Monday, 11 July 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५३ ।। -----

पहुँच आसु करि कुस कै आगे । अनेकानेक सर छाँड़न लागे ॥ 
बधि बधि भाल बदन कर बाहू । भेद मर्म दिए दारुन दाहू ॥ 
राजा सुरथ शीघ्रता पूर्वक वहां पहुंचे |  रथ को कुश के सम्मुख करते हुवे वह अनेकानेक बाण छोड़ने लगे |  भाल, वदन, हस्त व् बाहु में घात पर घात करते हुवे मर्म को भेदकर कुश को कठिन पीड़ा से संतप्त कर दिया | 

करिअ बिकलतर अस रे भाई । घायल व्यथा कहि नहि जाई ॥ 
तब कुस रिजु कस सर दस मारे । सुरथन्हि रथ सोंहि महि डारे ॥ 
इस  प्रकार वीरों के शिरोमणि राजा सुरथ ने कुश को ऐसे व्याकुल कर दिया कि घायल अवस्था में मुझसे उनकी व्यथा कही नहीं जाती | तब कुश ने भी प्रत्यंचा कर्षित कर दस बाण छोड़े और  राजा सुरथ को रथ से भूमि पर धराशाई कर दिया | 

पनच चढ़ेउ कठिन कोदंडा । काटि बेगवत किए खनखण्डा ॥ 
दिव्यास्त्र छाँड़ै केहि एका । दूज प्रतिहरन हनहि अनेका ॥ 
प्रत्यंचा चढ़ाए हुवे उनके सुदृढ़ धनुष को वेगपूर्वक काटते हुवे खंड-खंड कर दिया | जब उनमें से कोई एक दिव्यास्त्र का प्रयोग करता तब दुसरा उसका प्रतिकार करते हुवे अनेकाने अस्त्रों का प्रयोग करता |  

छेपायुध जो कोउ प्रहारिहि । तुरगति प्रतिहति तुरति बिदारहि ॥ 
एहि भाँति भयउ दोनहु ओरा । लोमनु हरख समर घन घोरा ॥ 
जब एक पक्ष क्षेपायुध से प्रहार करता तब दूसरे पक्ष द्वारा आतुरता पूर्वक प्रतिघात करते हुवे उसका भी निवारण कर दिया जाता | इस  प्रकार उन दोनों वीरों के मध्य लोमहर्षक घनघोर संग्राम होने लगा | 

सोचि सिया कुँअरु अबु करि चाहिब कृत का मोहि । 
लेन जिआरी उद्यत अह सहुँ मम परम बिद्रोहि ॥ 
तदनन्तर सीता पुत्र कुश ने विचार किया अहो ! यह सुरथ मेरा परम विद्रोही हो गया है और मेरे प्राण लेने को उद्यत अब मुझे क्या करना चाहिए | 


बुधवार १३ जुलाई, २०१६                                                                                         


करतब ठान लच्छ अनुमाना ।  गहेउ हस्त कटुक एकु बाना ॥ 
छूट सो काल अगन समाना । प्रजरत चला कला कृत नाना ॥ 
तब कर्तव्य का निश्चय कर लक्ष्य का अनुमान किया तथा एक तीक्ष्ण एवं भयंकर सायक हस्तगत किया | छूटते ही वह  कालाग्नि के समान प्रज्वलित होकर नाना कलाएं करता आगे बढ़ा | 

देख्यौ सुरथ आगत ताहीं । सोचि बिदारन जूँ मन माही ॥ 
त्योहिं कठिन कुलिस के भाँती । धँसा बेगि परिछेदत छाँती ॥ 
उसे अपने सम्मुख आते देख सुरथ ने ज्योंही मन में उसके निवारण का विचार किया, त्योंही वह महासायक तीव्रता पूर्वक उनके वक्ष में धंस गया |  

परा रथोपर रन हिय हारे । तरपत हे रघुनाथ पुकारा ॥ 
सारथि निज पति हतचित पावा । रन भू  सोंहि बहिर लय आवा ॥ 
सुरथ मूर्छा को प्राप्त होकर रथ पर गिर पड़े व् पीड़ा से तड़पते हुवे रघुनाथ को पुकारने लगे | सारथी ने अपने स्वामी को जब रथ में अचेत पाया वह तब वह उन्हें रणभूमि से बाहिर ले गया | 

हार रन हिय सुरथ गिरि गयऊ । सिया कुँअर कर बिजई भयऊ ॥ 
देखियत इयहि पवन कुमारा । सहसा एकु बड़ साल उपारा ॥ 
इस प्रकार सुरथ परास्त होकर धराशाई होने पर  और सीता पुत्र कुश विजयी हुवे-- यह देखकर पवन कुमार हनुमान जी ने सहसा एक विसहाल शाल का वृक्ष उखाड़ लिया | 

धावत बेगि जाइ निकट, दए बल अतुल अपार । 
झटति डारेन्हि तापर, करियहि घोर प्रहार ॥ 
वेगपूर्वक दौड़ते वह कुश के निकट गए और अपरिमित बल के साथ उस वृक्ष को तत्क्षण प्रक्षेपित करके उनपर पर घोर प्रहार किया | 

द्रुम घात तैं चोट गहावा । संहारास्त्र लेइ उठावा ॥ 
अजित अमोघ सकती अस होई । लागत सीध बचै नहि कोई ॥ 
उस वृक्ष के आघात से चोटिल होकर कुश ने संहारास्त्र उठाया जिसकी शक्ति ऐसी दुर्जय  व् अचूक थी  व् शत्रु पर सीधा प्रहार करती थी इससे किसी का बच पाना कठिन था |  

बिलोकत ताहि प्रबल हनुमाना । बिघन हरन के करिहि ध्याना । 
देत घात घन ऐतक माही । हनुमन उरसिज आनि समाहीं ॥ 
उस अस्त्र का अवलोकन कर बलशील हनुमान विध्न हर्ता श्री राम चंद्र जी का ध्यान करने लगे | इतने में ही वह अस्त्र करारी चोट देते हुवे उनके वक्ष में समा गया | 

होइहि अह ब्यथक सो भारी । पीर भरत करि बहुंत दुखारी ॥ 
हतत आतुर मूरुछा दयऊ ॥ सुनु मुनिबर आगिल का भयऊ ॥ 
आह ! वह चोट की उस गहन वेदना  ने हनुमान जी को पीड़ा देते कष्ट से व्याकुल कर दिया | उस चोट से वह तत्काल ही मूर्छा को प्राप्त हो गए | हे मुनिवर ! 'तदनन्तर आगे जो हुवा उसे सुनो | ' 

हनुमत होइ गयउ हतचेता । सीता नंदन तब रनखेता ॥ 
कसि कसि रिजु असि बान चलायो ।एक एक तेउ सहस बनि धायो ॥ 
जब हनुमान भी मूर्छित हो गए तब सीता के पुत्रों ने राण क्षेत्र में प्रत्यंचा को कर्ष-कर्ष कर ऐसे बाण चलाए की वह एक एक बाण से सहस्त्र बाणों में परिणित होकर दौड़ने लगे | 

लपक लपक लागेउ तिमि जिमि गहि कालहि खाहि ।  
चतुरँगनि पराई चली, कहति त्राहि मम त्राहि ॥ 
ततपरता पूर्वक प्रतिपक्ष को ऐसे जा लगते जैसे उन्हें काल ही कवलित कर रहा हो | राम जी की चतुरंगिणी सेना इस आक्रमण से त्राहि त्राहिकर  भाग खड़ी हुई | 


बृहस्पतिवार १४ जुलाई  २०१६                                                                                             
भाँपत ए सब  मरनि निअराई  । अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥ 
कपि राजु सुग्रीउ तेहि काला । आनि सँभारेउ सैन बिसाला ॥ 
अब मृत्यु निकट है यह भांपते ही सब भय से अत्यधिक आक्रान्त हो उठे, फिर कोई  सम्मुख नहीं हुवा | उस समय कपराज सुग्रीव ने उस विशालवाहिनी के संरक्षक हुवे  | 

ऊंच ऊंच सो बिटप उठावा । नभ रव पूरत कुस पहिं धावा ॥ 
देइ बिदारिहि बिनहि प्रयासू । टूक टूक होइब सब आसू ॥ 
वह ऊँचे ऊँचे वृक्षों को उठाकर नभ को शब्दवान करते कुश की ओर दौड़ पड़े | कुश ने उन्हें प्रयास के बिना  उन सभी वृक्षों को शीग्रता पूर्वक विदीर्ण करके खंड-खंड |  

तबु कपिप्रभु एकु सेल उपारा । ताकि तमकत माथ दए मारा ॥ 
बिहुरत बनावरि  दरसत  ताहीं  । कन कन करि डारिहि छन माही ॥ 
तब कपिनाथ सुग्रीव ने एक भयंकर पर्वत  उखाड़कर कुश के मस्तक का लक्ष्य करते हुवे उसे तमक कर दे मारा | उस पर्वत को आते देख कुश ने शीघ्र ही सैकड़ों बाणों का प्रहार करके उसे चूर्ण चूर्ण कर भूमि पर गिरा दिया |  

करत धूर पुनि उड़इँ अगासा । भइ धूसर  रन भुइ चहुँ पासा ॥ 
लगन जोग मह रूद्र समाना । भए सो भूधर भस्म प्रमाना ॥ 
तत्पश्चात उसे धूल-धूल कर आकाश में उड़ा दिया | रण- भूमि भी चारों और से धूल-धूसरित हो गई| वह  पर्वत अब  महा रूद्र के शरीर में लगाने योग्य भस्म सा हो गया था  | 

मारि भालु कपि घायल कीन्हि । जो उचित जस तस फल दीन्हि ॥ 
बालक के बल बिक्रम अतीवा । देखिहि अचरजु भरे सुग्रीवा ॥ 
भालू एवं कपियों को चोटिल कर उन्हें घायल अवस्था में पहुंचा दिया जिसके लिए जो उचित था उसे वही फल दिया | बालक का ऐसा महान पराक्रम देखकर सुग्रीव को अत्यंत आश्चर्य हुवा | 

चित्रलिखित समेत कपिप्रभु चितवहि भर प्रतिसोध । 
प्रताड़न ताहि बिटप एकु गहि अतिसय कृत क्रोध ॥ 
ऐसी स्तब्ध दशा व् प्रतिशोध से भरी दृष्टि से सुग्रीव कुश को देखते रहे | फिर उन्होंने उसे  प्रताड़ित करने के लिए रोषपूर्वक एक वृक्ष हाथ में लिया | 

ऐतक महुँ लव के बड़ भाई । बरनायुध चुनि चापु चढ़ाईं ॥ 
पुनि चित्रकृत निज बल दिखरायो । बरुण पास कपि सुदृढ़ बँधायो ॥ 

लपटाहि जिमि कोउ उरगारी । बँधत गिरे रन भूमि मझारी ॥ 

निरखिहि जुधिक परे निज नाथा । धाएउ इत उत भय के साथा ॥ 

पुष्कल अंगद कि प्रतापाग्रय । बीरमनि हो चहे अन्यानय ॥ 
बीरसिरोमनि भ्राता दोई । बहोरि बिजै कलस कर जोई ॥ 

करत हताहत सकल  भुआला । दोउ भ्रात गहेउ जयमाला ॥ 
दोनउ भात परस्पर हेलिहि । हरषित  मनस मुदित मन मेलिहि ॥ 

गहे गुरु चरण बसिहि सघन बन भेसु धरेउ  जिमि कोउ जति । 
मख तुरग निबंधु दोनहु बंधु मह मह बीर ते बीर अति ॥ 
बाल मराल कोउ भुआल न सहुँ चतुरंगी बाहिनी । 
चले गगन सर भाल कराल तथापि जीति बिनहि अनी । 

हरखिहि सुर न त बरखिहि सुमन न कोउ अस्तुति गाए  । 
न कतहुँ दुंदुभि बजावहिं बिजित सुभट समुदाए ॥  

शुक्रवार १५ जुलाई, २०१६                                                                                     


मुदित मनस बहु हरखित गाता । बोलेउ लव सुनहु मम ताता ॥ 
होइहि तुहरी कृपा अपारा । समर सिंधु पायउँ मैं पारा ॥ 

अजहुँ भई रन बिजै हमारी । हेरै कोउ सुरति चिन्हारी ॥ 
कहत अस लव सहित निज भाई । प्रथमहि रिपुहन पहिं नियराईं ॥ 

गयउ तहाँ दुहु गहगह गहि कर । हिरनमई मनि मुकुट मनोहर ॥ 
आयउ जहँ पुष्कल महि पारे । कबेलाकृत किरीट उतारे ॥ 

बहुरी बाहु सिखर लगि पूरा । गहि तासु कल कनक केयूरा ॥
कवच कराल भाल सर चंडा । सकेरिहि कछु कठिन कोदंडा ॥ 

बांध्यो जाइ पहिं बानर राजु अरु महबली हनुमन्तहि । 
कहत लव निज भ्रात सों तात लै जइहौं कुटीरु दुनहु गहि ॥ 
तहँ मुनि बालक केलिहि ता सँग मोरु मन रोचन होइहीं ।  
राख्यो निकट तुरग थल लाई दुहु बंधु करत अस बत कही ॥ 

जोहति सुतहि पंथ जगज जननि मातु श्री सोभामई । 
थिर थिर थकी ढरयो रबि दिनु बिरत्यो अरु साँझ भई ॥
अँधेरिया जग घेरिया जग जगमग जोत जुहार करे  । 
बरति बिलग जोहहि द्वार लग दीपन मनि सार भरे ॥ 

सुभ बसन भूषन बँधि कपिगन तुरग सहित सादर चले । 
जाइ सिया पहिं अरपिहि चरन नत भेँट भूषन जे भले ॥ 
आगत देखि दुहु बाल मराल मुदित बहु लोचन भरी । 
लाइ हरिदै सनेह सहित दुइ पलकन जल बिन्दु धरी ॥ 

चकित सकुचित अंचित बदन करि ढारि दृग पट हरयरी । 
परचत कपिगन भेंट भूषन सहसा सिहरति अति डरी ॥ 
उठि त्याजत निबंधु छोरि कहि सुत जाहु दुहु कै पग परौ  । 
कपिराजु बली महबीर जे अबिलम अतुरै परिहरौ ॥ 

जे महमन हनुमन भयउ रघुबर केर सहाइ । 
भस्म भई लंका पुरी दनुपत गयउ नसाइ ॥ 

रविवार, १७ जुलाई, २०१६                                                                                        

जे बलबन कपि भल्लुक नाहा ।  कहु दोनहु अस बाँधिहु काहा। 
मारि कुटत पुनि करिहु अनादर । रे बच्छर धिक् धिक् तुहरे पर ॥ 

बोलेउ सुत सुनहु हे माता । राम नामु नृपु एकु बिख्याता ॥ 
बीर सिरो मनि बहु बलवंता । दसरथ तनय अवध के कंता ॥ 

तेज तुंग एकु तुरग त्याजे। सुबरन पतिआ भाल बिराजे ॥ 
नाउ परच बल बिक्रम बिसेखे । परन परन बिबरन यहु लेखे ॥  

बलबन आपनु समुझिहि जोई । हरिहु ताहि बढ़ सद् छत्रि सोई ॥ 
न त मम सम्मुख अवनत माथा । समरपिहु राज पाट जुग हाथा ॥ 

दरस ढिठाई महिपु की साँच कहएँ हे मात । 
अहा हठात जाई पहिं बाँध लिये बरियात ॥ 

सोमवार, १८ जुलाई, २०१६                                                                                           

 पुनि सो समर बीर बल पूरा । गरज गहन रन भेरि अपूरा ॥ 
बरूथ बरूथ भट हमहि पचारे । किए घन घोर समर गए मारे ॥ 

मौलि मुकुट एहि रिपुदवनू के । ए कल कीरिट भरत नंदनू के ॥ 
बोलिहि  मातु पुनि मुख नेहि के । गहिहु तुरग कहहु सो केहि के ॥ 

प्रथमहि हम जो तोहि जनाईं । सोए रघुबर तासु गोसाईँ ॥ 
 रे बछर तुम करिहउ न न्याए । हरिहु तुरग रघुबीर परिहाए ॥ 

अनेकानेक बीरन्हि हनिहउ । पुनि बाँध कपिगन सुठि न करिहउ ॥ 
होए ए करतब कछु भल नाही । सुनु एहि बत नहि तुमहि जनाही ॥ 

जनमदात सो पितु तुम्हारे ।  महा मेध हुँत हय परिहारे ॥ 
सुनु छाँड़त सादर कपि दोऊ । बँधे बाजि परिहरहउ सोऊ ॥ 

सुनत मातु कर बत कही बाल बीर बलवंत । 
साधे मौन मूरत भए सो एकु पल परजंत ॥ 

मंगलवार, १९ जुलाई, २०१६                                                                                   

 पुनि बालक बोलिहि रे माता । अहहीं बेद बिदित एहि बाता ॥ 
सो छत्रि धरम हमहु अनुहारे । महमन महिप समर गए हारे ॥ 

छत्री धर्म अनुहर रन आगी । लागत जनि होत न हतभागी ॥ 

बालमीक मुनिबर पाहिं पढ़े । ए सिच्छा देइ सो हमहि गढ़े ॥ 

छात्र धर्म कह कहिब ग्याता । पिता ते पुत भ्रात ते भ्राता ॥ 

सिस समुह चहे गुरु किन होईं । जूझत रन भू पाप न होई ॥ 

तद्यपि जसु तुहरे अनुसासन । बंधे बाजि बर करिअ बिमोचन ॥ 

ता संगत बहरिहिं कपि दोऊ । होइहि सोए कहब तुम जोऊ ॥ 

अपूरत निज मंजुल मुख मध्यम मधुरित बानि । 
सिरु नत बहु बिन्यानबत दोउ जोग जुग पानि ॥ 

बृहस्पतिवार, २१ जुलाई, २०१६                                                                                     

जग बंदित मातु अस कहयऊ । गए दुहु तहाँ जहाँ रन भयऊ ॥ 
लए कपीस गन आगिल बाढ़े । तुरंगम सहित दिए दुहु छाँड़े ॥ 

दुहु सुत करम कटकु बिनसाई । सुनिहि सुतहि मुख जबु जग माई ॥ 

प्रणति चरनन सुरति भगवाना । मन ही मन पुनि करति ध्याना ॥ 

सदागतिबत सबहि के  साखी । भगवन केतु कंत पुर लाखी ॥ 

कहि करुणित हे दिनकर देऊ । जौं मैँ मन क्रम बचनन तेऊ ॥ 

बंदउँ चरन श्री रघुबरहि के । भजेउँ भजन न आन केहि के ॥ 

तौ मरनासन नृपु रिपुहन्ता । अजहुँ छन महुँ होएँ जीयन्ता ॥ 

 बिरुझत बिदरत बहु बरियाईं । मोर तनय ते गयउ नसाई ॥ 

रकताकत अनी सोउ भारी । मोर सत सोहिं होए जियारी ॥ 

पतिब्रता सति जानकी जस अस बचन  उचारि ।  
तैसेउ मरति जिअत उठि बिनसि सैन सो भारि ॥ 

शुक्रवार, २२ जुलाई, २०१६                                                                                      

कहत सेष सुनु मुनि बिद्वाना । छन महुँ मुरुछा गयउ बिहाना ॥ 
जगएं जगज जिमि सयन त्यागे । मरनासन रिपुहन जिअ जागे ॥ 

लहि सुभु लच्छन गहि गुन गाढ़े  । देखि तुरग निज सम्मुख ठाढ़े ॥ 
मनि मुकुताबलि मुकुट न माथा । धनु बिनु कर भुज सिखर न भाथा ॥ 

निरजिउ परेउ अनि जिअ गयऊ । संकित मन बहु अचरज भयऊ ॥ 
चितबत चित्रकृत नयन अलोले । जागत सुबुध सुमति सहुँ बोले ॥ 

जौ नहि जति नहि कोउ भुआला । कृपा करत सो बाल मराला ॥ 
बाँधेउ बाजि बल दिखरायो । मख अपूरनन दए बहुरायो ॥ 

गहरु करब कछु लाह न आही । चलहु बेगि अबु रघुबर पाहीं ॥ 

अह लोचन पथ लाइ के जोह रहे रघुराय । 
असि कहत चढ़ि राजहि रथ समर भूमि सिरु नाइ ॥ 

शनिवार, २३ जुलाई, २०१६                                                                                       

राजत रथ रथि लेइ तुरंगा । चलइँ चरन पथ पवन प्रसंगा ॥ 
चतुरंग अनि आयसु सिरु धारे । चलिहि पाछु सबु साजु सँभारे ॥ 

बाजिहि भेरि न संख अपूरे । गयउ बेगि आश्रमु ते दूरे ॥ 
अगमु पंथ गहन बन गिरि ताला । तीर तीर तरि तरुबर माला ॥ 

देइ दरस जबु भयउ बिहंगा । तरंग माल सुसोहित गंगा ॥ 
पार गमन आयउ निज देसा । मरुत गति सों कीन्हि प्रबेसा ॥ 

 पौर पौर पुर  नगर निकाई । पुरजन परिजन  बसित सुहाईं ॥ 
कंध कठिन कोदण्ड सम्भारे । सैन सहित रिपुहन मन मारे ॥ 

बीर भरत कुँअर कर सथ लेइँ सुरथ सँग माहि । 
रथारोहित जाहिं चले रघुकुल कैरव पाहि ॥ 

सोमवार, २५ जुलाई २०१६                                                                                          

बहुरि बिहुरत चरत सब डगरी । आएँ समीप अजोधा नगरी ॥ 
अमरावति जसि अति मन मोही । रबि बंसज बन संग सुसोही ॥ 

परस नभस धुर धुजा उतोले । हरुबर हरुबर पवन हिलोले ॥ 
सोंहि रुचिर पर कोट अतीवाँ । जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ॥ 

आए  रिपुहन सुनिहि श्री रामा । सवेन सहित हय पहुंचय धामा ॥ 
कह जय जय अतिसय हरषायो । बलबन लछमन पाहि पठायो ॥ 

सैन सहित तहँ आयउ लषमन । भेंटि परबसिया भात मुदित मन ॥ 
रकतारकत चाम चहुँ पासा । पलउ पलउ जिमि पलय पलासा ॥ 

कुसल छेम बुझाई कहि भाँति भाँति बहु बात । 
बलिहि बाहु फेरब भई अतिसय पुलकित गात ॥ 

बुधवार २७ जुलाई, २०१६                                                                                       

लै रिपुहन सथ रथ महुँ बैठे । महमन लषन अवध पुर पैठे ॥ 
जहँ त्रिभुवन कर पावन पबिता । प्रभु पद परसति सरजू सरिता ॥ 

पद पद पदमन पुन्य पयूषा । सरनिहि सरनिहि सस मंजूषा ॥ 
लगए मग लग सुभग सोपाना । सोहति सारद ससी समाना ॥ 

भरत नंदनहि रिपुहन साथा । आगत दरस हरषि रघुनाथा ॥ 
सहित सुभट अति निकट बिलोके । उर अनंदु घन गयउ न रोके ॥ 

बिहबल मन मिलनब जूँ ठाड़े । तुरतई रिपुहनहि कर बाढ़े ॥ 
सघन घाउ नहि खात अघाई । पगु परि बिनय सील सो भाई ॥ 

जनु महि लुठत स्नेह समेटे । उठइ भुजा कसि बरबसि भेँटें ॥ 
गहरईं घन गिरहि जल बूंदी । पेम निमगन पलकन्हि मूँदी ॥ 

परइँ चरन भरतु नंदन सादर करइँ प्रनाम । 
उठइँ लै उर कसइँ बाहु द्रबित दरस पुनि राम ॥ 

शुक्रवार, २९ जुलाई, २०१६                                                                                         

मिलि हनुमत पुनि लमनत बाहू । सुग्रीव सहित मेलिं सब काहू । 
पग परे नृपन्हि हरिदै लाए । भेंटें उमगि सनेहि बहुताए ॥ 

समदत सन्नत सैन समाजू । छुधावंत जिमि पाए सुनाजू ॥ 
गहि पद लगे सुमति प्रभु अंका । जनु भेंटी सम्पद अति रंका ॥ 

प्रफुरित नयन ठाढत समुहाए । आयउ निकट उलसित रघुराए ॥ 
देखि सुमति गदगद गोसाईं । मधुर बचन ते पूछ बुझाईं ॥

जगकर यहु सब राजाधिराजे । पाहुन बनि इहँ आनि बिराजे ॥  
सब समेत धारिअ मम पाऊँ । बाँध क्रम कहु कवन सो राऊ ॥ 

कहौ तुरंगम कहँ कहँ गयऊ । बाँधियब केहि केहि गहयऊ ॥ 
कुसल बंधु मम कवन उपाऊ । केहि बिधि कहु ल्याए छँड़ाऊ ॥ 

कहत सुमति तुम सरबग्य कहु कह कहा जनाउँ । 
पूछिहउ मोहि जोए प्रभु सो बरनत सकुचाउँ ॥ 







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