निज परचन दौ राऊ ॥ 

लगिहु समर स्लाघा धर बीर सरिस तुम मोहि । 
गहिहु चौरंगी सेन पुनि हय हस्ती रथ रोहि ॥ 


शुक्र /शनि, ०८ ०९ जुलाई, २०१६                                                                                   

धौल धुजिनि धर यहु बर बाहा । कहहु तात तिन तजिहउ काहा ॥ 
जो जथारथ बीर तुम होहू । गहौ धनुर जूझौ मम सोहू ॥ 

अजहुँ बध करि डारिहुँ तोही । सिआ कुँअरु पुनि कहिहु न मोही ॥ 
रघुकुल दीपक एहि बलबाना । कुस कर कहि रिपुहन जब जाना ॥ 

भयउ तासु मन अचरजु भारी । गहे धनु भरि नयन अँगारी ॥ 
दरस ताहि करि कोपु प्रचण्डा । गहेउ कटुक कठिन कोदंडा ॥ 

बहोरि पाँख हो कि प्रतिपाखा । चलावहिं बिसिख लाखहि लाखा ॥ 
परस गगन निज धुजा पताका ।  चलेउ जुग जुग रसन सलाका ॥ 

घहरहि गहबर घन के नाई । ब्यापत छितिज नभ पर छाईं ॥ 
लाईं झरि बृष्टि रूप धरहीं । नयन नयन बहु बिस्मय भरहीं ॥ 

तबहि उद्भट सिआ कुँअर  धनुष रसन कर जोग । 
करषत नारायनास्त्र, रिपुपर करिहि प्रजोग ॥ 

सो सायकहु पीरा न दयऊ ।  मर्म भेद बिनु बिरथा गयऊ ॥ 
गहे धनुष दरसिहि जबु ताहीं । कोप ज्वाल नयन न समाहीं ॥ 

कहत सियासुत सुनहु भुआला । गहिहु कंठ तुम बहु जयमाला ॥ 
सूर बीर बहु बहु बलवन्ता । संग्राम जीत तुम महमंता ॥

कटुक नरायनायुध किन होई । यह तोहि बाध सकै नहि कोई ॥ 
तथापि सुनु हे सुबुध सुजाना ॥  भुजा उठा मैं एहि पन ठाना || 

अजहुँ कठिन त्रइ सायक सोही । झटति मार गिरइहौं न तोही ॥ 
जौ तन कोटि कोटि पुन तेऊ । दुर्लभ मानस जनम लहेऊ ॥ 

मान बस करिहि निरादर लगिहि पाप जो ओहि । 
बिनु संसय लहउँ तव सहुँ आन लगै सो मोहि ॥ 

चैतन मन ए बचन सुनु राजा । पहुमि परन अब होउ समाजा ॥ 
करषत कुस ऐसेउ कहावा । गह करतल धनु बान चढ़ावा ॥  

चलिहि गगन सो बान कराला । काल अगन सहुँ बदन ब्याला ॥ 
रिपुहन हरिदै भवन बिसाला । तकि अस जस प्रबिसिहि तत्काला ॥ 

दरसत इत कुस सर संधानिहि । छोभत अति सो बहु रिस मानिहि ॥ 
सुमिरत मन ही मन रघुकंता । डारि दियो महि काटि तुरन्ता ॥ 

कटत बिसिख करि कोप अपारा । भभुकत भए दुहु नयन अँगारा ॥ 
दमक दूज बान संधान के । परसिहि करन रसन बितान के ॥ 

रिपु के हरिदै भवन निहारहि । भेदन मर्म रहेउ बिचारहि ॥ 
रिपुदवनु तेहि काटि गिरायो । नयन अगन अरु प्रबल दहायो ॥ 

लखि लखि लाल ललाम ते, भयउ सेंदुरी रंग । 
गिरिहि पल्किनि पाँखुरिया उठिहि त छुटिहि पतंग ॥ 

सुमिरत निज जनि पद नत माथा ।  पुनि  तीसर सायक गहि हाथा ॥ 
सोच करत रहेउ मन माही । अरिहन काटि निबेरन ताहीं ॥ 

तबहि बान सो परसत बाहू । धँसेउ उरसिज सोर न काहू ॥ 
स्त्रवत रुधिरु करिहि अति घायल । आह रिपुहंत  गिरिहि अवनि तल ॥ 

खात अघात परेउ भरि छारा । कटकु बीच भए हाहाकारा ॥ 
भरे बिपुल बल बाहु बिसाला । भयउ जयंत कुस तेहि काला ॥ 

जब रिपुदवनु परे महि पायो  । बीर सिरुमनि सुरथ अनखायो ॥ 
कहत सेष मुनि संजुग साजू । बहुरि सहित सब सैन समाजू ॥ 

 बिचित्रित अति बिसमय जनक मनिमय दिब्य अनूप । 
रतिवर रथ राखि सौमुख, तमकि चढ़े सो भूप ॥  





















 

    




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