Wednesday, 16 July 2025

----- ॥ दोहा-पद 37॥ -----,

धृर्त कृत सद चरित सौं करिआ जबहि बिहार |

उड़त धूर ते धूसरित होत तब संस्कार || 

:--वंचक व कुचरित्र जब सद्चरित्रों के संग विचरण करते हैं तब इस विचरण से उड़ते धूल रूपी कुविचारों के प्रभाव से संस्कार धुंधले होते चले जाते हैं 

अजहुँ भयउ भंड भंडरिए  भाँडन की भरमार |

ता सोंहि संस्कारि गुन पड़िआ जाइ भँगार || 

:-- वर्तमान में निर्लज्ज अनिष्ट की व्यंजना करने वाले उपद्रवियों की बहुलता हो गई है जिनके द्वारा संस्कारों से प्राप्य सद्गुणों का निकृष्ट वस्तु के रूप में पतन हो रहा है 

अपवचन सन दुर्वादन  हृदय के उदगार | 

अंतर की दुर्वासना तासों करत बहार || 

:-- अपशब्द के सह कुत्सित वाक्य ह्रदय के उद्गार स्वरूप होते हैं जिनके माध्यम से अंतर की कुप्रवृत्ति बहिर्गत होती  हैं | 

दुर्बचन एहि दुर्बादन कहत बुराई नाह | 

जबहि हँसी बिनोद करत  रीति रूप निरबाह ||

: - -ये अपशब्दों व दुर्वाद तब निंदनीय नहीं होते जब यह हंसी विनोद स्वरूप पारम्परिक रीतियों के निर्वहन हेतु होते हैं | 

पढ़िए तुलसी मानस में दुर्बादन की रीत | 

सामध सबंधी संगत तासों गाढ़े प्रीत || 

: - - गोस्वामी तुलसी दास रचित रामचरित्र मानस में इस दुर्वादन की मधुर रीति का वर्णन है यह समधीयों के परस्पर संबंधों की प्रगाढ़ता हेतु इस परम्परगत रीत का प्रयोग होता आया है 

जेँवत जेँउनार जौँ जौँ धर मुख सौंधी सोंठ | 

पुर नारि उदगारि गान  करत सजन के गोंठ || 

:--प्रीति भोज्य ग्रहण करते व सुगंध सौंठ इत्यादि मुखोधार्य करते ज्यों ज्यों सज्जन गोष्ठी की रीत परिपूरित  होती है त्यों त्यों पुर की नारियों द्वारा सज्जनों के विनोद स्वरूप उद्गारों का गान किया जाता है | 

कब किया जाता है ये तो पता नहीं............  यही तो रामायण है..... जिसे जानना है वो सुन लें..... 





"साहित्य वही है जिसे पीढ़ियां पढ़ें अन्यथा तो वह पुस्तकालयों में धूल धूसरित होते पृष्ठों का पुला है....."

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