Tuesday, 8 January 2019

----- ॥ दोहा-द्वादश १६ ॥ -----,

गदहा भए उपाधि लहे जोग भये अपराध |
अधुनातन एहि देस मह साधक भए बिनु साध || १ ||
भावार्थ : - अयोग्यता को योग्यता सूचक पत्रोपाधि व् पद प्राप्त हो रहे हैं योग्य होना अपराध हो गया है | विद्यमान परिदृश्य में कुशलता को देश के संचालनोपकरणसे रहित व् अकुशलता को उससे युक्त किया जा रहा है कैसे चलेगा ये देश.....?

गहे नहि गुन ग्यान जौ होतब सो अगवान |
ग्यानबान दीन करत अब होइहि धनबान || २ ||
भावार्थ : - जिसने गुणज्ञान ग्रहण नहीं किया है जो अयोग्य है वह अब आगे होकर उपाधियों का अधिकारी होगा और योग्य मध्यमवर्गीय ज्ञान वान को निर्धन रेखा के नीचे लाकर रातोंरात धनवान बनेगा.....

अधिकार वादी लोकतंत्र का नया आदेश.....

पाहन होतब नीउँ के भए सो कलस कँगूर |
सेष उठे बिनु होत भरित भवन ते दूर || ३ ||
भावार्थ : - जिन पत्थरों को नीचे रहकर समाज रूपी भवन की नीव होना था समाज का उत्थापक होना था वह पर्वत शिखरों के कंगूरे बनकर ऊँचे पदों, ऊँचे स्थानों पर सुशोभित हो जाएं तब फिर शेष रहे पत्थर रूपी समाज, उत्थित भवन बनने से दूर होता चला जाता हैं |


ऊंचाई सोई भली राखे जिउ जिउ जेहि | 
नीचाई बुरी जौ निज नीच निरखे न केहि || ४ || 
भावार्थ : - वह ऊंचाई उत्तम है जो नीची दृष्टिकर जीव मात्र की रक्षा करे | वह नीचाई निकृष्ट है जो यह नहीं देखती कि उसके नीचे भी कोई है |

औरन की देहरि पड़ा भुल्या अपना मूर | 
धन धरती कइ लाहु मैँ मातुपिता गै भूर || ५ || 
भावार्थ : -दूसरों की देहली में पड़ के अपनी जड़ें भूल गए धन और धरती का इतना लोभ हुवा कि अपने मातापिता, अपने पूर्वज भी याद नहींरहे |

धरम बिहूना मानसा भया दया ते हीन | 
लखत लखत मुख सबन कै गौउ मात भइँ दीन || ६ ||   
भावार्थ : - धरम से निरपेक्ष हुवा मनुष्य दया से रहित हो गया आशा पूरित नेत्र से सब ओर निहारती सर्वकामद गौ माताएं विपदाग्रस्त हो गईं |

जबह करे जुलूम करे बनता फिरे इंसान | 
ख़ौफ़ ख़ावत ता संगत भागे दूर मसान || ७ || 
भावार्थ : - जो जीवों पर क्रूरता पूर्ण व्यवहार कर फिर मनुष्य बना फिरता हो ऐसे भूत से सहमकर तो श्मशान भी दूर भागता है |

धरम न कोउ बिसारिये निकसत जबहीं प्रान | 
धरके काँधे धर्मही लेइ जात श्मसान || ८ || 
भावार्थ : - किसी को भी धर्म का अनादर नहीं करना चाहिए  वह धर्म ही है जो प्राण निकलने के पश्चात मनुष्य को अपना कंधा देकर श्मशान ले जाता है | 

धरम रहित मनुष्य पशु के समान है यदि पशुओं में धर्म होता तो उनकी भी श्मशान में अंत्येष्टि होती 




आँगन में नदिया बही आया मरत पियास |
दासा गोसाईं भया अरु गोसाईं दास ||  ||
भावार्थ : - इस देश से भिन्न इस परधर्मावलम्बियों के भारत आने की इतनी सी कहानी है की एक समय इस देश में समृद्धि की नदियाँ बहने लगी थी ये प्यासे मरते हुवे मरुस्थलों से यहाँ आए प्रथमतः स्वयं दास बने, फिर देश को लूटा, कालान्तर में देश के सम्प्रभुत्व को ही अपना दास बना लिया

बैसे भीतर आपने अपुने सोंहि बिरुद्ध |
स्वाम संगत आपनी करते निसदिन जुद्ध ||
भावार्थ : - और यहाँ अपनों के विरोधी अपने ही भीतर बैठे हैं वे अपने स्वाम्य को अपने सम्मुख किए उससे निसदिन संग्राम करते हैं |

जोग बनाया आपुनो पराए संगत प्रीत |
निज सत हेतु बिरोधता सो तो अनभल रीत ||





No comments:

Post a Comment